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उत्तरकाण्ड

तुलसीदास · रामचरितमानस · सप्तम सोपान

उत्तरकाण्ड

वह काण्ड जो युद्ध के बाद आता है, और जिसमें तुलसीदास कथा कहना बन्द करके यह बताने लगते हैं कि कथा किसलिये कही गयी थी।

रामचरितमानस का सातवाँ और अन्तिम सोपान दो हिस्सों में बँटा हुआ लगता है। पहले हिस्से में अयोध्या लौटती है, राज्याभिषेक होता है, और वह राज्य दिखाया जाता है जिसका नाम आज भी मुहावरे की तरह लिया जाता है। दूसरे हिस्से में कथा लगभग रुक जाती है और उसकी जगह एक लम्बा संवाद ले लेता है, गरुड़ और काकभुशुण्डि के बीच।

यहाँ हर प्रसंग अपना पूरा पन्ना है। मूल चौपाई और दोहा जैसे गीता प्रेस के पाठ में छपे हैं, वैसे ही दिये गये हैं, और उनके साथ वह कथा है जो उन्हें खोलती है।

प्रसंग-दर-प्रसंग पढ़िए

  1. अवधि का आख़िरी दिन और भरत-मिलनदोहा १ से ५
    लौटने की अवधि का एक ही दिन बचा है, भरत हिसाब लगा रहे हैं कि अवधि बीत गयी और साँस बची रह गयी तो जगत् में उनसे नीच कौन होगा, और उसी डूबते हुए मन के पास ब्राह्मण का रूप धरे पवनपुत्र नाव की तरह आ पहुँचते हैं।
  2. माताओं से भेंट, और वह घर जहाँ वे पहले गयेदोहा ६ से १०
    जिस दिन अयोध्या अपना सब कुछ वापस पाती है, उस दिन श्रीराम एक ही क्षण में अनगिनत रूप धरकर सबसे अलग-अलग मिलते हैं, और अपने महल की ओर चलते हुए रास्ता बदलकर पहले उस घर जाते हैं जिसकी स्वामिनी उनसे मिलते समय सकुचा गयी थीं।
  3. राज्याभिषेक, और बंदी के भेस में आये वेददोहा ११ से १५
    जिस दिन अयोध्या का सिंहासन भरता है, उस दिन श्रीराम पूरे प्रसंग में एक ही वाक्य बोलते हैं, और वह यह कि पहले मेरे सखाओं को नहलाओ। बाक़ी सारा बोलना उस दिन स्तुति है: देवताओं की, भाटों का भेस बाँधकर आये हुए चारों वेदों की, और अन्त में शंकर की, जो दस छन्द गाकर अपने को दीनजन कहते हैं।
  4. वानरों की विदा और राम-राज्य का आरम्भदोहा १६ से २०
    जिस सभा में श्रीराम अपने साथियों से कहते हैं कि अब घर जाइये, उसी सभा में एक आदमी बैठा रह जाता है और हिलता तक नहीं, और उत्तरकाण्ड का सबसे भीगा हुआ हिस्सा वहीं से खुलता है।
  5. राम-राज्यदोहा २१ से २६
    तुलसी इस राज्य का वर्णन उन चीज़ों से शुरू करते हैं जो वहाँ नहीं हैं, और छह दोहों तक यही करते चले जाते हैं: दण्ड केवल संन्यासी के हाथ में बचा है, भेद केवल नाचने वालों के सुर-ताल में, और जीत केवल अपने मन की।
  6. अयोध्या नगरी, और प्रताप का सूर्यदोहा २७ से ३१
    घर-घर की दीवारों पर वही कथा जो यह ग्रन्थ कह रहा है, सरजू के बँधे हुए घाट जिनके किनारे पर कीचड़ तक नहीं, और अन्त में एक सूर्य, जिसके उगते ही कुछ खिल जाते हैं और कुछ छिपने की जगह ढूँढ़ने लगते हैं।
  7. सनकादि का आगमन, और भरत का संकोचदोहा ३२ से ३६
    उपवन देखने निकले हुए एक राजा के सामने चार बालक आ खड़े होते हैं जो उससे कहीं पुराने हैं, राजा पहले झुकता है, और पन्ना वहाँ बन्द होता है जहाँ एक भाई प्रश्न पूछने की पूरी तैयारी करके प्रश्न नहीं पूछता।
  8. संत और असंत के लक्षणदोहा ३७ से ४५
    भरत एक ढिठाई की अनुमति लेकर पूछते हैं कि संत को किस निशानी से पहचाना जाय, और उत्तर में मिलती हैं दो लम्बी सूचियाँ, फिर एक दोहा जो दोनों सूचियों पर हाथ फेर देता है, और अन्त में हाथ जोड़कर कही गयी एक गुप्त बात।
  9. वसिष्ठ की विनती और नारद का आगमनदोहा ४६ से ५०
    भक्ति के मार्ग का हिसाब पूरा होता है, नगर अपने-अपने घर लौट जाता है, और तब कुलगुरु आकर अपने ही शिष्य के सामने अपने पेशे का नाम नीचा कहते हैं और एक ही वर माँगते हैं, कि यह प्रेम कभी घटे नहीं।
  10. उमा का संदेहदोहा ५१ से ५६
    एक स्तुति पूरी होती है और उसके साथ ही अयोध्या पन्ने से उठ जाती है। कैलास पर बैठा हुआ कहनेवाला अपनी कही हुई कथा का हिसाब देता है, सुननेवाली के भीतर एक प्रश्न जाग उठता है, और उस प्रश्न का उत्तर देने के लिये उसे बहुत पीछे, अपने ही सबसे दुखी दिनों तक लौटना पड़ता है।
  11. गरुड़ का मोह और भुशुण्डि के पर्वत तक की यात्रादोहा ५७ से ६३
    जिस पक्षी की पीठ पर हरि बैठते हैं, उसी के मन में यह प्रश्न उठता है कि वे राम कौन थे जिन्हें एक राक्षस ने बाँध लिया। तीन बड़े उसे उत्तर नहीं देते, राह दिखा देते हैं, और राह एक कौए के पास जाती है।
  12. भुशुण्डि का संक्षिप्त राम-चरितदोहा ६४ से ६९
    गरुड़ माँगते हैं और काग सुनाते हैं: बीस से कम चौपाइयों में पूरा रामचरितमानस, सरोवर के रूपक से अयोध्या के राज्याभिषेक तक। फिर सुननेवाला बताता है कि जिस मोह ने उसे इस आश्रम तक लाया, वह मोह उसका शत्रु नहीं था।
  13. माया की सेना और आँगन की जूठनदोहा ७० से ७५
    एक कौआ पक्षियों के राजा से कहता है कि आपको मोह नहीं हुआ था, और फिर गिनाने लगता है कि मोह किसे नहीं हुआ। बीच में माया की पूरी सेना खड़ी होती है, उसके ऊपर वह ब्रह्म जिसकी भौंह पर वह नाचती है, और अन्त में वही कौआ अयोध्या के आँगन में गिरी हुई जूठन उठाकर खाता है।
  14. अजिर बिहारी: आँगन का बालक और उदर के ब्रह्माण्डदोहा ७६ से ८२
    अयोध्या के आँगन में एक बालक अपनी परछाईं देखकर नाचता है, एक कौआ उसके चरण छूने बढ़ता है, और फिर वही बालक घुटनों के बल दौड़कर उसे ब्रह्मलोक तक खदेड़ता है और हँसते-हँसते अपने मुख में उतार लेता है।
  15. भुशुण्डि को वरदान और भक्ति का उपदेशदोहा ८३ से ९०
    एक कौआ धरती पर गिरा पड़ा है और एक बच्चे का हाथ उसके सिर पर है। उस हाथ से जो माँगा जाता है वह सब कुछ नहीं है, और इसीलिये वह सब कुछ से बड़ा निकलता है।
  16. अमित की गिनती, गरुड़ के प्रश्न, और रेशम का कीड़ादोहा ९० (ख) से ९६
    बाईस उपमाओं का वह लेखा जो अपने ही अन्त में अपने को ग़लत कह देता है, पक्षिराज के वे प्रश्न जिनमें तीन बार एक ही शब्द लौटता है, और एक कौए का यह कहना कि जिस देह से भक्ति मिली हो उससे ममता क्यों न हो।
  17. पहला जन्म और कलियुग का वर्णनदोहा ९७ से १०२
    अयोध्या की एक गली में जन्मा हुआ आदमी, जिसने उसी नगरी में रहते हुए उसकी महिमा नहीं जानी। और उसके बाद वह लम्बा चिट्ठा, जिसमें आदर के सारे नाम अपनी जगह खड़े रहते हैं और उनके नीचे खड़े आदमी बदल जाते हैं।
  18. कलि का एक पुनीत प्रताप, और गुरु का अपमानदोहा १०३ से १०७
    चार युगों के चार उपाय गिनाकर कहनेवाला कलियुग को सबसे सस्ता युग ठहरा देता है, और अगले ही आधे दोहे में बात युग से हटकर अपने ऊपर आ जाती है: अकाल, उज्जैन, एक ब्राह्मण गुरु, और शिव के मन्दिर में वह प्रणाम जो नहीं किया गया।
  19. रुद्राष्टक, शिव की कृपा, और लोमश का शापदोहा १०८ से ११२
    जिस गुरु का अपमान हुआ था वही संस्कृत में शिव के आगे गिड़गिड़ाते हैं, शाप घटता है पर मिटता नहीं, और हज़ार जन्म बीत जाने पर वही स्वभाव मेरु के शिखर पर दूसरी बार सिर उठा लेता है।
  20. ऋषि निर्दोष, वह वरदान, और ज्ञान तथा भक्ति का भेददोहा ११३ से ११७
    काकभुशुण्डि पहले यह सिद्ध करते हैं कि शाप देनेवाले ऋषि का उसमें कोई दोष नहीं था, और फिर गरुड़ का वह प्रश्न आता है जिसका उत्तर एक गाय, एक मथानी और एक बत्ती के सहारे दिया जाता है।
  21. भक्ति-चिंतामणि और मानस-रोगदोहा सोरठा ११७ (घ) से दोहा १२१
    एक दीपक जो आँचल की हवा से बुझ जाता है, एक मणि जिसे हवा से बचाना ही नहीं पड़ता, और अन्त में उन रोगों की सूची जिनकी ओषधि इस पन्ने पर नहीं आती।
  22. कथा का फल, और मानस का विश्रामदोहा १२२ से १३०
    सात सोपानों के अन्त में एक पक्षी अपनी बात पूरी करता है, दूसरा पक्षी अपने लोक को लौट जाता है, शिव अपनी पत्नी को कथा का फल बताते हैं, और तब कवि अपना नाम लेकर अपने ही ग्रन्थ के विषय में आख़िरी वाक्य कहता है।

यह तुलसी का राम-चरित है, वाल्मीकि का नहीं

इस स्थल पर वाल्मीकि रामायण अलग से पूरी पढ़ी जा सकती है, और दोनों को एक मान लेना ठीक नहीं होगा। तुलसीदास सोलहवीं शताब्दी में अवधी में लिख रहे थे, वाल्मीकि उनसे बहुत पहले संस्कृत में। कई प्रसंग दोनों में हैं, पर उनका रंग, क्रम और कभी-कभी ब्योरा भी अलग है। जहाँ यहाँ कुछ कहा गया है, वह तुलसी का कहा हुआ है।

आधार: श्रीरामचरितमानस, सप्तम सोपान (उत्तरकाण्ड), गीता प्रेस संस्करण; हनुमानप्रसाद पोद्दार की टीका के साथ पढ़ा गया।

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