रामचरितमानस · उत्तरकाण्ड · सनकादि का आगमन, और भरत का संकोच
सनकादि का आगमन, और भरत का संकोच
उपवन देखने निकले हुए एक राजा के सामने चार बालक आ खड़े होते हैं जो उससे कहीं पुराने हैं, राजा पहले झुकता है, और पन्ना वहाँ बन्द होता है जहाँ एक भाई प्रश्न पूछने की पूरी तैयारी करके प्रश्न नहीं पूछता।
इस पन्ने पर कोई युद्ध नहीं है, कोई यात्रा नहीं है, कोई संकट नहीं है। एक राजा अपने भाइयों को लेकर बगीचा देखने निकलता है। रास्ते में चार मेहमान आ जाते हैं। वह उन्हें देखते ही ज़मीन पर लेट जाता है, अपना ओढ़ा हुआ वस्त्र उतारकर उनके बैठने के लिये बिछा देता है, और कहता है कि आज मैं धन्य हूँ। मेहमान उसकी स्तुति करते हैं, एक वर माँगते हैं, और चले जाते हैं। इतना ही है। और फिर, जब वे जा चुके होते हैं, तब वह होता है जो इस पन्ने की सबसे अनोखी बात है: जो लोग बरसों से उसके साथ हैं, वे उससे एक प्रश्न पूछना चाहते हैं और पूछ नहीं पाते।
यह उत्तरकाण्ड का सातवाँ प्रसंग है, दोहा बत्तीस से छत्तीस तक। और इसे पढ़ते हुए एक बात ध्यान में रखने लायक है, जो इसी पन्ने की एक चौपाई में खुलकर आ जाती है। यह कथा किसी को सुनायी जा रही है। बीच में एक जगह कहनेवाला अपनी सुननेवाली का नाम लेकर पुकारता है, भवानी, और उसी वाक्य में यह बताता है कि जिन चार मुनियों की बात हो रही है वे भी अभी-अभी कहीं बैठकर राम-कथा ही सुनकर आ रहे हैं। एक कथा के भीतर एक कथा है, और दोनों जगह कोई बैठकर सुन रहा है।
और तीसरी बात, जिसके लिये यह प्रसंग देर तक याद रहता है। जो चार यहाँ आते हैं वे देखने में बालक हैं और उम्र में उस राजा से कहीं बड़े। जो झुकता है वह पहले झुकता है, और उसके बाद उसका घर झुकता है। जो अतिथि हैं वे बोल नहीं पाते, और जो मेज़बान है उसके हाथ जुड़े ही रह जाते हैं। इस पूरे पन्ने पर एक भी जगह ऐसी नहीं है जहाँ बड़ाई उस ओर जा रही हो जिस ओर वह जाती दिखती है, और यही इसका विषय है।
इस प्रसंग के मुख्य किरदार
- राम वह राजा, जिसे इसी प्रसंग की स्तुति राजाओं का शिरोमणि कहती है, और जो अतिथियों को आते देखकर सबसे पहले ज़मीन पर लेट जाता है।
- सनकादि चार मुनि, देखने में बालक और उम्र में बहुत पुराने, जिनका एक ही व्यसन है, जहाँ राम-चरित हो वहाँ जाकर सुनना।
- हनुमान् संग चलनेवाले परम प्रिय, जिन्हें पहली ही चौपाई में भाइयों से अलग आधा चरण मिलता है, और जो अन्त में वह बात कह देते हैं जो भाई नहीं कह पाते।
- भरत वे, जिनका नाम इस पन्ने पर सबसे अन्त में आता है, और जिनका प्रश्न इस पन्ने पर आता ही नहीं।
- घटसंभव मुनि जिनके यहाँ से सनकादि चले आ रहे हैं और जहाँ बहुत-सी राम-कथा कही गयी थी। टीका इस नाम को अगस्त्य कहकर पहचानती है।
- भवानी वह सुननेवाली, जिसे यह सारी कथा सुनायी जा रही है और जिनका नाम इसी प्रसंग की एक चौपाई के बीच में आ जाता है।
उपवन देखने निकले हुए
उत्तरकाण्ड यहाँ तक आते-आते शान्त हो चुका है। लौटना हो चुका, राज्य बस चुका, नगर का वर्णन हो चुका। कोई काम अधूरा नहीं पड़ा है, और शायद इसीलिये यह प्रसंग वहाँ से शुरू होता है जहाँ से कोई कथा आमतौर पर शुरू नहीं होती, एक खाली दिन से। तुलसी दो अक्षर लगाते हैं, एक बारा, एक बार, और उसके बाद जो बताते हैं वह किसी राजकाज का समाचार नहीं है। वह एक सैर है।
भ्रातन्ह सहित रामु एक बारा । संग परम प्रिय पवनकुमारा॥
चौपाई १
सुंदर उपबन देखन गए । सब तरु कुसुमित पल्लव नए॥
भाइयों सहित राम एक बार, और साथ में परम प्रिय पवनकुमार। ध्यान दीजिये कि हनुमान् को इस पंक्ति में भाइयों के साथ नहीं गिना गया, उन्हें अपना आधा चरण अलग मिला है, संग परम प्रिय पवनकुमारा। यह छोटी-सी अलग जगह इसी प्रसंग के अन्त में काम आयेगी, जहाँ भाई चुप रह जायेंगे और बोलनेवाला यही एक बचेगा। और जिस काम से वे निकले हैं, वह भी देखने लायक है। सुन्दर उपवन देखने गये। देखने। न शिकार, न सभा, न कोई निरीक्षण। उस दिन का काम केवल आँख का था।
और बगीचा कैसा था, यह भी आधी पंक्ति में रख दिया जाता है। सब वृक्ष फूले हुए, और पत्ते नये। यह वर्णन इतना साधारण है कि पढ़ते हुए फिसल जाता है, पर जो चार लोग अगली ही चौपाई में आनेवाले हैं, उनके साथ रखकर देखिये तो यह अपनी जगह बैठ जाता है। नयी पत्तियाँ पुराने पेड़ों पर आती हैं, और पेड़ हर साल वही रहता है। ठीक इसी बगीचे में वे आ रहे हैं जिनके विषय में तुलसी अभी कहेंगे कि देखने में वे बालक हैं और हैं बहुत समय के।
जानि समय सनकादिक आए। तेज पुंज गुन सील सुहाए॥
चौपाई २
समय जानकर सनकादि आये। यही इस आगमन की पूरी भूमिका है। न किसी ने बुलाया, न कोई सूचना पहले भेजी गयी, न कोई द्वारपाल भीतर ख़बर लेकर गया। टीका जानि समय को सुअवसर जानकर पढ़ती है, यानी वे उस घड़ी को पहचानकर आये जो ठीक थी। और ठीक घड़ी वह निकली जिसमें राजा के पास करने को कुछ नहीं था। जिस दिन दरबार लगा होता, उस दिन यह भेंट इस तरह हो ही नहीं सकती थी। खाली समय इस प्रसंग की शर्त है, विषय नहीं।
और आते ही उनके तीन परिचय दे दिये जाते हैं, और तीनों एक ही चरण में आ जाते हैं। तेज का पुञ्ज, गुण, और शील। पहला उनकी देह के विषय में है, दूसरा उनके भीतर के विषय में, और तीसरा उनके बरताव के विषय में। तीनों मिलाकर भी यह नहीं बताते कि वे कौन हैं, और वह अगली चौपाई का काम है।
सार: उत्तरकाण्ड के एक खाली दिन पर राम भाइयों को और परम प्रिय पवनकुमार को साथ लेकर उपवन देखने निकलते हैं, जहाँ सब वृक्ष फूले हुए हैं और पत्ते नये हैं। उसी घड़ी को पहचानकर सनकादि मुनि आ पहुँचते हैं, बिना बुलावे के और बिना सूचना के, तेज के पुञ्ज, गुण और शील से युक्त।
जो देखने में बालक हैं
अब तुलसी इन चारों का परिचय देते हैं, और परिचय में सबसे पहले वह बात रखते हैं जो सामने खड़े होकर भी दिखायी नहीं देती।
ब्रह्मानंद सदा लयलीना। देखत बालक बहुकालीना॥
चौपाई ३
सदा ब्रह्मानन्द में लीन, और देखने में बालक, पर हैं बहुत समय के। बहुकालीना, यह एक शब्द पूरी उम्र ढो रहा है। पंक्ति का असर इसी में है कि दोनों बातें साथ-साथ कह दी गयी हैं और किसी को समझाया नहीं गया। जो सामने खड़े हैं वे सबसे छोटे दिखते हैं और वे ही सबसे पुराने हैं। और आगे जो होने जा रहा है, उसका सारा भार इसी एक बात पर टिका है, क्योंकि जिसके सामने वे खड़े हैं उसे यही स्तुति थोड़ी देर बाद राजाओं का शिरोमणि कहेगी। उम्र एक ओर है और सिंहासन दूसरी ओर, और दोनों एक ही बगीचे में आमने-सामने आ गये हैं।
रूप धरें जनु चारिउ बेदा । समदरसी मुनि बिगत बिभेदा॥
चौपाई ४
आसा बसन ब्यसन यह तिन्हहीं । रघुपति चरित होइ तहँ सुनहीं॥
मानो चारों वेदों ने ही रूप धर लिया हो। चार मुनि, चार वेद, और उपमा में गिनती तक मिल जाती है। फिर दो शब्द उनके स्वभाव के, समदर्शी और भेद से रहित, और फिर एक शब्द उनके पहनावे का, जो इस पूरे परिचय में सबसे चुपचाप बड़ा है। आसा बसन। टीका इसे यों पढ़ती है कि दिशाएँ ही उनके वस्त्र हैं, यानी उनके शरीर पर कुछ है नहीं। ये चार एक राजा के उपवन में इसी तरह चले आये हैं, और आगे किसी पंक्ति में इस पर किसी का ध्यान नहीं जाता।
और फिर वह शब्द, जिसे तुलसी जान-बूझकर यहाँ ले आये हैं। ब्यसन। यह शब्द भले कामों के लिये नहीं चलता, यह लत के लिये चलता है, उस आदत के लिये जो आदमी से छूटती नहीं और जिसके पीछे वह कहीं भी चला जाता है। इन चारों का यही एक व्यसन बताया गया है, कि जहाँ रघुनाथजी का चरित्र होता है वहाँ वे जाकर सुनते हैं। आदत सुनने की है, और वह जगह पर नहीं टिकती, कथा के पीछे चलती है। आज वे उसी के सामने आ खड़े हुए हैं जिसकी कथा सुनने वे जगह-जगह जाते रहे हैं, और यह भी उन्होंने समय जानकर ही किया है।
तहाँ रहे सनकादि भवानी। जहँ घटसंभव मुनिबर ग्यानी॥
चौपाई ५
राम कथा मुनिबर बहु बरनी। ग्यान जोनि पावक जिमि अरनी॥
हे भवानी, सनकादि वहाँ रहे थे जहाँ घटसंभव ज्ञानी मुनिश्रेष्ठ रहते हैं। घटसंभव का अर्थ है घड़े से उत्पन्न, और टीका इस नाम को अगस्त्य कहकर खोलती है। पोद्दार यह भी जोड़ते हैं कि वे वहीं से चले आ रहे थे। और वहाँ हो क्या रहा था, यह अगली आधी पंक्ति बता देती है। उन श्रेष्ठ मुनि ने बहुत-सी राम-कथा कही थी। तो ये चार एक कथा से उठकर सीधे उसके सामने आ गये हैं जिसकी वह कथा थी। पहले सुना, अब देख रहे हैं।
और उस कथा के विषय में तुलसी जो उपमा देते हैं, वह यज्ञ की है। वह कथा ज्ञान को उसी तरह जन्म देती है जैसे अरणि की लकड़ी अग्नि को। अरणि में आग रखी हुई नहीं होती, वह उसमें से निकाली जाती है, और निकालने के लिये रगड़ चाहिये। कथा के विषय में इससे सीधी बात शायद ही कही जा सके। जो चाहिये वह भीतर है, और बिना बार-बार चले वह बाहर नहीं आता। यही कारण है कि इन चारों को एक बार सुनकर सन्तोष नहीं हुआ, और यही कारण है कि वे आज भी चलकर आये हैं।
पर इस चौपाई में एक और चीज़ है, जो पढ़ते हुए आसानी से निकल जाती है। बीच में एक सम्बोधन पड़ा है, भवानी। यानी यह सब कोई किसी को सुना रहा है, और सुननेवाली का नाम ठीक उसी पंक्ति में आता है जिसमें यह बताया जा रहा है कि वे चारों मुनि कहीं बैठकर राम-कथा सुनकर आ रहे हैं। एक कथा के भीतर एक कथा है। जिस काम के लिये वे चारों जगह-जगह घूमते हैं, वही काम इस समय, इसी पंक्ति में, कोई और कर रहा है।
सार: चारों मुनि सदा ब्रह्मानन्द में लीन हैं, देखने में बालक और उम्र में बहुत पुराने, मानो चारों वेदों ने रूप धर लिया हो। दिशाएँ ही उनका वस्त्र हैं, और उनका एक ही व्यसन है, जहाँ राम-चरित हो वहाँ जाकर सुनना। वे घटसंभव मुनि के यहाँ से आ रहे हैं जहाँ बहुत-सी राम-कथा कही गयी थी, और उसी चौपाई में कहनेवाला अपनी सुननेवाली भवानी को पुकार लेता है।
राजा पहले झुकता है
अब वह दोहा, जिसके लिये यह पन्ना याद किया जाता है। इसमें तीन काम होते हैं, तीनों एक ही आदमी करता है, और तीनों वह करता है जिससे इनकी अपेक्षा नहीं की जाती।
देखि राम मुनि आवत हरषि दंडवत कीन्ह।
दोहा ३२
स्वागत पूँछि पीत पट प्रभु बैठन कहँ दीन्ह॥ ३२॥
मुनियों को आते देखकर राम ने हर्षित होकर दण्डवत् की, स्वागत पूछा, और बैठने के लिये अपना पीताम्बर दे दिया। पहले काम में देखि और हरषि साथ-साथ चलते हैं। दण्डवत् करने से पहले प्रसन्नता आ गयी थी, यानी यह शिष्टाचार नहीं था। जो शिष्टाचार से झुकता है वह पहले झुकता है और प्रसन्न बाद में होता है, यदि होता है। दूसरा काम कुशल पूछना है, जो हर मेज़बान करता है। और तीसरे पर रुकना चाहिये।
आसन मँगाया नहीं गया। बिछौना लाया नहीं गया। जो ओढ़ा हुआ था वही उतारकर बिछा दिया गया। एक राजा के पास बैठने की जगह बनवाने के सौ तरीके होते हैं, और उनमें से कोई भी इतनी देर नहीं लेता जितनी अपना वस्त्र उतारने में लगती है, और कोई भी इतना कहता नहीं। और जिनके लिये यह बिछाया गया, उनके पास अपना कोई वस्त्र है ही नहीं। यह बात अभी दो चौपाई पहले कही जा चुकी है। जिसके पास कपड़ा नहीं, उसी के लिये कपड़ा बिछ गया, और बिछानेवाले ने वह दिया जो उसके अपने ऊपर था।
इसके बाद तीनों भाइयों ने, हनुमान् सहित, दण्डवत् की, और सबको बड़ा सुख हुआ। क्रम पर ध्यान दीजिये। पहले राजा ज़मीन पर गया, उसके बाद घर के लोग। किसी ने किसी से कहा नहीं, कोई आज्ञा नहीं हुई, और होती भी तो देर हो चुकी होती। जिस घर में सबसे बड़ा पहले झुक जाता है, उस घर में झुकने की आज्ञा देनी नहीं पड़ती। और इसी दण्डवत् के बाद मुनि उस छबि को देखते हैं और वहीं मग्न हो जाते हैं, मन रोके नहीं रुकता।
और अब वह चौपाई, जिसमें दो शरीर एक साथ अटक जाते हैं।
स्यामल गात सरोरुह लोचन । सुंदरता मंदिर भव मोचन॥
चौपाई ६
एकटक रहे निमेष न लावहिं । प्रभु कर जोरें सीस नवावहिं॥
श्यामल शरीर, कमल जैसे नेत्र, सुन्दरता का मन्दिर, जन्म-मृत्यु से छुड़ानेवाला। यहाँ तक यह वर्णन है। पर इसके बाद जो आता है वह वर्णन नहीं, दृश्य है। मुनि एकटक रह गये, पलक तक नहीं मारते। और उसी चौपाई के दूसरे आधे में, प्रभु हाथ जोड़े सिर नवा रहे हैं। दोनों आधी पंक्तियाँ एक ही बात कह रही हैं, कि किसी का शरीर रुक नहीं रहा। उनकी आँख नहीं झपकती, उनके हाथ नहीं खुलते। और दोनों को एक ही चौपाई में, आमने-सामने रखा गया है, ताकि पढ़नेवाले से यह न छूटे कि यहाँ विनय किसी एक ओर से नहीं हो रही।
ज़रा ठहरकर इस दृश्य को देखिये। चार लोग खड़े हैं जो पलक नहीं मार रहे, और सामने वह खड़ा है जिसका सिर नीचे जा रहा है और फिर नीचे जा रहा है। दोनों ओर कोई किसी को रोक नहीं रहा। जो देख रहे हैं वे देखे बिना नहीं रह सकते, और जो दिख रहा है वह झुके बिना नहीं रह सकता। इस बगीचे में उस समय ऐसा कोई नहीं था जो यह हिसाब लगाता कि किसे किसके आगे कितना झुकना था।
और इसके बाद वह पंक्ति आती है जिसमें कारण पहले रखा गया है और परिणाम बाद में।
तिन्ह कै दसा देखि रघुबीरा । स्रवत नयन जल पुलक सरीरा॥
चौपाई ७
कर गहि प्रभु मुनिबर बैठारे । परम मनोहर बचन उचारे॥
उनकी दशा देखकर रघुवीर के नेत्रों से जल बहने लगा और शरीर पुलकित हो गया। कारण अपने भीतर का नहीं है। आँसू इसलिये नहीं आये कि भीतर कुछ उमड़ा, आँसू इसलिये आये कि सामने किसी की हालत देखी गयी। थोड़ी देर पहले वे उसे देखकर मग्न हुए थे, अब वह उन्हें देखकर द्रवित है, और शब्द तक वही लौट आये हैं, पुलक और नयन। यह अनुकरण नहीं है, यह उसी एक चीज़ का दोनों ओर से बह निकलना है।
और तब वह काम होता है जिसके बिना यह भेंट आगे बढ़ ही नहीं सकती थी। हाथ पकड़कर उन्होंने श्रेष्ठ मुनियों को बैठाया। बैठाने के लिये पहले छूना पड़ा। जो एकटक खड़े रह गये थे वे अपने आप बैठनेवाले नहीं थे, और पीताम्बर बिछा हुआ पड़ा था। बिछाना पूरी बात नहीं थी, बिठाना बाकी था। और तब, सबके बैठ जाने के बाद, वे परम मनोहर वचन बोलते हैं।
सार: मुनियों को आते देखकर राम हर्षित होकर दण्डवत् करते हैं, कुशल पूछते हैं और बैठने के लिये अपना पीताम्बर बिछा देते हैं। उनके बाद तीनों भाई और हनुमान् दण्डवत् करते हैं। मुनि उस छबि में मग्न होकर पलक नहीं मारते और प्रभु हाथ जोड़े सिर नवाते रहते हैं। उनकी दशा देखकर राम के नेत्रों से जल बहता है, और वे हाथ पकड़कर उन्हें बैठाते हैं।
आजु धन्य मैं
बैठ जाने के बाद जो पहला वाक्य कहा जाता है, वह मेज़बान का वाक्य नहीं लगता।
आजु धन्य मैं सुनहु मुनीसा। तुम्हरें दरस जाहिं अघ खीसा॥
चौपाई ८
बड़े भाग पाइब सतसंगा। बिनहिं प्रयास होहिं भवभंगा॥
हे मुनीश्वरो, सुनिये, आज मैं धन्य हूँ, आपके दर्शन से पाप नष्ट हो जाते हैं। यह कौन कह रहा है और किससे, इस पर ठहरिये। घर का मालिक अपने अतिथि से कह रहा है कि आपके आने से मेरा दिन बन गया। और इतना कहकर छोड़ता नहीं, आगे बढ़कर कारण भी बता देता है। बड़े भाग्य से सत्संग मिलता है। जो अभी-अभी हुआ है उसे वह अपनी कमाई नहीं, अपना भाग्य बता रहा है, और भाग्य वह चीज़ है जिस पर किसी का हाथ नहीं होता।
और फिर वे दो शब्द, जो इस पूरे पन्ने पर अकेले खड़े हैं। बिनहिं प्रयास। सत्संग से भव का बन्धन बिना ही परिश्रम टूट जाता है। इस पन्ने पर हर चीज़ मेहनत माँगती है। मुनि चलकर आये हैं, राजा ज़मीन पर लेटा है, स्तुति गढ़ी जा रही है, और आगे एक प्रश्न पूछने में चार लोगों की हिम्मत जवाब दे जायेगी। इन सबके बीच केवल एक चीज़ ऐसी बतायी गयी है जो अपने आप हो जाती है, और वह है किसी के पास बैठ जाना। जो सबसे कठिन काम है उसका साधन सबसे आसान रखा गया है।
संत संग अपबर्ग कर कामी भव कर पंथ।
दोहा ३३
कहहिं संत कबि कोबिद श्रुति पुरान सदग्रंथ॥ ३३॥
संत का संग अपवर्ग का मार्ग है और कामी का संसार का। इस दोहे की बनावट में एक बात रखी हुई है जो कहने में छूट जाती है। पहली ओर संग का नाम लिया गया है, संत संग। दूसरी ओर केवल एक आदमी का नाम है, कामी, और टीका उसे भी संग ही पढ़ती है, कामी का संग। यानी दोनों रास्ते साथ के रास्ते हैं। पूछा यह नहीं जा रहा कि साथ रहा जाये या अकेले। पूछा यह जा रहा है कि साथ किसका। और यह ऐसा प्रश्न है जिसका उत्तर हर आदमी रोज़ देता है, बिना यह जाने कि दे रहा है।
और दूसरी पंक्ति में गवाह गिनाये जाते हैं, और गिनती देखने लायक है। संत, कवि, कोविद, श्रुति, पुराण और सद्ग्रन्थ। एक इतनी सीधी बात के लिये छह गवाह। बात सीधी है और उस पर चलना सीधा नहीं, और शायद इसीलिये इतने नाम एक साथ रख दिये गये हैं। जिस बात को कोई मानने से इनकार नहीं करता, वही सबसे कम बरती जाती है, और ऐसी ही बातों के नीचे सबसे लम्बी गवाही लगानी पड़ती है।
और इस पूरे दोहे की सबसे चुपचाप बात यह है कि यह कह कौन रहा है। जिसका अपना वचन इन्हीं ग्रन्थों में लिखा जाता है, वही ग्रन्थों का नाम लेकर बात पक्की कर रहा है। और गिनाते समय उसने अपना नाम उन छह में नहीं जोड़ा। जो चाहता तो कह सकता था कि मैं कहता हूँ, वह कह रहा है कि सब कहते हैं।
सार: बैठाने के बाद राम कहते हैं कि आज वे धन्य हैं, मुनियों के दर्शन से पाप नष्ट होते हैं, सत्संग बड़े भाग्य से मिलता है और उससे बिना परिश्रम ही भव का बन्धन टूट जाता है। और दोहे में वे इसे संत, कवि, कोविद, श्रुति, पुराण और सद्ग्रन्थ, सबकी गवाही से बाँध देते हैं कि संत का संग मोक्ष का मार्ग है और कामी का संग संसार का।
नामों का ढेर, और फिर एक माँग
प्रभु के वचन सुनकर चारों मुनि हर्षित हो गये, शरीर पुलकित हो गया, और स्तुति चल पड़ी। यह स्तुति लम्बी है, और उसका ढंग पकड़ लेने पर उसका मर्म अपने आप खुलता है। शुरू में क्रिया लगभग एक भी नहीं है। पहली तीन चौपाइयाँ केवल नाम हैं। जय भगवन्, अनन्त, अनामय, अनघ, अनेक, एक, करुणामय। फिर निर्गुण की जय, और उसी साँस में गुणों के समुद्र की जय। सुख का मन्दिर, सुन्दर, अति चतुर, लक्ष्मीपति, पृथ्वी को धारण करनेवाला, उपमारहित, अजन्मा, अनादि, शोभा की खान।
ध्यान दीजिये कि निर्गुण और गुणसागर, दोनों की जय एक ही चरण में बोल दी गयी है और बीच में कोई सफ़ाई नहीं दी गयी। जिन दो शब्दों को मिलाने में शास्त्र को अध्याय लग जाते हैं, उन्हें ये चार एक साँस में बोलकर आगे बढ़ जाते हैं। स्तुति करनेवाले के पास बहस का समय नहीं होता। उसके सामने जो खड़ा है वह दोनों है, और यह देख लेने के बाद कोई पूछता नहीं कि हो कैसे सकता है।
ग्यान निधान अमान मानप्रद । पावन सुजस पुरान बेद बद॥
चौपाई ९
तग्य कृतग्य अग्यता भंजन। नाम अनेक अनाम निरंजन॥
ज्ञान के भण्डार, मानरहित, और मान देनेवाले। इस एक चरण में इस पूरे पन्ने का सार बैठा हुआ है, और उसका प्रमाण कुछ पंक्तियाँ पहले ही दिया जा चुका है। जिसने अभी अपना ओढ़ा हुआ वस्त्र उतारकर बिछा दिया, उसे अमान मानप्रद कहना कोई उपाधि लगाना नहीं है। वह उसी दृश्य की ओर उँगली उठाना है जो अभी-अभी इसी बगीचे में घट चुका है। स्तुति यहाँ कल्पना नहीं कर रही, वह गवाही दे रही है।
और उसी चौपाई में दो शब्द और हैं जिन पर रुकना बनता है। तत्त्व का जाननेवाला, और की हुई सेवा को माननेवाला। पहला अपेक्षित है, दूसरा नहीं। जो सब जानता है उसके लिये यह कहना कि वह किसी की की हुई सेवा को भूलता नहीं, उसे उस जगह खड़ा कर देता है जहाँ लेन-देन चलता है। और ये चार जिस समय यह कह रहे हैं, उस समय वे उसी वस्त्र पर बैठे हुए हैं।
और चौपाई का अन्त वहाँ होता है जहाँ यह पूरी स्तुति अपने ऊपर हँस पड़ती है। आपके अनेक नाम हैं और आपका कोई नाम नहीं है। यह पंक्ति नामों के ढेर के भीतर से आती है। जो अभी-अभी बीस से अधिक नाम बोल चुके हैं, वही कह रहे हैं कि नाम कोई नहीं। और कहकर वे स्तुति बन्द नहीं करते। वे केवल इतना मानकर आगे बढ़ जाते हैं कि जो किया जा रहा है वह पूरा नहीं पड़ेगा, और फिर भी करना है।
अगली चौपाई में स्तुति का मिज़ाज बदल जाता है। अब तक नाम थे, अब माँगें शुरू होती हैं, और वे एक के बाद एक आती हैं। आप सबरूप हैं, सबमें व्याप्त हैं, सबके हृदय रूपी घर में बसते हैं, अब हमारा पालन कीजिये। द्वन्द्व, विपत्ति और भव का फन्दा काट दीजिये। हृदय में बसकर काम और मद का नाश कर दीजिये। और इस अन्तिम माँग में एक शब्द लौट आया है। काम। अभी दोहे में कामी के संग को संसार का मार्ग कहा गया था, और अब उसी जड़ को हृदय के भीतर से उखाड़ने के लिये कहा जा रहा है। संग बाहर की चीज़ है और उसकी जड़ भीतर है, और स्तुति दोनों जगह एक ही शब्द रखती है।
परमानंद कृपायतन मन परिपूरन काम।
दोहा ३४
प्रेम भगति अनपायनी देहु हमहि श्रीराम॥ ३४॥
परमानन्दस्वरूप, कृपा के धाम, मन की कामनाओं को पूरा करनेवाले, हमें अविचल प्रेमाभक्ति दीजिये। अब इस माँग को उसके सन्दर्भ में रखकर देखिये। कुछ ही पंक्तियाँ पहले, इसी बैठक में, कहा गया था कि संत का संग अपवर्ग का मार्ग है। जो लोग स्वयं वह संग हैं, और जिनके विषय में यही पन्ना कह चुका है कि वे सदा ब्रह्मानन्द में लीन रहते हैं, वे अपने लिये अपवर्ग नहीं माँगते। वे प्रेम की भक्ति माँगते हैं।
और उस भक्ति के साथ एक विशेषण लगाते हैं, अनपायनी, जो कभी जाय नहीं। यह विशेषण अपने भीतर एक डर छिपाये हुए है, और वह डर न मिलने का नहीं है, खो देने का है। माँगनेवाला जानता है कि जो मिलता है वह चला भी जाता है, और इसलिये वह वस्तु नहीं माँगता, वस्तु के साथ उसका ठहरना माँगता है। इतनी लम्बी स्तुति के बाद जो एक चीज़ माँगी गयी, उसमें भी सबसे अधिक ज़ोर उसके बने रहने पर है।
सार: चारों मुनि पुलकित होकर स्तुति करते हैं, जिसमें पहले केवल नाम हैं, निर्गुण और गुणसागर एक ही साँस में, और यह भी कि आपके अनेक नाम हैं और कोई नाम नहीं। वे उन्हें मानरहित और मान देनेवाला कहते हैं, फिर द्वन्द्व, विपत्ति, भव का फन्दा, काम और मद का नाश माँगते हैं, और दोहे में अपने लिये अपवर्ग नहीं, अविचल प्रेमाभक्ति माँगते हैं।
जो माँगा गया, और जो मिला
माँग एक बार कह दी गयी, पर स्तुति रुकती नहीं, और आगे की चार चौपाइयाँ उसी एक माँग को घुमा-घुमाकर कहती हैं। पहले वही बात फिर से। हमें अपनी अत्यन्त पवित्र करनेवाली भक्ति दीजिये, जो तीनों तापों और जन्म-मरण के क्लेश का नाश कर दे। फिर दो नाम, जो माँगनेवालों ने सोच-समझकर चुने हैं। शरणागत की कामना पूरी करने के लिये आप कामधेनु हैं और कल्पवृक्ष हैं। और उसके तुरन्त बाद, प्रसन्न होकर यही एक वर दीजिये।
कल्पवृक्ष के सामने खड़े होकर एक चीज़ माँगना आसान नहीं है। कल्पवृक्ष का नाम लेने का अर्थ ही यह है कि माँगनेवाला जानता है कि जो चाहे मिल सकता है। और उसी साँस में वह अपनी माँग को यह बरु कहकर एक कर देता है। उपमा बड़ी रखी गयी और थैली छोटी, और यह असंगति जान-बूझकर रखी गयी है। जिसे सब कुछ मिल सकता हो और जो एक ही चीज़ माँगे, उसने माँगने से पहले अपना हिसाब पूरा कर लिया है।
भव बारिधि कुंभज रघुनायक। सेवत सुलभ सकल सुख दायक॥
चौपाई १०
मन संभव दारुन दुख दारय । दीनबंधु समता बिस्तारय॥
आप भव रूपी समुद्र के लिये कुम्भज हैं, हे रघुनायक। कुम्भज का अर्थ भी वही है, घड़े से उत्पन्न, और टीका इसे अगस्त्य बताती है, वही मुनि जिन्होंने समुद्र पी लिया था। अब उस चौपाई पर लौटिये जो कुछ ही देर पहले आयी थी। ये चारों वहीं से चलकर आये हैं जहाँ घटसंभव रहते हैं। जिस आश्रम से वे उठे हैं, उसी के स्वामी का नाम उनकी उपमा बन गया है। जो अभी देखकर आये हैं, वही हाथ में आया है, और स्तुति में सबसे अच्छी उपमा प्रायः इसी तरह आती है।
और उसी चौपाई में एक और माँग है, जो ऊपर से देखने पर अजीब लगती है। हे दीनबन्धु, समता का विस्तार कीजिये। यह उन लोगों की माँग है जिन्हें कुछ ही चौपाइयाँ पहले तुलसी स्वयं समदरसी कह चुके हैं। जिनके पास वह चीज़ है, वही उसका फैलाव माँग रहे हैं। टीका इस माँग में कोष्ठक लगाकर हममें जोड़ती है, यानी वह इसे उन्हीं के भीतर बढ़ने की प्रार्थना पढ़ती है। और उसी पंक्ति में मन से उत्पन्न दारुण दुःखों को काटने के लिये भी कहा गया है, यानी दुःख की जड़ बाहर नहीं मानी गयी।
आगे की चौपाई में तीन चीज़ें हटाने को कही गयी हैं और तीन बढ़ाने को, और दोनों सूचियाँ आमने-सामने रख दी गयी हैं। आशा, त्रास और ईर्ष्या आदि के निवारक, और विनय, विवेक तथा वैराग्य के विस्तारक। फिर सम्बोधन बदलता है और राजा को राजा कहकर पुकारा जाता है, राजाओं के शिरोमणि, पृथ्वी के भूषण। और फिर वही माँग, इस बार एक नयी उपमा के साथ। संसृति रूपी नदी के लिये नौका रूप अपनी भक्ति दीजिये।
उपमा बदल गयी है, और यह देखने लायक है। अभी एक चौपाई पहले भव समुद्र था और उसका उत्तर वह मुनि था जो उसे पी जाता है। अब वह नदी है और उसका उत्तर एक नाव है। समुद्र के लिये कोई असाधारण चाहिये, नदी के लिये वह चाहिये जो हर घाट पर बँधी मिलती है। माँगनेवालों ने बड़ी उपमा पहले रखी और छोटी बाद में, और दोनों बार माँग वही की वही रही। जिसे भक्ति कहा जा रहा है वह कभी समुद्र पीनेवाला है और कभी घाट की नाव, और दोनों में पार उतरना एक ही है।
अगली चौपाई में वे उन्हें मुनियों के मन रूपी मानसरोवर का हंस कहते हैं, और फिर यह जोड़ते हैं कि उनके चरणकमल ब्रह्मा और शंकर से वन्दित हैं। यह वाक्य इस कथा में एक अलग ही जगह जाकर बैठता है, क्योंकि जो इस समय यह कथा सुना रहे हैं, वे वही शंकर हैं। कहनेवाला अपने ही नाम को अपनी कही जा रही स्तुति के भीतर सुनता है, और आगे बढ़ जाता है। और इसी चौपाई का अन्त चार चीज़ों को खा जाने पर होता है, काल, कर्म, स्वभाव और गुण।
तारन तरन हरन सब दूषन। तुलसिदास प्रभु त्रिभुवन भूषन॥
चौपाई ११
स्वयं तरे हुए और दूसरों को तारनेवाले, सब दोषों के हरनेवाले, तीनों लोकों के भूषण, और फिर वह शब्द जो इस पूरी स्तुति में सबसे अप्रत्याशित है, तुलसिदास प्रभु। कवि ने अपनी छाप कथा कहते हुए नहीं लगायी। उसने अपना नाम इन चारों के मुँह में रख दिया। जो चार सदा ब्रह्मानन्द में लीन बताये गये हैं, उनकी स्तुति के अन्तिम चरण में एक और आदमी चुपचाप उनके साथ आ खड़ा होता है, और इसके लिये उसने वही जगह चुनी जहाँ स्तुति सबसे ऊँचे पहुँच चुकी थी।
बार बार अस्तुति करि प्रेम सहित सिरु नाइ।
दोहा ३५
ब्रह्म भवन सनकादि गे अति अभीष्ट बर पाइ॥ ३५॥
बार-बार स्तुति करके, प्रेम सहित सिर नवाकर, अपना अत्यन्त मनचाहा वर पाकर सनकादि ब्रह्मलोक को गये। इस दोहे में जो नहीं है, वह उसमें जो है उससे बड़ा है। वर देने का कोई दृश्य नहीं है। कोई वाक्य ऐसा नहीं है जिसमें कहा गया हो कि यह वर दिया गया। माँग पिछली पंक्ति तक चल रही थी और अगली पंक्ति में वह मिल चुकी है, और बीच में कुछ नहीं। जिस बैठक की शुरुआत में इतना समय दण्डवत् और पीताम्बर पर लगा, उसके अन्त में देने की क्रिया के लिये एक शब्द भी नहीं लगा।
और जो मिला, उसे तुलसी अति अभीष्ट कहते हैं, अत्यन्त मनचाहा। यानी वही मिला जो माँगा गया था, न उससे कम और न बदले में कुछ और। यह छोटी-सी बात इस स्तुति को पीछे से पढ़वा देती है। इतनी लम्बी स्तुति में उन्होंने एक बार भी वह नहीं माँगा जो आमतौर पर माँगा जाता है। और अन्त में उन्हें वही मिला, जिससे यह साफ़ हो जाता है कि माँग में कोई भूल नहीं हुई थी। वे बगीचे में जितना लेकर आये थे, उससे केवल एक चीज़ अधिक लेकर लौटे।
सार: स्तुति आगे भी उसी एक माँग को दोहराती है, भक्ति। वे उन्हें कामधेनु और कल्पवृक्ष कहकर भी एक ही वर माँगते हैं, भव समुद्र के लिये कुम्भज और संसृति रूपी नदी के लिये नौका कहते हैं, समता का विस्तार माँगते हैं, और अन्तिम चरण में तुलसीदास का नाम आ जाता है। फिर बार-बार स्तुति करके और सिर नवाकर, अत्यन्त मनचाहा वर पाकर सनकादि ब्रह्मलोक को चले जाते हैं।
जो पूछा नहीं गया
चारों चले गये, और बगीचे में वही लोग रह गये जो सुबह निकले थे। और अब वह होता है जो इस पन्ने का सबसे मानवीय हिस्सा है, और जिसके लिये कोई भूमिका नहीं बाँधी गयी।
सनकादिक बिधि लोक सिधाए । भ्रातन्ह राम चरन सिर नाए॥
चौपाई १२
पूछत प्रभुहि सकल सकुचाहीं । चितवहिं सब मारुतसुत पाहीं॥
सनकादि ब्रह्मलोक को चले गये, तब भाइयों ने राम के चरणों में सिर नवाया। और इसके बाद दो आधी पंक्तियाँ आती हैं जिनमें एक पूरा घर खड़ा हो जाता है। सब प्रभु से पूछते सकुचाते हैं। और सब हनुमान् की ओर देख रहे हैं। भाई हैं, पास बैठे हैं, अभी-अभी चरणों में सिर नवाकर उठे हैं, और एक प्रश्न पूछने के लिये मुँह नहीं खोल पा रहे। इस पन्ने पर मुनि आये और बोल गये, और जो घर के हैं वे अटक गये।
और फिर वह आधी पंक्ति, जिसमें इस घर का नक्शा खिंच जाता है। सब हनुमान् की ओर देख रहे हैं। जो घर का नहीं है, उसकी ओर घर के लोग देख रहे हैं। इसी पन्ने की पहली चौपाई याद कीजिये, जहाँ भाइयों को एक साथ गिनकर हनुमान् को अलग आधा चरण दिया गया था। वह अलग जगह अब काम आ गयी। भाई का अधिकार बड़ा होता है, और उसी के अनुपात में उसका संकोच भी बड़ा होता है। सेवक वह पूछ लेता है जो भाई से पूछते नहीं बनता, क्योंकि सेवक को यह डर नहीं होता कि उसका पूछना कोई और अर्थ रखता होगा।
वे चाहते क्या हैं, यह अगली पंक्ति बता देती है। वे प्रभु के मुख की वह वाणी सुनना चाहते हैं जिसे सुनकर सारे भ्रम मिट जायें। और फिर वह वाक्य आता है जिस पर कथा एक क्षण के लिये रुक जाती है। अन्तर्यामी प्रभु सब जान गये, और तब पूछा, कहो हनुमान्, क्या बात है। जानना पहले हो चुका था, पूछना उसके बाद हुआ। जो सब जानता है वह भी पूछता है, क्योंकि जब तक कोई कहे नहीं, तब तक बात बात नहीं बनती। भीतर पड़ा हुआ प्रश्न किसी के मुँह से निकलकर ही प्रश्न होता है, और यही कारण है कि उसने जाननेवाले की तरह नहीं, पूछनेवाले की तरह बात शुरू की।
हनुमान् हाथ जोड़कर बोले, और उन्होंने जो कहा उसमें एक चीज़ नहीं है। हे दीनदयाल, हे भगवन्, सुनिये। हे नाथ, भरत कुछ पूछना चाहते हैं, पर प्रश्न करते हुए मन में सकुचा रहे हैं। उन्होंने नाम बताया और कठिनाई बतायी। प्रश्न नहीं बताया। जिस दूत को एक सन्देश पहुँचाना है, वह सन्देश की जगह भेजनेवाले की हालत लेकर आया है। और यही उस समय काम की चीज़ थी, क्योंकि अटका हुआ प्रश्न नहीं था, अटकी हुई हिम्मत थी।
तुम्ह जानहु कपि मोर सुभाऊ । भरतहि मोहि कछु अंतर काऊ॥
चौपाई १३
सुनि प्रभु बचन भरत गहे चरना। सुनहु नाथ प्रनतारति हरना॥
हनुमान्, आप तो मेरा स्वभाव जानते ही हैं, भरत में और मुझमें कभी कोई अन्तर है। उत्तर पर ध्यान दीजिये। यह भरत को नहीं दिया गया, हनुमान् को दिया गया, जबकि बात भरत की है। जिस रास्ते से बात आयी थी, उत्तर उसी रास्ते से लौटाया गया। और उसमें यह नहीं कहा गया कि पूछ लीजिये। उसमें संकोच का कारण उखाड़ दिया गया। संकोच वहाँ होता है जहाँ दो होते हैं, और उत्तर में दो होना ही नहीं माना गया।
और यह सुनते ही भरत ने चरण पकड़ लिये। जो अब तक चुप बैठे थे, वे बोलने से पहले पकड़ते हैं। हे नाथ, हे शरणागत का दुःख हरनेवाले, सुनिये। इस पूरे प्रसंग में यह दूसरी बार है जब कोई किसी के शरीर को छूकर बात आगे बढ़ाता है। पहली बार हाथ पकड़कर मुनियों को बिठाया गया था, और वह चुप्पी तब टूटी थी। अब चरण पकड़े गये हैं, और यह चुप्पी अब टूटेगी।
नाथ न मोहि संदेह कछु सपनेहुँ सोक न मोह।
दोहा ३६
केवल कृपा तुम्हारिहि कृपानंद संदोह॥ ३६॥
हे नाथ, मुझे कोई सन्देह नहीं है, स्वप्न में भी शोक और मोह नहीं है, और यह केवल आपकी ही कृपा है। यह वाक्य प्रश्न नहीं है, यह प्रश्न के आगे रखी हुई सफ़ाई है। भरत जानते हैं कि एक प्रश्न सुननेवाले को कैसा लग सकता है, कि इसके भीतर कहीं सन्देह बैठा होगा, या कोई दुःख होगा, या कोई उलझन। इसलिये वे पहले यही बात साफ़ कर देते हैं। और सपनेहुँ जैसा शब्द लगाकर करते हैं, स्वप्न में भी नहीं। जागते हुए अपने को सँभाला जा सकता है, सपने पर किसी का बस नहीं चलता, इसलिये अपने विषय में इससे बड़ी बात कोई कह नहीं सकता।
और यहीं यह पन्ना बन्द हो जाता है। प्रश्न नहीं आता। भूमिका पूरी हो चुकी है, संकोच हट चुका है, चरण पकड़े जा चुके हैं, और जो पूछा जाना है वह अगले प्रसंग के लिये रखा रह जाता है। तुलसी ने पूरा एक दोहा प्रश्न पूछने की तैयारी में लगा दिया और प्रश्न को अगले पन्ने पर जाने दिया। जिस चीज़ को कहने में इतनी देर लगती है, उसे पढ़नेवाला भी उसी देर के साथ पाता है।
सार: सनकादि के जाते ही भाई चरणों में सिर नवाते हैं, पर प्रभु से पूछते सकुचाते हैं और सब हनुमान् की ओर देखते हैं। अन्तर्यामी प्रभु सब जानकर भी पूछते हैं, और हनुमान् हाथ जोड़कर बताते हैं कि भरत कुछ पूछना चाहते हैं पर सकुचा रहे हैं। उत्तर में कहा जाता है कि भरत में और मुझमें कभी कोई अन्तर नहीं, और भरत चरण पकड़कर कहते हैं कि उन्हें कोई सन्देह नहीं, स्वप्न में भी शोक और मोह नहीं, यह केवल कृपा है।
और अन्त में, अपनी ओर
इस पन्ने पर दो बार लोग चुप हो जाते हैं, और दोनों चुप्पियाँ एक जैसी नहीं हैं। पहली बार मुनि चुप होते हैं। उनका व्यसन ही कथा सुनना बताया गया है, और जिसकी कथा वे सुनते रहे हैं उसके सामने पड़ते ही वे एकटक रह जाते हैं, पलक तक नहीं मारते। उनकी चुप्पी भर जाने की चुप्पी है, और वह तब टूटती है जब कोई हाथ पकड़कर उन्हें बैठा देता है। दूसरी बार भाई चुप होते हैं। उनके पास कहने को एक साफ़ बात है और वह निकलती नहीं। उनकी चुप्पी संकोच की है, और वह तब टूटती है जब कोई तीसरा उनकी ओर से बोल देता है। एक चुप्पी को स्पर्श चाहिये था, दूसरी को दूत।
दूसरी बात इस पन्ने की बनावट की है। यह वहाँ खुलता है जहाँ एक आदमी अपना ओढ़ा हुआ वस्त्र उतारकर ज़मीन पर बिछा देता है, और वहाँ बन्द होता है जहाँ एक आदमी किसी के चरण पकड़ लेता है। बीच में स्तुति है, वर है, और एक लम्बी चुप्पी है। पर दोनों सिरों पर वही एक काम हो रहा है, कि कोई अपने को नीचे रख रहा है। और दोनों बार वह पहले करता है जिससे इसकी अपेक्षा नहीं थी, एक बार राजा और एक बार वह जिससे कहा जा चुका है कि उसमें और मुझमें कोई अन्तर नहीं।
और तीसरी बात वह है जो इस पन्ने पर है ही नहीं। सीता का नाम एक बार भी नहीं आता। जो तीन भाई दण्डवत् करते हैं उनके नाम नहीं आते, और भरत का नाम भी तब आता है जब हनुमान् उसे लेते हैं। चारों मुनियों में से किसी एक का नाम अलग से नहीं आता, वे आदि से अन्त तक सनकादि ही रहते हैं। और वह प्रश्न, जिसके लिये इतना संकोच हुआ और इतनी भूमिका बँधी, इस पन्ने पर पूछा नहीं जाता।
सत्संग की महिमा इस पन्ने पर कही भी गयी है और दिखायी भी गयी है, और दोनों में फ़र्क़ बड़ा है। कही तो एक दोहे में गयी, कि संत का संग मोक्ष का रास्ता है और कामी का संग संसार का, और उसके नीचे छह गवाह लगा दिये गये। दिखायी वहाँ गयी जहाँ किसी ने बगीचे में अपना पीताम्बर उतारकर बिछा दिया, जहाँ किसी की आँख नहीं झपकी, जहाँ किसी के आँसू दूसरे की दशा देखकर बहे। जो शब्दों में एक पंक्ति है, वह दृश्य में पाँच दोहे लेता है, और पढ़नेवाले के पास अन्त में दोनों रहते हैं।
और आख़िरी बात, जो देर तक साथ रहती है। जो चार यहाँ आये थे उन्हें कुछ चाहिये नहीं था। वे सदा ब्रह्मानन्द में लीन बताये गये हैं, और जिस दिन की बात है उस दिन वे एक कथा सुनकर ही उठे थे। फिर भी वे चलकर आये, और आकर उन्होंने एक चीज़ माँगी, प्रेम की वह भक्ति जो कभी जाय नहीं। जिनके पास सब कुछ था उन्होंने वह माँगा जो ऊपर से किसी काम का नहीं दिखता, और जिसके पास देने को सब कुछ था उसने सबसे पहले अपना ओढ़ा हुआ वस्त्र दिया। इसी लेन-देन के लिये वह पूरा दिन खाली रखा गया था।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, उत्तरकाण्ड, दोहा ३२ से ३६, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।