इस पृष्ठ पर
रामचरितमानसउत्तरकाण्डप्रसंग 17
पहला जन्म और कलियुग का वर्णन
अयोध्या की एक गली में जन्मा हुआ आदमी, जिसने उसी नगरी में रहते हुए उसकी महिमा नहीं जानी। और उसके बाद वह लम्बा चिट्ठा, जिसमें आदर के सारे नाम अपनी जगह खड़े रहते हैं और उनके नीचे खड़े आदमी बदल जाते हैं।
भुशुण्डि का यह कहना एक आदमी की आत्मकथा से खुलता है और कुछ ही देर में पूरे एक युग का चिट्ठा बन जाता है। कहनेवाला वही पक्षी है जो उत्तरकाण्ड के इस हिस्से में गरुड़ को कथा सुना रहा है। पिछले प्रसंग के अन्त में उसने कहा था कि अब वह अपने पहले जन्म का चरित कहेगा। बात पूर्व के किसी एक कल्प की है, जब कलियुग चल रहा था। यहाँ की पहली ही बात उसी पर हाथ रखती है: उस कलियुग में।
इस प्रसंग के दो हिस्से हैं, और उनकी लम्बाई बराबर नहीं। पहला छोटा है, जिसमें कहनेवाला अपना युग, अपना नगर, अपना शरीर और अपने अवगुण गिनाता है। दूसरा कलियुग का वर्णन है, जो अन्त तक चलता है, इतना लम्बा कि कहनेवाले को तीन बार रुककर कहना पड़ता है कि यह पूरा कहा नहीं जा सकता। दोनों हिस्सों को जोड़नेवाली बात अवध के विषय में है।
एक बात शुरू में ही: जो सूची यहाँ बनती है वह पापों की सूची नहीं है। कहनेवाले ने अपने विषय का नाम स्वयं रख दिया है, कलिधर्म, कलियुग का धर्म। आगे जो गिनाया जायेगा वह वह नहीं जिसे उस युग में बुरा माना जाता था। वह है जिसे उस युग में धर्म माना जाता था।
अवध की गली और नील पर्वत
- काकभुशुण्डि गरुड़ को यह सारी कथा सुनानेवाला कौआ। इस कथा में वह पहले अयोध्या का वह शूद्र है जिसे अपनी ही नगरी की महिमा का पता नहीं था। फिर वह गवाह जो एक पूरे युग के आचरण का हिसाब देता है। इस प्रसंग में उनका नाम एक बार भी नहीं आता।
- गरुड़ सुननेवाले, जो यहाँ एक शब्द नहीं बोलते। भुशुण्डि उन्हें कई नामों से पुकारते हैं।
- शिव शुरू में ही, उस जन्म के इष्ट की तरह: कहनेवाला मन, वचन और कर्म से उन्हीं का सेवक था। आगे प्रसंग के अन्त तक शिव का नाम नहीं आता।
- राम वे किसी दृश्य में नहीं हैं। तीन जगह नाम की तरह आते हैं: जिनकी राजधानी में यह जन्म हुआ, जिनके हृदय में बसने पर अवध का प्रभाव जाना जाता है। और अन्त में भगवान् का वह नाम जिससे कलियुग में लोग बिना परिश्रम पार उतर जाते हैं।
- अवध वह नगरी जो यहाँ किसी किरदार की तरह काम करती है। पूरे चिट्ठे में यही एक जगह है जिसके विषय में कोई शिकायत नहीं है।
उस कलियुग में, अयोध्या में, एक शरीर
पहली ही बात में चार चीज़ें इसी क्रम में आती हैं: पहले युग, फिर नगर, फिर जन्म, और सबसे बाद में शरीर। भुशुण्डि कहते हैं: “उस कलियुग में मैं अयोध्यापुरी जाकर जन्मा, और जन्मते ही शूद्र का शरीर पाया।” शरीर अन्त में मिलता है, जैसे कोई चीज़ रास्ते में पकड़ा दी गयी हो। और अगली ही बात में आत्मकथा का पहला काँटा है।
वे कहते हैं: “मैं मन, वचन और कर्म से शिव का सेवक था।” मन, वचन और कर्म, यह तीन का नाप रामचरितमानस में पूरेपन का नाप है। जिस भक्ति को पूरा कहना हो, उसे इन्हीं तीनों से नापा जाता है। यहाँ सेवा सचमुच पूरी निकलती है। पर तुरन्त आगे की बात आती है: “दूसरे देवताओं की निन्दा करनेवाला, और अभिमानी।”
सेवा भी पूरी, और निन्दा भी पूरी, एक ही साँस में, एक ही आदमी में। और दोष शिव की सेवा में नहीं बताया गया। सेवा वहीं खड़ी रहती है, उस पर कोई उँगली नहीं उठती। जो अवगुण गिनाये गये वे दो हैं, दूसरों की निन्दा और अपना अभिमान। वह जन्म भक्ति से खाली नहीं था। भक्ति से भरा हुआ था, और उसी भरेपन के साथ बाक़ी सबके लिये बन्द था।
अब अवगुणों की गिनती चलती है, और हर एक के साथ एक बढ़ानेवाला शब्द लगा है: धन का मद, और उससे मतवाला। बोलनेवाला, और वह भी बहुत ही बकवादी। बुद्धि, और वह भी उग्र। दम्भ, और वह भी विशाल। कोई अवगुण अपनी सादी शक्ल में नहीं रखा गया। यह आदमी थोड़ा-थोड़ा बुरा नहीं था, हर चीज़ में पूरा था, और यह पूरापन वही है जो ऊपर सेवा और निन्दा दोनों में दिखा था।
फिर वह बात आती है जिसके लिये यह सारा परिचय है, यद्यपि और तथापि। भुशुण्डि कहते हैं: “यद्यपि मैं राम की राजधानी में ही रहता था, तथापि उस समय मैंने उसकी महिमा कुछ भी नहीं जानी।” यह दूरी की शिकायत नहीं है: कहनेवाला दूर नहीं, ठीक भीतर था। जिस नगरी की महिमा आगे गायी जायेगी, उसी की गलियों में उसका घर था। और “उस समय” के ये शब्द बता देते हैं कि जानने के दो समय हैं, और यह उनमें से पहला है।
अवध का प्रभाव, और वह शर्त जो उसके साथ लगी है
अगली ही बात समय बदल देती है: अब जाना। पहले “तब” था, अब “अब” है, और दोनों के बीच बहुत-से जन्म पड़े हैं। और जो वह अब जानता है, उसे अपनी खोज बताकर नहीं कहता।
भुशुण्डि कहते हैं: “अब मैंने अवध का प्रभाव जाना है। वेद, शास्त्र और पुराणों ने ऐसा गाया है।” वे अपना अनुभव नहीं गिना रहे, हवाला दे रहे हैं, और हवाला उन्हीं तीनों का है जिनकी निन्दा इसी युग में आगे दिखेगी। वे गाते हैं कि किसी भी जन्म में जो कोई अवध में बस जाता है, वह अवश्य ही राम के परायण हो जायेगा।
किसी भी जन्म में। शुरू में जन्म की पूरी कुण्डली बिछी थी: युग ख़राब, शरीर शूद्र का, स्वभाव अभिमानी, जेब में धन और मुँह में निन्दा। और एक भी चीज़ ऐसी नहीं जिसे शास्त्र योग्यता कहते हों। यहाँ कहा जा रहा है कि यह सब गिना ही नहीं जायेगा: शर्त जन्म की नहीं, पते की है।
और अब वह शर्त, जो वरदान पर नहीं, उसे पहचानने पर लगी है। अवध का प्रभाव जीव तभी जानता है, जब हाथ में धनुष धारण करनेवाले राम उसके हृदय में बसते हैं। पाना बिना शर्त है, जानना शर्त के साथ। वहाँ बस जाना काफ़ी है, पर यह समझ जाना कि वहाँ बस जाने का अर्थ क्या है, उसके लिये भीतर कुछ और चाहिये। इसी से समझ में आता है कि उस समय उसने महिमा क्यों नहीं जानी।
फिर बिना भूमिका के बात पलट जाती है: “हे सर्पों के शत्रु, वह कलिकाल बड़ा कठिन था।” सर्पों का शत्रु, यानी सुननेवाला: इस आत्मकथा में कहनेवाला पहली बार यहीं सिर उठाकर सामने बैठे को पुकारता है। और ठीक वहाँ, जहाँ बात अपनी ज़िन्दगी से हटकर पूरे युग पर जा रही है। उस युग में सब स्त्री-पुरुष पाप में लगे थे। टीका का काल भी देखने लायक है: वह कलिकाल कठिन था। था, है नहीं।
फिर तीन बातें इसी क्रम में आती हैं: कलियुग के पापों ने सब धर्मों को ग्रस लिया। सद्ग्रन्थ लुप्त हो गये। और तब दम्भियों ने अपनी बुद्धि से कल्पना कर-करके बहुत-से पंथ प्रकट कर दिये। नये पंथ पहले नहीं बने: पहले धर्म खाया गया, फिर किताबें गायब हुईं, और तब जाकर जगह खाली हुई। वे रोग नहीं, रोग के बाद उगी हुई घास हैं।
और शब्द हैं, अपनी ही बुद्धि से कल्पना करके। दोष यह नहीं बताया गया कि जो कहा गया वह झूठ था। दोष यह बताया गया कि वह अपना था। जिस चीज़ का लेखक कोई एक आदमी हो और जिसके पीछे न वेद हो न परम्परा, वह भुशुण्डि की नज़र में पंथ है। चाहे उसकी बातें कितनी ही भली लगें। और यह शब्द, कल्पना, आगे दो बार और लौटेगा।
कलिधर्म: एक शब्द जो पूरे चिट्ठे को खोल देता है
अब वही क्रिया, ग्रस लेना, दुबारा आती है जो अभी आयी थी। पहले कलि के मल ने धर्म को ग्रस लिया था, यहाँ लोभ ने शुभ कर्मों को ग्रस लिया, और सब लोग मोह के वश हो गये। दो बार निगलना, पास-पास। युग का वर्णन यहाँ किसी रंग या अँधेरे से नहीं, निगलने की क्रिया से होता है, और निगलनेवाला हर बार कोई और होता है।
फिर सुननेवाले को पुकारकर, उसे ज्ञान का भण्डार कहकर, भुशुण्डि वह नाम रख देते हैं जो सुनाया जायेगा: “मैं कुछ थोड़े-से कलिधर्म कहता हूँ।” कलिधर्म: धर्म वह है जिसे मानकर लोग चलते हैं, जिस पर गर्व होता है, जिसे बच्चों को सिखाया जाता है, और आगे की सूची सचमुच उसी तरह की है। उसमें कोई छिपकर किया हुआ पाप नहीं। सब कुछ खुले में है, और सबको उसके लिये आदर मिल रहा है।
और दो छोटे शब्द, कुछ थोड़े-से: सूची शुरू होने से पहले ही कह दिया गया कि यह अधूरी रहेगी। यह विनय नहीं, नाप है, और यह बात आगे दो बार और दुहरायी जायेगी।
सूची का पहला काम ढाँचा हटाना है: न वर्णधर्म रहता है, न चारों आश्रम। वह पूरी बनावट उठा ली गयी जिससे कोई समाज अपने को पहचानता है। और उसके बाद सब स्त्री-पुरुष वेद के विरोध में लगे रहते हैं, कोई वेद की आज्ञा नहीं मानता। विरोध में लगे रहना उदासीनता नहीं, एक काम है, और उसमें मेहनत लगती है।
फिर दो पद अपने काम का ठीक उलटा करते दिखाये जाते हैं। ब्राह्मण, जिसका काम वेद को सँभालना है, वेद बेचनेवाला है। और राजा, जिसका काम प्रजा को पालना है, प्रजा को खा जानेवाला है। अभी दो बार निगलना आ चुका है, और अब राजा के लिये भी वही क्रिया है: जो पालने के लिये बिठाया गया था वह खा रहा है।
यहाँ से वह चाल शुरू होती है जो पूरे चिट्ठे को बाँधे रखती है। आदर के शब्द हटाये नहीं जाते, अपनी जगह खड़े रहते हैं, और उनके नीचे खड़ा आदमी बदल जाता है। मार्ग वही है जो जिसको अच्छा लग जाये। पण्डित वही है जो डींग मारे। और जो मिथ्या आडम्बर रचता है और दम्भ में रत है, उसी को सब कोई संत कहते हैं।
भुशुण्डि यह नहीं कहते कि कलियुग में पण्डित नहीं बचे। कहते हैं कि पण्डित “वही” है, और फिर बता देते हैं कि वही कौन है। यह “वही” इस वर्णन में बार-बार लौटता है: हर बार एक आदरणीय पद लिया जाता है और उसके सामने “वही” रखकर एक नया आदमी बिठा दिया जाता है।
फिर छह पद और इसी तरह बदल दिये जाते हैं। जो किसी भी तरह दूसरे का धन हर ले वही बुद्धिमान है। जो दम्भ करता है वही बड़ा आचारी है। जो झूठ बोलता है और हँसी-दिल्लगी करना जानता है, कलियुग में वही गुणवान कहा जाता है। जो आचारहीन है और वेद का मार्ग छोड़ चुका है, वही ज्ञानी है और वही वैरागी। और जिसके नख बड़े-बड़े हैं और जटाएँ लम्बी, वही प्रसिद्ध तपस्वी है।
वेष, भूषण, और भोजन
योग्यता की तीन शर्तें गिनायी गयी हैं। तीनों शरीर के बाहर की हैं: अमंगल वेष, अमंगल भूषण, और भक्ष्य-अभक्ष्य, यानी खाने योग्य और न खाने योग्य, दोनों एक तरह खा लेना। कपड़ा, गहना, थाली। इतने पर ही आदमी योगी है, सिद्ध है, और पूजनीय है। फिर यह तीन बार कहा गया है: वही, वही, और वही। यह दुहराव ज़ोर के लिये नहीं, गिनती है, जैसे कोई एक-एक करके पद बाँट रहा हो। और आख़िरी पद “पूज्य” का है, यानी उनके चारों ओर एक भीड़ भी खड़ी है जो झुक रही है।
फिर यही बात दो और पदों पर लगती है। जिनके आचरण दूसरों का अहित करनेवाले हैं, उन्हीं का बड़ा गौरव होता है और वे ही मान्य होते हैं। और दूसरी बात: जो मन, वचन और कर्म से झूठ बकनेवाले हैं, वे ही कलिकाल में वक्ता माने जाते हैं।
मन, वचन और कर्म: यह वही तीन का नाप है जिससे इस प्रसंग के आरम्भ में कहनेवाले ने अपनी शिव-सेवा को पूरा बताया था। यहाँ वही नाप झूठ पर लगाया गया है, मन से भी, वचन से भी, कर्म से भी। झूठ इस युग में फिसलन नहीं, साधना हो गया है, और उसका फल भी मिलता है: वह मंच पर बिठाया जाता है।
घर के भीतर
अब तक जो गिना गया वह बाहर की दुनिया थी: पद, उपाधि, सभा, मंच। अब कहनेवाला दरवाज़े के भीतर चला जाता है। वहाँ जो दिखता है वह और नज़दीक से चुभता है, क्योंकि पद छोड़े जा सकते हैं, माता-पिता नहीं।
पहले सब पुरुष स्त्री के वश में हैं, और उपमा बाज़ार से है, बाजीगर का बन्दर: बन्दर नाचता है, पर नाचना चुनता नहीं। फिर शूद्र ब्राह्मणों को ज्ञान का उपदेश करते हैं, और गले में जनेऊ डालकर कुत्सित दान लेते हैं। चिह्न पहले पहना जाता है और फिर भुनाया जाता है। जो बात ऊपर जटा और नख में थी, वह अब लेन-देन तक पहुँच गयी है।
आगे नक़्शा और खुलता है: सभी पुरुष काम और लोभ में तत्पर और क्रोधी हैं, और देवता, ब्राह्मण, वेद तथा संतों के विरोधी। और फिर, गुणों के धाम सुन्दर पति को छोड़कर स्त्रियाँ परपुरुष का सेवन करती हैं। भुशुण्डि उन्हें अभागी कहते हैं: पापिनी नहीं, अभागी, और यह शब्द उस बात पर एक छाया की तरह पड़ा रह जाता है।
उसके बाद दो जोड़े उलटे दिखाये जाते हैं। सुहागिनें आभूषणों से रहित हैं और विधवाओं के नित नये शृंगार होते हैं। और गुरु-शिष्य के जोड़े के लिये हिसाब का शब्द है: गुरु और शिष्य में बहरे और अंधे का-सा हिसाब है, एक सुनता नहीं, दूसरा देखता नहीं। बहरा और अंधा एक-दूसरे की मदद नहीं कर सकते। यह जोड़ा बेईमान नहीं, बेकार है।
फिर एक ही क्रिया दो बार आती है, हर लेना। जो गुरु शिष्य का धन हर लेता है पर उसका शोक नहीं हरता, वह घोर नरक में पड़ता है। गुरु की परिभाषा इसी क्रिया से बन जाती है: गुरु वह है जो हरता है। प्रश्न केवल इतना है कि वह क्या हरता है।
फिर बात घर के भीतर से भीतर पहुँचती है: माता-पिता बालकों को बुलाकर वही धर्म सिखाते हैं जिससे पेट भरे। फिर वही “वही”: धर्म शब्द हटाया नहीं गया, बच्चों को धर्म ही सिखाया जा रहा है, बस उस शब्द के भीतर रखी चीज़ पेट भरना है। पण्डित और संत का पद बड़ा होकर मिलता है। यह घर में, पहले दिन से, छोटे बच्चे को दिया जा रहा है।
यहाँ दो शब्दों की दूरी ही अर्थ है। पहले बड़ा शब्द है, ब्रह्मज्ञान, और स्त्री-पुरुष उसके सिवा दूसरी बात करते ही नहीं। फिर छोटा-सा सिक्का है, कौड़ी, और उसके लिये लोभवश वे ब्राह्मण और गुरु की हत्या कर डालते हैं। बीच में कोई व्याख्या नहीं। और हत्या उन्हीं दो की होती है जिनसे वह ब्रह्मज्ञान सीखा गया होगा।
फिर यही बात झगड़े की शक्ल में दिखती है। शूद्र ब्राह्मणों से विवाद करते हैं: “हम आपसे कुछ घटकर हैं क्या? जो ब्रह्म को जानता है वही श्रेष्ठ ब्राह्मण है।” और यह कहकर वे उन्हें डाँटकर आँखें दिखाते हैं। भुशुण्डि उस वाक्य का उत्तर नहीं देते। वह वाक्य वहीं खड़ा रहने दिया जाता है, और जो दिखाया जाता है वह आँख है, डाँट है।
टूटी हुई हदें, और एक गवाही
अब नामों की अदला-बदली की माला का आख़िरी मनका आता है। माला ऊँचे से ऊँचे शब्द पर आकर टूटती है। जो पराई स्त्री में आसक्त हैं, कपट करने में चतुर हैं, और मोह, द्रोह तथा ममता में लिपटे हुए हैं, वे ही अभेदवादी ज्ञानी हैं। अभेदवाद, यानी वह दर्शन जो जीव और ब्रह्म में भेद नहीं मानता। और उसके नीचे वह आदमी बिठा दिया गया जो नीचे से नीचे की चीज़ों में लिपटा है।
और ठीक उसके बाद वह बात आती है जो इस चिट्ठे का दर्जा बदल देती है। भुशुण्डि कहते हैं: “मैंने उस कलियुग का यह चरित्र देखा।” यह शास्त्र नहीं, शिकायत नहीं, भविष्यवाणी नहीं। यह गवाही है। और यह सब उसी ने देखा जिसने शुरू में अपने अवगुण गिनाये थे। जो धन के मद में मतवाला और बहुत बकवादी था, वही अब इस सारी बकवास का हिसाब दे रहा है।
फिर दण्ड बताया जाता है। ये लोग स्वयं तो नष्ट रहते ही हैं, जो कहीं सन्मार्ग का पालन करते हैं उन्हें भी नष्ट कर देते हैं। और फिर अपराध का नाम साफ़ लिखा है: जो तर्क करके वेद की निन्दा करते हैं, वे कल्प-कल्प भर एक-एक नरक में पड़े रहते हैं। तर्क करके: हथियार का नाम दिया गया है, और वह हथियार बुद्धि है।
इसके बाद एक ही दृश्य के दो हिस्से आते हैं। पहले में वे जातियाँ गिनायी जाती हैं जिन्हें वर्ण-व्यवस्था नीचे रखती है: तेली, कुम्हार, चाण्डाल, भील, कोल, कलवार। स्त्री मर जाने पर या घर की सम्पत्ति नष्ट हो जाने पर वे सिर मुँड़ाकर संन्यासी हो जाते हैं। वे अपने को ब्राह्मणों से पुजवाते हैं, और अपने ही हाथों दोनों लोक नष्ट करते हैं। और ठीक उसके बाद ब्राह्मण आते हैं, छह विशेषणों के साथ: अपढ़, लोभी, कामी, आचारहीन, मूर्ख, और नीच जाति की व्यभिचारिणी स्त्रियों के स्वामी। पूजा करवानेवाले और पूजा करनेवाले, दोनों एक ही तस्वीर में हैं, और किसी को छोड़ा नहीं गया।
दूसरा हिस्सा इसी दृश्य को पूरा करता है: शूद्र नाना प्रकार के जप, तप और व्रत करते हैं और ऊँचे आसन पर बैठकर पुराण कहते हैं। सब मनुष्य मनमाना आचरण करते हैं। यहाँ शुरू का शब्द लौट आता है, कल्पित: वहाँ दम्भियों ने अपनी बुद्धि से पंथ कल्पित किये थे, यहाँ सब मनुष्य अपना आचार कल्पित कर रहे हैं। और अन्त में दूसरी बार वही बात कही जाती है: अपार अनीति का वर्णन किया ही नहीं जा सकता।
यह बात पूरे चिट्ठे की धुरी है। निदान दो शब्दों में है: वर्णसंकर, और टूटा हुआ सेतु। सेतु का अर्थ पुल भी है और बाँध भी। यहाँ वह मर्यादा है, वह रेखा जिसके इस पार और उस पार का भेद ही समाज को समाज बनाता है। वह रेखा टूट गयी, और टूटने के बाद पानी कहीं रुकता नहीं।
फिर करना और पाना आमने-सामने रखे गये हैं: वे पाप करते हैं, और दुःख, भय, रोग, शोक तथा वियोग पाते हैं। अब तक का चिट्ठा ज़्यादातर आदर, पद और पाखण्ड का था: पण्डित को आदर, झूठे को मंच, दम्भी को संत का नाम। यहाँ से आगे वर्णन बार-बार इस दूसरी क्रिया पर आता है, कि इस सबकी कीमत क्या चुकायी जा रही है।
फिर एक बात इस हिस्से को एक घेरे में बाँध देती है। वेदसम्मत, वैराग्य और विवेक से युक्त भगवान् की भक्ति का जो मार्ग है, मोहवश मनुष्य उस पर नहीं चलते और अनेक नये पंथों की कल्पना करते हैं। यह लगभग वही बात है जो शुरू में दम्भियों के पंथों के विषय में कही गयी थी। जिस बात से यह चिट्ठा खुला था, उसी पर उसका पहला हिस्सा बन्द होता है।
कलि का कौतुक
अब बात एक नयी चाल में चलती है: तेज़ और छोटी, जिसमें हर वाक्य एक अलग तस्वीर है।
पहली ही तस्वीर में दो शब्द आमने-सामने हैं, संन्यासी और घर: संन्यासी बहुत धन लगाकर घर सजाते हैं। और कारण वही निगलनेवाली क्रिया है: वैराग्य नहीं रहा, उसे विषयों ने हर लिया। वैराग्य छोड़ा नहीं गया, ले लिया गया, और ले जानेवाले का नाम भी दिया गया है।
फिर अदला-बदली हालत में है: तपस्वी धनवान हो गये और गृहस्थ दरिद्र। दोनों अपनी-अपनी जगह से खिसक गये। और फिर एक अनपेक्षित शब्द, कलि का कौतुक, तमाशा, वह चीज़ जिसे देखकर आदमी रुक जाता है। जिस युग को अभी मल का घर बताया जा रहा था, उसे यहाँ कौतुक कहा गया है। सुननेवाले को तात कहकर पुकारा गया है, और तीसरी बार कहा गया है कि यह कहा नहीं जाता।
फिर बात घर के भीतर लौटती है, ठण्डे स्वर में। कुलवती और सती स्त्री को पुरुष घर से निकाल देते हैं और अच्छी चाल छोड़कर घर में दासी ला रखते हैं। पुत्र माता-पिता को तभी तक मानते हैं जब तक स्त्री का मुँह नहीं देखा। और जब से ससुराल प्यारी लगने लगी, तब से अपने कुटुम्बी शत्रु-रूप हो गये। “तब तक” और “तब से” के बीच एक-एक रिश्ता चुपचाप जगह बदल लेता है। फिर राजा आते हैं: पापपरायण, धर्म से खाली, प्रजा को नित्य दण्ड देकर उसकी दुर्दशा करते हुए।
फिर बात चिह्नों पर लौटती है, और अब चिह्न इतने पतले हैं कि उनके पीछे कुछ बचा नहीं। धनी लोग मलिन, यानी नीच जाति के, होने पर भी कुलीन माने जाते हैं। द्विज का चिह्न केवल जनेऊ रह गया और तपस्वी का चिह्न नंगा बदन। और फिर उलटबाँसी अपने आख़िरी सिरे तक जाती है: जो वेदों और पुराणों को नहीं मानते, कलियुग में वे ही भगवान् के भक्त और सच्चे संत कहलाते हैं। शुरू में मार्ग बदला था, फिर पण्डित, फिर संत, और अब भक्त।
फिर कहनेवाला भूख तक पहुँचता है। पहली बात अब भी मुँह की है: कवियों के झुंड हो गये पर दुनिया में कोई उदार सुनायी नहीं पड़ता। गुण में दोष लगानेवाले भरे पड़े हैं और गुणी कोई नहीं। फिर शरीर आ जाता है: कलियुग में बार-बार अकाल पड़ते हैं, और अन्न के बिना सब लोग दुखी होकर मरते हैं। आदर, मान, पद और पाखण्ड की सूची यहाँ से पेट की हो जाती है।
ब्रह्माण्ड भर में, और खेत में
अब सुननेवाले को पुकारकर नामों की एक कतार रख दी जाती है जिसमें बीच में कोई क्रिया नहीं आती। कपट, हठ, दम्भ, द्वेष, पाखण्ड, मान, मोह, काम आदि और मद, एक के बाद एक, जैसे कोई बिना रुके गिनता जा रहा हो। और क्रिया अन्त में आती है, एक ही: ब्रह्माण्ड भर में छा गये।
अभी थोड़ी देर पहले बात किसी के घर में थी, दासी, ससुराल और बेटे के बीच। और यहाँ अचानक पैमाना ब्रह्माण्ड हो गया है। बीच की कोई सीढ़ी नहीं, न मुहल्ला, न नगर, न देश: इन चीज़ों के लिये कोई सीमा है ही नहीं।
फिर मनुष्य जप, तप, यज्ञ, व्रत और दान तामसी भाव से करने लगे हैं। यह नहीं कहा गया कि लोगों ने ये काम छोड़ दिये: जप हो रहा है, यज्ञ हो रहा है, दान दिया जा रहा है। जो बदला है वह भाव है, और भाव किसी को दिखता नहीं।
और उसके तुरन्त बाद, बिना यह कहे कि असर कैसे पहुँचता है, वह बात आती है। देवता पृथ्वी पर जल नहीं बरसाते, और बोया हुआ अन्न उगता नहीं। किसी के भीतर का भाव, और खेत में गड़ा बीज। भुशुण्डि इन दोनों के बीच एक शब्द भी नहीं रखते। यही इस चिट्ठे का बड़ा दावा है: जो चीज़ भीतर है और जिसे कोई देख नहीं सकता, उसका हिसाब बाहर, मिट्टी पर चुकाया जाता है। इसी से समझ में आता है कि अभी की सूची अकाल पर क्यों ख़त्म हुई थी।
दस-पाँच बरस, और कल्पान्त तक का घमंड
फिर बात उसी तेज़ चाल में शुरू होती है। उसकी पहली तस्वीर एक स्त्री की है जिसके पास पहनने को कुछ नहीं बचा: स्त्रियों के बाल ही उनका भूषण हैं, और भूख बहुत है। वे धनहीन हैं, बहुत तरह की ममता से दुखी हैं, सुख चाहती हैं पर धर्म में प्रेम नहीं। बुद्धि थोड़ी है और कठोर, और कोमलता नहीं बची।
पहले तीन बातें एक ही दिशा में जाती हैं: मनुष्य रोगों से पीड़ित हैं, भोग कहीं नहीं है। और अभिमान तथा विरोध बिना ही कारण किये जाते हैं। बिना कारण: अब तक हर अवगुण के पीछे कोई लालच था, धन, पद, कौड़ी। यहाँ कारण ख़त्म हो गया है। झगड़ा किसी चीज़ के लिये नहीं हो रहा, अपने आप हो रहा है, जैसे कोई आदत चलती रहती है जब उसका मक़सद कब का जा चुका हो।
फिर हिसाब दो संख्याओं का है: जीवन दस-पाँच बरस का, और घमंड ऐसा मानो कल्पान्त पर भी नाश न होगा। बीच में केवल घमंड है। कोई बुरा काम नहीं हो रहा, बस एक आदमी अपने विषय में जो मान रहा है, वह उसकी अपनी उम्र से हज़ारों गुना बड़ा है।
आगे यही हिसाब फैलता जाता है। कलिकाल ने मनुष्यों को बेहाल कर डाला। कोई बहन-बेटी का भी विचार नहीं करता। न सन्तोष है, न विवेक, न शीतलता। और जाति-कुजाति सब भीख माँगनेवाले हो गये। ईर्ष्या, कड़वे बोल और लालच भरपूर हैं और समता चली गयी। सब लोग वियोग और शोक से मारे हुए हैं, और वर्णाश्रम धर्म के आचरण जा चुके हैं।
अन्त में उन चीज़ों की गिनती है जो नहीं बचीं: इन्द्रियों का दमन, दान, दया, और समझदारी। उनकी जगह मूर्खता और ठगी बढ़ी है, और स्त्री हो या पुरुष, सब शरीर के पालन-पोषण में लगे हैं। और फिर चिट्ठे का आख़िरी नाम आता है, पराई निन्दा करनेवाले: जगत् में वे ही फैले हुए हैं।
चिट्ठा वहीं लौट आया है जहाँ से चला था। शुरू में कहनेवाले ने अपना पहला अवगुण यही गिनाया था, “दूसरे देवताओं की निन्दा करनेवाला”। इतने पद, इतने घर, इतने अकाल, और सूची का आख़िरी नाम वही निकला जो कहनेवाले का अपना पहला नाम था। पूरे युग का हिसाब देकर उसने आख़िर में अपनी ही पहली बात पर उँगली रख दी है, और किसी से कहा नहीं कि उसने ऐसा किया है।
अवगुणों का घर, और उसका एक गुण
और अब वह बात जिसके लिये यह पूरा चिट्ठा है। इतनी लम्बी सूची के बाद आसान काम होता उसे थोड़ा हल्का कर देना, कोई अपवाद गिना देना, कोई सफ़ाई जोड़ देना। भुशुण्डि इनमें से कुछ नहीं करते।
भुशुण्डि गरुड़ को पुकारकर कहते हैं कि कलिकाल पाप और अवगुणों का आगार है। यह शब्द निन्दा का नहीं, घर का है: भण्डार, गोदाम, वह जगह जहाँ चीज़ें रखी जाती हैं। युग को दोष नहीं दिया गया, उसे जगह बताया गया, और जो अभी गिनाया गया वह सब उस जगह में भरा सामान है। एक भी चीज़ वापस नहीं ली गयी।
और फिर, बिना किसी माफ़ी के, एक बात रख दी जाती है। कलियुग का एक गुण भी बहुत बड़ा है, कि उसमें बिना ही परिश्रम छुटकारा मिल जाता है। बिना परिश्रम छुटकारा: ये तीन शब्द अब तक गिनायी हर चीज़ के ठीक सामने आकर खड़े हो जाते हैं।
इस चिट्ठे में परिश्रम की कमी नहीं थी: वेद का विरोध, अपनी बुद्धि से पंथ गढ़ना, जटाएँ और नाख़ून बढ़ाना, जनेऊ पहनकर दान बटोरना। तर्क से वेद की निन्दा, ऊँचे आसन पर बैठकर पुराण कहना, और मन, वचन, कर्म तीनों से झूठ। पूरा युग परिश्रम कर रहा था, और वह कहीं नहीं पहुँच रहा था। और अब कहा जा रहा है कि जो सबको चाहिये था, वह इसी युग में बिना परिश्रम रखा है।
फिर भुशुण्डि इसे गिनकर दिखाते हैं। सत्ययुग, त्रेता और द्वापर में जो गति पूजा, यज्ञ और योग से मिलती है, वही गति कलियुग में लोग केवल भगवान् के नाम से पा जाते हैं। फल एक ही है। जो बदलता है वह दाम है। तीन युगों में उसके लिये पूजा, यज्ञ, योग चाहिये, यानी सामग्री, समय, शरीर और विधि। चौथे में एक नाम। इस युग में न वर्णधर्म बचा, न आश्रम, न सद्ग्रन्थ, न सुननेवाला गुरु, न देखनेवाला शिष्य। उसी में वह रास्ता काम आता है जिसके लिये इनमें से किसी की ज़रूरत नहीं।
बचे हुए शब्द, गिरे हुए लोग
कलियुग के चिट्ठे में एक ही चाल बार-बार चलती है: मार्ग, पण्डित, संत, सयाना, आचारी, गुणवान, ज्ञानी, विरागी, तपस्वी, योगी, सिद्ध, पूज्य, मान्य, वक्ता, कुलीन, भक्त, अभेदवादी। आदर का एक भी शब्द मिटाया नहीं गया। शब्दकोश पूरा बचा है, और उसी को देखकर पता चलता है कि कुछ गिरा है।
दूसरी बात: इस चिट्ठे में एक भी आदमी का नाम नहीं, न अवध के सिवा कोई नगर। सब कुछ जाति, पद और रिश्ते के नाम से है। इसलिये यह किसी की शिकायत नहीं, एक हालत का ब्योरा है, और हालत का ब्योरा किसी एक समय का कैदी नहीं होता।
तीसरी बात उस गवाह की है: शुरू की आत्मकथा उसे उसी भीड़ के भीतर बिठा देती है, उसके अपने मुँह से। जो आगे पूरे युग की बकवास गिनायेगा, वह अपने को बहुत ही बकवादी कहकर शुरू करता है।
और आख़िरी बात: इस चिट्ठे में एक जगह ऐसी है जिसके विषय में कोई शिकायत नहीं, अवध, जहाँ किसी भी जन्म में बस जानेवाला राम-परायण हो जाता है। और यह वचन उसी के मुँह से आया है जो उसी नगरी में रहते हुए उसकी महिमा नहीं जान पाया था। अवध ने अपना काम तब भी किया, जब उसे इसकी ख़बर नहीं थी।
इतनी लम्बी सूची के बाद भुशुण्डि युग को गाली नहीं देते, उसे “आगार”, एक गोदाम बता देते हैं जिसमें बहुत सामान भरा है। और उसी छत के नीचे एक चीज़ और रखी है जिसके लिये किसी को कुछ नहीं करना पड़ता।
जिस युग के विषय में इतना कुछ कहा गया, उसे सुनानेवाला उसमें रह चुका है और उससे निकल चुका है। वह अपनी ही एक पुरानी गली का नक़्शा बना रहा है। नक़्शे के अन्त में वह उस एक दरवाज़े पर निशान लगा देता है जो उस गली में भी खुला हुआ था।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, उत्तरकाण्ड, दोहा 97 से 102, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।