रामचरितमानस · उत्तरकाण्ड · अमित की गिनती, गरुड़ के प्रश्न, और रेशम का कीड़ा
अमित की गिनती, गरुड़ के प्रश्न, और रेशम का कीड़ा
बाईस उपमाओं का वह लेखा जो अपने ही अन्त में अपने को ग़लत कह देता है, पक्षिराज के वे प्रश्न जिनमें तीन बार एक ही शब्द लौटता है, और एक कौए का यह कहना कि जिस देह से भक्ति मिली हो उससे ममता क्यों न हो।
इस पन्ने पर एक आदमी गिनती करने बैठता है और गिनती हार जाती है। बाईस बार वह किसी न किसी चीज़ को उठाकर राम के सामने रख देता है, कभी कामदेव, कभी हिमालय, कभी समुद्र, कभी कामधेनु, कभी स्वयं काल, और हर बार उस चीज़ के आगे करोड़ या अरब लगा देता है। फिर जब यह पूरा लेखा बन चुका होता है, तब वही आदमी एक छंद में उसे उलट देता है। सूर्य को अरबों जुगनुओं के बराबर कह देना सूर्य की बड़ाई नहीं है, वह उसकी निन्दा है। बाईस उपमाएँ रखकर तेईसवीं जगह उपमा का इनकार रख देना, यही इस प्रसंग की पहली चाल है।
दूसरी चाल सुननेवाले की ओर से आती है। सुननेवाला कोई साधारण श्रोता नहीं है। वह पक्षियों का राजा है, वह हवा से तेज़ उड़ता है, और साँप उसका भोजन हैं। यह सारा वर्णन सुनकर वह पहले पंख फुला लेता है, फिर उसकी आँखें भर आती हैं, और फिर वह एक कौए के चरणों पर बार-बार सिर रखता है। इसके बाद वह जो वाक्य कहता है वह इस पूरे काण्ड की सबसे तीखी बात है, कि मुझे सन्देह के साँप ने डस लिया था। जिसके नाम पर साँप का विष उतारने की विद्या चलती है, उसे स्वयं विष चढ़ा हुआ था, और उसे उतारनेवाला एक कौआ निकला।
तीसरी चाल उत्तर देनेवाले की ओर से आती है, और वह सीधे उत्तर नहीं देता। वह पहले प्रश्नों की प्रशंसा करता है, फिर यह बताता है कि उसे अपनी यह काकदेह इतनी प्यारी क्यों है, और इसके लिये वह रेशम के कीड़े को उठा लाता है। बात यहाँ नीति की तरह कही जाती है और सुनने में घर की तरह लगती है, क्योंकि जिस कीड़े से सबसे सुन्दर वस्त्र बनता है वह कीड़ा सबसे अपवित्र माना जाता है और फिर भी प्राणों की तरह पाला जाता है।
और एक बात इस पूरी बातचीत के ऊपर टँगी रहती है, जो बीच की एक चौपाई में अचानक खुल जाती है। यह सारा दृश्य कोई तीसरा देख रहा है और किसी चौथे को सुना रहा है। जिस क्षण भुशुण्डि बोलने को होते हैं, उसी पंक्ति में उमा का नाम आ जाता है, और तब पता चलता है कि यह कथा शिव अपनी प्रिया से कह रहे हैं। उसी शिव का नाम गरुड़ अपने प्रश्न में प्रमाण की तरह रखते हैं, और उसी शिव की कृपा को भुशुण्डि अपनी स्मृति का कारण बताते हैं।
इस प्रसंग के मुख्य किरदार
- काकभुशुण्डि वे कौए जो इस समय पक्षिराज को राम की महिमा सुना रहे हैं, जिनके पास अपने अनेक जन्मों की याद बची हुई है, और जो इस पन्ने के अन्त में अपनी ही कथा कहने को तैयार होते हैं।
- गरुड़ पक्षियों के राजा, जो यहाँ शिष्य की जगह बैठे हैं, अपने को अविवेकी कहकर प्रश्न आरम्भ करते हैं, और एक कौए को प्रभु तथा स्वामी कहकर पुकारते हैं।
- राम जिनका वर्णन इस पूरे पन्ने पर होता रहता है और जो यहाँ एक बार भी सामने नहीं आते, बोलते नहीं, कुछ करते नहीं। इस प्रसंग में वे केवल गिने जाते हैं, और गिनती पूरी नहीं होती।
- शिव जो इस पूरी कथा के कहनेवाले हैं, जिनकी कही हुई एक बात गरुड़ अपने सन्देह का आधार बनाते हैं, और जिनका नाम एक चौपाई में उन लोगों के साथ गिना जाता है जो राम का पार नहीं पाते।
- उमा वे श्रोता जिनका नाम बीच की एक चौपाई में बिना किसी तैयारी के आ जाता है और जिनके कारण यह पता चलता है कि यह सारी बातचीत किसी और के मुँह से हम तक पहुँच रही है।
पहले एक इनकार
पिछला प्रसंग जहाँ समाप्त होता है वहाँ एक लम्बा उपदेश पूरा हो चुका है, और उसका आख़िरी वाक्य एक सोरठे में बँधा हुआ है। यह पन्ना उसी सोरठे से खुलता है। उसे पढ़कर आगे बढ़ जाना आसान है, पर उसमें दो शब्द रखे हैं जिन्हें गिन लेना चाहिये, क्योंकि वे लौटेंगे, और जब लौटेंगे तब किसी और के मुँह में होंगे और उपदेश की जगह शिकायत बन चुके होंगे।
अस बिचारि मतिधीर तजि कुतर्क संसय सकल।
सोरठा ९० (ख)
भजहु राम रघुबीर करुनाकर सुंदर सुखद॥ ९० (ख)॥
हे धीरबुद्धि, ऐसा विचार करके सारे कुतर्क और सारे सन्देह छोड़कर करुणा की खान, सुन्दर और सुख देनेवाले रघुवीर का भजन कीजिये। दो शब्द यहाँ हैं, कुतर्क और संसय। ये दोनों कुछ ही दोहों बाद गरुड़ के मुँह से निकलेंगे, और तब ये दवा के नाम नहीं, रोग के नाम होंगे। पहले वह पर्चा लिखा जाता है, फिर बीमार आकर अपनी बीमारी ठीक उन्हीं दो नामों से बताता है। तुलसी इस लौटने की ओर उँगली नहीं उठाते, वे बस दोनों जगह वही शब्द रख देते हैं।
और इसके तुरन्त बाद वह होता है जिसकी कम ही लोग अपेक्षा करते हैं। इतना बड़ा वर्णन कर चुकने के बाद कहनेवाला अपने ही वर्णन पर एक शर्त लगा देता है। वह यह नहीं कहता कि मैंने राम की महिमा गा दी। वह कहता है कि मैंने अपनी बुद्धि के बराबर गायी है, और इसमें बढ़ाकर कुछ नहीं कहा।
निज मति सरिस नाथ मैं गाई। प्रभु प्रताप महिमा खगराई॥
चौपाई १
कहेउँ न कछु करि जुगुति बिसेषी। यह सब मैं निज नयनन्हि देखी॥
हे पक्षिराज, हे नाथ, मैंने अपनी बुद्धि के अनुसार प्रभु के प्रताप और महिमा का गान किया। मैंने युक्ति लगाकर कोई बात बढ़ाकर नहीं कही, यह सब मैंने अपनी आँखों देखी कही है। दूसरी पंक्ति का वज़न पहली पंक्ति से आता है। पहले सीमा बतायी गयी, अपनी मति के बराबर, और उसके बाद प्रमाण दिया गया, अपनी आँखों का। यानी जो कम है वह मेरी ओर से कम है, पर जो कहा गया है वह सुनी हुई बात नहीं है।
इसके बाद की चौपाई में वह सीमा और चौड़ी कर दी जाती है, और इस बार वह कहनेवाले पर नहीं, सब कहनेवालों पर लगती है। राम की महिमा, नाम, रूप और गुणों की कथा, चारों अपार हैं और स्वयं रघुनाथ अनन्त हैं। मुनि अपनी-अपनी बुद्धि के अनुसार हरि के गुण गाते हैं। और फिर वह आधी पंक्ति आती है जिसमें तीन नाम गिनाये गये हैं, वेद, शेष और शिव, और तीनों के विषय में एक ही बात कही गयी है, कि वे पार नहीं पाते।
इन तीन नामों को ज़रा देर तक देखिये। वेद वह हैं जिनसे प्रमाण लिया जाता है। शेष वह हैं जिनके हज़ार मुख हैं और जिनके विषय में कहा जाता है कि वर्णन उन्हीं से बनता है। और शिव वह हैं जो इस समय यह पूरी कथा कह रहे हैं। कहनेवाला अपनी ही कथा के भीतर उस सूची में अपना नाम रखवा रहा है जिसमें असमर्थता गिनायी जा रही है। यह इस प्रसंग में एक बार नहीं होगा, आगे फिर होगा।
सार: पन्ना उस सोरठे से खुलता है जिसमें कुतर्क और सन्देह छोड़कर रघुवीर का भजन करने को कहा गया है। फिर भुशुण्डि अपने ही वर्णन पर शर्त लगाते हैं, कि यह मेरी बुद्धि के बराबर है, इसमें बढ़ाकर कुछ नहीं है, और यह सब आँखों देखा है। इसके बाद वे महिमा, नाम, रूप और गुण को अपार बताते हैं और कहते हैं कि वेद, शेष और शिव भी पार नहीं पाते।
आकाश, और उसमें उड़ता हुआ एक मच्छर
अब तुलसी वह काम करते हैं जो इस पूरे पन्ने की सबसे चतुर बात है। उन्हें अथाह होने का अर्थ समझाना है, और वे इसके लिये कोई शास्त्र का वाक्य नहीं उठाते। वे सुननेवाले को ही उपमा के भीतर खड़ा कर देते हैं। जिससे बात कही जा रही है वह आकाश में उड़नेवालों का राजा है, इसलिये आकाश उठा लिया जाता है।
तुम्हहि आदि खग मसक प्रजंता। नभ उड़ाहिं नहिं पावहिं अंता॥
चौपाई २
तिमि रघुपति महिमा अवगाहा । तात कबहुँ कोउ पाव कि थाहा॥
आपसे लेकर मच्छर तक सब आकाश में उड़ते हैं, पर आकाश का अन्त कोई नहीं पाता। इसी प्रकार, हे तात, रघुनाथ की महिमा अथाह है, क्या कभी कोई उसकी थाह पा सकता है। दो छोर चुने गये हैं और दोनों जान-बूझकर चुने गये हैं। एक छोर पर वह पक्षी है जिससे तेज़ कोई नहीं उड़ता, और दूसरे छोर पर मसक, मच्छर, जो एक आँगन पार करने में हाँफ जाता है। इन दोनों के बीच जितनी दूरी है वह किसी भी दो उड़नेवालों के बीच की सबसे बड़ी दूरी है।
और उपमा की मार यह है कि इस पूरी दूरी से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। दोनों उड़ते हैं, दोनों नहीं पाते। जो अन्तर है वह उड़ने में है, पहुँचने में नहीं, क्योंकि जहाँ पहुँचना है वहाँ किनारा है ही नहीं। यह बात किसी और को समझायी जाती तो उपदेश होती। इस श्रोता को समझायी जा रही है, इसलिये यह आईना है।
और दूसरी पंक्ति में एक चीज़ चुपचाप बदल जाती है जिस पर ध्यान कम जाता है। पहली पंक्ति में आकाश है, ऊपर की ओर, जहाँ उड़ा जाता है। दूसरी पंक्ति के दोनों शब्द पानी के हैं, अवगाहा और थाहा। थाह लेना नीचे की ओर की क्रिया है, वह डूबकर नापना है। यानी एक ही साँस में महिमा को ऊपर भी बेअन्त कहा गया और नीचे भी बेअन्त, और दोनों बार जो नापने चला वह उसी में रह गया।
सार: अथाह होने का अर्थ एक उपमा से समझाया जाता है जिसमें सुननेवाला स्वयं खड़ा है। गरुड़ से लेकर मच्छर तक सब आकाश में उड़ते हैं और कोई उसका अन्त नहीं पाता, वैसे ही रघुनाथ की महिमा की थाह कोई नहीं पाता। पहली पंक्ति ऊपर की ओर बेअन्त है और दूसरी नीचे की ओर।
बाईस उपमाएँ, और तीन तरह की गिनती
जिसने अभी कहा कि थाह किसी को नहीं मिलती, वही अब नापना शुरू करता है। यह विरोध नहीं है, यह चाल है, और इसका फल छंद पर जाकर खुलेगा। अगली छह चौपाइयों और दो दोहों में बाईस चीज़ें उठायी जाती हैं और हर एक के आगे कोई बड़ी संख्या लगा दी जाती है। यह सूची पढ़ने में सीधी लगती है, पर इसमें किसे किसके साथ रखा गया है, यह इसकी असली बात है।
पहली चौपाई में चार आते हैं। राम का शरीर करोड़ों कामदेवों के समान सुन्दर है। वे अनन्त कोटि दुर्गाओं के समान शत्रुओं का मर्दन करनेवाले हैं। उनका विलास अरबों इन्द्रों के समान है। और चौथी चीज़ अटपटी है, अरबों आकाशों के समान उनमें अवकाश है। सुन्दरता, शक्ति और ऐश्वर्य के बाद चौथे नम्बर पर जगह रखी गयी है, केवल जगह। टीका अवकास को स्थान बताती है। यानी जिस सूची में सब कुछ भरा हुआ गिनाया जा रहा है, उसी में एक पद खाली जगह का भी है, और वह भी अरबों आकाशों जितनी।
मरुत कोटि सत बिपुल बल रबि सत कोटि प्रकास।
दोहा ९१ (क, ख)
ससि सत कोटि सुसीतल समन सकल भव त्रास॥ ९१ (क)॥
काल कोटि सत सरिस अति दुस्तर दुर्ग दुरंत।
धूमकेतु सत कोटि सम दुराधरष भगवंत॥ ९१ (ख)॥
अरबों पवनों के समान उनमें बल है और अरबों सूर्यों के समान प्रकाश। अरबों चन्द्रमाओं के समान वे शीतल हैं और संसार के सब भयों का नाश करनेवाले। और दूसरे आधे में वे दो चीज़ें आती हैं जिनसे संसार डरता है, काल और धूमकेतु। अरबों कालों के समान वे दुस्तर, दुर्गम और दुरन्त हैं, और अरबों पुच्छल तारों के समान दुराधर्ष। ध्यान दीजिये कि चन्द्रमा वाली पंक्ति में एक काम भी जुड़ा है, भय का नाश, और यह पूरी सूची में अकेली ऐसी उपमा है जिसके साथ बताया गया है कि वह किसके लिये है।
काल को इस सूची में रख देना अपने आप में एक बात है। सामान्य ढंग यह होता कि कहा जाता, वे काल से बड़े हैं, काल उनसे डरता है। यहाँ यह नहीं कहा गया। यहाँ काल को नाप की इकाई बना दिया गया है, जैसे कोई कहे कि यह पहाड़ इतने पहाड़ों जितना ऊँचा है। जिससे सब डरते हैं उसे यहाँ किसी और को बड़ा बताने के काम में लगा दिया गया, और वह भी अरबों की संख्या में।
इसके बाद सूची तेज़ चलती है। अरबों पातालों के समान वे अथाह हैं, अरबों यमराजों के समान कराल, अनन्त कोटि तीर्थों के समान पवित्र करनेवाले, और उनका नाम सारे पापसमूह का नाश करनेवाला है। करोड़ों हिमालयों के समान वे अचल हैं, अरबों समुद्रों के समान गम्भीर, और अरबों कामधेनुओं के समान सब कामनाओं के देनेवाले। फिर अनन्त कोटि सरस्वतियों के समान उनमें चतुराई है, अरबों ब्रह्माओं के समान सृष्टि रचने की निपुणता, करोड़ों विष्णुओं के समान पालन और अरबों रुद्रों के समान संहार।
यहाँ रुककर देखिये कि इस सूची में कौन-कौन आ चुका है। दुर्गा, इन्द्र, यम, कामधेनु, सरस्वती, ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र। जिन्हें आगे रखकर लोग स्तुति करते हैं, वे सब यहाँ नाप की इकाइयाँ बनकर खड़े हैं। किसी की निन्दा नहीं की गयी, किसी को छोटा नहीं कहा गया, बस सबको तराज़ू के उस पलड़े पर रख दिया गया जिस पर बाट रखे जाते हैं। स्तुति का यह ढंग बहुत ठंडा है और इसीलिये बहुत बड़ा है।
धनद कोटि सत सम धनवाना। माया कोटि प्रपंच निधाना॥
चौपाई ३
भार धरन सत कोटि अहीसा । निरवधि निरुपम प्रभु जगदीसा॥
वे अरबों कुबेरों के समान धनवान् हैं और करोड़ों मायाओं के समान सृष्टि के खज़ाने। बोझ उठाने में वे अरबों शेषों के समान हैं। और फिर, बिलकुल अचानक, गिनती रुक जाती है और आधी पंक्ति में वह कह दिया जाता है जिसके लिये यह सारी सूची बनी थी, जगदीश्वर प्रभु निरवधि और निरुपम हैं। सीमा से रहित और उपमा से रहित। बाईस उपमाएँ देने के बाद कहनेवाला कह रहा है कि उपमा है ही नहीं।
और एक बात संख्याओं की। इस पूरी सूची में तीन तरह की गिनती चलती है और वे आपस में बदलती रहती हैं। कहीं केवल कोटि है, जैसे विष्णु और हिमालय के साथ। कहीं सत कोटि है, यानी सौ करोड़, जिसे टीका अरब कहती है, और यही सबसे अधिक बार आती है। और कहीं अमित कोटि है, जिसका अर्थ है कि अब गिनती छोड़ दी गयी। एक ही सूची के भीतर नापनेवाला अपनी इकाई बार-बार बड़ी करता जाता है, जैसे हर दो पंक्ति बाद उसे लग रहा हो कि पिछली इकाई छोटी पड़ गयी।
सार: महिमा को गिनकर बताने की कोशिश होती है। कामदेव, दुर्गा, इन्द्र, आकाश, पवन, सूर्य, चन्द्रमा, काल, धूमकेतु, पाताल, यम, तीर्थ, हिमालय, समुद्र, कामधेनु, सरस्वती, ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, कुबेर, माया और शेष, बाईस चीज़ें करोड़ों और अरबों की संख्या में रखी जाती हैं। सूची के अन्त में आधी पंक्ति में कह दिया जाता है कि प्रभु सीमा और उपमा दोनों से रहित हैं।
जुगनुओं से सूर्य नापना
अब वह छंद आता है जो इस पूरे लेखे को उठाकर उलट देता है, और उलटता भी उसी शब्द से है जिस पर सूची रुकी थी। पिछली आधी पंक्ति निरुपम पर समाप्त हुई थी, और छंद का पहला शब्द भी वही है। तुलसी इस जोड़ को छिपाते नहीं, वे इसे बिलकुल सामने रख देते हैं, ताकि पढ़नेवाला गिनती से इनकार तक बिना सीढ़ी के गिरे।
निरुपम न उपमा आन राम समान रामु निगम कहै।
छंद
जिमि कोटि सत खद्योत सम रबि कहत अति लघुता लहै॥
एहि भाँति निज निज मति बिलास मुनीस हरिहि बखानहीं।
प्रभु भाव गाहक अति कृपाल सप्रेम सुनि सुख मानहीं॥
राम उपमारहित हैं, उनकी कोई दूसरी उपमा है ही नहीं। राम के समान राम ही हैं, ऐसा वेद कहते हैं। इस वाक्य की बनावट पर ठहरिये। उपमा का काम यह होता है कि एक चीज़ को दूसरी चीज़ के बराबर रखा जाय। यहाँ जो एकमात्र वैध उपमा बची है उसके दोनों पलड़ों पर वही एक शब्द रखा है। यानी उपमा का ढाँचा तो खड़ा रहने दिया गया, पर उसमें भरने को दूसरा कुछ मिला नहीं।
और फिर वह पंक्ति, जिसके कारण यह छंद याद रखा जाता है। जैसे सूर्य को अरबों जुगनुओं के बराबर कहने से सूर्य बड़ा नहीं होता, वह अत्यन्त लघुता को ही प्राप्त होता है। टीका इसे खोलकर कह देती है कि ऐसा कहने से सूर्य की प्रशंसा नहीं, निन्दा होती है। और यहीं वह बात पूरी होती है जो चौपाइयों से नहीं पूरी हो सकती थी। अभी-अभी जो बाईस बार कहा गया था, वह सब इस एक पंक्ति के हिसाब से घाटे का सौदा है। जुगनुओं की संख्या बढ़ाते जाने से सूर्य की ओर एक क़दम भी नहीं बढ़ा जाता, बल्कि हर नया जुगनू यह और पक्का करता जाता है कि नापनेवाले के हाथ में जुगनू ही हैं।
पर छंद यहाँ से जो मोड़ लेता है वह इस पूरे प्रसंग का सबसे कोमल हिस्सा है। यदि गिनती इतनी बेकार है तो मुनि गाते क्यों हैं। उत्तर अगली पंक्ति में है। इसी प्रकार अपनी-अपनी बुद्धि के विलास के अनुसार मुनीश्वर हरि का बखान करते हैं, और प्रभु भाव गाहक हैं, अत्यन्त कृपालु हैं, वे उस वर्णन को प्रेमसहित सुनकर सुख मानते हैं।
गाहक का अर्थ ग्राहक है, लेनेवाला, ख़रीदार। जो चीज़ ली जाती है वह वर्णन नहीं है, भाव है। इससे पूरा हिसाब बदल जाता है। वर्णन का सही या ग़लत होना उस तराज़ू पर तौला ही नहीं जा रहा जिस पर हम उसे तौल रहे थे। मुनियों की गिनती ग़लत है और उनका गाना स्वीकार है, और दोनों बातें एक साथ सच हैं। जिस सूची को अभी घाटे का सौदा कहा गया, वही सूची सुनकर कोई सुख मान रहा है।
रामु अमित गुन सागर थाह कि पावइ कोइ।
दोहा ९२ (क)
संतन्ह सन जस किछु सुनेउँ तुम्हहि सुनायउँ सोइ॥ ९२ (क)॥
राम अपार गुणों के समुद्र हैं, क्या कोई उनकी थाह पा सकता है। संतों से मैंने जैसा कुछ सुना था, वही आपको सुनाया। इस दोहे में भुशुण्डि अपने ही आरम्भ से थोड़ा हटकर खड़े हो जाते हैं। पन्ने के पहले ही छन्द में उन्होंने कहा था कि यह सब मैंने अपनी आँखों देखा है। यहाँ वे कहते हैं कि संतों से जैसा सुना वैसा कह दिया। दोनों वाक्य एक ही भाषण के भीतर हैं और कुछ ही दोहे दूर हैं। पहली बात प्रभु के प्रताप के विषय में कही गयी थी, वह उन्होंने घटते हुए देखा था। यह दूसरी बात महिमा की गिनती के विषय में है, और वह किसी ने नहीं देखी, वह सुनी ही जाती है।
भाव बस्य भगवान सुख निधान करुना भवन।
सोरठा ९२ (ख)
तजि ममता मद मान भजिअ सदा सीतारवन॥ ९२ (ख)॥
सुख के भण्डार और करुणा के धाम भगवान् भाव के वश में हैं, इसलिये ममता, मद और मान छोड़कर सदा सीता के स्वामी का भजन करना चाहिये। छंद में जो बात कही गयी थी कि वे भाव के लेनेवाले हैं, वह यहाँ एक क़दम और आगे जाती है, वे भाव के वश में हैं। और इसके साथ तीन चीज़ें छोड़ने को कही जाती हैं, ममता, मद और मान। इनमें से पहली को याद रखिये। यही ममता इसी पन्ने पर लौटेगी, और तब उसे छोड़ने को नहीं कहा जायेगा, उसे कहनेवाला अपने लिये माँग लेगा।
सार: छंद में कहा जाता है कि राम की उपमा राम ही हैं, और सूर्य को अरबों जुगनुओं के बराबर कहना सूर्य की निन्दा है। फिर भी मुनि अपनी-अपनी बुद्धि से वर्णन करते हैं और प्रभु उसे प्रेमसहित सुनकर सुख मानते हैं, क्योंकि वे भाव के ग्राहक हैं। दोहे में भुशुण्डि कहते हैं कि संतों से जैसा सुना वैसा सुना दिया, और सोरठे में ममता, मद और मान छोड़कर भजन करने को कहते हैं।
पंख फुला लेनेवाला श्रोता
अब तक हम केवल बोलनेवाले को देख रहे थे। इस चौपाई में तुलसी कैमरा घुमा देते हैं और सुननेवाले पर टिका देते हैं, और जो पहला ब्यौरा देते हैं वह किसी आदमी का नहीं हो सकता था।
सुनि भुसुंडि के बचन सुहाए। हरषित खगपति पंख फुलाए॥
चौपाई ४
नयन नीर मन अति हरषाना । श्रीरघुपति प्रताप उर आना॥
भुशुण्डि के सुन्दर वचन सुनकर पक्षिराज हर्षित होकर पंख फुला लेते हैं। हाथ नहीं जुड़ते, सिर नहीं झुकता, आँख नहीं मुँदती। पंख फूलते हैं। जिस श्रोता को रोमांच होता है उसके शरीर पर रोम ही नहीं हैं, पर हैं, इसलिये तुलसी वही लिखते हैं जो उस देह में होगा। इसके बाद ही आँखों में जल आता है और मन अत्यन्त हर्षित होता है, और वे रघुनाथ के प्रताप को हृदय में धारण करते हैं।
और अगली चौपाई में वह होता है जिसके लिये यह सारी बातचीत चल रही थी। वे अपने पिछले मोह को याद करके पछताते हैं, कि मैंने अनादि ब्रह्म को मनुष्य मानकर देखा। इस वाक्य में कोई घटना नहीं गिनायी गयी, कोई जगह नहीं बतायी गयी, बस वह ग़लती नाम से रख दी गयी जो हो चुकी थी। जिसने भी कभी किसी के बारे में कोई राय बनाकर बाद में उसे बदला है, वह जानता है कि ग़लती का नाम लेना उसे गिनाने से भारी पड़ता है।
और फिर वह पंक्ति जिसमें एक शब्द जान-बूझकर छोटा रखा गया है। वे बार-बार काग के चरणों पर सिर नवाते हैं, और उन्हें राम के ही समान जानकर प्रेम बढ़ाते हैं। काग, यानी कौआ। तुलसी यहाँ भुशुण्डि नाम नहीं लिखते, वे जाति लिखते हैं। और वे यह ठीक उसी आधी पंक्ति में लिखते हैं जिसमें पक्षियों के राजा का सिर उन चरणों पर जा रहा है। नाम लिख देने से यह दृश्य आधा रह जाता, क्योंकि नाम किसी व्यक्ति का होता है और जाति वह चीज़ है जिसके कारण लोग झुकने से पहले सोचते हैं।
सार: वचन सुनकर गरुड़ के पंख फूल जाते हैं, आँखों में जल आ जाता है और वे राम का प्रताप हृदय में धारण करते हैं। वे अपने पिछले मोह पर पछताते हैं कि अनादि ब्रह्म को मनुष्य मान लिया, और बार-बार कौए के चरणों पर सिर नवाकर उन्हें राम के समान जानते हैं।
साँप ने डसा था, और गारुड़ी एक कौआ निकला
अगली चौपाई की पहली आधी पंक्ति किसी की कही हुई नहीं है, वह कथा की अपनी बात है, और टीका भी गरुड़ का बोलना दूसरी आधी पंक्ति से शुरू मानती है। गुरु के बिना कोई भवसागर नहीं तर सकता, चाहे वह ब्रह्मा और शंकर के समान ही क्यों न हो। इस वाक्य में जो दो नाम रखे गये हैं वे किसी और जगह गुरु के उदाहरण होते, यहाँ वे शिष्य की कमी के उदाहरण हैं।
गुर बिनु भव निधि तरइ न कोई । जौं बिरंचि संकर सम होई॥
चौपाई ५
संसय सर्प ग्रसेउ मोहि ताता। दुखद लहरि कुतर्क बहु ब्राता॥
और शंकर का नाम यहाँ रखनेवाला कौन है, यह याद रखने की चीज़ है। यह पूरी कथा शिव उमा से कह रहे हैं। थोड़ी देर पहले उन्होंने वह चौपाई सुनायी थी जिसमें वेद, शेष और शिव पार न पाने वालों में गिने गये थे। अब वे वह पंक्ति सुना रहे हैं जिसमें शंकर के समान होकर भी गुरु के बिना काम नहीं चलता। दो बार, बिना किसी विनय के प्रदर्शन के, कहनेवाले ने अपने को उस ओर रख दिया है जहाँ कमी है।
और फिर गरुड़ बोलते हैं, और पहला ही वाक्य वह है जिसके आगे इस प्रसंग में कुछ नहीं ठहरता। हे तात, मुझे सन्देह रूपी सर्प ने डस लिया था, और कुतर्क की बहुत सी दुःख देनेवाली लहरें उठ रही थीं। टीका इस लहर वाले हिस्से को खोलकर बताती है कि साँप के डसने पर विष चढ़ने से जैसे लहरें आती हैं, वैसे ही। और अब उन दो शब्दों को फिर देखिये जिन्हें पन्ने के पहले सोरठे में गिन लेने को कहा गया था। वहाँ कहा गया था, कुतर्क और संसय छोड़ दीजिये। यहाँ वही दोनों लौट आये हैं, पर अब वे छोड़ने की चीज़ नहीं रहे, अब वे वह चीज़ हैं जो किसी को पकड़कर बैठी हुई थी।
तव सरूप गारुड़ि रघुनायक। मोहि जिआयउ जन सुखदायक॥
चौपाई ६
तव प्रसाद मम मोह नसाना । राम रहस्य अनूपम जाना॥
आपके स्वरूप रूपी गारुड़ी के द्वारा भक्तों को सुख देनेवाले रघुनाथ ने मुझे जिला लिया। गारुड़ि, यानी वह जो साँप का विष उतारता है। टीका यही अर्थ देती है। इस एक शब्द में इस पूरे दृश्य का मज़ा बन्द है, क्योंकि विष उतारने की जिस विद्या का नाम लिया जा रहा है वह नाम इसी श्रोता के नाम से बना है। संसार में जिसे साँप काटता है वह जिस नाम की शरण लेता है, वह नाम इस समय बैठा हुआ है और कह रहा है कि मुझे साँप ने काट लिया था।
और जिस गारुड़ी ने विष उतारा वह कोई मन्त्र नहीं था, कोई जड़ी नहीं थी। वह किसी का स्वरूप था, और देखने भर से विष उतर गया। साँपों का शत्रु एक कौए को देखकर बचा है।
अगली आधी पंक्ति में वे उस बचने का हिसाब दे देते हैं। आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हुआ और मैंने राम का अनुपम रहस्य जाना। ध्यान दीजिये कि उन्होंने यह नहीं कहा कि मुझे ज्ञान हो गया। उन्होंने कहा कि जो ढका हुआ था वह हटा और जो ढका था वह दिख गया। पहले हटना, फिर दिखना। इसी क्रम में वह बात है जो आगे उनके प्रश्नों को उठाती है, क्योंकि जिसका पर्दा एक बार हट चुका है वही यह पूछने का साहस करता है कि यह हुआ कैसे।
और तब वे प्रशंसा करते हैं, सिर नवाते हैं, हाथ जोड़ते हैं, और विनम्र, प्रेमभरे, कोमल वचन बोलते हैं। तुलसी ने इस दोहे के पहले आधे में केवल शिष्टाचार रखा है और दूसरे आधे में वह वाक्य रख दिया है जिसे पढ़कर ठहर जाना पड़ता है।
प्रभु अपने अबिबेक ते बूझउँ स्वामी तोहि।
दोहा ९३ (ख)
कृपासिंधु सादर कहहु जानि दास निज मोहि॥ ९३ (ख)॥
हे प्रभो, हे स्वामी, मैं अपने अविवेक के कारण आपसे पूछता हूँ। हे कृपा के समुद्र, मुझे अपना निज दास जानकर आदरपूर्वक कहिये। चार सम्बोधन हैं और चारों वे हैं जो कोई सेवक अपने स्वामी के लिये काम में लाता है। और अपने लिये जो शब्द चुना गया है वह दास है, और दास के आगे निज लगा दिया गया है, यानी अपने घर का सेवक। जो विष्णु का वाहन है वह एक कौए से यह माँग रहा है कि मुझे अपने लोगों में गिन लीजिये।
और अपने प्रश्नों की भूमिका में जो शब्द उन्होंने रखा है वह अबिबेक है। पूछने से पहले वे यह मान लेते हैं कि पूछने की आवश्यकता ही उनकी अपनी कमी से पैदा हुई है। यह नम्रता का शिष्टाचार नहीं है। यह उस आदमी की बात है जिसने अभी-अभी अपने एक पुराने निर्णय को ग़लत पाया है और जो अब अपनी ही जाँच पर भरोसा नहीं कर रहा।
सार: कथा कहती है कि गुरु के बिना ब्रह्मा और शंकर के समान होकर भी कोई नहीं तरता। फिर गरुड़ कहते हैं कि सन्देह के सर्प ने उन्हें डस लिया था और कुतर्क की लहरें उठ रही थीं, और भुशुण्डि के स्वरूप रूपी गारुड़ी से रघुनाथ ने उन्हें जिला लिया। वे अपने को अविवेकी और निज दास कहकर, कौए को प्रभु और स्वामी कहकर, अपने प्रश्न आरम्भ करते हैं।
चार प्रश्न, और तीन बार एक ही शब्द
प्रश्न से पहले वे उत्तर देनेवाले का परिचय देते हैं, और यह परिचय आठ चीज़ें गिनाता है। आप सर्वज्ञ हैं, तत्त्व के ज्ञाता हैं, अन्धकार से परे हैं, उत्तम बुद्धिवाले हैं, सुशील हैं, सरल आचरणवाले हैं, ज्ञान, वैराग्य और विज्ञान के धाम हैं, और रघुनाथ के प्रिय दास हैं। सूची चढ़ती जाती है और सबसे ऊपर जो पद रखा गया है वह दास का है। सर्वज्ञता पहले नम्बर पर है और सेवा आख़िर में, और इस सूची में आख़िर ही सबसे ऊँचा है।
कारन कवन देह यह पाई । तात सकल मोहि कहहु बुझाई॥
चौपाई ७
राम चरित सर सुंदर स्वामी। पायहु कहाँ कहहु नभगामी॥
पहला प्रश्न यह है कि यह देह किस कारण से मिली, सब समझाकर कहिये। दूसरा प्रश्न इसके ठीक बाद है, हे स्वामी, हे आकाशगामी, यह सुन्दर राम चरित सर आपने कहाँ पाया। सर का अर्थ सरोवर है, और टीका इसे रामचरितमानस बताती है। यानी जिस ग्रन्थ को हम पढ़ रहे हैं उसका नाम ही एक झील है, और उस झील के मिलने का पता पूछा जा रहा है, जैसे कोई किसी से पूछे कि यह तालाब कहाँ मिला था।
तीसरा प्रश्न दो चौपाइयों में तैयार होता है और उसकी बनावट सबसे दिलचस्प है। वे कहते हैं, हे नाथ, मैंने शिव से ऐसा सुना है कि महाप्रलय में भी आपका नाश नहीं होता, और ईश्वर मिथ्या वचन नहीं कहते, और वही मेरे मन में सन्देह है। पढ़िये कि सन्देह किस पर है। भुशुण्डि के अमर होने पर नहीं। शिव के सच बोलने पर भी नहीं। सन्देह इस पर है कि ये दोनों बातें एक साथ कैसे टिकें। वे प्रमाण को मानते हैं और तथ्य को मान नहीं पा रहे, और इस असमर्थता को उन्होंने अपना सन्देह कहा है।
और फिर वे यह बताते हैं कि यह असमर्थता क्यों है। नाग, मनुष्य, देवता और सारा चराचर जगत् काल का कलेवा है, और असंख्य ब्रह्माण्डों का नाश करनेवाला काल सदा अनिवार्य है। कलेवा शब्द पर ठहरिये। कलेवा नाश्ते को कहते हैं, दिन का पहला और सबसे साधारण भोजन। सारा जगत् किसी के दिन की पहली हलकी सी ख़ुराक है। इतना बड़ा चित्र और इतना घरेलू शब्द, और दोनों एक ही आधी पंक्ति में।
तुम्हहि न ब्यापत काल अति कराल कारन कवन।
सोरठा ९४ (क)
मोहि सो कहहु कृपाल ग्यान प्रभाव कि जोग बल॥ ९४ (क)॥
ऐसा अत्यन्त कराल काल आपको नहीं व्यापता, इसका क्या कारण है, हे कृपालु मुझे कहिये, यह ज्ञान का प्रभाव है या योग का बल। और यहाँ पूछनेवाला अपने प्रश्न के साथ उत्तर के दो नमूने भी रख देता है। दोनों कमाई की चीज़ें हैं। ज्ञान अर्जित किया जाता है और योग साधा जाता है। जो आदमी पूछ रहा है उसके पास इन्हीं दो के खाने हैं, और वह उन्हीं में से किसी एक पर निशान लगवाना चाहता है।
और चौथा प्रश्न सबसे छोटा है और सबसे निजी। हे प्रभो, आपके आश्रम में आते ही मेरा मोह और भ्रम भाग गया, इसका क्या कारण है, हे नाथ, यह सब प्रेमसहित कहिये। पिछले तीन प्रश्न उत्तर देनेवाले के विषय में थे। यह अपने विषय में है। और यह वही आदमी पूछ रहा है जिसने अभी अपने को अविवेकी कहा था, यानी वह अपनी सबसे बड़ी राहत का कारण भी अपने भरोसे तय नहीं कर रहा।
अब इन चारों को एक साथ रखिये और वह शब्द देखिये जो इनमें तीन बार आता है। पहले प्रश्न में कारन कवन। तीसरे में कारन कवन। चौथे में फिर कारन कवन। तीन बार वही दो शब्द, बिना बदले। पक्षिराज कहानी नहीं माँग रहे, वे कारण माँग रहे हैं। वे यह जानना चाहते हैं कि किस नियम से यह सब हुआ, जैसे कोई किसी यन्त्र को खोलकर देखना चाहता हो। और इस पन्ने के अन्तिम दोहे में उन्हें जो देने का वादा किया जायेगा वह कारण नहीं होगा, वह चरित होगा। यानी नियम के बदले जीवन।
सार: गरुड़ चार बातें पूछते हैं, यह देह किस कारण मिली, यह सुन्दर रामचरित कहाँ मिला, महाप्रलय में भी काल आपको क्यों नहीं व्यापता, और आपके आश्रम में आते ही मेरा मोह क्यों भाग गया। तीसरे प्रश्न में वे स्वयं दो सम्भावनाएँ रख देते हैं, ज्ञान का प्रभाव या योग का बल। तीन प्रश्नों में एक ही शब्द लौटता है, कारन कवन।
प्रश्न की प्रशंसा
उत्तर से पहले जो होता है, वह इस पन्ने की सबसे चुपचाप बात है। उत्तर देनेवाला उत्तर नहीं देता, वह पहले प्रश्न की तारीफ़ करता है। और इसी चौपाई की पहली आधी पंक्ति में वह नाम आ जाता है जिससे यह पूरा दृश्य अपनी जगह पर बैठ जाता है।
गरुड़ गिरा सुनि हरषेउ कागा। बोलेउ उमा परम अनुरागा॥
चौपाई ८
धन्य धन्य तव मति उरगारी । प्रस्न तुम्हारि मोहि अति प्यारी॥
हे उमा, गरुड़ की वाणी सुनकर काकभुशुण्डि हर्षित हुए और परम प्रेम से बोले। उमा। यह सम्बोधन किसी तैयारी के साथ नहीं आता, यह बीच पंक्ति में आ जाता है, और आते ही यह याद दिला देता है कि हम जो दृश्य देख रहे हैं वह हमें किसी और की आँख से दिखाया जा रहा है। नीलगिरि पर एक कौआ और एक गरुड़ बैठे हैं, और उस दृश्य को कैलास पर बैठा हुआ कोई अपनी प्रिया से कह रहा है। और उसी कहनेवाले का नाम अभी थोड़ी देर पहले गरुड़ ने अपने प्रश्न में प्रमाण की तरह रखा था।
फिर वे जो कहते हैं वह प्रशंसा है और उसका निशाना ठीक वहाँ लगता है जहाँ पूछनेवाले ने अपने को नीचा कहा था। हे सर्पों के शत्रु, आपकी बुद्धि धन्य है, धन्य है, आपके प्रश्न मुझे बहुत ही प्यारे लगे। पूछनेवाले ने अपने प्रश्नों को अपने अविवेक की उपज कहा था। उत्तर देनेवाला उसी बुद्धि को धन्य कहता है, और एक बार नहीं, दो बार। जिसे अपने ऊपर से भरोसा उठ गया था उसे सबसे पहले यही लौटाया जाता है।
और इसके बाद वह वाक्य आता है जो इस पूरे प्रसंग की धुरी है। आपके प्रेमयुक्त सुन्दर प्रश्न सुनकर मुझे बहुत जन्मों की याद आ गयी। ध्यान दीजिये कि यह उत्तर नहीं है, यह उत्तर देनेवाले के साथ हुई कोई घटना है। प्रश्न ने केवल सूचना नहीं माँगी, उसने किसी के भीतर कुछ खोल दिया। और तब वे कहते हैं कि मैं अपनी सब कथा विस्तार से कहता हूँ, हे तात, आदरसहित मन लगाकर सुनिये।
पर कथा तुरन्त शुरू नहीं होती। बीच में एक चौपाई है जो सब कुछ एक जगह जोड़ देती है। अनेक जप, तप, यज्ञ, शम, दम, व्रत, दान, वैराग्य, विवेक, योग और विज्ञान, इन सबका फल एक ही है, रघुनाथ के चरणों में प्रेम, और इसके बिना कोई कल्याण नहीं पाता। ग्यारह चीज़ें गिनायी गयी हैं और सबका एक ही फल बताया गया है। यह वाक्य यहाँ यों ही नहीं रखा गया। यही सूची थोड़ी देर बाद फिर आयेगी, और तब यह किसी सिद्धान्त की सूची नहीं होगी, किसी के अपने किये हुए कामों की सूची होगी।
और अब वह ममता लौटती है जिसे छोड़ने को सोरठे में कहा गया था। मैंने इसी शरीर से राम की भक्ति पायी है, इसीसे इस पर मेरी ममता अधिक है। जिससे अपना कुछ स्वार्थ होता है, उस पर सभी ममता करते हैं। यह वाक्य पहली बार पढ़ने में खटकता है। कुछ ही दोहे पहले ममता, मद और मान छोड़ने को कहा गया था, और अब वही कहनेवाला अपनी ममता की घोषणा कर रहा है, और उसे स्वार्थ का नाम भी दे रहा है।
पर वह इस खटकने को जानता है, और आगे की पाँच चौपाइयाँ इसी को सुलझाने में लगती हैं। वह ममता का खण्डन नहीं करता, वह स्वार्थ की परिभाषा बदल देता है। और उस परिभाषा तक पहुँचने के लिये वह जो रास्ता चुनता है वह शास्त्र से नहीं, करघे से आता है।
सार: भुशुण्डि उत्तर देने से पहले प्रश्नों की प्रशंसा करते हैं और पूछनेवाले की बुद्धि को दो बार धन्य कहते हैं। इन्हीं प्रश्नों से उन्हें बहुत जन्मों की याद आ जाती है। फिर वे कहते हैं कि जप, तप, यज्ञ, व्रत, दान, योग आदि सबका फल राम के चरणों में प्रेम है, और यह भी कि इसी देह से भक्ति मिली, इसलिये इस देह पर उनकी ममता अधिक है।
रेशम का कीड़ा
अब वह सोरठा और दोहा आते हैं जिनके कारण यह प्रसंग बहुतों को याद रह जाता है। नीति पहले रखी जाती है और उदाहरण बाद में, और उदाहरण इतना घरेलू है कि उसे सुनकर नीति पर बहस करने की इच्छा नहीं रहती।
पन्नगारि असि नीति श्रुति संमत सज्जन कहहिं।
सोरठा ९५ (क) और दोहा ९५ (ख)
अति नीचहु सन प्रीति करिअ जानि निज परम हित॥ ९५ (क)॥
पाट कीट तें होइ तेहि तें पाटंबर रुचिर।
कृमि पालइ सबु कोइ परम अपावन प्रान सम॥ ९५ (ख)॥
हे पन्नगारि, वेदसम्मत नीति ऐसी है और सज्जन भी यही कहते हैं कि अपना परम हित जानकर अत्यन्त नीच से भी प्रीति करनी चाहिये। रेशम कीड़े से होता है और उससे सुन्दर रेशमी वस्त्र बनते हैं, इसीसे उस परम अपवित्र कीड़े को भी सब प्राणों के समान पालते हैं। इस दोहे की दूसरी पंक्ति में दो शब्द आमने-सामने रख दिये गये हैं, परम अपावन और प्रान सम। सबसे अपवित्र और अपने प्राणों जैसा। बीच में कोई तर्क नहीं दिया गया, बस वह चीज़ रख दी गयी जो उससे निकलती है।
और सम्बोधन देखिये। पन्नगारि, यानी साँपों का शत्रु। थोड़ी देर पहले उरगारी कहा गया था, जिसका अर्थ भी वही है। दोनों बार गरुड़ को उसी नाम से पुकारा गया है जो उनके भोजन से बना है, और दोनों बार जो बात कही जा रही है वह नीच को अपनाने की है।
और अब उस नीति का असली निशाना दिखता है। यह किसी और के विषय में नहीं कही गयी है। कहनेवाला इसे अपनी ही देह पर लगा रहा है। पक्षियों में कौआ वही है जो सबसे नीचे गिना जाता है, जो जूठन पर बैठता है, जिसे शुभ नहीं माना जाता। और उसी देह के विषय में अभी-अभी कहा गया है कि इसी से भक्ति मिली है। रेशम का कीड़ा और काकदेह, दोनों एक ही तर्क के दो सिरे हैं।
स्वारथ साँच जीव कहुँ एहा । मन क्रम बचन राम पद नेहा॥
चौपाई ९
सोइ पावन सोइ सुभग सरीरा । जो तनु पाइ भजिअ रघुबीरा॥
जीव के लिये सच्चा स्वार्थ यही है कि मन, वचन और कर्म से राम के चरणों में प्रेम हो। वही शरीर पवित्र और सुन्दर है जिस शरीर को पाकर रघुवीर का भजन किया जाय। यहाँ दोनों गुत्थियाँ एक साथ खुलती हैं। स्वार्थ शब्द छीना नहीं गया, उसे भर दिया गया, और जो उसमें भरा गया है वह प्रेम है। और पवित्रता की परिभाषा पलट दी गयी है। पवित्र वह देह नहीं जिसमें जन्म लेने से पहले कोई अधिकार मिला हो, पवित्र वह देह है जिसमें कुछ हो चुका हो। यानी शरीर का प्रमाणपत्र पहले नहीं मिलता, बाद में बनता है।
और अगली चौपाई इसी नियम को उलटी ओर से जाँचती है। जो राम से विमुख है, वह ब्रह्मा के समान देह भी पा जाय तो भी कवि और पण्डित उसकी प्रशंसा नहीं करते। इसी शरीर से मेरे हृदय में रामभक्ति उत्पन्न हुई, इसीसे हे स्वामी, यह मुझे परम प्रिय है। दोनों सिरे अब आमने-सामने खड़े हैं। एक ओर सबसे नीची देह जिसमें भक्ति उगी, दूसरी ओर सबसे ऊँची देह जिसमें कुछ नहीं उगा। और नियम दोनों पर एक ही तरह लगता है, जो उगा उसी से देह की क़ीमत तय होती है।
इसके बाद एक ब्यौरा आता है जिसे तुलसी बहुत हलके से रख देते हैं। मेरा मरण मेरी अपनी इच्छा पर है, फिर भी मैं यह शरीर नहीं छोड़ता, क्योंकि वेद ने कहा है कि शरीर के बिना भजन नहीं होता। यानी जो जब चाहे जा सकता है वह इसलिये रुका हुआ है कि जाने के बाद भजन का साधन नहीं बचेगा। किसी चीज़ को छोड़ने की शक्ति होते हुए न छोड़ना, यही इस पूरे हिस्से में ममता का असली अर्थ है।
और उसी चौपाई की दूसरी आधी पंक्ति में सबसे सीधी बात आ जाती है। पहले मोह ने मेरी बड़ी दुर्दशा की, राम से विमुख होकर मैं कभी सुख से नहीं सोया। इतने ऊँचे प्रसंग में सोने का ज़िक्र। न मुक्ति, न लोक, न सिद्धि। रात में नींद आयी या नहीं, इसी पैमाने पर उन्होंने अपने अनेक जन्मों का हिसाब लगा दिया है।
और तब वह सूची लौटती है जिसकी ओर पहले इशारा किया गया था। अनेक जन्मों में मैंने अनेक प्रकार के योग, जप, तप, यज्ञ और दान किये। हे गरुड़, जगत् में ऐसी कौन सी योनि है जिसमें घूम-फिरकर मैंने जन्म न लिया हो। हे गुसाईं, मैंने सब कर्म करके देख लिये, पर अब की तरह मैं कभी सुखी नहीं हुआ। जो बात थोड़ी देर पहले सिद्धान्त की तरह कही गयी थी, कि इन सबका फल राम के चरणों में प्रेम है, वह अब किसी के अपने अनुभव का बयान बन चुकी है। पहले नियम, फिर उस नियम को अपने ऊपर आज़मा चुके आदमी की गवाही।
और अन्तिम आधी पंक्ति में एक नाम फिर आता है। मुझे बहुत से जन्मों की याद है, क्योंकि शिव की कृपा से मेरी बुद्धि को मोह ने नहीं घेरा। अब इस पन्ने पर शिव तीन जगह हैं। गरुड़ ने उन्हें अपने सन्देह का प्रमाण बनाया था। भुशुण्डि उन्हें अपनी स्मृति का कारण बता रहे हैं। और यह पूरी बातचीत वही सुना रहे हैं। जो कथा में प्रमाण है, वही कथा में कारण है, और वही कथा का कहनेवाला है।
सार: नीति यह रखी जाती है कि अपना परम हित जानकर अत्यन्त नीच से भी प्रीति करनी चाहिये, और उदाहरण रेशम का कीड़ा है, जो परम अपवित्र होकर भी प्राणों के समान पाला जाता है। इसी से भुशुण्डि अपनी काकदेह की ममता को ठहराते हैं। सच्चा स्वार्थ मन, वचन और कर्म से राम के चरणों में प्रेम है, और वही देह पवित्र है जिसमें भजन हुआ हो। वे यह भी कहते हैं कि उनका मरण उनकी इच्छा पर है, फिर भी देह नहीं छोड़ते, क्योंकि देह के बिना भजन नहीं होता।
और एक पुराना कल्प खुलता है
अब वह दोहा आता है जिस पर यह पन्ना समाप्त होता है, और वह समाप्ति एक दरवाज़े पर होती है, कमरे के भीतर नहीं। पूछा कारण गया था, दिया चरित जा रहा है।
प्रथम जन्म के चरित अब कहउँ सुनहु बिहगेस।
दोहा ९६ (क, ख)
सुनि प्रभु पद रति उपजइ जातें मिटहिं कलेस॥ ९६ (क)॥
पूरुब कल्प एक प्रभु जुग कलिजुग मल मूल।
नर अरु नारि अधर्म रत सकल निगम प्रतिकूल॥ ९६ (ख)॥
हे पक्षिराज, सुनिये, अब मैं अपने प्रथम जन्म के चरित कहता हूँ, जिन्हें सुनकर प्रभु के चरणों में प्रीति उत्पन्न होती है, जिससे सब क्लेश मिट जाते हैं। पहले आधे में वादा है और वह वादा जानकारी का नहीं है। सुनने का फल प्रीति बताया गया है और प्रीति का फल क्लेशों का मिटना। यानी कथा यहाँ सूचना की तरह नहीं, दवा की तरह दी जा रही है, और जिसे दी जा रही है उसने अभी-अभी कहा था कि उसे साँप ने डसा था।
और दूसरे आधे में पर्दा उठ जाता है। हे प्रभो, पूर्व के एक कल्प में पापों का मूल युग कलियुग था, जिसमें पुरुष और स्त्री सभी अधर्म में रत और वेद के विरोधी थे। एक ही पंक्ति में समय, युग और लोगों का स्वभाव, तीनों बता दिये गये। न जगह का नाम है, न किसी व्यक्ति का। बस एक बीता हुआ कल्प, और उसमें वह युग जिसे मल का मूल कहा गया है।
और यहीं यह पन्ना रुक जाता है। जिस जन्म की बात करने के लिये इतनी भूमिका बाँधी गयी, वह जन्म इसके आगे खुलेगा। इस प्रसंग में हमें केवल यह मिलता है कि कथा कहने का निश्चय हो चुका है, सुननेवाला बैठ चुका है, और मंच पर रोशनी उस युग पर पड़ चुकी है जिसमें वह कथा घटेगी। आगे क्या हुआ, यह इस पन्ने की बात नहीं है।
सार: भुशुण्डि कहते हैं कि अब वे अपने प्रथम जन्म के चरित कहेंगे, जिन्हें सुनने से प्रभु के चरणों में प्रीति उपजती है और क्लेश मिटते हैं। फिर वे दृश्य बाँधते हैं, पूर्व के एक कल्प में कलियुग था, पापों का मूल, जिसमें स्त्री और पुरुष सभी अधर्म में रत और वेद के विरोधी थे। पन्ना यहीं समाप्त होता है।
और अन्त में, अपनी ओर
इस पन्ने पर तीन काम होते हैं और तीनों एक ही दिशा में जाते हैं। पहले गिनती होती है और हार जाती है। फिर प्रश्न पूछे जाते हैं और पूछनेवाला अपने प्रश्न के साथ ही अपनी हैसियत भी नीचे रख देता है। और अन्त में उत्तर देनेवाला अपनी सबसे नीची चीज़ को अपनी सबसे प्यारी चीज़ बताता है। तीनों जगह वही होता है कि बड़ा होने के लिये जो रास्ता सामान्यतः लिया जाता है वह काम नहीं करता, और जो काम करता है वह उलटी दिशा में जाता है।
और एक बात जो इस पूरे पन्ने पर नहीं है, उसे कह देना चाहिये। राम यहाँ एक बार भी नहीं आते। वे बोलते नहीं, कुछ करते नहीं, किसी को कुछ देते नहीं। पूरा प्रसंग उनके विषय में है और उनकी उपस्थिति उसमें कहीं नहीं है। सीता का नाम भी एक ही बार आता है, सोरठे के अन्तिम शब्द में, जहाँ भगवान् को उनके सम्बन्ध से पुकारा गया है। लंका, अयोध्या, युद्ध, कोई नाम यहाँ नहीं है। जो काण्ड युद्ध के बाद का है उसका यह हिस्सा दो पक्षियों की बातचीत के सिवा कुछ नहीं है।
और शायद इसीलिये इस प्रसंग में उपमाओं की इतनी भीड़ है। जब सामने कुछ हो रहा हो तब उसे दिखाया जाता है। जब कुछ नहीं हो रहा और फिर भी कुछ कहना हो, तब चीज़ें उठा-उठाकर बगल में रखी जाती हैं, कामदेव, हिमालय, समुद्र, कामधेनु, काल। बाईस बार यह किया जाता है और तेईसवीं बार कहनेवाला स्वयं कह देता है कि यह तरीक़ा ठीक नहीं है, क्योंकि जुगनू जोड़ते जाने से सूर्य नहीं बनता। और तब भी वह सूची मिटायी नहीं जाती। वह पन्ने पर बनी रहती है, अपनी असफलता समेत।
यही इस प्रसंग की सबसे काम की बात है, और वह छंद की उसी पंक्ति में रखी हुई है जिसमें भाव का ग्राहक होना कहा गया है। पूरे पन्ने पर किसी की गिनती सही नहीं बैठती, मुनियों की नहीं, भुशुण्डि की नहीं, और गरुड़ की तो बिलकुल नहीं। फिर भी कोई किसी को टोकता नहीं। सबकी बात सुनी जाती है और सबका भाव ले लिया जाता है।
और आख़िरी बात, जो इस पन्ने को पढ़ते हुए देर तक साथ रहती है। पूछनेवाला तीन बार कारण पूछता है और उसे कारण नहीं मिलता। उसे एक जीवन मिलता है, एक बीते हुए कल्प से शुरू होकर। बहुत सी बातें ऐसी होती हैं जिनका उत्तर नियम बताकर नहीं दिया जा सकता, केवल यह बताकर दिया जा सकता है कि किसके साथ क्या-क्या हुआ। यह पन्ना ठीक उसी जगह समाप्त होता है जहाँ नियम माँगनेवाले को कहानी सुनायी जाने लगती है।
उत्तरकाण्ड के इस हिस्से को पढ़ते हुए बार-बार यह लगता है कि यहाँ दो पक्षी बैठे हैं और दोनों अपनी जगह से हटे हुए हैं। जो सबसे ऊपर उड़ता है वह नीचे बैठा है और पूछ रहा है। जो सबसे नीचे गिना जाता है वह ऊपर बैठा है और बता रहा है। और जिस चीज़ के विषय में बताया जा रहा है, उसके लिये दोनों के पास एक ही शब्द है, अथाह। एक ने आकाश से यह सीखा और दूसरे ने अपने जन्मों से।
और जो एक बात इस पन्ने से साथ चलती है वह वही है जिसमें सबसे कम सजावट है। इतने ब्रह्माण्ड, इतने कल्प, इतने करोड़ और अरब गिनाने के बाद, अपने पूरे भटकाव का हिसाब देने के लिये जो पैमाना उठाया गया वह नींद है। राम से विमुख होकर मैं कभी सुख से नहीं सोया। जिसने यह कहा वह अपनी इच्छा से मर सकता है और नहीं मरता, और वह यह बता रहा है कि इससे पहले उसे चैन की नींद कभी नहीं आयी।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, उत्तरकाण्ड, दोहा ९० (ख) से ९६, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।