लुल्ला परिवारLulla Family
English
← संग्रह
क्रियाएँ
महाभारतधर्म की कठिन भूमि

अभिमन्यु व चक्रव्यूह

इस पृष्ठ पर
महाभारत · द्रोण पर्व
चक्रव्यूह में अकेले घुसे अभिमन्यु का अप्रतिम पराक्रम, और सात महारथियों के मिलकर घेरने पर उस युवा वीर का छल से वध।

पढ़ने में लगभग 45 मिनट

उगते सूर्य के नीचे चक्रव्यूह की वलयाकार सैन्य रचना, केंद्र में छत्रधारी रथ पर सेनापति

कुरुक्षेत्र के उस तेरहवें दिन प्रभात की पहली किरण के साथ ही द्रोणाचार्य ने एक ऐसी रचना खड़ी कर दी, जिसका नाम सुनते ही पाण्डवों का हृदय काँप उठा। चक्रव्यूह (पहिए के आकार में घूमती हुई सैन्य-रचना, जिसके भीतर मार्ग गोल-गोल मुड़ता चला जाता है और बाहर निकलने का रास्ता खोजना ही दुष्कर हो)। आचार्य ने उसके भीतर ऐसे राजाओं को बिठाया जिनमें से एक-एक स्वयं इन्द्र के समान था। द्वार पर सूर्य के समान तेजस्वी राजकुमार खड़े थे, सबने एक-दूसरे का साथ न छोड़ने की शपथ ली थी, सबके ध्वज सोने से मढ़े थे, सब लाल वस्त्रों में, लाल आभूषणों में, चन्दन और सुगन्धित अनुलेपन से सजे, पुष्पमालाओं से अलंकृत। उनके सिर पर आपके सुन्दर पौत्र लक्ष्मण (दुर्योधन का पुत्र) थे, और उनके पीछे दस हज़ार दृढ़ धनुर्धर। बीच में श्वेत छत्र के नीचे, चँवर डुलाए जाते हुए, देवराज के समान सुशोभित दुर्योधन खड़े थे, कर्ण, दुःशासन और कृपाचार्य से घिरे हुए। और सेना के मुख पर, उगते सूर्य की भाँति, आचार्य द्रोण।

वह दिन जिस दिन अर्जुन दूर थे

उस दिन अर्जुन रणभूमि के दूसरे छोर पर थे। संशप्तकों (वे योद्धा जिन्होंने शपथ ले रखी थी कि या तो अर्जुन को मारेंगे या स्वयं मरेंगे, अतएव वे बार-बार अर्जुन को ललकार कर युद्ध के दूसरे कोने में खींच ले जाते थे) ने उन्हें ललकार कर बहुत दूर ले जा रखा था। आचार्य की मन्शा यही थी। दुर्योधन के उलाहने पर उन्होंने वचन दिया था कि आज वे पाण्डवों के किसी प्रमुख महारथी को मारेंगे और देवताओं के लिए भी अभेद्य व्यूह रचेंगे, यदि अर्जुन किसी उपाय से रणभूमि से दूर हटा दिए जाएँ। चक्रव्यूह उसी वचन के लिए रचा गया था।

श्वेतदाढ़ी सेनापति सभा में हाथ उठाकर चिंतित बैठे राजा से कुछ कहता हुआ, चारों ओर सशस्त्र योद्धा
श्वेतदाढ़ी द्रोणाचार्य आकाश की ओर उंगली उठाकर सिंहासन पर बैठे दुर्योधन के सामने व्यूह की घोषणा करते हुए

द्रोण को क्रोध में आगे बढ़ता देख युधिष्ठिर ने उन्हें रोकने के अनेक उपाय सोचे। किन्तु आचार्य का धनुष ऐसी वर्षा कर रहा था कि पांचाल और सृंजय उनके सम्मुख ठहर ही न पाते थे। द्रोण की भुजाओं का जो बल हमने उस दिन देखा, वह अद्भुत था। अन्ततः युधिष्ठिर ने यह असह्य भार सुभद्रा के पुत्र पर रखने का निश्चय किया। उस अभिमन्यु को सम्बोधित करके, जो वासुदेव से किसी भाँति न्यून न था और जिसका तेज अर्जुन से भी बढ़कर था, राजा ने कहा, “हे पुत्र, ऐसा कुछ कीजिए कि अर्जुन संशप्तकों से लौटकर हमें उलाहना न दें। हम चक्रव्यूह तोड़ना नहीं जानते। इस व्यूह को आप, या अर्जुन, या कृष्ण, या प्रद्युम्न ही भेद सकते हैं। हे महाबाहु, पाँचवाँ कोई नहीं मिलेगा। हे अभिमन्यु, आपके पिता-तुल्य ये सब, आपके मामा, और ये समस्त सैनिक आपसे जो वर माँग रहे हैं, उसे देने की कृपा कीजिए। शीघ्र अस्त्र उठाइए और द्रोण के इस व्यूह का विध्वंस कीजिए, अन्यथा लौटकर अर्जुन हम सबको लज्जित करेंगे।”

अभिमन्यु ने उत्तर दिया, “अपने पिता-तुल्य जनों को विजय की कामना से मैं शीघ्र ही द्रोण के रचे हुए इस दृढ़, भयंकर और दुर्भेद्य व्यूह में घुस जाऊँगा। मुझे मेरे पिता ने इस प्रकार के व्यूह को भेदकर भीतर मारकाट मचाने की विधि सिखाई है। किन्तु यदि कोई संकट आ पड़े, तो उससे बाहर निकलना मैं नहीं जानता।”

यहीं इस कथा का वह काँटा है जो आगे चलकर हृदय में चुभता है। बालक जानता था कि भीतर कैसे जाना है, बाहर कैसे आना है यह नहीं। और फिर भी उसने मना नहीं किया।

घुटनों पर बैठा योद्धा स्वर्ण कवचधारी अभिमन्यु से हाथ जोड़कर विनती करता हुआ, पीछे युद्ध की हलचल

युधिष्ठिर ने कहा, “हे श्रेष्ठ योद्धा, एक बार इस व्यूह को तोड़कर हमारे लिए मार्ग बना दीजिए। आप जिस पथ से जाएँगे, हम सब उसी पथ से आपके पीछे-पीछे चलेंगे। युद्ध में आप साक्षात् धनंजय के समान हैं। आपको भीतर घुसते देखकर हम भी घुसेंगे और चारों ओर से आपकी रक्षा करते रहेंगे।”

भीम बोले, “मैं स्वयं आपके पीछे आऊँगा, और धृष्टद्युम्न, और सात्यकि, और पांचाल, और प्रभद्रक भी। एक बार आप व्यूह तोड़ दें, फिर मैं बार-बार उसमें घुसकर भीतर के प्रमुख योद्धाओं को मारूँगा।”

रथ पर खड़ा अभिमन्यु मुट्ठी उठाकर ललकारता हुआ, सामने वृद्ध सेनापति सहित कौरव योद्धाओं की पंक्तियां

अभिमन्यु ने कहा, “मैं द्रोण के इस अजेय व्यूह में वैसे ही घुसूँगा जैसे क्रोध में भरा कोई पतंगा धधकती अग्नि में घुस जाता है। आज मैं वह करूँगा जो दोनों कुलों के लिए, अर्थात् पिता के और माता के, हितकर होगा। आज मैं वह करूँगा जिससे मेरे मामा और मेरी माता प्रसन्न हों। आज समस्त प्राणी देखेंगे कि मुझ अकेले बालक के हाथों शत्रु-सेना की कैसी निरन्तर कटाई होती है। यदि आज मुझसे टकराकर कोई जीवित बच निकला, तो मैं अपने को पार्थ का पुत्र और सुभद्रा का जाया न मानूँगा। यदि एक ही रथ पर रहकर मैं समस्त क्षत्रिय-कुल को आठ टुकड़ों में न काट सका, तो स्वयं को अर्जुन-पुत्र न मानूँगा।”

वरिष्ठ योद्धाओं के घेरे में खड़ा किशोर अभिमन्यु छाती पर हाथ रखकर अपनी बात कहता हुआ

युधिष्ठिर ने कहा, “इन नर-व्याघ्रों से रक्षित होकर, इन प्रचण्ड बल वाले महाधनुर्धरों के बीच, जो साध्यों, रुद्रों या मरुतों के समान हैं, जो वसुओं, अग्नि या आदित्य के समान पराक्रमी हैं, आप जब द्रोण के इस अजेय व्यूह को भेदने का साहस कर रहे हैं और ऐसा कह रहे हैं, तो हे सुभद्रा-पुत्र, आपका बल बढ़े।”

समझने की कुंजी (अवधारणा): अभिमन्यु ने अर्जुन से चक्रव्यूह में प्रवेश की विधि सीखी थी। युद्ध से पहले वह स्वयं कहता है कि उसे बाहर निकलने की विधि ज्ञात नहीं। महाभारत यहाँ इस सीमा को सीधे कहता है; गर्भ में अधूरी शिक्षा सुनने का प्रसंग इस पाठ में नहीं है।

सार: अर्जुन को संशप्तक दूर खींच ले गए, द्रोण ने चक्रव्यूह रच डाला, और भेदने में समर्थ चार में से तीन वहाँ अनुपस्थित थे। शेष बचा एकमात्र अभिमन्यु, जो भीतर जाना तो जानता था, बाहर आना नहीं। पिताओं और मामाओं ने वचन दिया कि वे पीछे-पीछे आकर उसकी रक्षा करेंगे, और बालक ने वह असह्य भार सहर्ष उठा लिया।

सारथि की चेतावनी और व्यूह का भेदन

युधिष्ठिर के ये वचन सुनकर अभिमन्यु ने अपने सारथि सुमित्र को आदेश दिया, “घोड़ों को शीघ्र द्रोण की सेना की ओर हाँकिए।” किन्तु सारथि का हृदय इस आज्ञा से प्रसन्न न हुआ। उसने कहा, “हे दीर्घायु, पाण्डवों ने आप पर बहुत भारी बोझ रख दिया है। पहले अपनी बुद्धि से यह जाँच लीजिए कि आप इसे उठा सकते हैं या नहीं, तत्पश्चात् युद्ध में प्रवृत्त हूजिए। आचार्य द्रोण श्रेष्ठ अस्त्रों के स्वामी और युद्ध में पारंगत हैं। और आप परम सुख-वैभव में पले हैं, युद्ध के अभ्यस्त नहीं।”

चार श्वेत अश्वों के रथ से बाण चलाता अभिमन्यु, आगे गिरते हाथी और बिखरती कौरव सेना

यह सुनकर अभिमन्यु हँस पड़े और बोले, “हे सारथि, यह द्रोण कौन हैं? और यह क्षत्रियों का विशाल जमावड़ा क्या है? स्वयं इन्द्र अपने ऐरावत पर चढ़कर समस्त देवताओं की सहायता से भी आ खड़े हों, तो भी मैं उनसे भिड़ जाऊँ। इन समस्त क्षत्रियों की मुझे तनिक भी चिन्ता नहीं। यह शत्रु-सेना तो मेरे सोलहवें अंश के भी बराबर नहीं। हे सूतपुत्र, यदि मेरे मामा विष्णु स्वयं, अथवा मेरे पिता अर्जुन ही मेरे प्रतिद्वन्द्वी हो जाएँ, तब भी मेरे हृदय में भय न समाएगा। जाइए, द्रोण की सेना की ओर वेग से चलिए।”

इस प्रकार आज्ञा पाकर सारथि ने, अनमने हृदय से ही सही, सोने के साज से सजे अभिमन्यु के तीन वर्ष के उन घोड़ों को हाँक दिया। वे अश्व बड़े वेग और पराक्रम से सीधे द्रोण की ओर दौड़ पड़े। उन्हें इस प्रकार आता देख द्रोण के नेतृत्व में समस्त कौरव सामने बढ़े, और पीछे पाण्डव भी उसी मार्ग पर आ लगे। अर्जुन से भी बढ़कर वह बालक, सोने के कवच में कसा हुआ, कर्णिकार वृक्ष के चिह्न वाली उत्तम ध्वजा फहराता हुआ, द्रोण के नेतृत्व वाले योद्धाओं से वैसे ही निडर भिड़ गया जैसे सिंह-शावक हाथियों के झुंड पर टूट पड़े।

हाथियों और तलवारधारी सैनिकों की भीड़ के बीच रथ दौड़ाता अभिमन्यु व्यूह में मार्ग बनाता हुआ

एक क्षण को वहाँ ऐसी हलचल मची जैसी समुद्र में गंगा के मिलने पर भँवर उठती है। फिर वह घोर युद्ध आरम्भ हुआ। और उसी भयानक युद्ध के बीच, द्रोण के देखते-देखते, अर्जुन के पुत्र ने व्यूह तोड़कर उसके भीतर प्रवेश कर लिया।

जैसे ही वह भीतर घुसा, हाथियों, घोड़ों, रथों और पैदलों के बड़े-बड़े दल हर्षित होकर उसे घेरकर प्रहार करने लगे। नाना वाद्यों की ध्वनि से, सिंहनादों से, “ठहरिए, ठहरिए”, “जाने न पाए”, “इधर आइए, यही है, यही शत्रु है” इन चीत्कारों से, हाथियों की चिंघाड़ से, घंटियों की झनकार से, अट्टहासों से, और रथचक्रों तथा घोड़ों के टापों की गड़गड़ाहट से समस्त भूमि गूँज उठी। किन्तु वह वीर, हाथ की अद्भुत फुर्ती से और मर्मस्थलों के ज्ञान से, ऐसे अस्त्र चलाने लगा जो सीधे प्राणों में पैठ जाते। जो भी सामने आता, कटकर गिर पड़ता। आगे बढ़ते हुए योद्धा अग्नि पर गिरते पतंगों की भाँति अभिमन्यु पर आ गिरते और मारे जाते। अभिमन्यु ने भूमि को उनके शरीरों और कटे हुए अंगों से ऐसे पाट दिया जैसे पुरोहित यज्ञ-वेदी को कुश से बिछा देते हैं।

रथ पर घूमकर बाण बरसाता अभिमन्यु, चारों ओर उड़ते शत्रु-मस्तक और शवों से पटी रणभूमि

सहस्रों भुजाएँ कटीं, जिनमें कोई धनुष-बाण थामे थी, कोई तलवार, कोई ढाल, कोई अंकुश, कोई भाला या फरसा। पाँच फनों वाले सर्पों की भाँति वे रक्तरंजित बाहें भूमि पर शोभा पाने लगीं। सुन्दर नासिका, सुन्दर मुख और बिना दाग वाले मुख तथा कुण्डलों से सजे असंख्य शिर भूमि पर बिखर गए, मानो डंठल से कटे कमल हों। उत्तम रथ, जो आकाश में बादल के दुर्ग-से दीखते थे, अपने पहियों, धुरों और ध्वजाओं समेत चूर हो गए। अभिमन्यु चारों दिशाओं में दीखता हुआ सबको काटता चला गया।

समझने की कुंजी (वंश): अभिमन्यु अर्जुन और सुभद्रा (श्रीकृष्ण की बहन) के पुत्र थे, अतः वे एक ओर पाण्डव-वंश के और दूसरी ओर वृष्णि-वंश के दौहित्र थे। यही कारण है कि वे बार-बार “दोनों कुलों” का स्मरण करते हैं, और कथा उन्हें “इन्द्र के पुत्र (अर्जुन) के पुत्र” तथा “विष्णु (कृष्ण) के भानजे” कहकर बुलाती है।

सार: सारथि सुमित्र ने सावधान किया कि भार बहुत भारी है, किन्तु बालक हँसकर उसे टाल गया और बोला कि स्वयं इन्द्र भी सामने आ जाएँ तो उसे भय नहीं। फिर उसने द्रोण के देखते-देखते चक्रव्यूह भेद दिया, और भीतर घुसते ही घेर लिए जाने पर ऐसी मारकाट मचाई कि भूमि कटे अंगों और टूटे रथों से पट गई।

जयद्रथ का द्वार रोक देना

व्यूह के द्वार पर हथेली उठाए जयद्रथ पांडव योद्धाओं के रथों को आगे बढ़ने से रोकता हुआ

अभिमन्यु को इस प्रकार भीतर घुसते देख उसके पिता-तुल्य जन और मामा, शत्रुओं के संहारक, युद्ध-क्रम में सजकर उसी मार्ग पर दौड़ पड़े जो अभिमन्यु ने बनाया था, ताकि उसे उबार लें। उन वीरों को आता देख आपकी सेना युद्ध से मुँह मोड़ने लगी। तब आपका महातेजस्वी जामाता उन्हें ललकारने को दौड़ा। हाँ, सिन्धुराज जयद्रथ ने, सिन्धुदेश के स्वामी ने, अपने समस्त अनुचरों सहित उन पार्थों को रोक दिया जो अपने पुत्र को बचाने को आतुर थे। वृद्धक्षत्र के उस पुत्र ने दिव्यास्त्रों का आह्वान करके पाण्डवों को वैसे ही रोक दिया जैसे कोई हाथी किसी नीची भूमि में क्रीड़ा करता रहे।

यहाँ धृतराष्ट्र ने पूछा, “हे संजय, सिन्धुराज पर तो बहुत भारी बोझ आ पड़ा कि अकेले ही उसे क्रुद्ध पाण्डवों को रोकना पड़ा। उस वीर का पराक्रम क्या था, और उसने ऐसा अद्भुत कार्य कैसे सिद्ध किया? उसने कौन-से दान दिए, कौन-सी आहुतियाँ दीं, कौन-से यज्ञ किए, कौन-सी तपस्या की, जिसके बल पर अकेले ही उसने क्रोध में भरे पार्थों को रोक लिया?”

शिवलिंग के सम्मुख हाथ जोड़कर तपस्या करता जयद्रथ, आकाश में प्रकट त्रिशूलधारी शिव आशीर्वाद देते हुए

संजय ने उत्तर दिया, “द्रौपदी के अपमान के अवसर पर जयद्रथ भीमसेन से पराजित हुआ था। उस अपमान की तीव्र पीड़ा से उसने वर पाने की इच्छा से घोर तपस्या की। समस्त प्रिय वस्तुओं से इन्द्रियों को रोककर, भूख, प्यास और ताप सहकर, उसने अपना शरीर इतना सुखा लिया कि उभरी हुई नसें दीखने लगीं। वेद के शाश्वत मन्त्रों का उच्चारण करते हुए उसने महादेव की आराधना की। वह देवता, जो अपने भक्तों पर सदा करुणा रखते हैं, अन्ततः उस पर प्रसन्न हुए। हर ने स्वप्न में सिन्धुराज को दर्शन देकर कहा, ‘जो वर चाहें, माँगिए। मैं आपसे प्रसन्न हूँ, हे जयद्रथ।’ तब जयद्रथ ने हाथ जोड़कर, संयत चित्त से कहा, ‘मैं अकेला, एक ही रथ पर रहकर, युद्ध में पाण्डु के समस्त पुत्रों को रोक दूँ, चाहे वे कितने ही प्रचण्ड तेज और पराक्रम वाले क्यों न हों।’ महादेव ने कहा, ‘हे सौम्य, मैं आपको यह वर देता हूँ। पृथा के पुत्र धनंजय को छोड़कर, शेष चार पाण्डवों को आप युद्ध में रोक सकेंगे।’

उसी वर के बल से, और अपने दिव्यास्त्रों के बल से, जयद्रथ ने अकेले ही पाण्डवों की समस्त सेना को रोक रखा। उसकी प्रत्यंचा की टंकार और हथेलियों की चटाक ने शत्रु-क्षत्रियों के हृदय में भय भर दिया। जो भी पाण्डव-पक्ष का वीर द्रोण के बनाए व्यूह को भेदने का यत्न करता, उसे उस वर के कारण सिन्धुराज रोक देता।”

समझने की कुंजी (संख्या एवं वर): महादेव का वर सीमित था, जयद्रथ केवल चार पाण्डवों (युधिष्ठिर, भीम, नकुल, सहदेव) को रोक सकता था, अर्जुन को नहीं। किन्तु उस दिन अर्जुन संशप्तकों के पास दूर थे, अतः यह अर्ध-वर ही पर्याप्त सिद्ध हुआ। अभिमन्यु जिस द्वार से भीतर घुसा था, जयद्रथ ने उसी द्वार पर खड़े होकर उसे फिर से बन्द कर दिया, और बालक भीतर अकेला रह गया।

सार: अभिमन्यु ने जो मार्ग खोला था, उसी से पीछे आते पाण्डवों को महादेव के वरदान-प्राप्त जयद्रथ ने रोक लिया। वर की सीमा यह थी कि वह अर्जुन को छोड़ शेष चार पाण्डवों को ही रोक सकता था, और उस दिन अर्जुन दूर थे। इस प्रकार वचन देने वाले पीछे रह गए और बालक भीतर घिर गया।

दुःशासन से भिड़न्त, और कर्ण का तिरस्कार

व्यूह के भीतर दुर्योधन ने आचार्य के मुख पर अभिमन्यु की प्रशंसा देखी तो जल उठा। उसने कर्ण, बाह्लीक, दुःशासन, मद्रराज और अनेक महारथियों से कहा, “समस्त क्षत्रियों के आचार्य, ब्रह्मविद्या के ज्ञाताओं में अग्रणी द्रोण, मोह के कारण अर्जुन के इस पुत्र को मारना नहीं चाहते। आचार्य से युद्ध में कोई जीवित नहीं बचता, स्वयं काल भी नहीं, यदि वह शत्रु बनकर आचार्य के सामने आए। फिर किसी मर्त्य की क्या बात? यह अर्जुन का पुत्र है, और अर्जुन आचार्य का शिष्य। इसी से आचार्य इस बालक की रक्षा कर रहे हैं। शिष्य, पुत्र और उनके पुत्र सज्जनों को सदा प्रिय होते हैं। इसे शीघ्र कुचल डालिए।”

सूर्यास्त की छावनी में युवा अभिमन्यु वृद्ध श्वेतदाढ़ी योद्धा के सम्मुख हाथ बढ़ाकर आग्रहपूर्वक बोलता हुआ

दुःशासन ने उत्तर दिया, “हे राजन्, मैं ही पाण्डवों के सामने और पांचालों की आँखों के आगे इसे मारूँगा। आज मैं सुभद्रा के पुत्र को वैसे ही निगल जाऊँगा जैसे राहु सूर्य को।” यह कहकर वह क्रोध में गरजता हुआ अभिमन्यु पर बाणों की वर्षा करता हुआ टूट पड़ा।

अभिमन्यु ने उसका स्वागत छब्बीस तीखे बाणों से किया। दोनों रथयुद्ध के निपुण थे, सुन्दर वृत्त बनाते हुए, एक बाएँ तो दूसरा दाएँ घूमते हुए लड़ते रहे। फिर अभिमन्यु ने मुस्कुराकर दुःशासन से कहा, “सौभाग्य है कि वह घमण्डी वीर मेरे सामने आ खड़ा हुआ, जो क्रूर है, जिसने सारा धर्म त्याग दिया, और जो ऊँचे स्वर में अपनी ही प्रशंसा बकता रहता है। सभा में, धृतराष्ट्र के सुनते हुए, आपने अपने कठोर वचनों से राजा युधिष्ठिर को कुपित किया था। पाँसों की धूर्तता और शकुनि की कुशलता के बल पर मद में चूर होकर आपने भीम से भी अनेक उन्मत्त वचन कहे थे। आज मैं समस्त सेना के सामने अपने बाणों से आपको दण्ड दूँगा। आज मैं उस क्रोध से उऋण हो जाऊँगा जो आपके प्रति मेरे मन में है। युद्ध छोड़े बिना आप जीवित मुझसे बच न पाएँगे।”

यह कहकर उस वीर ने यम, अग्नि या वायु के समान तेज वाला एक बाण छोड़ा। वह बाण दुःशासन के कन्धे की संधि में लगा और सर्प के बाँबी में घुसने की भाँति उसके शरीर में पंख तक धँस गया। फिर पच्चीस अग्नि-स्पर्शी बाणों से उसे बींध दिया। गहरी पीड़ा से व्याकुल दुःशासन रथ के पिछले भाग में बैठ गया और मूर्च्छित हो गया। उसका सारथि उसे शीघ्र युद्ध से दूर ले गया। यह देखकर पाण्डव-पक्ष में हर्ष-ध्वनि उठी।

तब दुर्योधन ने कर्ण से कहा, “देखिए, सूर्य के समान तपता वह दुःशासन भी अभिमन्यु के आगे टिक न सका।” यह सुनकर कर्ण क्रोध में अभिमन्यु पर तीखे बाणों की झड़ी लगाने लगा और उसके अनुचरों को भी बींधने लगा। किन्तु अभिमन्यु, जो द्रोण की ओर बढ़ना चाहता था, उसने कर्ण को तिहत्तर बाणों से बींध डाला। आपकी सेना का कोई रथी द्रोण की ओर बढ़ते उस अभिमन्यु को रोक न सका।

तब कर्ण ने सैकड़ों बाण चलाकर अभिमन्यु के श्रेष्ठ अस्त्रों को विफल करना चाहा। राम (परशुराम) का वह शिष्य अपने अस्त्रों से उस अजेय बालक को पीड़ित करने लगा। किन्तु राधा-पुत्र की बाण-वर्षा से व्यथित होकर भी सुभद्रा-पुत्र को कोई पीड़ा न हुई। पत्थर पर सान धरे, तीखे फलवाले बाणों से अनेक वीरों के धनुष काटते हुए, अर्जुन-पुत्र ने कर्ण को बदले में बींधना आरम्भ कर दिया। हँसते-हँसते उसने कर्ण के छत्र, ध्वजा, सारथि और घोड़े काट डाले। कर्ण ने पाँच सीधे बाण मारे, अभिमन्यु ने उन्हें निर्भय होकर झेल लिया, और फिर एक ही बाण से कर्ण का धनुष और ध्वजा काटकर भूमि पर गिरा दिए।

कर्ण को इस संकट में देखकर उसका छोटा भाई बड़े बल से धनुष खींचता हुआ बीच में आ खड़ा हुआ। उसने दस बाणों से अभिमन्यु, उसके छत्र, ध्वज, सारथि और घोड़ों को बींधा। तब अभिमन्यु ने धनुष को बलपूर्वक झुकाकर, मुस्कुराते हुए, एक ही पंखधारी बाण से उसका शिर काट डाला। वह शिर धड़ से अलग होकर भूमि पर जा गिरा। अपने भाई को पर्वत-शिखर से वायु के झोंके से गिराए कर्णिकार वृक्ष की भाँति गिरा देखकर कर्ण पीड़ा से भर उठा। अभिमन्यु ने अपने बाणों से कर्ण को रणभूमि से पीछे हटने को विवश कर दिया।

समझने की कुंजी (वंश): कथा में बार-बार आने वाला “राधा-पुत्र” कर्ण है, जो सूत-दम्पति अधिरथ और राधा के पाले हुए थे, इसी से उन्हें “सूतपुत्र” और “राधेय” कहा जाता है। उन्होंने धनुर्विद्या परशुराम (जमदग्नि के पुत्र राम) से सीखी थी, अतः वे “राम के शिष्य” कहलाते हैं।

सार: दुर्योधन के उकसाने पर पहले दुःशासन भिड़ा और मूर्च्छित होकर रणभूमि से ढोया गया। फिर कर्ण आया, अभिमन्यु ने उसके छत्र-ध्वज-सारथि-घोड़े काट डाले, बीच में आए कर्ण के छोटे भाई का शिर उतार दिया, और कर्ण को भी पीछे हटा दिया। आचार्य द्रोण उस समय बालक की रक्षा करते-से प्रतीत हो रहे थे, जिससे दुर्योधन और भी जल उठा।

सौ राजकुमारों का संहार, और गन्धर्व-माया

जब आकाश अभिमन्यु के बाणों से ऐसे ढक गया मानो टिड्डियों के दल हों या मूसलाधार वर्षा, तब कुछ भी दीखता न था। कौरव-सेना भाग खड़ी हुई, भागते-भागते अपने ही साथियों को रौंदती हुई। सोने के बाजूबन्द पहने भुजाएँ, चमड़े के दस्तानों में कसी हथेलियाँ, धनुष-बाण, कुण्डल और पुष्पमालाओं से सजे शिर, सहस्रों की संख्या में भूमि पर बिखर गए।

व्यूह में घुसने के बाद, अभिमन्यु ने वसातीय नामक वीर को छाती में बाण मारकर गिरा दिया, यद्यपि वह लोहे का कवच पहने था। तब क्रुद्ध क्षत्रियों ने उसे घेर लिया। फिर मद्रराज शल्य के पुत्र रुक्मरथ ने भयभीत सैनिकों को आश्वस्त करते हुए कहा, “वीरो, भय न कीजिए। जब तक मैं हूँ, अभिमन्यु क्या है? मैं इसे जीवित ही बन्दी बना लूँगा।” यह कहकर वह सुन्दर रथ पर अभिमन्यु पर टूट पड़ा। उसने अभिमन्यु की छाती में तीन, दाहिनी भुजा में तीन और बाईं भुजा में तीन तीखे बाण मारे और गरजा। किन्तु अर्जुन-पुत्र ने उसका धनुष, दोनों भुजाएँ और सुन्दर नेत्र-भौंहों वाला शिर काटकर भूमि पर गिरा दिया।

शल्य-पुत्र को मारा गया देख उसके अनेक राजकुमार मित्र, छह हाथ लम्बे धनुष तानकर, अर्जुन-पुत्र को घेरकर बाण बरसाने लगे। अकेले बालक को इतने वीरों से घिरा देख दुर्योधन प्रसन्न हुआ और उसे यम का अतिथि मान बैठा। पलक झपकते उन राजकुमारों ने सोने के पंखों वाले बाणों से अर्जुन-पुत्र को अदृश्य कर दिया। बाणों से बींधा हुआ वह अंकुश से बिंधे हाथी की भाँति क्रोध से भर उठा।

तब उसने गन्धर्व-अस्त्र और उससे उत्पन्न होने वाली माया का प्रयोग किया, यह अस्त्र अर्जुन ने तपस्या से गन्धर्व तुम्बुरु आदि से पाया था। उस माया से अभिमन्यु अग्नि के घेरे की भाँति घूमने लगा, कभी एक दीखता, कभी सौ, कभी सहस्र। रथ के सञ्चालन की कुशलता और अस्त्र की माया से शत्रुओं को भ्रमित करके उसने राजाओं के शरीर सौ-सौ टुकड़ों में काट डाले। उनके प्राण निकल गए और शरीर भूमि पर गिर पड़े। वे सौ राजकुमार सुभद्रा-पुत्र के हाथों ऐसे काटे गए जैसे आँधी से गिराया गया पाँच वर्ष के आम-वृक्षों का कुंज, जो अभी फल देने को था। हर वैभव में पले, क्रुद्ध सर्पों के समान वे राजकुमार जब अकेले अभिमन्यु के हाथों मारे गए, तो दुर्योधन भयभीत हो उठा।

अपने रथी, हाथी, घोड़े और पैदल कुचले जाते देख कुरुराज क्रोध में स्वयं अभिमन्यु पर बढ़ा। थोड़ी देर ही उनमें अधूरा युद्ध चला, फिर अभिमन्यु के बाणों से व्यथित होकर आपका पुत्र युद्ध से पीछे हटने को विवश हो गया।

समझने की कुंजी (संख्या का आधुनिक समतुल्य): “सौ राजकुमारों” का एक झटके में संहार, और आगे आने वाली “दस हज़ार”, “आठ हज़ार रथ”, “नौ सौ हाथी” जैसी संख्याएँ महाभारत की अतिशय-शैली हैं। आज की दृष्टि से इन्हें शब्दशः गिनती न मानकर इस रूप में समझिए कि एक अकेले योद्धा ने पूरी एक वाहिनी (एक आधुनिक ब्रिगेड या डिविजन-तुल्य दल) को अकेले रोक और काट दिया, यही इस वर्णन का भाव है।

सार: वसातीय और शल्य-पुत्र रुक्मरथ मारे गए, फिर सौ राजकुमारों के घेरे को अभिमन्यु ने गन्धर्व-माया से छलकर काट डाला, जिसमें वह एक से सौ और सहस्र रूपों में दीखने लगा। दुर्योधन स्वयं आया और बाणों से व्यथित होकर पीछे हट गया। अकेले बालक ने एक पूरी सेना को रोक रखा था।

लक्ष्मण का वध, और छह महारथियों का घेरा

दुर्योधन के पीछे हटने और सौ राजकुमारों के मारे जाने पर आपकी सेना के योद्धा सूख गए, मुख सूख गए, नेत्र चंचल हो उठे, शरीर पसीने से भर गए और रोंगटे खड़े हो गए। शत्रु को जीतने से निराश होकर वे रणभूमि छोड़ने को तैयार हो गए। अपने घायल भाइयों, पिताओं, पुत्रों और सम्बन्धियों को छोड़कर वे घोड़ों और हाथियों को पूरे वेग से हाँकते हुए भागने लगे।

उन्हें भागते देख द्रोण, अश्वत्थामा, बृहद्बल, कृप, दुर्योधन, कर्ण, कृतवर्मा और सुबल-पुत्र शकुनि महान् क्रोध में अजेय सुभद्रा-पुत्र पर टूट पड़े। किन्तु ये सब भी आपके पौत्र से पीछे हटा दिए गए। तब केवल एक योद्धा, लक्ष्मण (दुर्योधन का पुत्र), वैभव में पला, बाणों में निपुण, महातेजस्वी, और अनुभवहीनता तथा गर्व के कारण निर्भय, अर्जुन-पुत्र के सामने बढ़ा। अपने पुत्र की चिन्ता में दुर्योधन भी उसके पीछे लौट पड़ा, और उसके पीछे अन्य महारथी भी।

एक मतवाले हाथी के दूसरे से भिड़ने की भाँति अर्जुन-पुत्र आपके पौत्र लक्ष्मण से भिड़ गया, उस लक्ष्मण से जो परम सुन्दर, महावीर, धनुष ताने पिता के पास खड़ा, हर वैभव में पला हुआ था और दूसरे यक्षराज-कुमार-सा दीखता था। लक्ष्मण ने सुभद्रा-पुत्र की दोनों भुजाओं और छाती पर तीखे बाण मारे। तब छड़ी से पीटे गए सर्प की भाँति क्रोध में भरकर अभिमन्यु ने आपके दूसरे पौत्र से कहा, “इस संसार को भली भाँति देख लीजिए, क्योंकि अब आपको दूसरे लोक जाना है। आपके समस्त बन्धुओं के देखते-देखते मैं आपको यम के धाम भेजूँगा।”

अभिमन्यु भाले जैसे बाण से रथ में बैठे युवा लक्ष्मण का वध करता हुआ, पीछे क्रोध में चीखता दुर्योधन

यह कहकर उस वीर ने एक चौड़े फलवाला बाण निकाला, जो केंचुली से निकले सर्प-सा दीखता था। अभिमन्यु की भुजाओं से छूटा वह बाण लक्ष्मण का सुन्दर, कुण्डलों से सजा, सुन्दर नासिका, भौंहों और मनोहर घुँघराले बालों वाला शिर काट ले गया। लक्ष्मण को मारा गया देख आपकी सेना “हाय, हाय” कर उठी। अपने प्यारे पुत्र के वध से दुर्योधन क्रोध में भर गया और अपने अधीन क्षत्रियों को ऊँचे स्वर में ललकारने लगा, “इसे मारिए।”

तब द्रोण, कृप, कर्ण, द्रोण-पुत्र अश्वत्थामा, बृहद्बल और हृदिक के पुत्र कृतवर्मा, इन छह महारथियों ने अभिमन्यु को घेर लिया। उन्हें तीखे बाणों से बींधकर और हटाकर अर्जुन-पुत्र बड़े वेग और रोष से जयद्रथ की विशाल सेना पर टूट पड़ा। तब कलिंग, निषाद और क्रथ के वीर पुत्र अपने हाथी-दल से उसका मार्ग रोककर घेरने लगे। अभिमन्यु ने उस हाथी-दल को वैसे ही विध्वंस किया जैसे वायु बादलों के पुंज को छिन्न-भिन्न कर देती है। क्रथ-पुत्र के धनुष, बाण, बाजूबन्द, भुजाएँ, मुकुटधारी शिर, छत्र, ध्वज, सारथि और घोड़े, सब अभिमन्यु ने काट गिराए।

धृतराष्ट्र ने पूछा कि उस समय किन वीरों ने उसे घेरा था, तो संजय ने फिर वही छह नाम गिनाए, द्रोण, कृप, कर्ण, अश्वत्थामा, बृहद्बल और कृतवर्मा। शेष योद्धा यह देखकर कि जयद्रथ ने पाण्डवों को रोकने का भारी कार्य अपने ऊपर ले लिया है, युधिष्ठिर की ओर दौड़ गए।

एक उप-कथा: इस अध्याय का लक्ष्मण दुर्योधन का पुत्र है, जिसका वध अभिमन्यु करता है; रामायण के लक्ष्मण से उसका केवल नाम मिलता है। संजय उसे धृतराष्ट्र का पौत्र कहते हैं, और अभिमन्यु को भी।

सार: भागती कौरव-सेना को रोकने आगे आया दुर्योधन का पुत्र लक्ष्मण भी अभिमन्यु के हाथों मारा गया, उसका कुण्डलधारी शिर एक ही बाण से कट गिरा। पुत्र-वध से क्रुद्ध दुर्योधन ने “इसे मारिए” कहकर ललकारा, और तब द्रोण, कृप, कर्ण, अश्वत्थामा, बृहद्बल तथा कृतवर्मा, ये छह महारथी मिलकर बालक को घेर बैठे।

कोसलराज बृहद्बल और शल्य पर प्रहार

घेरने वाले छहों महारथी छह-छह हाथ लम्बे धनुष तानकर सुभद्रा-पुत्र पर मूसलाधार बाण बरसाने लगे। किन्तु शत्रुओं के संहारक उस बालक ने उन समस्त महाधनुर्धरों को अपने बाणों से जड़वत् कर दिया। उसने द्रोण को पचास, बृहद्बल को बीस, कृतवर्मा को अस्सी और कृप को साठ बाणों से बींधा। अश्वत्थामा को सोने के पंखों वाले दस वेगवान् बाणों से, और कर्ण को एक चमकीले, बढ़िया सान धरे, दाढ़ीदार बाण से बींध दिया। कृप के रथ के घोड़े और दोनों पार्ष्णि-सारथि (रथ के पहियों की रक्षा करने वाले बगल के दो सारथि) गिराकर उसने कृप की छाती के बीच दस बाण मारे।

चारों ओर से घेरकर आक्रमण करते कौरव महारथियों के बीच रथ पर अकेला लड़ता अभिमन्यु

जब अभिमन्यु एक-एक करके श्रेष्ठ शत्रुओं को निर्भय काट रहा था, तब द्रोण-पुत्र अश्वत्थामा ने उसे पच्चीस छोटे बाणों से बींधा। अर्जुन-पुत्र ने समस्त धार्तराष्ट्रों के देखते-देखते अश्वत्थामा को बदले में अनेक तीखे बाणों से बींध दिया। अश्वत्थामा ने साठ प्रचण्ड बाण मारे, पर अभिमन्यु मैनाक पर्वत की भाँति अचल खड़ा रहा। फिर उसने तिहत्तर सीधे, सोने के पंखों वाले बाणों से अश्वत्थामा को बींधा। द्रोण ने पुत्र को बचाने के लिए अभिमन्यु को सौ बाणों से बींधा, अश्वत्थामा ने पिता को बचाने के लिए साठ से। कर्ण ने बाईस चौड़े फल वाले, कृतवर्मा ने चौदह, बृहद्बल ने पचास, और कृप ने दस बाण मारे। अभिमन्यु ने इनमें से प्रत्येक को बदले में दस-दस बाणों से बींधा।

तब कोसलराज बृहद्बल ने अभिमन्यु की छाती में एक काँटेदार बाण मारा। अभिमन्यु ने शीघ्र ही उसके घोड़े, ध्वज, धनुष और सारथि भूमि पर गिरा दिए। रथहीन होकर बृहद्बल ने तलवार उठाई और अभिमन्यु के कुण्डलधारी सुन्दर शिर को धड़ से अलग करना चाहा। किन्तु अभिमन्यु ने कोसलराज की छाती में एक प्रबल बाण मारा, और फटे हृदय से वह भूमि पर गिर पड़ा। यह देखकर दस हज़ार तेजस्वी राजा भयभीत होकर भाग खड़े हुए।

अभिमन्यु ने कर्ण को फिर एक काँटेदार बाण और पचास अन्य बाणों से बींधा, कर्ण ने उतने ही लौटाए। रक्त से नहाए वे दोनों खिले हुए किंशुक-वृक्षों-से सुशोभित हुए। फिर अभिमन्यु ने कर्ण के छह वीर मन्त्रियों को उनके घोड़ों, सारथियों और रथों सहित मार डाला। उसने मगधराज के पुत्र अश्वकेतु को छह बाणों से, और मार्तिकावत के भोज राजकुमार को एक छुरे जैसे बाण से काट डाला।

तब दुःशासन के पुत्र ने अभिमन्यु के चार घोड़ों को चार बाणों से, सारथि को एक और अभिमन्यु को दस बाणों से बींधा। अभिमन्यु ने उसे दस वेगवान् बाणों से बींधकर, क्रोध से लाल आँखों से कहा, “युद्ध छोड़कर आपके पिता कायर की भाँति भाग गए। अच्छा है कि आप लड़ना जानते हैं, किन्तु आज जीवित न बचेंगे।” फिर उसने शल्य पर भी प्रहार किया, उसका धनुष काटा, उसके दोनों पार्ष्णि-सारथि मारे, और उसे लोहे के छह बाणों से बींधा, जिससे शल्य रथहीन होकर दूसरे रथ पर चढ़ गया। अभिमन्यु ने शत्रुंजय, चन्द्रकेतु, महामेघ, सुवर्चा और सूर्यभास, इन पाँच वीरों को भी मार डाला।

समझने की कुंजी (स्थान एवं वंश): “कोसल” आधुनिक पूर्वी उत्तर प्रदेश का वह प्राचीन जनपद है जिसकी राजधानी अयोध्या/श्रावस्ती रही, इसी के राजा बृहद्बल यहाँ मारे जाते हैं। “मगध” दक्षिण बिहार का जनपद। “मद्र” आधुनिक पंजाब की ओर का देश, जिसके राजा शल्य नकुल-सहदेव के मामा थे, फिर भी इस युद्ध में कौरव-पक्ष में थे, यही महाभारत की नैतिक उलझन है, जहाँ रक्त-सम्बन्धी आमने-सामने खड़े हैं।

सार: घेरने वाले छहों महारथियों को अभिमन्यु ने एक-एक करके बींध डाला और अश्वत्थामा के साठ बाण खाकर भी मैनाक-सा अचल रहा। उसने कोसलराज बृहद्बल को मार गिराया, जिससे दस हज़ार राजा भाग खड़े हुए, और शल्य, दुःशासन-पुत्र तथा कर्ण को भी व्यथित कर दिया। शत्रुओं को अब उसमें कोई छिद्र नहीं दीख रहा था।

द्रोण की मन्त्रणा, और छल का आरम्भ

शकुनि ने अभिमन्यु को तीन बाणों से बींधकर दुर्योधन से कहा, “हम सब मिलकर इसे पीसें, अन्यथा अकेले-अकेले लड़ते हुए यह हम सबको मार डालेगा। हे राजन्, द्रोण, कृप और अन्यों से मन्त्रणा करके इसके वध का उपाय सोचिए।” तब कर्ण ने द्रोण से कहा, “अभिमन्यु हम सबको पीस रहा है। हमें वह उपाय बताइए जिससे हम इसे मार सकें।”

यह सुनकर महाधनुर्धर द्रोण ने सबको सम्बोधित करके कहा, “क्या आपमें से किसी ने सावधानी से देखकर इस युवक में कोई छिद्र पाया? यह सब दिशाओं में घूम रहा है। क्या किसी ने आज इसमें तनिक भी कमी पकड़ी? देखिए इस नर-सिंह, इस अर्जुन-पुत्र के हाथ की फुर्ती और गति को। इसके रथ की राह में केवल वृत्त में खिंचा इसका धनुष ही दीखता है, इतनी शीघ्रता से यह बाण साधता और छोड़ता है। सच कहूँ, यह सुभद्रा-पुत्र मेरे प्राणों को व्यथित करके और बाणों से मुझे विमूढ़ करके भी मुझे प्रिय लग रहा है। मुझे युद्ध में गाण्डीवधारी और हाथ की इस फुर्ती वाले बालक में कोई अन्तर नहीं दीखता।”

कर्ण ने फिर कहा, “अभिमन्यु के बाणों से अत्यन्त व्यथित होकर भी मैं केवल इसलिए डटा हूँ कि योद्धा को डटना चाहिए। इसके बाण अग्नि के तेज वाले, भयंकर हैं, और मेरे हृदय को क्षीण कर रहे हैं।”

शिविर में वृद्ध राजपुरुष उंगली उठाकर युवा योद्धा से बात करता हुआ, पीछे रण में लड़ता अभिमन्यु

तब आचार्य ने धीरे से, मुस्कुराकर, कर्ण से वह बात कही जो इस कथा का गहरे-से-गहरा और भारी मोड़ बन गई, “अभिमन्यु युवा है, इसका पराक्रम महान् है, और इसका कवच अभेद्य है। इसके पिता को कवच धारण करने की विधि मैंने ही सिखाई थी, और यह भी वही पूरी विधा जानता है। किन्तु भली भाँति छोड़े गए बाणों से आप इसका धनुष, प्रत्यंचा, घोड़ों की रास, घोड़े और दोनों पार्ष्णि-सारथि काट सकते हैं। हे राधा-पुत्र, यदि समर्थ हों तो यही कीजिए। इसे युद्ध से विमुख करके तब इस पर प्रहार कीजिए। धनुष हाथ में रहते इसे देवता और असुर भी मिलकर नहीं जीत सकते। यदि चाहें, तो पहले इसे रथ से और धनुष से वंचित कीजिए।”

आचार्य के ये वचन सुनकर कर्ण ने, अभिमन्यु जब बड़ी फुर्ती से बाण चला रहा था, तभी अपने बाणों से उसका धनुष काट डाला। भोजवंशी कृतवर्मा ने उसके घोड़े मारे, और कृप ने दोनों पार्ष्णि-सारथि। धनुष से वंचित होते ही शेष महारथी उस पर बाणों की वर्षा करने लगे। उन छहों महारथियों ने, जब वेग ही सब कुछ था, उस रथहीन बालक को, जो अकेला लड़ रहा था, निर्दयता से बाणों से ढक दिया।

समझने की कुंजी (अवधारणा): यहाँ महाभारत की नैतिक जटिलता खुलकर सामने आती है। आचार्य द्रोण, जो स्वयं अभिमन्यु के पराक्रम की प्रशंसा कर रहे थे और जिसे “गाण्डीवधारी के समान” कह रहे थे, वही उपाय बताते हैं कि बालक का धनुष काटकर उसे युद्ध से विमुख किया जाए और फिर निःशस्त्र पर सब मिलकर टूट पड़ें। यह क्षत्रिय-धर्म के द्वन्द्वयुद्ध-नियमों का स्पष्ट उल्लंघन था, एक के विरुद्ध छह, और वह भी निःशस्त्र पर। कथा इसे छिपाती नहीं, स्वयं आकाश के प्राणी इसे “अधर्म” कहते हैं।

सार: शकुनि और कर्ण की विवशता पर द्रोण ने पहले बालक के अभेद्य कवच और अद्भुत हाथ की प्रशंसा की, फिर वही उपाय सुझाया कि उसका धनुष, घोड़े और सारथि काट डाले जाएँ। कर्ण ने धनुष काटा, कृतवर्मा ने घोड़े, कृप ने सारथि, और निःशस्त्र बालक पर छहों एक साथ टूट पड़े। यहीं से छल का खुला खेल शुरू होता है।

तलवार, रथचक्र और गदा, अन्तिम प्रहार

रथ छिन जाने पर तलवार और ढाल लेकर हवा में उछलकर लड़ता अभिमन्यु, चारों ओर घेरते शत्रु

धनुष और रथ से वंचित होकर भी अपने क्षत्रिय-धर्म पर दृष्टि रखते हुए सुन्दर अभिमन्यु ने तलवार और ढाल उठाई और आकाश में कूद पड़ा। महान् बल और फुर्ती दिखाते हुए, कौशिक आदि गतियों का प्रदर्शन करते हुए, वह आकाश में गरुड़ की भाँति विचरने लगा। “कहीं यह तलवार लिए हम पर न गिर पड़े”, यह सोचकर वे महाधनुर्धर ऊपर दृष्टि लगाए उसके छिद्र खोजते हुए बाण चलाते रहे। तब द्रोण ने एक तीखे बाण से अभिमन्यु की रत्नजटित तलवार की मूठ काट डाली, और कर्ण ने तीखे बाणों से उसकी उत्तम ढाल काट दी।

टूटे रथ का पहिया सिर के ऊपर उठाकर घेरे हुए घुड़सवार शत्रुओं से जूझता अभिमन्यु

तलवार और ढाल से वंचित होकर वह सकुशल अंगों से आकाश से भूमि पर उतर आया। फिर उसने एक रथचक्र उठा लिया और क्रोध में द्रोण पर झपटा। रथ-धूल से अपना शरीर ढके, उठी हुई भुजाओं में चक्र थामे, अभिमन्यु परम सुन्दर दीख रहा था, चक्रधारी वासुदेव का अनुकरण करता-सा। उसके घावों से बहते रक्त से उसके वस्त्र रँग गए थे, भौंहों पर बल पड़े थे, और सिंह-गर्जना करता वह उन राजाओं के बीच परम तेजस्वी दीख रहा था। विष्णु की बहन के उस आनन्द, उस अतिरथी (अतिरथ, वह योद्धा जो अकेला अनेकों से लड़ सके) को, वासुदेव के अस्त्रों से सजे दूसरे जनार्दन-से उस वीर को देवता भी देख न पाते थे।

रक्तरंजित अभिमन्यु एक हाथ से पहिया उठाए गर्जना करता हुआ, चारों ओर तलवारें लिए झपटते शत्रु

उसके हाथ में चक्र देखकर राजाओं ने चिन्ता में पड़कर उस चक्र को सौ टुकड़ों में काट डाला। तब उस वीर ने एक भारी गदा उठाई। धनुष, रथ, तलवार और चक्र से वंचित अभिमन्यु गदा लेकर अश्वत्थामा पर टूट पड़ा। धधकती बिजली-सी उठी गदा देखकर अश्वत्थामा शीघ्र रथ से कूद पड़ा और तीन लम्बी छलाँगें भरकर बच निकला। अभिमन्यु ने उस गदा से अश्वत्थामा के घोड़े और दोनों पार्ष्णि-सारथि मार डाले। बाणों से बिंधा वह स्वयं साही की भाँति दीख रहा था। फिर उसने सुबल-पुत्र कालिकेय को भूमि में दबा दिया, उसके सतहत्तर गन्धार अनुचरों, दस रथियों और दस विशाल हाथियों को मार डाला।

आगे बढ़कर उसने दुःशासन-पुत्र के रथ और घोड़ों को भूमि में दबा दिया। तब दुःशासन के उस पुत्र ने अपनी गदा उठाकर “ठहरिए, ठहरिए” कहते हुए अभिमन्यु पर धावा बोला। फिर वे दोनों चचेरे भाई, गदाएँ ताने, एक-दूसरे का वध करने को आतुर, प्राचीन काल के त्रिनेत्र महादेव और असुर अन्धक की भाँति परस्पर प्रहार करने लगे। दोनों एक-दूसरे की गदा के सिरों से चोट खाकर भूमि पर वैसे गिर पड़े जैसे इन्द्र के सम्मान में खड़े किए गए दो ध्वज उखड़कर गिरें।

गदा उठाए दुःशासन-पुत्र भूमि पर गिरे घायल अभिमन्यु पर अंतिम प्रहार करने को तत्पर, वृद्ध योद्धा देखते हुए

तब दुःशासन-पुत्र, जो कुरुओं का यश बढ़ाने वाला था, पहले उठ खड़ा हुआ, और जब अभिमन्यु उठने ही को था, तभी उसने गदा से बालक के सिर के मुकुट पर प्रहार कर दिया। उस प्रहार के वेग से, और पहले की थकान से, शत्रु-सेनाओं का वह संहारक सुभद्रा-पुत्र मूर्च्छित होकर भूमि पर गिर पड़ा। इस प्रकार, हे राजन्, अनेकों ने मिलकर उस एक का वध किया, उस एक का, जिसने सरोवर में कमल-नालों को मसलते हाथी की भाँति समस्त सेना को पीस डाला था।

भूमि पर मृत पड़ा वह अभिमन्यु शिकारियों के मारे वन-हाथी-सा दीख रहा था। जैसे पूरे वन को जलाकर ग्रीष्म में बुझी हुई अग्नि, जैसे पर्वत-शिखर चूर करके शान्त हुई आँधी, जैसे भरत-सेना को अपनी ताप से झुलसाकर पश्चिमी पर्वत पर पहुँचा सूर्य, जैसे राहु से ग्रसा चन्द्रमा, जैसे जलहीन समुद्र। आकाश में प्राणियों ने कहा, “हाय, अकेले लड़ते हुए यह वीर, द्रोण और कर्ण के नेतृत्व में छह महारथियों के हाथों मारा गया। हम मानते हैं, यह कर्म अधर्म ही था।”

समझने की कुंजी (संख्या): घेरने वाले महारथी “छह” गिनाए जाते हैं (द्रोण, कर्ण, कृप, अश्वत्थामा, बृहद्बल, कृतवर्मा), किन्तु अन्तिम प्राणघातक प्रहार सातवें योद्धा दुःशासन-पुत्र का था, जो पहले मारे गए लक्ष्मण से भिन्न था, जिसने निःशस्त्र, उठते हुए बालक के मुकुट पर गदा मारी। इसी से इस वध को “सात महारथियों का मिलकर घेरना” कहा जाता है, छह ने निःशस्त्र किया, सातवें ने अन्तिम चोट की।

सार: निःशस्त्र होकर भी अभिमन्यु ने क्रमशः तलवार-ढाल, फिर रथचक्र, फिर गदा से लड़ाई जारी रखी, और कालिकेय, गन्धार-अनुचर तथा हाथी-दल को मारता रहा। अन्ततः दुःशासन-पुत्र के साथ गदायुद्ध में दोनों गिरे, पर वह पहले उठा और उठते हुए निःशस्त्र बालक के मुकुट पर गदा मारकर उसका वध कर डाला। स्वयं आकाश के प्राणियों ने इस मिले-जुले प्रहार को अधर्म कहा।

सन्ध्या, और युधिष्ठिर का विलाप

उस वीर के मारे जाने पर भूमि तारों से भरे आकाश की भाँति चन्द्रमा-सहित दीखने लगी। सोने के पंखों वाले बाणों से बिछी, रक्त की तरंगों से ढकी, कुण्डलों और रंगबिरंगी पगड़ियों से सजे वीरों के सुन्दर शिरों से पटी वह भूमि भयंकर रूप धर बैठी। आपके योद्धा, एक श्रेष्ठ वीर को मारकर और स्वयं घायल होकर, सन्ध्या के समय रक्त से सने अपने शिविर की ओर लौट चले। दिन और रात के बीच का वह विचित्र क्षण आ गया। गीदड़ों की अमंगल हुँकारें सुनाई देने लगीं। सूर्य, कमल-केसर की पीली-लाल आभा लिए, पश्चिमी पर्वतों के निकट डूबने लगा।

रथ पर शंख फूंकता योद्धा, आकाश की छवि में चक्रव्यूह के घेरों में अकेला लड़ता अभिमन्यु

उस वीर सेनापति-कुमार के मारे जाने पर पाण्डव योद्धा रथ छोड़कर, कवच उतारकर, धनुष फेंककर युधिष्ठिर को घेरकर बैठ गए, उनके हृदय अभिमन्यु पर ही टिके थे। शोक से अभिभूत युधिष्ठिर विलाप करने लगे, “हाय, अभिमन्यु ने मेरा भला करने की इच्छा से द्रोण का रचा व्यूह भेदा। उससे टकराकर बड़े-बड़े धनुर्धर पीछे हट गए। उसने हमारे अडिग शत्रु दुःशासन को भी बाणों से मूर्च्छित करके भगा दिया। हाय, द्रोण-सेना के विशाल सागर को पार करके वह अन्ततः दुःशासन-पुत्र से टकराकर यम का अतिथि बन गया।

“अभिमन्यु के मारे जाने पर मैं अर्जुन की ओर, और अपने प्रिय पुत्र से वंचित सुभद्रा की ओर कैसे आँख उठाऊँगा? आज हृषीकेश और धनंजय से हम कौन-से निरर्थक, असंगत और अनुचित वचन कहेंगे? भले की इच्छा से, विजय की आशा में, यह महान् अनिष्ट मैंने ही सुभद्रा, केशव और अर्जुन के साथ किया है। लोभी अपने दोष नहीं देखता, लोभ मूढ़ता से उपजता है। मधु बटोरने वाले सामने का गड्ढा नहीं देखते, मैं भी उन्हीं-सा हूँ। जो अभी बालक ही था, जिसे अच्छे भोजन, वाहन, शय्या और आभूषणों के योग्य होना था, उसी को हमने युद्ध के अग्रभाग में खड़ा कर दिया।

“धनंजय उदार, बुद्धिमान्, विनम्र, क्षमाशील, सुन्दर, बलवान् और सत्य के प्रति समर्पित है, उसके पराक्रम की देवता भी प्रशंसा करते हैं। उसी अर्जुन के पुत्र की रक्षा हम आज न कर सके। पुत्र-वध से क्रुद्ध होकर पार्थ कौरवों का समूल नाश करेगा। और यह भी निश्चित है कि नीच बुद्धि वाला दुर्योधन, अपने कुल का यह संहार देखकर, शोक में अपने प्राण त्याग देगा। इन्द्र के पुत्र के इस अद्वितीय तेज और पराक्रम वाले पुत्र को रणभूमि में पड़ा देखकर मुझे न विजय में, न राज्य में, न अमरता में, और न देवताओं के साथ निवास में, तनिक भी सुख नहीं मिलता।”

तब महर्षि कृष्ण द्वैपायन व्यास वहाँ आए। उनका विधिवत् पूजन करके युधिष्ठिर ने भतीजे के शोक में डूबे हुए कहा कि अनेक महाधनुर्धरों के बीच, अधर्मी प्रवृत्ति के महारथियों से घिरकर, वह बालक मारा गया, और यह युद्ध अत्यन्त असमान था, यही उन्हें कचोटता है। व्यास ने उन्हें समझाया, “हे युधिष्ठिर, हे महाबुद्धिमान्, आप जैसे जन विपत्तियों में मूढ़ नहीं होते। यह वीर बालक अनेक शत्रुओं को मारकर स्वर्ग चढ़ गया। यह विधान अटल है, हे भारत, काल देवता, दानव और गन्धर्व, सबको ले जाता है।”

समझने की कुंजी (वंश एवं स्थान): “कृष्ण द्वैपायन व्यास” इस समस्त महाभारत के रचयिता ऋषि हैं, द्वीप पर जन्म लेने से “द्वैपायन”, श्याम वर्ण से “कृष्ण”। वे पाण्डु और धृतराष्ट्र के जन्मदाता और इस कुल के पितामह-तुल्य हैं, अतः शोक के क्षणों में मार्गदर्शन देने स्वयं आते हैं। यह वही भूमि “समन्तपंचक” कहलाती है, जो कुरुक्षेत्र का ही प्राचीन नाम है।

सार: सन्ध्या में रक्तरंजित कौरव अपने शिविर लौटे, और पाण्डव-शिविर में युधिष्ठिर अपराध-बोध से भर गए कि उन्होंने ही बालक को असमान युद्ध के मुख में धकेला। उन्होंने स्वीकार किया कि अब अर्जुन और सुभद्रा से कैसे आँख मिलाएँगे, और भविष्यवाणी की कि क्रुद्ध अर्जुन कौरवों का नाश कर देगा। व्यास ने आकर समझाया कि काल अटल है और वीर बालक स्वर्ग चढ़ गया।

युधिष्ठिर का विलाप और व्यास का आगमन

उस वीर, उस रथ-दल के नायक सुभद्रा-पुत्र के वध के पश्चात्, पाण्डव-वीर अपने रथ छोड़कर, कवच उतारकर और धनुष फेंककर, राजा युधिष्ठिर को घेरकर बैठ गए। उनके हृदय मृत अभिमन्यु पर टिके थे और वे शोक में डूबे थे। अपने वीर भतीजे, उस महारथी अभिमन्यु के गिरने पर, शोक से अभिभूत राजा युधिष्ठिर विलाप करने लगे:

नीले वस्त्र से ढके अभिमन्यु के पार्थिव शरीर के चारों ओर शोक में डूबे योद्धा मौन खड़े

“हाय! अभिमन्यु ने मेरे हित की कामना से द्रोण की रचना भेदी, जो उनके सैनिकों से भरी थी। युद्ध में उससे भिड़कर महान् पराक्रमी, अस्त्र-निपुण और दुर्जेय धनुर्धर भी परास्त होकर लौटे। हमारे कट्टर शत्रु दुःशासन को उसने बाणों से मूर्च्छित करके युद्ध से भगा दिया। हाय, अर्जुन का वह वीर पुत्र, द्रोण की सेना-सागर को पार करके, अन्ततः दुःशासन-पुत्र से भिड़कर यम का अतिथि बन गया।

अभिमन्यु के मारे जाने पर मैं अर्जुन और सुभद्रा की ओर कैसे दृष्टि उठाऊँगा, जो अपने प्रिय पुत्र से वंचित हो गई? हृषीकेश और धनंजय से हम कौन-से निरर्थक, असंगत और अनुचित वचन कहेंगे! कल्याण की कामना और विजय की आशा में, यह महान् अनिष्ट मैंने ही सुभद्रा, केशव और अर्जुन के प्रति किया है। लोभी अपने दोष नहीं देखता; लोभ मूढ़ता से जन्मता है। मधु-संग्रहकर्ता आगे आती खाई नहीं देखते, मैं भी उन्हीं के समान हूँ।

रक्त से भरी संध्या की रणभूमि में चित पड़ा युवा योद्धा, शवों के बीच चीत्कार करते भेड़िये

जो अभी बालक था, जिसे उत्तम भोजन, वाहन, शय्या और आभूषणों के योग्य होना चाहिए था, हाय, उसी को हमने युद्ध के मुख में खड़ा कर दिया। ऐसे महान् संकट में, युद्ध में अनभ्यस्त, कोमल अवस्था के बालक का भला कैसे होता? उत्तम जाति के घोड़े की भाँति, अपने स्वामी की आज्ञा को अस्वीकार करने के बजाय, उसने स्वयं को बलिदान कर दिया।

हाय, क्रोध में भरे अर्जुन की शोक-भरी दृष्टि से दग्ध होकर आज हम भी नंगी धरती पर पड़े होंगे। धनंजय उदार, बुद्धिमान, विनम्र, क्षमाशील, सुन्दर, बलवान, सुगठित अंगों वाला, गुरुजनों के प्रति आदरशील, वीर, प्रिय और सत्य-परायण है; देवता भी उसके यशस्वी कर्मों की प्रशंसा करते हैं। उसी वीर ने निवातकवचों और कालकेयों का, इन्द्र के उन शत्रुओं का, जो हिरण्यपुर में रहते थे, संहार किया था। पलक झपकते उसने अनुयायियों सहित पौलोमों को मार डाला था। ऐसे महाबली के पुत्र की भी हम आज संकट से रक्षा न कर सके।

धृतराष्ट्र-पुत्रों पर महान् भय आ पड़ा है। पुत्र-वध से क्रुद्ध पार्थ कौरवों का समूल नाश करेगा। यह भी स्पष्ट है कि नीच-बुद्धि दुर्योधन, जिसके मन्त्री भी नीच हैं, अपने ही कुल और पक्ष का विनाशक, इस कौरव-सेना के संहार को देखकर शोक में अपने प्राण त्याग देगा। इन्द्र-पुत्र के इस अनुपम तेज और पराक्रमशाली पुत्र को रणभूमि में पड़ा देखकर न विजय, न राज्य, न अमरत्व, न देवताओं के साथ निवास, कोई भी वस्तु मुझे तनिक भी प्रसन्न नहीं करती।”

समझने की कुंजी (युधिष्ठिर का आत्म-दोष): ध्यान दीजिए, धर्मराज इस त्रासदी का दोष किसी और पर नहीं, स्वयं अपने ऊपर लेते हैं, “यह महान् अनिष्ट मैंने ही किया है।” वे अपने भीतर के लोभ (विजय की कामना) को मधु-संग्रहकर्ता की उपमा से उघाड़ते हैं, जो आगे की खाई नहीं देखता। महाभारत अपने परम धार्मिक पात्र को भी निर्दोष नहीं दिखाता; यहाँ युधिष्ठिर का धर्म उनकी आत्म-स्वीकृति में है, किसी निर्दोषता में नहीं।

जब कुन्ती-पुत्र युधिष्ठिर इस प्रकार विलाप कर रहे थे, तभी महर्षि कृष्ण द्वैपायन (व्यास) उनके पास आए। उनका विधिवत् पूजन करके और उन्हें आसन पर बैठाकर, भतीजे की मृत्यु के शोक से व्याकुल युधिष्ठिर ने कहा:

“हाय! अनेक महाधनुर्धरों से युद्ध करते हुए, अधर्मी प्रवृत्ति के कई महारथियों से घिरकर, सुभद्रा-पुत्र रणभूमि में मारा गया। वह वीरों का संहारक, सुभद्रा-पुत्र, अवस्था में बालक और बाल-बुद्धि का था। उसने विषम परिस्थितियों के विरुद्ध युद्ध किया। मैंने ही उससे कहा था कि हमारे लिए युद्ध में मार्ग खोल दे। वह शत्रु-सेना में घुस गया, पर सिन्धुराज द्वारा रोके जाने के कारण हम उसका अनुसरण न कर सके।

हाय, जो युद्ध को व्यवसाय मानते हैं, वे सदा अपने ही समान परिस्थिति वाले प्रतिद्वन्द्वियों से लड़ते हैं। पर शत्रुओं ने अभिमन्यु से जो युद्ध किया, वह अत्यन्त विषम था। यही मुझे गहरा शोक देता है और मेरे नेत्रों से अश्रु बहाता है। इसी का स्मरण करके मुझे मन की शान्ति नहीं मिलती।”

सार: अभिमन्यु के वध के पश्चात् पाण्डव शोक में युधिष्ठिर को घेरकर बैठ गए। धर्मराज ने इस त्रासदी का दोष स्वयं अपने ऊपर लिया, यह स्वीकार करते हुए कि उन्होंने ही बालक को विषम युद्ध में भेजा। तभी महर्षि व्यास उनके पास आए, और युधिष्ठिर ने उस अन्यायपूर्ण, असमान युद्ध की पीड़ा उनके सम्मुख रखी, जिसने उनके मन की शान्ति हर ली थी।

मूल: महाभारत (कृष्णद्वैपायन व्यास), द्रोण पर्व, अभिमन्युवध उपपर्व, अध्याय 34-49; पाठान्तर में गीता प्रेस का क्रम रखा गया है।

आधार: महाभारत, वेदव्यास (गीता प्रेस, गोरखपुर)