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अंग 709

अंग
709
राग Jaithsree
राग: Jaithsree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
होइ पवित्र सरीरु चरना धूरीऐ ॥
पारब्रहम गुरदेव सदा हजूरीऐ ॥13॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: आपके पैरों की खाक से मेरा शरीर पवित्र हैं जाए। हे प्रभू ! हे गुरदेव ! (मेहर कर) मैं सदा आपकी हजूरी में रहूँ। 13।
सलोक ॥
रसना उचरंति नामं स्रवणं सुनंति सबद अंम्रितह ॥
नानक तिन सद बलिहारं जिना धिआनु पारब्रहमणह ॥1॥
हभि कूड़ावे कंम इकसु साई बाहरे ॥
नानक सेई धंनु जिना पिरहड़ी सच सिउ ॥2॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक॥ जो मनुष्य जीभ से पारब्रहम का नाम उचारते हैं।जो कानों से सिफत सालाह की पवित्र बाणी सुनते हैं और पारब्रहम का ध्यान (धरते हैं)। हे नानक ! मैं उन लोगों से सदा सदके जाता हूँ। 1। एक पति-प्रभू की याद के बिना और सारे ही काम व्यर्थ हैं (भाव।यदि पति-प्रभू को भुला दिया तो….)। हे नानक ! सिर्फ वही लोग भाग्यशाली हैं।जिनका सदा कायम रहने वाले प्रभू के साथ प्यार है। 2।
पउड़ी ॥
सद बलिहारी तिना जि सुनते हरि कथा ॥
पूरे ते परधान निवावहि प्रभ मथा ॥
हरि जसु लिखहि बेअंत सोहहि से हथा ॥
चरन पुनीत पवित्र चालहि प्रभ पथा ॥
संतां संगि उधारु सगला दुखु लथा ॥14॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ मैं उन लोगों से सदा कुर्बान जाता हूँ जो प्रभू की बातें सुनते हैं। वे मनुष्य सब गुणों वाले व सबसे अच्छे हैं जो प्रभू के आगे सिर निवाते हैं। (उनके) हाथ सुंदर लगते हैं जो बेअंत प्रभू की सिफत सालाह लिखते हैं और वह पैर पवित्र हैं जो प्रभू की राह पर चलते हैं। (ऐसे) संतों की संगति में (दुख-विकारों से) बचाव हो जाता है।सारा दुख दूर हो जाता है। 14।
सलोकु ॥
भावी उदोत करणं हरि रमणं संजोग पूरनह ॥
गोपाल दरस भेटं सफल नानक सो महूरतह ॥1॥
कीम न सका पाइ सुख मिती हू बाहरे ॥
नानक सा वेलड़ी परवाणु जितु मिलंदड़ो मा पिरी ॥2॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक ॥ जब पूर्ण संयोगों से माथे पर लिखे लेख उघड़ते हैं (तब) प्रभू का सिमरन करते हैं और हे नानक ! वह घड़ी बरकति वाली होती है (जब) गोपाल हरी का दीदार होता है। 1। इतने असीम सुख प्रभू देता है कि मैं उनका मूल्य नहीं पा सकता। (पर) हे नानक ! वही सुलक्षणी घड़ी कबूल होती है जब अपना प्यारा प्रभू मिल जाए। 2।
पउड़ी ॥
सा वेला कहु कउणु है जितु प्रभ कउ पाई ॥
सो मूरतु भला संजोगु है जितु मिलै गुसाई ॥
आठ पहर हरि धिआइ कै मन इछ पुजाई ॥
वडै भागि सतसंगु होइ निवि लागा पाई ॥
मनि दरसन की पिआस है नानक बलि जाई ॥15॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ (रॅब करके) वह बेला जल्दी से आए जब मैं प्रभू से मिलूँ। वह महूरत वह मिलने का समय भाग्यशाली होता है।जब धरती का साई मिलता है। (मेहर कर) आठों पहर सिमर के मैं अपने मन की चाह पूरी करूँ। अच्छी किस्मत से सत्संग मिल जाए और मैं झुक-झुक के (सत्संगियों के) पैरों पर लगूँ। मेरे मन में (प्रभू के) दर्शनों की प्यास है।हे नानक ! (कह) मैं (सत्संगियों पर से) सदके जाता हूँ। 15।
सलोक ॥
पतित पुनीत गोबिंदह सरब दोख निवारणह ॥
सरणि सूर भगवानह जपंति नानक हरि हरि हरे ॥1॥
छडिओ हभु आपु लगड़ो चरणा पासि ॥
नठड़ो दुख तापु नानक प्रभु पेखंदिआ ॥2॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: श्लोक ॥ गोबिंद विकारियों को पवित्र करने वाला है।(पापियों के) सारे एैब दूर करने वाला है। हे नानक ! जो मनुष्य उस प्रभू को जपते हैं।भगवान उन शरण आए हुओं की लाज रखने के समर्थ है। 1। जिस मनुष्य ने सारा स्वै भाव मिटा दिया।जो मनुष्य प्रभू के चरणों के साथ जुड़ा रहा। हे नानक ! प्रभू का दीदार करने से उसके सारे दुख-कलेश नाश हो जाते हैं। 2।
पउड़ी ॥
मेलि लैहु दइआल ढहि पए दुआरिआ ॥
रखि लेवहु दीन दइआल भ्रमत बहु हारिआ ॥
भगति वछलु तेरा बिरदु हरि पतित उधारिआ ॥
तुझ बिनु नाही कोइ बिनउ मोहि सारिआ ॥
करु गहि लेहु दइआल सागर संसारिआ ॥16॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ हे दयालु ! मैं आपके दर पर आ गिरा हूँ।मुझे (अपने चरणों में) जोड़ ले। हे दीनों पर दया करने वाले ! मुझे रख ले।मैं भटकता-भटकता अब बहुत थक गया हूँ। भक्ति को प्यार करना और गिरे हुओं को बचाना- ये आपका बिरद स्वभाव है। हे प्रभू ! आपके बिना और कोई नहीं जो मेरी इस विनती को सिरे चढ़ा सके। हे दयालु ! मेरा हाथ पकड़ ले (और मुझे) संसार-समुंद्र में से बचा ले। 16।
सलोक ॥
संत उधरण दइआलं आसरं गोपाल कीरतनह ॥
निरमलं संत संगेण ओट नानक परमेसुरह ॥1॥
चंदन चंदु न सरद रुति मूलि न मिटई घांम ॥
सीतलु थीवै नानका जपंदड़ो हरि नामु ॥2॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक॥ जो संत जन गोपाल प्रभू के कीर्तन को अपने जीवन का सहारा बना लेते हैं। दयाल प्रभू उन संतों को (माया की तपस से) बचा लेता है। उन संतों की संगति करने से पवित्र हो जाते हैं।हे नानक ! (आप भी ऐसे गुरमुखों की संगति में रह के) परमेश्वर का पल्ला पकड़। 1। चाहे चंदन (का लेप किया) हो चाहे चंद्रमा (की चाँदनी) हो।और चाहे ठंडी ऋतु हो – इनसे मन की तपस बिल्कुल भी समाप्त नहीं हो सकती। हे नानक ! प्रभू का नाम सिमरने से ही मनुष्य (का मन) शांत होता है। 2।
पउड़ी ॥
चरन कमल की ओट उधरे सगल जन ॥
सुणि परतापु गोविंद निरभउ भए मन ॥
तोटि न आवै मूलि संचिआ नामु धन ॥
संत जना सिउ संगु पाईऐ वडै पुन ॥
आठ पहर हरि धिआइ हरि जसु नित सुन ॥17॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ प्रभू के सुंदर चरणों का आसरा ले के सारे जीव (दुनिया की तपस से) बच जाते हैं। गोबिंद की महिमा सुन के (बँदगी वालों के) मन निडर हो जाते हैं। वे प्रभू का नाम-धन इकट्ठा करते हैं और उस धन में कभी घाटा नहीं पड़ता। ऐसे गुरमुखों की संगति बड़े भाग्यों से मिलती है। ये संत जन आठों पहर प्रभू को सिमरते हैं और सदा प्रभू का यश सुनते हैं। 17।
सलोक ॥
दइआ करणं दुख हरणं उचरणं नाम कीरतनह ॥
दइआल पुरख भगवानह नानक लिपत न माइआ ॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक ॥ हे नानक ! अगर मनुष्य दयालु सर्व-व्यापक भगवान के नाम की वडिआई करे तो प्रभू मेहर करता है। उसके दुखों का नाश करता है और वह मनुष्य माया के मोह में नहीं फसता। 1।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।

इस अंग पर 10 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “आपके पैरों की खाक से मेरा शरीर पवित्र हैं जाए।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।