सिरि लगा जम डंडु ता पछुतानिआ ॥
बिनु पूरे गुरदेव फिरै सैतानिआ ॥9॥
राज कपटं रूप कपटं धन कपटं कुल गरबतह ॥
संचंति बिखिआ छलं छिद्रं नानक बिनु हरि संगि न चालते ॥1॥
पेखंदड़ो की भुलु तुंमा दिसमु सोहणा ॥
अढु न लहंदड़ो मुलु नानक साथि न जुलई माइआ ॥2॥
चलदिआ नालि न चलै सो किउ संजीऐ ॥
तिस का कहु किआ जतनु जिस ते वंजीऐ ॥
हरि बिसरिऐ किउ त्रिपतावै ना मनु रंजीऐ ॥
प्रभू छोडि अन लागै नरकि समंजीऐ ॥
होहु क्रिपाल दइआल नानक भउ भंजीऐ ॥10॥
नच राज सुख मिसटं नच भोग रस मिसटं नच मिसटं सुख माइआ ॥
मिसटं साधसंगि हरि नानक दास मिसटं प्रभ दरसनं ॥1॥
लगड़ा सो नेहु मंन मझाहू रतिआ ॥
विधड़ो सच थोकि नानक मिठड़ा सो धणी ॥2॥
हरि बिनु कछू न लागई भगतन कउ मीठा ॥
आन सुआद सभि फीकिआ करि निरनउ डीठा ॥
अगिआनु भरमु दुखु कटिआ गुर भए बसीठा ॥
चरन कमल मनु बेधिआ जिउ रंगु मजीठा ॥
जीउ प्राण तनु मनु प्रभू बिनसे सभि झूठा ॥11॥
तिअकत जलं नह जीव मीनं नह तिआगि चात्रिक मेघ मंडलह ॥
बाण बेधंच कुरंक नादं अलि बंधन कुसम बासनह ॥
चरन कमल रचंति संतह नानक आन न रुचते ॥1॥
मुखु डेखाऊ पलक छडि आन न डेऊ चितु ॥
जीवण संगमु तिसु धणी हरि नानक संतां मितु ॥2॥
जिउ मछुली बिनु पाणीऐ किउ जीवणु पावै ॥
बूंद विहूणा चात्रिको किउ करि त्रिपतावै ॥
नाद कुरंकहि बेधिआ सनमुख उठि धावै ॥
भवरु लोभी कुसम बासु का मिलि आपु बंधावै ॥
तिउ संत जना हरि प्रीति है देखि दरसु अघावै ॥12॥
चितवंति चरन कमलं सासि सासि अराधनह ॥
नह बिसरंति नाम अचुत नानक आस पूरन परमेसुरह ॥1॥
सीतड़ा मंन मंझाहि पलक न थीवै बाहरा ॥
नानक आसड़ी निबाहि सदा पेखंदो सचु धणी ॥2॥
आसावंती आस गुसाई पूरीऐ ॥
मिलि गोपाल गोबिंद न कबहू झूरीऐ ॥
देहु दरसु मनि चाउ लहि जाहि विसूरीऐ ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर 9 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(इस वास्ते इनकी खातिर) काम में क्रोध में अहंकार में पागल हुए फिरते हैं।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।