रामचरितमानस · उत्तरकाण्ड · गरुड़ का मोह और भुशुण्डि के पर्वत तक की यात्रा
गरुड़ का मोह और भुशुण्डि के पर्वत तक की यात्रा
जिस पक्षी की पीठ पर हरि बैठते हैं, उसी के मन में यह प्रश्न उठता है कि वे राम कौन थे जिन्हें एक राक्षस ने बाँध लिया। तीन बड़े उसे उत्तर नहीं देते, राह दिखा देते हैं, और राह एक कौए के पास जाती है।
उत्तरकाण्ड यहाँ तक आते-आते युद्ध, राज्याभिषेक और अयोध्या का राज्य पीछे छोड़ चुका है। अब जो कहा जा रहा है वह कैलास पर बैठे शिव अपनी पार्वती को कह रहे हैं, और कहते-कहते वे अपने ही अतीत में उतर गये हैं। पिछले प्रसंग में उन्होंने उत्तर दिशा के एक नीले पर्वत का पता दिया था, और यह बताया था कि वहाँ एक सरोवर है, कुछ पेड़ हैं, और एक कौआ बसता है। इस पन्ने पर वह चित्र पूरा होता है, और फिर कहनेवाले करवट लेते हैं। अब वह कथा सुनिये, वे कहते हैं, कि पक्षियों का राजा उस कौए के पास क्यों गया।
यह प्रसंग एक प्रश्न से चलता है और उस प्रश्न का उत्तर इस पन्ने पर कोई नहीं देता। गरुड़ ने रण में राम को नागपाश में बँधा देखा, वह बन्धन काटा, और लौटते हुए उनके भीतर कुछ टूट गया। जिनके नाम से संसार का बन्धन कटता है, उन्हें एक तुच्छ राक्षस ने कैसे बाँध लिया। यह प्रश्न वे नारद के पास ले जाते हैं, नारद उन्हें ब्रह्मा के पास भेज देते हैं, ब्रह्मा शंकर के पास, और शंकर, जो कुबेर के घर जाते हुए उन्हें रास्ते में मिलते हैं, कहते हैं कि चलते-चलते यह बात समझायी नहीं जा सकती। तीन बड़े, और तीनों में से एक भी समझाता नहीं। तीनों एक पता देते हैं।
और आख़िरी पता एक कौए का है। सात दोहों की इस कथा में पक्षियों के राजा को हर कोई किसी नये नाम से पुकारता है, खगपति, खगेस, बिहंगपति, बैनतेय, उरगाद, खग कुल केतु, और हर नाम उनका पद बताता है। जिसे यह सारे पद मिले हैं वही समझ नहीं पा रहा, और जिसके पास समझ है वह एक काक है, एक नीले पर्वत पर, एक बरगद के नीचे। तुलसी इस उलटफेर को कहीं ऊँची आवाज़ में नहीं कहते। वे बस नाम रखते जाते हैं और पाठक को गिनने देते हैं। यह तुलसीदास का रामचरितमानस है, और एक बात यहाँ ध्यान देने की है: जिसे गरुड़ अपनी पीठ पर ढोते हैं, उसका नाम विष्णु इस पूरे प्रसंग में एक बार भी नहीं आता। उसे हरि कहा गया है, रघुपति कहा गया है, और एक दोहे में त्रिभुवनपति।
इस प्रसंग के मुख्य किरदार
- शिव कहनेवाले, जो इस प्रसंग में अपनी ही कथा के एक पात्र बन जाते हैं, कभी हंस के शरीर में, कभी कुबेर के घर जाती हुई राह पर।
- पार्वती सुननेवाली, जिन्हें उमा, भवानी और गिरिजा कहकर पुकारा गया है, और जिन्हें शिव बीच में एक बार याद दिला देते हैं कि यह मोह उन्होंने भी भीतर से देखा है।
- गरुड़ पक्षियों के राजा, सर्पों के भक्षक, त्रिभुवनपति के वाहन, जिनके भीतर नागपाश देखकर एक संदेह बैठ जाता है और निकलता नहीं।
- काकभुशुण्डि नीले पर्वत का वह कौआ जिसका नाश कल्प के अन्त में भी नहीं होता, और जो बरगद के नीचे बिना रुके रामकथा कहता है।
- नारद देवर्षि, जिनके पास गरुड़ पहले जाते हैं, और जो अपनी सीमा कहकर उन्हें आगे भेज देते हैं।
- ब्रह्मा चतुरानन, बिरंचि, बिधाता, जो संदेह सुनकर पहले राम को सिर नवाते हैं और फिर शंकर का नाम लेते हैं।
- राम जिनका इस पन्ने पर एक ही दृश्य है, इन्द्रजीत के हाथों अपने को बँधा लेना, और जिस दृश्य की याद से शिव को भी लज्जा होती है।
जहाँ मोह नहीं पहुँचता
पिछले प्रसंग का चित्र यहाँ पूरा होता है। शिव उमा को उस नीले पर्वत का पता दे चुके हैं, और अब उस पर्वत के निवासी की बात करते हैं। पर देखिये कि निवासी के विषय में पहली बात क्या कही जाती है। न उसका रूप, न उसका ज्ञान, न उसकी कथा। पहली बात यह कि उसका नाश कल्प के अन्त में भी नहीं होता। एक कौआ, जिसे समय नहीं खाता।
तेहिं गिरि रुचिर बसइ खग सोई । तासु नास कल्पांत न होई॥
चौपाई १
माया कृत गुन दोष अनेका। मोह मनोज आदि अबिबेका॥
उस सुन्दर पर्वत पर वही पक्षी बसता है, और उसका नाश कल्प के अन्त में भी नहीं होता। फिर दूसरी पंक्ति में तुलसी एक सूची खोल देते हैं: माया के रचे हुए अनेकों गुण और दोष, मोह, काम, और ऐसे सारे अविवेक। सूची अगली चौपाई में पूरी होती है। ये सब सारे जगत् में छाये हुए हैं, पर उस पर्वत के पास कभी नहीं फटकते। पहले पक्षी को समय के बाहर रखा गया, फिर पर्वत को माया के बाहर। और ध्यान रखिये कि इस सूची में मोह का नाम है। जो कथा आगे आनेवाली है वह मोह की कथा है, और उस कथा के शुरू होने से पहले ही हमें एक ऐसी जगह दिखा दी गयी है जहाँ मोह का प्रवेश नहीं। रोगी अभी आया नहीं है, पर जिस जगह वह ठीक होगा, वह पहले दिखा दी गयी है।
फिर वह कौआ करता क्या है। शिव इसे चार पेड़ों में बाँटकर बताते हैं, और चारों में एक क्रम है। पीपल के नीचे वह ध्यान धरता है। पाकर के नीचे जप और यज्ञ करता है। आम की छाँह में मानस पूजा, यानी वह पूजा जिसमें फूल और जल बाहर के नहीं, मन के होते हैं। और बरगद के नीचे वह हरि की कथा कहता है, और अनेकों पक्षी आकर सुनते हैं। विचित्र रामचरित को वह अनेक प्रकार से, प्रेम और आदर के साथ गाता है। हरि के भजन के सिवा उसका कोई दूसरा काम नहीं। अब इन चारों को फिर देखिये। पहले तीन काम अकेले के हैं। ध्यान अकेले होता है, जप अकेले, और मानस पूजा तो नाम से ही भीतर की चीज़ है। चौथा काम अकेले नहीं हो सकता। कथा के लिये सुननेवाला चाहिये। इसी चौथे पेड़ के नीचे यह सारा प्रसंग जाकर रुकेगा।
सुननेवाले कौन हैं, यह भी कहा गया है। निर्मल बुद्धि के हंस, जो उस सरोवर पर सदा बसते हैं। और तब कहनेवाले अपनी बात कहते हैं। जब मैंने वहाँ जाकर यह कौतुक देखा, हृदय में विशेष आनन्द उपजा। कौतुक शब्द पर रुकिये। कैलास के स्वामी के लिये यह दृश्य एक कौतुक था, यानी ऐसा कुछ जो देखने में अचरज लगे और मन को बाँध ले। जिसने संसार के सारे दृश्य देखे हैं, उसे एक कौए की कथा-सभा ने रोक लिया।
तब कछु काल मराल तनु धरि तहँ कीन्ह निवास।
दोहा ५७
सादर सुनि रघुपति गुन पुनि आयउँ कैलास॥ ५७॥
तब कुछ काल हंस का शरीर धारण कर मैंने वहाँ निवास किया, आदर से रघुपति के गुण सुने, और फिर कैलास लौट आया। इस दोहे में एक बात है जिस पर आगे का पूरा प्रसंग टिका है, और वह अभी छोटी लगती है। शिव ने वहाँ बैठकर सुनने के लिये हंस का शरीर लिया। वे अपने रूप में जाकर भी सुन सकते थे। उन्होंने ऐसा नहीं किया। जिस सभा में सुननेवाले पक्षी हैं, वहाँ वे पक्षी होकर बैठे। यह बात इसी पन्ने पर आगे उन्हीं के मुँह से एक नियम बनकर लौटेगी, जब वे कहेंगे कि पक्षी पक्षी की ही भाषा समझता है। और सादर शब्द भी देखिये। महादेव रघुपति के गुण आदर से सुन रहे हैं, एक कौए के मुँह से, और उनके साथ बैठे हैं सरोवर के हंस।
सार: शिव उमा को बताते हैं कि नीले पर्वत का कौआ कल्प के अन्त में भी नष्ट नहीं होता और माया के रचे मोह आदि उस पर्वत के पास नहीं फटकते। वह पीपल के नीचे ध्यान, पाकर के नीचे जप, आम की छाँह में मानस पूजा और बरगद के नीचे हरिकथा करता है, जिसे सरोवर के हंस सुनते हैं। शिव स्वयं हंस का शरीर धरकर वहाँ कुछ काल रहे, रघुपति के गुण सुने, और कैलास लौटे।
वह बन्धन, जिसे याद करके शिव को भी लाज आती है
गिरिजा, शिव कहते हैं, यह सब इतिहास मैंने कह दिया, कि मैं किस समय उस पक्षी के पास गया था। अब वह कथा सुनिये कि पक्षिकुल की ध्वजा किस कारण काक के पास गये। इसी आधी पंक्ति में तुलसी ने पूरा प्रसंग रख दिया है। खग कुल केतु, यानी पक्षियों के वंश का झण्डा, गया एक काग के पास। दोनों शब्द एक ही पंक्ति में, आमने-सामने। जिसे झण्डा कहा गया वह पूछने गया, और जिसे केवल काग कहा गया वह बतानेवाला है।
जब रघुनाथ कीन्हि रन क्रीड़ा । समुझत चरित होति मोहि ब्रीड़ा॥
चौपाई २
इंद्रजीत कर आपु बँधायो । तब नारद मुनि गरुड़ पठायो॥
जब रघुनाथ ने वह रणलीला की, जिसे याद करने से मुझे लज्जा होती है, इन्द्रजीत के हाथों अपने को बँधा लिया, तब नारद मुनि ने गरुड़ को भेजा। यहाँ दो बातें एक साथ हो रही हैं। पहली यह कि कहनेवाला स्वयं उस दृश्य से लजाता है। शिव को उस लीला की याद आते ही संकोच होता है। यानी गरुड़ का जो प्रश्न आगे आयेगा, वह किसी मूर्ख का प्रश्न नहीं है। वह दृश्य ऐसा है कि महादेव भी उसे बिना सिर झुकाये याद नहीं कर पाते। दूसरी बात शब्दों में है। तुलसी नहीं कहते कि इन्द्रजीत ने राम को बाँधा। वे कहते हैं, आपु बँधायो, अपने को बँधा लिया। बाँधनेवाला इन्द्रजीत है, पर बँधने का कर्ता राम हैं। उत्तर प्रश्न से पहले ही पंक्ति में रख दिया गया है, और गरुड़ इसे नहीं देख पाते, क्योंकि रणभूमि में वे पंक्ति नहीं देख रहे थे, दृश्य देख रहे थे।
सर्पों के भक्षक बन्धन काटकर गये, और हृदय में प्रचण्ड विषाद उपजा। प्रभु के बन्धन को बहुत प्रकार से समझते हुए सर्पों के शत्रु विचार करने लगे। ध्यान दीजिये कि तुलसी इस चौपाई में गरुड़ का नाम नहीं लेते। दो बार पुकारते हैं और दोनों बार साँपों के बैरी कहकर, उरगाद और उरग आराती। यह संयोग नहीं है। जिनके भोजन में साँप हैं, वे साँपों का बन्धन काटने आये, और काटकर लौटे तो यही बात उनके भीतर चुभ गयी। जिस चीज़ को मैं खा जाता हूँ, उसने इन्हें बाँध रखा था, और मैंने इन्हें छुड़ाया। तो ये कौन हैं। विषाद इसी हिसाब से पैदा हुआ है, और हिसाब ग़लत नहीं है। ग़लत केवल यह है कि हिसाब लगानेवाला अपने को उस दृश्य से बाहर मान रहा है।
ब्यापक ब्रह्म बिरज बागीसा। माया मोह पार परमीसा॥
चौपाई ३
सो अवतार सुनेउँ जग माहीं । देखेउँ सो प्रभाव कछु नाहीं॥
यह वह चौपाई है जिसमें गरुड़ अपना संदेह अपनी ही भाषा में रखते हैं। जो व्यापक ब्रह्म हैं, विकार से रहित, वाणी के स्वामी, माया और मोह से परे परमेश्वर, मैंने सुना था कि जगत् में उन्हीं का अवतार है। पर मैंने उसका प्रभाव कुछ भी नहीं देखा। पहली पंक्ति में छह विशेषण हैं और दूसरी में दो क्रियाएँ, सुनेउँ और देखेउँ। सुना, और देखा। सारा संदेह इन दो क्रियाओं की दूरी में है। गरुड़ की श्रद्धा कान से आयी थी और आँख ने उसे झुठला दिया। इस संदेह में एक ईमानदारी भी है, जो अक्सर छूट जाती है। गरुड़ यह नहीं कह रहे कि राम ब्रह्म नहीं हैं। वे कह रहे हैं कि जो ब्रह्म का बताया गया था, वह मैंने अपनी आँख से नहीं देखा। यह अस्वीकार नहीं है, यह एक खाली जगह है, और खाली जगह में भ्रम जल्दी भरता है।
भव बंधन ते छूटहिं नर जपि जा कर नाम।
दोहा ५८
खर्ब निसाचर बाँधेउ नागपास सोइ राम॥ ५८॥
जिनका नाम जपकर मनुष्य संसार के बन्धन से छूट जाते हैं, उन्हीं राम को एक तुच्छ राक्षस ने नागपाश से बाँध लिया। यह दोहा गरुड़ के विचार की ही अगली कड़ी है, और वह बिना किसी उत्तर के खड़ा है। तुलसी उसे ऐसा ही खड़ा छोड़ देते हैं। पहली पंक्ति में बंधन शब्द है, दूसरी में बाँधेउ। एक बन्धन वह जो नाम से कटता है, एक बन्धन वह जो नाम रखनेवाले पर पड़ा। और बीच में खर्ब निसाचर, तुच्छ राक्षस। जिस राक्षस ने बाँधा उसे छोटा कहकर बन्धन को और बड़ा कर दिया गया है। संदेह की भाषा ऐसी ही होती है। वह दोनों सिरों को खींचकर उनके बीच की दूरी बढ़ाती है, और फिर उस दूरी को देखकर घबराती है।
सार: शिव अब वह कथा उठाते हैं कि गरुड़ काक के पास क्यों गये। रण में राम ने इन्द्रजीत के हाथों अपने को बँधा लिया, नारद ने गरुड़ को भेजा, गरुड़ ने बन्धन काटा और लौटते हुए उनके हृदय में प्रचण्ड विषाद उपजा। जिसे व्यापक ब्रह्म का अवतार सुना था उसका प्रभाव आँख से नहीं दिखा, और जिसके नाम से भव-बन्धन कटता है उसे एक तुच्छ राक्षस ने नागपाश में बाँध लिया।
समझाने से जो न मिटे
अब गरुड़ वह करते हैं जो हर बुद्धिमान संदेह के सामने करता है। वे अपने मन को समझाते हैं। और यहाँ तुलसी इस प्रसंग की सबसे सच्ची पंक्तियों में से एक रखते हैं।
नाना भाँति मनहि समुझावा। प्रगट न ग्यान हृदयँ भ्रम छावा॥
चौपाई ४
खेद खिन्न मन तर्क बढ़ाई । भयउ मोहबस तुम्हरिहिं नाई॥
अनेकों प्रकार से मन को समझाया, पर ज्ञान प्रकट नहीं हुआ, हृदय में भ्रम छा गया। खेद से खिन्न मन में तर्क बढ़ाते हुए वे मोह के वश हो गये, आपकी ही तरह। तर्क बढ़ाई, यही वह शब्द है। गरुड़ ने तर्क कम नहीं किया, बढ़ाया, और जितना बढ़ाया उतना भ्रम छाया। यह पंक्ति एक पूरे रास्ते को बन्द कर देती है। संदेह से अकेले लड़कर उसमें से नहीं निकला जाता। और अन्तिम शब्द देखिये, तुम्हरिहिं नाई, आपकी ही भाँति। शिव यह उमा से कह रहे हैं, और उन्हें याद दिला रहे हैं कि यह मोह उन्होंने भी भीतर से देखा है। यह टोकना नहीं है। यह उस सुननेवाली को कथा के भीतर बिठाना है, जो अब तक बाहर बैठी सुन रही थी। जिसे गरुड़ का मोह समझना है, उसे अपना याद करना पड़ेगा।
व्याकुल होकर वे देवर्षि के पास गये और अपने मन का संदेह कह सुनाया। सुनकर नारद को अत्यन्त दया आयी। यहाँ भी शब्द चुना हुआ है। दया आयी। क्रोध नहीं, हँसी नहीं, और तुरन्त उपदेश देने की उतावली भी नहीं। और नारद जो पहला वाक्य कहते हैं वह किसी सिद्धान्त से नहीं, अपने अनुभव से आता है। सुनिये पक्षिराज, राम की माया प्रबल है। जो ज्ञानियों का चित्त हर लेती है, बलपूर्वक मन में मोह भर देती है, और जिसने मुझे भी बहुत बार नचाया है, वही आपको व्याप गयी है। नचावा मोही, मुझे नचाया। देवर्षि पहले अपना नाम इस सूची में लिखते हैं, फिर गरुड़ का। जो कहनेवाला अपने को बाहर रखकर कहता, उसकी बात इस समय गरुड़ के भीतर नहीं उतरती।
और फिर नारद वह बात कहते हैं जो किसी सिखानेवाले के लिये कहना सबसे कठिन है। आपके हृदय में महामोह उपजा है, और मेरे कहने से यह शीघ्र नहीं मिटेगा। चतुरानन के पास जाइये, और वहाँ जो आदेश मिले वही करिये। नारद यह नहीं कहते कि यह मोह मिटेगा नहीं। वे कहते हैं, मेरे कहने से नहीं मिटेगा। सीमा अपनी बताते हैं, रोग की नहीं। और पता देने में एक क्षण की देर नहीं लगाते।
अस कहि चले देवरिषि करत राम गुन गान।
दोहा ५९
हरि माया बल बरनत पुनि पुनि परम सुजान॥ ५९॥
ऐसा कहकर परम सुजान देवर्षि राम का गुणगान करते हुए, और बार-बार हरि की माया का बल वर्णन करते हुए, चल दिये। इस दोहे में तुलसी ने नारद को परम सुजान कहा है, ठीक उस जगह जहाँ उन्होंने समझाने से इनकार किया है। यानी यह इनकार ही सुजानता है। और जाते हुए वे गाते क्या हैं, राम के गुण, और माया का बल। दो चीज़ें एक ही साँस में, पुनि पुनि। जिस माया ने गरुड़ को उलझाया, उसी का बल गाते हुए नारद जाते हैं, क्योंकि उनकी दृष्टि में वह उलझन भी उसी की लीला है जिसका गुण वे गा रहे हैं। गरुड़ के लिये माया एक समस्या है। नारद के लिये वह गीत का एक और पद है।
सार: गरुड़ अपने मन को समझाते हैं, पर तर्क बढ़ाने से भ्रम और गहरा होता है और वे मोह के वश हो जाते हैं, शिव के शब्दों में उमा की ही तरह। नारद उनका संदेह दया से सुनते हैं, कहते हैं कि राम की माया ने मुझे भी बहुत बार नचाया है और यह मोह मेरे कहने से शीघ्र नहीं मिटेगा, इसलिये ब्रह्मा के पास जाइये। फिर राम के गुण और माया का बल गाते हुए चले जाते हैं।
ब्रह्मा सिर नवाते हैं
तब पक्षिराज बिरंचि के पास गये और अपना संदेह सुनाया। और ब्रह्मा का पहला उत्तर शब्दों में नहीं है। सुनकर बिरंचि ने राम को सिर नवाया, और उनका प्रताप समझकर उन पर अत्यन्त प्रेम छा गया। सामने एक व्याकुल पक्षी खड़ा है जिसका प्रश्न है कि राम बँध कैसे गये, और सृष्टि रचनेवाला उसी प्रश्न को सुनकर राम को प्रणाम करता है। जो बात गरुड़ के लिये आघात है, वह ब्रह्मा के लिये उसी प्रताप का एक और प्रमाण है। एक ही घटना, दो आँखें, और दोनों के बीच का अन्तर ही इस प्रसंग का विषय है।
फिर ब्रह्मा मन में विचार करते हैं, और तुलसी हमें उनके मन के भीतर ले जाते हैं। कवि, कोविद, ज्ञाता, सब माया के वश हैं। हरि की माया का प्रभाव असीम है, जिसने मुझे भी अनेक बार नचाया है। बिपुल बार जेहिं मोहि नचावा। यही वाक्य कुछ ही चौपाइयाँ पहले नारद ने कहा था, जेहिं बहु बार नचावा मोही। दो अलग-अलग लोकों के दो बड़े एक ही बात लगभग एक ही शब्दों में कह रहे हैं, और दोनों बिना पूछे कह रहे हैं। और तब ब्रह्मा वह बात सोचते हैं जो केवल वही सोच सकते थे। यह चराचर जगत् मेरा ही रचा हुआ है। जब मैं ही नाचता हूँ, तो खगराज के मोह में आश्चर्य क्या।
विचार पूरा हुआ तो वे बोले, और तुलसी कहते हैं कि सुन्दर वाणी बोले। राम की प्रभुता महेश जानते हैं। यह वाक्य अपने आप में एक स्वीकार है। सृष्टि के रचनेवाले कह रहे हैं कि यह बात मैं नहीं जानता, कोई और जानता है। और इसे कहने में उन्हें कोई कठिनाई नहीं होती, क्योंकि अभी-अभी वे अपने मन में यह मान चुके हैं कि माया ने उन्हें भी नचाया है। जिसने अपना नाचना मान लिया, उसके लिये यह कहना आसान है कि उत्तर किसी और के पास है।
बैनतेय संकर पहिं जाहू । तात अनत पूछहु जनि काहू॥
चौपाई ५
तहँ होइहि तव संसय हानी। चलेउ बिहंग सुनत बिधि बानी॥
हे वैनतेय, शंकर के पास जाइये, और तात, अन्यत्र किसी से मत पूछिये। वहीं आपके संदेह का नाश होगा। ब्रह्मा की वाणी सुनते ही पक्षी चल पड़ा। इस चौपाई में ब्रह्मा गरुड़ को दो नामों से पुकारते हैं, बैनतेय और तात। पहला उनके वंश का नाम है, दूसरा वह जो कोई बड़ा किसी छोटे को स्नेह से कहता है। और बीच में एक निषेध है जो इस प्रसंग में कहीं और नहीं आया: अनत पूछहु जनि काहू, और कहीं किसी से न पूछना। नारद ने ऐसा नहीं कहा था। ब्रह्मा जानते हैं कि भटकते हुए संदेही का सबसे बड़ा खतरा यह है कि वह हर दरवाज़े पर पूछता चला जाये और हर दरवाज़े से आधा उत्तर ले आये, और आधे उत्तरों का ढेर संदेह को और मोटा करता है। इसलिये पता एक है, और उसके साथ एक ताला भी है।
सार: गरुड़ का संदेह सुनकर ब्रह्मा राम को सिर नवाते हैं और मन में सोचते हैं कि कवि, कोविद और ज्ञाता सब माया के वश हैं, उसने मुझे भी अनेक बार नचाया है, और जब जगत् का रचनेवाला ही नाचता है तो खगराज के मोह में आश्चर्य क्या। फिर वे कहते हैं कि राम की प्रभुता महेश जानते हैं, शंकर के पास जाइये और किसी और से मत पूछिये। गरुड़ चल पड़ते हैं।
कुबेर के घर जाती राह पर
यहाँ कथा एक अनोखा मोड़ लेती है। अब तक शिव कह रहे थे। अब वे उसी कथा में एक पात्र बनकर उतरते हैं, और तुलसी इस उतरने को एक दोहे में इतनी सफ़ाई से करते हैं कि पाठक को समय और स्थान दोनों एक साथ मिल जाते हैं।
परमातुर बिहंगपति आयउ तब मो पास।
दोहा ६०
जात रहेउँ कुबेर गृह रहिहु उमा कैलास॥ ६०॥
बड़ी आतुरता से पक्षिराज तब मेरे पास आये। उमा, मैं उस समय कुबेर के घर जा रहा था, और आप कैलास पर थीं। इस दोहे की दूसरी पंक्ति में शिव अपना पता और उमा का पता दोनों देते हैं, और इससे एक बात साफ़ हो जाती है। यह भेंट उमा ने नहीं देखी। इसीलिये कही जा रही है। जो सुननेवाला वहाँ नहीं था, उसे यह बताना पड़ता है कि वह उस समय कहाँ था। और शिव का अपना पता एक राह है, कोई घर नहीं। यह छोटी बात आगे उनका पूरा उत्तर तय कर देगी। परमातुर शब्द भी देखिये। नारद के पास व्याकुल पहुँचे थे, यहाँ परमातुर पहुँचते हैं। दो दरवाज़े पीछे छूट चुके हैं और उतावली बढ़ी है, घटी नहीं।
गरुड़ ने आदर से उनके चरणों में सिर नवाया और अपना संदेह सुनाया। शिव कहते हैं कि उनकी विनती और कोमल वाणी सुनकर उन्होंने प्रेम से कहा। यहाँ भी वही क्रम है जो नारद और ब्रह्मा के पास था, पहले सिर नवाना, फिर संदेह कहना, फिर सुननेवाले की ओर से कठोरता की जगह कोमलता। तीन बार यह क्रम आ चुका है, और तीनों बार संदेही को झिड़की नहीं मिली।
मिलेहु गरुड़ मारग महँ मोही । कवन भाँति समुझावौं तोही॥
चौपाई ६
तबहिं होइ सब संसय भंगा। जब बहु काल करिअ सतसंगा॥
गरुड़, आप मुझे रास्ते में मिले हैं। मैं आपको किस प्रकार समझाऊँ। सब संदेह तभी भंग होता है जब बहुत काल तक सत्संग किया जाय। पहली पंक्ति में एक बहाना दिखता है और दूसरी में उसका कारण। शिव यह नहीं कह रहे कि उनके पास उत्तर नहीं है। वे कह रहे हैं कि उत्तर उस किस्म का है जो चलते-चलते नहीं दिया जाता। जो चीज़ बहुत काल में बनती है, उसे राह पर खड़े होकर दो वाक्यों में नहीं थमाया जा सकता। और सतसंगा शब्द पर रुकिये। शिव ने सत्संग कहा, उपदेश नहीं कहा। संदेह का इलाज कोई एक वाक्य नहीं है, एक संग है, और संग में समय लगता है। इसीलिये राह पर वह नहीं हो सकता, क्योंकि राह पर कोई ठहरता नहीं।
फिर वे बताते हैं कि उस सत्संग में क्या हो। वहाँ सुन्दर हरिकथा सुनी जाय, जिसे मुनियों ने अनेक प्रकार से गाया है, और जिसके आदि, मध्य और अन्त में प्रतिपाद्य प्रभु राम ही हैं। यहाँ एक शर्त छिपी है। कथा वह हो जिसमें शुरू से अन्त तक राम ही विषय हों। जिस पक्षी का संदेह राम के विषय में है, उसे राम की ही कथा में बैठाया जा रहा है, किसी और चीज़ में नहीं। और तब शिव एक वादा करते हैं। भाई, जहाँ नित्य हरिकथा होती है, मैं आपको वहीं भेजता हूँ, जाकर सुनिये। सुनते ही सारा संदेह जायेगा और राम के चरणों में अति नेह होगा। नित, प्रतिदिन। कथा वहाँ कभी-कभी नहीं होती, हर दिन होती है। और भाई शब्द भी देखिये। महादेव पक्षिराज को भाई कह रहे हैं। इस पूरे प्रसंग में गरुड़ को जितने नाम मिले हैं, उनमें यह अकेला है जो कोई पद नहीं है।
बिनु सतसंग न हरि कथा तेहि बिनु मोह न भाग।
दोहा ६१
मोह गएँ बिनु राम पद होइ न दृढ़ अनुराग॥ ६१॥
बिना सत्संग हरिकथा नहीं, उसके बिना मोह नहीं भागता, और मोह के गये बिना राम के चरणों में दृढ़ अनुराग नहीं होता। यह दोहा एक सीढ़ी है और उसमें चार डण्डे हैं। सत्संग, कथा, मोह का जाना, और अनुराग। सीढ़ी नीचे से ऊपर बनायी गयी है, क्योंकि हर डण्डा अपने से नीचे वाले पर टिका है। गरुड़ का प्रश्न मोह का था। शिव उन्हें बताते हैं कि मोह इस सीढ़ी का तीसरा डण्डा है, और तीसरे पर हाथ रखने के लिये पहले दो पर पैर रखना पड़ता है। इस दोहे में बिनु तीन बार आया है और न तीन बार, और तीनों बार वह किसी चीज़ को असम्भव नहीं कहता। वह कहता है, बिना किसी और चीज़ के असम्भव। यह निराशा की भाषा नहीं है। यह उस आदमी की भाषा है जो रास्ता जानता है और उसे उलटे क्रम में नहीं चलने देता।
सार: कुबेर के घर जाते हुए शिव को गरुड़ रास्ते में मिलते हैं, उमा उस समय कैलास पर थीं। शिव कहते हैं कि राह चलते यह नहीं समझाया जा सकता, सब संदेह तभी टूटता है जब बहुत काल सत्संग हो और वहाँ वह हरिकथा सुनी जाय जिसके आदि, मध्य और अन्त में राम ही हों। दोहा सीढ़ी बाँध देता है: बिना सत्संग कथा नहीं, बिना कथा मोह नहीं जाता, बिना मोह के गये अनुराग नहीं।
उत्तर दिशा में एक नीला पर्वत
मिलहिं न रघुपति बिनु अनुरागा । किएँ जोग तप ग्यान बिरागा॥
चौपाई ७
उत्तर दिसि सुंदर गिरि नीला । तहँ रह काकभुसुंडि सुसीला॥
बिना अनुराग रघुपति नहीं मिलते, चाहे योग, तप, ज्ञान और वैराग्य सब कर लिये जायँ। उत्तर दिशा में एक सुन्दर नीला पर्वत है, वहाँ सुशील काकभुशुण्डि रहते हैं। इस चौपाई की दो पंक्तियों के बीच एक छलाँग है। पहली पंक्ति सिद्धान्त है, दूसरी पता। बीच में कोई इसलिये नहीं है, और तुलसी को उसकी ज़रूरत भी नहीं पड़ी। जो अनुराग से मिलते हैं, उनका अनुराग जहाँ मिलता है, वह जगह यह है। और चार साधनों की जो सूची पहली पंक्ति में है, योग, तप, ज्ञान, वैराग्य, उसमें से एक भी गरुड़ के पास कम नहीं था। जो चीज़ उन्हें चाहिये थी, वह इस सूची में नहीं है, और यह बात उन्हें कहनेवाले की ज़बान से नहीं, चौपाई के बनाव से पता चलती है।
फिर उस कौए का परिचय, और परिचय में चार बातें हैं। राम-भक्ति के मार्ग में परम प्रवीण, ज्ञानी, गुणों का घर, और बहु कालीन, यानी बहुत काल के। यह आख़िरी विशेषण उस पहली चौपाई से बाँधता है जहाँ कहा गया था कि उनका नाश कल्प के अन्त में भी नहीं होता। और तब वह पंक्ति जिसके लिये यह सारा पता दिया गया है, राम कथा सो कहइ निरंतर। वे राम की कथा निरन्तर कहते हैं। शिव ने ऊपर कहा था, जहाँ नित्य कथा होती है वहाँ भेजता हूँ। यह वही जगह है। और सुननेवाले श्रेष्ठ पक्षी हैं, भाँति-भाँति के, आदर से सुनते हुए। वहाँ जाकर हरि के गुण बहुत सुनिये, मोह से उपजा दुःख दूर होगा।
शिव कहते हैं कि जब उन्होंने यह सब समझाकर कहा, तब गरुड़ उनके चरणों में सिर नवाकर हर्षित होकर चले। हरषि। जिस पक्षी को हम व्याकुल और परमातुर देख चुके हैं, वह यहाँ पहली बार हर्ष के साथ चलता है। उसे उत्तर नहीं मिला। उसे एक रास्ता मिला, और उस समय उसके लिये रास्ता मिलना ही इतना था कि व्याकुलता हर्ष में बदल गयी। तीन दरवाज़ों के बाद यह पहला दरवाज़ा है जिसके पीछे कोई और दरवाज़ा नहीं है।
और अब शिव उमा से वह बात कहते हैं जो गरुड़ को नहीं कही गयी। उमा, मैंने उसे इसलिये नहीं समझाया कि रघुपति की कृपा से मैं उसका मर्म पा गया था। उसने कभी अभिमान किया होगा, जिसे कृपानिधान नष्ट करना चाहते हैं। यह पूरे प्रसंग का सबसे शान्त और सबसे बड़ा मोड़ है। अब तक गरुड़ का मोह एक दुर्घटना लगता था, माया का एक हमला। शिव उसे उलट देते हैं। यह मोह कृपा है। किसी पुराने अभिमान को गलाने के लिये उसे भेजा गया है, और जो चीज़ किसी को गलाने के लिये दी गयी हो, उसे बीच रास्ते में समझाकर हटा देना उस कृपा के काम में हाथ डालना होता। शिव ने हाथ नहीं डाला। और यह भी ध्यान दीजिये कि तुलसी नहीं बताते कि वह अभिमान क्या था। होइहि कीन्ह कबहुँ, कभी किया होगा। अनुमान ही रखा गया है, कथा नहीं। शिव को मर्म मिला है, ब्योरा नहीं, और वे ब्योरा गढ़ते भी नहीं।
कछु तेहि ते पुनि मैं नहिं राखा। समुझइ खग खगही कै भाषा॥
चौपाई ८
प्रभु माया बलवंत भवानी। जाहि न मोह कवन अस ग्यानी॥
और कुछ इस कारण भी मैंने उसे अपने पास नहीं रखा कि पक्षी पक्षी की ही भाषा समझता है। भवानी, प्रभु की माया बलवान है, ऐसा कौन ज्ञानी है जिसे वह मोह न ले। यह दूसरा कारण पहले से हलका दिखता है और उतना ही गहरा है। शिव इस पन्ने के आरम्भ में स्वयं हंस का शरीर लेकर उस कौए की कथा सुनने बैठे थे। वे जानते हैं कि वहाँ पक्षी होकर बैठना क्या होता है, और यह भी कि जो बात एक कौआ एक गरुड़ से कहेगा, वह महादेव के कहने से भी अलग तरह उतरेगी। कहनेवाले का बड़ा होना ही हर जगह काम नहीं करता। कभी-कभी उसका बराबर का होना काम करता है, और कभी उसका छोटा होना। और चौपाई का अन्त एक प्रश्न से होता है जो उत्तर नहीं माँगता, क्योंकि उत्तर सबको मालूम है। ऐसा कौन ज्ञानी है जिसे माया न मोहे। पिछली तीन भेंटों में तीन बड़े यही कह चुके हैं।
ग्यानी भगत सिरोमनि त्रिभुवनपति कर जान।
दोहा ६२ (क)
ताहि मोह माया नर पावँर करहिं गुमान॥ ६२ (क)॥
जो ज्ञानियों और भक्तों के शिरोमणि हैं, त्रिभुवनपति के वाहन हैं, उन्हें भी माया ने मोह लिया, और नीच मनुष्य घमण्ड करते हैं। यह दोहा प्रसंग से बाहर निकलकर पाठक की ओर देखता है। यहाँ वही तुलसी हैं जो कथा के बीच में कभी-कभी अपनी जगह से उठकर सामने आ जाते हैं। और ध्यान दीजिये कि गरुड़ का नाम यहाँ भी नहीं है। हैं केवल तीन पद: ज्ञानियों के शिरोमणि, भक्तों के शिरोमणि, त्रिभुवनपति का वाहन। जिसे तीनों लोकों का स्वामी अपनी सवारी बनाता है, उसे उसी स्वामी के विषय में संदेह हुआ। तुलसी इसे कहीं भारी नहीं करते। बस एक दोहे में पद गिनाते हैं, फिर नर पावँर की ओर मुड़ जाते हैं, और दोहा वहीं ख़त्म हो जाता है। जिसे चुभना है, उसे चुभ जायेगा।
सिव बिरंचि कहुँ मोहइ को है बपुरा आन। अस जियँ जानि भजहिं मुनि माया पति भगवान॥
दोहा ६२ (ख)
जब यह माया शिव और बिरंचि को मोह लेती है, तो दूसरा बेचारा कौन है। मन में यही जानकर मुनि माया के स्वामी भगवान् का भजन करते हैं। इस दोहे के ठीक पहले मासपारायण का अट्ठाईसवाँ विश्राम आता है, यानी महीने भर के पाठ में आज का दिन इसी पंक्ति पर थमता है। और थमने की जगह देखिये। गरुड़ अभी उस पर्वत पर पहुँचे नहीं हैं। पाठक को रात भर इसी वाक्य के साथ छोड़ा जाता है कि जिसे शिव और ब्रह्मा नहीं झेल सके, उसके सामने कोई और क्या है। पर इस दोहे में उत्तर भी है, हलके से रखा हुआ। मुनि माया से लड़ते नहीं, माया के पति को भजते हैं। लड़ाई की जगह भजन, और उलझन की जगह उसका स्वामी। बपुरा शब्द, बेचारा, इस पूरे प्रसंग के सारे बड़े नामों पर एक साथ चढ़ जाता है, और उसमें कोई अपमान नहीं है। वह बस हिसाब बराबर कर देता है।
सार: शिव गरुड़ को उत्तर दिशा के नीले पर्वत पर काकभुशुण्डि के पास भेजते हैं, जो राम-भक्ति में परम प्रवीण हैं और निरन्तर रामकथा कहते हैं। गरुड़ हर्षित होकर जाते हैं। उमा को शिव बताते हैं कि उन्होंने स्वयं इसलिये नहीं समझाया कि यह मोह किसी पुराने अभिमान को गलाने की कृपानिधान की इच्छा है, और इसलिये भी कि पक्षी पक्षी की भाषा समझता है। दो दोहे कहते हैं कि जब ज्ञानी और भक्त शिरोमणि, त्रिभुवनपति के वाहन को माया मोह लेती है, और शिव और ब्रह्मा को भी, तो कोई और बेचारा क्या है। इसीलिये मुनि माया के स्वामी को भजते हैं।
पर्वत दिखा, और मोह गया
गयउ गरुड़ जहँ बसइ भुसुंडा । मति अकुंठ हरि भगति अखंडा॥
चौपाई ९
देखि सैल प्रसन्न मन भयऊ। माया मोह सोच सब गयऊ॥
गरुड़ वहाँ गये जहाँ भुशुण्डि बसते हैं, अकुण्ठ बुद्धि और अखण्ड हरि-भक्ति वाले। पर्वत देखकर मन प्रसन्न हुआ, और माया, मोह, सोच सब चला गया। यह पंक्ति इस पन्ने की सबसे बड़ी घटना है, और वह इतनी हलकी है कि आँख से निकल जाती है। मोह चला गया। कब। कथा सुनने से पहले। कौए के दर्शन से भी पहले। पर्वत को देखकर। और यही वह पर्वत है जिसके विषय में इस पन्ने की पहली चौपाई ने कहा था कि माया के रचे मोह उसके पास नहीं फटकते। तुलसी ने वह पंक्ति वहाँ इसी क्षण के लिये रखी थी। नारद ने कहा था, मेरे कहने से नहीं मिटेगा। ब्रह्मा ने कहा, महेश जानते हैं। शिव ने कहा, राह पर नहीं समझाया जा सकता। और अन्त में मोह किसी के कहने से नहीं गया। वह उस जगह पर पहुँचने से गया जहाँ उसका रहना सम्भव ही नहीं था। तीन बड़ों ने जो नहीं किया, एक भूगोल ने कर दिया।
फिर छोटे-छोटे काम, जिन्हें तुलसी ठीक उसी क्रम में रखते हैं जिसमें एक थका हुआ यात्री करता है। तालाब में स्नान किया, जल पिया, और हृदय में हर्षित होकर बरगद के नीचे गये। बट तर, वही चौथा पेड़, जिसके नीचे कथा होती है। और वहाँ बूढ़े-बूढ़े पक्षी आये हुए थे, राम के सुन्दर चरित सुनने। बृद्ध बृद्ध, दो बार। यह सभा नयी नहीं है। सुननेवाले बूढ़े पक्षी हैं, और कथा यहाँ निरन्तर होती है, यह शिव पहले ही कह चुके हैं। पक्षियों का राजा एक ऐसी सभा में आ बैठा है जो उसके आने से पहले से बैठी है और उसके जाने के बाद भी बैठी रहेगी।
और समय देखिये। भुशुण्डि कथा आरम्भ करना ही चाहते थे कि उसी समय खगनाथ वहाँ पहुँचे। न कथा चल रही थी, न समाप्त हो चुकी थी। ठीक आरम्भ का क्षण। तुलसी इस मेल पर कुछ नहीं कहते। वे केवल घड़ी बता देते हैं और आगे बढ़ जाते हैं, और पाठक अपने आप समझ लेता है कि जिसे इतनी दूर से भेजा गया है, उसके लिये कथा रुकी हुई थी। पक्षिराज को आते देख कौए समेत सारा पक्षी-समाज हर्षित हुआ। और तब कौए का शिष्टाचार, जो किसी राजसभा से कम नहीं है। बहुत आदर किया, कुशल पूछी, सुन्दर आसन दिया, प्रेम से पूजा की, और तब मधुर वचन बोले। एक कौआ गरुड़ की पूजा कर रहा है, और जिसकी पूजा हो रही है, वह पूछने आया है।
नाथ कृतारथ भयउँ मैं तव दरसन खगराज।
दोहा ६३ (क) और (ख)
आयसु देहु सो करौं अब प्रभु आयहु केहि काज॥ ६३ (क)॥
सदा कृतारथ रूप तुम्ह कह मृदु बचन खगेस।
जेहि कै अस्तुति सादर निज मुख कीन्हि महेस॥ ६३ (ख)॥
नाथ, हे खगराज, आपके दर्शन से मैं कृतार्थ हुआ। आज्ञा दीजिये, मैं वही करूँ। प्रभु, आप किस काम से आये हैं। और गरुड़ का उत्तर कोमल शब्दों में। आप तो सदा कृतार्थ रूप हैं, जिनकी स्तुति महेश ने स्वयं अपने मुख से आदर सहित की है। इन दो दोहों में एक ही शब्द दो बार आता है, कृतारथ। कौआ कहता है, आपके दर्शन से मैं कृतार्थ हुआ। गरुड़ कहते हैं, कृतार्थ तो आप सदा से हैं। दोनों एक दूसरे को नाथ और प्रभु कह रहे हैं, और दोनों में से कोई भी झूठ नहीं बोल रहा। और ध्यान दीजिये कि गरुड़ अपने संदेह से नहीं शुरू करते। वे शिव की स्तुति का हवाला देते हैं, और यहाँ पाठक को याद आता है कि यह स्तुति उन्होंने उसी राह पर सुनी थी, उसी शिव से, जो कभी हंस बनकर इसी बरगद के नीचे बैठे थे। यहीं यह पन्ना रुकता है। प्रश्न अभी पूछा नहीं गया, वह अगले प्रसंग में आयेगा। पर जो पूछने आया था वह पहुँच गया है, और जिसके पास पहुँचा है, उसने उसे आसन दे दिया है।
सार: गरुड़ नीले पर्वत पर पहुँचते हैं और पर्वत को देखते ही उनका माया, मोह और सोच जाता रहता है। तालाब में स्नान और जलपान करके वे बरगद के नीचे जाते हैं, जहाँ बूढ़े पक्षी रामचरित सुनने बैठे हैं और भुशुण्डि कथा आरम्भ करने ही वाले हैं। कौआ पक्षिराज का आदर करता है, आसन देता है, पूजा करता है और आने का प्रयोजन पूछता है। गरुड़ उत्तर में कहते हैं कि आप तो सदा कृतार्थ हैं, जिनकी स्तुति स्वयं महेश ने की है।
और अन्त में, अपनी ओर
इस पन्ने पर एक प्रश्न चार दरवाज़ों तक गया और किसी दरवाज़े पर उसका उत्तर नहीं मिला। नारद ने कहा, मेरे कहने से नहीं मिटेगा। ब्रह्मा ने कहा, महेश जानते हैं। शिव ने कहा, राह चलते नहीं समझाया जा सकता। और भुशुण्डि ने अभी कुछ कहा ही नहीं। फिर भी मोह चला गया, और चला गया उस क्षण जब गरुड़ ने वह पर्वत देखा। तुलसी यह बात हलके से कहते हैं, पर कहते अवश्य हैं, कि कुछ उलझनें उत्तर से नहीं सुलझतीं, जगह बदलने से सुलझती हैं। जहाँ खड़े होकर हम सोच रहे हैं, वहीं से सोचते रहने पर तर्क बढ़ता है और भ्रम छाता है। यह गरुड़ की पहली चौपाई में लिखा हुआ है, और हम में से हर एक ने इसे किसी न किसी रात अपने भीतर पढ़ा है।
दूसरी बात उन तीनों की है जिन्होंने उत्तर नहीं दिया। तीनों ने एक ही वाक्य अलग-अलग शब्दों में कहा, कि माया ने मुझे भी नचाया है। नारद ने कहा, ब्रह्मा ने मन में सोचा, और शिव ने उमा से पूछा कि ऐसा कौन ज्ञानी है जिसे वह न मोहे। जो लोग किसी संदेही की सबसे अधिक मदद कर पाते हैं, वे वही होते हैं जो पहले यह कह सकें कि यह मुझे भी हुआ है। और तीनों ने दूसरी बात भी एक जैसी की। अपनी सीमा बताकर आगे का पता दे दिया। बड़े होने का यह रूप इस प्रसंग में तीन बार दिखता है: यह जानना कि यह काम मेरा नहीं है, और यह भी जानना कि किसका है। दोनों में से एक अकेला हो तो वह अभिमान या पलायन बन जाता है। दोनों साथ हों तो वही कृपा का रास्ता बनते हैं।
और तीसरी बात शिव के उस वाक्य की है जो उन्होंने गरुड़ को नहीं, उमा को कहा। उसने कभी अभिमान किया होगा, जिसे कृपानिधान नष्ट करना चाहते हैं। जो चीज़ गरुड़ को अपनी सबसे बड़ी हार लगी, वह किसी की सबसे कोमल कृपा थी। हम अपने मोह को इस नज़र से नहीं देख पाते, और देख भी नहीं सकते, क्योंकि उसके भीतर बैठकर वह बाहर से नहीं दिखता। पर इस पन्ने पर एक ऐसा कहनेवाला है जो बाहर से देख रहा है, और वह चुप रहता है, क्योंकि वह जानता है कि कृपा को बीच में रोकना उसका काम नहीं है। उस चुप्पी में जितना कहा गया है, उतना इस प्रसंग के किसी उपदेश में नहीं। और जब हम अपने किसी उलझे हुए दिन को याद करें, तो यह सोचना बुरा नहीं कि शायद कोई उसे भी बाहर से देख रहा था, और इसीलिये चुप था।
सात दोहों में एक कौए का पर्वत, एक बन्धन, एक संदेह, तीन भेंटें और एक पहुँचना। तुलसी इस यात्रा में कहीं जल्दी नहीं करते और कहीं ठहरते भी नहीं। हर दरवाज़े पर वही क्रम है: सिर नवाना, संदेह कहना, दया पाना, और अगला पता लेना। जब पाठक इस क्रम को तीन बार देख लेता है, तब चौथे दरवाज़े पर पहुँचकर उसे भी वही सुख होता है जो गरुड़ को पर्वत देखकर हुआ, कि अब आगे कोई पता नहीं है, यहीं बैठना है।
और आख़िरी बात, जिसे यह पन्ना अपने अन्तिम दोहे में छोड़ जाता है। पक्षियों का राजा एक कौए के सामने बैठा है, कौआ उसे नाथ कह रहा है, और वह कौए को सदा कृतार्थ कह रहा है। किसी ने अपना पद उतारा नहीं है, पर पद अब बीच में नहीं है। कथा अभी आरम्भ होने को है, और जो सुनने आया है, वह ठीक समय पर आया है।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, उत्तरकाण्ड, दोहा ५७ से ६३, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।