दसवें दिन की साँझ ढलने को थी, जब कुरुक्षेत्र के उस विशाल रणक्षेत्र में एक ऐसी घटना घटी जिसकी प्रतीक्षा दोनों सेनाएँ काँपते हृदय से कर रही थीं। गंगापुत्र भीष्म, जो नौ दिनों तक प्रलय के सूर्य की भाँति पाण्डव-सेना को तपाते रहे थे, अब शिखण्डी (पांचाल-राजकुमार, जो पूर्वजन्म में स्त्री-रूप में जन्मा था) को आगे करके किए गए अर्जुन के अनगिनत बाणों से बिंधकर अपने रथ से नीचे गिर पड़े। पर उनका शरीर धरती को न छू सका; बाणों का वह सघन जाल ही उनकी शय्या बन गया। यह कथा हम आपके सम्मुख उसी क्रम में सुनाते हैं जिस क्रम में संजय ने अंधे राजा धृतराष्ट्र को सुनाई थी, बीच के उन दिनों के संग्राम से आरम्भ करके जिनमें यह महाप्रलय अपने चरम की ओर बढ़ता गया।
कृष्ण का रथ से उतरना और प्रतिज्ञा का स्मरण
संजय कहते हैं कि उन दिनों के संग्राम में एक प्रसंग ऐसा आया जिसने स्वयं वासुदेव कृष्ण को विचलित कर दिया। भीष्म पाण्डव-सेना को इस प्रकार काट रहे थे, मानो प्रलयकाल का सूर्य समस्त प्राणियों को भस्म करने उठ खड़ा हुआ हो। यह देखकर देवकीनन्दन कृष्ण, जो अर्जुन के सारथि (रथ हाँकने वाले) बने हुए थे, क्रोध से भर उठे। वे रथ की रासें (घोड़ों की लगाम) छोड़कर, चक्र (सुदर्शन, उनका दिव्य अस्त्र) हाथ में लेकर कूद पड़े और भीष्म की ओर वेग से दौड़े।
शान्तनु-पुत्र भीष्म ने उस आते हुए भगवान् को देखा और निर्भय होकर कहा, “आइए, आइए, हे देवेश्वर। हे जगन्निवास (जिनमें समस्त संसार वास करता है), मैं आपको प्रणाम करता हूँ। हे लोकनाथ, मुझे इस उत्तम रथ से बलपूर्वक नीचे गिरा दीजिए। हे कृष्ण, यदि आपके हाथों यहाँ मेरा वध हो, तो इस लोक और परलोक दोनों में मेरा महान् सौभाग्य होगा। हे वृष्णि और अन्धकवंशियों के स्वामी, आप मेरा जो सम्मान कर रहे हैं, उससे तीनों लोकों में मेरी कीर्ति गाई जाएगी।”
कृष्ण वेग से उनकी ओर बढ़ते हुए बोले, “इस पृथ्वी पर इस महाविनाश के मूल आप ही हैं। आज आप दुर्योधन को मरा हुआ देखेंगे। जो बुद्धिमान् मंत्री धर्म के मार्ग पर चलता है, उसे जुए जैसे दुर्व्यसन में डूबे राजा को रोकना चाहिए। और जो अपने कुल का होकर भी धर्म का उल्लंघन करे, उसे ऐसे त्याग देना चाहिए मानो उसकी बुद्धि नियति से भ्रष्ट हो गई हो।” यहाँ कथा की नैतिक जटिलता प्रकट होती है: कृष्ण भीष्म को ही इस संहार का मूल बता रहे हैं, क्योंकि उन्होंने अधर्मी राजा का साथ नहीं छोड़ा। राजर्षि भीष्म ने यदुश्रेष्ठ कृष्ण को उत्तर दिया, “नियति परम बलवती है। यदुओं ने अपने हित के लिए कंस का त्याग किया था। मैंने यही बात राजा धृतराष्ट्र से कही थी, पर उन्होंने नहीं मानी। जो श्रोता हित की बात सुनकर भी न ग्रहण करे, वह अपने ही दुर्भाग्य से नियति के प्रभाव में कुबुद्धि हो जाता है।”

इसी बीच विशाल और लम्बी भुजाओं वाले अर्जुन (पार्थ) अपने रथ से कूदकर पैदल ही कृष्ण के पीछे दौड़े और उन्होंने दोनों हाथों से उन्हें पकड़ लिया। आत्मनिष्ठ देवश्रेष्ठ कृष्ण क्रोध से उद्दीप्त थे, अतः पकड़े जाने पर भी वे अर्जुन को इस प्रकार खींचते हुए आगे बढ़े मानो आँधी किसी एक वृक्ष को बहा ले जा रही हो। महात्मा अर्जुन ने अपने पैर जमाकर बड़े कष्ट से दसवें पग पर उन्हें रोका। जब कृष्ण रुके, तब सोने की सुन्दर माला पहने अर्जुन ने प्रसन्नतापूर्वक प्रणाम करके कहा, “हे केशव, अपना यह क्रोध शान्त कीजिए। आप ही पाण्डवों के आश्रय हैं। मैं अपने पुत्रों और सहोदर भाइयों की शपथ खाकर कहता हूँ कि जिस कर्म की मैंने प्रतिज्ञा की है, उससे मैं विमुख न होऊँगा। हे इन्द्र-अनुज, आपकी आज्ञा से मैं निश्चय ही कुरुओं का संहार करूँगा।” उस प्रतिज्ञा और शपथ को सुनकर जनार्दन कृष्ण प्रसन्न हो गए और पुनः चक्र को बाहु पर धारण किए अपने रथ पर चढ़ गए। उन्होंने छोड़ी हुई रासें फिर सँभालीं और अपना पाञ्चजन्य शंख उठाकर समस्त दिशाओं को उसके निनाद से भर दिया।
समझने की कुंजी (अवधारणा): भीष्म का अपने ही वध की कामना करना कोई आत्म-समर्पण नहीं था। वे क्षत्रिय-धर्म के अनुसार राजा का अन्न खाकर उसके पक्ष में लड़ने को बँधे थे, और साथ ही कृष्ण के हाथों मृत्यु को परम कल्याण मानते थे। यही महाभारत की वह नैतिक उलझन है जहाँ कर्तव्य और भक्ति एक ही व्यक्ति में टकराते हैं।
सार: कृष्ण ने प्रतिज्ञा-भंग करके भीष्म को मारने का उद्यम किया; अर्जुन ने उन्हें रोककर स्वयं कुरु-संहार की शपथ दोहराई। भीष्म ने इस पूरे विनाश को नियति और राजा धृतराष्ट्र की हठ का फल बताया, अपना दोष नहीं छिपाया।
गाण्डीव की टंकार और रक्त की नदी
कृष्ण को आभूषणों से सुसज्जित होकर पुनः शंख उठाते देख कुरु-वीरों ने ऊँचा सिंहनाद किया। झाँझ, नगाड़े, दुन्दुभि और रथ-चक्रों की घर्र-घर्र मिलकर एक भीषण कोलाहल बन गई। तभी मेघगर्जन-सी गाण्डीव (अर्जुन के धनुष) की टंकार ने सारे आकाश और दिशाओं को भर दिया। भूरिश्रवा ने अर्जुन पर सोने के पंखों वाले सात भाले फेंके, दुर्योधन ने एक प्रचण्ड शूल, शल्य ने गदा, और शान्तनु-पुत्र भीष्म ने एक तोमर (लोहे का भाला) चलाया। अर्जुन ने सात बाणों से भूरिश्रवा के सातों भाले काट डाले, एक तीक्ष्ण बाण से दुर्योधन का शूल छेद दिया, और दो अन्य बाणों से भीष्म के तोमर तथा शल्य की गदा को बीच में ही काट गिराया।
फिर अर्जुन ने अपने अप्रमेय तेज वाले गाण्डीव को दोनों हाथों से बड़े बल से खींचकर, उचित मन्त्रों से अत्यन्त भयंकर माहेन्द्र-अस्त्र (इन्द्र का दिव्यास्त्र) का आवाहन किया और उसे आकाश में प्रकट कर दिया। उस महाअस्त्र से प्रज्वलित अग्नि-तेज वाले बाणों की वर्षा होने लगी, जिससे मुकुटधारी अर्जुन ने समस्त कौरव-सेना को रोक दिया। उन बाणों ने शत्रुओं की भुजाएँ, धनुष, ध्वज-शिखर और रथ काटते हुए राजाओं, विशाल हाथियों और घोड़ों के शरीर भेद दिए। गाण्डीव की टंकार से शत्रुओं के हृदय काँप उठे।
उस भयंकर युद्ध में किरीटी अर्जुन ने रणभूमि पर एक भीषण नदी बहा दी, जिसका जल मृतकों के क्षत-विक्षत शरीरों से बहता रक्त था और झाग चर्बी। मारे गए हाथियों और घोड़ों के शव उसके तट बने, अँतड़ियाँ और मज्जा उसका कीचड़, और बालों से ढके मनुष्यों के मस्तक उसमें तैरते कूड़े-से दिखे। उस रक्त-नदी को जीवित बचे लोग वैतरणी (मृत्यु-लोक की भयानक नदी) के समान देखते रहे। चेदि, पांचाल, मत्स्य आदि पाण्डव-पक्ष के योद्धा विजय से उल्लसित होकर सिंहनाद करने लगे। तब सूर्य को अपनी किरणें समेटते देख, और इन्द्र के उस अप्रतिहत अस्त्र को युगान्त-सा फैलते देख, भीष्म, द्रोण, दुर्योधन और बाह्लीक ने अपनी सेनाएँ रात्रि-विश्राम के लिए हटा लीं।
उस रात कुरु-शिविर में भारी हाहाकार उठा। सब कहने लगे कि आज अर्जुन ने दस हजार रथियों और सात सौ हाथियों को मार डाला; पश्चिम के सभी योद्धा, सौवीर, क्षुद्रक और मालवगण समाप्त हो गए। श्रुतायु, दुर्मर्षण, चित्रसेन, द्रोण, कृप, सिन्धुराज, बाह्लीक, भूरिश्रवा, शल्य, साल और सैकड़ों अन्य योद्धा, स्वयं भीष्म के साथ मिलकर भी, क्रुद्ध पृथापुत्र अर्जुन से परास्त हुए। यह कहते हुए कुरु-योद्धा हजारों मशालों से जगमगाते अपने शिविरों में लौट गए।
समझने की कुंजी (संख्या-आधुनिक-समतुल्य): “दस हजार रथी” को आज की भाषा में एक पूरी बख़्तरबन्द बटालियन-शृंखला समझिए। प्राचीन गणना में रथ युद्ध की रीढ़ था, अतः रथियों की संख्या ही किसी दिन की हार-जीत का पैमाना बनती थी।
सार: माहेन्द्र-अस्त्र से अर्जुन ने कौरव-सेना में रक्त की वैतरणी बहा दी और एक ही दिन में दस हजार रथी तथा सात सौ हाथी मारे। साँझ होते ही दोनों पक्ष विश्राम को लौटे।
भीम का कोप और अभिमन्यु का पराक्रम
अगले दिन भीष्म, क्रोध से भरकर और विशाल सेना के साथ, भारत-सेना के अग्रभाग में शत्रु के विरुद्ध बढ़े। द्रोण, दुर्योधन, बाह्लीक, दुर्मर्षण, चित्रसेन, बलवान् जयद्रथ और अन्य राजवीर बड़ी-बड़ी टुकड़ियों सहित उन्हें चारों ओर से घेरकर चले। पाण्डवों ने अपनी सेना को ‘श्येन’ (बाज़ के आकार वाली) व्यूह-रचना में सजाया। उस व्यूह की चोंच में महाबली भीमसेन थे, दोनों आँखों में अजेय शिखण्डी और धृष्टद्युम्न, मस्तक में सात्यकि, ग्रीवा में गाण्डीव हिलाते अर्जुन, और पुच्छ में स्वयं युधिष्ठिर अपने जुड़वाँ भाइयों सहित।
भीमसेन उस मकर-व्यूह के मुख से घुसकर भीष्म तक पहुँचे और उन्हें बाणों से ढक दिया। तब भीष्म के पौत्र अभिमन्यु (अर्जुन-पुत्र), सोने के कवच में, उन सब महारथियों के विरुद्ध अकेले बढ़े और पाँच बाघों-से वीरों के बीच ऐसे लड़े जैसे कोई युवा सिंह पाँच हाथियों से जूझता हो। उन्होंने द्रोण-पुत्र अश्वत्थामा को एक, शल्य को पाँच और संयमनी-पुत्र की ध्वजा को आठ बाणों से गिराया। भूरिश्रवा, शल्य, अश्वत्थामा और साल भी कृष्ण-पुत्र अभिमन्यु के बाहुबल के भय से उसके सम्मुख न ठहर सके।
तब त्रिगर्त, मद्र और कैकेय मिलकर पच्चीस हजार की संख्या में, दुर्योधन की प्रेरणा से, अर्जुन और उनके पुत्र दोनों को घेर बैठे। यह देख पांचाल-राजकुमार धृष्टद्युम्न हजारों हाथियों, रथों और लाखों अश्वारोहियों सहित मद्र और कैकेय की उस टुकड़ी पर टूट पड़े। एक ही व्यूह में संयमनी-पुत्र और धृष्टद्युम्न के बीच घोर द्वन्द्व हुआ; अन्ततः क्रुद्ध धृष्टद्युम्न ने गदा से संयमनी-पुत्र का सिर कुचल डाला। पुत्र-वध से कुपित संयमनी ने धृष्टद्युम्न पर आक्रमण किया, और शल्य ने भी उसकी छाती में बाण मारा।
समझने की कुंजी (वंश): अभिमन्यु अर्जुन और सुभद्रा (कृष्ण की बहन) के पुत्र थे, अतः उन्हें “कृष्ण-पुत्र” अर्थात् कृष्ण की बहन का पुत्र भी कहा गया है। वे कौरव-कुल की दृष्टि से भीष्म के प्रपौत्र थे।
उधर धृष्टद्युम्न से युद्ध करते हुए दुर्योधन के अनेक भाई और बारह महारथी एक-दूसरे को बेधने लगे। तभी क्रोध से भरे भीमसेन ने गदा उठाई। उन्हें कैलास-शिखर-सा गदा उठाए देख धृतराष्ट्र-पुत्र भयभीत होकर भागे। दुर्योधन ने मगध की दस हजार हाथियों वाली सेना भीम पर चढ़ा दी। भीमसेन रथ से कूदकर, सिंह-सा गरजते हुए, उस गज-सेना में वज्र-सी भारी गदा लिए घुस पड़े और काल के समान हाथियों को मारने लगे। उनकी गर्जना से हाथी स्तब्ध हो गए। द्रौपदी के पुत्र, सुभद्रा-पुत्र अभिमन्यु, नकुल, सहदेव और धृष्टद्युम्न भीम का पृष्ठ-रक्षण करते रहे। अभिमन्यु ने एक ही बाण से मगधराज का गज मारा और चौड़े फल वाले बाण से उस राजा का सिर काट गिराया। भीम चर्बी, रक्त और मज्जा से सने, रुद्र-से भयंकर दीखते, उस गज-सेना को आँधी की तरह बिखेरते रहे।
सार: श्येन-व्यूह में भीम और अभिमन्यु ने कौरव-महारथियों को छिन्न-भिन्न किया; भीम ने मगध की दस हजार हाथियों वाली गज-सेना को गदा से कुचल दिया।
भीम के हाथों धृतराष्ट्र-पुत्रों का संहार
दुर्योधन ने पूरी सेना को भीम-वध का आदेश दिया, पर भीमसेन तट की भाँति उस सागर-सी सेना को रोके खड़े रहे। उनके भाई, पुत्र, धृष्टद्युम्न, द्रौपदी के पुत्र, अभिमन्यु और अजेय शिखण्डी भय से उन्हें छोड़कर न गए। भीम साइक-लोहे की गदा लिए काल-से घूमते रहे। तभी दुर्योधन ने नौ बाणों से भीम की छाती बेध दी। क्रुद्ध भीम ने अपने सारथि विशोक से कहा, “ये धृतराष्ट्र के वीर पुत्र मुझे मारना चाहते हैं; आज मैं इन सबको आपके सामने मार डालूँगा। अतः हे सारथि, सावधानी से रथ चलाइए।”
दुर्योधन ने भीम का धनुष काट दिया, पर भीम ने दूसरा धनुष लेकर अश्व-नाल फल वाले बाण से राजा का धनुष काट डाला। फिर दुर्योधन ने काल-दण्ड-से तीक्ष्ण बाण से भीम की दोनों छातियों के बीच प्रहार किया; भीम मूर्च्छित होकर रथ के पाटे पर बैठ गए। होश में आते ही उन्होंने दुर्योधन और शल्य को बाणों से बींध डाला, और शल्य रणभूमि से हटा दिए गए।
तब आपके चौदह पुत्रों ने भीम को घेरा। संजय धृतराष्ट्र को उनके नाम गिनाते हैं: सेनापति, सुषेण, जलसन्ध, सुलोचन, उग्र, भीमरथ, भीम, वीरबाहु, आलोलुप, दुर्मुख, दुष्प्रधर्ष, विवित्सु, विकट और सम। ये सब मिलकर बाण-वर्षा करने लगे। भेड़ियों के बीच घिरे शेर-से भीम उन पर गरुड़-वेग से टूट पड़े। उन्होंने अश्व-नाल फल वाले बाण से सेनापति का सिर काटा; तीन बाणों से जलसन्ध को यमलोक भेजा; सुषेण को मृत्यु के पास पहुँचाया; पगड़ी और कुण्डलों से सजे उग्र का चन्द्र-सा सुन्दर मस्तक एक ही चौड़े बाण से काट गिराया; सत्तर बाणों से वीरबाहु को सारथि और ध्वज सहित परलोक भेजा; और मुस्कराते हुए भीम तथा भीमरथ दोनों भाइयों को, तथा सुलोचन को भी यमलोक पहुँचा दिया। शेष पुत्र भय से भाग खड़े हुए।
एक उप-कथा: भीम के इस संहार को सुनकर कुरु-योद्धाओं को विदुर के वे चेतावनी-भरे वचन स्मरण हो आए, जो उन्होंने सभा में कहे थे। जब द्रौपदी का अपमान हुआ था, तभी भीम ने प्रतिज्ञा की थी कि वे धृतराष्ट्र के पुत्रों का संहार करेंगे। आज वही वचन सत्य होते दीख रहे थे, और कौरव-पक्ष को लगने लगा कि भीम मानो उनके वंश के विनाश के लिए ही जन्मे हों।
तब भीष्म ने सब महारथियों से कहा, “वह भयंकर धनुर्धर भीम क्रोध में आकर धृतराष्ट्र के बलवान् पुत्रों को मार रहा है; अतः आप सब मिलकर इस पाण्डु-पुत्र को पकड़िए।” प्राग्ज्योतिषराज भगदत्त अपने मद-झरते हाथी पर भीम पर टूटे और उन्हें बाणों से ऐसे ढक दिया मानो मेघ सूर्य को ढक लें। भगदत्त के सीधे बाण से भीम मूर्च्छित होकर रथ के पाटे पर बैठ गए और ध्वज-दण्ड थामे रहे।
सार: भीम ने एक ही संग्राम में धृतराष्ट्र के चौदह नामधारी पुत्रों में से अनेक को मार डाला, जिससे द्रौपदी-अपमान के समय ली गई उनकी प्रतिज्ञा साकार होती दिखी।
घटोत्कच की माया और कौरवों का पलायन
भीम को मूर्च्छित देख राक्षस घटोत्कच (भीम और हिडिम्बा का पुत्र) क्रोध से भर उठा और क्षण भर में अदृश्य होकर एक भयंकर माया रच डाली। उसने अपनी शक्ति से ऐरावत-सा हाथी प्रकट किया और अंजन, वामन तथा महापद्म नामक दिग्गजों पर सवार राक्षसों को साथ लिया। उसने भगदत्त के हाथी को घेरकर पीड़ित किया।
उन भयंकर चिंघाड़ों को सुनकर भीष्म ने द्रोण, सुयोधन और राजाओं से कहा, “महाधनुर्धर भगदत्त हिडिम्बा के दुष्ट-आत्मा पुत्र से लड़ते हुए घोर संकट में पड़े हैं। हे वीरो, चलिए, राजा की रक्षा कीजिए; यदि रणभूमि में असुरक्षित रहे तो वे शीघ्र प्राण त्याग देंगे।” किन्तु कुछ क्षण बाद, उन लड़ते हाथियों और घटोत्कच की गर्जना देखकर भीष्म ने पुनः द्रोण से कहा, “आज मैं हिडिम्बा के इस दुष्ट-आत्मा पुत्र से युद्ध करना नहीं चाहता। यह इस समय बल और तेज से सम्पन्न तथा भली-भाँति सहायता-प्राप्त है; इसे अभी वज्रधारी इन्द्र भी नहीं जीत सकते। हमारे पशु थक चुके हैं, हम पांचालों और पाण्डवों से बुरी तरह घायल हैं। अतः आज सेना के पीछे हटने की घोषणा करवा दीजिए; कल हम शत्रु से लड़ेंगे।” रात्रि का बहाना पाकर कौरवों ने प्रसन्नता से ऐसा ही किया और घटोत्कच के भय से पीछे हट गए। दुर्योधन अपने भाइयों की मृत्यु से शोक-संतप्त, आँसू बहाता, चिन्ता में डूब गया।
समझने की कुंजी (अवधारणा): “माया” का अर्थ यहाँ इन्द्रजाल अथवा भ्रम-विद्या है। राक्षसों को इच्छानुसार रूप बदलने और छल-युद्ध करने में निपुण माना जाता था। ध्यान दें कि भीष्म स्वयं घटोत्कच के छल-युद्ध को अधर्म मानकर भी, अपनी सेना की थकान के कारण उससे टकराव टाल देते हैं; यह उनकी व्यावहारिक रणनीति थी।
सार: घटोत्कच की माया-विद्या के सामने भीष्म ने सेना की थकान देखकर युद्ध स्थगित कर दिया; उस दिन पाण्डव-पक्ष विजयी रहा।
वासुदेव की महिमा और भीष्म का परामर्श
भाइयों की पराजय से संतप्त दुर्योधन रात्रि में विनयपूर्वक भीष्म के पास गया और पूछा कि किसके बल पर पाण्डव उन्हें बार-बार जीत रहे हैं, जबकि उनके पक्ष में द्रोण, कृप, अश्वत्थामा, कर्ण, भगदत्त जैसे महारथी हैं। भीष्म ने उत्तर में पहले तो शान्ति का परामर्श दोहराया, “हे भरतश्रेष्ठ, पाण्डवों से सन्धि कर लीजिए; यही आपके और संसार के हित में है। बन्धुओं सहित इस पृथ्वी का सुख भोगिए।” फिर उन्होंने पाण्डवों की अजेयता का रहस्य बताया: उनके रक्षक स्वयं शार्ङ्गधन्वा वासुदेव हैं।
भीष्म ने वह प्राचीन इतिहास सुनाया जो उन्होंने जमदग्नि-पुत्र राम (परशुराम), मार्कण्डेय, व्यास और नारद से सुना था। गन्धमादन पर्वत पर ब्रह्मा ने जिस परम दिव्य पुरुष की स्तुति की थी, वही वासुदेव हैं। ब्रह्मा ने उन्हें विश्व का स्वामी, योग की आत्मा, परम ब्रह्म और परम गति कहकर पूजा था। भीष्म ने कहा कि वासुदेव ने ही अपने स्वरूप से संकर्षण, फिर प्रद्युम्न और अनिरुद्ध को रचा, और अनिरुद्ध से ब्रह्मा उत्पन्न हुए। जहाँ कृष्ण हैं, वहाँ धर्म है; और जहाँ धर्म है, वहीं विजय है। इसी कारण पाण्डव अजेय और सदा विजयी हैं, और इसी कारण वे शान्ति का परामर्श दे रहे हैं। दुर्योधन यह सुनकर कृष्ण और पाण्डवों को आदर से देखने लगा, पर उसका हठ न टूटा।
समझने की कुंजी (अवधारणा): “जहाँ धर्म, वहाँ विजय” (यतो धर्मस्ततो जयः) महाभारत का केन्द्रीय सूत्र है। भीष्म इसे युद्ध के बीच भी दोहराते हैं, यद्यपि वे स्वयं अधर्मी पक्ष की ओर से लड़ रहे हैं। यह विरोधाभास उनकी त्रासदी है: ज्ञान उन्हें है, पर प्रतिज्ञा उन्हें अधर्म के पक्ष में बाँधे रखती है।
सार: भीष्म ने वासुदेव को परम पुरुष बताकर शान्ति का परामर्श दिया, किन्तु दुर्योधन का हठ अडिग रहा। भीष्म ज्ञानी होते हुए भी प्रतिज्ञावश अधर्म के पक्ष में बँधे रहे।
इरावान् का वध और मण्डल-व्यूह के दिन
आगे के दिनों में युद्ध और भीषण होता गया। अर्जुन के नाग-कुल में उत्पन्न पुत्र इरावान् ने सुबल के पुत्रों की अश्व-सेना को काट डाला। यह देख दुर्योधन ने ऋष्यशृंग के राक्षस-पुत्र अलम्बुष को, जो भीम से वैर रखता था, इरावान्-वध को भेजा। इरावान् और अलम्बुष में माया-युद्ध हुआ; इरावान् ने अपनी नाग-माया से राक्षस को घेर लिया, पर अलम्बुष ने गरुड़-रूप धरकर उन नागों को निगल लिया और तलवार से इरावान् का मुकुट-धारी, कुण्डल-शोभित सिर काट गिराया। अर्जुन को अपने पुत्र की मृत्यु का तब तक पता न चला।
एक अन्य दिन भीष्म ने ‘मण्डल’ नामक अभेद्य व्यूह रचा, जिसमें हर हाथी के पास सात रथ, हर रथ के पास सात घुड़सवार, और हर घुड़सवार के पीछे सात धनुर्धर तथा सात ढाल-धारी रखे गए। दस हजार घोड़े, दस हजार हाथी और दस हजार रथ भीष्म की रक्षा में लगे। युधिष्ठिर ने इसके सामने ‘वज्र’ व्यूह रचा। उस दिन भी भीष्म प्रलय-सूर्य की भाँति तपते रहे। एक बार शिखण्डी ने भीष्म पर बाण चलाए, किन्तु भीष्म ने उसकी स्त्री-योनि का स्मरण करके उसे छोड़ दिया और अन्य पाण्डव-वीरों की ओर मुड़ गए।
एक उप-कथा: शिखण्डी का जन्म पहले द्रुपद के यहाँ कन्या के रूप में हुआ था और वरदान के बल पर वह पुरुष बना। भीष्म ने प्रतिज्ञा कर रखी थी कि जो पूर्व में स्त्री रहा हो, उस पर वे शस्त्र न उठाएँगे, क्योंकि स्त्री-रक्षा का व्रत उन्होंने आजीवन निभाया। यही प्रतिज्ञा आगे चलकर उनकी मृत्यु का द्वार बनी, क्योंकि अर्जुन ने शिखण्डी को आगे करके बाण चलाए।
इन दिनों भीष्म, द्रोण, अश्वत्थामा, कृप और कृतवर्मा के कोप से पाण्डव-सेना का संहार होता रहा, और दूसरी ओर भीम तथा अर्जुन के कोप से कौरव-सेना का। दुर्योधन और कर्ण ने रात्रि में मन्त्रणा की। कर्ण ने कहा, “जब तक भीष्म युद्ध कर रहे हैं, मैं शस्त्र नहीं उठाऊँगा, क्योंकि वे पाण्डवों पर प्रतिदिन दया दिखाते हैं और उन्हें जीतना नहीं चाहते। भीष्म के शस्त्र-त्याग करते ही मैं अकेला सोमकों सहित पाण्डवों का वध कर दूँगा।” यहाँ कथा कर्ण और भीष्म के बीच के पुराने मनमुटाव को नहीं छिपाती; दोनों एक ही पक्ष में होकर भी साथ नहीं लड़ते।
सार: इरावान् माया-युद्ध में मारे गए; भीष्म ने मण्डल-व्यूह रचकर संहार किया, पर शिखण्डी को उसकी पूर्व-स्त्री-योनि के कारण नहीं मारा। कर्ण ने भीष्म के रहते लड़ने से मना कर दिया।
दुर्योधन के कटु वचन और भीष्म की वेदना
एक रात दुर्योधन भीष्म के शिविर में गया और शब्द-रूपी छुरियों से उन्हें बेधते हुए बोला, “हे भीष्म, आपके सहारे हम देवताओं और असुरों को भी जीतने का साहस करते हैं। फिर पाण्डवों की क्या बात? यदि आप पाण्डवों पर दया या मेरे प्रति द्वेष के कारण उन्हें छोड़ते हैं, तो कृपया कर्ण को युद्ध की अनुमति दे दीजिए।”
इन शब्द-छुरियों से बिंधे भीष्म को गहरा दुःख हुआ, किन्तु उन्होंने एक भी कटु वचन नहीं कहा। बहुत देर मौन रहकर, साँप-सा गहरी साँस लेते हुए उन्होंने शान्त वचनों में कहा, “हे दुर्योधन, आप मुझे शब्द-छुरियों से क्यों बेधते हैं? मैं अपनी पूरी शक्ति से आपका हित करने का यत्न करता हूँ और युद्ध में अपने प्राण न्योछावर करने को तत्पर हूँ। किन्तु पाण्डव सचमुच अजेय हैं।” फिर उन्होंने अर्जुन के पूर्व-पराक्रमों की एक-एक स्मृति गिनाई: खाण्डव-वन में अग्नि को तृप्त करते हुए इन्द्र को जीतना; गन्धर्वों से बँधे जा रहे दुर्योधन को मुक्त कराना (जब उसके भाई और कर्ण भाग गए थे); विराटनगर में अकेले सबको परास्त करना; गोग्रहण के समय द्रोण और स्वयं भीष्म को हराकर उनके वस्त्र छीन लेना। और साथ ही यह दृढ़ता से कहा, “मैं शिखण्डिनी को नहीं मारूँगा, चाहे प्राण ही क्यों न देने पड़ें। विधाता ने उसे पहले स्त्री बनाया था। हे गान्धारीनन्दन, सोकर रात बिताइए; कल मैं ऐसा घोर युद्ध करूँगा जिसकी चर्चा जगत् युगों तक करेगा।”
एक उप-कथा: भीष्म ने यहाँ अपने पिता शान्तनु के लिए लिए गए उस आजीवन-ब्रह्मचर्य व्रत का संकेत किया, जिसके कारण उन्होंने राज्य त्यागा था। उसी व्रत-परम्परा का विस्तार यह नियम था कि वे किसी स्त्री पर, या जो कभी स्त्री रहा हो उस पर, शस्त्र न उठाएँ। दुर्योधन ने रात भर भीष्म के विलाप को मानो आदेश समझा और अगली सुबह सेना को युद्ध के लिए तैयार करवा दिया।
सार: दुर्योधन के कटु वचनों से आहत भीष्म ने प्रत्युत्तर में कोई कठोर बात नहीं कही, अर्जुन की अजेयता के प्रमाण गिनाए, और अगले दिन घोर युद्ध की प्रतिज्ञा की। शिखण्डी को न मारने का संकल्प उन्होंने दोहराया।
दसवाँ दिन: सर्वतोभद्र-व्यूह और भीष्म का अन्तिम संकल्प
दसवें दिन भीष्म ने ‘सर्वतोभद्र’ व्यूह रचा। कृप, कृतवर्मा, शैव्य, शकुनि, सिन्धुराज जयद्रथ और काम्बोजराज सुदक्षिण व्यूह के अग्रभाग में रहे; द्रोण, भूरिश्रवा, शल्य और भगदत्त दाहिने पक्ष में; अश्वत्थामा, सोमदत्त और अवन्ती के दोनों राजकुमार बाएँ पक्ष में। पाण्डव-पक्ष में युधिष्ठिर, भीम, नकुल, सहदेव अग्रभाग में, और शिखण्डी, अर्जुन, घटोत्कच, चेकितान तथा कुन्तिभोज साथ सजे। अर्जुन ने धृष्टद्युम्न से कहा, “हे पांचाल-राजकुमार, आज शिखण्डी को भीष्म के सम्मुख रखिए; मैं स्वयं उनका रक्षक बनूँगा।”
उस दिन के आरम्भ में भयानक अपशकुन हुए: सूर्य मलिन पड़ गया, प्रचण्ड वायु चली, हड्डियों और रक्त की वर्षा हुई, गीदड़ भयंकर चीत्कार करते दौड़े, और उल्काएँ सूर्य-बिम्ब से टकराकर गिरीं। दुर्योधन के कहने पर विदेह, कलिंग और दशेरक जातियों के योद्धा अर्जुन पर टूट पड़े, किन्तु अर्जुन ने दिव्यास्त्रों से उन्हें कीट-पतंगों-सा भस्म कर दिया।

उस दिन भीष्म ने अपूर्व पराक्रम दिखाया। उन्होंने दस हजार हाथी, दस हजार घोड़े, और दो लाख पैदल सैनिक मार डाले, और मत्स्य तथा पांचाल के सात महारथियों का संहार किया। उन्होंने विराट के प्रिय भाई शतानीक को, और फिर एक हजार क्षत्रियों को बाणों से गिरा दिया। धुएँ-रहित अग्नि-से प्रदीप्त भीष्म की ओर कोई पाण्डव-वीर आँख उठाकर भी न देख सका।
तब भीष्म ने मन-ही-मन निश्चय किया कि वे अब अपने प्राणों की रक्षा नहीं चाहते। उन्होंने युधिष्ठिर को पास बुलाकर कहा, “हे युधिष्ठिर, हे महाप्राज्ञ, ये धर्ममय और स्वर्ग की ओर ले जाने वाले वचन सुनिए। अब मैं इस शरीर की रक्षा नहीं चाहता। मैंने युद्ध में बहुत समय बिता लिया। यदि आप मेरा प्रिय करना चाहते हैं, तो पार्थ, पांचालों और सृंजयों को आगे करके मेरा वध करने का यत्न कीजिए।” युधिष्ठिर ने उनका अभिप्राय जानकर सेना को आगे बढ़ने का आदेश दिया।
समझने की कुंजी (वरदान): भीष्म को उनके पिता शान्तनु से दो वरदान प्राप्त थे: एक, कि वे युद्ध में किसी के द्वारा मारे नहीं जा सकते; और दूसरा, कि उनकी मृत्यु उनकी अपनी इच्छा पर निर्भर रहेगी (इच्छा-मृत्यु)। इसी कारण कोई शस्त्र उन्हें तब तक नहीं गिरा सकता था जब तक वे स्वयं प्राण-त्याग का संकल्प न करें।
सार: दसवें दिन भीष्म ने दस हजार हाथी, दस हजार घोड़े और दो लाख पैदल मार डाले, फिर स्वयं युधिष्ठिर से अपने वध का उपाय पूछा, क्योंकि वे अब प्राणों का मोह छोड़ चुके थे।
शिखण्डी को आगे कर अर्जुन का आक्रमण
अर्जुन ने शिखण्डी से कहा, “भीष्म की ओर बढ़िए। आज आपको उनका तनिक भी भय नहीं करना चाहिए। मैं स्वयं अपने तीक्ष्ण बाणों से उन्हें उनके उत्तम रथ से नीचे गिरा दूँगा।” शिखण्डी, धृष्टद्युम्न और अभिमन्यु भीष्म की ओर टूट पड़े; वृद्ध विराट, द्रुपद और कुन्तिभोज भी कवच धारण किए बढ़े।
कौरव-पक्ष के योद्धाओं ने प्रत्येक पाण्डव-वीर को रोका: चित्रसेन ने चेकितान को, कृतवर्मा ने धृष्टद्युम्न को, सोमदत्त-पुत्र भूरिश्रवा ने भीम को, विकर्ण ने नकुल को, कृप ने सहदेव को, दुर्मुख ने घटोत्कच को, दुर्योधन ने स्वयं सात्यकि को, सुदक्षिण ने अभिमन्यु को, अश्वत्थामा ने विराट और द्रुपद को, द्रोण ने युधिष्ठिर को, और दुःशासन ने शिखण्डी को आगे किए आते अर्जुन को रोका। अर्जुन और दुःशासन में घोर द्वन्द्व हुआ; दुःशासन ने अर्जुन के माथे में तीन तीक्ष्ण बाण मारे, जिनसे बिंधे अर्जुन शिखरों वाले मेरु-से शोभित हुए। अन्ततः अर्जुन ने सौ बाणों से दुःशासन को बेध डाला और उसे भीष्म के रथ की ओर भागने पर विवश कर दिया। दुःशासन के लिए भीष्म मानो डूबते को मिला द्वीप बन गए।
द्रोण ने अपने पुत्र अश्वत्थामा से अपशकुनों की चर्चा करते हुए कहा, “हे पुत्र, आज वह दिन है जिस दिन पार्थ भीष्म-वध के लिए पूरी शक्ति लगाएगा। मेरे बाण तरकश से स्वयं निकले पड़ते हैं, मेरा धनुष जँभाई-सा लेता है, मेरा हृदय खिन्न है। अर्जुन शिखण्डी को आगे करके भीष्म की ओर बढ़ रहा है। भीष्म ने कह दिया है कि वे शिखण्डी को नहीं मारेंगे, क्योंकि विधाता ने उसे स्त्री बनाया था। उसके मार्ग से बचकर आप युद्ध कीजिए; मैं युधिष्ठिर पर चढ़ूँगा।”
सार: अर्जुन ने शिखण्डी को ढाल बनाकर भीष्म पर आक्रमण किया; कौरव-वीरों ने हर पाण्डव-योद्धा को रोका, पर अर्जुन ने दुःशासन को परास्त कर दिया। द्रोण ने अपशकुनों से भीष्म के पतन का पूर्वाभास पा लिया।
भीष्म का संकल्प और “ये शिखण्डी के बाण नहीं हैं”
अर्जुन ने शिखण्डी को आगे रखकर भीष्म का धनुष काट दिया। द्रोण, कृतवर्मा, जयद्रथ, भूरिश्रवा, साल, शल्य और भगदत्त, ये सात महारथी अर्जुन के इस कर्म को सहन न कर सके और दिव्यास्त्र लिए उन पर टूट पड़े। पर अर्जुन ने सबको रोक लिया। शिखण्डी ने भीष्म पर दस बाण चलाए, किन्तु भीष्म ने उसकी ओर केवल क्रोध-भरी दृष्टि से देखा और स्त्री-स्मृति के कारण एक भी बाण न चलाया।
भीष्म ने जब-जब नया धनुष उठाया, अर्जुन ने तीन-तीन बाणों से उसे काट डाला। तब क्रोध से होंठ चाटते भीष्म ने पर्वत को भी चीर देने वाला एक शूल अर्जुन के रथ पर फेंका; अर्जुन ने पाँच चौड़े बाणों से उसके पाँच टुकड़े कर दिए। तब भीष्म ने मन में सोचा, “एक ही धनुष से मैं समस्त पाण्डवों को मार सकता था, यदि स्वयं विष्णु उनके रक्षक न होते। पर दो कारणों से मैं इनसे न लड़ूँगा: एक, इनका अवध्य होना; दूसरा, शिखण्डी का स्त्री-रूप। मेरे पिता ने मुझे इच्छा-मृत्यु का वरदान दिया था; अब मैं अपनी मृत्यु की कामना करता हूँ, क्योंकि यही उचित समय है।”

आकाश में स्थित ऋषियों और वसुओं ने कहा, “हे पुत्र, आपका संकल्प हमें भी स्वीकार है। अपने संकल्प के अनुसार आचरण कीजिए; युद्ध से अपना मन हटा लीजिए।” तब जल-कणों से युक्त सुगन्धित वायु बही, दिव्य दुन्दुभियाँ बजीं और भीष्म पर पुष्प-वर्षा हुई। ये वचन भीष्म के अतिरिक्त किसी ने न सुने।

अब भी अर्जुन से बिंधते हुए भीष्म ने अपने धनुष फिर-फिर उठाए, पर अर्जुन उन्हें काटते रहे। अन्ततः भीष्म ने युद्ध की इच्छा त्याग दी। अर्जुन के सैकड़ों बाणों से बिंधे भीष्म ने मुस्कराते हुए दुःशासन से कहा, “एक ही पंक्ति में मेरी ओर आते ये बाण, जिनका स्पर्श वज्र-सा है, अर्जुन के हैं; ये शिखण्डी के नहीं हैं। मेरे कठोर कवच को भेदकर, मूसल-से वेग से मुझे काटते ये बाण शिखण्डी के नहीं हैं। ब्राह्मण के दण्ड-से कठोर, वज्र-से असह्य, मेरे प्राणों को पीड़ित करते ये बाण शिखण्डी के नहीं हैं। गाण्डीवधारी पार्थ के अतिरिक्त समस्त राजा मिलकर भी मुझे यह पीड़ा नहीं दे सकते।”
समझने की कुंजी (अवधारणा): यहाँ कथा की युद्ध-नीति की एक नैतिक उलझन प्रकट होती है। भीष्म स्त्री-रूप शिखण्डी पर बाण नहीं चलाते, और अर्जुन इसी का लाभ उठाकर शिखण्डी को ढाल बनाते हैं। यह छल नहीं तो आदर्श-युद्ध भी नहीं; पाण्डव-पक्ष भी यहाँ शुद्ध धर्म-युद्ध से तनिक हटता है, और कथा इसे छिपाती नहीं।
सार: भीष्म ने स्वयं इच्छा-मृत्यु का संकल्प लिया; ऋषियों और वसुओं ने उसे अनुमोदित किया। उन्होंने दुःशासन से कहा कि उन्हें बेधने वाले बाण शिखण्डी के नहीं, अर्जुन के हैं।
रथ से पतन और शर-शय्या

दसवें दिन भी, समस्त मर्म-स्थलों में बिंधे होने पर भी, भीष्म दस हजार योद्धाओं को मारकर शान्त रणभूमि में टिके रहे। तब पार्थ ने सेना के अग्रभाग में स्थित होकर कुरु-सेना का मध्य भेद दिया। भीष्म के शरीर पर दो अंगुल भर भी ऐसा स्थान न बचा जो बाणों से बिंधा न हो। और तब, सूर्यास्त से कुछ पहले, आपके पुत्रों के सामने ही, भीष्म पूर्व की ओर सिर किए अपने रथ से नीचे गिर पड़े।
उनके गिरते ही आकाश में देवताओं और पृथ्वी के राजाओं के “हाय” और “ओह” के स्वर गूँज उठे। महात्मा पितामह को गिरते देख मानो सबके हृदय भी उनके साथ गिर पड़े। वे इन्द्र-ध्वज की भाँति उखड़कर गिरे और पृथ्वी काँप उठी। किन्तु बाणों से चारों ओर बिंधे होने के कारण उनका शरीर भूमि को न छू सका; वे बाणों की शय्या पर ही टिक गए। उसी क्षण उस महाधनुर्धर पर एक दिव्य भाव छा गया। मेघों ने शीतल जल बरसाया और पृथ्वी डोल उठी।

गिरते समय भीष्म ने ध्यान दिया कि सूर्य अभी दक्षिणायन में है (वर्ष का वह काल जिसे शरीर-त्याग के लिए अशुभ माना जाता था)। अतः उन्होंने अपने प्राणों को जाने न दिया। आकाश में दिव्य स्वर सुनाई पड़े, “गंगापुत्र दक्षिणायन में प्राण क्यों त्यागें?” भीष्म ने उत्तर दिया, “मैं जीवित हूँ।” गंगा ने हंस-रूप में मानस-सरोवर के ऋषियों को भेजा। उन हंस-रूपी ऋषियों ने शर-शय्या पर लेटे भीष्म की परिक्रमा करके कहा कि महात्मा भीष्म दक्षिणायन में क्यों प्रयाण करें। भीष्म ने उनसे कहा, “जब तक सूर्य दक्षिणायन में है, मैं प्राण न त्यागूँगा। उत्तरायण आने पर ही मैं अपने प्राचीन धाम को जाऊँगा। मेरे पिता का दिया वरदान सत्य हो; मैं अपनी इच्छा से ही प्राण रोके रहूँगा।” यह कहकर वे शर-शय्या पर लेटे रहे।
एक उप-कथा: भीष्म ने अपनी इच्छा-मृत्यु के वरदान का उपयोग इस प्रकार किया कि वे शर-शय्या पर पड़े रहकर उत्तरायण की प्रतीक्षा करते रहे। प्राचीन मान्यता में उत्तरायण (सूर्य के उत्तर की ओर लौटने का काल) को देहत्याग के लिए शुभ माना जाता था, जो ज्योतिर्मय गति और मुक्ति का प्रतीक है। इसी कारण भीष्म ने अनेक दिनों तक प्राण रोके रखे।
जब कुरु-शिखर भीष्म गिरे, तब पाण्डव और सृंजय सिंहनाद कर उठे, और कौरव स्तब्ध रह गए। कृप, दुर्योधन और अन्य कुरु शोक से मूर्च्छित-से, बहुत देर निश्चल खड़े रहे। बुद्धिमान् भीष्म, उपनिषदों में सिखाए गए योग का आश्रय लेकर, मानसिक प्रार्थना में लीन, अपने उत्तरायण-रूपी काल की प्रतीक्षा करते शान्त पड़े रहे।
सार: सूर्यास्त से कुछ पूर्व, पूर्व की ओर सिर किए, भीष्म रथ से गिरे, पर बाणों के सघन जाल ने उन्हें भूमि छूने न दी। दक्षिणायन देखकर उन्होंने प्राण रोक लिए और उत्तरायण की प्रतीक्षा में योग-स्थिर हो गए।
शर-शय्या का तकिया और जल की धारा

भीष्म के गिरते ही दोनों सेनाओं ने अस्त्र-शस्त्र रखकर युद्ध रोक दिया। द्रोण, यह समाचार सुनकर, रथ से गिर पड़े और होश आने पर उन्होंने सेना को युद्ध से रोक दिया। पाण्डव और कौरव, कवच उतारकर, भीष्म के पास आए। सहस्रों योद्धा, प्रजापति के पास जाते देवताओं की भाँति, शर-शय्या पर लेटे भीष्म के समीप पहुँचे और प्रणाम करके खड़े हो गए।
भीष्म ने उनका स्वागत करते हुए कहा कि उनका मस्तक नीचे लटक रहा है, अतः उन्हें तकिया चाहिए। राजाओं ने कोमल, मुलायम वस्त्रों के तकिए लाए, पर भीष्म ने उन्हें न चाहा। मुस्कराते हुए उन्होंने कहा, “हे राजाओ, ये वीर की शय्या के योग्य नहीं हैं।” फिर उन्होंने अर्जुन की ओर देखकर कहा, “हे धनंजय, मेरा मस्तक झुका हुआ है। मुझे ऐसा तकिया दीजिए जो आप उचित समझें।” अर्जुन ने आँखों में आँसू भरकर गाण्डीव लिया और मन्त्रों से अभिमन्त्रित तीन तीक्ष्ण बाणों से भीष्म के मस्तक को सहारा दे दिया। अपना अभिप्राय जान लिया गया देख भीष्म प्रसन्न हुए और बोले, “हे पाण्डुपुत्र, आपने मुझे मेरी शय्या के योग्य तकिया दिया। यदि आप अन्यथा करते तो मैं क्रोध से आपको शाप दे देता। क्षत्रिय को रणभूमि में इसी प्रकार शर-शय्या पर शयन करना चाहिए।” फिर उन्होंने सब राजाओं से कहा, “जब तक सूर्य उत्तरायण की ओर न मुड़े, मैं इसी शय्या पर सोऊँगा। मेरे चारों ओर एक खाई खुदवा दीजिए। शत्रुता त्यागकर युद्ध से विरत हो जाइए।”
शल्य-निकालने में निपुण कुछ वैद्य आए, किन्तु भीष्म ने कहा, “इन्हें आदर सहित धन देकर विदा कर दीजिए। मैंने क्षत्रिय-धर्म की परम और श्रेष्ठ गति पा ली है। शर-शय्या पर पड़े मुझे अब वैद्यों की चिकित्सा उचित नहीं। इन्हीं बाणों सहित मुझे अग्नि दी जाए।” दुर्योधन ने वैद्यों को सम्मान सहित विदा किया। राजाओं ने भीष्म की तीन परिक्रमा करके, उनकी रक्षा को पहरेदार बिठाकर, शोक-संतप्त हृदय से अपने शिविरों की ओर प्रस्थान किया।
उसी समय कृष्ण ने पाण्डवों के पास आकर युधिष्ठिर से कहा, “हे कुरुनन्दन, सौभाग्य से आपकी विजय हुई; सौभाग्य से अजेय भीष्म परास्त हुए।” युधिष्ठिर ने उत्तर दिया, “आपकी कृपा से विजय है, आपके कोप से पराजय। आप ही हमारे आश्रय हैं। जिन्हें आप सदा युद्ध में बचाते हैं, उनकी विजय कोई आश्चर्य नहीं।” कृष्ण मुस्कराकर बोले, “हे श्रेष्ठ राजन्, ये वचन आप ही से शोभा देते हैं।”

अगली प्रातः सब राजा पुनः भीष्म के पास आए। सहस्रों कन्याओं ने उन पर चन्दन-चूर्ण, लावा और पुष्प-मालाएँ बरसाईं। स्त्री, वृद्ध और बालक सूर्य-दर्शन के अभिलाषियों-से उमड़ पड़े। बाणों की पीड़ा से जलते भीष्म ने जल माँगा। राजाओं ने शीतल जल के पात्र लाए, पर भीष्म ने कहा, “अब मैं किसी मानवीय भोग का उपयोग नहीं कर सकता; मैं शर-शय्या पर हूँ, चन्द्र और सूर्य के लौटने की प्रतीक्षा में।” फिर उन्होंने अर्जुन को बुलाया, “हे अर्जुन, मेरा शरीर अग्नि-सा जल रहा है, मुख सूख गया है। आप महाधनुर्धर हैं; मुझे विधिपूर्वक जल दीजिए।” अर्जुन रथ पर चढ़े, गाण्डीव की टंकार से सेना को कँपाते हुए भीष्म की परिक्रमा की, और पर्जन्य-अस्त्र से अभिमन्त्रित बाण भीष्म के दक्षिण की ओर पृथ्वी में मारा। वहाँ से अमृत-सी शीतल, सुगन्धित, मधुर जल की एक धारा फूट निकली, जिससे अर्जुन ने पितामह भीष्म को तृप्त किया। यह दिव्य कर्म देख समस्त राजा विस्मय से भर उठे और शंख-दुन्दुभि गूँज उठे।
समझने की कुंजी (अवधारणा): अर्जुन का बाणों से तकिया देना और बाण से जल-धारा निकालना केवल पराक्रम-प्रदर्शन नहीं, अपितु पितामह के प्रति श्रद्धा का प्रतीक है। शर-शय्या पर लेटे भीष्म ने वैद्यों की चिकित्सा अस्वीकार करके यह घोषित किया कि उन्होंने क्षत्रिय-धर्म की परम गति पा ली है, और अब वे केवल उत्तरायण की प्रतीक्षा में हैं।
सार: अर्जुन ने भीष्म को बाणों का तकिया दिया और पर्जन्य-अस्त्र से पृथ्वी फोड़कर अमृत-सी जल-धारा से उनकी प्यास बुझाई। भीष्म ने वैद्यों को विदा कर, शस्त्र-त्याग और शत्रुता-त्याग का आदेश देकर, उत्तरायण की प्रतीक्षा में शर-शय्या पर योग-स्थिर रहना स्वीकार किया।
नौ दिनों की मार के बाद वह रात, जब युधिष्ठिर का धैर्य टूटने को था
नौवें दिन सूरज जब क्षितिज की ओर ढलने लगा और सन्ध्या (दिन और रात के बीच की वह बेला) का भयावना समय आया, तब रणभूमि पर इतना धुँधलका छा गया कि कुछ दिखाई देना बन्द हो गया। धर्मराज युधिष्ठिर ने देखा कि उनकी अपनी सेना भीष्म के बाणों से कटकर बिखर गई है, सैनिक अपने हथियार फेंककर भयभीत होकर मैदान छोड़कर भाग रहे हैं, और सोमकों के बड़े-बड़े रथी हतोत्साह होकर मुँह लटकाए खड़े हैं। थोड़ी देर सोचकर उन्होंने सेना को पीछे हटा लेने का आदेश दिया। आप समझ लीजिए कि उसी समय कौरव सेना भी पीछे हट गई। दोनों ओर के महारथी, स्वयं युद्ध में घायल और थके हुए, अपने-अपने शिविरों में लौट आए।
भीष्म के बाणों से बिंधे हुए पाण्डव उस रात चैन नहीं पा सके। उनके मन में बार-बार उस वृद्ध योद्धा के पराक्रम का चित्र घूमता रहा। उधर भीष्म ने पाण्डवों और सृंजयों को पराजित किया था, इसलिए दुर्योधन के साथ सब कौरव उनकी स्तुति करते हुए, हर्षित होकर उन्हें अपने शिविर तक पहुँचा आए। फिर वह रात उतर आई जो सब प्राणियों को उनकी सुध-बुध से दूर कर देती है।
उसी गहरी रात में पाण्डव, वृष्णिवंशी (श्रीकृष्ण के कुल के लोग) और सृंजय एक मन्त्रणा के लिए बैठे। सब परिस्थिति को तौलते हुए शान्त मन से विचार करने लगे कि इस घड़ी उनके हित में क्या है। बहुत देर सोचकर युधिष्ठिर ने वासुदेव की ओर आँखें उठाकर कहा, “हे कृष्ण, देखिए इन उग्र पराक्रमी भीष्म को। ये मेरी सेना को ऐसे रौंद रहे हैं जैसे हाथी सरकंडों के वन को रौंद देता है। हम तो उस महात्मा की ओर आँख उठाकर देख भी नहीं सकते। प्रचण्ड दावानल की भाँति ये मेरी सेना को चाट जाते हैं। क्रुद्ध यम जीते जा सकते हैं, वज्रधारी इन्द्र भी, पाशधारी वरुण भी, गदाधारी कुबेर भी; पर क्रोध में भरे भीष्म को रण में जीतना सम्भव नहीं। ऐसी दशा में मैं तो शोक के समुद्र में डूबा जा रहा हूँ। मैं वन में चला जाऊँगा। अब युद्ध की इच्छा नहीं रही।”
श्रीकृष्ण ने करुणावश उन्हें ढाढ़स बँधाते हुए कहा, “हे धर्म के पुत्र, हे सत्य में दृढ़ रहने वाले, शोक मत कीजिए। आपके भाई तो साक्षात् शत्रुनाशक हैं। अर्जुन और भीमसेन में पवन और अग्नि का तेज है, माद्री के दोनों पुत्र इन्द्र के समान वीर हैं। आप चाहें तो मुझे ही इस काम पर लगा दीजिए। आपकी आज्ञा से मैं ही भीष्म से लड़ूँगा। यदि अर्जुन उन्हें मारना न चाहें तो मैं अकेले एक ही रथ पर चढ़कर कौरवों के सामने उस वृद्ध पितामह को मार गिराऊँगा।”
युधिष्ठिर ने उत्तर दिया, “हे महाबाहु, बात ठीक वैसी ही है जैसी आप कहते हैं। आपके रहते मुझे सब कुछ सुलभ है। पर हे माधव, अपनी कीर्ति के लिए मैं आपके वचन को झूठा नहीं कर सकता। आपने तो पहले ही प्रतिज्ञा कर ली है कि आप मेरे लिए लड़ेंगे नहीं, केवल परामर्श देंगे। इसलिए हे मधुसूदन, हम सब आपके साथ एक बार फिर देवव्रत के पास चलें और उन्हीं से उनकी मृत्यु का उपाय पूछें। बचपन में हम अनाथ और बालक थे; उन्हीं ने हमें पाला है। वही हमारे पिता के पिता हैं। उन्हीं के पास जाकर हम पूछेंगे, और जो वे कहेंगे, मैं वही करूँगा।”
समझने की कुंजी (अवधारणा): महाभारत की एक गहरी विडम्बना यहाँ खुलती है। युद्ध जीतने के लिए शत्रु को मारने का उपाय शत्रु से ही माँगा जा रहा है, और शत्रु प्रेमवश वह उपाय बता भी देगा। भीष्म दुर्योधन की ओर से लड़ रहे हैं, फिर भी पाण्डवों से उनका वात्सल्य घटा नहीं। धर्म, कर्तव्य और स्नेह का यह उलझाव ही इस पर्व का प्राण है। इसे सपाट अच्छाई-बुराई में मत बाँटिए।
सार: नौ दिन भीष्म के बाणों से कटकर युधिष्ठिर का धैर्य चुक गया। श्रीकृष्ण ने स्वयं भीष्म-वध का बीड़ा उठाना चाहा, पर युधिष्ठिर ने उनकी प्रतिज्ञा अक्षुण्ण रखी और तय किया कि स्वयं पितामह से ही उनकी मृत्यु का उपाय पूछा जाए।
पितामह के शिविर में पाण्डव, और भीष्म के मुख से अपने वध का उपाय
ऐसा निश्चय करके वीर पाण्डव और पराक्रमी वासुदेव अपने कवच और हथियार उतारकर एक साथ भीष्म के शिविर की ओर चल पड़े। उनके भीतर पहुँचकर उन्होंने सिर झुकाकर पितामह को प्रणाम किया और उनकी शरण माँगी। महाबाहु भीष्म ने स्नेह से कहा, “वृष्णिवंशी, आपका स्वागत है। हे धनंजय, आपका स्वागत है। हे युधिष्ठिर, हे भीम, और हे नकुल-सहदेव, आप सबका स्वागत है। आपका हर्ष बढ़ाने के लिए मैं अब क्या करूँ? चाहे कितना ही कठिन हो, मैं उसे पूरे मन से करूँगा।”
युधिष्ठिर ने प्रसन्न होकर प्रेम से कहा, “हे सब कुछ जानने वाले, हमें विजय कैसे मिले, राज्य कैसे मिले, और प्राणियों का यह संहार कैसे रुके? आप अपनी ही मृत्यु का उपाय हमें बताइए। हे कुरुपितामह, आप तो शत्रु को छिद्र (कमज़ोरी का बिन्दु) ढूँढ़ने का अवसर तक नहीं देते। रण में आपका धनुष सदा मण्डलाकार खिंचा रहता है; आप कब बाण उठाते हैं, कब साधते हैं, कब छोड़ते हैं, कोई जान ही नहीं पाता। बताइए, हम आपको कैसे जीतें?”
शान्तनु-पुत्र ने उत्तर दिया, “हे कुन्ती-पुत्र, सच कहता हूँ, जब तक मैं जीवित हूँ, युद्ध में आपकी विजय नहीं हो सकती। मेरे हारने पर ही पाण्डवों को विजय मिलेगी। इसलिए यदि आप विजय चाहते हैं तो बिना देर किए मुझे मार गिराइए। मैं आज्ञा देता हूँ, हे पृथा के पुत्रो, आप अपनी इच्छानुसार मुझ पर प्रहार कीजिए।”
युधिष्ठिर ने फिर पूछा कि आप तो देवताओं और असुरों से मिलकर भी अजेय हैं, तब हम किस उपाय से आपको जीतें। तब भीष्म ने वह रहस्य खोला, “हे पाण्डुपुत्र, जब हाथ में धनुष लेकर मैं सावधानी से लड़ता हूँ, तब इन्द्र सहित देवता और असुर भी मुझे नहीं हरा सकते। पर यदि मैं अपने हथियार रख दूँ, तो ये रथी भी मुझे मार सकते हैं। मैंने अपना एक नियम बना रखा है: जिसने हथियार फेंक दिए हों, जो गिर पड़ा हो, जिसका कवच खिसक गया हो, जिसकी ध्वजा गिर गई हो, जो भाग रहा हो, जो भयभीत हो, जो हाथ जोड़कर शरण माँगे, जो स्त्री हो, या जो स्त्री का नाम धारण करता हो, इनके साथ मैं युद्ध नहीं करता।

“आपकी सेना में द्रुपद का पुत्र शिखण्डी है, जो युद्ध में क्रोधी, वीर और सदा विजयी रहता है। वह पहले स्त्री था, फिर पुरुषत्व को प्राप्त हुआ; यह सब आप जानते ही हैं। कवच पहने अर्जुन शिखण्डी को आगे करके अपने तीखे बाणों से मुझ पर आक्रमण करें। उस अमंगल लक्षण को, अर्थात् उस व्यक्ति को जो पहले स्त्री था, सामने देखकर मैं धनुष-बाण से सज्जित रहते हुए भी उस पर प्रहार नहीं करूँगा। उसी अवसर पर हे धनंजय, आप शीघ्र चारों ओर से मुझे अपने बाणों से बेध डालिए। श्रीकृष्ण और अर्जुन को छोड़कर तीनों लोकों में मुझे रण में मार सकने वाला और कोई नहीं दिखता। अर्जुन शिखण्डी या किसी अन्य को सामने करके मुझे रथ से गिरा दें; तब आपकी विजय निश्चित है।”
एक उप-कथा: शिखण्डी कौन है, यह जानना ज़रूरी है। पूर्वजन्म में वह काशिराज की कन्या अम्बा थी। भीष्म उसका हरण करके लाए थे (अपने भाई के विवाह के लिए), पर उसके किसी और से प्रेम के कारण उसे लौटा दिया गया; तब वह वर भी उसे न अपना सका। भीष्म को ही अपने सर्वनाश का कारण मानकर अम्बा ने घोर तप किया और शिखण्डी के रूप में द्रुपद के यहाँ जन्म लिया, पहले कन्या रूप में, फिर वरदान से पुरुष बनकर। इसीलिए भीष्म उस पर शस्त्र नहीं उठाएँगे, और यही उनके अन्त का द्वार बनेगा।

यह सुनकर अर्जुन का मुख ग्लानि और शोक से झुक गया। उन्होंने कहा, “हे माधव, जो मेरे पिता के भी पिता हैं, जो हमारे कुल में परम वृद्ध हैं, जिनकी गोद में चढ़कर बालपन में मैंने अपने धूल भरे शरीर से इन्हें मैला किया, जिन्हें मैंने भूल से ‘पिता’ कह दिया था और जिन्होंने हँसकर कहा था ‘मैं आपका पिता नहीं, पिता का पिता हूँ’, उनसे मैं कैसे लड़ूँ? चाहे विजय मिले या मृत्यु, मैं इस महात्मा से युद्ध नहीं करूँगा।”
वासुदेव ने कहा, “हे जिष्णु, पहले भीष्म-वध की प्रतिज्ञा करके अब क्षत्रिय-धर्म के विरुद्ध आप कैसे पीछे हट सकते हैं? जो शत्रु बनकर सामने आए, उसे यदि वह वृद्ध और पूज्य भी हो तो भी मारना ही क्षत्रिय का सनातन धर्म है। यह तो देवताओं ने पहले ही निश्चित कर रखा है। आप शिखण्डी को आगे करके पितामह को रथ से गिरा दीजिए।” अर्जुन ने धीरे से माना कि शिखण्डी ही भीष्म की मृत्यु का निमित्त बनेगा; वे अन्य महारथियों को रोकेंगे और शिखण्डी पितामह से भिड़ेगा। यह तय करके पाण्डव भीष्म की अनुमति लेकर प्रसन्न मन से अपने-अपने शिविरों में लौट गए।
सार: शस्त्र उतारकर पाण्डव पितामह की शरण गए, और भीष्म ने स्वयं अपने वध का उपाय खोला: शिखण्डी को सामने देखकर वे शस्त्र नहीं उठाएँगे, उसी क्षण अर्जुन उन्हें बेध डालें। अर्जुन की ग्लानि को श्रीकृष्ण ने क्षत्रिय-धर्म का स्मरण कराकर सँभाला।
दसवें दिन की व्यूह-रचना: शिखण्डी सबके आगे
सूर्योदय की बेला में ढोल, झाँझ, छोटे नगाड़ों और दूधिया शंखों की ध्वनि के बीच पाण्डव शिखण्डी को अपने आगे रखकर युद्ध के लिए निकले। उन्होंने सब शत्रुओं का नाश करने वाली एक व्यूह-रचना बनाई थी। शिखण्डी सारी सेना के एकदम अग्रभाग में स्थित था। भीमसेन और धनंजय उसके रथ के पहियों के रक्षक बने। पीछे द्रौपदी के पुत्र और वीर अभिमन्यु थे। उनके पीछे सात्यकि और चेकितान अन्तिम पंक्ति की रक्षा कर रहे थे। उनके पीछे पांचालों से घिरे धृष्टद्युम्न, फिर जुड़वाँ भाइयों सहित युधिष्ठिर, फिर विराट, फिर द्रुपद; और पाँचों कैकेय भाई तथा वीर धृष्टकेतु सेना के पिछले भाग की रक्षा कर रहे थे।
उधर कौरवों ने भी महारथी भीष्म को सारी सेना के आगे रखकर प्रस्थान किया। उस अजेय योद्धा की रक्षा धृतराष्ट्र के पराक्रमी पुत्र कर रहे थे। उनके पीछे महाधनुर्धर द्रोण और उनका पुत्र अश्वत्थामा, फिर हाथियों की सेना से घिरे भगदत्त, फिर कृपाचार्य और कृतवर्मा; और कांबोजराज सुदक्षिण, मगधराज जयत्सेन, सुबल-पुत्र शकुनि तथा बृहद्बल पिछली पंक्ति में थे। प्रतिदिन की भाँति भीष्म ने उस दिन भी व्यूह-रचना की, कभी आसुर, कभी पैशाच, तो कभी राक्षस व्यूह बनाते हुए।
अर्जुन को आगे रखकर और शिखण्डी को सबके आगे करके पार्थ-सेना भिन्न-भिन्न प्रकार के बाण बरसाती हुई भीष्म की ओर बढ़ी। भीष्म के बाणों से बिंधकर अनेक कौरव-योद्धा रक्त में नहाए परलोक चले गए। नकुल, सहदेव और महारथी सात्यकि कौरव सेना को बड़े वेग से पीड़ित करने लगे, और कौरव-सैनिक उस विशाल पाण्डव-सेना का सामना न कर सके।
समझने की कुंजी (व्यूह): “व्यूह” का अर्थ है सेना की विशेष आकार-रचना, ताकि रक्षा और प्रहार दोनों सधे रहें। शिखण्डी को सबके आगे रखने की पूरी रणनीति इसी एक तथ्य पर टिकी थी कि भीष्म उस पर बाण नहीं चलाएँगे। यह कोई वीरता का प्रदर्शन नहीं था, एक सोची-समझी युक्ति थी, जिसमें अर्जुन शिखण्डी की आड़ लेकर प्रहार करेंगे।
भीष्म का प्रलयंकर पराक्रम, और शिखण्डी की ललकार

अपनी सेना का संहार न सह पाकर वह अजेय महाधनुर्धर भीष्म अपने प्राणों की चिन्ता छोड़कर पाण्डवों, पांचालों और सृंजयों पर लम्बे, गोखुर-मुख वाले और अर्धचन्द्राकार बाणों की वर्षा करने लगे। रथों से रथियों को, घोड़ों से घुड़सवारों को, पैदल सैनिकों के झुंडों को और हाथियों की पीठ से गजारोहियों को गिराते हुए उन्होंने शत्रु में आतंक भर दिया। पाण्डव-योद्धा अकेले उन पर ऐसे टूट पड़े जैसे वज्रधारी इन्द्र पर असुर। उनका विशाल धनुष इन्द्र के धनुष की भाँति सदा मण्डलाकार खिंचा दिखता था।
उस दसवें दिन भीष्म ने अपने तीखे बाणों से शिखण्डी की सेना को वन की भाँति भस्म कर डाला। तब शिखण्डी ने उन्हें छाती के बीचोंबीच तीन बाणों से बेध दिया। गहरी चोट लगने पर भीष्म ने देखा कि बेधने वाला शिखण्डी है। क्रुद्ध होकर भी, उससे लड़ने को अनिच्छुक भीष्म ने हँसकर कहा, “आप मुझे मारें या न मारें, मैं आपसे कभी युद्ध नहीं करूँगा। आप वही शिखण्डी हैं जो विधाता ने आपको पहले बनाया था।”
यह सुनकर शिखण्डी क्रोध से अपने होंठ चाटता हुआ बोला, “हे महाबाहु, मैं जानता हूँ कि आप क्षत्रियों के संहारक हैं। मैंने परशुराम से आपके युद्ध की कथा सुनी है, आपके अलौकिक पराक्रम की बात सुनी है। फिर भी मैं आज आपसे लड़ूँगा। पाण्डवों के और अपने हित के लिए मैं आपका वध अवश्य करूँगा; अपनी सत्य की शपथ खाकर कहता हूँ। हे सदा विजयी भीष्म, इस संसार को अन्तिम बार देख लीजिए।” यह कहकर शिखण्डी ने पाँच सीधे बाणों से भीष्म को बेध दिया।
शिखण्डी को भीष्म की मृत्यु का निमित्त मानकर अर्जुन ने उसे उत्साहित किया, “मैं आपके पीछे रहकर बाणों से शत्रुओं को भगाता रहूँगा। आप वेग से भीष्म पर टूट पड़िए। मैं द्रोण, अश्वत्थामा, कृप, दुर्योधन, जयद्रथ, अवन्ती के विन्द-अनुविन्द, कांबोजराज सुदक्षिण, भगदत्त, मगधराज, सोमदत्त-पुत्र और शेष सब महारथियों को वैसे ही रोक दूँगा जैसे तट उमड़ते समुद्र को रोकता है। आप पितामह को मारिए।”
समझने की कुंजी (संख्या-आधुनिक समतुल्य): महाभारत की गिनतियाँ काव्य की अतिशयता हैं, यथार्थ जनगणना नहीं। “प्रतिदिन दस हज़ार” या “दस हज़ार हाथी” जैसी संख्याएँ भीष्म की भयावनी मारक-शक्ति को मन पर अंकित करने का ढंग हैं, ठीक वैसे ही जैसे आज हम कहें “उन्होंने अकेले पूरी पलटन को रोक लिया”। इन्हें भाव की तीव्रता समझिए, खाते-बही का आँकड़ा नहीं।
सार: भीष्म ने दसवें दिन भी प्रलय मचाया, पर शिखण्डी के बाण लगने पर उन्होंने उससे लड़ने से इनकार कर दिया। शिखण्डी ने वध की शपथ ली, और अर्जुन ने सब महारथियों को रोकने का बीड़ा उठाकर उसे आगे ठेला।
दुर्योधन की पुकार और भीष्म का अन्तिम संकल्प
दुर्योधन ने भयभीत होकर भीष्म से कहा, “हे गंगापुत्र, श्वेत घोड़ों वाला, कृष्ण को सारथि बनाए पाण्डुपुत्र अर्जुन मेरी सारी सेना को दावानल की तरह जला रहा है। भीम, सात्यकि, चेकितान, माद्री के पुत्र, अभिमन्यु, धृष्टद्युम्न और राक्षस घटोत्कच, सब मेरी सेना को तोड़ रहे हैं। आपके सिवा इन पीड़ित सैनिकों का कोई आश्रय मुझे नहीं दिखता।”
क्षणभर सोचकर देवव्रत ने उसे सान्त्वना देते हुए कहा, “हे दुर्योधन, शान्त मन से सुनिए। पहले मैंने आपके सामने प्रतिज्ञा की थी कि प्रतिदिन दस हज़ार क्षत्रियों को मारकर रण से लौटूँगा। वह प्रतिज्ञा मैंने पूरी की है। आज मैं और भी बड़ा काम करूँगा। आज या तो मैं मारा जाकर सोऊँगा, या पाण्डवों को मार डालूँगा। आपके दिए अन्न का जो ऋण मुझ पर है, उसे आज आपकी सेना के अग्रभाग में अपने प्राण न्योछावर करके चुका दूँगा।” यह कहकर वह अजेय योद्धा क्षत्रियों पर बाण बरसाता हुआ पाण्डव-सेना पर टूट पड़ा।
उस दसवें दिन भीष्म ने अपना बल दिखाते हुए पांचालों के श्रेष्ठ रथियों का तेज ऐसे सोख लिया जैसे सूर्य अपनी किरणों से पृथ्वी की नमी सोख लेता है। दस हज़ार चपल हाथी, दस हज़ार घोड़े अपने सवारों सहित, और पूरे दो लाख पैदल सैनिक मारकर वे धुएँ रहित अग्नि की भाँति युद्ध में देदीप्यमान हो उठे। उस समय उत्तरायण के तपते सूर्य की भाँति उनकी ओर पाण्डवों में से कोई आँख उठाकर भी न देख सका। चारों ओर असंख्य योद्धाओं से घिरे भीष्म मेघों से ढके मेरु पर्वत के शिखर जैसे लग रहे थे। धृतराष्ट्र के पुत्र विशाल सेना लेकर चारों ओर से उनकी रक्षा कर रहे थे।
उस दिन की मार ऐसी थी कि रणभूमि पर रक्त की एक नदी बह निकली, जिसमें योद्धाओं के बाल काई और सिवार बन गए। धड़ों से कटे हुए सिर पत्थरों की वर्षा के समान शब्द करते हुए गिरते रहे; धरती मनुष्यों के धड़ों, हाथियों के क्षत-विक्षत शरीरों और घोड़ों के कटे अंगों से ढक गई। उठती हुई लाल-धुएँ के रंग की धूल ने ऐसा आवरण डाला कि सैनिक अपने और पराये का भेद न कर सके; पिता पुत्र को और पुत्र पिता को न पहचान सका। तब एक घोर युद्ध छिड़ा।
एक उप-कथा: भीष्म “अन्न के ऋण” की बात करते हैं। यह कोई मुहावरा भर नहीं। भीष्म आजीवन हस्तिनापुर के राजसिंहासन के सेवक रहे; उन्होंने पिता शान्तनु के सुख के लिए विवाह और राज्य दोनों का त्याग किया था, इसी कारण उनका नाम “भीष्म” (भीषण प्रतिज्ञा वाला) पड़ा। वही नमक का ऋण उन्हें दुर्योधन के पक्ष में लड़ने को बाध्य करता है, चाहे उनका हृदय पाण्डवों की ओर झुका हो। यह उनकी त्रासदी का मूल है।
सब महारथियों का टकराव: भीष्म की रक्षा बनाम भीष्म का वध
अर्जुन ने शिखण्डी से कहा, “पितामह की ओर बढ़िए। आज भीष्म से तनिक भी मत डरिए। मैं अपने तीखे बाणों से इन्हें इनके श्रेष्ठ रथ से गिरा दूँगा।” यह सुनकर शिखण्डी गंगापुत्र की ओर झपटा। धृष्टद्युम्न, अभिमन्यु, वृद्ध विराट, द्रुपद, कुन्तिभोज, नकुल, सहदेव और स्वयं युधिष्ठिर भी भीष्म की ओर दौड़े।
तब कौरव-योद्धा भीष्म की रक्षा के लिए सामने आए। चित्रसेन ने चेकितान को, कृतवर्मा ने धृष्टद्युम्न को, सोमदत्त-पुत्र भूरिश्रवा ने भीमसेन को, विकर्ण ने नकुल को, कृप ने सहदेव को, और दुर्योधन ने स्वयं सात्यकि को रोका। सुदक्षिण ने अभिमन्यु को, अश्वत्थामा ने विराट और द्रुपद को, द्रोण ने युधिष्ठिर को, तथा महाधनुर्धर दुःशासन ने शिखण्डी को आगे किए भीष्म की ओर बढ़ते अर्जुन को रोका।
तब हमने एक अद्भुत दृश्य देखा। दुःशासन के रथ तक पहुँचकर अर्जुन आगे न बढ़ सके। जैसे तट उमड़ते समुद्र को रोकता है, वैसे ही दुःशासन ने क्रुद्ध पार्थ को रोक लिया। दुःशासन ने तीन बाणों से अर्जुन को और बीस से वासुदेव को बेधा। क्रुद्ध अर्जुन ने सौ बाणों से दुःशासन को बेध डाला, जो कवच पार करके उसका रक्त पी गए। दुःशासन ने माथे में तीन तीखे बाण मारे; उन बाणों के साथ अर्जुन शिखरों वाले मेरु की भाँति शोभायमान दिखे। अन्ततः अर्जुन के बाणों से पीड़ित होकर दुःशासन अर्जुन को छोड़कर भीष्म के रथ की ओर चला गया; डूबते हुए के लिए भीष्म ही उसका द्वीप बने।
इसी बीच ऋष्यशृंग के पुत्र राक्षस अलम्बुष ने सात्यकि को रोका। सात्यकि ने हँसते हुए नौ बाणों से उस राक्षस को बेधा; राक्षस ने भी उतने ही बाणों से सिनिवंशी सात्यकि को घायल किया। दोनों में बाणों की झड़ी लग गई, और महान तेजस्वी सात्यकि गहरी चोट खाकर भी अपने पराक्रम पर हँसते हुए डटे रहे।
अभिमन्यु ने भीष्म के हित के लिए, अपने पिता पार्थ की सहायता हेतु, बृहद्बल से युद्ध किया। कोसलराज ने सुभद्रा-पुत्र को पहले पाँच, फिर बीस बाणों से बेधा; अभिमन्यु ने आठ लोहे के बाणों से उत्तर दिया, और फिर बृहद्बल का धनुष काटकर तीस बाण और मारे। दोनों का यह द्वन्द्व देवासुर-संग्राम में वालि और इन्द्र के संग्राम जैसा प्रतीत हुआ। एक ओर दुर्योधन ने नौ सीधे बाणों से अभिमन्यु की छाती बेधी; अभिमन्यु ने यम के दण्ड जैसी एक भयंकर शक्ति दुर्योधन के रथ पर फेंकी, जिसे दुर्योधन ने एक चौड़े बाण से बीच में ही काट गिराया। तब अभिमन्यु ने दस तीखे बाणों से कुरुराज की छाती बेध दी।
दूसरी ओर पौरव और धृष्टकेतु का घोर द्वन्द्व चला। दोनों ने एक-दूसरे के धनुष काटे, घोड़े मारे, और रथहीन होकर तलवारों से भिड़े। सौ चन्द्र और सौ तारों से चित्रित बैल-चर्म की ढालें और चमकीली तलवारें लिए वे वन में एक ही सिंहनी के लिए लड़ते दो सिंहों की भाँति घूमते, आगे बढ़ते, पीछे हटते रहे। पौरव ने धृष्टकेतु के ललाट पर और चेदिराज ने पौरव के कन्धे पर वार किया, और दोनों घायल होकर मैदान में गिर पड़े। जयत्सेन ने पौरव को और सहदेव ने धृष्टकेतु को रणभूमि से हटा लिया।
द्रोण और पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्न का संग्राम भी भयंकर था। द्रोण ने प्रिषत-पुत्र का विशाल धनुष काटकर पचास बाणों से उसे गहरे बेध डाला। धृष्टद्युम्न ने दूसरा धनुष उठाकर बाण बरसाए, फिर यम के दण्ड जैसी एक गदा द्रोण पर फेंकी, जिसे द्रोण ने पचास बाणों से चूर-चूर कर दिया। धृष्टद्युम्न ने एक लोहे का भाला फेंका, उसे भी द्रोण ने नौ बाणों से काट डाला। उधर भीमसेन हाथियों की सेना में वज्रधारी इन्द्र की भाँति प्रवेश करके पर्वत जैसे हाथियों को धराशायी करते रहे; गिरे हुए हाथी अंजन के ढेर जैसे पृथ्वी पर बिखर गए।
हर ओर “भीष्म की विजय” और “भीष्म पर विजय” का दाँव लगा था, मानो भीष्म ही वह बाज़ी हों जिस पर पूरे युद्ध का परिणाम टिका हो।
सार: भीष्म तक पहुँचने का यत्न करते अर्जुन और शिखण्डी को कौरव महारथियों ने जगह-जगह रोका; दुःशासन ने अर्जुन को कड़ी टक्कर दी। पूरी रणभूमि एक ही केन्द्र पर घूम रही थी: भीष्म को बचाना, या भीष्म को गिराना।
अग्नि-समान भीष्म, और शिखण्डी की उपेक्षा
भीष्म का रथ मानो उनकी अग्नि-वेदी था, उनका धनुष उस अग्नि की ज्वाला, तलवारें-गदाएँ उसका ईंधन, और बाणों की वर्षा उसकी जलती चिनगारियाँ, जिनसे वे क्षत्रियों को भस्म कर रहे थे। चेदि, काशी और करूष देशों के पूरे चौदह हज़ार महारथी, जो सोने से जड़ी ध्वजाओं वाले और प्राण न्योछावर करने को तत्पर थे, भीष्म के पास पहुँचते ही अपने रथ, घोड़े और हाथियों सहित यमलोक भेज दिए गए। सोमकों में एक भी महारथी ऐसा न था जो भीष्म के पास जाकर जीवित लौटा हो।

शिखण्डी ने भीष्म की छाती पर दस चौड़े बाण मारे। पर गंगापुत्र ने केवल क्रोध से उसकी ओर देखा, मानो उस दृष्टि से ही उसे भस्म कर देंगे; उसका स्त्री-रूप स्मरण करके उन्होंने उस पर प्रहार नहीं किया। शिखण्डी इसे समझ न सका। अर्जुन ने फिर कहा, “शीघ्र पितामह का वध कीजिए। युधिष्ठिर की सेना में आपके सिवा कोई इनसे लड़ने योग्य नहीं।”
शिखण्डी ने अनेक बाणों से पितामह को ढक दिया, पर उनकी उपेक्षा करके देवव्रत केवल क्रुद्ध अर्जुन को ही रोकते रहे और शेष पाण्डव-सेना को परलोक भेजते रहे। जैसे गर्मी से तपा मनुष्य वर्षा की धार को प्रसन्नता से ग्रहण करता है, वैसे ही गंगापुत्र शिखण्डी के बाणों को हँसते हुए सहते रहे; वे बाण उन्हें तनिक भी पीड़ा न देते थे।
तब दुर्योधन ने अपने सब योद्धाओं को ललकारा, “चारों ओर से फाल्गुन पर टूट पड़िए। सेनापति-धर्म जानने वाले भीष्म आप सबकी रक्षा करेंगे।” यह सुनकर विदेह, कलिंग, निषाद, सौवीर, बाल्हीक, दरद, मालव, शूरसेन, शिवि, वसाति, साल्व, शक, त्रिगर्त, अम्बष्ठ और कैकेय आदि अनेक देशों के योद्धा अर्जुन पर टूट पड़े, मानो अग्नि पर पतंगों के झुंड। महाबाहु धनंजय ने विविध दिव्यास्त्रों का स्मरण करके, उन सेनापतियों को उनकी टुकड़ियों के अग्रभाग में ही, अग्नि में जलते पतंगों की भाँति भस्म कर दिया। हज़ारों बाण रचते हुए उनका गाण्डीव आकाश में देदीप्यमान हो उठा। उन बाणों से बिंधकर, अपनी ऊँची ध्वजाएँ कटी-गिरी देखकर, वे क्षत्रिय एक साथ मिलकर भी कपिध्वज पार्थ के पास न फटक सके। रथी अपनी ध्वजाओं सहित, घुड़सवार अपने घोड़ों सहित, और गजारोही अपने हाथियों सहित किरीटी के बाणों से गिरते गए।
फिर अर्जुन ने कौरव-सेना को खदेड़कर दुःशासन पर बाण बरसाए, जो उसे चीरकर बाँबी में घुसते सर्पों की भाँति पृथ्वी में समा गए। अर्जुन ने दुःशासन के घोड़े और सारथि गिराए, बीस बाणों से विविंशति को रथहीन किया, और कृप, विकर्ण तथा शल्य को भी रथविहीन कर दिया; ये सब भाग खड़े हुए। पूर्वाह्न में ही इन महारथियों को परास्त करके पार्थ धुआँरहित अग्नि की भाँति देदीप्यमान हो उठे। सूर्य की भाँति चारों ओर बाण-किरणें बिखेरते हुए उन्होंने अनेक राजाओं को गिराया, और कुरु तथा पाण्डव सेनाओं के बीच रक्त की एक बड़ी नदी बहा दी। कटे हुए हाथियों, घोड़ों और रथियों के रक्त से रँगी वह भूमि शरद् के लाल मेघ-सी दिखने लगी। कुत्ते, कौवे, गीध, भेड़िये और सियार उस आहार को देखकर भयंकर हुँकार भरने लगे; भिन्न-भिन्न दिशाओं से वायु बहने लगी, और राक्षस तथा प्रेत वहाँ ऊँचे स्वर में चीत्कार करते दिखे।
तब भीष्म ने एक दिव्यास्त्र का आवाहन करके अर्जुन पर आक्रमण किया; कवच पहने शिखण्डी झपटकर बीच में आ गया, और भीष्म ने अग्नि-समान वह अस्त्र वापस खींच लिया। उधर श्वेत घोड़ों वाले कुन्ती-पुत्र पितामह को भ्रमित करते हुए आपकी सेना का संहार करते रहे।
समझने की कुंजी (अवधारणा): ध्यान दीजिए, भीष्म की हार किसी एक प्रबल वार से नहीं आती। वह एक नैतिक बन्धन से आती है। वे शिखण्डी को नहीं मारेंगे, यह उनका अपना व्रत है। उनका वध छल नहीं, उनकी ही प्रतिज्ञा का परिणाम है; उन्होंने स्वयं यह द्वार खोला। यही महाभारत की सूक्ष्मता है, जहाँ पराजय भी धर्म और व्रत के तानेबाने से बुनी जाती है।
“ये बाण शिखण्डी के नहीं, अर्जुन के हैं”: भीष्म का त्याग का निश्चय
शिखण्डी को आगे रखकर पाण्डव चारों ओर से भीष्म को घेरकर बार-बार बेधने लगे। सृंजयों ने मिलकर शतघ्नी (एक प्रकार का बहु-मारक अस्त्र), काँटेदार गदाओं, परशुओं, मुद्गरों, भालों और सोने के पंखों वाले बाणों से उन पर प्रहार किया। उनका कवच जगह-जगह बिंध गया, पर हर मर्म पर बिंधकर भी भीष्म ने पीड़ा अनुभव नहीं की। शत्रुओं को वे प्रलय की अग्नि जैसे दिखते थे।
अर्जुन ने क्रुद्ध होकर शिखण्डी को आगे करके भीष्म का धनुष काट डाला। तब द्रोण, कृतवर्मा, जयद्रथ, भूरिश्रवा, शल, शल्य और भगदत्त, ये सात महारथी अर्जुन का यह कृत्य न सह सके और क्रोध में उन पर टूट पड़े। “मारो, बेधो, काटो” का घोर कोलाहल अर्जुन के रथ के चारों ओर उठा। उनकी रक्षा के लिए सात्यकि, भीम, धृष्टद्युम्न, विराट, द्रुपद, घटोत्कच और अभिमन्यु आगे आए।
भीष्म ने दूसरा, और भी कठोर धनुष उठाया; अर्जुन ने तीन बाणों से उसे भी काट दिया। बाएँ हाथ से भी धनुष चलाने में समर्थ अर्जुन ने एक के बाद एक भीष्म के सब धनुष काट डाले। तब क्रोध में होंठ चाटते हुए भीष्म ने पर्वत को भी चीर देने वाला एक भाला (शक्ति) उठाकर अर्जुन के रथ पर फेंका। अर्जुन ने पाँच चौड़े बाणों से उस भाले के पाँच टुकड़े कर दिए।
अपना भाला कटा देखकर भीष्म मन ही मन सोचने लगे, “केवल एक धनुष से मैं सब पाण्डवों को मार सकता था, यदि स्वयं विष्णु उनके रक्षक न होते। पर दो कारणों से मैं इनसे नहीं लड़ूँगा: एक तो ये अवध्य हैं, दूसरे शिखण्डी का स्त्री-रूप। मेरे पिता ने मुझे दो वरदान दिए थे, कि मैं रण में अवध्य रहूँगा और मेरी मृत्यु मेरी अपनी इच्छा पर निर्भर रहेगी। अब, यही उचित समय है, मैं अपनी मृत्यु की कामना करता हूँ।”
भीष्म का यह संकल्प जानकर आकाश में स्थित ऋषियों और वसुओं ने कहा, “हे पुत्र, आपका निश्चय हमें भी स्वीकार है। अपने संकल्प के अनुसार कीजिए, युद्ध से मन हटा लीजिए।” तब जल-कणों से भरी सुगन्धित वायु बहने लगी, दिव्य दुन्दुभियाँ बज उठीं, और भीष्म पर फूलों की वर्षा हुई। ये वचन भीष्म के सिवा कोई न सुन सका। सञ्जय कहते हैं कि मैंने ये वचन व्यासजी की दी हुई दिव्य-दृष्टि के कारण सुने। भीष्म के रथ से गिरने की कल्पना से देवताओं के हृदय शोक से भर उठे।

शिखण्डी ने नौ तीखे बाणों से पितामह की छाती बेधी। भीष्म भूकम्प में अडिग पर्वत की भाँति विचलित न हुए। तब अर्जुन ने हँसते हुए गाण्डीव खींचकर पच्चीस बाणों से, और फिर सैकड़ों बाणों से उनके हर मर्म को बेध डाला। अर्जुन ने फिर भीष्म का धनुष काटा, ध्वजा गिराई, और रथ को कँपा दिया। भीष्म ने और भी बलिष्ठ धनुष उठाया, पर पलक झपकते ही अर्जुन ने उसे भी तीन टुकड़े कर दिया।
तब भीष्म ने दुःशासन से हँसकर कहा, “देखिए दुःशासन, एक ही पंक्ति में मेरी ओर आते ये बाण, जिनका स्पर्श वज्र जैसा है, अर्जुन के हैं, शिखण्डी के नहीं। मेरे कठोर कवच को चीरकर, मूसल के वेग से मुझे चोट पहुँचाने वाले ये बाण शिखण्डी के नहीं। विष-भरे क्रुद्ध सर्पों की भाँति मेरे मर्मों में घुसते ये बाण शिखण्डी के नहीं; जाड़े की ठंड जैसे गायों को कँपा दे, वैसे ही मुझे चीरते ये बाण शिखण्डी के नहीं। गाण्डीवधारी जिष्णु को छोड़कर सब राजा मिलकर भी मुझे पीड़ा नहीं दे सकते।”

यह कहकर भीष्म ने पार्थ पर एक शक्ति (भाला) फेंकी; अर्जुन ने तीन बाणों से उसके तीन टुकड़े कर दिए। तब भीष्म ने सोने से जड़ी ढाल और तलवार उठाई, पर रथ से उतरने से पहले ही अर्जुन ने बाणों से उस ढाल के सौ टुकड़े कर दिए। युधिष्ठिर ने अपनी सेना को ललकारा, “गंगापुत्र पर टूट पड़िए, तनिक भी मत डरिए।” चारों ओर से योद्धा उस अकेले वीर पर झपटे।
समझने की कुंजी (वरदान): भीष्म “इच्छा-मृत्यु” के वरदान वाले हैं, अर्थात् वे तब तक प्राण नहीं छोड़ेंगे जब तक स्वयं न चाहें। इसीलिए बाणों से बिंधकर भी वे तुरन्त नहीं मरते। यह वरदान आगे की कथा में निर्णायक बनेगा, क्योंकि वे उत्तरायण (सूर्य के उत्तर की ओर मुड़ने का काल) की प्रतीक्षा में अपने प्राण रोके रखेंगे।
सार: अर्जुन ने एक के बाद एक भीष्म के सब धनुष, भाले और ढाल काट डाले। भीष्म ने पहचान लिया कि घातक बाण शिखण्डी के नहीं, अर्जुन के हैं, और ऋषियों-वसुओं की अनुमति पाकर उन्होंने स्वेच्छा से प्राण-त्याग का निश्चय कर लिया।
रथ से गिरना, और शर-शय्या पर लेटना

उस दसवें दिन भीष्म के शरीर में दो अंगुल भी ऐसी जगह नहीं बची जो बाणों से बिंधी न हो। फिर सूर्यास्त से कुछ पहले, आपके पुत्रों के सामने ही, वे पूर्व की ओर सिर किए अपने रथ से गिर पड़े। उनके गिरते ही आकाश में देवताओं और पृथ्वी के राजाओं के “हाय, हाय” के स्वर गूँज उठे। इन्द्र की उखड़ी हुई ध्वजा की भाँति वह महाबाहु वीर पृथ्वी को कँपाते हुए गिरा। पर बाणों से चारों ओर बिंधे होने के कारण उनका शरीर भूमि को नहीं छू सका; वे बाणों की शय्या पर ही लेट गए।
उस क्षण उस महाधनुर्धर में एक दिव्य भाव समा गया। आकाश से शीतल जल की वर्षा हुई और पृथ्वी काँप उठी। गिरते समय भीष्म ने यह लक्ष्य कर लिया था कि सूर्य अभी दक्षिणायन (सूर्य के दक्षिण की ओर रहने का काल) में है। इसलिए उस अशुभ काल का स्मरण करके उन्होंने अपने प्राणों को जाने नहीं दिया। चारों ओर आकाश में दिव्य वाणियाँ सुनाई दीं, “गंगापुत्र, यह श्रेष्ठ शस्त्रवेत्ता दक्षिणायन में प्राण क्यों त्यागे?” भीष्म ने उत्तर दिया, “मैं जीवित हूँ।” पृथ्वी पर गिरे रहकर भी, उत्तरायण की प्रतीक्षा में, उन्होंने अपने प्राण नहीं छोड़े।

तब हिमवान की पुत्री गंगा ने हंस-रूप में महर्षियों को भेजा। मानस-सरोवर के वे हंस-रूपी ऋषि भीष्म के दर्शन के लिए उस स्थान पर आए जहाँ वे शर-शय्या पर लेटे थे। उनकी प्रदक्षिणा करके, सूर्य के दक्षिणायन में होने का स्मरण करके, वे आपस में बोले, “ऐसे महात्मा भीष्म दक्षिणायन में देह क्यों छोड़ें?” यह कहकर हंस दक्षिण दिशा की ओर चल पड़े। भीष्म ने उन्हें देखकर क्षणभर विचार किया और कहा, “जब तक सूर्य दक्षिणायन में है, मैं प्राण नहीं त्यागूँगा। उत्तरायण आने पर ही मैं अपने प्राचीन धाम को जाऊँगा। यह मेरा निश्चय है। पिता का दिया वरदान सत्य हो, कि मेरी मृत्यु मेरी इच्छा पर निर्भर रहे।” यह कहकर वे शर-शय्या पर लेटे रहे।
कुरुकुल के उस शिखर के गिरते ही पाण्डवों और सृंजयों ने सिंहनाद किया। भीष्म के परास्त होने पर दुर्योधन को कुछ न सूझा; कृप और दुर्योधन सहित सब कौरव शोक से मूर्छित-से, बहुत देर तक निश्चल खड़े रहे, मानो किसी ने उनकी जाँघें जकड़ ली हों। उधर विजयी पाण्डवों ने अपने स्वर्ण-जड़े शंख बजाए, और भीमसेन कुपित शत्रुओं को मारकर बगल बजाते हुए हर्ष से गरजने लगे। दोनों सेनाओं के योद्धा हथियार रखकर सोच में पड़ गए; कुछ चीख उठे, कुछ भाग खड़े हुए, कुछ क्षत्रिय-धर्म को कोसने लगे, तो कुछ भीष्म की प्रशंसा करने लगे। ऋषियों और पितरों ने उस उच्च-व्रती की स्तुति की। इधर बुद्धिमान भीष्म, उपनिषदों में बताए योग का आश्रय लेकर, मन ही मन प्रार्थना करते हुए, अपने काल की प्रतीक्षा में शान्त लेटे रहे।
समझने की कुंजी (काल): “दक्षिणायन” वह छह मास हैं जब सूर्य आकाश में दक्षिण की ओर रहता है; “उत्तरायण” वह छह मास जब वह उत्तर की ओर मुड़ता है। परम्परा में उत्तरायण को देह-त्याग का शुभ काल माना गया है। भीष्म इच्छा-मृत्यु के वरदान के बल पर शर-शय्या पर महीनों प्रतीक्षा करेंगे, जब तक सूर्य उत्तर की ओर न मुड़ जाए।
युद्धविराम, और बाणों का तकिया

सञ्जय ने धृतराष्ट्र को बताया कि सन्ध्या के समय मारे गए कुरुपितामह ने धार्तराष्ट्रों को शोक में और पांचालों को हर्ष में डुबो दिया। बाणों से बिंधे होने के कारण उनका शरीर भूमि को छुए बिना ही शर-शय्या पर टिका रहा। उनके गिरते ही समस्त प्राणियों में हाहाकार मच गया; दोनों सेनाओं के क्षत्रियों के हृदय में भय समा गया। आकाश पर धुँधलका छा गया, सूर्य मन्द पड़ गया, और पृथ्वी मानो चीत्कार कर उठी। लोग कहने लगे, “यही तो वेदवेत्ताओं में श्रेष्ठ हैं! इन्हीं ने अपने पिता शान्तनु के सुख के लिए अपने वंश की निरन्तरता का व्रत त्यागा था।” ऋषि, सिद्ध और चारण उस शर-शय्या पर लेटे वीर के विषय में ऐसा ही कहते रहे।
भीष्म के गिरे देख दुःशासन वेग से द्रोण की सेना में पहुँचा और उन्हें यह दुःखद समाचार दिया। सुनते ही द्रोण अपने रथ से गिर पड़े, फिर सँभलकर उन्होंने कौरव-सेना को युद्ध रोकने का आदेश दिया। कौरवों को रुका देख पाण्डवों ने भी अपने दूतों के द्वारा युद्ध रुकवा दिया। तब दोनों ओर के राजा अपने कवच उतारकर भीष्म के पास पहुँचे, जैसे देवता प्रजापति की ओर जाते हों। हज़ारों योद्धा, पाण्डव और कौरव, एक साथ शर-शय्या पर लेटे भीष्म के पास खड़े होकर उन्हें प्रणाम करने लगे।
धर्मात्मा भीष्म ने उन सबका स्वागत करते हुए कहा, “आप सब महाभाग्यशाली महारथियों का स्वागत है। आपके दर्शन से मैं प्रसन्न हूँ।” फिर सिर लटका देख वे बोले, “मेरा सिर बहुत नीचे झुका जा रहा है, मुझे एक तकिया दीजिए।” राजाओं ने बहुत कोमल, बारीक वस्त्रों के सुन्दर तकिए मँगवाए, पर भीष्म ने उन्हें नहीं चाहा। हँसकर उन्होंने कहा, “हे राजाओं, ये किसी वीर की शय्या के योग्य नहीं।” फिर अर्जुन की ओर देखकर बोले, “हे महाबाहु धनंजय, मेरा सिर झुका जा रहा है; मुझे ऐसा तकिया दीजिए जिसे आप उचित समझें।”

अर्जुन ने अश्रुपूरित नेत्रों से धनुष चढ़ाकर पितामह को प्रणाम किया और कहा, “आज्ञा दीजिए, मैं आपका दास हूँ। मैं क्या करूँ?” भीष्म ने कहा, “हे पार्थ, आप क्षत्रिय-धर्म के ज्ञाता और सब धनुर्धरों में श्रेष्ठ हैं; मेरे सिर के योग्य तकिया दीजिए।” अर्जुन ने “ऐसा ही हो” कहकर गाण्डीव और कुछ सीधे बाण लिए, उन्हें मन्त्रों से अभिमन्त्रित किया, और पितामह की अनुमति लेकर तीन प्रबल बाणों से भीष्म का सिर सँभाल दिया, मानो बाणों का तकिया बना दिया।
अपने मन की बात अर्जुन द्वारा समझ ली गई देख भीष्म अत्यन्त प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा, “हे पाण्डुपुत्र, आपने मुझे मेरी शय्या के योग्य तकिया दिया है। यदि आप दूसरा करते तो मैं क्रोध से आपको शाप दे देता। क्षत्रिय को रणभूमि में अपनी शर-शय्या पर इसी प्रकार सोना चाहिए।” फिर सब राजाओं की ओर मुड़कर बोले, “देखिए, पाण्डुपुत्र ने मुझे कैसा तकिया दिया है! मैं उत्तरायण आने तक इसी शय्या पर सोऊँगा। जब सूर्य उत्तर की ओर मुड़ेगा, तब मैं किसी प्रिय मित्र को विदा करते मित्र की भाँति अपने प्राण त्याग दूँगा। आप सब वैर छोड़कर युद्ध से विरत हो जाइए।”
तब बाण निकालने में निपुण कुशल वैद्य अपने उपकरणों के साथ आए। उन्हें देखकर भीष्म ने दुर्योधन से कहा, “इन वैद्यों का यथोचित आदर करके धन देकर विदा कर दीजिए। ऐसी दशा में मुझे अब वैद्यों की क्या आवश्यकता? मैंने क्षत्रिय-धर्म की परम गति पा ली है। शर-शय्या पर लेटे हुए मेरे लिए चिकित्सा कराना उचित नहीं। इन बाणों के साथ ही मेरा दाह-संस्कार होना चाहिए।” दुर्योधन ने वैद्यों को सम्मानपूर्वक विदा कर दिया। भीष्म की इस धर्म-निष्ठा से सब राजा विस्मित रह गए। फिर पाण्डव और कौरव, उस शय्या की तीन बार प्रदक्षिणा करके, चारों ओर पहरेदार बैठाकर, रक्त से सने शरीर लिए, भारी मन से अपने शिविरों को लौट गए।
उस रात माधव ने हर्षित बैठे पाण्डवों के पास जाकर युधिष्ठिर से कहा, “हे कुरुनन्दन, सौभाग्य से आपकी विजय हुई, सौभाग्य से अजेय भीष्म गिराए गए।” युधिष्ठिर ने उत्तर दिया, “आपकी कृपा से विजय है, आपके क्रोध से पराजय। आप ही हमारे शरणदाता हैं। जिनकी रक्षा आप करते हैं, उनकी विजय में क्या आश्चर्य?” यह सुनकर जनार्दन मुस्कराकर बोले, “हे श्रेष्ठ राजन्, ऐसे वचन आप ही के मुख से शोभा देते हैं।”

एक उप-कथा: अगले दिन हज़ारों स्त्रियाँ, वृद्ध, बालक और दर्शक भीष्म को देखने ऐसे उमड़े जैसे लोग सूर्य के दर्शन को आते हों। कन्याओं ने उन पर चन्दन-चूर्ण, लावा और पुष्पमालाएँ बरसाईं। प्यास से व्याकुल भीष्म ने जल माँगा; राजा शीतल जल लाए, पर उन्होंने कहा कि अब मानवीय भोग मेरे योग्य नहीं। उन्होंने अर्जुन को बुलाया। अर्जुन ने गाण्डीव से भूमि को बेधकर पर्जन्य-अस्त्र से एक शीतल, अमृत-सुगन्धित जल की धार निकाली और पितामह की प्यास बुझाई। यह अलौकिक कर्म देख सब राजा विस्मित रह गए। भीष्म ने अर्जुन की प्रशंसा करके दुर्योधन को फिर समझाया कि पाण्डवों से सन्धि कर लो, आधा राज्य लौटा दो, यह युद्ध मेरी मृत्यु के साथ समाप्त हो जाए। पर मरते रोगी की भाँति औषधि ठुकराते हुए दुर्योधन ने वे हितकर वचन नहीं माने।
सार: भीष्म के गिरते ही दोनों सेनाओं ने युद्ध रोक दिया। पितामह ने कोमल तकियों को ठुकराकर अर्जुन से बाणों का तकिया माँगा, उत्तरायण तक प्राण रोकने का संकल्प दोहराया, और वैद्यों को विदा कर दिया। उन्होंने अन्त तक दुर्योधन को सन्धि का उपदेश दिया, जिसे दुर्योधन ने ठुकरा दिया।
नौ दिन बीत गए, और युधिष्ठिर का धैर्य टूट गया
नौ दिन से कुरुक्षेत्र का मैदान भीष्म के बाणों से जलता आ रहा था। नवें दिन भी जब सूर्य अस्त हुआ और सन्ध्या की वह भयानक बेला आ पहुँची जिसमें युद्ध का कुछ भी दिखाई नहीं देता, तब युधिष्ठिर ने देखा कि उनकी अपनी सेना भीष्म के हाथों मारी जाकर शस्त्र फेंक चुकी है, भय से भागी जा रही है, और सोमक-वीर हारकर निराश खड़े हैं। राजा ने कुछ क्षण विचार किया और सेना को पीछे हटा लेने की आज्ञा दी। दूसरी ओर कौरवों ने भी अपनी सेना समेट ली, और दोनों ओर के महारथी अपने-अपने शिविरों में लौट गए। भीष्म ने उस दिन भी पाण्डवों और सृंजयों को परास्त किया था, इसलिए धृतराष्ट्र-पुत्र उनकी प्रशंसा करते हुए, हर्षित होकर, उन्हें अपने शिविर तक ले गए।
समझने की कुंजी (वंश): भीष्म शान्तनु और गंगा के पुत्र हैं, इसी से वे “गांगेय”, “शान्तनुपुत्र” और “देवव्रत” कहलाते हैं। पाण्डव और कौरव, दोनों के लिए वे पितामह (दादा) हैं, क्योंकि वे इन दोनों कुलों के पिता-पक्ष के परम वृद्ध और परम आदरणीय पुरुष हैं। सृंजय और सोमक पाण्डवों के पक्ष के पांचाल-वंशी योद्धा-समूह हैं।
रात्रि उतर आई, वह रात्रि जो समस्त प्राणियों की चेतना हर लेती है। उसी घोर बेला में पाण्डव, वृष्णि और अजेय सृंजय एक मन्त्रणा के लिए एकत्र हुए। तब युधिष्ठिर ने बहुत देर सोचकर, वासुदेव कृष्ण पर दृष्टि डालते हुए ये वचन कहे, “हे कृष्ण, उस उग्र पराक्रमी महात्मा भीष्म को देखिए। जैसे हाथी सरकंडों के वन को कुचल डाले, वैसे वे मेरी सेना को कुचल रहे हैं। हम उस महात्मा की ओर आँख उठाकर भी नहीं देख सकते। प्रचण्ड दावानल की भाँति वे मेरी सेना को चाट जाते हैं। हाथ में धनुष लिए, क्रोध से भरे, बाण बरसाते हुए वे तक्षक नाग के समान भयंकर हो उठते हैं। क्रुद्ध यम जीते जा सकते हैं, वज्रधारी इन्द्र भी, पाशधारी वरुण भी, और गदाधारी कुबेर भी, पर क्रोध में भरे भीष्म युद्ध में अजेय हैं।”
युधिष्ठिर का स्वर भीतर से टूट चुका था। उन्होंने कहा, “हे अजेय, मैं अपनी बुद्धि की दुर्बलता से शोक के समुद्र में डूब गया हूँ। मैं वन में चला जाऊँगा, वही मेरे लिए श्रेयस्कर है। अब मुझे युद्ध की इच्छा नहीं रही। जैसे पतिंगा जलती अग्नि में कूदकर केवल मृत्यु पाता है, वैसे ही मैं भीष्म पर टूटता हूँ। राज्य के लिए पराक्रम दिखाते हुए, हाय, मैं विनाश की ओर ले जाया जा रहा हूँ। मेरे वीर भाई बाणों से अत्यन्त पीड़ित हैं। मुझ बड़े भाई के स्नेह में उन्हें राज्य से वंचित होकर वन जाना पड़ा। हे मधुसूदन, मेरे ही कारण द्रौपदी इस संकट में डूबी। यदि भाइयों सहित मैं आपकी कृपा के योग्य हूँ, तो हे कृष्ण, अपने धर्म का उल्लंघन किए बिना मेरे हित का उपाय बताइए।”
उनके ये वचन और सारी स्थिति सुनकर कृष्ण ने करुणा से, युधिष्ठिर को सान्त्वना देते हुए, उत्तर दिया, “हे धर्मपुत्र, हे सत्य में दृढ़ रहने वाले, शोक मत कीजिए, जिनके अर्जुन और भीमसेन जैसे शत्रुनाशक भाई हों। ये दोनों वायु और अग्नि के समान तेजस्वी हैं, और माद्री के दोनों पुत्र इन्द्र के समान वीर हैं। हमारे बीच जो सद्भाव है, उसके नाते मुझे भी इस कार्य में लगाइए। मैं स्वयं भीष्म से युद्ध करूँगा। आपकी आज्ञा से ऐसा क्या है जो मैं इस महायुद्ध में न कर सकूँ? यदि अर्जुन उन्हें मारना न चाहें, तो मैं अकेला, एक ही रथ पर चढ़कर, धृतराष्ट्र-पुत्रों के सामने उस वृद्ध पितामह को मार गिराऊँगा। पर हे राजन्, यदि आप भीष्म के वध में ही विजय निश्चित देखते हैं, तो यह कार्य अर्जुन के लिए भी भारी नहीं। पहले उपप्लव्य में पार्थ ने अनेक लोगों के सामने प्रतिज्ञा की थी कि वे गंगापुत्र का वध करेंगे। उन बुद्धिमान पार्थ के वचन निभाए जाने चाहिए।”
युधिष्ठिर ने कहा, “हे महाबाहो, ऐसा ही है जैसा आप कहते हैं। जहाँ आप मेरे पक्ष में हों, वहाँ मैं इन्द्र-सहित देवताओं को भी जीत लूँ, भीष्म की तो बात ही क्या। पर हे कृष्ण, अपने महत्त्व के लिए मैं आपके वचन को मिथ्या नहीं कर सकता। आपने पहले ही प्रतिज्ञा की थी कि आप मेरे लिए युद्ध नहीं करेंगे, केवल परामर्श देंगे। इसलिए हे माधव, बिना युद्ध किए ही मेरी सहायता कीजिए। और एक बात है, जो मेरे मन में आई है। भीष्म ने मुझसे कहा था कि वे मेरे लिए लड़ेंगे नहीं, पर हित का परामर्श अवश्य देंगे। तो हम सब आपके साथ चलकर देवव्रत के पास जाएँ, और उन्हीं से उनकी मृत्यु का उपाय पूछें। हम बालक थे, अनाथ थे, उन्होंने ही हमारा पालन किया। वही पितामह, हमारे पिता के भी पिता, हाय, उन्हीं से मैं आज उनकी मृत्यु का मार्ग पूछना चाहता हूँ। धिक्कार है इस क्षत्रिय-वृत्ति को।”
सार: नौ दिन के संहार से टूटकर युधिष्ठिर ने वन जाने तक की बात कह डाली। कृष्ण ने स्वयं शस्त्र उठाने का प्रस्ताव रखा, पर युधिष्ठिर ने उन्हें उनकी प्रतिज्ञा (युद्ध न करने की) याद दिलाई। अन्त में यह निश्चय हुआ कि वे स्वयं भीष्म के पास जाकर उन्हीं से उनकी मृत्यु का उपाय पूछेंगे। यहीं महाभारत की वह विकट नैतिक गाँठ खुलती है, जहाँ शिष्य अपने पूज्य पितामह से उन्हीं को मारने का रहस्य माँगने जाते हैं।
पितामह स्वयं अपनी मृत्यु का द्वार बताते हैं
ऐसा निश्चय करके पाण्डव और वासुदेव, अपने कवच और शस्त्र उतारकर, सब मिलकर भीष्म के शिविर में गए। भीतर पहुँचकर उन्होंने सिर झुकाकर पितामह को प्रणाम किया और उनकी शरण ली। महाबाहु भीष्म ने उनसे स्नेह-भरे वचन कहे, “हे वृष्णिवंशी, स्वागत है। हे धनंजय, स्वागत है। हे राजा युधिष्ठिर, हे भीम, और हे दोनों जुड़वाँ भाइयो, आप सबका स्वागत है। आपका हर्ष बढ़ाने के लिए अब मैं क्या करूँ? चाहे वह कितना ही कठिन क्यों न हो, मैं उसे अपने सम्पूर्ण मन से करूँगा।”
बार-बार इतने स्नेह से कहने वाले गंगापुत्र से युधिष्ठिर ने प्रसन्न हृदय से, प्रेमपूर्वक कहा, “हे सर्वज्ञ, हम विजय कैसे पाएँ, राज्य कैसे पाएँ, और प्राणियों का यह संहार कैसे रुके? यह सब मुझे बताइए, हे प्रभु। अपनी मृत्यु का उपाय बताइए। हे वीर, हम युद्ध में आपको कैसे सह सकेंगे? आप तो शत्रु को छिद्र तक नहीं देते। आपके धनुष को सदा मण्डलाकार खिंचा देखकर कोई जान ही नहीं पाता कि आप कब बाण उठाते हैं, कब साधते हैं, और कब छोड़ते हैं। हे पितामह, वह उपाय बताइए जिससे हम आपको जीत सकें, राज्य पा सकें, और मेरी सेना का यह विनाश रुक सके।”
यह सुनकर शान्तनुपुत्र ने पाण्डुपुत्र से कहा, “हे कुन्तीपुत्र, जब तक मैं जीवित हूँ, तब तक युद्ध में आपकी विजय नहीं हो सकती, यह मैं सत्य कहता हूँ। पर जब मैं युद्ध में परास्त हो जाऊँ, तब आपको विजय मिल सकती है। इसलिए यदि विजय चाहते हैं, तो मुझे बिना देर किए गिरा दीजिए। हे पृथापुत्रो, मैं आपको अनुमति देता हूँ, जैसे चाहें वैसे मुझ पर प्रहार कीजिए। मेरे मारे जाने पर शेष सब मारे जाएँगे, इसलिए जैसा मैं कहता हूँ वैसा कीजिए।”
युधिष्ठिर ने फिर पूछा, “क्रोध में आप गदाधारी काल के समान हो उठते हैं। वज्रधारी इन्द्र, वरुण या यम जीते जा सकते हैं, पर आप तो इन्द्र-सहित देवताओं और असुरों से भी अजेय हैं। फिर वह उपाय क्या है?”
भीष्म ने कहा, “हे महाबाहु, जो आप कहते हैं वह सत्य है। जब मैं धनुष-बाण लेकर सावधानी से युद्ध करता हूँ, तब इन्द्र-सहित देवता और असुर भी मुझे नहीं जीत सकते। पर यदि मैं शस्त्र रख दूँ, तो ये महारथी मुझे मार सकते हैं। जिसने शस्त्र फेंक दिए हों, जो गिर पड़ा हो, जिसका कवच उतर गया हो, जिसकी ध्वजा गिर गई हो, जो भाग रहा हो, जो भयभीत हो, जो कहे ‘मैं आपकी शरण में हूँ’, जो स्त्री हो, जो स्त्री का नाम धरे, जो अपनी रक्षा करने में असमर्थ हो, जिसका एक ही पुत्र हो, या जो नीच कुल का हो, इनसे मैं युद्ध नहीं करता। और सुनिए, मेरा एक संकल्प यह भी है कि कोई अपशकुन देखकर मैं कभी युद्ध नहीं करता।”
अब भीष्म ने वह द्वार खोल दिया जिसे वे जानते थे। उन्होंने कहा, “आपकी सेना में द्रुपद का पुत्र है, जिसे शिखण्डी कहते हैं, जो युद्ध में क्रोधी, वीर और सदा विजयी है। वह पहले स्त्री था और पीछे पुरुष हुआ, यह बात आप सब भली भाँति जानते हैं। कवच धारण किए हुए अर्जुन शिखण्डी को आगे करके अपने तीखे बाणों से मुझ पर आक्रमण करें। जब वह अपशकुन-रूप, जो पहले स्त्री था, मेरे सामने होगा, तब मैं धनुष-बाण होते हुए भी उस पर प्रहार करने की इच्छा नहीं करूँगा। उसी अवसर को पाकर हे भरतश्रेष्ठ, पाण्डुपुत्र धनंजय मुझे चारों ओर से अपने बाणों से बेध दें। श्रीकृष्ण और अर्जुन को छोड़कर, तीनों लोकों में मुझे मारने में समर्थ कोई व्यक्ति मैं नहीं देखता। इसलिए अर्जुन शिखण्डी या कुछ और आगे करके मुझे रथ से गिरा दें। तभी विजय निश्चित है।”
समझने की कुंजी (अवधारणा): शिखण्डी द्रुपद-पुत्री थी जो वरदान से पुरुष हुई, और जिसका सम्बन्ध भीष्म के पूर्वजन्म की उस अम्बा से है जिसने भीष्म से वैर बाँधा था। भीष्म का व्रत है कि वे स्त्री, या स्त्री रूप में जन्मे, या स्त्री-नाम धरे किसी पर शस्त्र नहीं उठाते। यही व्रत उनकी मृत्यु का द्वार बन जाता है। यह महाभारत की उस नैतिक बुनावट का अंग है जहाँ धर्म ही किसी को असुरक्षित कर देता है।
यह सब जानकर पाण्डव पितामह को प्रणाम करके अपने शिविरों को लौट गए। पर परलोक जाने को उद्यत गंगापुत्र की यह बात सुनकर अर्जुन शोक से जल उठे, और लज्जा से उनका मुख झुक गया। उन्होंने कहा, “हे माधव, मैं उस पितामह से युद्ध कैसे करूँ जो आयु में बड़े हैं, बुद्धि और विवेक से सम्पन्न हैं, और हमारे कुल के परम वृद्ध पुरुष हैं? बाल्यकाल में खेलते हुए मैं अपने धूल-भरे शरीर से इन महात्मा की गोद में चढ़ जाता और इनका शरीर मैला कर देता था। ये मेरे पिता पाण्डु के पिता हैं। एक बार बालपन में इनकी गोद में चढ़कर मैंने इन्हें ‘पिताजी’ कह दिया था। तब इन्होंने कहा था, ‘मैं आपका पिता नहीं, आपके पिता का पिता हूँ, हे भारत।’ जिन्होंने यह कहा, उन्हें मैं कैसे मारूँ? चाहे विजय मिले या मृत्यु, मैं उस महात्मा से युद्ध नहीं करूँगा। हे कृष्ण, आप क्या कहते हैं?”
वासुदेव ने कहा, “हे जिष्णु, पहले भीष्म-वध की प्रतिज्ञा करके अब क्षत्रिय-धर्म के विरुद्ध आप उनके वध से कैसे विमुख हो सकते हैं? हे पार्थ, युद्ध में अजेय उस क्षत्रिय को रथ से गिरा दीजिए, क्योंकि गंगापुत्र को मारे बिना आपकी विजय कभी नहीं होगी। यही देवताओं ने पहले से निश्चित कर रखा है, और जो पहले से नियत है वह अवश्य होगा। बृहस्पति ने प्राचीन काल में इन्द्र से यही कहा था कि जो शत्रु बनकर आए, चाहे वह वृद्ध हो, सब गुणों से युक्त हो और पूज्य हो, उसका भी वध कर देना चाहिए। हे धनंजय, क्षत्रिय का यही सनातन धर्म है कि वह बिना द्वेष के युद्ध करे, प्रजा की रक्षा करे और यज्ञ करे।”
अर्जुन ने कहा, “हे कृष्ण, शिखण्डी ही भीष्म की मृत्यु का कारण होगा, क्योंकि पांचाल-राजकुमार को देखते ही भीष्म प्रहार करना छोड़ देते हैं। इसलिए शिखण्डी को आगे और अपने मस्तक पर रखकर हम गंगापुत्र को गिराएँगे। अन्य धनुर्धरों को मैं अपने बाणों से रोक लूँगा, और शिखण्डी अकेले भीष्म से लड़ेंगे, क्योंकि मैंने स्वयं कुरुश्रेष्ठ से सुना है कि वे शिखण्डी पर प्रहार नहीं करेंगे।” यह निश्चय करके, भीष्म की अनुमति लेकर, पाण्डव माधव के साथ प्रसन्न हृदय से लौटे और अपनी-अपनी शय्याओं पर विश्राम को गए।
सार: भीष्म ने स्वयं अपनी मृत्यु का द्वार खोल दिया, शिखण्डी को आगे करना। अर्जुन का बचपन का स्नेह और कृष्ण का कठोर क्षत्रिय-धर्म यहाँ आमने-सामने हैं। कृष्ण ने अर्जुन को उनकी पुरानी प्रतिज्ञा का स्मरण कराकर कर्तव्य की ओर धकेला। यह वह क्षण है जहाँ भक्ति, धर्म और शोक एक साथ टकराते हैं, और किसी को सहज विजय नहीं मिलती।
दसवें दिन का सूर्योदय, शिखण्डी सब से आगे
धृतराष्ट्र ने पूछा, “हे संजय, शिखण्डी गंगापुत्र की ओर कैसे बढ़े, और भीष्म पाण्डवों की ओर कैसे? यह सब मुझे बताओ।”
संजय ने कहा, “सूर्योदय की बेला में पाण्डव, नगाड़ों, झाँझों और दूधिया शंखों की ध्वनि के साथ, शिखण्डी को अपनी सेना के अग्रभाग में रखकर युद्ध के लिए निकले। शिखण्डी सम्पूर्ण सेना के बिल्कुल आगे खड़े थे। भीमसेन और धनंजय उनके रथ के पहियों के रक्षक बने। उनके पीछे द्रौपदी के पुत्र और वीर अभिमन्यु थे। महारथी सात्यकि और चेकितान सब से पीछे की रक्षा में लगे। उनके पीछे पांचालों से घिरे धृष्टद्युम्न, फिर जुड़वाँ भाइयों सहित स्वयं राजा युधिष्ठिर, फिर विराट, फिर द्रुपद चले। पाँचों केकय-भाई और वीर धृष्टकेतु पाण्डव-सेना के पिछले भाग की रक्षा कर रहे थे।”
संजय ने कहा, “कौरवों ने भी महारथी भीष्म को सम्पूर्ण सेना के अग्रभाग में रखकर प्रयाण किया। उनके पीछे महाधनुर्धर द्रोण और उनके पुत्र अश्वत्थामा थे, फिर अपने गजदल से घिरे भगदत्त, फिर कृप और कृतवर्मा, फिर काम्बोज-राज सुदक्षिण, मगध-राज जयत्सेन, सुबल-पुत्र शकुनि और बृहद्बल थे। भीष्म प्रतिदिन कभी आसुर, कभी पैशाच और कभी राक्षस व्यूह की रचना करते थे। अर्जुन को आगे रखे, शिखण्डी को अग्रभाग में किए, पाण्डव अनेक प्रकार के बाण बिखेरते हुए भीष्म की ओर बढ़े।”
समझने की कुंजी (अवधारणा): व्यूह सेना की एक विशेष रचना या साँचा है, जिसमें सैनिक एक निश्चित आकृति में खड़े होते हैं। आसुर, पैशाच और राक्षस व्यूह उन रचनाओं के नाम हैं, जिनकी आकृति और आक्रामकता उनके नाम से ध्वनित होती है। भीष्म प्रतिदिन भिन्न व्यूह रचते थे, ताकि शत्रु उनकी चाल का पूर्वानुमान न लगा सके।
भीष्म के बाणों से बिंधे, रक्त से सने अनेक कौरव-योद्धा परलोक सिधार गए। नकुल, सहदेव और सात्यकि कौरव-सेना को बड़े वेग से पीड़ित करने लगे, और कौरव-सेना उस विशाल पाण्डव-समूह के सामने टिक न सकी, सब ओर भागने लगी। तब धृतराष्ट्र ने पूछा कि क्रुद्ध भीष्म ने अपनी पीड़ित सेना को देखकर क्या किया। संजय ने कहा, “अपनी सेना का वह संहार भीष्म सह न सके। उस अजेय महाधनुर्धर ने अपने प्राणों की चिन्ता छोड़कर पाण्डवों, पांचालों और सृंजयों पर लम्बे, बछड़े के दाँत जैसे और अर्धचन्द्राकार बाणों की झड़ी लगा दी। उन्होंने पाँचों महारथी पाण्डवों को रोक दिया, असंख्य हाथी-घोड़े मार गिराए, और रथियों को रथों से, सवारों को घोड़ों से, और गजारोहियों को हाथियों की पीठ से गिराकर शत्रु में आतंक भर दिया। उनका शक्र-समान धनुष सदा मण्डलाकार खिंचा दिखता था।”
उसी दसवें दिन भीष्म ने शिखण्डी के दल को दावानल की भाँति भस्म कर डाला। तब विषधर सर्प के समान क्रुद्ध शिखण्डी ने भीष्म की छाती के मध्य में तीन बाण मारे। गहरी चोट खाकर भीष्म ने देखा कि यह शिखण्डी है। क्रोध से भरे, पर शिखण्डी से युद्ध करने को अनिच्छुक भीष्म ने हँसकर कहा, “चाहे आप मुझ पर प्रहार करें या न करें, मैं आपसे कभी युद्ध नहीं करूँगा। आप वही शिखण्डी हैं जैसा विधाता ने आपको पहले बनाया था।”
यह सुनकर शिखण्डी क्रोध से अपने होंठ चाटते हुए बोले, “हे महाबाहु, मैं जानता हूँ कि आप क्षत्रिय-कुल के संहारक हैं। मैंने परशुराम से आपके युद्ध की कथा सुनी है, और आपके अमानुषी पराक्रम की भी। फिर भी मैं आज आपसे युद्ध करूँगा। पाण्डवों का और अपना प्रिय करने के लिए, हे शत्रुनाशक, मैं आज आपसे लड़ूँगा। मैं आपको अवश्य मारूँगा, यह मैं अपनी सौगन्ध खाकर कहता हूँ। हे सदा विजयी भीष्म, इस संसार को अन्तिम बार देख लीजिए।” यह कहकर शिखण्डी ने पाँच सीधे बाणों से भीष्म को बेध दिया।
एक उप-कथा: शिखण्डी का भीष्म के प्रति यह वैर आकस्मिक नहीं था। महाभारत में पहले आ चुका है कि काशिराज की पुत्री अम्बा को भीष्म ने स्वयंवर से हरण कर लाने पर त्याग दिया, जिससे उसका विवाह नहीं हो सका। अम्बा ने भीष्म से प्रतिशोध का व्रत लेकर तप किया, प्राण त्यागे, और द्रुपद के घर शिखण्डी के रूप में जन्म लिया, जो स्त्री से पुरुष बना। इसी से भीष्म उसे “स्त्री-रूप में जन्मा” मानकर उस पर शस्त्र नहीं उठाते, और यही पूर्वजन्म का वैर उनकी मृत्यु का साधन बनता है।
उनके वचन सुनकर अर्जुन ने, शिखण्डी को भीष्म का संहारक मानकर, उत्साह दिया, “मैं आपके पीछे रहकर शत्रुओं को अपने बाणों से तितर-बितर करूँगा। क्रोध में भरकर भीष्म पर टूट पड़िए। यदि आज आप भीष्म को मारे बिना लौटे, तो मेरे साथ आप भी संसार में उपहास के पात्र बनेंगे। आप पितामह को रोकिए, और मैं द्रोण, अश्वत्थामा, कृप, दुर्योधन, चित्रसेन, विकर्ण, सिन्धुराज जयद्रथ, अवन्ती के विन्द-अनुविन्द, काम्बोज-राज सुदक्षिण, भगदत्त, मगध-राज, सोमदत्त-पुत्र और शेष सब महारथियों को, समुद्र को रोकने वाले तट की भाँति, रोके रखूँगा। आप पितामह का वध कीजिए।”
पितामह का अन्तिम संकल्प, और भीषण द्वन्द्व
धृतराष्ट्र ने पूछा कि क्या भीष्म का रथ या धनुष टूटा। संजय ने कहा, “नहीं, युद्ध में न तो भीष्म का धनुष टूटा, न रथ को कोई क्षति पहुँची। वे सीधे बाणों से शत्रु का संहार कर रहे थे। दसवें दिन उन्होंने शत्रु-सेना को सहस्रों के समूह में चीर डाला। पाण्डव उस महाधनुर्धर को परास्त न कर सके। तब बाएँ हाथ से भी धनुष चलाने वाले धनंजय वहाँ आ पहुँचे, सिंह की भाँति गरजते और बाण बरसाते हुए। उनके गर्जन से भयभीत होकर कौरव-योद्धा सिंह के शब्द से छोटे पशुओं की भाँति भाग खड़े हुए।”
यह देखकर भयभीत दुर्योधन ने भीष्म से कहा, “हे गंगापुत्र, श्वेत अश्वों वाले और कृष्ण को सारथि बनाए हुए पाण्डुपुत्र मेरी सारी सेना को दावानल की भाँति जला रहे हैं। देखिए, मेरे सब सैनिक भागे जा रहे हैं। जैसे ग्वाला वन में पशुओं को हाँकता है, वैसे ही मेरी सेना हाँकी जा रही है। भीम, सात्यकि, चेकितान, माद्री के दोनों पुत्र, वीर अभिमन्यु, धृष्टद्युम्न और राक्षस घटोत्कच, सब मेरी सेना को तोड़ रहे हैं। हे पुरुषश्रेष्ठ, आपको छोड़कर इन पीड़ित सैनिकों का और कोई आश्रय मुझे नहीं दिखता।”
तब आपके पिता देवव्रत ने क्षण भर सोचकर, दुर्योधन को सान्त्वना देते हुए कहा, “हे दुर्योधन, शान्ति से सुनिए। पहले मैंने आपके सामने प्रतिज्ञा की थी कि प्रतिदिन दस सहस्र उत्तम क्षत्रियों को मारकर ही मैं युद्ध से लौटूँगा। मैं वह प्रतिज्ञा निभाता आया हूँ। आज मैं एक और बड़ा कार्य करूँगा। आज या तो मैं स्वयं मारा जाकर सोऊँगा, या पाण्डवों को मारूँगा। हे नरश्रेष्ठ, आपके दिए अन्न के ऋण से आज मैं आपकी सेना के अग्रभाग में अपने प्राण न्योछावर करके उऋण हो जाऊँगा।” यह कहकर वे क्षत्रियों के बीच बाण बरसाते हुए पाण्डव-सेना पर टूट पड़े।
उस दसवें दिन भीष्म ने अपना पराक्रम दिखाते हुए लाखों योद्धाओं का संहार किया। उन्होंने पांचालों के बीच के तेजस्वी राजाओं की शक्ति को वैसे ही सोख लिया जैसे सूर्य अपनी किरणों से पृथ्वी का जल। दस सहस्र वेगवान हाथी, दस सहस्र घोड़े सवारों सहित, और पूरे दो लाख पैदल सैनिक मारकर वह नरश्रेष्ठ धूमरहित अग्नि की भाँति देदीप्यमान हुए। उत्तरायण में स्थित तपते सूर्य की भाँति उनकी ओर कोई पाण्डव आँख तक न उठा सका।
समझने की कुंजी (संख्या-आधुनिक-समतुल्य): “दस सहस्र हाथी” या “दो लाख पैदल” जैसी विशाल संख्याएँ महाभारत की काव्य-शैली का अंग हैं, जो किसी एक दिन में हुए संहार की भयावहता को मन में बैठाती हैं। इन्हें शाब्दिक सैन्य-गणना मानने के बजाय अतिशयोक्तिपूर्ण बिम्ब समझना उचित है, जो उस युग की युद्ध-कल्पना की विराटता दर्शाते हैं।
तब अर्जुन ने शिखण्डी से कहा, “पितामह की ओर बढ़िए। आज भीष्म से तनिक भी भय मत कीजिए। मैं स्वयं अपने तीखे बाणों से उन्हें उनके उत्तम रथ से गिरा दूँगा।” यह सुनकर शिखण्डी गंगापुत्र पर टूट पड़े। धृष्टद्युम्न और अभिमन्यु भी हर्षित होकर भीष्म पर झपटे। वृद्ध विराट, द्रुपद और कुन्तिभोज भी कवच धारण किए भीष्म पर बढ़े। नकुल, सहदेव, युधिष्ठिर और शेष सब योद्धा भी भीष्म की ओर दौड़े।
कौरव-पक्ष के योद्धाओं ने उन्हें रोका। चित्रसेन ने चेकितान को रोका, कृतवर्मा ने धृष्टद्युम्न को, सोमदत्त-पुत्र भूरिश्रवा ने भीम को, विकर्ण ने नकुल को, और कृप ने सहदेव को रोका। दुर्योधन ने स्वयं सात्यकि को रोका, और महाधनुर्धर दुःशासन ने शिखण्डी को आगे किए हुए वेग से बढ़ते अर्जुन को रोका। तब वहाँ एक अद्भुत दृश्य देखा गया, अर्जुन दुःशासन के रथ तक पहुँचकर आगे न बढ़ सके, क्योंकि समुद्र को रोकने वाले तट की भाँति दुःशासन ने उन्हें रोक लिया। दोनों रथियों में माया और इन्द्र के प्राचीन द्वन्द्व जैसा भीषण युद्ध हुआ। अर्जुन ने दुःशासन को सौ बाणों से बेधा, और दुःशासन ने अर्जुन के मस्तक में तीन तीखे बाण मारे, जिनसे बिंधे अर्जुन शिखर-युक्त मेरु की भाँति शोभित हुए। अन्ततः, पार्थ से अत्यन्त पीड़ित होकर दुःशासन भीष्म के रथ की ओर भाग गए, और डूबते हुए के लिए भीष्म ही द्वीप बन गए।
उधर ऋष्यशृंग-पुत्र राक्षस अलम्बुष ने सात्यकि को रोका, सुदक्षिण ने अभिमन्यु को, अश्वत्थामा ने विराट और द्रुपद को, और भारद्वाज-पुत्र द्रोण ने स्वयं युधिष्ठिर को रोका। द्रोण के रथ की मेघ-गर्जन सी ध्वनि सुनकर प्रभद्रक काँप उठे, और द्रोण से रुकी युधिष्ठिर की वह विशाल सेना एक पग भी आगे न बढ़ सकी। इस प्रकार भीष्म की रक्षा के लिए कौरव-वीरों ने पाण्डव-महारथियों को जगह-जगह रोके रखा, पर आपके पुत्रों की सेना उस संहार से चारों ओर विचलित होने लगी।
सार: दसवें दिन भीष्म ने जीवन की चिन्ता त्याग दी और अद्वितीय संहार किया, पर भीतर ही भीतर अपनी मृत्यु को आमन्त्रित कर रहे थे। दुर्योधन के लिए अन्न-ऋण चुकाने का संकल्प, और दूसरी ओर शिखण्डी को आगे करके भीष्म तक पहुँचने का पाण्डव-प्रयास, दोनों एक साथ चल रहे थे। हर महारथी की रक्षा-पंक्ति इस बात की साक्षी है कि पितामह को गिराना कितना कठिन था।
अग्नि बन गए भीष्म, और स्वयं ही प्राण-त्याग की इच्छा
धृतराष्ट्र ने फिर पूछा कि उस दसवें दिन भीष्म कैसे लड़े। संजय ने कहा, “उस दिन जब भीष्म और अर्जुन आमने-सामने हुए, तब घोर संहार हुआ। उच्च और दिव्य अस्त्रों के ज्ञाता शान्तनुपुत्र ने सहस्रों योद्धाओं को बार-बार मारा। अनेक ऐसे वीर, जिनके नाम और कुल भी ज्ञात न थे, पर जो रण से कभी न हटते थे, उस दिन भीष्म के हाथों मारे गए। दस दिन तक पाण्डव-सेना को जलाकर, धर्मात्मा भीष्म ने अपने प्राणों की रक्षा की इच्छा छोड़ दी। ‘अब मैं और अधिक श्रेष्ठ योद्धाओं का वध नहीं करूँगा,’ ऐसा सोचकर वे अपनी सेना के अग्रभाग में अपना ही वध चाहने लगे।”
युधिष्ठिर को पास देखकर भीष्म ने कहा, “हे युधिष्ठिर, हे महाबुद्धिमान, ये धर्ममय और स्वर्ग की ओर ले जाने वाले वचन सुनिए। हे भारत, अब मैं इस शरीर की रक्षा नहीं चाहता। बहुत समय युद्ध में मनुष्यों का संहार करते बीता। यदि आप मेरा प्रिय करना चाहते हैं, तो पार्थ को पांचालों और सृंजयों सहित अपने अग्रभाग में रखकर मुझे मार डालने का यत्न कीजिए।” उनका यह अभिप्राय जानकर युधिष्ठिर ने सृंजयों के सहारे युद्ध की ओर प्रयाण किया। फिर धृष्टद्युम्न और युधिष्ठिर ने अपनी सेना को प्रेरित किया, “बढ़ो, लड़ो, भीष्म को जीतो। आप सबको अमोघ-लक्ष्य जिष्णु अर्जुन की रक्षा प्राप्त है। हे सृंजयो, आज भीष्म से भय मत कीजिए। शिखण्डी को आगे रखकर हम आज भीष्म को अवश्य जीतेंगे।”
तब पाण्डव शिखण्डी और धनंजय को आगे करके भीष्म पर टूटे, और कौरव भीष्म को आगे रखकर पाण्डवों पर। दोनों सेनाओं के वेग से पृथ्वी काँप उठी। शंखों के नाद और सिंहनाद से कोलाहल भयानक हो उठा, और उठती धूल मेघ-सी छा गई, जिसमें चमकते शस्त्र बिजली की भाँति कौंधते थे। उस संग्राम में, मानो माँस के टुकड़े के लिए दो बाजों के बीच का युद्ध हो, भीष्म ही वह दाँव बने जिस पर कौरव-सेना की विजय टिकी थी।
अभिमन्यु ने भीष्म के लिए दुर्योधन से युद्ध किया, पौरव ने धृष्टकेतु से, और अश्वत्थामा ने सात्यकि से। पौरव और चेदिराज धृष्टकेतु तो रथ टूट जाने पर खड्ग-ढाल लेकर भूमि पर ही भिड़ गए, और एक-दूसरे को मस्तक तथा कन्धे पर घायल करके दोनों गिर पड़े; जयत्सेन पौरव को और सहदेव धृष्टकेतु को रणभूमि से उठा ले गए। उधर अभिमन्यु ने कोसलराज बृहद्बल से, और भीम ने गजसेना से युद्ध किया। पर्वत-समान हाथी भीम के हाथों गिरकर पृथ्वी को अपनी चीत्कारों से भर रहे थे।
अर्जुन गंगापुत्र के पास पहुँचकर उन्हें अनेक बाणों से पीड़ित करने लगे, मानो वन में एक मतवाला हाथी दूसरे पर टूट पड़ा हो। तब अर्जुन ने कुन्तीपुत्र होकर शिखण्डी को पुकारा, “बढ़िए, बढ़िए, भीष्म की ओर, और उन्हें मारिए।” तब अर्जुन शिखण्डी को आगे करके भीष्म की ओर शीघ्रता से बढ़े। उस समय भीष्म का रथ ही उनकी अग्नि-वेदी था, धनुष उस अग्नि की ज्वाला, और तलवारें, भाले तथा गदाएँ उसकी समिधा। वे जो बाण-वर्षा कर रहे थे, वही उस अग्नि की धधकती चिनगारियाँ थीं, जिनसे वे क्षत्रियों को भस्म कर रहे थे।
शिखण्डी ने भीष्म की छाती के मध्य में दस चौड़े बाण मारे। गंगापुत्र ने केवल क्रोध से शिखण्डी की ओर देखा, मानो उस दृष्टि से ही पांचाल-राजकुमार को भस्म कर देंगे, पर उसकी स्त्री-योनि का स्मरण करके सबके देखते हुए उस पर प्रहार नहीं किया। यह शिखण्डी समझ न सका। तब अर्जुन ने कहा, “शीघ्र दौड़िए और पितामह को मारिए। हे वीर, और क्या कहूँ? युधिष्ठिर की सेना में आपको छोड़कर भीष्म से युद्ध करने योग्य मुझे कोई नहीं दिखता।” शिखण्डी ने नाना अस्त्रों से पितामह को ढक दिया, पर देवव्रत उन बाणों की उपेक्षा करके केवल क्रुद्ध अर्जुन को ही रोकते रहे, और अपने तीखे बाणों से पाण्डव-सेना को परलोक भेजते रहे।
समझने की कुंजी (अवधारणा): भीष्म की यह दशा महाभारत के नैतिक तनाव का चरम है। वे जानते हैं कि शिखण्डी ही उनकी मृत्यु का साधन है, फिर भी अपने व्रत के कारण उस पर शस्त्र नहीं उठाते। यह न तो दुर्बलता है, न पराजय; यह धर्म और व्रत के प्रति निष्ठा है, जो जानते-बूझते अपने ही प्राणों को असुरक्षित कर देती है। शिखण्डी के बाण उन्हें केवल माध्यम बनाते हैं, असली बाण अर्जुन के हैं।
तब भीष्म के बाणों से सात्यकि, भीम, अर्जुन, द्रुपद, विराट, धृष्टद्युम्न और शेष पाण्डव-महारथी शोक के समुद्र में डूबने लगे, पर अर्जुन ने सबकी रक्षा की। दुर्योधन ने अपने योद्धाओं से कहा, “सब ओर से अर्जुन पर टूट पड़िए। सेनापति-धर्म के ज्ञाता भीष्म आप सबकी रक्षा करेंगे।” तब विदेह, कलिंग, दशेरक, निषाद, सौवीर, बाह्लीक, दरद, मालव, शूरसेन, शिवि, शाल्व, शक, त्रिगर्त और केकय आदि अनेक जातियों के योद्धा अर्जुन पर टूट पड़े, मानो पतिंगों के झुण्ड अग्नि पर। महाबाहु अर्जुन ने दिव्य अस्त्रों का स्मरण करके, सहस्रों बाण रचकर, उन सबको अग्नि के पतिंगों की भाँति भस्म कर दिया। उन्होंने दुःशासन के घोड़े और सारथि गिराए, विविंशति, कृप, विकर्ण और शल्य को रथविहीन कर दिया, और दोपहर से पहले ही इन महारथियों को परास्त करके धूमरहित दावानल की भाँति देदीप्यमान हुए। पार्थ ने कौरव-सेना को पीठ दिखाने को विवश करके रणभूमि में रक्त की एक नदी बहा दी।
परशुराम की दी हुई विद्या, और दसवें दिन का संहार
संजय ने कहा, “जब दोनों सेनाओं के योद्धा रणभूमि में सजे, तब वे सब अहटल वीर ब्रह्मलोक पर मन लगाकर लड़ने लगे। उस सामान्य संग्राम में एक ही प्रकार के योद्धा एक ही प्रकार के योद्धाओं से नहीं लड़े; रथी रथी से, पैदल पैदल से, घुड़सवार घुड़सवार से न भिड़कर, मतवालों की भाँति सब आपस में गुँथ गए। हाथी और मनुष्य इस प्रकार मिल गए कि उनका भेद ही जाता रहा।”
समझने की कुंजी (अवधारणा): “ब्रह्मलोक पर मन लगाकर लड़ना” का अर्थ है कि वीर मृत्यु को वरण करके लड़ रहे थे, इस विश्वास के साथ कि रण में वीरगति पाने वाला क्षत्रिय उत्तम लोकों को जाता है। कुरुक्षेत्र में मरने वालों के लिए यह गति और भी सुलभ मानी गई। यह उस युग के क्षत्रिय-धर्म की वह आस्था है जो युद्ध को भी एक प्रकार का यज्ञ बना देती है।
संजय ने कहा, “प्राचीन काल में बुद्धिमान परशुराम ने भीष्म को वह अस्त्र-विद्या सिखाई थी जो शत्रु-पंक्तियों का संहार करने वाली थी। उसी विद्या के बल पर वे कुरु-पितामह प्रतिदिन रथियों के दस सहस्र योद्धा मारते आए थे। पर दसवें दिन भीष्म ने अकेले दस सहस्र हाथी मारे। फिर मत्स्यों और पांचालों के सात महारथियों को मारा, पाँच सहस्र पैदल, एक सहस्र हाथी और दस सहस्र घोड़े उस शिक्षा के कौशल से मार गिराए। तदुपरान्त उन्होंने विराट के प्रिय भाई शतानीक को, और फिर पूरे एक सहस्र क्षत्रियों को अपने चौड़े बाणों से मारा। धनंजय के पीछे चलने वाले जो भी पाण्डव-क्षत्रिय भीष्म के समीप पहुँचे, सब यमलोक को गए।”
दसवें दिन वे दोनों सेनाओं के बीच धनुष हाथ में लिए ऐसे शोभित हुए कि ग्रीष्म के मध्याह्न-सूर्य की भाँति कोई राजा उनकी ओर देख तक न सका। यह देखकर मधुसूदन कृष्ण ने प्रसन्न होकर अर्जुन से कहा, “वहाँ शान्तनुपुत्र भीष्म दोनों सेनाओं के बीच खड़े हैं। अपना बल लगाकर उन्हें मारिए और विजय जीतिए। जहाँ से वे हमारी पंक्तियाँ तोड़ रहे हैं, वहीं उन्हें रोकिए। हे प्रभु, आपको छोड़कर भीष्म के बाण सहने का साहस और किसी में नहीं।” तब अर्जुन ने उसी क्षण भीष्म को, उनके रथ, घोड़ों और ध्वजा सहित, अपने बाणों से अदृश्य कर दिया, पर भीष्म ने भी अपनी बाण-वर्षा से अर्जुन के बाणों को छिन्न कर दिया।
तब पांचालराज, धृष्टकेतु, भीम, धृष्टद्युम्न, नकुल-सहदेव, चेकितान, पाँचों केकय-भाई, सात्यकि, अभिमन्यु, घटोत्कच, द्रौपदी के पाँचों पुत्र, शिखण्डी, कुन्तिभोज, सुशर्मा और विराट, ये तथा अनेक प्रबल योद्धा भीष्म के बाणों से पीड़ित होकर शोक-सागर में डूबने लगे, पर अर्जुन ने सबको उबार लिया। तब शिखण्डी, अर्जुन से रक्षित होकर, अकेले भीष्म पर वेग से टूटे। अर्जुन ने पहले भीष्म के पीछे चलने वालों को मारा, फिर स्वयं उन पर झपटे। सात्यकि, चेकितान, धृष्टद्युम्न, विराट, द्रुपद, माद्री के दोनों पुत्र, अभिमन्यु और द्रौपदी के पाँचों पुत्र, सब उसी अर्जुन की रक्षा में अकेले भीष्म पर टूट पड़े।
उन सब दृढ़ धनुर्धरों ने भीष्म के शरीर के नाना अंगों को सुनिश्चित बाणों से बेध डाला। उन असंख्य बाणों की उपेक्षा करके अविचलित भीष्म पाण्डव-पंक्तियों में घुस गए, और सब बाणों को मानो खेल-खेल में व्यर्थ कर दिया। बार-बार शिखण्डी की ओर हँसकर देखते, पर उसकी स्त्री-योनि का स्मरण करके उस पर एक भी बाण नहीं चलाते। दूसरी ओर उन्होंने द्रुपद के दल के सात महारथियों को मार डाला। तब मत्स्य, पांचाल और चेदि-योद्धाओं में, जो उस अकेले वीर पर टूट रहे थे, हाहाकार मच गया। भागीरथीपुत्र भीष्म, उस अकेले योद्धा को, सबने पैदल, घोड़ों, रथों और बाण-वर्षा से वैसे ढक लिया जैसे मेघ सूर्य को ढक लेते हैं। तब देवासुर-संग्राम जैसे उस युद्ध में, किरीटधारी अर्जुन ने शिखण्डी को आगे करके भीष्म को बार-बार बेधा।
सार: भीष्म ने स्वयं युधिष्ठिर से अपने वध का यत्न करने को कहा, और दसवें दिन परशुराम की दी अस्त्र-विद्या के बल पर अकेले अपार संहार किया। पर अब सब पाण्डव-महारथी, अर्जुन की रक्षा में, शिखण्डी को आगे करके एक साथ उन पर टूट पड़े। शिखण्डी की उपस्थिति भीष्म के हाथ बाँध देती है, और अर्जुन के बाण निरन्तर बरसते रहते हैं। पितामह का अन्त अब निकट है।
रथ से गिरना, और शर-शय्या
संजय ने कहा, “इस प्रकार सब पाण्डव शिखण्डी को आगे करके, भीष्म को चारों ओर से घेरकर, बार-बार बेधने लगे। सब सृंजयों ने मिलकर उन पर भयानक शतघ्नियाँ, कीलोंवाली गदाएँ, फरसे, मुद्गर, छोटी मोटी लाठियाँ, भाले, बरछे, कम्पन, लम्बे बाण, बछड़े के दाँत जैसे बाण और अग्नि-बाण बरसाए। इस प्रकार अनेक योद्धाओं से पीड़ित होकर भीष्म का कवच सब ओर से बिंध गया। पर हर मर्मस्थल में बिंधकर भी भीष्म को पीड़ा नहीं हुई। उल्टे वे शत्रुओं को युगान्त में उठने वाली प्रलयाग्नि-सी जान पड़े। उनका धनुष-बाण उस अग्नि की धधकती ज्वालाएँ थे, अस्त्रों की उड़ान उसकी वायु, रथ-चक्रों की गड़गड़ाहट उसकी ऊष्मा, और वीरों के शरीर उसका प्रचुर ईंधन।”
समझने की कुंजी (अवधारणा): शतघ्नी एक प्राचीन अस्त्र है, जिसका नाम ही “सौ को मारने वाली” अर्थ देता है; इसे एक प्रकार का कीलोंवाला लम्बा यन्त्र या प्रक्षेपास्त्र माना जाता है। कम्पन भी एक विशेष फेंके जाने वाला शस्त्र है। महाभारत में मृत्यु के समीप भी भीष्म को प्रलयाग्नि की उपमा देना उनकी अदम्यता को दर्शाता है, कि वे गिरने से पहले तक एक योद्धा ही रहे।
भीष्म उन राजाओं के रथ-समूहों के बीच घूमते, कभी उस भीड़ से बाहर निकलते, और फिर उसी के मध्य से गुज़रते। पांचालराज और धृष्टकेतु की उपेक्षा करके वे पाण्डव-सेना के मध्य में घुस गए, और सात्यकि, भीम, अर्जुन, द्रुपद, विराट तथा धृष्टद्युम्न, इन छह योद्धाओं को हर प्रकार के कवच को भेदने वाले अत्यन्त तीखे बाणों से बेध डाला। उन महारथियों ने भी उन बाणों को रोककर, दस-दस बाणों से भीष्म पर बड़े बल से प्रहार किया। तब महारथी शिखण्डी के छोड़े हुए, पत्थर पर तीखे किए और स्वर्ण-पंखों वाले बाण शीघ्रता से भीष्म के शरीर में धँसते चले गए।
तब क्रोध से भरे किरीटधारी अर्जुन ने, शिखण्डी को आगे करके, भीष्म पर झपटकर उनका धनुष काट डाला। यह देखकर द्रोण, कृतवर्मा, सिन्धुराज जयद्रथ, भूरिश्रवा, शल, शल्य और भगदत्त, ये सात महारथी अर्जुन के इस कर्म को सह न सके, और क्रोध में भरकर दिव्य अस्त्रों का आह्वान करते हुए उन पर बाण-वर्षा करते टूट पड़े। उनके वेग से उठा कोलाहल युगान्त में उमड़ते समुद्र की गर्जना जैसा था, “मारो, ले आओ, पकड़ो, बेधो, काट डालो”, यही भयंकर शोर अर्जुन के रथ के चारों ओर सुनाई पड़ा। यह सुनकर सात्यकि, भीमसेन, धृष्टद्युम्न आदि पाण्डव-महारथी अर्जुन की रक्षा के लिए आगे बढ़े।
उधर अर्जुन और शिखण्डी के बाणों से बिंधते हुए भी भीष्म पाण्डव-सेना को बेधते रहे, पर अब अर्जुन के बाण उनके मर्मों में निरन्तर धँसते जा रहे थे, और शिखण्डी की उपस्थिति उनके हाथ बाँधे रखती थी। उनका कवच चूर-चूर हो चुका था, और सारा शरीर बाणों से छिद गया था। सूर्य की उत्तरायण-यात्रा से कुछ ही पहले, सन्ध्या की बेला निकट थी, जब अनगिनत बाणों से बिंधे वह कुरु-पितामह, मानो कुरुवंश का सीमा-वृक्ष, अर्जुन की दिशा में अपने रथ से नीचे की ओर झुकते हुए गिर पड़े।
जब वे सदा-विजयी भीष्म रथ से गिरकर पृथ्वी की सतह की ओर आए, तब सम्पूर्ण प्राणियों में “हाय, हाय” का क्रन्दन फैल गया। पर उनका शरीर पृथ्वी से नहीं छुआ, क्योंकि उनके अंगों में धँसे असंख्य बाण ही उन्हें थामे रहे, और वे उसी बाण-शय्या पर लेट गए, धरती से ऊपर अधर में। उस समय आकाश अन्धकार से ढक गया, सूर्य का तेज मन्द पड़ गया, और पृथ्वी मानो ऊँचे स्वर में चीख उठी।
समझने की कुंजी (अवधारणा): “शर-शय्या” अर्थात बाणों की शय्या वह दृश्य है जिसके लिए महाभारत में भीष्म सर्वाधिक स्मरण किए जाते हैं। उनके शरीर में इतने बाण धँसे थे कि वे ही एक खाट बन गए, और भीष्म का शरीर पृथ्वी को न छूकर उन्हीं पर अधर में टिका रहा। यह उनकी पवित्रता और इच्छा-मृत्यु के वरदान का प्रतीक है, जिससे वे प्राण-त्याग का समय स्वयं चुन सके।
भीष्म के गिरते ही दोनों सेनाओं के क्षत्रियों के हृदय में भय भर गया। शान्तनुपुत्र की ध्वजा गिरी देखकर और कवच कटा देखकर, कौरव और पाण्डव, दोनों उदासी से भर उठे। ऋषि, सिद्ध और चारण आकाश में कहने लगे, “यह वेदों के ज्ञाताओं में श्रेष्ठ है। इसी ने पहले अपने पिता शान्तनु को काम से पीड़ित जानकर अपने वंश-बीज को सोख लेने का व्रत लिया था।” यों उस पुरुषश्रेष्ठ की प्रशंसा होती रही, जब वे शर-शय्या पर लेटे थे।
भीष्म के मारे जाने पर आपके पुत्रों को कुछ न सूझा। उनके मुख शोक से भर गए, और सब लज्जा से सिर झुकाए खड़े रहे। दूसरी ओर पाण्डव, विजय पाकर, अपनी पंक्तियों के अग्रभाग पर खड़े हुए, और उन्होंने अपने स्वर्ण-मण्डित विशाल शंख बजाए। उसी समय भीमसेन को हमने अत्यन्त हर्ष से उछलते देखा। कौरवों पर एक महान मूर्च्छा-सी छा गई, और कर्ण तथा दुर्योधन बार-बार लम्बी साँसें भरने लगे। दुःशासन वेग से द्रोण के दल में गया और उन्हें भीष्म के गिरने का समाचार दिया। यह सुनकर द्रोण अपने रथ से गिर पड़े, फिर सँभलकर उन्होंने कुरु-सेना को युद्ध से रोक दिया। कुरुओं को रुका देख पाण्डवों ने भी दूत भेजकर युद्ध रुकवा दिया।
तकिया, और उत्तरायण की प्रतीक्षा
युद्ध रोककर, कवच उतारकर, दोनों ओर के सहस्रों योद्धा भीष्म के पास वैसे ही आए जैसे देवता प्रजापति के पास आते हों। शर-शय्या पर लेटे पितामह को प्रणाम करके पाण्डव और कौरव खड़े हो गए। तब धर्मात्मा शान्तनुपुत्र ने उनसे कहा, “स्वागत है आप सबका, हे महाभाग्यशालियो, हे महारथियो। आपको देखकर मैं प्रसन्न हूँ, आप तो साक्षात देवताओं के समान हैं।” फिर सिर झुकाए हुए उन्होंने कहा, “मेरा सिर बहुत नीचे लटक रहा है। मुझे एक तकिया दीजिए।”
राजाओं ने अनेक उत्तम, अत्यन्त कोमल और महीन वस्त्रों के तकिए लाकर रखे, पर पितामह ने उन्हें नहीं चाहा। उस नरश्रेष्ठ ने हँसकर कहा, “हे राजाओ, ये वीर की शय्या के योग्य नहीं हैं।” फिर महाबाहु अर्जुन की ओर देखकर बोले, “हे धनंजय, हे महाबाहो, मेरा सिर लटक रहा है। मुझे ऐसा तकिया दीजिए जैसा आप उचित समझें।”
तब अर्जुन ने आँखों में आँसू भरकर, धनुष चढ़ाकर, पितामह को प्रणाम करके कहा, “हे कुरुश्रेष्ठ, हे सब शस्त्रधारियों में प्रथम, आज्ञा दीजिए, मैं आपका दास हूँ। मैं क्या करूँ, हे पितामह?” भीष्म ने कहा, “हे पार्थ, मेरा सिर लटक रहा है। बिना देर किए मुझे ऐसा तकिया दीजिए जो वीर की शय्या के योग्य हो। आप धनुर्धरों में श्रेष्ठ हैं, क्षत्रिय-धर्म के ज्ञाता हैं।” तब अर्जुन ने ‘जो आज्ञा’ कहकर गाण्डीव और कुछ सीधे बाण लेकर, उन्हें मन्त्रों से अभिमन्त्रित करके, और पितामह की अनुमति लेकर, तीन तीखे बाणों से भीष्म के सिर को नीचे से थाम दिया।
अपने मन का भाव ताड़कर अर्जुन ने यह कार्य किया, यह देखकर धर्म के मर्मज्ञ भीष्म अत्यन्त प्रसन्न हुए। उन्होंने अर्जुन की प्रशंसा की और सब भरतवंशियों पर दृष्टि डालकर कहा, “हे पाण्डुपुत्र, आपने मुझे मेरी शय्या के योग्य तकिया दिया। यदि आप कुछ और करते, तो मैं क्रोध से आपको शाप दे देता। क्षत्रिय को रणभूमि में अपनी बाण-शय्या पर ऐसे ही सोना चाहिए।” फिर सब राजाओं से बोले, “देखिए, पाण्डुपुत्र ने मुझे जो तकिया दिया है। मैं इस शय्या पर तब तक सोऊँगा जब तक सूर्य उत्तरायण की ओर न मुड़ जाए। जब सूर्य अपने सात अश्वों वाले रथ पर कुबेर की दिशा की ओर बढ़ेगा, तब मैं प्रिय मित्र को विदा देते प्रिय मित्र की भाँति अपने प्राण त्याग दूँगा। हे राजाओ, मेरे चारों ओर एक खाई खुदवा दीजिए। सैकड़ों बाणों से बिंधा हुआ मैं सूर्य की आराधना करूँगा। और आप वैर त्यागकर युद्ध से विरत हो जाइए।”
समझने की कुंजी (अवधारणा): उत्तरायण वह काल है जब सूर्य दक्षिण से उत्तर की ओर मुड़ता है (लगभग मकर संक्रान्ति से)। इसे शुभ और देवताओं का दिन माना जाता है, और इसी काल में देह त्यागने वाले को उत्तम गति प्राप्त मानी जाती थी। भीष्म को इच्छा-मृत्यु का वरदान था, इसलिए उन्होंने प्राण रोककर उत्तरायण की प्रतीक्षा करने का निश्चय किया। “कुबेर की दिशा” से उत्तर दिशा का अभिप्राय है।
तब अस्त्र-चिकित्सा में कुशल कुछ शल्य-वैद्य अपने उपकरणों सहित बाण निकालने आए। उन्हें देखकर गंगापुत्र ने दुर्योधन से कहा, “इन वैद्यों को उचित आदर देकर, धन देकर विदा कर दीजिए। इस अवस्था में मुझे अब वैद्यों की क्या आवश्यकता? मैंने क्षत्रिय-धर्म की परम और उत्तम गति पा ली है। बाण-शय्या पर पड़े मुझ जैसे के लिए अब चिकित्सा कराना उचित नहीं। इन्हीं बाणों के साथ मेरा दाह-संस्कार हो।” यह सुनकर दुर्योधन ने उन वैद्यों को सत्कारपूर्वक विदा कर दिया, और भीष्म की धर्म-निष्ठा देखकर सब राजा विस्मय से भर उठे।
इस प्रकार पितामह को तकिया देकर, उन्हें प्रणाम करके और तीन बार प्रदक्षिणा करके, उनकी रक्षा के लिए चारों ओर पहरेदार बिठाकर, रक्त से सने शरीर वाले वे वीर, मन में शोक लिए, सन्ध्या समय अपने-अपने शिविरों को लौटे। तब उचित समय पर माधव कृष्ण ने युधिष्ठिर के पास आकर कहा, “हे कुरुनन्दन, सौभाग्य से आपकी विजय हुई। सौभाग्य से वह भीष्म गिरा, जो मनुष्यों के लिए अवध्य था।” युधिष्ठिर ने उत्तर दिया, “आपकी कृपा से विजय है, आपके क्रोध से पराजय। आप ही हमारे शरणदाता हैं। जिनकी रक्षा आप सदा करते हैं, उनकी विजय कोई आश्चर्य नहीं।” यह सुनकर जनार्दन ने मुस्कराकर कहा, “हे राजाओं में श्रेष्ठ, ऐसे वचन आप ही से निकल सकते हैं।”
सार: भीष्म ने तकिए के रूप में कोमल वस्त्र अस्वीकार किए, और अर्जुन ने तीन बाणों से उनका सिर थामकर वीर-शय्या के योग्य तकिया दिया। पितामह ने वैद्यों को विदा कर दिया, और उत्तरायण आने तक प्राण रोककर सूर्य की आराधना करते हुए शर-शय्या पर लेटे रहने का संकल्प किया। दस दिनों के महासंग्राम का सेनापति अब युद्ध से ऊपर उठकर, इच्छा-मृत्यु की प्रतीक्षा में, दोनों कुलों का साझा शोक बन गया।
मूल: महाभारत (कृष्णद्वैपायन व्यास), भीष्म पर्व; गीता प्रेस गोरखपुर परम्परा।