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पहला जन्म और कलियुग का वर्णन

रामचरितमानस · उत्तरकाण्ड · पहला जन्म और कलियुग का वर्णन

पहला जन्म और कलियुग का वर्णन

अयोध्या की एक गली में जन्मा हुआ आदमी, जिसने उसी नगरी में रहते हुए उसकी महिमा नहीं जानी। और उसके बाद वह लम्बा चिट्ठा, जिसमें आदर के सारे नाम अपनी जगह खड़े रहते हैं और उनके नीचे खड़े आदमी बदल जाते हैं।

यह पन्ना एक आदमी की आत्मकथा से खुलता है और कुछ ही पंक्तियों में पूरे एक युग का चिट्ठा बन जाता है। कहनेवाला वही पक्षी है जो उत्तरकाण्ड के इस हिस्से में गरुड़ को कथा सुना रहा है। पिछला प्रसंग जिस दोहे पर रुका था, उसमें उसने घोषणा कर दी थी कि अब वह अपने पहले जन्म का चरित कहेगा, और यह भी बता दिया था कि बात पूर्व के किसी एक कल्प की है और उस समय कलियुग चल रहा था। यहाँ का पहला ही शब्द उसी घोषणा पर हाथ रखता है, तेहिं, उस। उस कलियुग में।

पन्ने के दो हिस्से हैं और उनकी लम्बाई बराबर नहीं है। पहला चार चौपाइयों का है, जिनमें कहनेवाला अपना युग, अपना नगर, अपना शरीर और अपने अवगुण गिनाता है। दूसरा दोहा ९७ की दूसरी छमाही से शुरू होकर पन्ने के अन्त तक चलता है, और वह कलियुग का वर्णन है, इतना लम्बा कि कहनेवाले को तीन बार रुककर कहना पड़ता है कि यह पूरा कहा नहीं जा सकता। दोनों हिस्सों को जोड़नेवाली पंक्ति अवध के विषय में है, और वही इस पन्ने की सबसे हल्की और सबसे बड़ी पंक्ति है।

और एक बात शुरू में ही कह देनी चाहिये, क्योंकि उसके बिना यह चिट्ठा गलत पढ़ा जायेगा। जो सूची यहाँ बनती है वह पापों की सूची नहीं है। दोहा ९७ की दूसरी छमाही में कहनेवाले ने अपने विषय का नाम स्वयं रख दिया है, कलिधर्म, कलियुग का धर्म। यानी आगे जो गिनाया जायेगा वह वह नहीं है जिसे उस युग में बुरा माना जाता था। वह वह है जिसे उस युग में धर्म माना जाता था।

इस प्रसंग के मुख्य किरदार

  • काकभुशुण्डि गरुड़ को यह सारी कथा सुनानेवाला कौआ। इस पन्ने पर वह पहले अयोध्या का वह शूद्र है जिसे अपनी ही नगरी की महिमा का पता नहीं था, और फिर वह गवाह है जो एक पूरे युग के आचरण का हिसाब देता है। इन पंक्तियों में उनका नाम एक बार भी नहीं आता।
  • गरुड़ सुननेवाले, जो इस पन्ने पर एक शब्द नहीं बोलते। पद्य उन्हें उरगारी, हरिजान, खगेस, ब्यालारि, गोसाईं और तात कहकर पुकारता है, और टीका उनका नाम गरुड़ लेती है।
  • शिव पहली ही चौपाई में, उस जन्म के इष्ट की तरह। कहनेवाला मन, वचन और कर्म से उन्हीं का सेवक था। आगे इस पन्ने पर शिव का नाम नहीं आता।
  • राम इस पन्ने पर वे किसी दृश्य में नहीं हैं। वे तीन जगह नाम की तरह आते हैं: जिनकी राजधानी में यह जन्म हुआ, जिनके हृदय में बसने पर अवध का प्रभाव जाना जाता है, और अन्तिम दोहे का वह हरि-नाम जिससे कलियुग में लोग बिना परिश्रम पार उतर जाते हैं।
  • अवध वह नगरी जो इस पन्ने पर किसी किरदार की तरह काम करती है। पद्य उसे कोसलपुर और अवध कहता है, टीका अयोध्यापुरी। पूरे चिट्ठे में यही एक चीज़ है जिसके विषय में कोई शिकायत नहीं है।

उस कलियुग में, कोसलपुर में, एक शरीर

पहली पंक्ति में जो क्रम रखा गया है, उसे धीरे-धीरे पढ़ना चाहिये, क्योंकि उसमें चार चीज़ें हैं और वे इसी क्रम में आती हैं। पहले युग, फिर नगर, फिर जन्म, और सबसे बाद में शरीर। कहनेवाला यह नहीं कहता कि मैं शूद्र था और अयोध्या में रहता था। वह कहता है कि उस कलियुग में मैं कोसलपुर जाकर जन्मा, और जन्मते समय शूद्र का शरीर पाया। शरीर सबसे अन्त में मिलता है, जैसे कोई चीज़ रास्ते में पकड़ा दी गयी हो। और उसी चौपाई की दूसरी पंक्ति में इस पन्ने का पहला काँटा गड़ा हुआ है।

तेहिं कलिजुग कोसलपुर जाई । जनमत भयउँ सूद्र तनु पाई॥
सिव सेवक मन क्रम अरु बानी। आन देव निंदक अभिमानी॥

चौपाई १

मन, वचन और कर्म से शिव का सेवक। यह जो तीन का नाप है, मन क्रम अरु बानी, रामचरितमानस में वह पूरेपन का नाप है। जिस भक्ति को पूरा कहना हो, उसे इन्हीं तीनों से नापा जाता है। यहाँ वह नाप लगाया गया है और सेवा सचमुच पूरी निकलती है। पर पंक्ति यहाँ रुकती नहीं। उसी साँस में अगला आधा आता है, आन देव निंदक, अभिमानी। दूसरे देवताओं की निन्दा करनेवाला, और घमंडी।

यह जोड़ ध्यान से देखने लायक है। सेवा भी पूरी, और निन्दा भी पूरी, और दोनों एक ही पंक्ति में, एक ही आदमी में। और यह भी देखिये कि दोष किस चीज़ में बताया गया है। शिव की सेवा में नहीं। सेवा वहीं खड़ी रहती है, उस पर कोई उँगली नहीं उठती। जो अवगुण गिनाये गये वे दो हैं, दूसरों की निन्दा और अपना अभिमान। वह जन्म भक्ति से खाली नहीं था। वह भक्ति से भरा हुआ था और उसी भरेपन के साथ बाकी सबके लिये बन्द था।

धन मद मत्त परम बाचाला। उग्रबुद्धि उर दंभ बिसाला॥
जदपि रहेउँ रघुपति रजधानी। तदपि न कछु महिमा तब जानी॥

चौपाई २

अब अवगुणों की गिनती चलती है और हर गिनती के साथ एक बढ़ानेवाला शब्द लगा हुआ है। धन का मद, और उससे मतवाला। बोलनेवाला, और परम बाचाला, बहुत ही बकवादी। बुद्धि, और वह भी उग्र। दम्भ, और वह भी विशाल। चारों में मात्रा जोड़ी गयी है, कोई अवगुण अपनी सादी शक्ल में नहीं रखा गया। यह आदमी थोड़ा-थोड़ा बुरा नहीं था, वह हर चीज़ में पूरा था, और यह पूरापन वही है जो ऊपर की पंक्ति में सेवा और निन्दा दोनों में दिखा था।

और इसके बाद वह पंक्ति आती है जिसके लिये यह सारा परिचय बनाया गया था। जदपि और तदपि। यद्यपि मैं रघुनाथ की राजधानी में ही रहता था, तथापि उस समय मैंने उसकी महिमा कुछ भी नहीं जानी। इस वाक्य की मार इसमें है कि यह दूरी की शिकायत नहीं कर रहा। कहनेवाला यह नहीं कह रहा कि मैं दूर था, वन में था, किसी और देश में था। वह कह रहा है कि मैं ठीक भीतर था। जिस नगरी की महिमा आगे गायी जायेगी, उसी की गलियों में उसका घर था। और अन्तिम दो शब्द, तब जानी, बता देते हैं कि जानने के दो समय हैं और यह उनमें से पहला है।

सार: कहनेवाला बताता है कि उस कलियुग में वह कोसलपुर जाकर शूद्र का शरीर पाकर जन्मा, मन, वचन और कर्म से शिव का सेवक था, दूसरे देवताओं का निन्दक और अभिमानी था, धन के मद में मतवाला, बहुत बकवादी, उग्रबुद्धि और भारी दम्भवाला। और यद्यपि वह रघुनाथ की राजधानी में ही रहता था, तथापि उस समय उसने उस नगरी की महिमा कुछ भी नहीं जानी।

अवध का प्रभाव, और वह शर्त जो उसके साथ लगी है

अगली चौपाई का पहला शब्द ही समय बदल देता है। अब जाना। पिछली पंक्ति में तब था, इसमें अब है, और इन दोनों के बीच बहुत सारे जन्म पड़े हुए हैं। और जो वह जानता है उसे वह अपनी खोज बताकर नहीं कहता।

अब जाना मैं अवध प्रभावा। निगमागम पुरान अस गावा॥
कवनेहुँ जन्म अवध बस जोई । राम परायन सो परि होई॥

चौपाई ३

वेद, शास्त्र और पुराणों ने ऐसा गाया है। यह दूसरी आधी पंक्ति बात को सँभालती है। कहनेवाला अपना अनुभव नहीं गिना रहा, वह हवाला दे रहा है, और हवाला उन्हीं तीनों का है जिनकी निन्दा इसी युग में सबसे अधिक होगी, जैसा आगे दिखेगा। और जो बात वे गाते हैं वह यह है: किसी भी जन्म में जो कोई अवध में बस जाता है, वह अवश्य ही राम के परायण हो जायेगा।

कवनेहुँ जन्म। किसी भी जन्म में। इस पन्ने पर इससे बड़ी बात कोई नहीं है, और इसका पूरा वज़न तभी खुलता है जब हम पहली चौपाई पर लौटकर देखें। वहाँ जन्म की पूरी कुण्डली बिछी हुई थी: युग खराब, शरीर शूद्र का, स्वभाव अभिमानी, जेब में धन और मुँह में निन्दा। उनमें से एक भी चीज़ ऐसी नहीं है जिसे शास्त्र योग्यता कहते हों। और यहाँ कहा जा रहा है कि यह सब गिना ही नहीं जायेगा। शर्त जन्म की नहीं है, शर्त पते की है। और क्रम भी देखिये, कुण्डली पहले आती है और वचन उसका उत्तर बनकर आता है।

अवध प्रभाव जान तब प्रानी। जब उर बसहिं रामु धनुपानी॥
सो कलिकाल कठिन उरगारी । पाप परायन सब नर नारी॥

चौपाई ४

और अब वह शर्त, जो वरदान पर नहीं, उसे पहचानने पर लगी है। अवध का प्रभाव जीव तभी जानता है, जब हाथ में धनुष धारण करनेवाले राम उसके हृदय में निवास करते हैं। दोनों चौपाइयों को साथ रखिये और बात साफ़ हो जायेगी। पाना बिना शर्त है, जानना शर्त के साथ है। वहाँ बस जाना काफ़ी है, पर यह समझ जाना कि वहाँ बस जाने का अर्थ क्या है, उसके लिये भीतर कुछ और चाहिये। इसी से पिछली चौपाई का तब जानी समझ में आ जाता है।

और फिर, बिना किसी भूमिका के, पंक्ति पलट जाती है। सो कलिकाल कठिन उरगारी। वह कलिकाल बड़ा कठिन था। उरगारी, सर्पों का शत्रु, यानी सुननेवाला। इस पन्ने पर यह पहली बार है कि कहनेवाला सिर उठाकर सामने बैठे हुए को पुकारता है, और वह ठीक उसी जगह पुकारता है जहाँ बात अपनी ज़िन्दगी से हटकर पूरे युग पर जा रही है। टीका यहाँ जो काल लगाती है वह भी देखने लायक है, वह कहती है कि वह कलिकाल कठिन था। था, है नहीं।

कलिमल ग्रसे धर्म सब लुप्त भए सदग्रंथ।
दंभिन्ह निज मति कल्पि करि प्रगट किए बहु पंथ॥ ९७ (क)॥

दोहा ९७ (क)

दोहे की पहली पंक्ति में तीन बातें इसी क्रम में रखी गयी हैं। कलियुग के पापों ने सब धर्मों को ग्रस लिया। सद्ग्रन्थ लुप्त हो गये। और तब दम्भियों ने अपनी बुद्धि से कल्पना कर-करके बहुत-से पंथ प्रकट कर दिये। इस क्रम को उलटकर देखिये और यह दोहा कुछ और ही कहने लगेगा। नये पंथ पहले नहीं बने। पहले धर्म खाया गया, फिर किताबें गायब हुईं, और तब जाकर जगह खाली हुई। वे रोग नहीं हैं, वे रोग के बाद उगी हुई घास हैं।

और एक शब्द जान-बूझकर रखा गया है, निज मति कल्पि करि। अपनी ही बुद्धि से कल्पना करके। दोष यह नहीं बताया गया कि जो कहा गया वह झूठ था। दोष यह बताया गया कि वह अपना था। जिस चीज़ का लेखक कोई एक आदमी हो जाय और जिसके पीछे न वेद हो न परम्परा, वह इस दोहे की नज़र में पंथ है, चाहे उसमें कही हुई बातें कितनी ही भली लगें। और यह शब्द, कल्पना, इस पन्ने पर दो बार और लौटेगा।

सार: कहनेवाला कहता है कि अब उसने अवध का प्रभाव जाना है, और वेद, शास्त्र तथा पुराण गाते हैं कि किसी भी जन्म में जो अवध में बस जाय वह अवश्य राम-परायण हो जाता है। पर यह प्रभाव जीव तभी जानता है जब धनुर्धारी राम उसके हृदय में बसें। फिर बात युग पर आ जाती है: दोहा ९७ (क) कहता है कि कलि के पापों ने सब धर्मों को ग्रस लिया, सद्ग्रन्थ लुप्त हो गये, और दम्भियों ने अपनी बुद्धि से कल्पना करके बहुत-से पंथ खड़े कर दिये।

कलिधर्म: एक शब्द जो पूरे चिट्ठे को खोल देता है

भए लोग सब मोहबस लोभ ग्रसे सुभ कर्म।
सुनु हरिजान ग्यान निधि कहउँ कछुक कलिधर्म॥ ९७ (ख)॥

दोहा ९७ (ख)

पहली पंक्ति में वही क्रिया दुबारा आती है जो अभी-अभी ऊपर आ चुकी थी। ऊपर कलि के मल ने धर्म को ग्रसे किया था, यहाँ लोभ ने शुभ कर्मों को ग्रस लिया। एक ही दोहे में दो बार खाने की क्रिया। युग का वर्णन तुलसी किसी रंग या किसी अँधेरे से नहीं करते, वे उसे निगलने की क्रिया से करते हैं, और निगलनेवाला हर बार कोई और होता है।

और दूसरी पंक्ति में वह होता है जिसके लिये यह दोहा यहाँ रखा गया है। सुननेवाले को पुकारा जाता है, हरिजान, और ग्यान निधि, ज्ञान का भण्डार। और जो सुनाया जायेगा उसका नाम भी उसी पंक्ति में रख दिया गया है, कलिधर्म। धर्म वह चीज़ है जिसे मानकर लोग चलते हैं, जिस पर उन्हें गर्व होता है, जिसे वे अपने बच्चों को सिखाते हैं। और आगे जो सूची आती है वह सचमुच उसी तरह की सूची है। उसमें कोई छिपकर किया हुआ पाप नहीं है। सब कुछ खुले में है, और सबको उसके लिये आदर मिल रहा है।

और एक छोटा शब्द इस पंक्ति में और है, कछुक। कुछ थोड़े-से कलिधर्म कहता हूँ। सूची शुरू होने से पहले ही कह दिया गया है कि यह अधूरी रहेगी। यह विनय नहीं है, यह नाप है, और कहनेवाला यह बात आगे दो बार और दुहरायेगा।

बरन धर्म नहिं आश्रम चारी । श्रुति बिरोध रत सब नर नारी॥
द्विज श्रुति बेचक भूप प्रजासन । कोउ नहिं मान निगम अनुसासन॥

चौपाई ५

सूची का पहला काम ढाँचा हटाना है। न वर्णधर्म रहता है, न चारों आश्रम। यानी वह पूरी बनावट जिससे कोई समाज अपने को पहचानता है, वह उठा ली गयी। और उसके बाद सब स्त्री-पुरुष वेद के विरोध में लगे रहते हैं। यह वाक्य उदासीनता का नहीं है। विरोध में लगे रहना एक काम है, और उसमें मेहनत लगती है।

फिर दो पद गिनाये जाते हैं और दोनों को उनके अपने काम का ठीक उलटा करते हुए दिखाया जाता है। ब्राह्मण, जिसका काम वेद को सँभालना है, वेद बेचनेवाला है। और राजा, जिसका काम प्रजा को पालना है, प्रजासन है, प्रजा को खा जानेवाला। इसी दोहे में अभी दो बार निगलना आ चुका है, और अब राजा के लिये भी वही क्रिया चुनी गयी है। जो पालने के लिये बिठाया गया था वह खा रहा है।

मारग सोइ जा कहुँ जोइ भावा। पंडित सोइ जो गाल बजावा॥
मिथ्यारंभ दंभ रत जोई । ता कहुँ संत कहइ सब कोई॥

चौपाई ६

और यहाँ से वह चाल शुरू होती है जो इस पूरे चिट्ठे को बाँधे रखती है। तुलसी आदर के शब्द नहीं हटाते। वे उन्हें अपनी जगह खड़ा रहने देते हैं और उनके नीचे खड़ा आदमी बदल देते हैं। मार्ग वही है जो जिसको अच्छा लग जाय। पण्डित वही है जो गाल बजावा, डींग मारे। और जो मिथ्या आडम्बर रचता है और दम्भ में रत है, उसी को सब कोई संत कहते हैं।

पंक्ति की बनावट पर ध्यान दीजिये। वह यह नहीं कहती कि कलियुग में पण्डित नहीं बचे। वह कहती है कि पण्डित वही है, और फिर बता देती है कि वही कौन है। सोइ, यही वह शब्द है जो इस पूरे वर्णन में बार-बार लौटता है। हर बार एक आदरणीय पद लिया जाता है और उसके सामने सोइ रखकर एक नया आदमी बिठा दिया जाता है।

अगली दो चौपाइयाँ इसी चाल को आगे ले जाती हैं और उनमें छह पद और इसी तरह बदल दिये जाते हैं। जो किसी भी तरह दूसरे का धन हर ले वही बुद्धिमान है। जो दम्भ करता है वही बड़ा आचारी है। जो झूठ बोलता है और हँसी-दिल्लगी करना जानता है, कलियुग में वही गुणवान कहा जाता है। जो आचारहीन है और वेद का मार्ग छोड़ चुका है, वही ज्ञानी है और वही वैरागी। और जिसके नख बड़े-बड़े हैं और जटाएँ लम्बी, वही प्रसिद्ध तपस्वी है।

सार: दोहा ९७ (ख) कहता है कि सब लोग मोह के वश हो गये और लोभ ने शुभ कर्मों को ग्रस लिया, और फिर सुननेवाले को पुकारकर कहनेवाला अपने विषय का नाम रखता है, कलिधर्म, और यह भी कि वह कुछ थोड़े-से ही कहेगा। इसके बाद वर्णधर्म और चारों आश्रम हटते हैं, ब्राह्मण वेद बेचनेवाला और राजा प्रजा को खा जानेवाला हो जाता है, और आदर के सारे नाम अपनी जगह रहकर नये आदमियों पर चढ़ जाते हैं: डींग मारनेवाला पण्डित, दम्भी संत, पराया धन हरनेवाला सयाना, जटा और नखवाला तपस्वी।

वेष, भूषण, और भोजन

असुभ बेष भूषन धरें भच्छाभच्छ जे खाहिं।
तेइ जोगी तेइ सिद्ध नर पूज्य ते कलिजुग माहिं॥ ९८ (क)॥

दोहा ९८ (क)

योग्यता की तीन शर्तें गिनाई गयी हैं और तीनों शरीर के बाहर की हैं। अमंगल वेष। अमंगल भूषण। और भच्छाभच्छ, खाने योग्य और न खाने योग्य, दोनों का एक ही तरह खा लेना। कपड़ा, गहना, थाली। इतने पर ही आदमी योगी है, सिद्ध है, और पूजनीय है। और दूसरी पंक्ति में यह तीन बार कहा गया है, तेइ, तेइ, ते। वही, वही, और वही। यह दुहराव ज़ोर के लिये नहीं है, यह गिनती है, जैसे कोई एक-एक करके पद बाँट रहा हो। और पूज्य शब्द अन्त में है, तीनों पदों के बाद, यानी उनके चारों ओर एक भीड़ भी खड़ी है जो झुक रही है।

जे अपकारी चार तिन्ह कर गौरव मान्य तेइ।
मन क्रम बचन लबार तेइ बकता कलिकाल महुँ॥ ९८ (ख)॥

सोरठा ९८ (ख)

सोरठे में यही बात दो और पदों पर लागू होती है। जिनके आचरण दूसरों का अहित करनेवाले हैं, उन्हीं का बड़ा गौरव होता है और वे ही मान्य होते हैं। और फिर वह दूसरी पंक्ति, जिसके लिये यह सोरठा इस पन्ने पर सबसे ज़्यादा याद रखने लायक है। जो मन, वचन और कर्म से लबार हैं, झूठ बकनेवाले हैं, वे ही कलिकाल में वक्ता माने जाते हैं।

मन क्रम बचन। यह वही तीन का नाप है जो इस पन्ने की सबसे पहली चौपाई में आया था, जहाँ कहनेवाले ने अपनी शिव-सेवा को इसी नाप से पूरा बताया था। रामचरितमानस में यह नाप भक्ति और प्रेम के साथ आता है, कि कोई आधा नहीं, पूरा लगा हुआ है। यहाँ वही नाप झूठ पर लगाया गया है। मन से भी झूठ, वचन से भी, कर्म से भी। झूठ इस युग में कोई फिसलन नहीं रह गया, वह एक साधना हो गया है, और उसका फल भी मिलता है, वह मंच पर बिठाया जाता है।

सार: दोहा ९८ (क) कहता है कि अमंगल वेष और भूषण धारण करनेवाले और भक्ष्य-अभक्ष्य सब खा लेनेवाले ही योगी, सिद्ध और पूज्य हैं। सोरठा ९८ (ख) कहता है कि जिनके आचरण दूसरों का अहित करते हैं उन्हीं का गौरव होता है, और जो मन, वचन तथा कर्म से झूठ बकनेवाले हैं वे ही वक्ता माने जाते हैं, यानी वही तीन का नाप जो पहली चौपाई में भक्ति को पूरा बताता था यहाँ झूठ को पूरा बताता है।

घर के भीतर

अब तक जो गिना गया वह बाहर की दुनिया थी, पद, उपाधि, सभा, मंच। अगली चार चौपाइयों में कहनेवाला दरवाज़े के भीतर चला जाता है, और वहाँ जो दिखता है वह और नज़दीक से चुभता है, क्योंकि वहाँ के रिश्तों का कोई विकल्प नहीं होता। पद छोड़े जा सकते हैं। माता-पिता नहीं छोड़े जाते।

नारि बिबस नर सकल गोसाईं । नाचहिं नट मर्कट की नाईं॥
सूद्र द्विजन्ह उपदेसहिं ग्याना । मेलि जनेऊ लेहिं कुदाना॥

चौपाई ७

पहली पंक्ति की उपमा बाज़ार से उठायी गयी है, नट मर्कट, बाजीगर का बन्दर। उपमा की चोट उसके दूसरे हिस्से में है। बन्दर नाचता है, पर वह नाचना चुनता नहीं, और नाचते हुए बन्दर को देखकर कोई यह नहीं सोचता कि वह क्या सोच रहा होगा। और दूसरी पंक्ति में वह बात है जो पाठ में जैसी छपी है वैसी ही यहाँ है। शूद्र ब्राह्मणों को ज्ञान का उपदेश करते हैं, और गले में जनेऊ डालकर कुत्सित दान लेते हैं। चिह्न पहले पहना जाता है और फिर उस चिह्न को भुनाया जाता है, यानी वही चीज़ जो ऊपर जटा और नख में थी, अब लेन-देन तक पहुँच गयी है।

अगली चौपाई नक़्शा और खोलती है। सभी पुरुष काम और लोभ में तत्पर और क्रोधी हैं, और देवता, ब्राह्मण, वेद तथा संतों के विरोधी। और फिर वह पंक्ति जिसमें एक ही शब्द से निर्णय भी दे दिया जाता है, गुणों के धाम सुन्दर पति को छोड़कर स्त्रियाँ परपुरुष का सेवन करती हैं, और उन्हें अभागी कहा गया है। तुलसी उन्हें पापिनी नहीं कहते, वे उन्हें बदकिस्मत कहते हैं, और यह शब्द उस पंक्ति पर एक छाया की तरह पड़ा रह जाता है।

उसके बाद की चौपाई दो जोड़ों को उलटकर दिखाती है। सुहागिनें आभूषणों से रहित हैं और विधवाओं के नित नये शृंगार होते हैं। और दूसरा जोड़ा गुरु और शिष्य का है, जिसके लिये हिसाब-किताब का शब्द चुना गया है, का लेखा। गुरु और शिष्य में बहरे और अंधे का-सा हिसाब है, एक सुनता नहीं, दूसरा देखता नहीं। इस उपमा में ही उसका उत्तर छिपा है: बहरा और अंधा एक-दूसरे की मदद नहीं कर सकते, क्योंकि जिसके पास आँख है वह बता नहीं सकता और जिसके पास कान है वह देख नहीं सकता। यह जोड़ा बेईमान नहीं है, यह बेकार है।

हरइ सिष्य धन सोक न हरई । सो गुर घोर नरक महुँ परई॥
मातु पिता बालकन्हि बोलावहिं । उदर भरै सोइ धर्म सिखावहिं॥

चौपाई ८

पहली पंक्ति में एक ही क्रिया दो बार आयी है और पूरी बात उसी दुहराव में है। हरइ और हरई, हर लेना। जो गुरु शिष्य का धन हर लेता है पर उसका शोक नहीं हरता, वह घोर नरक में पड़ता है। गुरु शब्द की परिभाषा यहाँ किसी शास्त्र से नहीं आती, वह इसी क्रिया से बन जाती है। गुरु वह है जो हरता है। सवाल केवल इतना है कि वह क्या हरता है।

और दूसरी पंक्ति घर की सबसे भीतरी जगह पर पहुँच जाती है। माता-पिता बालकों को बुलाकर वही धर्म सिखाते हैं जिससे पेट भरे। यहाँ फिर वही सोइ है जो ऊपर पण्डित और संत के साथ था। धर्म शब्द हटाया नहीं गया। बच्चों को धर्म ही सिखाया जा रहा है, बुलाकर, बैठाकर, जैसे सिखाया जाना चाहिये। बस उस शब्द के भीतर जो चीज़ रखी गयी है वह उदर भरै है। और यह बात ऊपर की हर पंक्ति से गहरी जाती है, क्योंकि पण्डित और संत का पद तो बड़ा होकर मिलता है, और यह घर में, पहले दिन से, छोटे बच्चे को दिया जा रहा है।

ब्रह्म ग्यान बिनु नारि नर कहहिं न दूसरि बात।
कौड़ी लागि लोभ बस करहिं बिप्र गुर घात॥ ९९ (क)॥

दोहा ९९ (क)

इस दोहे में दो शब्द हैं और उन दोनों की दूरी ही इसका पूरा अर्थ है। पहली पंक्ति में सबसे बड़ा शब्द है, ब्रह्मज्ञान, और स्त्री-पुरुष उसके सिवा दूसरी बात करते ही नहीं। दूसरी पंक्ति में सबसे छोटा सिक्का है, कौड़ी, और उसके लिये लोभवश वे ब्राह्मण और गुरु की हत्या कर डालते हैं। बीच में कोई तर्क नहीं है, कोई व्याख्या नहीं है। और ध्यान दीजिये कि हत्या किसकी होती है, उन्हीं दो की जिनसे वह ब्रह्मज्ञान सीखा गया होगा।

दोहे की दूसरी छमाही इसी बात को झगड़े की शक्ल में दिखाती है। शूद्र ब्राह्मणों से विवाद करते हैं और कहते हैं कि हममें और इनमें कुछ कम-ज़्यादा नहीं है, ब्रह्म को जो जानता है वही श्रेष्ठ ब्राह्मण है, और यह कहकर वे उन्हें डाँटकर आँखें दिखाते हैं। ध्यान देने की बात यह है कि पंक्ति उस वाक्य का उत्तर नहीं देती। वह वाक्य वहीं खड़ा रहने दिया जाता है, और जो दिखाया जाता है वह आँख है, डाँट है।

सार: घर के भीतर का चिट्ठा: पुरुष बाजीगर के बन्दर की तरह नाचते हैं, शूद्र ब्राह्मणों को ज्ञान का उपदेश करते हैं और जनेऊ डालकर कुत्सित दान लेते हैं, सुहागिनें बिना गहने और विधवाएँ नित नये शृंगार में हैं, गुरु और शिष्य बहरे और अंधे का-सा हिसाब हैं, शिष्य का धन हरनेवाला पर शोक न हरनेवाला गुरु घोर नरक में पड़ता है, और माता-पिता बच्चों को वही धर्म सिखाते हैं जिससे पेट भरे। दोहा ९९ (क) ब्रह्मज्ञान की बातों और कौड़ी के लिये की गयी हत्या को एक ही साँस में रख देता है।

टूटी हुई हदें, और एक गवाही

इसके बाद जो चौपाई आती है वह नामों की अदला-बदली की पूरी माला का आख़िरी मनका है, और वह सबसे बड़े शब्द पर आकर टूटती है। जो पराई स्त्री में आसक्त हैं, कपट करने में चतुर हैं, और मोह, द्रोह तथा ममता में लिपटे हुए हैं, वे ही अभेदवादी ज्ञानी हैं। अभेदवाद, यानी वह दर्शन जो जीव और ब्रह्म में भेद नहीं मानता। वेदान्त का सबसे ऊँचा वाक्य, और उसके नीचे वह आदमी बिठा दिया गया जो सबसे नीचे की चीज़ों में लिपटा हुआ है।

और ठीक उसके बाद वह आधी पंक्ति आती है जो इस चिट्ठे का दर्जा बदल देती है, देखा मैं चरित्र कलिजुग कर। मैंने उस कलियुग का यह चरित्र देखा। यह शास्त्र नहीं है, शिकायत नहीं है, भविष्यवाणी नहीं है। यह गवाही है। और यह सब उसी ने देखा जिसने इस पन्ने की पहली चार चौपाइयों में अपने अवगुण गिनाये थे। जो आदमी धन के मद में मतवाला और बहुत बकवादी था, वही अब इस सारी बकवास का हिसाब दे रहा है।

अगली चौपाई अकेली ऐसी है जिसमें दण्ड लिखा गया है। ये लोग स्वयं तो नष्ट रहते ही हैं, जो कहीं सन्मार्ग का पालन करते हैं उन्हें भी नष्ट कर देते हैं। और फिर वह पंक्ति जिसमें अपराध का नाम बहुत साफ़ लिखा है, जो तर्क करके वेद की निन्दा करते हैं वे कल्प-कल्प भर एक-एक नरक में पड़े रहते हैं। तर्क करके। हथियार का नाम दिया गया है, और वह हथियार बुद्धि है।

इसके बाद की दो चौपाइयाँ एक ही दृश्य के दो हिस्से हैं और उन्हें साथ ही पढ़ना चाहिये। पहले हिस्से में वे जातियाँ गिनायी जाती हैं जिन्हें वर्ण-व्यवस्था नीचे रखती है, तेली, कुम्हार, चाण्डाल, भील, कोल, कलवार। स्त्री मर जाने पर या घर की सम्पत्ति नष्ट हो जाने पर वे सिर मुँड़ाकर संन्यासी हो जाते हैं, अपने को ब्राह्मणों से पुजवाते हैं और अपने ही हाथों दोनों लोक नष्ट करते हैं। और दूसरे हिस्से में, ठीक अगली ही आधी पंक्ति में, ब्राह्मण आते हैं, और उनके लिये छह विशेषण रखे गये हैं: निरच्छर, अपढ़, लोभी, कामी, आचारहीन, मूर्ख, और नीच जाति की व्यभिचारिणी स्त्रियों के स्वामी। जो पूजा करवा रहे हैं और जो पूजा कर रहे हैं, दोनों एक ही चौपाई में हैं और दोनों में से किसी को छोड़ा नहीं गया।

अगली चौपाई इसी दृश्य को पूरा करती है। शूद्र नाना प्रकार के जप, तप और व्रत करते हैं और बरासन पर, ऊँचे आसन पर, बैठकर पुराण कहते हैं। सब मनुष्य मनमाना आचरण करते हैं। और यहाँ वह शब्द फिर लौट आता है जो दोहा ९७ में था, कल्पित। वहाँ दम्भियों ने अपनी बुद्धि से पंथ कल्पित किये थे, यहाँ सब मनुष्य अपना आचार कल्पित कर रहे हैं। और चौपाई के अन्त में दूसरी बार वही बात कही जाती है, जाइ न बरनि, अपार अनीति का वर्णन किया ही नहीं जा सकता।

भए बरन संकर कलि भिन्नसेतु सब लोग।
करहिं पाप पावहिं दुख भय रुज सोक बियोग॥ १०० (क)॥

दोहा १०० (क)

यह दोहा इस पन्ने की धुरी है। पहली पंक्ति निदान देती है और उसके लिये दो शब्द चुनती है, वर्णसंकर, और भिन्नसेतु। सेतु का अर्थ पुल भी है और बाँध भी, और यहाँ वह मर्यादा है, वह रेखा जिसके इस पार और उस पार का भेद ही समाज को समाज बनाता है। वह रेखा टूट गयी। और यह शब्द अपने साथ यह भी ले आता है कि टूटने के बाद पानी कहीं रुकता नहीं।

और दूसरी पंक्ति में इस पूरे पन्ने पर पहली बार दुःख आता है। वे पाप करते हैं और दुःख, भय, रोग, शोक तथा वियोग पाते हैं। दो क्रियाएँ आमने-सामने रखी गयी हैं, करना और पाना। यहाँ तक का सारा चिट्ठा एक ऐसे युग का था जो अपने पर प्रसन्न था। पण्डित को आदर मिल रहा था, झूठे को मंच, दम्भी को संत का नाम। किसी को कोई तकलीफ़ नहीं दिख रही थी। इस पंक्ति से आगे पन्ना पलट जाता है और बाकी सारा वर्णन इसी दूसरी क्रिया का होता है, कि इस सबकी कीमत क्या चुकायी जा रही है।

और दोहे की दूसरी छमाही इस पूरे हिस्से को एक घेरे में बाँध देती है। वेदसम्मत, वैराग्य और विवेक से युक्त हरिभक्ति का जो मार्ग है, मोहवश मनुष्य उस पर नहीं चलते और अनेकों नये पंथों की कल्पना करते हैं। यह वही वाक्य है जो दोहा ९७ की पहली छमाही में था। जिस वाक्य से यह चिट्ठा खुला था, उसी वाक्य पर उसका पहला हिस्सा बन्द होता है, और घेरे की दोनों दीवारें एक ही ईंट की हैं।

सार: पराई स्त्री में आसक्त, कपटी और मोह-द्रोह-ममता में लिपटे लोग ही अभेदवादी ज्ञानी कहलाते हैं, और कहनेवाला जोड़ देता है कि उसने यह चरित्र स्वयं देखा। तर्क से वेद की निन्दा करनेवाले कल्प-कल्प भर नरक में पड़ते हैं। नीची जातियों के लोग शोक या नुकसान पर संन्यासी होकर ब्राह्मणों से पुजवाते हैं, और ब्राह्मण अपढ़, लोभी, कामी और आचारहीन हैं। दोहा १०० (क) कहता है कि सब वर्णसंकर और मर्यादा से टूटे हुए हो गये, पाप करते हैं और दुःख, भय, रोग, शोक तथा वियोग पाते हैं।

छंद: कलि का कौतुक

यहाँ छपे हुए पाठ में एक बदलाव आता है जिसे पढ़ते हुए महसूस किया जा सकता है। दोहा १०० के बाद गीता प्रेस का पाठ छंद का सिगिल लगाता है और पाँच स्तबक एक नयी चाल में चलते हैं, तेज़, छोटी साँस की, जिसमें हर आधी पंक्ति एक अलग तस्वीर है।

बहु दाम सँवारहिं धाम जती। बिषया हरि लीन्हि न रहि बिरती॥
तपसी धनवंत दरिद्र गृही । कलि कौतुक तात न जात कही॥

छंद १

पहली ही आधी पंक्ति में दो शब्द आमने-सामने बिठा दिये गये हैं, जती और धाम। संन्यासी और घर। संन्यासी बहुत धन लगाकर घर सजाते हैं। और उसके बाद जो कारण दिया गया है वह वही निगलनेवाली क्रिया है, वैराग्य नहीं रहा, उसे विषयों ने हर लिया। वैराग्य यहाँ छोड़ा नहीं गया, वह ले लिया गया, और ले जानेवाले का नाम भी दे दिया गया है।

दूसरी आधी पंक्ति में वही अदला-बदली है, बस अब वह नाम में नहीं, हालत में है। तपस्वी धनवान हो गये और गृहस्थ दरिद्र। दोनों ने एक-दूसरे की जगह ले ली है। किसी ने कुछ छीना नहीं, बस दोनों अपनी-अपनी जगह से खिसक गये। और फिर वह शब्द, जो इस पूरे वर्णन में सबसे अनपेक्षित है, कलि कौतुक। तमाशा, खेल, वह चीज़ जिसे देखकर आदमी रुक जाता है। जिस युग को अभी मल का घर बताया जा रहा था, उसे यहाँ कौतुक कहा गया है, सुननेवाले को तात कहकर पुकारा गया है, और तीसरी बार यह कह दिया गया है, न जात कही

अगले दो छंद घर के भीतर की बात फिर उठाते हैं और उसे उसके सबसे ठण्डे रूप में रखते हैं। कुलवती और सती स्त्री को पुरुष घर से निकाल देते हैं और अच्छी चाल छोड़कर घर में दासी को ला रखते हैं। पुत्र माता-पिता को तभी तक मानते हैं जब तक स्त्री का मुँह नहीं देखा। और जब से ससुराल प्यारी लगने लगी, तब से अपने कुटुम्बी शत्रु-रूप हो गये। इन पंक्तियों में कोई क्रोध नहीं है, कोई गाली नहीं है। इनमें समय है, तब तक और तब से, और उसी समय के भीतर एक-एक रिश्ता चुपचाप जगह बदल लेता है। और उसी छंद की दूसरी आधी में राजा फिर आते हैं, पापपरायण, धर्म से खाली, प्रजा को नित्य ही दण्ड देकर उसकी दुर्दशा करते हुए।

अगला छंद फिर चिह्नों पर लौट आता है, और अब चिह्न इतने पतले हो चुके हैं कि उनके पीछे कुछ बचा नहीं। धनी लोग नीच होने पर भी कुलीन माने जाते हैं। द्विज का चिह्न केवल जनेऊ रह गया और तपस्वी का चिह्न नंगा बदन, उघार तपी। और फिर वह पंक्ति जो इस उलटबाँसी को उसके आख़िरी सिरे तक ले जाती है, जो वेदों और पुराणों को नहीं मानते, कलियुग में वे ही हरिभक्त और सच्चे संत कहलाते हैं। शुरू में मार्ग बदला था, फिर पण्डित, फिर संत, और अब भक्त।

और पाँचवें छंद में कहनेवाला पहली बार भूख तक पहुँच जाता है। पहली आधी पंक्ति अब भी मुँह की है, कवियों के झुंड हो गये पर दुनिया में कोई उदार सुनायी नहीं पड़ता, गुण में दोष लगानेवाले भरे पड़े हैं और गुणी कोई नहीं। और दूसरी आधी में शरीर आ जाता है। कलियुग में बार-बार अकाल पड़ते हैं, और अन्न के बिना सब लोग दुखी होकर मरते हैं। यहाँ तक की सारी सूची आदर, मान, पद और पाखण्ड की थी। इस पंक्ति से आगे वह पेट की हो जाती है।

सार: छंद की चाल में वर्णन तेज़ हो जाता है। संन्यासी धन लगाकर घर सजाते हैं, तपस्वी धनी और गृहस्थ दरिद्र हो गये, और कहनेवाला इसे कलियुग का कौतुक कहकर तीसरी बार जोड़ देता है कि यह कहा नहीं जा सकता। सती स्त्री घर से निकाली जाती है और दासी घर में आती है, पुत्र माता-पिता को स्त्री का मुँह देखने तक मानते हैं, राजा प्रजा को नित्य दण्डित करते हैं, द्विज का चिह्न जनेऊ भर रह जाता है, और अन्त में बार-बार पड़ते अकाल में लोग अन्न बिना मरने लगते हैं।

ब्रह्माण्ड भर में, और खेत में

सुनु खगेस कलि कपट हठ दंभ द्वेष पाषंड।
मान मोह मारादि मद ब्यापि रहे ब्रह्मंड॥ १०१ (क)॥
तामस धर्म करहिं नर जप तप ब्रत मख दान।
देव न बरषहिं धरनीं बए न जामहिं धान॥ १०१ (ख)॥

दोहा १०१ (क, ख)

पहली पंक्ति में सुननेवाले को खगेश कहकर पुकारा जाता है और फिर नामों की एक कतार रख दी जाती है जिसमें कोई क्रिया बीच में नहीं आती। कपट, हठ, दम्भ, द्वेष, पाखण्ड, मान, मोह, काम आदि और मद। एक के बाद एक, बिना जोड़ के, जैसे कोई गिनती गिनते-गिनते साँस न ले रहा हो। और क्रिया अन्त में आती है, एक ही, ब्यापि रहे ब्रह्मंड

यह छलाँग देखने लायक है। अभी पिछली पंक्तियों में हम किसी के घर में थे, दासी और ससुराल और बेटे के बीच। और यहाँ एक ही दोहे में पैमाना ब्रह्माण्ड हो गया है। तुलसी बीच की कोई सीढ़ी नहीं लगाते, न मुहल्ला, न नगर, न देश। घर के भीतर की बात सीधे ब्रह्माण्ड पर चढ़ा दी जाती है, और यही इस दोहे की बात है, कि इन चीज़ों के लिये कोई सीमा है ही नहीं।

और दूसरी छमाही में वह पंक्ति है जो इस पूरे पन्ने पर सबसे साहसी है। पहले आधे में कहा गया है कि मनुष्य जप, तप, यज्ञ, व्रत और दान तामसी भाव से करने लगे। ध्यान दीजिये कि यहाँ यह नहीं कहा गया कि लोगों ने ये काम छोड़ दिये। काम हो रहे हैं। जप हो रहा है, यज्ञ हो रहा है, दान दिया जा रहा है। जो बदला है वह भाव है, और भाव किसी को दिखता नहीं।

और उसके तुरन्त बाद, बिना यह कहे कि इसका असर कैसे पहुँचता है, वह आधी पंक्ति आती है: देवता पृथ्वी पर जल नहीं बरसाते, और बोया हुआ अन्न उगता नहीं। बए न जामहिं धान। किसी के भीतर का भाव, और खेत में गड़ा हुआ बीज। इन दोनों के बीच तुलसी एक शब्द भी नहीं रखते। यह पंक्ति ही इस चिट्ठे का सबसे बड़ा दावा है, कि जो चीज़ सबसे भीतर है और जिसे कोई देख नहीं सकता, उसका हिसाब सबसे बाहर आकर, मिट्टी पर चुकाया जाता है। इसी से समझ में आता है कि पिछला छंद अकाल पर क्यों खत्म हुआ था।

सार: दोहा १०१ (क) कहता है कि कपट, हठ, दम्भ, द्वेष, पाखण्ड, मान, मोह, काम आदि और मद ब्रह्माण्ड भर में छा गये, और (ख) कहता है कि मनुष्य जप, तप, यज्ञ, व्रत और दान तामसी भाव से करने लगे, इसलिये देवता वर्षा नहीं करते और बोया हुआ अन्न उगता नहीं। भीतर के भाव और खेत के बीज के बीच तुलसी कोई कड़ी नहीं जोड़ते, दोनों को एक ही दोहे में रख देते हैं।

दस-पाँच बरस, और कल्पान्त तक का घमंड

दूसरा छंद फिर उसी तेज़ चाल में शुरू होता है, और उसकी पहली तस्वीर एक स्त्री की है जिसके पास पहनने को कुछ नहीं बचा। स्त्रियों के बाल ही उनका भूषण हैं, और भूख बहुत है। वे धनहीन हैं, बहुत तरह की ममता से दुखी हैं, सुख चाहती हैं पर धर्म में प्रेम नहीं है, बुद्धि थोड़ी है और कठोर है, और कोमलता नहीं बची।

नर पीड़ित रोग न भोग कहीं। अभिमान बिरोध अकारनहीं॥
लघु जीवन संबतु पंच दसा। कलपांत न नास गुमानु असा॥

छंद २

पहली आधी पंक्ति में तीन बातें हैं और तीनों एक ही दिशा में जाती हैं। मनुष्य रोगों से पीड़ित हैं। भोग कहीं नहीं है। और अभिमान तथा विरोध बिना ही कारण किये जाते हैं। अकारनहीं। यह शब्द इस पंक्ति को बाकी सारे चिट्ठे से अलग कर देता है। अब तक हर अवगुण के पीछे कोई लालच था, धन था, पद था, कौड़ी थी। यहाँ कारण खत्म हो गया है। झगड़ा किसी चीज़ के लिये नहीं हो रहा, वह अपने आप हो रहा है, जैसे कोई आदत चलती रहती है जब उसका मक़सद कब का जा चुका हो।

और दूसरी आधी पंक्ति में वह हिसाब है जो इस पन्ने का सबसे तीखा हिसाब है, और वह सिर्फ़ दो संख्याओं का है। जीवन छोटा है, संबतु पंच दसा, दस-पाँच बरस का। और घमंड ऐसा है मानो कल्पान्त होने पर भी नाश न होगा। एक तरफ़ पाँच या दस साल, दूसरी तरफ़ वह समय जिसमें सृष्टि ही समेट ली जाती है, और इन दोनों के बीच जो चीज़ खड़ी है वह सिर्फ़ गुमानु है। इस पंक्ति में कोई बुरा काम नहीं हो रहा। सिर्फ़ एक आदमी अपने विषय में कुछ मान रहा है, और जो वह मान रहा है वह उसकी अपनी उम्र से हज़ारों गुना बड़ा है।

बाकी के तीन छंद इसी हिसाब को फैलाकर रख देते हैं। कलिकाल ने मनुष्यों को बेहाल कर डाला, कोई बहन-बेटी का भी विचार नहीं करता, न सन्तोष है, न विवेक, न शीतलता, और जाति-कुजाति सब मगता हो गये, यानी माँगनेवाले। ईर्ष्या, कड़वे बोल और लालच भरपूर हैं और समता चली गयी। सब लोग वियोग और शोक से मारे हुए हैं, और वर्णाश्रम धर्म के आचरण जा चुके हैं।

और अन्तिम छंद में गिनती उन चीज़ों की होती है जो नहीं बचीं: इन्द्रियों का दमन, दान, दया, और समझदारी। इनकी जगह मूर्खता और ठगी बढ़ी है, और स्त्री हो या पुरुष, सब शरीर के पालन-पोषण में लगे हैं। और फिर चिट्ठे का आख़िरी नाम आता है, परनिंदक। जो पराई निन्दा करनेवाले हैं, जगत् में वे ही फैले हुए हैं।

इस आख़िरी शब्द पर ठहरना चाहिये, क्योंकि यह पन्ना वहीं लौट आया है जहाँ से चला था। पहली चौपाई में कहनेवाले ने अपने विषय में जो पहला अवगुण गिनाया था वह यही था, आन देव निंदक। इतना लम्बा चिट्ठा, इतने पद, इतने घर, इतने अकाल, और सूची का आख़िरी नाम वही निकला जो कहनेवाले का अपना पहला नाम था। उसने पूरे युग का हिसाब देकर आख़िर में अपनी ही पहली पंक्ति पर उँगली रख दी है, और किसी से यह कहा नहीं कि उसने ऐसा किया है।

सार: दूसरे छंद में स्त्रियों के पास बाल ही भूषण हैं और भूख बड़ी है, मनुष्य रोगों से पीड़ित हैं, भोग कहीं नहीं, और अभिमान तथा विरोध बिना कारण किये जाते हैं। जीवन दस-पाँच बरस का है और घमंड ऐसा मानो कल्पान्त पर भी नाश न होगा। कोई बहन-बेटी का विचार नहीं करता, समता चली गयी, दम, दान, दया और समझदारी नहीं रही, और सूची का आख़िरी नाम परनिन्दा है, वही जो कहनेवाले ने अपने पहले जन्म में अपना पहला अवगुण बताया था।

अवगुणों का घर, और उसका एक गुण

और अब वह दोहा जिसके लिये यह पूरा पन्ना बना हुआ है। इतनी लम्बी सूची के बाद जो सबसे आसान काम होता, वह होता उसे थोड़ा हल्का कर देना, कोई अपवाद गिना देना, कोई सफ़ाई जोड़ देना। तुलसी इनमें से कुछ नहीं करते।

सुनु ब्यालारि काल कलि मल अवगुन आगार।
गुनउ बहुत कलिजुग कर बिनु प्रयास निस्तार॥ १०२ (क)॥
कृतजुग त्रेताँ द्वापर पूजा मख अरु जोग।
जो गति होइ सो कलि हरि नाम ते पावहिं लोग॥ १०२ (ख)॥

दोहा १०२ (क, ख)

पहली पंक्ति सूची को एक शब्द में समेट लेती है और वह शब्द निन्दा का नहीं, घर का शब्द है, आगार। भण्डार, गोदाम, वह जगह जहाँ चीज़ें रखी जाती हैं। कलिकाल पाप और अवगुणों का आगार है। युग को दोष नहीं दिया गया, उसे जगह बताया गया, और जो अभी गिनाया गया वह सब उस जगह में भरा हुआ सामान है। एक भी चीज़ वापस नहीं ली गयी।

और उसी पंक्ति के दूसरे आधे में, बिना किसी माफ़ी के, वह एक बात रख दी जाती है। कलियुग का एक गुण भी बहुत बड़ा है, कि उसमें बिना ही परिश्रम छुटकारा मिल जाता है। बिनु प्रयास निस्तार। और ये तीन शब्द इस पूरे पन्ने पर जो कुछ पढ़ा गया है, उसके ठीक सामने आकर खड़े हो जाते हैं।

क्योंकि इस चिट्ठे में परिश्रम की कोई कमी नहीं थी। लोग वेद के विरोध में लगे रहते थे, और उसमें मेहनत लगती है। दम्भी अपनी बुद्धि से नये पंथ गढ़ रहे थे, और उसमें दिमाग़ लगता है। जटाएँ बढ़ाना, नाखून बढ़ाना, जनेऊ पहनकर दान बटोरना, तर्क करके वेद की निन्दा करना, ऊँचे आसन पर बैठकर पुराण कहना, इनमें से एक भी आसान नहीं है। और मन, वचन और कर्म तीनों से झूठ बोलना तो अपने आप में पूरी साधना है। पूरा युग परिश्रम कर रहा था, और वह परिश्रम कहीं नहीं पहुँच रहा था। और अब कहा जा रहा है कि जो चीज़ सबको चाहिये थी, वह इसी युग में बिना परिश्रम के रखी हुई है।

दोहे की दूसरी छमाही इसी को गिनकर दिखा देती है। सत्ययुग, त्रेता और द्वापर में जो गति पूजा, यज्ञ और योग से मिलती है, वही गति कलियुग में लोग केवल हरि के नाम से पा जाते हैं। चारों युगों की यह तुलना अच्छाई की तुलना नहीं है। फल एक ही है, सब युगों में वही गति है। जो बदलता है वह दाम है। तीन युगों में उसके लिये पूजा चाहिये, यज्ञ चाहिये, योग चाहिये, यानी सामग्री, समय, शरीर और विधि। चौथे में एक नाम चाहिये। और जिस युग में न वर्णधर्म बचा, न आश्रम, न सद्ग्रन्थ, न गुरु जो सुनता हो, न शिष्य जो देखता हो, उसी में वह रास्ता काम आता है जिसके लिये इनमें से किसी चीज़ की ज़रूरत नहीं पड़ती।

सार: दोहा १०२ (क) कलिकाल को पाप और अवगुणों का आगार कहता है और उसी साँस में जोड़ देता है कि उसका एक गुण भी बहुत बड़ा है, कि उसमें बिना परिश्रम छुटकारा मिल जाता है। और (ख) कहता है कि सत्ययुग, त्रेता और द्वापर में जो गति पूजा, यज्ञ और योग से मिलती है, वही कलियुग में लोग केवल हरि के नाम से पा जाते हैं। सूची में से एक भी बात वापस नहीं ली जाती।

और अन्त में, अपनी ओर

इस पन्ने को दुबारा शुरू से देखिये तो एक ही चाल बार-बार दिखती है। आदर के जितने शब्द किसी भाषा के पास होते हैं, वे सब यहाँ मौजूद हैं। मार्ग, पण्डित, संत, सयाना, आचारी, गुणवान, ज्ञानी, विरागी, तपस्वी, योगी, सिद्ध, पूज्य, मान्य, वक्ता, कुलीन, हरिभक्त, अभेदवादी। एक भी शब्द मिटाया नहीं गया। शब्दकोश पूरा का पूरा बचा हुआ है, और उसी को देखकर पता चलता है कि कुछ गिरा है, क्योंकि अगर शब्द भी चले गये होते तो शायद किसी को कमी ही महसूस न होती।

दूसरी बात यह है कि इस चिट्ठे में एक भी आदमी का नाम नहीं है। न कोई राजा, न कोई गुरु, न कोई पण्डित, न कोई नगर छोड़कर अवध। सब कुछ जाति, पद और रिश्ते के नाम से कहा गया है। नाम आ जाते तो यह किसी की शिकायत बन जाता। नाम न होने से यह एक हालत का ब्योरा रह जाता है, और हालत का ब्योरा किसी एक समय का कैदी नहीं होता।

तीसरी बात उस गवाह की है जो यह सब कह रहा है। वह बाहर से आकर नहीं बोल रहा। पन्ने की पहली चार चौपाइयाँ उसे उसी भीड़ के भीतर बिठा देती हैं, और वे उसके अपने मुँह से कही गयी हैं: शूद्र का शरीर, दूसरे देवताओं की निन्दा, धन का मद, बकवास, उग्र बुद्धि, विशाल दम्भ। जो आदमी आगे पूरे युग की बकवास गिनायेगा, वह अपने को परम बाचाला कहकर शुरू करता है।

और आख़िरी बात, जो सबसे हल्की है और इसीलिये सबसे आसानी से छूट जाती है। इस पूरे पन्ने पर एक ही चीज़ ऐसी है जिसके विषय में कोई शिकायत नहीं है, और वह कोई आदमी नहीं है, वह एक जगह है। अवध, जिसके विषय में कहा गया कि किसी भी जन्म में जो वहाँ बस जाय वह राम-परायण हो जाता है। और यह वचन उसी आदमी के मुँह से आया है जो उसी नगरी में रहते हुए उसकी महिमा नहीं जान पाया था। अवध ने अपना काम उस समय भी किया, जब उसे इसकी ख़बर नहीं थी।

उत्तरकाण्ड के इस प्रसंग को पढ़कर जो एक शब्द सबसे देर तक साथ रहता है, वह आगार है। गोदाम। इतनी लम्बी सूची के बाद तुलसी युग को कोई गाली नहीं देते, वे उसे एक जगह बता देते हैं जिसमें बहुत सामान भरा हुआ है। और उसी छत के नीचे एक चीज़ और रखी हुई है जिसके लिये किसी को कुछ नहीं करना पड़ता।

और जो बात यह पन्ना कहकर आगे बढ़ जाता है, वह यह है कि जिस युग के विषय में इतना कुछ कहा गया, उसे सुनानेवाला उसमें रह चुका है और उससे निकल चुका है। वह अपनी ही एक पुरानी गली का नक़्शा बना रहा है, और नक़्शे के अन्त में उस एक दरवाज़े पर निशान लगा देता है जो उस गली में भी खुला हुआ था।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, उत्तरकाण्ड, दोहा ९७ से १०२, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।

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