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कलि का एक पुनीत प्रताप, और गुरु का अपमान

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रामचरितमानसउत्तरकाण्डप्रसंग 18

चार युगों के चार उपाय गिनाकर कहनेवाला कलियुग को सबसे सस्ता युग ठहरा देता है। अगले ही पल बात युग से हटकर अपने ऊपर आ जाती है: अकाल, उज्जैन, एक ब्राह्मण गुरु। और शिव के मन्दिर में वह प्रणाम जो नहीं किया गया।

यह प्रसंग दो हिस्सों का है, और दोनों के बीच कोई पुल नहीं बनाया गया। पहले हिस्से में एक ठंडा, गिना हुआ तर्क है: किस युग में किस उपाय से आदमी पार होता है। और चारों में सस्ता उपाय किस युग के हिस्से आया है। दूसरे हिस्से में एक आदमी की कथा है जिसके पास वही सस्ता उपाय था और जिसने उसे पकड़ा नहीं। बीच का जोड़ बहुत छोटा है, और उसमें बात इतनी अचानक मुड़ती है कि लगता है कोई बात छूट गयी।

यह कथा उसी लम्बी बातचीत का हिस्सा है जो उत्तरकाण्ड भर चलती है। इसमें कोई अपना नाम नहीं बताता। कहनेवाला केवल “मैं” कहता है, सुननेवाले को पक्षियों के राजा की पदवियों से पुकारा जाता है, और पोद्दार की टीका उसे गरुड़ बताती है। जिस ब्राह्मण के चारों ओर दूसरा हिस्सा घूमता है, वह आदि से अन्त तक केवल ब्राह्मण, द्विज और गुरु है। इस प्रसंग में दो ही नाम पड़े हैं, और दोनों जगहों के हैं: अवध और उज्जैन।

यह तुलसीदास का रामचरितमानस है, वाल्मीकि की रामायण नहीं: वहाँ न यह बातचीत है, न यह वक्ता, न उज्जैन का यह ब्राह्मण। यहाँ पहले सिद्धान्त आता है, और उसके तुरन्त बाद उसी सिद्धान्त की चीर-फाड़, अपने ही ऊपर, बिना रियायत के।

दयालु गुरु, कपटी शिष्य

  • कहनेवाला वह जो यह सारी कथा सुना रहा है। इस प्रसंग में वह अपना नाम नहीं लेता, और युगों के हिसाब के बाद अपनी ही कथा का दोषी आदमी वही निकलता है।
  • गरुड़ सुननेवाले, जिन्हें कहनेवाला कई पदवियों से पुकारता है। यह नाम टीका देती है, कहनेवाला नहीं।
  • वह ब्राह्मण उज्जैन का एक वैदिक शिव-उपासक, परम साधु, परमार्थ का जानकार, जो कहनेवाले को पुत्र की तरह पढ़ाता है और अन्त में उसी के लिये गिड़गिड़ाता है।
  • शिव जिनके मन्दिर में यह सब होता है, जिनका मन्त्र रोज़ जपा जाता है, और जिनकी आवाज़ आकाश से उतरकर शाप देती है।
  • राम जिनका नाम युगों वाले हिस्से का पूरा तर्क है, और जिनके भक्तों को देखकर दूसरे हिस्से का आदमी जल उठता है।

चार युग, चार उपाय

पिछला प्रसंग कलियुग के अवगुण गिनाते-गिनाते एक विचित्र जगह पर रुका था: जिस युग में मैल अधिक से अधिक है, उसी में बिना परिश्रम छुटकारा भी है। यह प्रसंग वहीं से उठता है, और उठते ही चारों युगों को एक-एक वाक्य देकर गिना देता है, बिना तारीफ़ के एक भी शब्द के। यह कथा नहीं, हिसाब है, और देखना यह है कि जोड़ किस ओर झुक रहा है।

पहले दो युग निपट जाते हैं, और दोनों को बराबर जगह मिलती है, एक-एक वाक्य।

सत्ययुग में सब योगी और विज्ञानी होते हैं, और भगवान् का ध्यान करके प्राणी भवसागर से तर जाते हैं। त्रेता में मनुष्य अनेक प्रकार के यज्ञ करते हैं, और कर्म को भगवान् के समर्पण करके पार हो जाते हैं। त्रेता की बात में जो शब्द असल में काम कर रहा है वह यज्ञ नहीं, प्रभु को समर्पण है: यज्ञ अपने आप नहीं तारता। तारता वह है जो यज्ञ के बाद किया जाता है, कि जो किया उसे अपने खाते से हटा दिया जाये। एक ही वाक्य में क्रिया और उस क्रिया का त्याग, दोनों हैं।

फिर बाक़ी दो युग आते हैं, और उन्हीं में इस हिसाब की चोटी है।

द्वापर में राम के चरणों की पूजा करके मनुष्य संसार से तर जाता है, और दूसरा कोई उपाय नहीं। और कलियुग में केवल भगवान् की गुणगाथा गाने से मनुष्य भवसागर की थाह पा जाते हैं। चारों को साथ रखिये तो उपाय हैं ध्यान, यज्ञ, पूजा, गान। पहला भीतर का अभ्यास है और उसमें बरसों लगते हैं। दूसरे में सामग्री, ऋत्विज, भूमि, समय चाहिये। तीसरे में एक स्थान और एक विधि। चौथे में केवल एक मुँह। जैसे-जैसे युग उतरता है, उपाय सस्ता होता जाता है, और यही इस हिसाब का जोड़ है।

और क्रिया बदल जाती है: पहले तीन युगों में तरना, कलियुग में थाह पाना। तरने के लिये नाव, दूसरा किनारा और बीच का सारा पानी चाहिये। थाह पाने का अर्थ है कि पैर नीचे लग गये, जल उतना गहरा था ही नहीं जितना दिखता था। संसार का नाप बदल दिया गया है, बिना यह बताये।

फिर बात और कस दी जाती है: कलियुग में न योग है, न यज्ञ, न ज्ञान। राम का गुणगान ही एकमात्र आधार है। और दो शर्तें रख दी जाती हैं, दोनों भीतर की: सारे भरोसे छोड़कर, और प्रेम सहित। जिस उपाय को अभी सस्ता बताया गया, उसकी कीमत गिनाने का ढंग बदल गया है। सामग्री कुछ नहीं लगती, पर कहीं और टिका हुआ मन लेकर यह काम नहीं होगा।

वही भवसागर से तर जाता है, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं। नाम का प्रताप कलियुग में प्रकट है, प्रत्यक्ष: दूसरे युगों में उसे मानना पड़ता होगा, इस युग में वह दिखायी देता है। फिर वह बात आती है जिससे इस प्रसंग का नाम बना है: कलि का एक पवित्र प्रताप है, कि मानसिक पुण्य तो होते हैं, पर पाप नहीं होते। टीका कोष्ठक लगाकर दूसरे को भी मानसिक पाप बताती है, और उस कोष्ठक के बिना बात अधूरी रह जाती है।

यह सीधा हिसाब नहीं है: मन का अच्छा भाव गिन लिया जाता है, बुरा छोड़ दिया जाता है। और जिस युग को अभी मैल का घर कहा गया, उसी की इस असमानता को पुनीत, पवित्र, कहा जा रहा है। जिसके पास करने को कुछ नहीं बचा, उसके पास सोचने को तब भी बचा रहता है। इस युग में सोचना आधा ही गिना जाता है, वह आधा जो उसके पक्ष में है।

जिस युग का कोई सानी नहीं

और अब वह बात, जिसमें यह सारा हिसाब एक वाक्य में बँधता है, और जिसके ठीक बाद एक नयी चीज़ आ जाती है।

यदि मनुष्य विश्वास करे तो कलियुग के समान दूसरा युग नहीं है। क्योंकि इसी युग में राम के निर्मल गुणसमूहों को गा-गाकर मनुष्य बिना ही परिश्रम संसार से तर जाता है। पूरा दावा एक शर्त पर टँगा है, और वह शर्त पहले ही शब्दों में है, यदि मनुष्य विश्वास करे। न तप माँगा गया, न सामग्री, न पात्रता। जिस युग में परिश्रम की छूट मिली, उसी में विश्वास अनिवार्य कर दिया गया। यह अदला-बदली ही इस बात की चाल है।

फिर धर्म के चार चरणों की बात आती है। मानस इतना ही कहता है कि धर्म के चार चरण प्रसिद्ध हैं और कलि में उनमें से एक प्रधान है। कौन-सा, यह नहीं बताता। टीका चारों को नाम देती है, सत्य, दया, तप और दान, और प्रधान चरण दान को बताती है। फिर वह बात आती है जिसमें सारी कठोरता ढीली पड़ जाती है: जिस किसी भी प्रकार से दिया जाये, दान कल्याण ही करता है।

यह छूट यज्ञ में नहीं मिलती, जहाँ विधि चूकी तो फल चूका। यहाँ विधि की शर्त ही उठा ली गयी है। और सत्य, दया और तप अकेले आदमी के भीतर पूरे हो सकते हैं, दान नहीं: उसमें दूसरा आदमी चाहिये। इस युग की पहचान थोड़ी देर बाद चारों ओर के विरोध से दी जायेगी। उसी के हिस्से धर्म का वह चरण आया है जो किसी दूसरे के हाथ तक पहुँचे बिना बनता ही नहीं।

युग बीतते कहाँ हैं

अब तक बात युगों की, यानी समय की, लगती है, जिस पर किसी का वश नहीं चलता। अगली ही बात यह पूरी समझ उलट देती है, और उसे देर भी नहीं लगती।

राम की माया से प्रेरित होकर सबके हृदयों में सभी युगों के धर्म नित्य होते रहते हैं। रोज़, और सबके भीतर। युग पंचांग पर नहीं, छाती के भीतर चल रहे हैं, और चारों एक साथ। जो आज सत्ययुग में है वह कल द्वापर में हो सकता है, और यह किसी तिथि से तय नहीं होगा। और कारण भी अपने हाथ का नहीं, राम की माया की प्रेरणा है: अपने भीतर का युग भी अपनी कमाई नहीं है।

फिर पहचान के लक्षण आते हैं, जैसे कोई वैद्य नाड़ी देखकर नाम बताता हो: शुद्ध सत्त्वगुण, समता, विज्ञान, और मन का प्रसन्न होना, इसे सत्ययुग का प्रभाव जानिये। पहले तीन बड़े शब्द हैं, जिन्हें सिद्ध होना पड़ता है। चौथा केवल एक मनोदशा है, जिसे कोई साधता नहीं।

त्रेता का लक्षण इसके बाद है: सत्त्व अधिक, रजोगुण कुछ, कर्मों में प्रीति, और सब प्रकार से सुख। द्वापर का उसके बाद: रजोगुण बहुत, सत्त्व बहुत थोड़ा, कुछ तमोगुण, और मन में हर्ष तथा भय। हर्ष और भय एक साथ रखे गये हैं। जिसके पास सुख है और जो जानता है कि वह चला भी जा सकता है, उसके मन में दोनों एक ही समय रहते हैं। यही द्वापर की पहचान है, और यह रोज़ की बात है।

और कलियुग: तमोगुण बहुत, रजोगुण थोड़ा, चारों ओर विरोध। सत्त्व का नाम ही नहीं। पर इसके तुरन्त बाद की बात इस निदान का कारण बता देती है। बुद्धिमान् लोग युगों के इस धर्म को मन में पहचानकर अधर्म छोड़ देते हैं और धर्म में प्रीति करते हैं। यह वर्णन रोने के लिये नहीं, पहचानने के लिये है, और पहचान का उपयोग यही है कि आदमी अपने भीतर का युग बदल सके। जिसे अभी माया की प्रेरणा कहा गया था, उसी के सामने अब एक दरवाज़ा खुल गया है।

जिसका राम के चरणों में अत्यन्त प्रेम है, उसे कालधर्म नहीं व्यापते। यह इस हिसाब की छूट है, और आगे की सारी कथा इसी के चारों ओर घूमती है। इसे समझाने की उपमा किसी शास्त्र से नहीं, किसी चौराहे से उठायी गयी है। नट का किया हुआ कपट देखनेवालों के लिये बड़ा विकट होता है, पर नट के सेवक को वही माया नहीं व्यापती।

उपमा की असली बात उसमें है जो कहा नहीं गया: सेवक चतुर नहीं बताया गया, न यह कि उसने खेल का भेद पकड़ लिया है। वह वही तमाशा देख रहा है जो सब देख रहे हैं। उस पर माया इसलिये नहीं चलती कि वह नट का आदमी है। बचाव जानकारी से नहीं, रिश्ते से है, और यही बात अभी चरणों के प्रेम के नाम से कही गयी थी।

और तभी बात मुड़ जाती है

अब वह जगह आती है जहाँ दो बातें दो अलग संसारों की हैं, और उनके बीच एक शब्द भी नहीं जोड़ा गया।

पहली बात अब तक का सब बाँध देती है: राम की माया के रचे हुए दोष और गुण, दोनों, उनके भजन बिना नहीं जाते। दोष का जाना समझ में आता है। गुण भी माया का बनाया हुआ है और उसे भी जाना है, यह सुनने में अटपटा लगता है, और यही इस बात की चोट है। जिसे आदमी अपनी कमाई समझकर सँभालता है, वह भी उसी दीवार के इसी तरफ़ का सामान है। इसीलिये भुशुण्डि आगे कहते हैं कि सब कामनाएँ छोड़कर राम का भजन कीजिये।

और फिर दूसरी बात, बिना भूमिका, बिना जोड़ने वाले वाक्य के। भुशुण्डि कहते हैं: “हे गरुड़, उस कलिकाल में मैं बहुत वर्षों तक अवध में रहा। वहाँ अकाल पड़ा, और तब मैं विपत्ति का मारा विदेश चला गया।” इस प्रसंग के आरम्भ से यहाँ तक यह पहला “मैं” है। अब तक सब कुछ बिना किसी के अपने ऊपर लिये कहा जा रहा था, युग, गुण, धर्म, माया, काल। यहाँ अचानक एक आदमी खड़ा हो जाता है और अपनी बात कहने लगता है।

और अपने विषय में उसकी पहली बात भूख है। अभी-अभी सब कामनाओं के त्याग की बात थी। अब एक आदमी इसलिये घर छोड़ रहा है कि खाने को नहीं बचा। भुशुण्डि दोनों को एक के बाद एक रख देते हैं और बीच में कुछ नहीं कहते। यह मोड़ खटकता है: जिस आदमी की कथा अभी शुरू हुई है, उसकी शुरुआत किसी साधना से नहीं, अकाल से हुई है।

उज्जैन, और वह ब्राह्मण

भुशुण्डि कहते हैं: “सुनिये, मैं दीन, मलिन, दरिद्र और दुखी होकर उज्जैन गया।” चार विशेषण, और चारों एक ही बात नहीं कहते: दीन दशा का नाम है, मलिन देह और मुख का, दरिद्र जेब का, और दुखी भीतर का। ऊपर से नीचे तक कुछ भी साबुत नहीं। और यह वही है जिसने अभी चारों युगों का हिसाब गिनाया था और कालधर्म से छूटने का नियम बताया था। अपनी कथा वह इसी हालत से शुरू करता है।

आगे की बात का क्रम याद रह जाता है। वे कहते हैं: “कुछ समय बीतने पर कुछ सम्पत्ति मिली, और तब वहीं मैं फिर शिव की सेवा करने लगा।” पूजा पहले नहीं आयी: पहले पेट भरा, फिर मन्दिर खुला। कहनेवाला अपने आरम्भ को सुन्दर बनाने की कोई कोशिश नहीं करता।

वहाँ एक ब्राह्मण थे जो वेद की विधि से सदा शिव की पूजा करते थे, और उन्हें दूसरा कोई काम नहीं था। वे परम साधु थे, परमार्थ के जानकार थे, शिव के उपासक थे, और हरि, यानी विष्णु, की निन्दा करनेवाले नहीं थे। इस परिचय की आख़िरी बात भारी है, और वह अकेली नकार में कही गयी है। यह अलग से कहने की बात तभी बनती है जब न कहने पर कुछ और समझ लिये जाने का डर हो। आगे का सारा झगड़ा इसी एक बात में रखा है, और अभी उसे कोई नहीं देख सकता।

भुशुण्डि कहते हैं: “मैं कपट सहित उनकी सेवा करता था।” सेवा हो रही है, नियम से हो रही है, दिखने में पूरी है, और भीतर कपट है। और उसके तुरन्त बाद ब्राह्मण का माप दोहरा दिया जाता है: वे बड़े दयालु थे और नीति के घर थे। दो आदमी आमने-सामने हैं, और दोनों का तौल साथ-साथ, बिना किसी टिप्पणी के।

फिर एक शब्द सब सँभाल लेता है। वे कहते हैं: “हे स्वामी, बाहर से नम्र देखकर ब्राह्मण मुझे पुत्र की भाँति पढ़ाते थे।” बाहर से: नम्रता ऊपरी थी, पर उसके बदले में जो मिला वह ऊपरी नहीं था। पुत्र की तरह पढ़ाया जाना घर के भीतर की जगह देना है। झूठी विनय के बदले सच्ची सन्तानता मिल गयी।

वे कहते हैं: “उन ब्राह्मणश्रेष्ठ ने मुझे शिव का मन्त्र दिया और अनेक प्रकार के शुभ उपदेश किये। मैं शिव के मन्दिर में जाकर मन्त्र जपता, और मेरे हृदय में दम्भ तथा अहंकार बढ़ते गये।” इन दोनों बातों के बीच न कोई “पर” है, न कोई “तथापि”। मन्त्र सही है, देनेवाला सही है, मन्दिर सही है, जप रोज़ हो रहा है, और आदमी बिगड़ता जा रहा है। दोनों बातें एक ही साँस में, मानो उनमें कोई विरोध ही न हो।

शिष्य और गुरु, दो चित्र

अब दो चित्र आते हैं, एक शिष्य का, एक गुरु का, और दोनों को आमने-सामने रखने से जो दिखता है वह किसी वर्णन से नहीं दिखता।

भुशुण्डि कहते हैं: “मैं दुष्ट था, मलिन बुद्धिवाला था, नीच जाति का था, और मोह के वश था। भगवान् के भक्तों और द्विजों को देखते ही जल उठता था और विष्णु से द्रोह करता था।” यह सब वह अपने विषय में बिना किसी सफ़ाई के कह रहा है। और देखते ही जल उठता था: इसमें कोई कारण नहीं, कोई घटना नहीं, कोई अपमान नहीं जिसका बदला बाक़ी हो। बस दिखायी देना काफ़ी था।

और यह वही आदमी है जो रोज़ शिव का मन्त्र जपता है, जिसके गुरु शिव के उपासक हैं और विष्णु की निन्दा नहीं करते। उसी गुरु के पास बैठकर जो सीखकर निकला वह द्वेष है, जो गुरु के पास था ही नहीं।

वे कहते हैं: “मेरे आचरण देखकर गुरु दुखी थे और मुझे नित्य समझाते थे, पर मुझे अत्यन्त क्रोध उठता था।” और फिर वह प्रश्न, जिस पर यह बात बन्द होती है: दम्भी को कभी नीति अच्छी लगती है? यह कथन नहीं, प्रश्न है, और पूछनेवाला कहनेवाला स्वयं है, अपने ही विषय में, बहुत बरसों बाद, जब उत्तर मिल चुका है और भोगा भी जा चुका है।

और एक शब्द, दुखी: गुरु क्रुद्ध नहीं, दुखी हैं। शिष्य को क्रोध आता है, गुरु को दुख होता है। दोनों एक ही आचरण देख रहे हैं: जो उसे कर रहा है उसे गुस्सा है, जो केवल देख रहा है उसे तकलीफ़।

गुरु की सीख, और शिष्य का जलना

एक बार गुरु ने बुलाकर बहुत प्रकार से नीति की शिक्षा दी। उस सारी शिक्षा का सार एक वाक्य में है: “हे पुत्र, शिव की सेवा का फल यही है कि राम के चरणों में प्रगाढ़ भक्ति हो।” यह कहते समय उन्होंने शिव को हटाया नहीं, सेवा को ग़लत नहीं कहा। केवल यह बताया कि वह सेवा किस ओर फल देती है। और यही एक वाक्य आगे की सारी आग जलाता है।

फिर गुरु और आगे जाते हैं: “हे तात, शिव और ब्रह्मा भी राम को भजते हैं, फिर नीच मनुष्य की बात ही कितनी है? जिनके चरणों के प्रेमी ब्रह्मा और शिव हैं, उनसे द्रोह करके, अरे अभागे, आप सुख चाहते हैं?” यहाँ पहली बार गुरु की वाणी कड़ी पड़ती है, पर शिष्य का इष्ट कहीं छोटा नहीं किया गया। गुरु उसे उसके देवता से हटाते नहीं। उसी देवता की आँख के साथ खड़ा कर देते हैं, जिधर वे स्वयं देखते हैं।

भुशुण्डि कहते हैं: “गुरु ने शिव को हरि का सेवक कहा, और यह सुनकर मेरा हृदय जल उठा।” आग एक शब्द पर लगी, सेवक। और फिर वह बात आती है जिसमें कहनेवाला अपनी सज़ा का नाम स्वयं ले लेता है, उस समय बिना जाने कि वह सज़ा का नाम है। “नीच जाति का मैं विद्या पाकर ऐसा हो गया, जैसे दूध पिलाने से साँप।”

यह उपमा किसी और ने नहीं दी। कहनेवाला, जो अब जानता है कि आगे क्या हुआ, इसे अपने ऊपर लगा रहा है। दूध पिलाया गया साँप विष नहीं छोड़ता, यह पुरानी बात है। पर यहाँ बात आगे जाती है: जो शब्द उसने अपने लिये चुना है, वही थोड़ी देर बाद आकाशवाणी के मुँह से निकलेगा। तब वह उपमा नहीं रहेगा, देह हो जायेगा। कथा का यह हिस्सा अपना अन्त पहले ही बोल चुका है।

आगे वह अपने ऊपर चार शब्द और लगाता है, अभिमानी, कुटिल, दुर्भाग्य और कुजाति, और कहता है कि दिन-रात गुरु से द्रोह करता रहा। उसी के बगल में गुरु का माप फिर रख दिया जाता है: वे अत्यन्त दयालु थे, उन्हें थोड़ा-सा भी क्रोध नहीं आता था। और वे बार-बार उत्तम ज्ञान की ही शिक्षा देते रहे। दोनों ओर एक ही काम लगातार हो रहा है, एक ओर द्रोह और दूसरी ओर सीख, और कोई पक्ष थकता नहीं।

नीच मनुष्य जिससे बड़ाई पाता है, वह सबसे पहले उसी को मारकर उसी का नाश करता है। और साथ में घर का चित्र: आग से उत्पन्न धुआँ मेघ की पदवी पाकर उसी आग को बुझा देता है। पदवी: धुएँ को ओहदा मिलता है, वह ऊपर उठकर बादल कहलाने लगता है। उस ओहदे का पहला उपयोग यही करता है कि नीचे लौटकर अपने जनक को बुझा दे।

फिर वही बात दुबारा कही जाती है। धूल रास्ते में निरादर से पड़ी रहती है और सबकी लातें सहती है। पर जब पवन उसे उठाता है तो वह पहले उसी पवन को भर देती है, और फिर राजाओं के नेत्रों और मुकुटों पर पड़ती है। पहले उसी को भर देती है: दोनों चित्रों में उठानेवाला पहला शिकार होता है। आग ने धुआँ दिया और आग बुझी। पवन ने धूल उठायी और पवन भर गया।

फिर निष्कर्ष, नीतिवाक्य की तरह: ऐसा समझकर बुद्धिमान् लोग अधम का संग नहीं करते। कवि और पण्डित यही नीति कहते हैं कि दुष्ट से न कलह अच्छा है, न प्रेम। उससे सदा उदासीन ही रहना चाहिये, और कुत्ते की तरह उसे दूर से ही छोड़ देना चाहिये। यह किसी शास्त्र-सभा में नहीं कहा जा रहा। एक आदमी अपने श्रोता से कह रहा है, बहुत बरसों बाद, और अगली ही बात बता देती है कि किसके विषय में।

वे अपनी ही नीति को अपने ऊपर मोड़ देते हैं: “मैं दुष्ट था, हृदय में कपट और कुटिलता थी। गुरु हित की बात कहते थे और मुझे वह सुहाती नहीं थी।” ऊपर की सारी नीति उसी के लिये है: धुआँ वही है, धूल वही है, दूर से छोड़ देने लायक कुत्ता भी वही। और वह अधम भी वही जिसका संग न करने की सलाह अभी दी गयी। जो अपनी कथा सुनाते हुए अपने लिये ये चारों चीज़ें चुनता है, वह सुननेवाले से कुछ छिपा नहीं रहा।

वह दिन, मन्दिर में

अब वह दिन आता है, बहुत थोड़े शब्दों में। जो होता है वह कोई काम नहीं, किसी काम का न होना है, और पूरा प्रसंग उसी न होने पर मुड़ जाता है।

भुशुण्डि कहते हैं: “एक दिन मैं शिव के मन्दिर में शिव का नाम जप रहा था। उसी समय गुरु वहाँ आये, और अभिमान के मारे मैंने उठकर प्रणाम नहीं किया।” इस वाक्य में एक चीज़ छोड़कर सब सही है: जगह, काम, नाम, समय। ग़लत केवल एक देह है जो बैठा रह गया। अपराध कोई वचन नहीं। इस पूरे प्रसंग में कहनेवाला गुरु के सामने एक शब्द भी नहीं बोलता। जो हुआ वह चुपचाप हुआ।

फिर दोनों ओर का हिसाब एक साथ हो जाता है: गुरु दयालु थे, उन्होंने कुछ नहीं कहा, उनके हृदय में लेशमात्र भी क्रोध नहीं हुआ। पर गुरु का अपमान बहुत बड़ा पाप है, और शिव उसे सह नहीं सके। जिसका अपमान हुआ उसने कुछ नहीं कहा। जिसका नहीं हुआ था वह चुप नहीं रह सका। और यह सब शिव के ही मन्दिर में, उन्हीं के नाम के जप के बीच, उन्हीं के उपासक के साथ हो रहा है।

आकाश से उतरी हुई आवाज़

मन्दिर में शिव की आकाशवाणी होती है। वह पहले तीन नाम लेती है, तीनों गाली की तरह, “अरे हतभाग्य, अज्ञ, अभिमानी”। फिर पहला काम यह करती है कि गुरु को बरी कर देती है। “यद्यपि आपके गुरु को क्रोध नहीं है, वे अत्यन्त कृपालु चित्त के हैं और उन्हें यथार्थ ज्ञान है…” शाप देने से पहले यह कह देना ज़रूरी था, नहीं तो आगे जो होता वह किसी की नाराज़गी का फल लगता।

और फिर कारण, जो क्रोध नहीं है: “…तो भी मैं आपको शाप दूँगा, क्योंकि नीति का विरोध मुझे अच्छा नहीं लगता। यदि मैं दण्ड न दूँ तो मेरा वेदमार्ग ही भ्रष्ट हो जाये।” अन्तिम वाक्य में जो बचाया जा रहा है वह किसी की प्रतिष्ठा नहीं, एक रास्ता है। शाप इसलिये दिया जा रहा है कि जिस मार्ग पर और लोग चलेंगे वह ठीक बना रहे। दण्ड यहाँ बदला नहीं, मरम्मत है, और देनेवाला अपने ही नियम के अधीन खड़ा है।

इसके बाद सामान्य विधान सुनाया जाता है: जो मूर्ख गुरु से ईर्ष्या करते हैं वे करोड़ों युगों तक रौरव नरक में पड़े रहते हैं। फिर वे तिर्यक् योनियों में शरीर धारण करते हैं और दस हज़ार जन्मों तक पीड़ा पाते हैं। यह सबके लिये कहा गया। और उसके तुरन्त बाद उस एक की बारी आती है।

शाप कहता है कि यह पापी गुरु के सामने अजगर की तरह बैठा रहा। इस दुष्ट की बुद्धि पाप से ढक गयी है, यह सर्प हो जाये। और अधम से भी अधम होकर, इस अधोगति को पाकर, किसी बड़े पेड़ के खोखले में जाकर रहे। शाप का हर टुकड़ा उसी अपराध से बना है: उठा नहीं गया था, इसलिये अब पैर ही नहीं रहेंगे। अजगर की तरह बैठा रह गया था, इसलिये अब वही जाति मिलेगी जो पड़ी रहती है। मन्दिर की जगह एक पेड़ का खोखला। और अन्तिम शब्द कोई बड़ी क्रिया नहीं, “रहे” है, पड़े रहना।

और वह शब्द भी यहीं लौट आता है जो कहनेवाला अपने लिये पहले ही चुन चुका था। उसने अपने को दूध पिलाया हुआ साँप कहा था, और अब उसे साँप हो जाने को कहा जा रहा है। उपमा देह बन रही है, और बीच में कुछ ही देर का फ़ासला है। जिसने अपने बारे में सच्ची बात कही थी, दण्ड ने वही बात उठाकर उसे पहना दी।

शिव का भयानक शाप सुनकर गुरु ने हाहाकार किया: हाहाकार करनेवाला वही है जिसका अपमान हुआ था। शिष्य के विषय में एक ही शब्द है, काँपता हुआ। और उसे काँपता देखकर गुरु के हृदय में बड़ा सन्ताप हुआ। सन्ताप अपने लिये नहीं उठा। उसका कारण शाप नहीं, काँपना है।

फिर वे नीचे झुक जाते हैं: प्रेमसहित दण्डवत् करके, शिव के सामने हाथ जोड़कर, दण्ड को भयंकर समझकर, गद्गद वाणी से वे विनती करने लगे। जिस आदमी को उस दिन प्रणाम नहीं मिला था, वह उसी दिन किसी और के लिये ज़मीन पर लेट गया। प्रसंग विनती के शुरू होने पर बन्द होता है, उसके पूरे होने पर नहीं। जो कहा जायेगा वह अगले प्रसंग में है।

न उठने का अनुपात

युगों के हिसाब और उज्जैन की कथा के बीच जोड़ लिखा नहीं गया, पर वह है। युग पंचांग पर नहीं, हृदय में चलते हैं, और कलियुग की पहचान चारों ओर का विरोध है। और दूसरे हिस्से का आदमी मन्दिर में शिव का मन्त्र जपते हुए भगवान् के भक्तों को देखते ही जल उठता है। बाहर से वह साधक है। भीतर का युग कुछ और चल रहा है।

दूसरी बात उस छूट की है: कालधर्म उसे नहीं व्यापते जिसका राम के चरणों में अत्यन्त प्रेम है। कहनेवाले के पास मन्त्र, गुरु, मन्दिर, नियम, विद्या और वर्षों का अभ्यास था। जो एक चीज़ नहीं थी, वही शर्त थी, और उसकी जगह ठीक उलटी चीज़ भरी थी, विष्णु से द्रोह।

तीसरी बात: यहाँ किसी आदमी का नाम नहीं। कहनेवाला अपना नाम नहीं बताता, सुननेवाले का नाम टीका में है, मानस में नहीं, और गुरु केवल गुरु, ब्राह्मण और द्विज है। नाम केवल दो जगहों के हैं, अवध और उज्जैन, और उनके जिनकी पूजा हो रही है।

जो हुआ उसका माप बहुत छोटा है, एक आदमी बैठा रहा और खड़ा नहीं हुआ। और बदले में आया बहुत बड़ा है, करोड़ों युग, दस हज़ार जन्म, और एक पेड़ का खोखला। कथा इस अनुपात को ठीक करने की कोशिश नहीं करती। केवल दिखा देती है कि जो देह बैठा रह गया था, उसके भीतर बहुत दिनों से क्या पक रहा था।

और आख़िर में वह चित्र, जिस पर यह प्रसंग बन्द होता है। मन्दिर में तीन हैं: एक वह जिसने अपमान किया और अब काँप रहा है। एक वह जिसकी आवाज़ अभी आकाश से उतरी है। और एक वह जिसका अपमान हुआ था, जो ज़मीन पर लेटा है, हाथ जोड़े, गला भर आने के कारण ठीक से बोल भी नहीं पा रहा। और जिसके लिये वह बोल रहा है वह वही है जिसने उसे प्रणाम नहीं किया था।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, उत्तरकाण्ड, दोहा 103 से 107, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।