ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ऐसो गुनु मेरो प्रभ जी कीन ॥
पंच दोख अरु अहं रोग इह तन ते सगल दूरि कीन ॥ रहाउ ॥
बंधन तोरि छोरि बिखिआ ते गुर को सबदु मेरै हीअरै दीन ॥
रूपु अनरूपु मोरो कछु न बीचारिओ प्रेम गहिओ मोहि हरि रंग भीन ॥1॥
पेखिओ लालनु पाट बीच खोए अनद चिता हरखे पतीन ॥
तिस ही को ग्रिहु सोई प्रभु नानक सो ठाकुरु तिस ही को धीन ॥2॥1॥20॥
माई मेरे मन की प्रीति ॥
एही करम धरम जप एही राम नाम निरमल है रीति ॥ रहाउ ॥
प्रान अधार जीवन धन मोरै देखन कउ दरसन प्रभ नीति ॥
बाट घाट तोसा संगि मोरै मन अपुने कउ मै हरि सखा कीत ॥1॥
संत प्रसादि भए मन निरमल करि किरपा अपुने करि लीत ॥
सिमरि सिमरि नानक सुखु पाइआ आदि जुगादि भगतन के मीत ॥2॥2॥21॥
प्रभ जी मिलु मेरे प्रान ॥
बिसरु नही निमख हीअरे ते अपने भगत कउ पूरन दान ॥ रहाउ ॥
खोवहु भरमु राखु मेरे प्रीतम अंतरजामी सुघड़ सुजान ॥
कोटि राज नाम धनु मेरै अंम्रित द्रिसटि धारहु प्रभ मान ॥1॥
आठ पहर रसना गुन गावै जसु पूरि अघावहि समरथ कान ॥
तेरी सरणि जीअन के दाते सदा सदा नानक कुरबान ॥2॥3॥22॥
प्रभ तेरे पग की धूरि ॥
दीन दइआल प्रीतम मनमोहन करि किरपा मेरी लोचा पूरि ॥ रहाउ ॥
दह दिस रवि रहिआ जसु तुमरा अंतरजामी सदा हजूरि ॥
जो तुमरा जसु गावहि करते से जन कबहु न मरते झूरि ॥1॥
धंध बंध बिनसे माइआ के साधू संगति मिटे बिसूर ॥
सुख संपति भोग इसु जीअ के बिनु हरि नानक जाने कूर ॥2॥4॥23॥
माई मेरे मन की पिआस ॥
इकु खिनु रहि न सकउ बिनु प्रीतम दरसन देखन कउ धारी मनि आस ॥ रहाउ ॥
सिमरउ नामु निरंजन करते मन तन ते सभि किलविख नास ॥
पूरन पारब्रहम सुखदाते अबिनासी बिमल जा को जास ॥1॥
संत प्रसादि मेरे पूर मनोरथ करि किरपा भेटे गुणतास ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “टोडी महला 5 घरु 5 दुपदे सतिगुर प्रसादि ॥ हे भाई ! मेरे प्रभू जी ने (मेरे पर) ऐसा उपकार कर दिया है।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।