ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ राग जैतसरी महला ५ चउपदे घरु १ ॥ देहु संदेसरो कहीअ प्रिअ कहीअ ॥ बिरहै बिरहा कीआ राउ हम ल्यागे रहीअ ॥१॥रहाउ॥ सजन सहाइ संत प्रब मेरे जिउ बंकी अंखि निहलीअ ॥१॥
[ इस अंग की गहरी चिंतना ]
गुरु अर्जन का जैतसरी opening है, “देहु संदेसरो।” “एक छोटा संदेश दो।”
“संदेसरो” diminutive form है। “संदेश” का छोटा रूप। यह बहुत intimate है, “बस एक छोटी सी बात।”
दिल्ली में जब हम किसी से बहुत miss कर रहे होते हैं, हम texting करते हैं, “कुछ भी लिख दो, बस।” यह same intimacy है। गुरु अर्जन हरि से वो “कुछ भी” माँग रहे हैं।
“बिरहै बिरहा कीआ राउ” का अनुभव specific है। विरह में जो “राज” चलता है, उसी में रहे।
यह acceptance की language है। दुख से नहीं भाग रहे। मगर self-pity भी नहीं। बस “लगे रहे।”
दिल्ली में हम सब “feel good” pursue करते हैं। जैतसरी विरह को embrace करती है, उससे भागती नहीं। एक mature pain है यह।
“बंकी अँखि” वाली पंक्ति में एक side-glance की नज़र है। यह deliberate नहीं, यह incidental है, मगर meaningful।
दिल्ली के markets में जब आप किसी से नज़रें मिला बैठते हो, और एक pal भर का acknowledgment exchange होता है, यह “बंकी अँखि” है। यह deep नहीं, मगर unforgettable होता है।
[ इस अंग पर एक और मनन ]
गुरु अर्जन देव जी की voice यहाँ tender है। “देहु संदेसरो।”
दिल्ली में जब हम किसी से बहुत miss कर रहे हों, छोटे messages exchange करते हैं। “अच्छा क्या?” “खाना खाया?” यह small talk है, मगर substance नहीं, intimacy है।
गुरु अर्जन हरि से वो “छोटा message” माँग रहे हैं। बहुत नहीं, बस acknowledgment।
“बिरहै बिरहा कीआ राउ हम ल्यागे रहीअ” वाली पंक्ति में एक specific quality है। “लगे रहे।” यह perseverance है।
दिल्ली में जब कोई relationship में struggle face करते हैं, “लगे रहना” key है। यह giving up नहीं, यह commitment है।
गुरु अर्जन same posture suggest कर रहे हैं हरि-संबंध में। मगर वो romance नहीं। यह devotional persistence है।
गुरु अर्जन का जैतसरी। और एक tender request।
“देहु संदेसरो कहीअ प्रिअ कहीअ।” “‘संदेसरो’ (छोटा संदेश) दो, प्रिय कहो।”
सबसे tender request। एक “छोटा” संदेश। बहुत नहीं माँग रहे।
“संदेसरो” diminutive form है। “संदेश” का छोटा रूप। यह बहुत intimate है, “बस एक छोटी सी बात।”
दिल्ली में जब हम किसी से बहुत miss कर रहे होते हैं, हम texting करते हैं, “कुछ भी लिख दो, बस।” यह same intimacy है। गुरु अर्जन हरि से वो “कुछ भी” माँग रहे हैं।
“बिरहै बिरहा कीआ राउ।” “विरह में विरह का ‘राउ’ (राज) किया।”
विरह में जो राज चलता है, उसी में रहे।
“हम ल्यागे रहीअ।” “हम लगे रहे।”
यह acceptance है। दुख से नहीं भाग रहे।
दिल्ली में हम सब “feel good” pursue करते हैं। जैतसरी विरह को embrace करती है, उससे भागती नहीं। एक mature pain है यह।
“सजन सहाइ संत प्रब मेरे।” “साजन, सहायी, संत, प्रभु, मेरे।”
चार nouns एक पंक्ति में, सब हरि की qualities।
“जिउ बंकी अंखि निहलीअ।” “जैसे ‘बंकी’ (मुड़ी, glanced) आँख से ‘निहलीअ’ (देखा)।”
beautiful image। एक side-glance की नज़र। यह deliberate नहीं, यह incidental है, मगर meaningful।
दिल्ली के markets में जब आप किसी से नज़रें मिला बैठते हो, और एक pal भर का acknowledgment exchange होता है, यह “बंकी अँखि” है। यह deep नहीं, मगर unforgettable होता है। नानक same quality हरि के साथ describe कर रहे हैं।