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सनकादि का आगमन, और भरत का संकोच

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रामचरितमानसउत्तरकाण्डप्रसंग 7

उपवन देखने निकले हुए एक राजा के सामने चार बालक आ खड़े होते हैं जो उससे कहीं पुराने हैं। राजा पहले झुकता है। कथा वहाँ रुकती है जहाँ एक भाई प्रश्न पूछने की पूरी तैयारी करके प्रश्न नहीं पूछता।

इस प्रसंग में कोई युद्ध नहीं, कोई यात्रा नहीं, कोई संकट नहीं। एक राजा अपने भाइयों को लेकर बगीचा देखने निकलता है। रास्ते में चार मेहमान आ जाते हैं। वह उन्हें देखते ही दण्डवत् करता है, अपना ओढ़ा हुआ पीताम्बर उनके बैठने के लिये बिछा देता है, और कहता है कि आज वह धन्य है। मेहमान उसकी स्तुति करते हैं, एक वर माँगते हैं, और चले जाते हैं। और उनके जाने के बाद वह होता है जो उस दिन की सबसे अनोखी बात है। जो बरसों से उसके साथ हैं, वे उससे एक प्रश्न पूछना चाहते हैं और पूछ नहीं पाते।

यह उत्तरकाण्ड का सातवाँ प्रसंग है। बीच में खुल जाता है कि यह कथा किसी को सुनायी जा रही है: शिव पार्वती को पुकारते हैं। उसी वाक्य में वे बताते हैं कि जिन चार मुनियों की बात हो रही है, वे भी अभी कहीं बैठकर राम-कथा सुनकर आ रहे हैं। एक कथा के भीतर एक कथा है, और दोनों जगह कोई बैठकर सुन रहा है।

तीसरी बात इस प्रसंग का विषय है। जो चार यहाँ आते हैं वे देखने में बालक हैं और उम्र में उस राजा से कहीं बड़े। राजा पहले झुकता है, और उसके बाद उसका घर। अतिथि देखते रह जाते हैं, और मेज़बान के हाथ जुड़े ही रह जाते हैं। इस भेंट में बड़ाई कहीं उस ओर नहीं जाती जिस ओर वह जाती दिखती है।

राजा के सामने चार मुनि

  • राम वह राजा, जिसे इसी प्रसंग की स्तुति राजाओं का शिरोमणि कहती है, और जो अतिथियों को आते देखकर सबसे पहले दण्डवत् करता है।
  • सनकादि चार मुनि, देखने में बालक और उम्र में बहुत पुराने, जिनका एक ही व्यसन है, जहाँ राम-चरित हो वहाँ जाकर सुनना।
  • हनुमान साथ चलने वाले परम प्रिय, जिनका नाम पहली ही बार भाइयों से अलग लिया जाता है। वे अन्त में वह बात कह देते हैं जो भाई नहीं कह पाते।
  • भरत जिनका नाम उपवन की इस भेंट में सबसे अन्त में आता है, और जिनका प्रश्न इस प्रसंग में आता ही नहीं।
  • अगस्त्य जिन्हें मानस घटसंभव मुनि कहता है। उन्हीं के यहाँ से सनकादि चले आ रहे हैं, जहाँ बहुत-सी राम-कथा कही गयी थी। अगस्त्य नाम टीका का है।
  • पार्वती वह सुनने वाली, जिन्हें शिव यह सारी कथा सुना रहे हैं, और जिनका नाम इसी प्रसंग में एक बार बीच में आ जाता है।

उपवन देखने निकले हुए

उत्तरकाण्ड यहाँ तक आते-आते शान्त हो चुका है। लौटना हो चुका, राज्य बस चुका, नगर का वर्णन हो चुका। यह प्रसंग एक ख़ाली दिन से शुरू होता है। कथा कहती है, एक बार, और उसके बाद जो बताती है वह किसी राजकाज का समाचार नहीं, एक सैर है।

भाइयों सहित राम एक बार, और साथ में परम प्रिय हनुमान। हनुमान को यहाँ भाइयों के साथ नहीं गिना गया। उनका नाम अलग से लिया गया है: साथ में परम प्रिय पवनकुमार। यह अलग जगह इसी प्रसंग के अन्त में काम आयेगी, जहाँ भाई चुप रह जायेंगे और बोलने वाला यही एक बचेगा। और जिस काम से वे निकले हैं: सुन्दर उपवन देखने। न शिकार, न सभा, न कोई निरीक्षण। उस दिन का काम केवल आँख का था।

बगीचा कैसा था, यह भी थोड़े में कहा गया है: सब वृक्ष फूले हुए, और पत्ते नये। यह वर्णन साधारण है, पर आगे आने वाले चार लोगों के साथ यह अपनी जगह बैठ जाता है। नयी पत्तियाँ पुराने पेड़ों पर आती हैं। इसी बगीचे में वे आ रहे हैं जिनके बारे में कथा अभी कहेगी कि देखने में वे बालक हैं और हैं बहुत समय के।

समय जानकर सनकादि आये। इस आगमन की पूरी भूमिका इतनी ही है। न किसी ने बुलाया, न कोई सूचना पहले भेजी गयी। टीका इसे सुअवसर जानकर आना पढ़ती है, यानी वे उस घड़ी को पहचानकर आये जो ठीक थी। और ठीक घड़ी वह निकली जिसमें राजा के पास करने को कुछ नहीं था। जिस दिन दरबार लगा होता, उस दिन यह भेंट इस तरह न होती।

आते ही उनके तीन परिचय एक साथ दे दिये जाते हैं: तेज के पुञ्ज, गुण, और शील। पहला उनके देह के विषय में है, दूसरा उनके भीतर के, तीसरा उनके बरताव के। वे कौन हैं, यह आगे खुलता है।

जो देखने में बालक हैं

अब कथा इन चारों का परिचय देती है, और सबसे पहले वह बात रखती है जो सामने खड़े होकर भी दिखायी नहीं देती।

सदा ब्रह्मानन्द में लीन, देखने में बालक, पर हैं बहुत समय के। बहुकालीन, यह एक शब्द पूरी उम्र ढो रहा है, और दोनों बातें साथ-साथ कह दी गयी हैं, बिना समझाये। जो सामने खड़े हैं वे सबसे छोटे दिखते हैं और वही सबसे पुराने हैं। और जिसके सामने वे खड़े हैं, उसे इन्हीं की स्तुति थोड़ी देर बाद राजाओं का शिरोमणि कहेगी। उम्र एक ओर है और सिंहासन दूसरी ओर, और दोनों एक ही बगीचे में आमने-सामने हैं।

मानो चारों वेदों ने ही रूप धर लिया हो: चार मुनि, चार वेद, और उपमा में गिनती तक मिल जाती है। फिर दो शब्द उनके स्वभाव के, समदर्शी और भेद से रहित, और फिर एक बात उनके पहनावे की। टीका इसे यों पढ़ती है कि दिशाएँ ही उनके वस्त्र हैं, यानी उनके शरीर पर कुछ है नहीं। ये चार एक राजा के उपवन में इसी तरह चले आये हैं।

और फिर वह शब्द, व्यसन। यह शब्द भले कामों के लिये नहीं चलता, लत के लिये चलता है, उस आदत के लिये जो छूटती नहीं और जिसके पीछे आदमी कहीं भी चला जाता है। इन चारों का यही एक व्यसन बताया गया है, कि जहाँ राम का चरित्र कहा जाता है वहाँ वे जाकर सुनते हैं। आदत सुनने की है, और वह कथा के पीछे चलती है। आज वे उसी के सामने आ खड़े हुए हैं जिसकी कथा सुनने वे जगह-जगह जाते रहे हैं।

शिव पार्वती से कहते हैं कि सनकादि वहाँ गये थे जहाँ ज्ञानी मुनिश्रेष्ठ घटसंभव रहते हैं। घटसंभव का अर्थ है घड़े से उत्पन्न, और टीका इस नाम को अगस्त्य कहकर खोलती है। पोद्दार यह भी जोड़ते हैं कि सनकादि वहीं से चले आ रहे थे। और वहाँ क्या हो रहा था, यह भी बताया गया है: उन श्रेष्ठ मुनि ने बहुत-सी राम-कथा कही थी। ये चार एक कथा से उठकर सीधे उसके सामने आ गये हैं जिसकी वह कथा थी। पहले सुना, अब देख रहे हैं।

उस कथा के लिये यज्ञ की उपमा दी गयी है: वह कथा ज्ञान को उसी तरह जन्म देती है जैसे अरणि की लकड़ी अग्नि को। अरणि में आग रखी हुई नहीं होती, उसमें से निकाली जाती है, और निकालने के लिये रगड़ चाहिये। जो चाहिये वह भीतर है, और बिना बार-बार चले वह बाहर नहीं आता।

इसी बात के बीच में सम्बोधन पड़ा है, भवानी: यह सब शिव पार्वती को सुना रहे हैं। सुनने वाली का नाम ठीक उसी वाक्य में आता है जिसमें बताया जा रहा है कि चारों मुनि कहीं बैठकर राम-कथा सुनकर आ रहे हैं। जिस काम के लिये वे चारों जगह-जगह घूमते हैं, वही काम इस समय, इसी घड़ी, पार्वती कर रही हैं।

राजा पहले झुकता है

अब वह बात जिसके लिये सनकादि की यह भेंट याद की जाती है। इसमें तीन काम होते हैं, तीनों एक ही आदमी करता है, और तीनों वह करता है जिससे इनकी अपेक्षा नहीं की जाती।

मुनियों को आते देखकर राम ने हर्षित होकर दण्डवत् की, स्वागत पूछा, और बैठने के लिये अपना पीताम्बर बिछा दिया। पहले काम में देखना और हर्षित होना साथ चलते हैं: दण्डवत् से पहले प्रसन्नता आ गयी थी, यानी यह शिष्टाचार नहीं था। दूसरा काम कुशल पूछना है, जो हर मेज़बान करता है। तीसरा काम सबसे ज़्यादा कहता है।

आसन मँगाया नहीं गया, बिछौना लाया नहीं गया। जो ओढ़ा हुआ था वही उतारकर बिछा दिया गया। एक राजा के पास बैठने की जगह बनवाने के सौ तरीक़े होते हैं, और उनमें से कोई इतना नहीं कहता। और जिनके लिये यह बिछाया गया, उनके पास अपना कोई वस्त्र है ही नहीं। यह बात थोड़ा पहले कही जा चुकी है। जिसके पास कपड़ा नहीं, उसी के लिये कपड़ा बिछ गया, और बिछाने वाले ने वह दिया जो उसके अपने ऊपर था।

इसके बाद तीनों भाइयों ने, हनुमान सहित, दण्डवत् की, और सबको बड़ा सुख हुआ। पहले राजा झुका, उसके बाद घर के लोग। किसी ने किसी से कहा नहीं, कोई आज्ञा नहीं हुई। जिस घर में सबसे बड़ा पहले झुक जाता है, उसमें झुकने की आज्ञा देनी नहीं पड़ती। और मुनि राम की अतुलनीय छबि देखकर उसी में मग्न हो जाते हैं। मन रोके नहीं रुकता।

और अब वह घड़ी जिसमें दो ओर के शरीर एक साथ अटक जाते हैं।

साँवला शरीर, कमल जैसे नेत्र, सुन्दरता के धाम, जन्म-मृत्यु से छुड़ाने वाले: यहाँ तक वर्णन है। इसके बाद दृश्य है। मुनि एकटक रह गये, पलक तक नहीं मारते। और उसी घड़ी राम हाथ जोड़े सिर नवा रहे हैं। दोनों दृश्य एक ही बात कहते हैं, कि किसी का शरीर रुक नहीं रहा: उनकी आँख नहीं झपकती, राम के हाथ नहीं खुलते। दोनों एक ही घड़ी में आमने-सामने हैं, और विनय किसी एक ओर से नहीं हो रही।

चार लोग खड़े हैं जो पलक नहीं मार रहे, और सामने वह खड़ा है जिसका सिर बार-बार नीचे जा रहा है। जो देख रहे हैं वे देखे बिना नहीं रह सकते, और जो दिख रहा है वह झुके बिना नहीं रह सकता। उस समय उस बगीचे में कोई यह हिसाब नहीं लगा रहा था कि किसे किसके आगे कितना झुकना था।

और फिर वह बात आती है जिसमें कारण पहले है और परिणाम बाद में।

उनकी दशा देखकर राम के नेत्रों से जल बहने लगा और शरीर पुलकित हो गया। आँसू इसलिये नहीं आये कि भीतर कुछ उमड़ा। इसलिये आये कि सामने किसी की हालत देखी गयी। थोड़ी देर पहले मुनि राम को देखकर मग्न हुए थे। अब राम उन्हें देखकर द्रवित हैं। यह अनुकरण नहीं, उसी एक चीज़ का दोनों ओर से बह निकलना है।

और तब वह काम होता है जिसके बिना यह भेंट आगे नहीं बढ़ सकती थी: राम ने हाथ पकड़कर श्रेष्ठ मुनियों को बैठाया। जो एकटक खड़े रह गये थे वे अपने आप बैठने वाले नहीं थे, और पीताम्बर बिछा हुआ पड़ा था। बिछाना पूरी बात नहीं थी, बिठाना बाक़ी था। और सबके बैठ जाने के बाद राम परम मनोहर वचन बोलते हैं।

आज मैं धन्य हूँ

बैठ जाने के बाद जो पहला वाक्य कहा जाता है, वह मेज़बान का वाक्य नहीं लगता।

राम कहते हैं, “मुनीश्वरो, सुनिये, आज मैं धन्य हूँ। आपके दर्शन से ही सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। बड़े भाग्य से सत्संग मिलता है, जिससे बिना परिश्रम ही जन्म-मृत्यु का चक्र टूट जाता है।” घर का मालिक अतिथि के आने को अपना सौभाग्य कह रहा है। वह कारण भी बताता है: जो अभी हुआ है उसे वह अपनी कमाई नहीं, अपना भाग्य बताता है।

और फिर वे दो शब्द, बिना परिश्रम। बगीचे के इस दिन हर चीज़ मेहनत माँगती है: मुनि चलकर आये हैं, राजा दण्डवत् करता है, स्तुति गढ़ी जायगी। और आगे एक प्रश्न पूछने में भाइयों की हिम्मत जवाब दे जायगी। इन सबके बीच एक ही चीज़ अपने आप होने वाली बतायी गयी है, और वह है किसी संत के पास बैठ जाना।

फिर राम कहते हैं, “संत का संग मोक्ष का मार्ग है और कामी का संग संसार का। संत, कवि, पण्डित, वेद, पुराण और सब सद्ग्रन्थ ऐसा कहते हैं।” पहली ओर संग का नाम है, संत का संग। दूसरी ओर राम केवल एक आदमी का नाम लेते हैं, कामी, और टीका उसे भी संग पढ़ती है, कामी का संग। दोनों रास्ते साथ के रास्ते हैं। पूछा यह नहीं जा रहा कि साथ रहा जाय या अकेले। पूछा यह जा रहा है कि साथ किसका।

और फिर गवाह गिनाये जाते हैं: संत, कवि, पण्डित, वेद, पुराण और सद्ग्रन्थ। एक सीधी बात के लिये छह गवाह, क्योंकि बात सीधी है पर उस पर चलना सीधा नहीं।

और यह बात कह कौन रहा है: वह जिसकी कथा सुनने मुनि जगह-जगह जाते हैं, ग्रन्थों का नाम लेकर बात पक्की कर रहा है। गिनाते समय वह अपना नाम उन छह में नहीं जोड़ता। वह यह नहीं कहता, “मैं कहता हूँ”। वह कहता है, “सब कहते हैं।”

नामों का ढेर, और फिर एक माँग

राम के वचन सुनकर चारों मुनि हर्षित हो गये, शरीर पुलकित हो गया, और स्तुति चल पड़ी। स्तुति लम्बी है। उसके शुरू में लगभग कोई क्रिया नहीं, केवल नाम हैं: भगवान, अनन्त, विकार से रहित, एक भी और अनेक भी, करुणामय। निर्गुण की जय, और साथ ही गुणों के समुद्र की जय। सुख के धाम, अजन्मा, अनादि, शोभा की खान।

निर्गुण और गुणसागर, दोनों की जय बोल दी गयी है, बीच में कोई सफ़ाई नहीं। जिन दो शब्दों को मिलाने में शास्त्र को अध्याय लग जाते हैं, उन्हें ये चार एक साँस में बोलकर आगे बढ़ जाते हैं। उनके सामने जो खड़ा है वह दोनों है, और यह देख लेने के बाद कोई नहीं पूछता कि हो कैसे सकता है।

इसी लड़ी में एक नाम है: स्वयं मान से रहित, और दूसरों को मान देने वाले। जिसने अभी अपना ओढ़ा हुआ वस्त्र उतारकर बिछा दिया, उसे यह कहना कोई उपाधि लगाना नहीं, उसी दृश्य की ओर उँगली उठाना है जो अभी इसी बगीचे में घटा है। स्तुति यहाँ कल्पना नहीं, गवाही दे रही है।

वहीं दो शब्द और हैं: तत्त्व के जानने वाले, और की हुई सेवा को मानने वाले। पहला अपेक्षित है, दूसरा नहीं। जो सब जानता है उसके बारे में यह कहना कि वह किसी की की हुई सेवा को भूलता नहीं, उसे उस जगह खड़ा कर देता है जहाँ लेन-देन चलता है। और ये चार जिस समय यह कह रहे हैं, उस समय उसी पीताम्बर पर बैठे हैं।

यह हिस्सा वहाँ ख़त्म होता है जहाँ स्तुति अपनी सीमा मान लेती है: आपके अनेक नाम हैं और आपका कोई नाम नहीं। यह बात नामों के ढेर के भीतर से आती है। जो बीस से अधिक नाम बोल चुके हैं, वही कहते हैं कि नाम कोई नहीं। और कहकर स्तुति बन्द नहीं करते। मानते हैं कि जो किया जा रहा है वह पूरा नहीं पड़ेगा, और फिर भी करना है।

फिर नाम हटकर माँगें शुरू होती हैं। मुनि कहते हैं, “आप सबरूप हैं, सबमें व्याप्त हैं, सबके हृदय में सदा बसते हैं। हमारा पालन कीजिये। द्वन्द्व, विपत्ति और भव का फन्दा काट दीजिये। हे राम, हमारे हृदय में बसकर काम और मद का नाश कर दीजिये।” अन्तिम माँग में एक शब्द लौट आया है, काम। अभी राम ने कामी के संग को संसार का मार्ग कहा था। अब उसी जड़ को हृदय के भीतर से उखाड़ने को कहा जा रहा है।

फिर मुनि कहते हैं, “आप परमानन्द हैं, कृपा के धाम हैं, मन की कामनाएँ पूरी करने वाले हैं। हे राम, हमें अपनी अविचल प्रेमा-भक्ति दीजिये।” कुछ ही देर पहले इसी बैठक में कहा गया था कि संत का संग मोक्ष का मार्ग है। जो स्वयं वह संग हैं, और जिनके बारे में कथा कह चुकी है कि वे सदा ब्रह्मानन्द में लीन रहते हैं, वे अपने लिये मोक्ष नहीं माँगते। वे प्रेम की भक्ति माँगते हैं।

और उस भक्ति के साथ एक विशेषण लगाते हैं: जो कभी जाय नहीं। इस विशेषण में एक डर छिपा है, न मिलने का नहीं, खो देने का। माँगने वाला जानता है कि जो मिलता है वह चला भी जाता है, इसलिये वह वस्तु के साथ उसका ठहरना माँगता है।

जो माँगा गया, और जो मिला

माँग एक बार कह दी गयी, पर स्तुति रुकती नहीं। आगे वही माँग घुमा-घुमाकर कही जाती है। मुनि कहते हैं, “हे राम, हमें अपनी बहुत पवित्र करने वाली भक्ति दीजिये, जो तीनों तापों और जन्म-मरण के क्लेश का नाश करे।” फिर दो नाम: शरणागत की कामना पूरी करने के लिये कामधेनु और कल्पवृक्ष। और तुरन्त बाद, “प्रसन्न होकर हमें यही वर दीजिये।”

कल्पवृक्ष के सामने खड़े होकर एक चीज़ माँगना आसान नहीं। कल्पवृक्ष का नाम लेने का अर्थ ही यह है कि माँगने वाला जानता है कि जो चाहे मिल सकता है। और वहीं वह अपनी माँग को यही एक वर कह देता है। जिसे सब कुछ मिल सकता हो और जो एक ही चीज़ माँगे, उसने माँगने से पहले अपना हिसाब पूरा कर लिया है।

फिर मुनि उन्हें भव रूपी समुद्र के लिये कुम्भज कहते हैं। कुम्भज का अर्थ भी घड़े से उत्पन्न है, और टीका इसे अगस्त्य बताती है, वही मुनि जो समुद्र सोख लेने के लिये जाने जाते हैं। ये चारों वहीं से चलकर आये हैं जहाँ घटसंभव रहते हैं, और जिस आश्रम से वे उठे हैं, उसी के स्वामी का नाम उनकी उपमा बन गया है।

फिर एक और माँग है: “हे दीनबन्धु, मन से उपजे दारुण दुःखों को काटिये और समता का विस्तार कीजिये।” यह उनकी माँग है जिन्हें कथा कुछ पहले स्वयं समदर्शी कह चुकी है। जिनके पास वह चीज़ है, वही उसका फैलाव माँग रहे हैं। टीका कोष्ठक में “हममें” जोड़ती है, यानी इसे उन्हीं के भीतर बढ़ने की प्रार्थना पढ़ती है। और दुःखों को मन से उपजा कहा गया है। उनकी जड़ बाहर नहीं मानी गयी।

आगे तीन चीज़ें हटाने वाले और तीन बढ़ाने वाले की बात आमने-सामने है: आशा, भय और ईर्ष्या आदि के निवारक, और विनय, विवेक तथा वैराग्य के विस्तारक। फिर राजा को राजा कहकर पुकारा जाता है, राजाओं के शिरोमणि, पृथ्वी के भूषण। वही माँग एक नयी उपमा के साथ आती है: “संसार की धारा रूपी नदी के लिये नाव जैसी अपनी भक्ति दीजिये।”

उपमा बदल गयी है। अभी-अभी भव समुद्र था और उसका उत्तर वह मुनि जो उसे सोख लेते हैं। अब वह नदी है और उसका उत्तर एक नाव। समुद्र के लिये कोई असाधारण चाहिये, नदी के लिये वह जो हर घाट पर बँधी मिलती है। दोनों बार माँग वही की वही रही, और दोनों में पार उतरना एक ही है।

फिर मुनि उन्हें मुनियों के मन रूपी मानसरोवर का हंस कहते हैं, और जोड़ते हैं कि उनके चरण ब्रह्मा और शिव से वन्दित हैं। यह वाक्य इस कथा में एक अलग जगह बैठता है, क्योंकि जो इस समय यह कथा सुना रहे हैं, वे वही शिव हैं। कहने वाला अपना ही नाम अपनी सुनायी जा रही स्तुति के भीतर लेता है और आगे बढ़ जाता है। और यह बात चार चीज़ों को खा जाने पर ख़त्म होती है, काल, कर्म, स्वभाव और गुण।

स्वयं तरे हुए और दूसरों को तारने वाले, सब दोषों को हरने वाले, तीनों लोकों के भूषण, और फिर, तुलसीदास के स्वामी। स्तुति इन चार मुनियों के मुँह में है, और उसके अन्त में कवि अपना नाम, तुलसीदास, रख देते हैं।

बार-बार स्तुति करके, प्रेम सहित सिर नवाकर, अपना बहुत मनचाहा वर पाकर सनकादि ब्रह्मलोक को गये। यहाँ वर देने का कोई दृश्य नहीं। कोई वाक्य नहीं जिसमें कहा गया हो कि यह वर दिया गया। माँग अभी तक चल रही थी और अगले ही वाक्य में वह मिल चुकी है। जिस बैठक की शुरुआत में इतना समय दण्डवत् और पीताम्बर पर लगा, उसके अन्त में देने की क्रिया के लिये एक शब्द भी नहीं लगा।

और जो मिला, उसे कथा बहुत मनचाहा कहती है। यानी वही मिला जो माँगा गया था। जिन्हें कुछ चाहिये नहीं था, वे बगीचे में जितना लेकर आये थे, उससे एक ही चीज़ अधिक लेकर लौटे।

जो पूछा नहीं गया

चारों चले गये, और बगीचे में वही लोग रह गये जो उपवन देखने निकले थे। और अब इस कथा का बहुत मानवीय हिस्सा आता है, बिना किसी भूमिका के।

सनकादि ब्रह्मलोक को चले गये, तब भाइयों ने राम के चरणों में सिर नवाया। और फिर दो छोटी बातों में एक पूरा घर खड़ा हो जाता है: सब राम से पूछते सकुचाते हैं, और सब हनुमान की ओर देख रहे हैं। भाई हैं, पास बैठे हैं, अभी चरणों में सिर नवाकर उठे हैं, और एक प्रश्न पूछने के लिये मुँह नहीं खोल पा रहे। बगीचे में मुनि आये और बोल गये, और जो घर के हैं वे अटक गये।

जो घर का नहीं है, उसकी ओर घर के लोग देख रहे हैं। शुरू में भाइयों को एक साथ गिनकर हनुमान का नाम अलग लिया गया था। वह अलग जगह अब काम आ गयी। भाई का अधिकार बड़ा होता है, और उसी के अनुपात में उसका संकोच भी। सेवक वह पूछ लेता है जो भाई से पूछते नहीं बनता।

वे चाहते क्या हैं, यह भी बताया गया है: राम के मुख की वह वाणी सुनना जिसे सुनकर सारे भ्रम मिट जायँ। अन्तर्यामी राम सब जान गये, और तब पूछा, “कहिये हनुमान, क्या बात है?” जानना पहले हो चुका था, पूछना उसके बाद हुआ। जब तक कोई कहे नहीं, बात बात नहीं बनती। भीतर पड़ा प्रश्न किसी के मुँह से निकलकर ही प्रश्न होता है, और राम पूछने वाले की तरह बात शुरू करते हैं।

हनुमान हाथ जोड़कर कहते हैं, “भगवन्, सुनिये। नाथ, भरत कुछ पूछना चाहते हैं, पर प्रश्न करते हुए मन में सकुचा रहे हैं।” उन्होंने नाम बताया और कठिनाई बतायी। प्रश्न नहीं बताया। अटका हुआ प्रश्न नहीं था, अटकी हुई हिम्मत थी, और हनुमान वही लेकर आये।

राम कहते हैं, “हनुमान, आप तो मेरा स्वभाव जानते ही हैं। भरत में और मुझमें कभी कोई अन्तर है?” उत्तर भरत को नहीं, हनुमान को दिया गया, जबकि बात भरत की है। जिस रास्ते से बात आयी थी, उत्तर उसी रास्ते से लौटा। और उसमें यह नहीं कहा गया कि पूछ लीजिये। संकोच का कारण ही उखाड़ दिया गया: संकोच वहाँ होता है जहाँ दो होते हैं, और उत्तर में दो होना ही नहीं माना गया।

यह सुनते ही भरत ने राम के चरण पकड़ लिये, और कहा, “नाथ, सुनिये।” जो अब तक चुप बैठे थे, वे बोलने से पहले चरण पकड़ते हैं। इस प्रसंग में यह दूसरी बार है जब कोई किसी को छूकर बात आगे बढ़ाता है। पहली बार हाथ पकड़कर मुनियों को बिठाया गया था, और वह चुप्पी तब टूटी थी। अब चरण पकड़े गये हैं, और यह चुप्पी अब टूटेगी।

भरत कहते हैं, “नाथ, मुझे कुछ भी सन्देह नहीं है, और स्वप्न में भी शोक और मोह नहीं है। यह केवल आपकी ही कृपा है।” यह वाक्य प्रश्न नहीं, प्रश्न के आगे रखी हुई सफ़ाई है। भरत जानते हैं कि एक प्रश्न सुनने वाले को ऐसा लग सकता है कि उसके भीतर कहीं सन्देह या दुःख बैठा होगा। इसलिये वे पहले यही साफ़ कर देते हैं, और स्वप्न में भी कहकर करते हैं। जागते हुए अपने को सँभाला जा सकता है, सपने पर किसी का बस नहीं चलता।

और कथा यहीं रुक जाती है। प्रश्न नहीं आता। भूमिका पूरी हो चुकी है, संकोच हट चुका है, चरण पकड़े जा चुके हैं, और जो पूछा जाना है वह अगले प्रसंग के लिये रह जाता है। पूरी एक बात प्रश्न पूछने की तैयारी में जाती है, और प्रश्न आगे के प्रसंग तक जाता है।

दो चुप्पियाँ, एक पीताम्बर

उपवन के इस दिन दो बार लोग चुप हो जाते हैं, और दोनों चुप्पियाँ एक जैसी नहीं। पहली बार मुनि चुप होते हैं: जिसकी कथा वे सुनते रहे हैं, उसके सामने पड़ते ही वे एकटक रह जाते हैं। उनकी चुप्पी भर जाने की है, और वह तब टूटती है जब कोई हाथ पकड़कर उन्हें बैठा देता है। दूसरी बार भाई चुप होते हैं: उनके पास कहने को एक साफ़ बात है और वह निकलती नहीं। उनकी चुप्पी संकोच की है, और वह तब टूटती है जब कोई तीसरा उनकी ओर से बोल देता है। एक चुप्पी को स्पर्श चाहिये था, दूसरी को दूत।

कथा वहाँ खुलती है जहाँ एक आदमी अपना ओढ़ा हुआ वस्त्र उतारकर बिछा देता है, और वहाँ रुकती है जहाँ एक आदमी किसी के चरण पकड़ लेता है। बीच में स्तुति है, वर है, और एक लम्बी चुप्पी। दोनों सिरों पर एक ही काम हो रहा है। कोई अपने को नीचे रख रहा है: एक बार राजा, और एक बार वह भाई जिसके और अपने बीच राम कोई अन्तर नहीं मानते।

और जो इस भेंट में है ही नहीं: सीता का नाम एक बार भी नहीं आता। जो तीन भाई दण्डवत् करते हैं उनके नाम नहीं आते, और भरत का नाम भी तब आता है जब हनुमान उसे लेते हैं। चारों मुनियों में से किसी का नाम अलग से नहीं आता। वे आदि से अन्त तक सनकादि ही रहते हैं। और वह प्रश्न, जिसके लिये इतना संकोच हुआ और इतनी भूमिका बँधी, यहाँ पूछा नहीं जाता।

सत्संग की महिमा इस बैठक में कही भी गयी है और दिखायी भी गयी है। कही एक बार में गयी, कि संत का संग मोक्ष का रास्ता है और कामी का संग संसार का, और उसके नीचे छह गवाह लगा दिये गये। दिखायी वहाँ गयी जहाँ किसी ने बगीचे में अपना पीताम्बर उतारकर बिछा दिया, जहाँ किसी की आँख नहीं झपकी, जहाँ किसी के आँसू दूसरे की दशा देखकर बहे।

जो चार यहाँ आये थे उन्हें कुछ चाहिये नहीं था। वे सदा ब्रह्मानन्द में लीन बताये गये हैं, और उस दिन एक कथा सुनकर ही उठे थे। फिर भी वे चलकर आये, और आकर उन्होंने एक चीज़ माँगी, प्रेम की वह भक्ति जो कभी जाय नहीं। जिनके पास सब कुछ था उन्होंने वह माँगा जो ऊपर से किसी काम का नहीं दिखता। जिसके पास देने को सब कुछ था उसने सबसे पहले अपना ओढ़ा हुआ वस्त्र दिया।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, उत्तरकाण्ड, दोहा 32 से 36, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।