गंगापुत्र भीष्म शरों की उस शय्या पर लेट गए तो कुरुक्षेत्र की हवा ही बदल गई। दस दिन तक जिस वृद्ध ने कौरव सेना को अपनी बाँहों पर उठा रखा था, वही अब बाणों के बिछौने पर पड़ा था, मानो आँधियों ने किसी विशाल समुद्र को सोख लिया हो, मानो आकाश से तारे झड़ गए हों, मानो फ़सल झुलस गई हो और खेत सूना रह गया हो। धृतराष्ट्र के पुत्रों की विजय की आशा उनके कवचों और मन की शान्ति के साथ ही उतर गई। संजय हस्तिनापुर लौटकर अन्धे राजा के सामने बैठे, और जो कुछ रणभूमि पर घटा, उसे क्रम से सुनाने लगे। इसी कथा-धारा में हम आपको ले चलते हैं उस मोड़ तक जहाँ आचार्य द्रोण कौरवों के सेनापति बने, जहाँ उन्होंने युधिष्ठिर को जीवित पकड़कर लाने का वचन दिया, और जहाँ संशप्तक (मरने या मारने की शपथ लेने वाले योद्धा) अर्जुन को रणभूमि के दूर छोर पर खींच ले गए।
भीष्म के गिरने पर बिखरी हुई कौरव सेना

जनमेजय ने व्यास के शिष्य वैशम्पायन से पूछा कि शिखण्डी के हाथों पिता देवव्रत के मारे जाने का समाचार सुनकर, आँखें आँसुओं से भीगे राजा धृतराष्ट्र ने क्या किया। वैशम्पायन ने कहा कि पिता के पतन की बात सुनकर कुरुवंशी राजा चिन्ता और शोक से भर उठे, और उन्हें कहीं चैन न मिला। उसी रात संजय शिविर से नगर लौटे, और राजा ने उनसे विलाप करते हुए पूछा कि देवव्रत के गिर जाने के बाद, नियति से प्रेरित होकर कौरवों ने आगे क्या किया।
संजय ने कहा कि भीष्म जब मारे गए तो दोनों ओर के योद्धा अपने-अपने मन में विचार करने लगे। क्षत्रिय-धर्म पर मनन करते हुए वे विस्मय और हर्ष से भर उठे, और उस महान योद्धा को सिर झुकाकर प्रणाम किया। उन्होंने भीष्म के लिए सीधे बाणों का तकिया रखकर एक शय्या बनाई, और उनकी रक्षा का प्रबन्ध करके आपस में मधुर वचन कहे। फिर गंगापुत्र से विदा लेकर, उनकी परिक्रमा करके, क्रोध से लाल आँखों से एक-दूसरे को देखते हुए वे फिर युद्ध के लिए आमने-सामने आ खड़े हुए। नगाड़ों और तुरहियों के घोष से दोनों दलों की सेनाएँ निकल पड़ीं।
परन्तु देवव्रत से रहित कुरुसेना ऐसी लग रही थी जैसे हिंसक पशुओं से भरे वन में चरवाहे के बिना भेड़-बकरियों का झुण्ड। गंगापुत्र के गिर जाने पर भारत-सेना सागर के सीने पर डगमगाती हुई एक दुर्बल नौका जैसी हो गई, जिसे चारों ओर से चलती आँधी झकझोर रही हो। पाण्डवों के अचूक और प्रबल आघातों से कौरव-सेना, अपने घोड़ों, रथियों और हाथियों समेत, अत्यन्त व्याकुल, असहाय और भयभीत हो उठी। डरे हुए राजा और सामान्य सैनिक एक-दूसरे पर भरोसा खोकर मानो पाताल में धँसते जा रहे थे।
समझने की कुंजी (वंश): भीष्म को गंगापुत्र, देवव्रत, शान्तनुनन्दन, और ‘भारतों का पितामह’ इन सभी नामों से पुकारा जाता है। वे शान्तनु और गंगा के पुत्र थे, और कौरव तथा पाण्डव दोनों के परदादा की पीढ़ी के पूज्य पुरुष थे।

तब कौरवों को कर्ण की स्मृति आई, जो उनके विचार में देवव्रत के ही समान थे। सबके मन उस अस्त्र-विद्या के परम ज्ञाता की ओर मुड़ गए, जैसे संकट में पड़े मनुष्य का मन किसी रक्षा करने में समर्थ मित्र की ओर मुड़ता है। राजा लोग पुकार उठे, “कर्ण! कर्ण! राधा का पुत्र, हमारा मित्र, सूत-कुल का वह वीर जो युद्ध में सदा प्राण देने को तैयार रहता है! उसने इन दस दिनों तक युद्ध नहीं किया। उसे शीघ्र बुलाइए!”
एक उप-कथा: कर्ण के युद्ध से दूर रहने का कारण पुराना था। जब वीरों की गिनती हुई थी, तब भीष्म ने कर्ण को ‘अर्धरथी’ की श्रेणी में रख दिया था, यद्यपि वह दो महारथियों के बराबर माना जाता था। इस अपमान से जली बात पर कर्ण ने गंगापुत्र से कह दिया था कि जब तक आप जीवित हैं, हम युद्ध नहीं करेंगे। यदि आप पाण्डवों को मार दें तो हम दुर्योधन की अनुमति से वन चले जाएँगे, और यदि आप पाण्डवों के हाथों मारे जाकर स्वर्ग पहुँचें, तो हम अकेले अपने रथ पर चढ़कर उन सबको मार डालेंगे जिन्हें आप महारथी मानते हैं। यही प्रतिज्ञा करके वह पहले दस दिन रणभूमि से दूर रहा था।
सार: भीष्म के बाणशय्या पर गिरते ही कौरव सेना का मनोबल टूट गया, और संकट में पड़े योद्धाओं ने कर्ण को स्मरण किया, जो भीष्म के जीवित रहते अपनी प्रतिज्ञा के कारण युद्ध से दूर रहे थे।
कर्ण का रणभूमि में आना और शोक-संवाद
भीष्म के मारे जाने का समाचार पाकर सूतपुत्र अधिरथनन्दन कर्ण, बड़े भाई की भाँति, उस डूबती हुई कौरव-सेना को संकट से उबारने के लिए शीघ्र रणभूमि में आ पहुँचे। सैनिकों को सम्बोधित करते हुए उन्होंने कहा, “जिन भीष्म में धैर्य, बुद्धि, पराक्रम, सत्य, आत्मसंयम और वीर के सब गुण थे, जिनमें दिव्य अस्त्र, विनम्रता, मधुर वाणी और निर्द्वेषता चन्द्रमा में लक्ष्मी की तरह स्थिर थी, उन शत्रुहन्ता भीष्म ने जब शान्ति पा ली, तो हम अन्य सब वीरों को पहले से ही मरा हुआ मानते हैं। इस संसार में कोई वस्तु अविनाशी नहीं। जब उच्च व्रत वाले भीष्म ही मारे गए, तो कौन निश्चय से कह सकता है कि कल का सूर्य उदित होगा?”
ये वचन सुनकर धृतराष्ट्र के पुत्र और सैनिक ज़ोर से विलाप करने लगे और शोक के आँसू बहाने लगे। फिर जब दारुण युद्ध पुनः आरम्भ हुआ, तो कर्ण ने महारथियों को सम्बोधित कर ऐसी बातें कहीं जिनसे उन्हें बड़ा हर्ष हुआ, “इस क्षणभंगुर संसार में सब कुछ मृत्यु के मुख की ओर बहता जाता है। जब आप सब उपस्थित थे, तब भी पर्वत के समान अचल भीष्म रथ से कैसे गिरा दिए गए? अब हम ही, जैसे उन उच्च-आत्मा ने किया था, इस असहाय कुरुसेना की रक्षा करेंगे। यह भार अब हम पर आ पड़े। युधिष्ठिर धैर्य, बुद्धि, धर्म और बल से युक्त हैं; वृकोदर सौ हाथियों के समान बलवान हैं; और अर्जुन युवा तथा देवराज के पुत्र हैं। उनकी सेना देवताओं द्वारा भी सहज नहीं जीती जा सकती। तथापि आज हम शत्रु के बल का प्रतिरोध करेंगे।”

फिर कर्ण ने अपना कवच, शिरस्त्राण, धनुष और बाण मँगवाए, सोलह तरकश रथ पर बँधवाए, और स्वर्णजड़ित शंख, गदा, ध्वज तथा वायु-वेग के समान तेज़ घोड़े तैयार करने का आदेश दिया। वह स्वर्ण से सजे उत्तम रथ पर सवार होकर, अग्नि के समान तेजस्वी होकर, विजय के लिए रणभूमि की ओर चल पड़ा। कुरुयोद्धाओं ने उसका वैसे ही सत्कार किया जैसे देवता इन्द्र का करते हैं।
सार: कर्ण ने डूबती कौरव-सेना की रक्षा का भार स्वयं उठाने का संकल्प लिया और पूरी साज-सज्जा के साथ रणभूमि की ओर प्रस्थान किया।
बाणशय्या पर भीष्म और कर्ण का मिलन

रणभूमि में जाकर कर्ण ने पितामह भीष्म को बाणों की शय्या पर लेटे देखा, मानो मेरु पर्वत धरती पर गिरा पड़ा हो, मानो आकाश से सूर्य उतर आया हो। यह देखकर वह अत्यन्त शोक से भरकर रथ से उतर पड़ा, और आँखों में आँसू लिए पैदल ही उनके पास गया। हाथ जोड़कर, श्रद्धा से उन्हें प्रणाम करके उसने कहा, “हम कर्ण हैं! आपका कल्याण हो। आँखें खोलकर हमें देखिए और हमसे पवित्र, मंगलमय वचन कहिए। आज से, हे भारत-श्रेष्ठ, क्रोध से भरे पाण्डव कुरुओं को वैसे ही मारेंगे जैसे बाघ हिरनों को। हे वीर, आपके बिना ये राजा अर्जुन के कपिध्वज रथ की गड़गड़ाहट तक न सह सकेंगे। आपकी अनुमति से हम उस पराक्रमी पाण्डुपुत्र को अपने अस्त्रों के बल से मारने में समर्थ हैं।”
तब वृद्ध कुरु-पितामह ने प्रसन्न हृदय से, देश-काल के अनुकूल वचन कहे, “जैसे समुद्र नदियों का, जैसे सूर्य सब ज्योतियों का आश्रय है, वैसे ही आप अपने सम्बन्धियों और मित्रों के आश्रय बनिए। आपने दुर्योधन का प्रिय करने के लिए राजपुर जाकर काम्बोजों को, और गिरिव्रज में नग्नजित आदि अनेक राजाओं को, तथा अम्बष्ठों, विदेहों, गन्धर्वों, किरातों, कलिंगों और बाह्लीकों को जीता है। हे कर्ण, हम मंगल-वचनों से आपको आदेश देते हैं, जाकर शत्रु से युद्ध कीजिए और दुर्योधन को विजय दिलाइए। आप हमारे लिए वैसे ही पौत्र हैं जैसे दुर्योधन। सज्जनों का सज्जनों के साथ सम्बन्ध, बुद्धिमान कहते हैं, एक ही गर्भ से जन्मे सम्बन्ध से बढ़कर होता है।”

भीष्म के इन वचनों से इस संवाद में महाभारत की वह गूढ़ नैतिक परत खुलती है। भीष्म जानते थे कि कर्ण वस्तुतः कुन्ती का ही पुत्र, पाण्डवों का बड़ा भाई है, इसीलिए उसे ‘अपना पौत्र’ कहकर वे उस छिपे सत्य की ओर संकेत करते हैं। कर्ण ने भीष्म के चरणों को श्रद्धापूर्वक प्रणाम किया और जहाँ सब कौरव धनुर्धर खड़े थे, वहाँ चला गया।
सार: भीष्म ने कर्ण को आशीर्वाद देकर कौरव-सेना की रक्षा का भार सौंपा, और उसे ‘अपना पौत्र’ कहकर उसके वास्तविक कुल का सूक्ष्म संकेत दिया।
सेनापति का चुनाव: कर्ण का परामर्श

कर्ण को रथ पर देखकर दुर्योधन प्रसन्न होकर बोला, “यह सेना अब, मेरे विचार में, एक योग्य रक्षक पा गई। फिर भी, जो उचित और हमारी शक्ति के भीतर हो, उसका निर्णय अभी हो जाए।” कर्ण ने कहा, “हे नरश्रेष्ठ, आप ही कहिए, क्योंकि आप राजाओं में बुद्धिमान हैं। जिसका काम होता है, वही उसे भली-भाँति देखता है।”
दुर्योधन बोला, “भीष्म हमारे सेनापति थे; उन्होंने दस दिन धर्मयुद्ध से हमारी रक्षा की, और कठिनतम कार्य किए। अब जब वे स्वर्ग जा रहे हैं, तो उनके पश्चात किसे आप हमारा सेनापति बनाने योग्य मानते हैं? नायक के बिना सेना युद्ध में क्षण भर भी नहीं ठहर सकती, जैसे जल में कर्णधार के बिना नौका। आप हमारी सेना के समस्त महात्मा योद्धाओं में देखकर ऐसा उपयुक्त नायक खोजिए जो शान्तनुनन्दन का स्थान ले सके।”

कर्ण ने कहा, “ये सभी महात्मा पुरुष हैं, हर एक नायक होने योग्य है। पर सब एक साथ नायक नहीं हो सकते। केवल एक चुना जाना चाहिए, जिसमें विशेष गुण हों। ये सब एक-दूसरे को समान मानते हैं; यदि किसी एक का सम्मान हुआ, तो दूसरे असन्तुष्ट होकर आपके हित के लिए युद्ध न करेंगे। परन्तु ये द्रोण इन सब योद्धाओं के अस्त्र-गुरु हैं, वर्षों में पूज्य और आदरणीय। शुक्र अथवा बृहस्पति के समान, ब्रह्मज्ञ, अजेय द्रोण के रहते कौन नायक होने योग्य है? आपकी सेना में एक भी ऐसा राजा नहीं जो द्रोण के युद्ध में जाने पर उनका अनुसरण न करे। इसलिए, हे दुर्योधन, बिना विलम्ब इन्हीं को सेनापति बनाइए, जैसे देवताओं ने असुरों को जीतने के लिए कार्तिकेय को अपना सेनापति बनाया था।”
समझने की कुंजी (अवधारणा): ‘सेनापति’ का अर्थ सम्पूर्ण सेना का प्रधान सेनानायक है। महाभारत-युद्ध में क्रमशः भीष्म, द्रोण, कर्ण, शल्य और अश्वत्थामा सेनापति बने। द्रोण का सेनापतित्व कुल पाँच दिन (अध्याय की दृष्टि से ग्यारहवें से पन्द्रहवें दिन तक) रहा।
सार: कर्ण ने राजनीतिक समझ दिखाते हुए स्वयं नायक न बनकर अस्त्र-गुरु द्रोण को सेनापति बनाने का परामर्श दिया, ताकि अन्य योद्धा असन्तुष्ट न हों।
द्रोणाचार्य का अभिषेक और सेनापति-पद

कर्ण के वचन सुनकर दुर्योधन ने सेना के बीच खड़े द्रोण से कहा, “हे ब्राह्मण-श्रेष्ठ, आपके जन्म की श्रेष्ठता, कुल की उच्चता, विद्या, आयु, बुद्धि, पराक्रम, कौशल, अजेयता, नीति, आत्मविजय, तप और कृतज्ञता के कारण, इन राजाओं में कोई आपके समान नायक नहीं। जैसे रुद्रों में कपाली, वसुओं में पावक, यक्षों में कुबेर, मरुतों में वासव, ब्राह्मणों में वसिष्ठ, ज्योतियों में सूर्य, पितरों में यम, और जल-जीवों में वरुण श्रेष्ठ हैं, वैसे ही आप सब सेनानायकों में श्रेष्ठ हैं। इन ग्यारह अक्षौहिणी सेनाओं को अपने आदेश में लीजिए, और इन्द्र के दानवों को मारने की भाँति हमारे शत्रुओं को मारिए। आप हमारे सेनापति बनें तो, हे नरश्रेष्ठ, मैं युधिष्ठिर को उसके सब अनुयायियों और सम्बन्धियों समेत युद्ध में जीत लूँगा।”
यह सुनकर सब राजाओं ने द्रोण की जय-जयकार की और सिंह-गर्जना से आपके पुत्र को प्रसन्न किया। तब द्रोण बोले, “मैं छह अंगों समेत वेद जानता हूँ, मनुष्य-व्यवहार का शास्त्र भी जानता हूँ, और शैव अस्त्र तथा अनेक प्रकार के शस्त्रों से परिचित हूँ। विजय के अभिलाषी आप लोगों ने मुझ पर जो गुण आरोपित किए हैं, उन्हें वास्तव में प्रकट करने का यत्न करते हुए मैं पाण्डवों से युद्ध करूँगा। परन्तु, हे राजन, मैं पृषत के पुत्र (धृष्टद्युम्न) को नहीं मार सकूँगा, क्योंकि वह मेरे ही वध के लिए उत्पन्न हुआ है। मैं पाण्डवों से युद्ध करूँगा और सोमकों को मारूँगा। रही पाण्डवों की बात, वे प्रसन्न हृदय से मुझसे युद्ध न करेंगे।”

द्रोण की इस स्वीकृति से जो नैतिक छाया गिरती है उसे ध्यान से सुनिए। आचार्य जानते हैं कि धृष्टद्युम्न ही उनका वधकर्ता बनेगा, फिर भी वे सेनापतित्व स्वीकार करते हैं; और पाण्डव, जो उनके अपने शिष्य रहे हैं, उनसे विवश होकर ही लड़ेंगे। तब दुर्योधन ने विधिपूर्वक द्रोण को सेना का अधिपति बनाया, जैसे प्राचीन काल में इन्द्र के नेतृत्व में देवताओं ने स्कन्द का अभिषेक किया था। नगाड़े बजे, शंख गूँजे, ब्राह्मणों ने मंगल-घोष और जयकार किए, और द्रोण का विधिवत सम्मान हुआ। कौरव योद्धा पाण्डवों को मानो पहले से ही जीता हुआ मानने लगे।
समझने की कुंजी (संख्या-आधुनिक-समतुल्य): एक अक्षौहिणी में परम्परा के अनुसार 21,870 रथ, उतने ही हाथी, 65,610 घोड़े और 1,09,350 पैदल सैनिक होते थे। ग्यारह अक्षौहिणी अर्थात लगभग चौबीस लाख से अधिक योद्धाओं की कौरव-सेना, जो आज की दृष्टि से कई आधुनिक सेनाओं को मिलाकर भी कहीं विशाल बैठती है।
एक उप-कथा: सेनापति बनते ही द्रोण ने सेना को शकट (छकड़े या गाड़ी के आकार) के व्यूह में सजाया। सिन्धुराज जयद्रथ, कलिंगराज और विकर्ण दाहिने पक्ष में रहे; कृप, कृतवर्मा, चित्रसेन और विविंशति दुःशासन के नेतृत्व में बाएँ पक्ष की रक्षा में लगे; और दुर्योधन तथा कर्ण को बीच में रखकर अनेक देशों के योद्धा पिछली पंक्ति बने। पाण्डवों ने अपनी सेना को क्रौंच (सारस) के आकार के व्यूह में सजाया, जिसके अग्रभाग में स्वयं वासुदेव और धनंजय कपिध्वज रथ पर खड़े थे।
सार: द्रोण ने सेनापतित्व स्वीकार किया, यह जानते हुए भी कि धृष्टद्युम्न उनका वधकर्ता है और पाण्डव उनके शिष्य हैं; विधिपूर्वक अभिषेक हुआ और सेना व्यूह-रचना में सजी।
द्रोण का प्रथम दिवस: रणभूमि पर प्रलय
द्रोण जब बड़े वेग से युद्ध को बढ़े, तो धरती मानो विलाप के स्वरों से काँप उठी। बादल न होते हुए भी आकाश से माँस, हड्डी और रक्त की वर्षा हुई; गीध, बाज और कौवे हज़ारों की संख्या में सेना पर गिरने लगे; गीदड़ चीख़ उठे, और अनेक भयानक उत्पात प्रकट हुए जो वीरों के संहार के सूचक थे। फिर दोनों सेनाओं के बीच ऐसा भीषण संग्राम छिड़ा कि उसका कोलाहल समूची धरती को भर देता प्रतीत हुआ।
तेज से देदीप्यमान द्रोण ने पाण्डव-सेना पर सैकड़ों तीखे बाण बखेरते हुए धावा बोला। आँधी से जैसे सारसों की पंक्तियाँ छिन्न-भिन्न हो जाएँ, वैसे ही पाण्डव और पांचाल टूटने लगे। द्रोण ने दिव्य अस्त्रों का आह्वान करके थोड़े ही समय में पांचालों समेत धृष्टद्युम्न को काँपने पर विवश कर दिया। पर पृषत के पराक्रमी पुत्र ने अपनी बाण-वर्षा से द्रोण की बाण-वर्षा को व्यर्थ करते हुए कुरुओं में बड़ा संहार किया। द्रोण ने फिर अपने योद्धाओं को संगठित करके पृषतपुत्र पर मेघ-समान बाण बरसाए, और अग्नि-चक्र की तरह पाण्डव-सेना में घूमते रहे।
यह देखकर युधिष्ठिर ने धृष्टद्युम्न और धनंजय से कहा, “कुम्भ से उत्पन्न द्रोण को रोका जाए, हमारे योद्धा सावधानी से चारों ओर से उन्हें घेर लें।” तब अर्जुन और पृषतपुत्र अपने अनुयायियों समेत द्रोण का सामना करने आए। केकय राजकुमार, भीमसेन, अभिमन्यु, घटोत्कच, युधिष्ठिर, नकुल-सहदेव, मत्स्यराज, द्रुपदपुत्र, द्रौपदी के पाँचों पुत्र, धृष्टकेतु, सात्यकि, युयुत्सु आदि अनेक योद्धा अपने-अपने कुल और पराक्रम के अनुरूप पराक्रम दिखाने लगे।

क्रोध से भरे द्रोण वृद्ध होते हुए भी युवा की भाँति रणभूमि में घूमते रहे, मानो साक्षात मृत्यु पाण्डु-पुत्रों के दलों के बीच विचर रही हो। उन्होंने आभूषणों से सजे शीश और भुजाएँ काट गिराईं, अनेक रथों के मंच सूने कर दिए, और सिंह-गर्जना की। उनके बाण हज़ारों की संख्या में दिशाओं को ढकते हुए हाथियों, घोड़ों, रथों और पैदलों पर गिरने लगे, और रणभूमि रक्त से कीचड़मय हो गई। उस समय द्रोण के बाणों के अतिरिक्त कुछ दिखाई न देता था; केवल उनके रथ का ध्वज बिजली की तरह चमकता दीखता था।
समझने की कुंजी (वंश): द्रोण को ‘कुम्भज’ या ‘कुम्भ से उत्पन्न’ और ‘भारद्वाजपुत्र’ कहा जाता है, क्योंकि कथा के अनुसार महर्षि भारद्वाज के तेज से एक कलश (द्रोण) में उनका जन्म हुआ था। ‘पृषतपुत्र’ अर्थात धृष्टद्युम्न, राजा द्रुपद का पुत्र, जो द्रोण-वध के लिए ही यज्ञ से उत्पन्न हुआ था।
सार: सेनापति बनते ही द्रोण ने प्रथम दिवस के संग्राम में अग्नि-चक्र की भाँति घूमते हुए पाण्डव-सेना में भारी संहार मचाया, यद्यपि धृष्टद्युम्न उनका सामना करता रहा।
द्रोण की रक्त-नदी और वीरों के द्वन्द्व
द्रोण ने रणभूमि में एक भयानक नदी-सी बहा दी, जैसी युग के अन्त में देखी जाती है। उस नदी का उद्गम द्रोण के क्रोध का वेग था; योद्धा उसकी लहरें थे, वीर उसके तट के वृक्ष, और बहता रक्त उसका जल। रथ उसके भँवर बने, हाथी-घोड़े उसके किनारे, कवच उसकी कुमुदिनियाँ, और कटे शीश तट पर बिखरे पत्थर। यह नदी हज़ारों महारथियों को यम के लोक में बहा ले गई; केवल अत्यन्त तेजस्वी ही उसे पार कर सकते थे, कायर नहीं।
इसी बीच अनेक द्वन्द्व छिड़ गए। सौ प्रकार की माया से भरे शकुनि ने सहदेव पर धावा बोला; सहदेव ने सौबल का धनुष और रथ काट डाला, और दोनों गदा लेकर रथविहीन होकर पर्वत-शिखरों की भाँति भिड़ गए। भीमसेन ने विविंशति को बाणों से बेधा। शल्य ने हँसते हुए अपने ही प्रिय भानजे नकुल को बाणों से बेधा, पर नकुल ने मामा के घोड़े, छत्र, ध्वज, सारथि और धनुष काटकर शंख फूँक दिया। धृष्टकेतु कृप से, सात्यकि कृतवर्मा से, द्रुपद भगदत्त से, और शिखण्डी सोमदत्त के पुत्र भूरिश्रवा से भिड़े। हिडिम्बा-पुत्र (घटोत्कच) और अलम्बुष नामक राक्षस माया से एक-दूसरे को जीतने को आतुर होकर अद्भुत युद्ध करने लगे।
सबमें विलक्षण द्वन्द्व अभिमन्यु का रहा। पौरव नामक योद्धा ने अभिमन्यु पर बाण-वर्षा की, पर सुभद्रापुत्र ने उसका ध्वज, छत्र और धनुष काट गिराया। जब अभिमन्यु ने पौरव के प्राण लेने वाला बाण चढ़ाया, तब हार्दिक्य के पुत्र कृतवर्मा ने दो बाणों से वह धनुष-बाण काट डाला। तब अभिमन्यु ढाल-तलवार लेकर ऐसे विचरा कि आक्रमण और रक्षा के अस्त्रों में भेद ही न रह गया। उसने पौरव के रथ पर कूदकर उसे केश से पकड़ लिया, उसके सारथि को लात मारकर गिराया, और तलवार से उसका ध्वज काट डाला; गरुड़ जैसे समुद्र की तह से साँप को उठाता है, वैसे ही उसने पौरव को उठा लिया।
तभी अभिमन्यु के पिता का शत्रु सिन्धुराज जयद्रथ यह सह न सका। वह मयूर-चिह्न वाली ढाल और तलवार लेकर रथ से कूद पड़ा। अभिमन्यु पौरव को छोड़कर बाज की तरह नीचे उतरा, और दोनों सिंह-समान तलवार-युद्ध में भिड़ गए। जब अभिमन्यु ने वार किया, तो जयद्रथ की तलवार उसकी स्वर्ण-मढ़ी ढाल में फँसकर टूट गई, और सिन्धुराज छह पग पीछे हटकर पलक झपकते अपने रथ पर जा चढ़ा। फिर शल्य ने अभिमन्यु पर लोहे का दहकता-सा भाला फेंका; अभिमन्यु ने उसे गरुड़ की भाँति बीच में ही पकड़कर, उसी भाले से शल्य के सारथि को मारकर गिरा दिया। विराट, द्रुपद, धृष्टकेतु, युधिष्ठिर, सात्यकि, भीम, धृष्टद्युम्न, शिखण्डी, नकुल-सहदेव और द्रौपदी के पुत्र सब “वाह! वाह!” पुकार उठे।
फिर भीम और शल्य का गदा-युद्ध छिड़ा। दोनों बैलों की तरह गरजते, वृत्तों में घूमते भिड़े। उनकी गदाएँ टकराकर अग्नि की चिनगारियाँ छोड़तीं, फुफकारती नागिनों-सी जान पड़तीं। अन्ततः एक-दूसरे के वेग से आहत होकर दोनों इन्द्रध्वज-समान एक ही क्षण में धरती पर गिर पड़े। कृतवर्मा शल्य को मूर्च्छित अवस्था में अपने रथ पर बैठाकर रणभूमि से ले गया, और भीम पलक झपकते ही गदा लिए उठ खड़ा हुआ। मद्रराज को युद्ध से मुड़ता देख आपके पुत्र काँप उठे, और पाण्डवों ने हर्ष से सिंह-गर्जना की।
सार: द्रोण के संहार के बीच अनेक द्वन्द्व छिड़े; अभिमन्यु ने पौरव, जयद्रथ और शल्य के सामने असाधारण पराक्रम दिखाया, और भीम-शल्य के गदा-युद्ध में दोनों एक साथ धराशायी हुए।
वृषसेन का पराक्रम और दिवस की समाप्ति
अपनी सेना को टूटता देख कर्ण के पुत्र वीर वृषसेन ने अकेले ही उसकी रक्षा का भार उठाया और अस्त्रों की माया दिखाते हुए हज़ारों बाण बखेरे, जो ग्रीष्म के सूर्य की किरणों की भाँति दिशाओं में फैल गए। नकुल के पुत्र शतानीक ने उस पर दस मर्मभेदी बाण चलाए, पर कर्ण-पुत्र ने उसका धनुष और ध्वज काट डाला। तब द्रौपदी के अन्य पुत्र अपने भाई की रक्षा को दौड़े और बाण-वर्षा से कर्ण-पुत्र को ढक दिया। उन्हें बचाने अश्वत्थामा के नेतृत्व में अनेक रथी आए, और घोर युद्ध छिड़ गया।
तब युधिष्ठिर की सेना ने समुद्र-गर्जना-समान कोलाहल करते हुए आपकी सेना का संहार आरम्भ किया। यह देखकर द्रोण ने पुकारा, “हे वीरो, मत भागो!” और चार दाँत वाले हाथी-समान क्रोधित होकर पाण्डव-सेना में घुसकर सीधे युधिष्ठिर पर धावा बोला। युधिष्ठिर ने उन्हें बाणों से बेधा, पर द्रोण ने उनका धनुष काटकर वेग से उन पर आक्रमण किया। तब युधिष्ठिर के रथ-पहियों के रक्षक पांचाल-राजकुमार कुमार ने द्रोण को रोका, पर द्रोण ने उस वीर को मार डाला।
द्रोण ने शिखण्डी, उत्तमौजा, नकुल, सहदेव, युधिष्ठिर, द्रौपदी के पुत्रों, सात्यकि और मत्स्यराज को बाणों से बेधते हुए युधिष्ठिर को पकड़ने के लिए उन्हीं की ओर बढ़े। युगन्धर ने मार्ग रोका, पर द्रोण ने उसे चौड़े फल वाले बाण से गिरा दिया। फिर विराट, द्रुपद, कैकेय राजकुमार, सात्यकि, शिवि, व्याघ्रदत्त और सिंहसेन युधिष्ठिर को बचाने द्रोण को घेरकर अनगिनत बाण बरसाने लगे, पर द्रोण ने व्याघ्रदत्त और सिंहसेन के कुण्डल-सजे शीश काट गिराए और युधिष्ठिर के रथ के सामने साक्षात मृत्यु की भाँति आ खड़े हुए।
तब युधिष्ठिर की सेना में हाहाकार मच गया, “राजा पकड़े गए!” योद्धा कहने लगे, “आज द्रोण युधिष्ठिर को पकड़कर दुर्योधन के पास ले जाएँगे।” ठीक उसी क्षण कुन्तीपुत्र अर्जुन रथ की गड़गड़ाहट से आकाश भरते हुए वहाँ आ पहुँचे, और संहार से ऐसी रक्त-नदी बहाते हुए कुरुओं को तितर-बितर कर दिया। उन्होंने द्रोण के दलों को बाणों के सघन जाल से ढक दिया, और देखते-ही-देखते न दिशाएँ दिखीं, न आकाश, न धरती, केवल बाणों का घना अन्धकार रह गया। तभी सूर्य भी धूल के बादल में डूबकर अस्त हो गया। न मित्र पहचाना जाता था, न शत्रु; अतः द्रोण, दुर्योधन और अर्जुन तीनों ने अपनी-अपनी सेनाएँ लौटा लीं। विजयी अर्जुन सब सेनाओं के पीछे, केशव को साथ लिए, अपने शिविर लौटे।
सार: द्रोण युधिष्ठिर को पकड़ने के निकट पहुँच गए थे, पर ठीक समय पर अर्जुन के आ जाने और सूर्यास्त ने उस प्रयास को विफल कर दिया।
दुर्योधन का वर और युधिष्ठिर को जीवित पकड़ने की प्रतिज्ञा

सेनापतित्व पाने के बाद द्रोण ने आपके पुत्र से सब सेना के बीच कहा था, “हे राजन, जैसे आपने मुझे गंगापुत्र के तुरन्त बाद सेनापति-पद से सम्मानित किया है, उसका समुचित फल लीजिए। बताइए, मैं आपका कौन-सा कार्य सिद्ध करूँ? आप जो वर चाहें, माँगिए।” तब दुर्योधन ने कर्ण, दुःशासन आदि से परामर्श करके आचार्य से कहा, “यदि आप मुझे वर देना चाहते हैं, तो रथियों में श्रेष्ठ उस युधिष्ठिर को जीवित पकड़कर यहाँ मेरे पास ले आइए।”
यह सुनकर द्रोण ने उत्तर दिया, जिससे सब सैनिक हर्षित हुए, “कुन्तीपुत्र को साधुवाद, जिसे आप केवल पकड़ना चाहते हैं, मारना नहीं। हे नरश्रेष्ठ, आप उसके वध का वर क्यों नहीं माँगते? यह बड़े आश्चर्य की बात है कि धर्मराज युधिष्ठिर का कोई शत्रु ऐसा नहीं जो उसकी मृत्यु चाहे। आप उसे जीवित चाहते हैं, तो या तो अपने वंश को विनाश से बचाना चाहते हैं, या पाण्डवों को जीतकर उन्हें राज्य देकर भ्रातृ-सम्बन्ध स्थापित करना चाहते हैं। सत्य ही उसे अजातशत्रु कहते हैं, क्योंकि आप तक उससे स्नेह रखते हैं।”

द्रोण के इन वचनों पर दुर्योधन के मन का भाव सहसा प्रकट हो गया, क्योंकि अपने मुख के भावों को बृहस्पति-जैसे भी नहीं छिपा पाते। दुर्योधन ने हर्ष से कहा, “हे आचार्य, कुन्तीपुत्र के वध से मेरी विजय नहीं हो सकती। यदि युधिष्ठिर मारे गए, तो पार्थ निःसन्देह हम सबको मार डालेगा; और उन सबको तो देवता भी नहीं मार सकते। उनमें जो बचेगा, वही हमारा उन्मूलन कर देगा। परन्तु युधिष्ठिर अपने वचन का सत्य-पालक है। यदि उसे जीवित यहाँ लाया जाए और पुनः जुए में जीत लिया जाए, तो पाण्डव फिर वन को चले जाएँगे, क्योंकि वे सब युधिष्ठिर के आज्ञाकारी हैं। ऐसी विजय चिरस्थायी होगी। इसीलिए मैं धर्मराज का वध किसी भी प्रकार नहीं चाहता।”
इस संवाद की नैतिक टेढ़ को छिपाए बिना रखना आवश्यक है। दुर्योधन की मंशा सीधी विजय नहीं, छल से युधिष्ठिर को पकड़कर, उसके सत्य-व्रत का लाभ उठाकर, फिर जुए में जीतकर पाण्डवों को वन भेजने की है। द्रोण, जो लाभ-शास्त्र के मर्मज्ञ थे, इस कुटिल अभिप्राय को भाँपकर क्षण भर विचार करके सीमित रूप में वर देते हैं।
एक उप-कथा: ‘अजातशत्रु’ का अर्थ है ‘जिसका कोई शत्रु जन्मा ही न हो’। युधिष्ठिर का यह नाम उनके स्वभाव की उस सरलता और धर्मनिष्ठा से जुड़ा है, जिसके कारण द्रोण कहते हैं कि स्वयं दुर्योधन तक उनसे भीतर-ही-भीतर स्नेह रखता है। महाभारत यहाँ शत्रु-मित्र की सीमाओं को सपाट नहीं करता; आचार्य का अपने शिष्यों के प्रति स्नेह और कर्तव्य का द्वन्द्व साथ-साथ चलता है।
सार: दुर्योधन ने वर माँगा कि युधिष्ठिर को मारा नहीं, जीवित पकड़ा जाए, ताकि उसे पुनः जुए में हराकर पाण्डवों को वन भेजा जा सके; द्रोण ने इस कुटिल अभिप्राय को समझ लिया।
द्रोण की शर्त: अर्जुन को हटाओ

द्रोण ने कहा, “यदि वीर अर्जुन युद्ध में युधिष्ठिर की रक्षा न करे, तो आप ज्येष्ठ पाण्डव को पहले ही अपने वश में आया हुआ समझें। रही पार्थ की बात, इन्द्र के नेतृत्व में देवता और असुर मिलकर भी युद्ध में उसके सामने नहीं ठहर सकते। इसीलिए मैं वह नहीं कर सकता जो आप कहते हैं। निःसन्देह अर्जुन मेरा शिष्य है, और मैं ही उसका प्रथम अस्त्र-गुरु था। पर वह युवा है, परम भाग्यवान है, और अपने उद्देश्य पर अत्यन्त एकाग्र है। उसने इन्द्र और रुद्र से अनेक अस्त्र पाए हैं, और आपके द्वारा वह क्रुद्ध भी किया गया है। अतः जिस किसी उपाय से हो, अर्जुन को युद्ध से हटाइए। पार्थ के हट जाने पर आप युधिष्ठिर को जीता हुआ समझिए। विजय उसके वध में नहीं, उसके बन्दी बनाए जाने में है। यदि वह क्षण भर भी मेरे सामने युद्ध में ठहरे, तो मैं उसे आज ही आपके वश में ला दूँगा; परन्तु यह तभी, जब धनंजय रणभूमि से दूर हो। पार्थ की उपस्थिति में युधिष्ठिर को इन्द्र-सहित देवता और असुर भी नहीं पकड़ सकते।”
इन सीमाओं के साथ द्रोण के वर देने पर आपके मूढ़ पुत्रों ने युधिष्ठिर को मानो पकड़ा हुआ ही मान लिया। दुर्योधन को द्रोण का पाण्डवों के प्रति पक्षपात ज्ञात था; अतः आचार्य को अपने वचन पर टिकाए रखने के लिए उसने यह मन्त्रणा सब सैनिकों में प्रकट कर दी, कि द्रोण ने ज्येष्ठ पाण्डव को पकड़ने की प्रतिज्ञा की है।
सार: द्रोण ने प्रतिज्ञा को इस शर्त से बाँध दिया कि पहले अर्जुन को युधिष्ठिर के पास से हटाना होगा; और दुर्योधन ने आचार्य को बाँधे रखने के लिए यह बात पूरी सेना में घोषित कर दी।
युधिष्ठिर की सावधानी और अर्जुन का वचन
धर्मराज युधिष्ठिर ने अपने गुप्तचरों से भारद्वाजपुत्र के अभिप्राय का सब विवरण शीघ्र जान लिया। तब उन्होंने अपने सब भाइयों और राजाओं को बुलाकर धनंजय से कहा, “हे नरश्रेष्ठ, आपने द्रोण का अभिप्राय सुना। ऐसे उपाय किए जाएँ कि वह उद्देश्य सिद्ध न हो। द्रोण ने सीमाओं के साथ प्रतिज्ञा की है, पर वे सीमाएँ आप पर ही टिकी हैं। अतः, हे महाबाहु, आज मेरे निकट रहकर युद्ध कीजिए, ताकि दुर्योधन को द्रोण से अपनी इच्छा की पूर्ति न मिले।”
अर्जुन ने कहा, “जैसे मेरे द्वारा अपने आचार्य का वध सम्भव नहीं, वैसे ही मैं आपको कभी छोड़ नहीं सकता। हे पाण्डुपुत्र, मैं अपने गुरु से लड़ने के बजाय युद्ध में प्राण देना श्रेयस्कर समझूँगा। आकाश तारों समेत गिर पड़े, धरती फट जाए, फिर भी जब तक मैं जीवित हूँ, द्रोण आपको कभी नहीं पकड़ सकेंगे। यदि स्वयं वज्रधारी इन्द्र अथवा देवताओं समेत विष्णु भी उनकी सहायता करें, तब भी वे सफल न होंगे। मेरी प्रतिज्ञा कभी अधूरी नहीं रहती; मुझे स्मरण नहीं कि मैंने कभी असत्य कहा हो, अथवा कभी पराजित हुआ होऊँ।”
तब पाण्डव शिविर में शंख, नगाड़े, झाँझ और छोटे ढोल बजने लगे, और महात्मा पाण्डवों ने अनेक सिंह-गर्जनाएँ कीं। उनके उत्तर में आपके दलों में भी वाद्य बजने लगे। दोनों ओर की सेनाएँ व्यूह-रचना में सजकर धीरे-धीरे एक-दूसरे की ओर बढ़ीं, और रोम खड़े कर देने वाला भीषण संग्राम छिड़ गया।
सार: युधिष्ठिर ने अर्जुन से अपने निकट रहने को कहा, और अर्जुन ने प्रतिज्ञा की कि जब तक वह जीवित है, द्रोण युधिष्ठिर को कभी नहीं पकड़ सकेंगे; इसी के साथ आचार्य का संकल्प और भी पुनः परीक्षा में पड़ता रहा।
द्रोण की लज्जा और संशप्तकों की प्रतिज्ञा
उस दिन के युद्ध में अर्जुन के युधिष्ठिर के पास डटे रहने से द्रोण का प्रयास विफल रहा। सेनाएँ अपने-अपने शिविर लौटीं, तो द्रोण ने मन में अत्यन्त खिन्न होकर लज्जा से दुर्योधन से कहा, “मैंने आपसे पहले ही कहा था कि जब तक धनंजय युधिष्ठिर के साथ है, उसे देवता भी युद्ध में नहीं पकड़ सकते। आप सबने मिलकर उस पर आक्रमण किया, फिर भी पार्थ ने आपके सब प्रयत्न व्यर्थ कर दिए। कृष्ण और पाण्डुपुत्र अजेय हैं, इसमें सन्देह न कीजिए। यदि किसी प्रकार श्वेत-अश्वों वाले अर्जुन को युधिष्ठिर के पास से हटाया जा सके, तो धर्मराज शीघ्र आपके वश में आ जाएँगे। कोई उसे युद्ध की चुनौती देकर रणभूमि के दूसरे छोर पर खींच ले जाए; कुन्तीपुत्र उसे जीते बिना नहीं लौटेगा। तब, जब अर्जुन समीप न होगा, मैं धृष्टद्युम्न के देखते-देखते पाण्डव-सेना में घुसकर धर्मराज को पकड़ लूँगा।”
द्रोण के ये वचन सुनकर त्रिगर्तराज ने अपने भाइयों के साथ कहा, “हे राजन, हम सदा गाण्डीवधारी से अपमानित होते आए हैं। हमने उसका कोई अनिष्ट नहीं किया, फिर भी उसने हमें सदा सताया है। उन सब अपमानों का स्मरण करके हम क्रोध से जलते हैं और रात में सो नहीं पाते। सौभाग्य से वह अब हमारे सामने अस्त्र-सहित आ खड़ा होगा। हम प्रतिज्ञा करते हैं: आज या तो धरती अर्जुन से रहित होगी, या त्रिगर्तों से। यह हमारी प्रतिज्ञा कभी मिथ्या न होगी। हम उसे रणभूमि से दूर ले जाकर मार डालेंगे।”

सत्यरथ, सत्यवर्मा, सत्यव्रत, सत्येषु और सत्यकर्मा, ये पाँच भाई दस हज़ार रथों के साथ आगे आए। मालव, तुण्डिकेर, प्रस्थल के राजा वीर सुशर्मा, मावेल्लक, ललित और मद्रक भी हज़ारों रथों समेत प्रतिज्ञा लेने आए। तब उन्होंने अग्नि प्रज्वलित की, कुश-घास के वस्त्र धारण किए, घी से स्नान किया, और धनुष की प्रत्यंचा को करधनी बनाकर कवच पहना। जिन वीरों ने ब्राह्मणों को सैकड़ों दान दिए थे, अनेक यज्ञ किए थे, पुत्रवान हुए थे, और जिन्हें अब इस संसार में कुछ शेष न रहा था, उन्होंने अग्नि के समक्ष प्राणियों के सुनते हुए ऊँचे स्वर में यह प्रतिज्ञा की कि यदि धनंजय को मारे बिना वे रणभूमि से लौटें, अथवा भयभीत होकर पीठ दिखाएँ, तो उन्हें वे ही अधोलोक मिलें जो महापापियों के लिए हैं; और यदि वे यह दुष्कर कार्य सिद्ध करें, तो उन्हें परम वांछित लोक प्राप्त हों।
समझने की कुंजी (अवधारणा): ‘संशप्तक’ वे योद्धा हैं जिन्होंने अग्नि के समक्ष यह शपथ ली कि वे या तो अपने लक्ष्य (अर्जुन) को मारकर ही लौटेंगे या स्वयं मरकर वीरगति पाएँगे; पीछे हटने का कोई विकल्प नहीं। ‘त्रिगर्त’ पंजाब के एक प्राचीन जनपद का नाम है, जिसके राजा सुशर्मा थे, जो अर्जुन से पुराने बैर के कारण इस शपथ के अगुआ बने।
सार: द्रोण की शर्त के अनुसार त्रिगर्तराज सुशर्मा के नेतृत्व में हज़ारों योद्धाओं ने अग्नि-साक्षी ‘मरो या मारो’ की संशप्तक-प्रतिज्ञा ली, ताकि अर्जुन को युधिष्ठिर से दूर खींचकर मार सकें।
अर्जुन का दक्षिण छोर की ओर खिंचना और संशप्तक-संग्राम

यह प्रतिज्ञा करके वे योद्धा अर्जुन को रणभूमि के दक्षिण भाग की ओर ललकारते हुए चल पड़े। उनसे चुनौती पाकर अर्जुन ने बिना विलम्ब युधिष्ठिर से कहा, “बुलाए जाने पर मैं कभी पीठ नहीं फेरता, यह मेरा अटल व्रत है। ये जीतने या मरने की शपथ लिए हुए लोग मुझे महायुद्ध को बुला रहे हैं। यह सुशर्मा अपने भाइयों समेत मुझे ललकार रहा है। मुझे इसके वध की अनुमति दीजिए; इस चुनौती को सहना मेरे लिए असम्भव है। सत्य कहता हूँ, इन शत्रुओं को युद्ध में मारा हुआ ही जानिए।”
युधिष्ठिर ने कहा, “हे पुत्र, आपने सुन ही लिया है कि द्रोण ने क्या करने का संकल्प किया है। ऐसा कीजिए कि उनका वह संकल्प व्यर्थ हो जाए। द्रोण महाबली, वीर, अस्त्रों में निपुण और श्रम से परे हैं; उन्होंने मेरे बन्दी बनाने की प्रतिज्ञा की है।” अर्जुन ने उत्तर दिया, “हे राजन, यह सत्यजित आज युद्ध में आपका रक्षक होगा। जब तक सत्यजित जीवित है, आचार्य अपनी इच्छा पूरी न कर सकेंगे। परन्तु यदि यह वीर मारा जाए, तो आप सब योद्धाओं से घिरे होने पर भी रणभूमि में न ठहरें।” युधिष्ठिर ने अर्जुन को अनुमति दी, उन्हें गले लगाया, स्नेह से देखा और अनेक आशीर्वाद दिए। तब महाबली पार्थ, भूखे सिंह की भाँति, त्रिगर्तों की ओर निकल पड़े। अर्जुन के दूर हटते ही दुर्योधन की सेना युधिष्ठिर को पकड़ने के लिए उन्मत्त हो उठी।

संशप्तकों ने एक समतल मैदान पर अपने रथों से अर्धचन्द्र के आकार का व्यूह बनाया। अर्जुन को आता देख वे हर्ष से ऊँचे स्वर में चिल्ला उठे, उस समय जब उन्हें रोना चाहिए था। यह देखकर अर्जुन ने हलकी हँसी के साथ कृष्ण से कहा, “हे देवकीनन्दन, देखिए, ये त्रिगर्त भाई, जो युद्ध में नष्ट होने वाले हैं, हर्षित हो रहे हैं। अथवा यही उनके आनन्द का अवसर है, क्योंकि उन्हें वे उत्तम लोक मिलेंगे जो कायरों को दुर्लभ हैं।” यह कहकर अर्जुन ने स्वर्णजड़ित देवदत्त शंख बड़े वेग से फूँका, जिसके घोष से वह संशप्तक रथ-सेना मानो पत्थर हो गई; पशु आँखें फाड़े, अंग-शिथिल खड़े रह गए।
फिर होश सँभालकर उन्होंने एक साथ अर्जुन पर बाण बखेरे, पर अर्जुन ने पन्द्रह बाणों से उन हज़ारों बाणों को बीच में ही काट डाला। उन्होंने सुबाहु का चर्म-कवच, सुधर्मा और सुधन्वा को ढका, और अर्जुन ने उत्तर में उनके स्वर्णध्वज काट गिराए। सुधन्वा का धनुष काटकर, उसके घोड़े मारकर, अर्जुन ने उसका पगड़ी-सजा शीश धड़ से अलग कर दिया। यह देखकर उसके अनुयायी भयभीत होकर दुर्योधन की सेना की ओर भाग चले। तब त्रिगर्तराज ने उन्हें ललकारा, “मत भागो, हे वीरो! सब सैनिकों के सामने जो भयानक शपथ ली, उसका क्या होगा? लौटकर दुर्योधन के नायकों से क्या कहेंगे? रुको, और अपनी शक्ति-भर लड़ो।” तब वे योद्धा फिर लौट आए, और नारायण-गोपों के साथ मिलकर साक्षात मृत्यु को ललकारने को तैयार हो गए।
अर्जुन ने कृष्ण से कहा, “हे हृषीकेश, घोड़ों को संशप्तकों की ओर बढ़ाइए; ये जीवित युद्ध न छोड़ेंगे। आज आप मेरी भुजाओं और धनुष का भयंकर बल देखेंगे।” कृष्ण ने मुस्कुराकर रथ को वहीं पहुँचाया। तब नारायण-गोपों ने अर्जुन को बाण-वर्षा से घेर लिया, और कुन्तीपुत्र तथा कृष्ण क्षण भर के लिए अदृश्य से हो गए। तब क्रोधित अर्जुन ने त्वष्टा नामक अस्त्र छोड़ा, जिससे अपने ही असंख्य रूप प्रकट हो गए; भ्रमित होकर त्रिगर्त एक-दूसरे को ही अर्जुन समझकर परस्पर मारने लगे। जब उन्होंने अपने बाण लक्ष्य पर लगते देखे, तो दोनों कृष्णों को मरा समझकर हर्ष से वस्त्र लहराने लगे। तब पसीने से तर कृष्ण ने पुकारा, “हे पार्थ, कहाँ हैं आप? मैं आपको देख नहीं पाता; क्या आप जीवित हैं?” यह सुनते ही अर्जुन ने वायव्य अस्त्र से वह बाण-वर्षा बिखेर दी, और वायुदेव संशप्तकों को घोड़े-हाथियों समेत सूखे पत्तों की भाँति उड़ा ले गए।
इस प्रकार अर्जुन उस संग्राम में रुद्र की भाँति विचरते रहे, और उनका रथ युग के अन्त में सृष्टि का संहार करते रुद्र के रथ-सा प्रतीत हुआ। उधर, ठीक जब अर्जुन संशप्तकों से भीषण युद्ध में उलझे हुए थे, द्रोण अपनी व्यूह-रचित सेना के साथ युधिष्ठिर को पकड़ने के लिए धावा बोल चुके थे, और अनेक योद्धा उस अभिप्राय से उनके पीछे चल पड़े थे। इस तरह संशप्तक अर्जुन को रणभूमि के दूर छोर पर खींच ले गए, और द्रोण का जाल युधिष्ठिर के चारों ओर कसने लगा।
समझने की कुंजी (अवधारणा): ‘त्वष्टा’ और ‘वायव्य’ दिव्य अस्त्र हैं। त्वष्टा अस्त्र अनेक मायावी प्रतिरूप उत्पन्न करके शत्रु को भ्रमित कर देता है, जिससे वे परस्पर ही लड़ मरते हैं; वायव्य अस्त्र वायुदेव से सम्बद्ध है, जो शत्रु-समूह को आँधी की तरह उड़ा देता है। ‘नारायण-गोप’ कृष्ण की वह सेना थी जो दुर्योधन को दे दी गई थी।
सार: संशप्तकों ने अर्जुन को रणभूमि के दक्षिण छोर पर खींच लिया; अर्जुन ने त्वष्टा और वायव्य अस्त्रों से उनका संहार किया, पर इसी बीच द्रोण ने युधिष्ठिर को पकड़ने के लिए सेना सहित धावा बोल दिया, और इस तरह उनके वर की पूर्ति का अवसर खुल गया।
भीष्म का शयन और सेनापति का प्रश्न
हस्तिनापुर में, उस नगर में जिसका नाम हाथी के नाम पर पड़ा था, धृतराष्ट्र अपने शोक में डूबे बैठे थे। रात के समय शिविर से लौटे संजय उनके पास फिर आ पहुँचे, और राजा ने उनसे वही प्रश्न किया जो उनके भीतर रह-रहकर उठ रहा था। देवव्रत भीष्म, गंगा के पुत्र, जिनके पराक्रम को कोई व्यर्थ न कर सका था, अब बाणों की शय्या (तीरों से बना बिछौना) पर लेटे थे। शिखंडी, पांचालों के राजकुमार, को आगे करके अर्जुन ने उन्हें रथ से गिरा दिया था। दस दिन तक उस वृद्ध योद्धा ने कौरव-सेना को धर्मयुद्ध से बचाया था; अब वह उत्तरायण की प्रतीक्षा में, प्राण रोके, पड़े थे।
धृतराष्ट्र ने कहा, “हे संजय, उस उच्च-आत्मा भीष्म के गिर जाने पर, जब वह अजेय वीर मारा गया, तब भाग्य से प्रेरित कौरवों ने आगे क्या किया? जिस सेना के पास नेता न रहे, वह शोक के समुद्र में डूबी नौका के समान हो जाती है। हमें सब विस्तार से बताइए।”

संजय ने उत्तर दिया कि भीष्म के गिरते ही दोनों पक्ष के योद्धा एक क्षण को ठहर गए। उन्होंने उस महावीर के लिए सीधे बाणों से बनी शय्या रची, उसके सिरहाने तकिये के रूप में भी बाण ही रखे, और उनकी रक्षा का प्रबंध करके, उन्हें प्रणाम करके, उनकी प्रदक्षिणा (बायीं ओर से दायीं ओर घूमकर सम्मान-वंदन) की। फिर लाल आँखों से एक-दूसरे को देखते हुए वे क्षत्रिय पुनः युद्ध के लिए निकल पड़े। किन्तु गंगा-पुत्र के बिना कौरव-सेना ऐसी जान पड़ती थी जैसे तारों से रहित आकाश, जैसे जल सूख जाने पर नदी, जैसे वन में रखवाले के बिना भेड़-बकरियों का झुंड। सबके मन में एक ही नाम उठा: कर्ण। कर्ण, जिसने पहले दस दिन युद्ध नहीं किया था, अब आ पहुँचे।
गंगा-पुत्र के गिर जाने पर कौरव-सेना तारों से रहित आकाश के समान, या नष्ट फसल वाली पृथ्वी के समान, या जल सूख जाने पर सूखी नदी के समान जान पड़ती थी; जैसे बली के मारे जाने पर पुराना असुर-दल, जैसे पति-विहीन सुन्दरी, जैसे भँवर में घिरी डगमगाती नौका, वैसी ही वह सेना अपने आश्रय के बिना व्याकुल, असहाय और भयभीत हो गई। तब उन्हें कर्ण का स्मरण हुआ, जो स्वयं देवव्रत के समान थे और जिन्होंने पहले दस दिन युद्ध नहीं किया था। सबके हृदय उस श्रेष्ठ धनुर्धर की ओर वैसे ही मुड़े जैसे संकट में पड़े मनुष्य का हृदय किसी सहायक मित्र की ओर मुड़ता है। राजाओं ने पुकारा, “कर्ण! कर्ण! हमारे मित्र, सूत-पुत्र, जो सदा रण में प्राण देने को तत्पर रहते हैं! उन्हें शीघ्र बुलाओ!”
कर्ण आ पहुँचे, और दुःखी कौरव-योद्धाओं को इस प्रकार उबारने का यत्न करने लगे मानो डूबती नौका में बैठे बच्चों को पिता उबारता हो। उन्होंने सेना को सम्बोधित करके कहा कि जिस भीष्म में धैर्य, बुद्धि, पराक्रम, सत्य, आत्म-संयम और वीर के सब गुण थे, और जिनमें ये गुण चन्द्रमा में लक्ष्मी के समान स्थिर थे, वह जब शान्त हो गए, तब वह अन्य सब वीरों को मानो मारा हुआ ही मानते हैं। “इस क्षणभंगुर संसार में कुछ भी अविनाशी नहीं। जब भीष्म जैसे उच्च-व्रती गिर पड़े, तब कौन निश्चय से कह सकता है कि कल का सूर्य उदित होगा? वसुओं के तेज से जन्मे, पृथ्वी के वह स्वामी फिर वसुओं में जा मिले हैं।” फिर उन्होंने कहा कि अब वह स्वयं इस असहाय, उदास-मुख कौरव-सेना की रक्षा करेंगे; यह भार उन्हीं पर आ पड़े। “युधिष्ठिर धैर्य, बुद्धि, धर्म और बल से सम्पन्न हैं; वृकोदर (भीम) सौ हाथियों के समान बलवान हैं; अर्जुन तरुण है और देवराज का पुत्र। फिर भी मैं इस वैर को सहन न करूँगा। आज मैं रण में जाकर शत्रु के बल को रोकूँगा।” इस प्रकार कर्ण ने अपना रथ सजवाया, सोने का कवच, सूर्य-सम मुकुट, अग्नि-से बाण, और सोलह तरकश माँगे, और मंगल-द्रव्य लाकर अपने अंगों पर पुष्प-मालाएँ धारण कीं। फिर वायु-वेगी श्रेष्ठ अश्वों से जुते रथ पर सवार होकर, इन्द्र के समान शोभायमान कर्ण उस रणभूमि की ओर चले जहाँ भीष्म ने अपना ऋण चुकाया था।

कर्ण भीष्म के पास गए। रथ से उतरकर, आँखों में आँसू भरे, पैदल चलकर, हाथ जोड़कर उन्होंने कहा, “मैं कर्ण हूँ। हे भरतवंशी, मेरी ओर आँखें खोलकर देखिए और कोई शुभ वचन कहिए। हे कुरुश्रेष्ठ, मैं आपके समान कोषागार भरने में, मन्त्रणा में, सेना के व्यूह-रचना में और अस्त्र-प्रयोग में और किसी को नहीं देखता।” भीष्म ने उन्हें स्नेह से देखा। यह वार्ता आगे की कथा है; अभी कथा का सूत्र वहाँ है जहाँ कौरव-शिविर में यह प्रश्न उठा कि अब सेनापति कौन हो।
समझने की कुंजी (वंश-नाम): भीष्म के अनेक नाम कथा में आते हैं। देवव्रत उनका जन्म-नाम है; गंगा-पुत्र या गांगेय अर्थात् गंगा के पुत्र; शान्तनु-पुत्र अर्थात् राजा शान्तनु के पुत्र; भीष्म अर्थात् भीषण प्रतिज्ञा करने वाले। ये सब एक ही व्यक्ति हैं।
सार: भीष्म बाण-शय्या पर लेट जाते हैं और कौरव-सेना नेता-विहीन हो जाती है। सबके मन सेनापति के प्रश्न पर टिक जाते हैं, और पहले कर्ण की ओर, फिर एक उससे भी बड़े नाम की ओर मुड़ते हैं।
कर्ण का परामर्श: द्रोण ही सेनापति हों
दुर्योधन ने सभी योद्धाओं के बीच कर्ण से कहा, “हे पुरुष-व्याघ्र, भीष्म वर्षों, पराक्रम और विद्या से सम्पन्न हमारे सेनापति थे, और सब योद्धाओं के आश्रय थे। उन्होंने दस दिन धर्मयुद्ध से हमारी रक्षा की, और कठिनतम पराक्रम किए। अब जब वह स्वर्ग की ओर जा रहे हैं, तब आप किसे हमारा सेनापति होने योग्य मानते हैं? नेता के बिना सेना एक क्षण भी रणभूमि में नहीं टिकती। जैसे कर्णधार (नाव चलाने वाला) के बिना नौका, या सारथि के बिना रथ इधर-उधर भटकता है, वैसी ही नेता-विहीन सेना की दशा होती है। आप सेना के समस्त उच्च-आत्मा योद्धाओं में से कोई उपयुक्त नेता खोजिए जो शान्तनु-पुत्र का स्थान ले सके। जिसे आप योग्य समझेंगे, उसी को हम सब निस्संदेह अपना नेता बना लेंगे।”
कर्ण ने कहा, “ये सब उच्च-आत्मा पुरुष हैं। इनमें से हर एक नेता होने योग्य है। सब कुलीन हैं, प्रहार-कला में निपुण हैं, पराक्रमी और बुद्धिमान हैं, शास्त्रज्ञ हैं, और रण से कभी पीठ नहीं फेरते। किन्तु सब एक साथ नेता नहीं हो सकते। केवल एक को चुनना चाहिए, उसी को जिसमें कोई विशेष गुण हो। ये सब एक-दूसरे को अपने समान मानते हैं; यदि किसी एक का सम्मान हुआ तो दूसरे असंतुष्ट होंगे और आपके हित में पूरे मन से न लड़ेंगे। किन्तु एक ऐसे हैं जो इन सब योद्धाओं के आचार्य (अस्त्र-विद्या के गुरु) हैं, जो वर्षों में वृद्ध हैं और आदर के योग्य हैं। इसलिए द्रोण को, इस अस्त्रधारियों में श्रेष्ठ को, नेता बनाया जाए। जब अजेय द्रोण यहाँ उपस्थित हों, जो शुक्र अथवा बृहस्पति के समान हैं, तब और कौन नेता होने योग्य है? आपकी समस्त सेना में एक भी राजा ऐसा नहीं जो द्रोण के युद्ध में जाने पर उनके पीछे न चले। द्रोण समस्त सेनापतियों में, समस्त अस्त्रधारियों में, और समस्त बुद्धिमानों में अग्रणी हैं। और हे राजा, वह आपके भी आचार्य हैं। इसलिए हे दुर्योधन, बिना विलम्ब इन्हें अपनी सेना का नेता बनाइए, जैसे देवताओं ने असुरों को जीतने के लिए कार्तिकेय को अपना सेनापति बनाया था।”
एक उप-कथा: कर्ण की उपमा गहरी है। कार्तिकेय (स्कन्द), शिव के पुत्र, को देवताओं ने तारकासुर-वध के लिए अपना सेनापति बनाया था। वहाँ अनेक देवता थे, किन्तु नेतृत्व एक को सौंपा गया, ताकि सेना बिखरे नहीं। कर्ण यही कह रहे हैं कि गुणों में सब समान हों तब भी आदर और गुरुता (वरिष्ठता) के आधार पर एक को चुनना ही नीति है, और वह एक द्रोण हैं।
सार: कर्ण, सबको समान मानते हुए भी, वरिष्ठता और गुरु-पद के आधार पर द्रोण का नाम सुझाते हैं, क्योंकि उन्हीं के नेतृत्व में सेना बिना ईर्ष्या के एकजुट रहेगी।
द्रोणाचार्य का सेनापति-पद पर अभिषेक
कर्ण के ये वचन सुनकर दुर्योधन सेना के बीच खड़े द्रोण की ओर मुड़े और बोले, “हे आचार्य, आपके जन्म की उत्कृष्टता के लिए, आपके माता-पिता की कुलीनता के लिए, आपकी विद्या, वर्षों और बुद्धि के लिए, आपके पराक्रम, कौशल, अजेयता, लोक-व्यवहार के ज्ञान, नीति और आत्म-संयम के लिए, और आपकी तपस्या तथा कृतज्ञता के लिए, इन समस्त राजाओं में कोई इतना अच्छा नेता नहीं हो सकता जितने आप। आप वासव (इन्द्र) के समान, जैसे वह देवताओं की रक्षा करते हैं, हमारी रक्षा कीजिए। आपको नेता पाकर हम अपने शत्रुओं को जीतना चाहते हैं। जैसे रुद्रों में कपाली, वसुओं में पावक (अग्नि), यक्षों में कुबेर, मरुतों में वासव, ब्राह्मणों में वसिष्ठ, ज्योतियों में सूर्य, पितरों में यम, जल-जीवों में वरुण, तारों में चन्द्रमा, और दिति-पुत्रों में उशनस (शुक्र) श्रेष्ठ हैं, वैसे ही आप समस्त सेनापतियों में श्रेष्ठ हैं। इन ग्यारह अक्षौहिणी सेनाओं को अपनी आज्ञा के अधीन कर लीजिए। हे निष्पाप, आप जैसे महान धनुर्धर को अपने आगे धनुष ताने देखकर अर्जुन प्रहार न करेगा। निस्संदेह, हे पुरुष-व्याघ्र, यदि आप हमारे नेता हो जाएँ तो मैं युधिष्ठिर को उसके समस्त अनुयायियों और सम्बन्धियों सहित युद्ध में जीत लूँगा।”
दुर्योधन के ये वचन सुनकर समस्त राजाओं ने द्रोण की जय-जयकार की और सिंह-गर्जना से दुर्योधन को प्रसन्न किया। तब द्रोण ने उत्तर दिया, “मैं छहों अंगों सहित वेद जानता हूँ। मैं मनुष्यों के व्यवहार का शास्त्र भी जानता हूँ। मैं शैव अस्त्र तथा अन्य अनेक प्रकार के अस्त्रों से परिचित हूँ। ये जो गुण आपने मुझमें बताए हैं, उन्हें वस्तुतः प्रकट करने का प्रयास करते हुए मैं पांडवों से युद्ध करूँगा। किन्तु हे राजा, मैं पृषत-पुत्र (धृष्टद्युम्न) को नहीं मार सकूँगा। हे पुरुषों में श्रेष्ठ, वह मेरे ही वध के लिए उत्पन्न हुआ है। मैं पांडवों से युद्ध करूँगा और सोमकों का संहार करूँगा। रही बात पांडवों की, वे प्रसन्न हृदय से मुझसे न लड़ेंगे।”
इस प्रकार द्रोण की अनुमति पाकर दुर्योधन ने उन्हें विधि-विधान के अनुसार अपनी सेना का सेनापति बनाया। दुर्योधन के नेतृत्व में राजाओं ने द्रोण का सेनापति-पद पर अभिषेक किया, ठीक वैसे ही जैसे प्राचीन काल में इन्द्र के नेतृत्व में देवताओं ने स्कन्द का अभिषेक किया था। अभिषेक के पश्चात सेना का हर्ष ढोलों और शंखों की गूँज में फूट पड़ा। ब्राह्मणों के मंगल-उच्चार, जय-घोष और नर्तकों के नृत्य के साथ द्रोण का सम्मान हुआ, और कौरव योद्धाओं ने पांडवों को मानो पहले से ही पराजित मान लिया।
समझने की कुंजी (संख्या-आधुनिक-समतुल्य): अक्षौहिणी एक विशाल सेना-इकाई थी, जिसमें परम्परा के अनुसार 21,870 रथ, उतने ही हाथी, 65,610 घुड़सवार और 1,09,350 पैदल सैनिक होते थे। ग्यारह अक्षौहिणी अर्थात् लगभग चालीस लाख से अधिक योद्धाओं की समूची कौरव-सेना अब द्रोण के एक संकेत पर चलने वाली थी। आधुनिक समतुल्य में यह कई पूर्ण सेना-दलों के बराबर का दायित्व था, मानो आज के अनेक सैन्य-कोरों की कमान एक ही व्यक्ति को सौंप दी गई हो।
यहाँ द्रोण की नैतिक उलझन को छिपाना नहीं चाहिए। वह स्वयं स्वीकार करते हैं कि धृष्टद्युम्न उन्हीं के वध के लिए जन्मा है, फिर भी वह उस सेना का नेतृत्व स्वीकार करते हैं जिसके विरुद्ध उनके अपने प्रिय शिष्य, पांडव, खड़े हैं। वह कहते हैं कि पांडव उनसे प्रसन्न हृदय से न लड़ेंगे। आचार्य का हृदय एक ओर अधर्म के पक्ष में बँधा है और दूसरी ओर स्नेह से। यह जटिलता द्रोण-पर्व की आत्मा है।
सार: द्रोण सेनापति-पद स्वीकार करते हैं, अपनी विद्या और सीमाएँ खुलकर बताते हुए (धृष्टद्युम्न उन्हें मारेगा, पांडव अनिच्छा से लड़ेंगे)। विधिवत अभिषेक होता है, और कौरव हर्ष से पांडवों को पहले ही हारा हुआ मान लेते हैं।
वर का प्रस्ताव: दुर्योधन की माँग
सेनापति-पद पाने के पश्चात द्रोण ने समस्त सेना के बीच दुर्योधन से कहा, “हे राजा, समुद्रगामी गंगा के उस पुत्र (भीष्म) के तुरन्त बाद आपने मुझे सेना का नेतृत्व देकर सम्मानित किया है। उस कार्य का उचित फल लीजिए। अब मैं आपका कौन-सा कार्य सिद्ध करूँ? जो वर आप चाहते हैं, माँग लीजिए।”
तब दुर्योधन ने कर्ण, दुःशासन और अन्य परामर्शदाताओं से मन्त्रणा करके आचार्य से कहा, “यदि आप मुझे वर देना चाहते हैं, तो रथियों में श्रेष्ठ युधिष्ठिर को जीवित पकड़कर मेरे पास यहाँ ले आइए।”

दुर्योधन के ये वचन सुनकर द्रोण ने ऐसा उत्तर दिया जिससे समस्त सेना प्रसन्न हो उठी, “धन्य हैं कुन्ती-पुत्र युधिष्ठिर, जिनका आप केवल बन्दी बनाना चाहते हैं, वध नहीं। हे दुर्जय, आप कोई और वर, उदाहरण के लिए उनके वध का वर, क्यों नहीं माँगते? हे पुरुष-व्याघ्र, आप उनकी मृत्यु क्यों नहीं चाहते? आप नीति से अनभिज्ञ तो नहीं हैं। यह बड़े आश्चर्य की बात है कि राजा युधिष्ठिर का कोई शत्रु उनकी मृत्यु नहीं चाहता। चूँकि आप उन्हें जीवित रखना चाहते हैं, इसलिए या तो आप अपने वंश को विनाश से बचाना चाहते हैं, या पांडवों को युद्ध में जीतकर उन्हें उनका राज्य देकर भ्रातृ-सम्बन्ध स्थापित करना चाहते हैं। उस बुद्धिमान राजकुमार का जन्म शुभ था। सचमुच वह अजातशत्रु (जिसका कोई शत्रु जन्मा ही नहीं) कहलाते हैं, क्योंकि आप तक उनके प्रति स्नेह रखते हैं।”
द्रोण के इन वचनों से दुर्योधन के हृदय में जो भाव सदा छिपा रहता था, वह अचानक प्रकट हो गया। बृहस्पति जैसे भी अपने मुख के भाव छिपा नहीं सकते। हर्ष से भरकर दुर्योधन ने कहा, “हे आचार्य, कुन्ती-पुत्र के वध से मुझे विजय नहीं मिलेगी। यदि युधिष्ठिर मारे जाएँ, तो पार्थ (अर्जुन) निस्संदेह हम सबका वध कर देगा। उन सबको तो देवता भी नहीं मार सकते। उनमें से जो भी बचेगा, वह हमारा समूल नाश कर देगा। किन्तु युधिष्ठिर अपने वचन के सच्चे हैं। यदि उन्हें जीवित यहाँ लाया जाए और एक बार फिर द्यूत में हराया जाए, तो पांडव फिर वन को चले जाएँगे, क्योंकि वे सब युधिष्ठिर के आज्ञाकारी हैं। ऐसी विजय निस्संदेह स्थायी होगी। इसी कारण मैं किसी भी प्रकार राजा युधिष्ठिर का वध नहीं चाहता।”
एक उप-कथा: अजातशत्रु शब्द का अर्थ है “जिसका कोई शत्रु उत्पन्न ही न हुआ हो”। यह युधिष्ठिर का विशेषण है और उनकी धर्मनिष्ठा का प्रमाण भी। द्रोण इसी शब्द से दुर्योधन को आईना दिखाते हैं कि जब आप स्वयं तक उससे स्नेह रखते हैं, तब वह कितना निर्द्वेष होगा। द्यूत (पासों का जुआ) का उल्लेख यहाँ पुरानी कथा की ओर इशारा है, जब शकुनि के छल से युधिष्ठिर सब-कुछ हार बैठे थे और पांडवों को तेरह वर्ष का वनवास भोगना पड़ा था। दुर्योधन वही चाल फिर चलना चाहता है।
यहाँ दुर्योधन का अभिप्राय छिपा हुआ है किन्तु कुटिल है। वह युधिष्ठिर को जीवित इसलिए चाहता है कि उन्हें फिर द्यूत में हराकर पांडवों को सदा के लिए वनवास भेजा जा सके, अर्थात् छल से स्थायी राज्य पाया जाए। यह नैतिक कुटिलता को सरल नहीं किया गया है; यही दुर्योधन का असली मन है।
सार: दुर्योधन वध नहीं, युधिष्ठिर का जीवित बन्दी होना माँगता है, ताकि उन्हें फिर द्यूत में हराकर पांडवों को सदा वनवास में डाला जा सके। द्रोण उसकी इस छिपी कुटिल चाल को ताड़ लेते हैं।
द्रोण की प्रतिज्ञा और उसकी शर्त
दुर्योधन के इस कुटिल अभिप्राय को ताड़कर द्रोण, जो लाभ के शास्त्र के सत्य को जानते थे और बड़ी बुद्धि से सम्पन्न थे, थोड़ा विचार करके उन्होंने वर को एक शर्त में बाँधकर दिया। द्रोण ने कहा, “यदि वीर अर्जुन युद्ध में युधिष्ठिर की रक्षा न करे, तो आप ज्येष्ठ पांडव को अपने वश में आया हुआ ही समझिए। रही पार्थ की बात, इन्द्र के नेतृत्व में देवता और असुर मिलकर भी युद्ध में उसके सामने नहीं बढ़ सकते। इसी कारण मैं वह नहीं कर सकता जो आप कहते हैं। निस्संदेह अर्जुन मेरा शिष्य है, और मैं ही अस्त्र-विद्या में उसका पहला गुरु था। किन्तु वह तरुण है, बड़े सौभाग्य से सम्पन्न है, और अपने लक्ष्य पर अत्यन्त एकाग्र रहता है। उसने इन्द्र और रुद्र से अनेक अस्त्र पाए हैं। और आपने उसे क्रुद्ध भी कर रखा है। इसलिए मैं वह नहीं कर सकता जो आप कहते हैं। अर्जुन को, जिस किसी भी उपाय से सम्भव हो, युद्धभूमि से हटा दिया जाए। पार्थ के हट जाने पर आप राजा युधिष्ठिर को पहले से ही पराजित समझिए। हे पुरुषों में श्रेष्ठ, विजय उन्हें पकड़ने में है, उनके वध में नहीं। छल से भी उनका पकड़ा जाना सम्भव है। उस सत्य और धर्म में रत राजा को मैं निस्संदेह आज ही आपके वश में ले आऊँगा, यदि वह एक क्षण भी युद्ध में मेरे सामने ठहर जाए, बशर्ते कि कुन्ती-पुत्र धनंजय, वह पुरुष-व्याघ्र, रणभूमि से हटा दिया जाए। किन्तु फाल्गुन (अर्जुन) की उपस्थिति में, हे राजा, युधिष्ठिर इन्द्र-सहित देवताओं और असुरों से भी युद्ध में नहीं पकड़े जा सकते।”
इन शर्तों के साथ द्रोण द्वारा राजा को पकड़ने का वचन देने पर, आपके मूर्ख पुत्रों ने युधिष्ठिर को मानो पकड़ा हुआ ही समझ लिया। दुर्योधन द्रोण का पांडवों के प्रति पक्षपात जानता था। इसलिए द्रोण को अपने वचन पर अटल रखने के लिए उसने यह मन्त्रणा सबके सामने प्रकट कर दी, और द्रोण की युधिष्ठिर-बन्दी की प्रतिज्ञा समस्त सेना में घोषित करा दी।
समझने की कुंजी (अवधारणा): द्रोण की प्रतिज्ञा बिना शर्त की नहीं है। वह एक “यदि-तब” की प्रतिज्ञा है: यदि अर्जुन रणभूमि से दूर हटा दिया जाए, तब द्रोण युधिष्ठिर को जीवित पकड़ लेंगे। इसी एक शर्त पर समूचे द्रोण-पर्व की रणनीति टिकी है। कौरवों का सारा यत्न अब अर्जुन को युधिष्ठिर से दूर खींचने पर केन्द्रित हो जाता है।
यहाँ द्रोण का मन फिर बँटा हुआ दिखता है। वह अपने शिष्य अर्जुन की महिमा खुलकर गाते हैं, मानो भीतर-ही-भीतर चाहते हों कि वह न हटे। किन्तु वचन से बँधे होने के कारण वह शर्त बताकर अपना धर्म निभाने का मार्ग रखते हैं। दुर्योधन इसी पक्षपात को जानकर, आचार्य को बाँधने के लिए, उनकी प्रतिज्ञा को सार्वजनिक करा देता है, ताकि वह पीछे न हट सकें। यह चतुराई और अविश्वास दोनों का मेल है।
सार: द्रोण प्रतिज्ञा करते हैं कि अर्जुन के हटते ही वह युधिष्ठिर को जीवित पकड़ लेंगे; अर्जुन की उपस्थिति में यह असम्भव है। दुर्योधन इस शर्त-बद्ध प्रतिज्ञा को सारी सेना में घोषित करा देता है, ताकि आचार्य अपने वचन से न डिगें।
युधिष्ठिर का प्रत्युत्तर और अर्जुन की शपथ
राजा युधिष्ठिर ने अपने गुप्तचरों के द्वारा द्रोण के अभिप्राय का सारा विवरण शीघ्र ही जान लिया। तब अपने सब भाइयों और सेना के अन्य राजाओं को एकत्र करके उन्होंने धनंजय से कहा, “हे पुरुष-व्याघ्र, आपने द्रोण का अभिप्राय सुन लिया है। ऐसे उपाय किए जाएँ कि उनका वह उद्देश्य सिद्ध न हो। यह सच है कि शत्रुओं को पीसने वाले द्रोण ने अपनी प्रतिज्ञा की है, किन्तु वह शर्तों के अधीन है, और वह शर्त, हे महाधनुर्धर, आप पर टिकी है। इसलिए आज आप मेरे समीप रहकर युद्ध कीजिए, ताकि दुर्योधन को द्रोण से अपनी कामना का फल न मिले।”
अर्जुन ने उत्तर दिया, “जैसे मेरे द्वारा अपने आचार्य का वध कभी सम्भव नहीं, वैसे ही, हे राजा, मैं आपको कभी त्याग नहीं सकता। हे पांडुपुत्र, मैं अपने आचार्य के विरुद्ध लड़ने के बजाय रण में अपने प्राण त्याग देना अधिक अच्छा समझूँगा। धृतराष्ट्र का यह पुत्र आपको युद्ध में बन्दी बनाकर राज्य पाना चाहता है। इस संसार में उसे अपनी इस कामना का फल कभी नहीं मिलेगा। तारों सहित आकाश भले गिर पड़े, पृथ्वी भले खण्ड-खण्ड हो जाए, फिर भी जब तक मैं जीवित हूँ, द्रोण आपको कदापि नहीं पकड़ सकेंगे। यदि वज्रधारी इन्द्र स्वयं, अथवा देवताओं के अग्रणी विष्णु, युद्ध में उनकी सहायता करें, तब भी वह आपको रणभूमि में नहीं पकड़ सकेंगे। हे महाराज, जब तक मैं जीवित हूँ, आपको द्रोण से कोई भय नहीं करना चाहिए, चाहे वह समस्त अस्त्रधारियों में श्रेष्ठ हों। मैं आपसे और कहता हूँ, हे राजा, कि मेरी प्रतिज्ञा कभी अधूरी नहीं रहती। मुझे स्मरण नहीं कि मैंने कभी असत्य कहा हो। मुझे स्मरण नहीं कि मैं कभी पराजित हुआ होऊँ। मुझे स्मरण नहीं कि प्रतिज्ञा करके मैंने उसका कोई अंश अधूरा छोड़ा हो।”
तब पांडव-शिविर में शंख, नगाड़े, झाँझ और छोटे ढोल बजने लगे, और उच्च-आत्मा पांडवों ने अनेक सिंह-गर्जनाएँ कीं। धनुष की प्रत्यंचा की भयानक टंकार और हथेलियों की ताल स्वर्ग तक जा पहुँची। यह सुनकर कौरव-दल में भी वाद्य बज उठे। दोनों सेनाएँ व्यूह-बद्ध होकर धीरे-धीरे युद्ध की कामना से एक-दूसरे की ओर बढ़ीं।
सार: गुप्तचरों से प्रतिज्ञा जानकर युधिष्ठिर अर्जुन को अपने पास रहकर लड़ने को कहते हैं। अर्जुन शपथ लेते हैं कि वह न आचार्य का वध करेंगे, न युधिष्ठिर को छोड़ेंगे; जब तक वह जीवित हैं, द्रोण राजा को नहीं पकड़ सकते।
द्रोण के सूर्य-सम पराक्रम का प्रथम दिन
तब पांडवों और कौरवों के बीच, और एक ओर द्रोण तथा दूसरी ओर पांचालों के बीच, ऐसा भयानक युद्ध छिड़ा जिससे रोंगटे खड़े हो जाएँ। श्रृंजय वीरों ने पूरे बल से यत्न किया, किन्तु द्रोण द्वारा रक्षित द्रोण की सेना को वे रण में हरा न सके। और इसी प्रकार आपके पुत्र के योद्धा, प्रहार में निपुण होते हुए भी, अर्जुन द्वारा रक्षित पांडव-सेना को न हरा सके। द्रोण और अर्जुन से रक्षित दोनों सेनाएँ ऐसी जान पड़ती थीं मानो रात के सन्नाटे में दो फूले हुए वन निश्चल खड़े हों।
फिर सुनहले रथ वाले द्रोण, महान तेज से दीप्त सूर्य के समान, पांडवों की पंक्तियों को रौंदते हुए उनमें इच्छानुसार विचरने लगे। भय के कारण पांडव और श्रृंजय उस एक ही अत्यन्त वेगवान योद्धा को, उसके तीव्रगामी रथ पर, मानो अनेक रूपों में विभाजित देखने लगे। उसके छोड़े भयानक बाण सब दिशाओं में दौड़े और पांडुपुत्र की सेना को भयभीत करने लगे। द्रोण उस समय मध्याह्न के सूर्य के समान जान पड़ते थे, जिनके तेज को सौ बाणों के घेरे भी ढक न सकते थे।
व्यूह की रचना भी द्रोण ने अपने हाथों की थी। सिन्धु-राज जयद्रथ, कलिंगों का स्वामी, और कवच पहने आपके पुत्र विकर्ण ने दाहिने पार्श्व पर स्थान लिया। शकुनि, गन्धार-जाति के चमकीले भालों से लड़ने वाले अनेक श्रेष्ठ घुड़सवारों के साथ, उनके सहारे के रूप में आगे बढ़ा। द्रोण ने सेना को शकट (छकड़े या गाड़ी के आकार के) व्यूह में सजाया, जबकि सामने पांडवों का व्यूह दूसरे ढंग का था। जब सेनापति रण में निकले, तो भयानक शकुन प्रकट हुए, ऐसे चिह्न जो विनाश की सूचना देते थे।
तब धृष्टद्युम्न, पांचालों का राजकुमार और पांडव-सेना का सेनापति, क्रोध से भरकर द्रोण को रोकने आगे बढ़ा। द्रोण और पृषत-पुत्र के बीच जो भिड़न्त हुई, वह अद्भुत थी; संजय कहते हैं कि उन्हें विश्वास है कि उसकी कोई समता नहीं। द्रोण ने अपने पैने बाणों से चेदियों, पांचालों और पांडवों में भारी संहार किया। उनकी प्रत्यंचा की टंकार और हथेलियों की ताल चारों ओर सुनाई दी, और वह वज्र की गर्जना के समान सबके हृदयों में भय भर गई। द्रोण ने अश्वों, सारथियों, रथियों और हाथियों का संहार करते हुए सेना को रौंदा, और पांडव तथा श्रृंजय, उस सिंह से आक्रान्त निकृष्ट पशुओं के झुंड के समान, बार-बार टूटकर भागे।
इसी समय नील नामक एक योद्धा, जो साक्षात अग्नि के समान दीप्त था, अपने बाणों को चिनगारियाँ और धनुष को ज्वाला बनाकर, सूखे घास के ढेर को जलाती दावाग्नि के समान कौरव-पंक्तियों को भस्म करने लगा। द्रोण-पुत्र अश्वत्थामा, जो पहले से ही उससे भिड़ने को उत्सुक था, मुस्कुराकर बोला, “हे नील, इतने साधारण सैनिकों को अपनी बाण-ज्वालाओं से जलाकर आप क्या पाएँगे? केवल मुझ अकेले से लड़िए, और क्रोध से भरकर मुझ पर प्रहार कीजिए।” नील ने अश्वत्थामा को अपने बाणों से बींधा, किन्तु द्रोण-पुत्र ने तीन चौड़े फलवाले बाणों से उसका धनुष, ध्वज और छत्र काट गिराए, और फिर एक दाढ़ीदार बाण से नील का सुन्दर नासिका और कुण्डलों से सजा सिर उसके धड़ से अलग कर दिया। तेजस्वी नील का गिरना देखकर पांडव-सेना शोक से काँप उठी, और उनके महारथी सोचने लगे, “हाय, इन्द्र-पुत्र अर्जुन हमें शत्रु से कैसे बचाएँगे, जब वह तो दक्षिणी छोर पर संशप्तकों और नारायणी सेना के संहार में लगे हैं?”
एक उप-कथा: कथा बार-बार स्मरण कराती है कि धृष्टद्युम्न ही द्रोण के वध के लिए जन्मा है। द्रौपदी और धृष्टद्युम्न दोनों राजा द्रुपद के यज्ञ-कुण्ड से उत्पन्न हुए थे। द्रुपद ने द्रोण से पुराने अपमान का बदला लेने के लिए वह यज्ञ किया था। इसीलिए द्रोण आरम्भ में ही कह चुके हैं कि वह पृषत-पुत्र (धृष्टद्युम्न) को नहीं मार सकेंगे, क्योंकि नियति उसे उन्हीं के अन्त का साधन बना चुकी है। और आज पहले ही दिन वही धृष्टद्युम्न आचार्य के सामने आ खड़ा होता है।
सार: सेनापति बनते ही द्रोण मध्याह्न-सूर्य के समान पांडव-सेना को रौंदते हैं। धृष्टद्युम्न, वही जो उनके वध के लिए जन्मा है, उन्हें रोकने आगे आता है, और दोनों के बीच अनुपम युद्ध छिड़ता है।
पहले दिन की पराजय: द्रोण की प्रतिज्ञा विफल
उस दिन रणभूमि में अनेक प्रसंग बीते। संशप्तकों ने अर्जुन को दक्षिण की ओर ललकारा (इसका वर्णन आगे विस्तार से आएगा), किन्तु अर्जुन उन्हें परास्त करके लौट-लौटकर युधिष्ठिर के समीप ही बना रहा। द्रोण ने हज़ारों पांडव-दलों पर आक्रमण किया और अपने पैने बाणों से उन्हें तोड़ा, किन्तु जहाँ-जहाँ युधिष्ठिर तक पहुँचने का प्रयास हुआ, वहाँ-वहाँ अर्जुन की उपस्थिति बाधा बनकर खड़ी रही। भीमसेन उस सेना-संहार को सह न सका। उसने वल्हीक को साठ और कर्ण को दस बाणों से बींधा। द्रोण ने भीम को मारने की इच्छा से उसके मर्म-स्थलों पर अनेक सीधे, पैने बाण मारे, फिर छब्बीस और बाण, जिनका स्पर्श अग्नि-सा और जो विषधर सर्पों के समान थे। कर्ण ने भीम को बारह बाणों से, अश्वत्थामा ने सात से, और दुर्योधन ने छह से बींधा। उत्तर में भीमसेन ने इन सबको बींधा: द्रोण को पचास बाण, कर्ण को दस, दुर्योधन को बारह और द्रोण को आठ, और गरजते हुए वह युद्ध में जुट गया।
उस भिड़न्त में, जहाँ योद्धा अपने प्राणों की चिन्ता छोड़कर लड़ रहे थे और मृत्यु सहज सुलभ थी, अजातशत्रु युधिष्ठिर ने भीम की रक्षा के लिए अनेक योद्धा भेजे। माद्री के दोनों पुत्र (नकुल और सहदेव) तथा युयुधान (सात्यकि) के नेतृत्व में वे वीर शीघ्र भीमसेन के पास पहुँचे, और क्रोध से भरकर, एकजुट होकर, द्रोण की अनेक श्रेष्ठ धनुर्धरों से रक्षित सेना को तोड़ने आगे बढ़े। द्रोण ने बिना किसी व्याकुलता के उन सब महारथियों का सामना किया। घुड़सवारों से घुड़सवार, रथियों से रथी भिड़ गए; भाले भालों से, तलवारें तलवारों से, फरसे फरसों से टकराने लगे। हाथियों के हाथियों से टकराने से युद्ध और भी प्रचण्ड हो उठा। कोई हाथी की पीठ से सिर के बल गिरा, कोई घोड़े की पीठ से, और कोई बाणों से बिंधकर रथ से। उस घोर भीड़ में पिता ने पुत्र को और पुत्र ने पिता को न पहचाना; “अरे पिता! अरे पुत्र! कहाँ हो, मित्र? रुको! मारो! ले आओ!” ऐसी पुकारें, अट्टहास और गर्जनाएँ चारों ओर गूँजती रहीं। मनुष्यों, अश्वों और हाथियों का रक्त एक में मिल गया, और धूल बैठ गई।

तभी पांडव-सेनापति ने “यही समय है” कहकर पांडवों को उन योद्धाओं पर ले चला, और वे हंसों के सरोवर की ओर बढ़ने के समान द्रोण के रथ की ओर बढ़े। “इसे पकड़ो”, “भागने मत दो”, “मत डरो”, “टुकड़े-टुकड़े कर दो”, ऐसी ललकारें द्रोण के रथ के समीप सुनाई दीं। तब द्रोण, कृप, कर्ण, अश्वत्थामा, राजा जयद्रथ, अवन्ती के विन्द और अनुविन्द, तथा शल्य ने उन वीरों का सामना किया। इसी समय जिष्णु (अर्जुन), बड़ी संख्या में संशप्तकों को परास्त करके, उस स्थान पर लौट आया जहाँ द्रोण पांडव-सेना को पीस रहे थे। रक्त के सरोवरों और बाणों की लहरों से भरी रणभूमि को पार करके, संशप्तकों को मारकर, फाल्गुनी वहाँ आ खड़ा हुआ। उसके वानर-ध्वज से ज्योति फूट रही थी। उसने हज़ारों बाणों से कौरवों को झुलसा दिया, मानो युग के अन्त में उदित होने वाला सूर्य हो। किन्तु जो गिर पड़े थे, जो पीठ फेरकर भाग रहे थे, और जो लड़ना नहीं चाहते थे, उन पर अर्जुन ने बाण न चलाए, सद्योद्धाओं के आचार का स्मरण करते हुए।
सूर्य पश्चिमी पर्वतों की ओर अपने विश्राम-गृह में चला गया, और दोनों सेनाएँ धीरे-धीरे अपने-अपने शिविरों को लौट गईं। उस सायंकाल को सम्भालते हुए संजय कहते हैं कि अर्जुन के अपार पराक्रम से पहले ही कौरव टूट चुके थे, और युधिष्ठिर की सुरक्षित रक्षा के कारण द्रोण की प्रतिज्ञा भी विफल हो गई थी, अतः आपके योद्धा पराजित माने गए। कवच फटे, धूल से ढके, वे चिन्तित दृष्टि से इधर-उधर देखते रहे। द्रोण की अनुमति से रणभूमि छोड़कर, शत्रुओं से अपमानित होकर, वे लौटे, और मार्ग में सब प्राणियों के मुख से फाल्गुन के असंख्य गुणों की प्रशंसा और अर्जुन के प्रति केशव की मित्रता की चर्चा सुनते रहे। उन्होंने वह रात अभिशप्त मनुष्यों के समान, घटनाओं पर मनन करते और पूर्ण मौन धारण किए, बिताई।
समझने की कुंजी (पात्र): केशव अर्थात् श्रीकृष्ण, जो अर्जुन के सारथि और मित्र हैं। फाल्गुन अर्जुन का ही एक नाम है (फाल्गुनी नक्षत्र में जन्म के कारण)। वल्हीक कुरु-वंश के एक वृद्ध राजा हैं, दुर्योधन के बान्धव। संशप्तक वे योद्धा हैं जिन्होंने अर्जुन को मारकर ही लौटने या रण में मर जाने की शपथ ली है; अगले अध्याय का केन्द्र वही हैं।
सार: पहले दिन अर्जुन युधिष्ठिर के पास बना रहता है, इसलिए द्रोण की प्रतिज्ञा फलित नहीं होती। संध्या को कौरव पराजित और मौन लौटते हैं, मार्ग भर अर्जुन और कृष्ण की प्रशंसा सुनते हुए।
दुर्योधन का उलाहना और द्रोण का दूसरा संकल्प
अगली प्रातः दुर्योधन ने, शत्रु की समृद्धि देखकर, क्षोभ और क्रोध से, बड़ी निराशा में, समस्त सेना के सुनते हुए द्रोण से कहा, “हे द्विजश्रेष्ठ, निस्संदेह आपने हमें ऐसे लोग समझ रखा है जिनका आपके हाथों विनाश ही होना है। आज आपने युधिष्ठिर को पकड़ में पाकर भी नहीं पकड़ा। जिस शत्रु को आप युद्ध में पकड़ना चाहें, वह आपकी दृष्टि में आ जाने पर आपसे बच नहीं सकता, चाहे उसे देवताओं की सहायता पाए पांडव ही क्यों न रक्षा करें। प्रसन्न होकर आपने मुझे वर दिया था; अब आप उसके अनुसार आचरण नहीं कर रहे। जो श्रेष्ठ हैं (आप जैसे), वे अपने प्रति समर्पित किसी की आशा कभी मिथ्या नहीं करते।”
दुर्योधन के इन वचनों से भरद्वाज-पुत्र बहुत लज्जित हुए। राजा को सम्बोधित करके उन्होंने कहा, “आपको मुझे ऐसा नहीं समझना चाहिए। मैं सदा वही करने का यत्न करता हूँ जो आपको प्रिय हो। देवताओं, असुरों, गन्धर्वों, यक्षों, नागों और राक्षसों सहित तीनों लोक भी उस सेना को नहीं हरा सकते जिसकी रक्षा किरीटधारी (अर्जुन) कर रहा हो। जहाँ विश्व के सृष्टा गोविन्द हैं, और जहाँ अर्जुन सेनापति है, वहाँ त्रिनेत्र महादेव के अतिरिक्त किसका बल चल सकता है, हे प्रभु? हे राजा, मैं आज सच कहता हूँ, और वह अन्यथा न होगा। आज मैं पांडवों के अग्रणी वीरों में से किसी एक महारथी का वध करूँगा। आज मैं ऐसा व्यूह रचूँगा जिसे देवता भी न भेद सकें। किन्तु हे राजा, आप किसी भी उपाय से अर्जुन को रणभूमि से दूर ले जाइए। युद्ध का ऐसा कुछ नहीं जो वह न जानता हो या न कर सके। अनेक स्थानों से उसने युद्ध का सम्पूर्ण ज्ञान पा लिया है।”
द्रोण के ये वचन कहते ही संशप्तकों ने अर्जुन को फिर युद्ध के लिए ललकारा और उसे रणभूमि के दक्षिणी छोर पर खींच ले गए। तब अर्जुन और उसके शत्रुओं के बीच ऐसा युद्ध हुआ जैसा न कभी देखा, न सुना गया था। दूसरी ओर, द्रोण द्वारा रचा गया व्यूह ऐसा दीप्तिमान था कि उसकी ओर ताका भी न जा सके, ठीक वैसे जैसे आकाश के मध्य पहुँचकर सब-कुछ तपाते सूर्य की ओर नहीं ताका जा सकता। यह वही चक्र-व्यूह था, जिसे भेदने का दायित्व आगे चलकर सुभद्रा-पुत्र अभिमन्यु पर आ पड़ेगा। किन्तु वह अगली कथा का विषय है।

एक उप-कथा: संशप्तक (संस्कृत में “जिन्होंने एक साथ शपथ ली हो”) त्रिगर्त-देश के राजा सुशर्मा और उसके भाइयों के नेतृत्व में वे योद्धा थे जिन्होंने अग्नि और कुश-घास के बीच विधिवत शपथ ली थी कि वे अर्जुन को मारकर ही लौटेंगे, अथवा रण में मरकर वीरगति पाएँगे। उनका एकमात्र प्रयोजन था अर्जुन को मुख्य रणभूमि से, जहाँ युधिष्ठिर थे, दूर खींच ले जाना, ताकि द्रोण अपना संकल्प पूरा कर सकें। इस प्रकार वे आत्म-बलिदान के मूल्य पर दुर्योधन की रणनीति का साधन बने।
यहाँ नैतिक जटिलता फिर उभरती है। द्रोण लज्जित तो होते हैं, किन्तु अधर्म के पक्ष को छोड़ते नहीं; वे केवल अपनी सीमा बताते हैं कि अर्जुन की उपस्थिति में कुछ सम्भव नहीं। दुर्योधन का उलाहना, मानो आचार्य के स्नेह को ही दोष देकर, उन्हें और कठोर संकल्प की ओर धकेलता है। और संशप्तकों की शपथ, जो अपने-आप में वीरता है, उसी कुटिल योजना का अंग बन जाती है जिसका अन्तिम फल अभिमन्यु जैसे किशोर का अकेले घिरकर मारा जाना होगा।
सार: दुर्योधन के उलाहने पर द्रोण लज्जित होकर दोहरा संकल्प लेते हैं: एक अभेद्य व्यूह रचना और किसी महारथी का वध, बशर्ते अर्जुन को रणभूमि से हटा दिया जाए। संशप्तक अर्जुन को दक्षिणी छोर पर खींच ले जाते हैं, और इस प्रकार द्रोण के व्यूह तथा युधिष्ठिर-बन्दी की चाल का मार्ग खुलता है।
मूल: महाभारत (कृष्णद्वैपायन व्यास), द्रोण पर्व; गीता प्रेस गोरखपुर परम्परा।