अंग 716, राग टोडी (deepened)

SGGS, Ang
716
राग टोडी, महला 5
राग: राग टोडी · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी · महला 5
पढ़ने का समय: लगभग 2 मिनट
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टोडी महला ५ ॥ चरण ओट साधा संगि गहीआ ॥ तीनि भवन तातपु जब लाहो लगु लाहु जोति समाणी ॥रहाउ॥ सरब निधान सरब के मीतु संत संग रहाउ ॥१॥

“चरण ओट साधा संगि गहीआ।” “साधा संगति में चरणों की ‘ओट’ (shelter) पकड़ी।”

टोडी में एक quality है, “shelter-seeking।” जब वैभव छूट जाता है, जब external sources fail हो जाते हैं, यह ज़रूरत evident हो जाती है।

दिल्ली में हम सब बहुत “shelter” arrange करते हैं, insurance, savings, networks, contingency plans। यह wise है। मगर genuine shelter एक है, साध-संगति। बाक़ी सब temporary।

“ओट” शब्द बहुत specific है। यह “छत्र,” “साया” से अलग है। “ओट” का meaning “windbreak, अड़चन की रोक” है। किसी पहाड़ की ओट में जा कर तू hide हो जाता है तेज़ हवा से। साधा संगति वैसा “ओट” है, ज़िंदगी की तेज़ हवाओं से।

“तीनि भवन तातपु।” “तीन ‘भवन’ (worlds) ‘तातपु’ (taptu, tapas-burning)।”

imagery: तीनों लोक तप रहे हैं, on fire हैं। मगर “ओट” में बैठा आदमी safe है।

“जब लाहो लगु लाहु जोति समाणी।” “जब ‘लाहो’ (मुनाफ़ा) ‘लगु’ (लग गया), ‘लाहु’ (मुनाफ़ा) ‘जोति’ (ज्योति) में ‘समाणी’ (समा गई)।”

metaphor: मुनाफ़ा लगने पर, मुनाफ़ा ज्योति में मिल जाता है।

दिल्ली के व्यापारी language यह है। “लाहा” (profit) कमाने का अंत क्या? पैसा। फिर पैसे का अंत क्या? कुछ नहीं। मगर जो “लाहा” “ज्योति” (हरि) में जा कर मिलता है, वो permanent है। यह “वज़न” वाला statement है।

“सरब निधान सरब के मीतु।” “सब निधि, सब का ‘मीतु’ (मित्र)।”

two attributes। हरि सब निधि है, और सब का मित्र है। दोनों एक साथ।

दिल्ली में हम सब अपने “मित्र-circle” बहुत carefully चुनते हैं। और अपनी “निधि” (savings, investments) carefully manage करते हैं। नानक कह रहे हैं, एक है जो दोनों है। उसी से connection बनाओ।

“संत संग रहाउ।” “संत-संग में ‘रहाउ’ (रुको)।”

closing instruction. simple।

देखें: अंग 720, बैरारी, “सतसंगति मिलीऐ” (similar instruction)
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टोडी महला ५ ॥ सूख सहज आनद घना हरि कीरतनु गाउ ॥रहाउ॥ हरि के संत गावहु जसु तुमरै नाम बाणी सुहावै ॥१॥

“सूख सहज आनद घना।” “सुख, सहज, आनंद ‘घना’ (बहुत)।”

टोडी के अंदर एक specific positive moment। अभी तक introspective yearning थी, अब “घना आनंद।”

यह सबसे subtle observation है। टोडी का yearning ख़ुद आनंद-states को support करता है। yearning में जो depth है, वो depth ही आनंद का carrier बनती है।

दिल्ली में हम सब “happiness” pursue करते हैं direct। “मैं ख़ुश रहना चाहता हूँ।” गुरु अर्जन का mechanism inverted है, “yearning से शुरू करो, आनंद ख़ुद आएगा।” यह paradoxical है, मगर यही bhakti का way है।

“हरि कीरतनु गाउ।” “हरि का कीर्तन गाओ।”

simple instruction। और मगर ध्यान दो, इस instruction से पहले “सुख, सहज, आनंद घना” आ रहा है। यानी गाने से ही यह सब आ रहा है।

दिल्ली के context में: हम सब कीर्तन को “एक religious activity” मानते हैं। नानक कह रहे हैं, यह एक access mechanism है, इन सब inner states तक पहुँचने का। sing, और sing कर के feel करो।

“हरि के संत गावहु जसु।” “हरि के संतों, ‘जस’ (प्रशंसा) गाओ।”

directed addressing। हरि के संतों को बुला रहे हैं। collective practice।

“तुमरै नाम बाणी सुहावै।” “तुम्हारी नाम-बाणी ‘सुहावै’ (शोभती)।”

closing: जब genuine हरि-संत collectively गाते हैं, तो उनकी आवाज़ “सुहाती” है। यह not aesthetic claim, यह spiritual claim है। genuine voices में एक quality है।

दिल्ली में जब आप किसी अच्छे gurdwara में सुबह की कीर्तन सुनो, यह “सुहाव” feel होता है। यह voice की technical quality से ज़्यादा है, यह कुछ अंदर का है जो outward में project होता है।