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अंग 708

अंग
708
राग Jaithsree
राग: Jaithsree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
काम क्रोधि अहंकारि फिरहि देवानिआ ॥
सिरि लगा जम डंडु ता पछुतानिआ ॥
बिनु पूरे गुरदेव फिरै सैतानिआ ॥9॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: (इस वास्ते इनकी खातिर) काम में क्रोध में अहंकार में पागल हुए फिरते हैं। जब मौत का डण्डा सिर पे आ बजता है।तब पछताते हैं। (हे भाई ! मनुष्य) पूरे गुरू की शरण के बिना शैतान के समान फिरता है। 9।
सलोक ॥
राज कपटं रूप कपटं धन कपटं कुल गरबतह ॥
संचंति बिखिआ छलं छिद्रं नानक बिनु हरि संगि न चालते ॥1॥
पेखंदड़ो की भुलु तुंमा दिसमु सोहणा ॥
अढु न लहंदड़ो मुलु नानक साथि न जुलई माइआ ॥2॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक॥ हे नानक ! ये राज।रूप।धन (ऊँची) कुल का माण- सब छल रूप है। जीव छल करके दूसरों पर दूषण लगा लगा के (कई ढंगों से) माया जोड़ते हैं।पर प्रभू के नाम के बिना कोई भी चीज यहाँ से साथ नहीं जाती। 1। (मुझसे) देखने में कहाँ भूल हो गई।तुंमा (धतूरे का फल) देखने में तो सुंदर दिखा। पर इसका तो आधी कौड़ी भी मूल्य नहीं मिलता।हे नानक ! यही हाल माया का है।(जीव के लिए तो ये एक कौड़ी की भी नहीं क्योंकि यहाँ से चलने के वक्त) ये माया जीव के साथ नहीं जाती। 2।
पउड़ी ॥
चलदिआ नालि न चलै सो किउ संजीऐ ॥
तिस का कहु किआ जतनु जिस ते वंजीऐ ॥
हरि बिसरिऐ किउ त्रिपतावै ना मनु रंजीऐ ॥
प्रभू छोडि अन लागै नरकि समंजीऐ ॥
होहु क्रिपाल दइआल नानक भउ भंजीऐ ॥10॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ उस माया को इकट्ठा करने का क्या लाभ।जो (जगत से चलने के वक्त) साथ नहीं जाती। जिसने आखिर विछुड़ ही जाना है।उसकी खातिर बताओ क्या प्रयत्न करने हुए। प्रभू को बिसर के (निरी माया से) ना तो तृप्त हुआ जा सकता है ना ही मन प्रसन्न होता है। जो इन्सान प्रभु को छोड़करं सांसारिक प्रपंचों में लीन रहता है, आखिरकार वह नरक में ही बसेरा करता है। हे प्रभू ! कृपा कर।दया कर।नानक का सहम दूर कर दे। 10।
सलोक ॥
नच राज सुख मिसटं नच भोग रस मिसटं नच मिसटं सुख माइआ ॥
मिसटं साधसंगि हरि नानक दास मिसटं प्रभ दरसनं ॥1॥
लगड़ा सो नेहु मंन मझाहू रतिआ ॥
विधड़ो सच थोकि नानक मिठड़ा सो धणी ॥2॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: श्लोक॥ ना ही राज के सुख।ना ही भोगों के चस्के और ना ही माया की मौजें – ये कोई भी स्वादिष्ट नहीं हैं। हे नानक ! सत्संग में (मिलने से) प्रभू का नाम मीठा है और सेवक को प्रभू के दीदार मीठे लगते हैं। 1। हे नानक ! जिस मनुष्य को वह प्यारा लग जाए जिससे अंदर से मन (प्रभू के साथ) रंगा जाए। और जिसका मन सच्चे नाम-रूप पदार्थ (भाव।मोती) से परोया जाए उस मनुष्य को मालिक प्रभू प्यारा लगता है। 2।
पउड़ी ॥
हरि बिनु कछू न लागई भगतन कउ मीठा ॥
आन सुआद सभि फीकिआ करि निरनउ डीठा ॥
अगिआनु भरमु दुखु कटिआ गुर भए बसीठा ॥
चरन कमल मनु बेधिआ जिउ रंगु मजीठा ॥
जीउ प्राण तनु मनु प्रभू बिनसे सभि झूठा ॥11॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ परमात्मा (के नाम) के बिना भक्तों को और कोई चीज मीठी नहीं लगती। उन्होंने खोज के देख लिया है कि (नाम के बिना) और सारे स्वाद फीके हैं। सतिगुरू (उनके लिए) वकील बना और (प्रभू को मिलने के कारण उनका) अज्ञान भटकना और दुख सब कुछ दूर हो गया है। जैसे मजीठे से (कपड़े पर पक्का) रंग चढ़ता है।वैसे ही उनका मन प्रभू के सुंदर चरणों में (पक्की तरह से) भेदित हो जाता है। प्रभू ही उनकी जिंद-प्राण है और तन-मन है।अन्य नाशवंत प्यार उनके अंदर से नाश हो गए हैं। 11।
सलोक ॥
तिअकत जलं नह जीव मीनं नह तिआगि चात्रिक मेघ मंडलह ॥
बाण बेधंच कुरंक नादं अलि बंधन कुसम बासनह ॥
चरन कमल रचंति संतह नानक आन न रुचते ॥1॥
मुखु डेखाऊ पलक छडि आन न डेऊ चितु ॥
जीवण संगमु तिसु धणी हरि नानक संतां मितु ॥2॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक ॥ पानी को छोड़ के मछली जी नहीं सकती।बादलों के बिना पपीहे की भी जिंदगी नहीं। हिरन राग के तीर से भेदा जाता है और फूलों की सुगंधि भौरे के बँधन का कारण बन जाती है।इसी तरह। हे नानक ! संत प्रभू के चरणों में मस्त रहते हैं।प्रभू-चरणों के बिना उन्हें और कुछ नहीं भाता। 1। अगर एक पलक मात्र ही मैं आपका मुख देख लूँ।तो आपको छोड़ के मैं किसी और की तरफ चित्त (की प्रीत) ना लगाऊँ। हे नानक ! जीवन का जोड़ उस मालिक प्रभू के साथ ही हो सकता है।वह प्रभू संतों का मित्र है। 2।
पउड़ी ॥
जिउ मछुली बिनु पाणीऐ किउ जीवणु पावै ॥
बूंद विहूणा चात्रिको किउ करि त्रिपतावै ॥
नाद कुरंकहि बेधिआ सनमुख उठि धावै ॥
भवरु लोभी कुसम बासु का मिलि आपु बंधावै ॥
तिउ संत जना हरि प्रीति है देखि दरसु अघावै ॥12॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ जैसे मछली पानी के बिना जी नहीं सकती। जैसे बासात की बॅूँद के बिना पपीहा तृप्त नहीं होता। जैसे (घण्डेहेड़े की) आवाज हिरन को मोहित कर लेती है।वह उधर को ही उठ दौड़ता है। जैसे भौरा फूल की सुगंधि का आशिक होता है।(फूल से) मिल के अपने आप को फसा लेता है।वैसे ही। संतों को प्रभू से प्रेम होता है।प्रभू दीदार करके वे तृप्त हो जाते हैं। 12।
सलोक ॥
चितवंति चरन कमलं सासि सासि अराधनह ॥
नह बिसरंति नाम अचुत नानक आस पूरन परमेसुरह ॥1॥
सीतड़ा मंन मंझाहि पलक न थीवै बाहरा ॥
नानक आसड़ी निबाहि सदा पेखंदो सचु धणी ॥2॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक ॥ जो मनुष्य प्रभू के चरण-कमलों का ध्यान धरते हैं और श्वास-श्वास उसका सिमरन करते हैं। जो अविनाशी प्रभू का नाम कभी नहीं भुलाते।हे नानक ! परमेश्वर उनकी आशाएं पूरी करता है। 1। जिन मनुष्यों के मन में प्रभू (सदा) परोया रहता है।जिनसे एक छिन के लिए भी जुदा नहीं होता। हे नानक ! उनकी वह सच्चा मालिक आशाएं पूरी करता है और सदा उनकी संभाल करता है। 2।
पउड़ी ॥
आसावंती आस गुसाई पूरीऐ ॥
मिलि गोपाल गोबिंद न कबहू झूरीऐ ॥
देहु दरसु मनि चाउ लहि जाहि विसूरीऐ ॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ हे धरती के पति ! हे धरती के रखवाले ! हे गोबिंद ! मुझ आसवंत की आशा पूरी कर। मुझे मिल। ताकि मैं कभी तौखले चिंता ना करूँ। मेरे मन में कसक है।मुझे दीदार दे और मेरे झोरे मिट जाएं।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर 9 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(इस वास्ते इनकी खातिर) काम में क्रोध में अहंकार में पागल हुए फिरते हैं।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।