लुल्ला परिवारLULLA FAMILY, शुरुआतEnglish

अमित की गिनती, गरुड़ के प्रश्न, और रेशम का कीड़ा

इस पृष्ठ पर

रामचरितमानसउत्तरकाण्डप्रसंग 16

बाईस उपमाओं का वह लेखा जो अपने ही अन्त में अपने को ग़लत कह देता है। पक्षिराज के वे प्रश्न जिनमें तीन बार एक ही शब्द लौटता है। और एक कौए का यह कहना कि जिस देह से भक्ति मिली हो उससे ममता क्यों न हो।

यहाँ एक कहनेवाला गिनती करने बैठता है और गिनती हार जाती है। बाईस बार वह किसी न किसी चीज़ को उठाकर राम के सामने रख देता है, कभी कामदेव, कभी हिमालय, कभी समुद्र, कभी कामधेनु, कभी स्वयं काल। हर बार वह उसके आगे करोड़ या अरब लगा देता है। फिर जब यह पूरा लेखा बन चुकता है, तब एक बात उसे उलट देती है: सूर्य को अरबों जुगनुओं के बराबर कहना सूर्य की बड़ाई नहीं, उसकी निन्दा है। बाईस उपमाएँ रखकर तेईसवीं जगह उपमा का इनकार, यही इस प्रसंग की पहली चाल है।

दूसरी चाल सुननेवाले की ओर से आती है। सुननेवाला पक्षियों का राजा है। वह हवा से तेज़ उड़ता है, और साँप उसका भोजन हैं। यह सारा वर्णन सुनकर वह पहले पंख फुला लेता है, फिर उसकी आँखें भर आती हैं, और फिर वह एक कौए के चरणों पर बार-बार सिर रखता है। इसके बाद वह कहता है कि उसे सन्देह के साँप ने डस लिया था। जिसके नाम पर साँप का विष उतारने की विद्या चलती है, उसे स्वयं विष चढ़ा हुआ था, और उसे उतारनेवाला एक कौआ निकला।

तीसरी चाल उत्तर देनेवाले की ओर से आती है, और वह सीधे उत्तर नहीं देता। पहले प्रश्नों की प्रशंसा करता है, फिर बताता है कि उसे अपना यह काकदेह इतना प्यारा क्यों है। इसके लिये वह रेशम के कीड़े को उठा लाता है। जिस कीड़े से सुन्दर वस्त्र बनता है, वह परम अपवित्र माना जाता है और फिर भी प्राणों की तरह पाला जाता है।

और एक बात इस पूरी बातचीत के ऊपर टँगी रहती है, जो बातचीत के बीच अचानक खुल जाती है। जिस क्षण भुशुण्डि बोलने को होते हैं, उसी क्षण पार्वती का सम्बोधन आ जाता है। तब पता चलता है कि यह कथा शिव पार्वती से कह रहे हैं। उन्हीं शिव का नाम गरुड़ अपने प्रश्न में प्रमाण की तरह रखते हैं, और उन्हीं की कृपा को भुशुण्डि अपनी स्मृति का कारण बताते हैं।

नीलगिरि और कैलास के लोग

  • काकभुशुण्डि वे कौए जो इस समय गरुड़ को राम की महिमा सुना रहे हैं, जिन्हें अपने अनेक जन्मों की याद है। वे अन्त में अपनी ही कथा कहने को तैयार होते हैं।
  • गरुड़ पक्षियों के राजा, जो यहाँ शिष्य की जगह बैठे हैं, अपने को अविवेकी कहकर प्रश्न आरम्भ करते हैं, और एक कौए को प्रभु तथा स्वामी कहकर पुकारते हैं।
  • राम जिनका वर्णन इस पूरी बातचीत में होता रहता है और जो एक बार भी सामने नहीं आते, बोलते नहीं, कुछ करते नहीं। इस प्रसंग में वे केवल गिने जाते हैं, और गिनती पूरी नहीं होती।
  • शिव जो इस पूरी कथा के कहनेवाले हैं, जिनकी कही हुई एक बात गरुड़ अपने सन्देह का आधार बनाते हैं। उनका नाम एक जगह उनके साथ गिना जाता है जो राम का पार नहीं पाते।
  • पार्वती वे श्रोता जिनका सम्बोधन बातचीत के बीच बिना किसी तैयारी के आ जाता है। उससे पता चलता है कि यह सारी बातचीत शिव के मुँह से कही जा रही है।

पहले एक इनकार

पिछला प्रसंग जहाँ समाप्त होता है, वहाँ एक लम्बा उपदेश पूरा हो चुका है। यह प्रसंग उसी उपदेश के आख़िरी वाक्य से खुलता है, और उसमें दो शब्द हैं जो लौटेंगे, किसी और के मुँह में, और तब उपदेश नहीं, शिकायत बनकर।

भुशुण्डि कहते हैं: “हे धीरबुद्धि, ऐसा विचार करके सारे कुतर्क और सारे सन्देह छोड़कर करुणा की खान, सुन्दर और सुख देनेवाले राम का भजन कीजिये।” दो शब्द हैं, कुतर्क और सन्देह। थोड़ी ही देर बाद ये गरुड़ के मुँह से निकलेंगे, और तब दवा के नाम नहीं, रोग के नाम होंगे। पहले पर्चा लिखा जाता है, फिर बीमार आकर अपनी बीमारी ठीक उन्हीं दो नामों से बताता है। कथा इस लौटने की ओर उँगली नहीं उठाती, बस दोनों जगह वही शब्द रख देती है।

और इसके तुरन्त बाद कहनेवाला अपने ही वर्णन पर एक शर्त लगा देता है। वह यह नहीं कहता कि उसने राम की महिमा गा दी। वह कहता है कि अपनी बुद्धि के बराबर गायी है, और इसमें बढ़ाकर कुछ नहीं कहा।

भुशुण्डि कहते हैं: “हे नाथ, मैंने अपनी बुद्धि के अनुसार राम के प्रताप और महिमा का गान किया। युक्ति लगाकर कोई बात बढ़ाकर नहीं कही। यह सब मैंने अपनी आँखों देखा है।” पहले सीमा बतायी गयी, अपनी मति के बराबर, और फिर प्रमाण, अपनी आँखों का। जो कम है वह कहनेवाले की ओर से कम है, पर जो कहा गया है वह सुनी हुई बात नहीं।

फिर यह सीमा सब कहनेवालों पर लग जाती है। राम की महिमा, नाम, रूप और गुणों की कथा, चारों अपार हैं, और स्वयं राम अनन्त हैं। मुनि अपनी-अपनी बुद्धि के अनुसार उनके गुण गाते हैं। और फिर तीन नाम आते हैं, वेद, शेष और शिव, और तीनों के विषय में एक ही बात, कि वे पार नहीं पाते।

वेद प्रमाण हैं, शेष के हज़ार मुख हैं, और शिव वे हैं जो इस समय यह पूरी कथा कह रहे हैं। कहनेवाला अपनी ही कथा के भीतर उस सूची में अपना नाम रखवा रहा है जिसमें असमर्थता गिनायी जा रही है। यह आगे फिर होगा।

आकाश, और उसमें उड़ता हुआ एक मच्छर

अथाह होने का अर्थ समझाने के लिये भुशुण्डि कोई शास्त्र का वाक्य नहीं उठाते। वे सुननेवाले को ही उपमा के भीतर खड़ा कर देते हैं। जिससे बात कही जा रही है वह आकाश में उड़नेवालों का राजा है, इसलिये आकाश उठा लिया जाता है।

भुशुण्डि कहते हैं: “आपसे लेकर मच्छर तक सब आकाश में उड़ते हैं, पर आकाश का अन्त कोई नहीं पाता। इसी प्रकार, हे तात, राम की महिमा अथाह है। क्या कभी कोई उसकी थाह पा सकता है?” दो छोर हैं: एक पर वह पक्षी जिससे तेज़ कोई नहीं उड़ता, दूसरे पर मच्छर, जो एक आँगन पार करने में हाँफ जाता है।

उपमा की मार यह है कि इस पूरी दूरी से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता: दोनों उड़ते हैं, दोनों नहीं पाते, क्योंकि जहाँ पहुँचना है वहाँ किनारा है ही नहीं। किसी और को यह उपदेश होता। इस श्रोता के लिये यह आईना है।

फिर एक चीज़ चुपचाप बदल जाती है। उपमा में आकाश है, ऊपर की ओर। पर महिमा के लिये जो दो शब्द आते हैं, अथाह और थाह, वे दोनों पानी के हैं। थाह लेना नीचे की ओर डूबकर नापना है। महिमा ऊपर भी बेअन्त कही गयी और नीचे भी, और दोनों बार नापने चलनेवाला उसी में रह गया।

बाईस उपमाएँ, और तीन तरह की गिनती

जिसने अभी कहा कि थाह किसी को नहीं मिलती, वही अब नापना शुरू करता है। यह विरोध नहीं, चाल है, और इसका फल आगे जाकर खुलेगा। अब एक के बाद एक बाईस चीज़ें उठायी जाती हैं और हर एक के आगे कोई बड़ी संख्या लगा दी जाती है। सूची सीधी लगती है, पर इसकी असली बात यह है कि किसे किसके साथ रखा गया है।

पहले चार आते हैं: राम का शरीर करोड़ों कामदेवों के समान सुन्दर है। वे अनन्त कोटि दुर्गाओं के समान शत्रुओं का मर्दन करनेवाले हैं। उनका विलास अरबों इन्द्रों के समान है। और चौथी चीज़ अटपटी है, अरबों आकाशों के समान उनमें अवकाश है। सुन्दरता, शक्ति और ऐश्वर्य के बाद चौथे नम्बर पर केवल जगह रखी गयी है। टीका अवकाश को स्थान बताती है। सब कुछ भरा हुआ गिनाती सूची में एक चीज़ खाली जगह की भी है, और वह भी अरबों आकाशों जितनी।

अरबों पवनों के समान उनमें बल है और अरबों सूर्यों के समान प्रकाश। अरबों चन्द्रमाओं के समान वे शीतल हैं और संसार के सब भयों का नाश करनेवाले। दूसरे आधे में वे दो चीज़ें आती हैं जिनसे संसार डरता है, काल और धूमकेतु। अरबों कालों के समान वे दुस्तर, दुर्गम और दुरन्त हैं, और अरबों पुच्छल तारों के समान दुराधर्ष।

काल को यहाँ काल से बड़ा नहीं कहा गया। उसे नाप की इकाई बना दिया गया है, जैसे कोई कहे कि यह पहाड़ इतने पहाड़ों जितना ऊँचा है। जिससे सब डरते हैं, वह यहाँ किसी और को बड़ा बताने के काम में लगा है, और अरबों की संख्या में।

फिर सूची तेज़ चलती है। अरबों पातालों के समान वे अथाह हैं, अरबों यमराजों के समान कराल, अनन्त कोटि तीर्थों के समान पवित्र करनेवाले, और उनका नाम सारे पापसमूह का नाश करनेवाला है। करोड़ों हिमालयों के समान वे अचल हैं, अरबों समुद्रों के समान गम्भीर, और अरबों कामधेनुओं के समान सब कामनाओं के देनेवाले। अनन्त कोटि सरस्वतियों के समान उनमें चतुराई है, अरबों ब्रह्माओं के समान सृष्टि रचने की निपुणता, करोड़ों विष्णुओं के समान पालन, और अरबों रुद्रों के समान संहार।

इस सूची में दुर्गा, इन्द्र, यम, कामधेनु, सरस्वती, ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र आ चुके हैं: जिन्हें आगे रखकर लोग स्तुति करते हैं, वे सब यहाँ नाप की इकाइयाँ हैं। किसी को छोटा नहीं कहा गया। सबको तराज़ू के उस पलड़े पर रख दिया गया जिस पर बाट रखे जाते हैं।

वे अरबों कुबेरों के समान धनवान् हैं और करोड़ों मायाओं के समान सृष्टि के ख़ज़ाने। बोझ उठाने में अरबों शेषों के समान। और फिर अचानक गिनती रुक जाती है। तब वह कह दिया जाता है जिसके लिये यह सारी सूची बनी थी: जगत् के स्वामी राम सीमा से रहित और उपमा से रहित हैं। बाईस उपमाएँ देने के बाद कहनेवाला कह रहा है कि उपमा है ही नहीं।

और एक बात संख्याओं की। इस सूची में तीन तरह की गिनती चलती है: कहीं केवल करोड़, जैसे विष्णु और हिमालय के साथ। कहीं सौ करोड़, जिसे टीका अरब कहती है, और यही बार-बार आती है। और कहीं अनन्त कोटि, जहाँ गिनती छोड़ दी गयी। नापनेवाला अपनी इकाई बार-बार बड़ी करता जाता है, जैसे हर दो क़दम बाद उसे लग रहा हो कि पिछली इकाई छोटी पड़ गयी।

जुगनुओं से सूर्य नापना

अब वह बात आती है जो इस पूरे लेखे को उलट देती है, और वह ठीक वहीं से उठती है जहाँ सूची रुकी थी। गिनती से इनकार तक कोई सीढ़ी नहीं है।

राम उपमारहित हैं, उनकी कोई दूसरी उपमा है ही नहीं। राम के समान राम ही हैं, ऐसा वेद कहते हैं। उपमा का काम एक चीज़ को दूसरी के बराबर रखना है। यहाँ जो एकमात्र उपमा बची है, उसके दोनों पलड़ों पर वही एक शब्द रखा है। उपमा का ढाँचा खड़ा रहने दिया गया, पर उसमें भरने को दूसरा कुछ मिला नहीं।

और फिर वह उपमा, जिसके कारण यह जगह याद रखी जाती है। जैसे सूर्य को अरबों जुगनुओं के बराबर कहने से सूर्य बड़ा नहीं होता, अत्यन्त लघुता को ही प्राप्त होता है। टीका इसे खोलकर कह देती है कि ऐसा कहने से सूर्य की प्रशंसा नहीं, निन्दा होती है। अभी जो बाईस बार कहा गया था, वह सब इस एक उपमा के हिसाब से घाटे का सौदा है। जुगनुओं की संख्या बढ़ाते जाने से सूर्य की ओर एक क़दम भी नहीं बढ़ा जाता। हर नया जुगनू पक्का करता जाता है कि नापनेवाले के हाथ में जुगनू ही हैं।

पर बात यहाँ से एक कोमल मोड़ लेती है। यदि गिनती इतनी बेकार है तो मुनि गाते क्यों हैं? उत्तर तुरन्त आता है: इसी प्रकार अपनी-अपनी बुद्धि के विलास के अनुसार मुनीश्वर राम का बखान करते हैं, और राम भाव के ग्राहक हैं, अत्यन्त कृपालु हैं। वे उस वर्णन को प्रेमसहित सुनकर सुख मानते हैं।

ग्राहक, यानी लेनेवाला। और जो लिया जाता है वह वर्णन नहीं, भाव है। मुनियों की गिनती ग़लत है और उनका गाना स्वीकार है। दोनों बातें एक साथ सच हैं: जिस सूची को अभी घाटे का सौदा कहा गया, उसी को सुनकर कोई सुख मान रहा है।

भुशुण्डि कहते हैं: “राम अपार गुणों के समुद्र हैं। क्या कोई उनकी थाह पा सकता है? संतों से मैंने जैसा कुछ सुना था, वही आपको सुनाया।” यहाँ वे अपने ही आरम्भ से थोड़ा हटकर खड़े हैं। शुरू में उन्होंने कहा था कि यह सब उन्होंने अपनी आँखों देखा है। यहाँ कहते हैं कि संतों से जैसा सुना वैसा कह दिया। दोनों वाक्य एक ही भाषण के भीतर हैं: पहली बात राम के प्रताप के विषय में थी, जो उन्होंने घटते हुए देखा था। यह दूसरी बात महिमा की गिनती के विषय में है, जो किसी ने नहीं देखी, सुनी ही जाती है।

फिर एक सीख आती है: सुख के भण्डार और करुणा के धाम भगवान् भाव के वश में हैं। इसलिये ममता, मद और मान छोड़कर सदा सीता के पति राम का भजन करना चाहिये। अभी कहा गया था कि वे भाव के लेनेवाले हैं। यहाँ बात एक क़दम आगे जाती है, वे भाव के वश में हैं। और तीन चीज़ें छोड़ने को कही जाती हैं, ममता, मद और मान। इनमें पहली थोड़ी ही देर में लौटेगी, और तब उसे छोड़ने को नहीं कहा जायेगा। कहनेवाला उसे अपने लिये माँग लेगा।

पंख फुला लेनेवाला श्रोता

अब तक बोलनेवाला सामने था। अब कथा सुननेवाले पर टिकती है, और उसका पहला ब्योरा किसी आदमी का नहीं हो सकता था।

भुशुण्डि के सुन्दर वचन सुनकर गरुड़ हर्षित होकर पंख फुला लेते हैं। हाथ नहीं जुड़ते, सिर नहीं झुकता। पंख फूलते हैं। जिसे रोमांच होता है उसके शरीर पर रोम नहीं, पर हैं, इसलिये कवि वही लिखते हैं जो उस देह में होगा। फिर आँखों में जल आता है, मन अत्यन्त हर्षित होता है, और वे राम के प्रताप को हृदय में धारण करते हैं।

फिर वह होता है जिसके लिये यह सारी बातचीत चल रही थी। गरुड़ अपने पिछले मोह को याद करके पछताते हैं कि उन्होंने अनादि ब्रह्म को मनुष्य मान लिया था। इसमें कोई घटना नहीं गिनायी गयी, कोई जगह नहीं बतायी गयी। बस वह ग़लती नाम लेकर रख दी गयी जो हो चुकी थी।

और फिर एक छोटा-सा शब्द आता है: वे बार-बार कौए के चरणों पर सिर नवाते हैं, और उन्हें राम के समान जानकर प्रेम बढ़ाते हैं। कवि यहाँ भुशुण्डि नाम नहीं, उनकी जाति लिखते हैं। और ठीक उसी क्षण, जब पक्षियों के राजा का सिर उन चरणों पर जा रहा है। नाम किसी व्यक्ति का होता है। जाति वह चीज़ है जिसके कारण लोग झुकने से पहले सोचते हैं।

साँप ने डसा था, और गारुड़ी एक कौआ निकला

फिर एक बात आती है जो किसी की कही हुई नहीं, कथा की अपनी बात है। टीका भी गरुड़ का बोलना इसके बाद से शुरू मानती है। गुरु के बिना कोई भवसागर नहीं तर सकता, चाहे वह ब्रह्मा और शिव के समान ही क्यों न हो। ये दो नाम किसी और जगह गुरु के उदाहरण होते। यहाँ वे शिष्य की कमी के उदाहरण हैं।

और शिव का नाम यहाँ रखनेवाला कौन है? यह पूरी कथा शिव पार्वती से कह रहे हैं। थोड़ी देर पहले उन्होंने वह बात सुनायी थी जिसमें वेद, शेष और शिव पार न पानेवालों में गिने गये थे। अब वह बात सुना रहे हैं जिसमें शिव के समान होकर भी गुरु के बिना काम नहीं चलता। दो बार, बिना किसी विनय के प्रदर्शन के, कहनेवाले ने अपने को उस ओर रख दिया है जहाँ कमी है।

फिर गरुड़ बोलते हैं: “हे तात, मुझे सन्देह रूपी सर्प ने डस लिया था, और कुतर्क की बहुत-सी दुःख देनेवाली लहरें उठ रही थीं।” टीका लहर वाले हिस्से को खोलकर बताती है: साँप के डसने पर विष चढ़ने से जैसे लहरें आती हैं, वैसे। और अब वे दो शब्द लौट आये हैं जो शुरू के उपदेश में थे। वहाँ कहा गया था, कुतर्क और सन्देह छोड़ दीजिये। यहाँ वे छोड़ने की चीज़ नहीं रहे, वह चीज़ हैं जो किसी को पकड़कर बैठी थी।

गरुड़ कहते हैं: “भक्तों को सुख देनेवाले राम ने आपके स्वरूप रूपी गारुड़ी के द्वारा मुझे जिला लिया।” गारुड़ी, यानी साँप का विष उतारनेवाला। टीका यही अर्थ देती है। इस एक शब्द में पूरे दृश्य का मज़ा बन्द है। विष उतारने की जिस विद्या का नाम लिया जा रहा है, वह नाम इसी श्रोता के नाम से बना है। जिसे साँप काटता है वह जिस नाम की शरण लेता है, वह नाम यहाँ बैठा कह रहा है कि उसे साँप ने काट लिया था।

और जिस गारुड़ी ने विष उतारा वह कोई मन्त्र या जड़ी नहीं, किसी का स्वरूप था, और देखने भर से विष उतर गया। साँपों का शत्रु एक कौए को देखकर बचा है।

फिर वे इस बचने का हिसाब देते हैं: “आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हुआ और मैंने राम का अनुपम रहस्य जाना।” उन्होंने यह नहीं कहा कि उन्हें ज्ञान हो गया। उन्होंने कहा कि जो ढका था वह हटा और जो ढका हुआ था वह दिख गया। पहले हटना, फिर दिखना। और जिसका पर्दा एक बार हट चुका है, वही यह पूछने का साहस करता है कि यह हुआ कैसे।

फिर वे भुशुण्डि की बहुत प्रकार से प्रशंसा करते हैं, सिर नवाते हैं, हाथ जोड़ते हैं, और विनम्र, प्रेमभरे, कोमल वचन बोलते हैं। यह सब शिष्टाचार है, और इसके बाद वह वाक्य आता है जिस पर बात ठहरती है।

गरुड़ कहते हैं: “हे प्रभो, हे स्वामी, मैं अपने अविवेक के कारण आपसे पूछता हूँ। हे कृपा के समुद्र, मुझे अपना निज दास जानकर आदरपूर्वक कहिये।” ये सम्बोधन वे हैं जो कोई सेवक अपने स्वामी के लिये काम में लाता है। और अपने लिये चुना गया शब्द दास है, आगे “निज” लगाकर, यानी अपने घर का सेवक। जो विष्णु का वाहन है, वह एक कौए से माँग रहा है कि उसे अपने लोगों में गिन लिया जाये।

और प्रश्नों की भूमिका में उन्होंने अविवेक शब्द रखा है: पूछने से पहले मान लिया कि पूछने की आवश्यकता उनकी अपनी कमी से पैदा हुई है। यह नम्रता का शिष्टाचार नहीं। यह उस आदमी की बात है जिसने अभी-अभी अपने एक पुराने निर्णय को ग़लत पाया है और अब अपनी ही जाँच पर भरोसा नहीं कर रहा।

चार प्रश्न, और तीन बार एक ही शब्द

प्रश्न से पहले गरुड़ उत्तर देनेवाले का परिचय देते हैं। यह परिचय आठ चीज़ें गिनाता है: “आप सर्वज्ञ हैं, तत्त्व के ज्ञाता हैं, अन्धकार से परे हैं, उत्तम बुद्धिवाले हैं, सुशील हैं, सरल आचरणवाले हैं। आप ज्ञान, वैराग्य और विज्ञान के धाम हैं, और राम के प्रिय दास हैं।” सूची चढ़ती जाती है, और ऊपर जो पद रखा गया है वह दास का है: सर्वज्ञता पहले नम्बर पर है और सेवा आख़िर में। और इस सूची में आख़िर ही ऊँचा है।

पहला प्रश्न: “आपने यह देह किस कारण से पाया? हे तात, मुझे सब समझाकर कहिये।” दूसरा ठीक इसके बाद: “हे स्वामी, हे आकाशगामी, यह सुन्दर राम चरित सर आपने कहाँ पाया?” सर यानी सरोवर, और टीका इसे रामचरितमानस बताती है। इस ग्रन्थ का नाम ही एक झील है। उस झील के मिलने का पता पूछा जा रहा है, जैसे कोई किसी से पूछे कि यह तालाब कहाँ मिला था।

तीसरा प्रश्न धीरे-धीरे तैयार होता है। गरुड़ कहते हैं: “हे नाथ, मैंने शिव से ऐसा सुना है कि महाप्रलय में भी आपका नाश नहीं होता, और ईश्वर मिथ्या वचन नहीं कहते। यही मेरे मन में सन्देह है।” सन्देह न भुशुण्डि के अमर होने पर है, न शिव के सच बोलने पर। सन्देह इस पर है कि ये दोनों बातें एक साथ कैसे टिकें। वे प्रमाण को मानते हैं और तथ्य को मान नहीं पा रहे, और इस असमर्थता को उन्होंने अपना सन्देह कहा है।

फिर वे बताते हैं कि यह असमर्थता क्यों है: “नाग, मनुष्य, देवता और सारा चराचर जगत् काल का कलेवा है। असंख्य ब्रह्माण्डों का नाश करनेवाला काल सदा अनिवार्य है।” कलेवा नाश्ते को कहते हैं, दिन का पहला, साधारण-सा भोजन: सारा जगत् किसी के दिन की पहली हल्की-सी ख़ुराक है। इतना बड़ा चित्र और इतना घरेलू शब्द, एक ही साँस में।

“ऐसा अत्यन्त कराल काल आपको नहीं व्यापता, इसका क्या कारण है? मुझे कहिये: यह ज्ञान का प्रभाव है या योग का बल?” पूछनेवाला उत्तर के दो नमूने भी रख देता है, और दोनों कमाई की चीज़ें हैं: ज्ञान अर्जित किया जाता है, योग साधा जाता है।

चौथा प्रश्न छोटा है और निजी: “हे प्रभो, आपके आश्रम में आते ही मेरा मोह और भ्रम भाग गया। हे नाथ, इसका क्या कारण है, यह सब प्रेमसहित कहिये।” पिछले प्रश्न उत्तर देनेवाले के विषय में थे। यह अपने विषय में है। और यह वही पूछ रहा है जिसने अभी अपने को अविवेकी कहा था। अपनी राहत का कारण भी वह अपने भरोसे तय नहीं कर रहा।

इन चारों में एक शब्द तीन बार आता है, कारण: पहले प्रश्न में, तीसरे में, और चौथे में फिर, बिना बदले। गरुड़ कहानी नहीं माँग रहे, कारण माँग रहे हैं। वे जानना चाहते हैं कि किस नियम से यह सब हुआ, जैसे कोई यन्त्र खोलकर देखना चाहता हो। और प्रसंग के अन्त में उन्हें जो देने का वादा होगा, वह कारण नहीं, चरित होगा: नियम के बदले जीवन।

प्रश्न की प्रशंसा

उत्तर देनेवाला पहले उत्तर नहीं देता, प्रश्न की तारीफ़ करता है। और इसी क्षण वह सम्बोधन आ जाता है जिससे यह पूरा दृश्य अपनी जगह पर बैठ जाता है।

शिव कहते हैं: “पार्वती, गरुड़ की वाणी सुनकर काकभुशुण्डि हर्षित हुए और परम प्रेम से बोले।” यह सम्बोधन बात के बीच में आ जाता है। आते ही वह याद दिला देता है कि यह दृश्य किसी और की आँख से दिखाया जा रहा है। नीलगिरि पर एक कौआ और गरुड़ बैठे हैं, और उस दृश्य को कैलास पर बैठे शिव पार्वती से कह रहे हैं। और उन्हीं शिव का नाम अभी थोड़ी देर पहले गरुड़ ने अपने प्रश्न में प्रमाण की तरह रखा था।

भुशुण्डि जो कहते हैं वह प्रशंसा है। उसका निशाना ठीक वहाँ लगता है जहाँ पूछनेवाले ने अपने को नीचा कहा था: “हे सर्पों के शत्रु, आपकी बुद्धि धन्य है, धन्य है। आपके प्रश्न मुझे बहुत ही प्यारे लगे।” गरुड़ ने अपने प्रश्नों को अपने अविवेक की उपज कहा था। भुशुण्डि उसी बुद्धि को धन्य कहते हैं, और दो बार। जिसके भीतर से अपने ऊपर भरोसा उठ गया था, उसे पहले यही लौटाया जाता है।

फिर वह वाक्य आता है जो इस प्रसंग की धुरी है: “आपके प्रेमयुक्त सुन्दर प्रश्न सुनकर मुझे बहुत जन्मों की याद आ गयी।” यह उत्तर नहीं, उत्तर देनेवाले के साथ हुई एक घटना है: प्रश्न ने केवल सूचना नहीं माँगी, किसी के भीतर कुछ खोल दिया। तब भुशुण्डि कहते हैं: “मैं अपनी सब कथा विस्तार से कहता हूँ। हे तात, आदरसहित मन लगाकर सुनिये।”

पर कथा तुरन्त शुरू नहीं होती। बीच में एक बात सब कुछ एक जगह जोड़ देती है। अनेक जप, तप, यज्ञ, शम, दम, व्रत, दान, वैराग्य, विवेक, योग और विज्ञान, इन सबका फल एक ही है, राम के चरणों में प्रेम। इसके बिना कोई कल्याण नहीं पाता। ग्यारह चीज़ें, और सबका एक ही फल। यही सूची थोड़ी देर बाद फिर आती है, और तब किसी सिद्धान्त की नहीं, किसी के अपने किये हुए कामों की सूची होती है।

और अब वह ममता लौटती है जिसे छोड़ने को थोड़ी देर पहले कहा गया था। भुशुण्डि कहते हैं: “मैंने इसी शरीर से राम की भक्ति पायी है, इसीसे इस पर मेरी ममता अधिक है। जिससे अपना कुछ स्वार्थ होता है, उस पर सभी ममता करते हैं।” यह वाक्य पहली बार में खटकता है: कुछ ही देर पहले ममता, मद और मान छोड़ने को कहा गया था। अब वही कहनेवाला अपनी ममता की घोषणा कर रहा है, और उसे स्वार्थ का नाम भी दे रहा है।

पर भुशुण्डि इस खटकने को जानते हैं, और आगे की बातें इसी को सुलझाती हैं। वे ममता का खण्डन नहीं करते, स्वार्थ की परिभाषा बदल देते हैं, और उस परिभाषा तक पहुँचने का रास्ता शास्त्र से नहीं, करघे से आता है।

रेशम का कीड़ा

अब वे बातें आती हैं जिनके कारण यह प्रसंग बहुतों को याद रह जाता है। नीति पहले रखी जाती है और उदाहरण बाद में, और उदाहरण इतना घरेलू है कि उसे सुनकर नीति पर बहस करने की इच्छा नहीं रहती।

भुशुण्डि कहते हैं: “हे साँपों के शत्रु, वेदसम्मत नीति ऐसी है और सज्जन भी यही कहते हैं कि अपना परम हित जानकर अत्यन्त नीच से भी प्रीति करनी चाहिये। रेशम कीड़े से होता है और उससे सुन्दर रेशमी वस्त्र बनते हैं, इसीसे उस परम अपवित्र कीड़े को भी सब प्राणों के समान पालते हैं।” उदाहरण में दो शब्द आमने-सामने हैं, परम अपवित्र और अपने प्राणों जैसा। बीच में कोई तर्क नहीं, बस वह चीज़ रख दी गयी जो उससे निकलती है।

और सम्बोधन फिर साँपों के शत्रु का है: थोड़ी देर पहले भी गरुड़ को इसी अर्थ के नाम से पुकारा गया था। दोनों बार जो बात कही जा रही है वह नीच को अपनाने की है।

और उस नीति का निशाना अब दिखता है: भुशुण्डि इसे अपने ही देह पर लगा रहे हैं। पक्षियों में कौआ नीचा गिना जाता है, जूठन पर बैठता है, शुभ नहीं माना जाता। और उसी देह के विषय में अभी कहा गया कि इसी से भक्ति मिली है। रेशम का कीड़ा और काकदेह, दोनों एक ही तर्क के दो सिरे हैं।

भुशुण्डि कहते हैं: “जीव के लिये सच्चा स्वार्थ यही है कि मन, वचन और कर्म से राम के चरणों में प्रेम हो। वही शरीर पवित्र और सुन्दर है जिस शरीर को पाकर राम का भजन किया जाये।” यहाँ दोनों गुत्थियाँ एक साथ खुलती हैं। स्वार्थ शब्द छीना नहीं गया, उसमें प्रेम भर दिया गया। और पवित्रता की परिभाषा पलट गयी: पवित्र वह देह नहीं जिसे जन्म से कोई अधिकार मिला हो, पवित्र वह देह है जिसमें कुछ हो चुका हो। शरीर का प्रमाणपत्र पहले नहीं मिलता, बाद में बनता है।

फिर भुशुण्डि यही नियम उलटी ओर से जाँचते हैं। “जो राम से विमुख है, वह ब्रह्मा के समान देह भी पा जाये तो भी कवि और पण्डित उसकी प्रशंसा नहीं करते। इसी शरीर से मेरे हृदय में रामभक्ति उत्पन्न हुई, इसीसे, हे स्वामी, यह मुझे परम प्रिय है।” अब दोनों सिरे आमने-सामने हैं: एक ओर नीचा गिना जानेवाला देह जिसमें भक्ति उगी, दूसरी ओर ब्रह्मा जैसा देह जिसमें कुछ नहीं उगा। और नियम दोनों पर एक ही तरह लगता है।

इसके बाद एक ब्योरा बहुत हल्के से आता है। “मेरा मरण मेरी अपनी इच्छा पर है, फिर भी मैं यह शरीर नहीं छोड़ता, क्योंकि वेद ने कहा है कि शरीर के बिना भजन नहीं होता।” जो जब चाहे जा सकता है, वह इसलिये रुका है कि जाने के बाद भजन का साधन नहीं बचेगा। छोड़ने की शक्ति होते हुए न छोड़ना, यही इस हिस्से में ममता का अर्थ है।

फिर सीधी बात आ जाती है: “पहले मोह ने मेरी बड़ी दुर्दशा की। राम से विमुख होकर मैं कभी सुख से नहीं सोया।” इतने ऊँचे प्रसंग में सोने का ज़िक्र: न मुक्ति, न लोक, न सिद्धि। रात में नींद आयी या नहीं, इसी पैमाने पर उन्होंने अपने अनेक जन्मों का हिसाब लगा दिया है।

और तब वह सूची लौटती है: “अनेक जन्मों में मैंने अनेक प्रकार के योग, जप, तप, यज्ञ और दान किये। हे गरुड़, जगत् में ऐसी कौन-सी योनि है जिसमें घूम-फिरकर मैंने जन्म न लिया हो? मैंने सब कर्म करके देख लिये, पर अब की तरह मैं कभी सुखी नहीं हुआ।” थोड़ी देर पहले जो सिद्धान्त की तरह कहा गया था, कि इन सबका फल राम के चरणों में प्रेम है, वह अब अपने अनुभव का बयान है। पहले नियम, फिर उस नियम को अपने ऊपर आज़मा चुके की गवाही।

अन्त में एक नाम फिर आता है: “मुझे बहुत-से जन्मों की याद है, क्योंकि शिव की कृपा से मेरी बुद्धि को मोह ने नहीं घेरा।” अब शिव यहाँ तीन जगह हैं: गरुड़ ने उन्हें अपने सन्देह का प्रमाण बनाया था, भुशुण्डि उन्हें अपनी स्मृति का कारण बता रहे हैं। और यह पूरी बातचीत वही सुना रहे हैं।

और एक पुराना कल्प खुलता है

अब वह बात आती है जिस पर गरुड़ के प्रश्नों का यह दौर ठहरता है, और वह एक दरवाज़े पर ठहरता है, कमरे के भीतर नहीं। पूछा कारण गया था, दिया चरित जा रहा है।

भुशुण्डि कहते हैं: “हे गरुड़, सुनिये, अब मैं अपने पहले जन्म के चरित कहता हूँ, जिन्हें सुनकर राम के चरणों में प्रीति उत्पन्न होती है। उससे सब क्लेश मिट जाते हैं।” वादा जानकारी का नहीं है: सुनने का फल प्रीति है, और प्रीति का फल क्लेशों का मिटना। कथा यहाँ दवा की तरह दी जा रही है, और जिसे दी जा रही है उसने अभी कहा था कि उसे साँप ने डसा था।

फिर पर्दा उठ जाता है। “पूर्व के एक कल्प में पापों का मूल युग कलियुग था, जिसमें पुरुष और स्त्री सभी अधर्म में रत और वेद के विरोधी थे।” एक ही वाक्य में समय, युग और लोगों का स्वभाव, तीनों। न जगह का नाम, न किसी व्यक्ति का। बस एक बीता हुआ कल्प, और उसमें वह युग जिसे मल का मूल कहा गया है।

और कथा यहीं रुक जाती है। जिस जन्म के लिये इतनी भूमिका बँधी, वह इसके आगे खुलेगा। अभी इतना हुआ है कि कथा कहने का निश्चय हो चुका है, सुननेवाला बैठ चुका है। और रोशनी उस युग पर पड़ चुकी है जिसमें वह कथा घटेगी।

उलटी दिशा का रास्ता

नील पर्वत पर तीन काम होते हैं और तीनों एक ही दिशा में जाते हैं: गिनती होती है और हार जाती है। पूछनेवाला प्रश्न के साथ अपनी हैसियत भी नीचे रख देता है। और उत्तर देनेवाला अपने नीचे गिने जानेवाले देह को अपनी प्यारी चीज़ बताता है। तीनों जगह जो काम करता है, वह उलटी दिशा में जाता है।

इस प्रसंग में राम एक बार भी नहीं आते। वे बोलते नहीं, कुछ करते नहीं, किसी को कुछ देते नहीं। पूरा प्रसंग उनके विषय में है और उनकी उपस्थिति कहीं नहीं। सीता का नाम भी एक ही बार आता है, उस सीख के अन्तिम शब्द में, जहाँ राम को उनके पति के रूप में पुकारा गया है। लंका, अयोध्या, युद्ध, कोई नाम यहाँ नहीं। युद्ध के बाद के काण्ड का यह हिस्सा दो पक्षियों की बातचीत के सिवा कुछ नहीं।

शायद इसीलिये यहाँ उपमाओं की इतनी भीड़ है: जब कुछ हो नहीं रहा और फिर भी कुछ कहना हो, तब चीज़ें उठा-उठाकर बगल में रखी जाती हैं। बाईस बार यह होता है, तेईसवीं बार कह दिया जाता है कि जुगनू जोड़ने से सूर्य नहीं बनता, और तब भी वह सूची मिटायी नहीं जाती। अपनी असफलता समेत कथा में बनी रहती है।

काम की बात उसी वाक्य में है जिसमें राम को भाव का ग्राहक कहा गया है। यहाँ किसी की गिनती सही नहीं बैठती, मुनियों की नहीं, भुशुण्डि की नहीं, और गरुड़ की तो बिलकुल नहीं। फिर भी कोई किसी को टोकता नहीं। सबकी बात सुनी जाती है और सबका भाव ले लिया जाता है।

पूछनेवाला तीन बार कारण पूछता है और उसे कारण नहीं, एक जीवन मिलता है, एक बीते हुए कल्प से शुरू होकर। बातचीत ठीक वहीं ठहरती है जहाँ नियम माँगनेवाले को कहानी सुनायी जाने लगती है।

यहाँ दो पक्षी अपनी जगह से हटे बैठे हैं: जो ऊँचा उड़ता है वह नीचे बैठा पूछ रहा है। और जो नीचा गिना जाता है वह ऊपर बैठा बता रहा है। और दोनों के पास एक ही शब्द है, अथाह, एक ने आकाश से सीखा, दूसरे ने अपने जन्मों से।

इतने ब्रह्माण्ड, इतने कल्प, इतने करोड़ और अरब गिनाने के बाद, अपने पूरे भटकाव का हिसाब देने के लिये भुशुण्डि जो पैमाना उठाते हैं वह नींद है। राम से विमुख होकर वे कभी सुख से नहीं सोये। जो अपनी इच्छा से मर सकता है और नहीं मरता, वह बता रहा है कि इससे पहले उसे चैन की नींद कभी नहीं आयी।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, उत्तरकाण्ड, सोरठा 90 (ख) से दोहा 96, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।