रामचरितमानस · उत्तरकाण्ड · कलि का एक पुनीत प्रताप, और गुरु का अपमान
कलि का एक पुनीत प्रताप, और गुरु का अपमान
चार युगों के चार उपाय गिनाकर कहनेवाला कलियुग को सबसे सस्ता युग ठहरा देता है, और अगले ही आधे दोहे में बात युग से हटकर अपने ऊपर आ जाती है: अकाल, उज्जैन, एक ब्राह्मण गुरु, और शिव के मन्दिर में वह प्रणाम जो नहीं किया गया।
यह पन्ना दो हिस्सों का है और दोनों के बीच कोई पुल नहीं बनाया गया। पहले हिस्से में एक तर्क है, ठंडा और गिना हुआ, कि किस युग में किस उपाय से आदमी पार होता है, और उन चारों में सबसे सस्ता उपाय किस युग के हिस्से आया है। दूसरे हिस्से में एक आदमी की कथा है जिसके पास वही सस्ता उपाय था और जिसने उसे पकड़ा नहीं। बीच में जो जोड़ है वह एक ही दोहे के दो आधों का जोड़ है, और दूसरे आधे में बात इतनी अचानक मुड़ती है कि पढ़नेवाला एक बार रुककर पीछे देखता है कि कहीं कोई पंक्ति छूट तो नहीं गयी।
पाँच दोहों की यह कथा उसी लम्बी बातचीत का हिस्सा है जो उत्तरकाण्ड भर चलती है। इन पंक्तियों में कोई अपना नाम नहीं बताता। कहनेवाला केवल मैं कहता है। सुननेवाले को उरगारी, खगराया, खगनाथ, बिहगेस और खगपति कहकर पुकारा जाता है, और पोद्दार की टीका उसे गरुड़ बताती है। जिस ब्राह्मण के चारों ओर आधा पन्ना घूमता है, वह आदि से अन्त तक केवल बिप्र, द्विज और गुर है। दो ही नाम इस पन्ने पर पड़े हैं और दोनों जगहों के हैं, अवध और उजेनी।
और यह ध्यान में रखने की बात है कि यह तुलसीदास का रामचरितमानस है, वाल्मीकि की रामायण नहीं। वहाँ यह बातचीत नहीं है, यह वक्ता नहीं है, और उज्जैन का यह ब्राह्मण नहीं है। जो आगे पढ़ा जायेगा वह अवधी का है, और उसका ढंग अपना है: पहले सिद्धान्त, और उसके तुरन्त बाद उसी सिद्धान्त की चीर-फाड़, अपने ही ऊपर, बिना किसी रियायत के।
इस प्रसंग के मुख्य किरदार
- कहनेवाला वह जो यह सारी कथा सुना रहा है। इन पंक्तियों में वह अपना नाम नहीं लेता, और आधे पन्ने के बाद वही अपनी कथा का सबसे बुरा आदमी निकलता है।
- गरुड़ सुननेवाले, जिन्हें पद्य में उरगारी, खगराया, खगनाथ, बिहगेस, खगपति और गोसाईं कहकर पुकारा जाता है। यह नाम टीका देती है, पद्य नहीं।
- वह ब्राह्मण उज्जैन का एक वैदिक शिव-उपासक, परम साधु, परमार्थ का जानकार, जो कहनेवाले को पुत्र की तरह पढ़ाता है और अन्त में उसी के लिये गिड़गिड़ाता है।
- महेश जिनके मन्दिर में यह सब होता है, जिनका मन्त्र रोज़ जपा जाता है, और जिनकी आवाज़ आकाश से उतरकर शाप देती है।
- राम जिनका नाम इस पन्ने के पहले हिस्से का पूरा तर्क है, और जिनके भक्तों को देखकर दूसरे हिस्से का आदमी जल उठता है।
चार युग, चार उपाय
पिछला प्रसंग कलियुग के अवगुण गिनाते-गिनाते एक विचित्र जगह पर आकर रुका था, कि जिस युग में सबसे अधिक मैल है, उसी में बिना परिश्रम छुटकारा भी है। यह प्रसंग वहीं से उठता है, और उठते ही वह काम करता है जो पूरे पन्ने का ढाँचा तय कर देता है। वह चारों युगों को एक-एक पंक्ति देकर गिना देता है, और गिनाते समय एक भी शब्द तारीफ़ का नहीं लगाता। यह कथा नहीं है, यह हिसाब है, और हिसाब पढ़ने का मज़ा तब आता है जब यह दिखायी देने लगे कि जोड़ किस ओर झुक रहा है।
पहली ही चौपाई में दो युग निपट जाते हैं, और दोनों को बराबर जगह मिलती है, एक-एक अर्धाली।
कृतजुग सब जोगी बिग्यानी। करि हरि ध्यान तरहिं भव प्रानी॥
चौपाई १
त्रेताँ बिबिध जग्य नर करहीं । प्रभुहि समर्पि कर्म भव तरहीं॥
सत्ययुग में सब योगी और विज्ञानी होते हैं, और हरि का ध्यान करके प्राणी भवसागर से तर जाते हैं। त्रेता में मनुष्य अनेक प्रकार के यज्ञ करते हैं, और कर्म को प्रभु के समर्पण करके पार हो जाते हैं। ध्यान दीजिये कि त्रेता की पंक्ति में जो शब्द असल में काम कर रहा है वह यज्ञ नहीं है, प्रभुहि समर्पि है। यज्ञ अपने आप किसी को नहीं तारता। तारता वह है जो यज्ञ के बाद किया जाता है, कि जो किया उसे अपने खाते से हटा दिया जाये। तुलसी एक ही अर्धाली में क्रिया और उस क्रिया का त्याग, दोनों रख देते हैं।
अगली दो अर्धालियों में शेष दो युग आते हैं, और उन्हीं में इस पूरे हिसाब की चोटी है।
द्वापर करि रघुपति पद पूजा। नर भव तरहिं उपाय न दूजा॥
चौपाई २
कलिजुग केवल हरि गुन गाहा । गावत नर पावहिं भव थाहा॥
द्वापर में श्रीरघुनाथ के चरणों की पूजा करके मनुष्य संसार से तर जाता है, और दूसरा कोई उपाय नहीं है। और कलियुग में केवल हरि की गुणगाथा गाने से मनुष्य भवसागर की थाह पा जाते हैं। अब चारों को एक साथ रखकर देखिये। ध्यान, यज्ञ, पूजा, गान। पहला भीतर का अभ्यास है और उसमें बरसों लगते हैं। दूसरे में सामग्री चाहिये, ऋत्विज चाहिये, भूमि चाहिये, समय चाहिये। तीसरे में एक स्थान चाहिये और एक विधि। चौथे में केवल एक मुँह चाहिये। जैसे-जैसे युग उतरता है, उपाय सस्ता होता जाता है, और यही इस पूरे हिसाब का जोड़ है।
और एक शब्द और है जिस पर रुकना बनता है। पहले तीन युगों में क्रिया एक ही रखी गयी है, तरना। कलियुग में क्रिया बदल जाती है, थाह पाना। तरने के लिये नाव चाहिये, दूसरा किनारा चाहिये, और बीच का सारा पानी पार करना पड़ता है। थाह पाने का अर्थ है कि पैर नीचे लग गये, कि जल उतना गहरा था ही नहीं जितना दिखता था। एक ही चौपाई के भीतर संसार का नाप बदल दिया गया है, और बदलनेवाला यह बताता भी नहीं कि उसने ऐसा किया।
इसके बाद जो चौपाई आती है वह बात को और कस देती है। कलियुग में न योग है, न यज्ञ, न ज्ञान; श्रीराम का गुणगान ही एकमात्र आधार है। और फिर दो शर्तें रख दी जाती हैं, और दोनों बाहर की नहीं हैं। पहली, सब भरोस तजि, सारे भरोसे छोड़कर। दूसरी, प्रेम समेत, प्रेम सहित। यानी जिस उपाय को अभी सबसे सस्ता बताया गया, उसकी कीमत गिनाने का ढंग बदल दिया गया है। सामग्री कुछ नहीं लगती, पर कहीं और टिका हुआ मन लेकर यह काम नहीं होगा।
सोइ भव तर कछु संसय नाहीं । नाम प्रताप प्रगट कलि माहीं॥
चौपाई ३
कलि कर एक पुनीत प्रतापा। मानस पुन्य होहिं नहिं पापा॥
वही भवसागर से तर जाता है, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं, और नाम का प्रताप कलियुग में प्रत्यक्ष है। प्रगट, यही शब्द रखा गया है। दूसरे युगों में उसे मानना पड़ता होगा, इस युग में वह दिखायी देता है। और उसके बाद वह अर्धाली आती है जिससे इस प्रसंग का नाम बना है। कलि का एक पवित्र प्रताप है, कि मानसिक पुण्य तो होते हैं, पर पाप नहीं होते। टीका कोष्ठक लगाकर दूसरे को भी मानसिक पाप बताती है, और उस कोष्ठक के बिना पंक्ति अधूरी रह जाती है।
इस हिसाब को ज़रा ठहरकर देखिये, क्योंकि यह सीधा हिसाब नहीं है। मन में उठा हुआ अच्छा भाव गिन लिया जाता है, और मन में उठा हुआ बुरा भाव छोड़ दिया जाता है। तराजू के दोनों पलड़े एक ही तरह नहीं तौलते। और जिस युग को अभी-अभी मैल का घर कहा जा चुका है, उसी की इस असमानता को पुनीत कहा जा रहा है, पवित्र। जिस आदमी के पास करने को कुछ नहीं बचा, उसके पास सोचने को तब भी बचा रहता है; और इस युग में सोचना आधा ही गिना जाता है, वह आधा जो उसके पक्ष में है।
सार: कृतयुग में ध्यान, त्रेता में यज्ञ और कर्म का समर्पण, द्वापर में रघुनाथ के चरणों की पूजा, और कलियुग में केवल हरि की गुणगाथा, यही चार उपाय गिनाये जाते हैं। कलि में योग, यज्ञ और ज्ञान नहीं बचे, एक ही आधार है, और उसकी दो शर्तें हैं, सब भरोसे छोड़ना और प्रेम सहित गाना। नाम का प्रताप इस युग में प्रत्यक्ष है, और कलि का एक पुनीत प्रताप यह है कि मानसिक पुण्य होते हैं, पाप नहीं।
जिस युग का कोई सानी नहीं
और अब वह दोहा, जिसमें यह सारा हिसाब एक वाक्य में बाँध दिया जाता है, और जिसके दूसरे आधे में एक बिलकुल नयी चीज़ आ जाती है।
कलिजुग सम जुग आन नहिं जौं नर कर बिस्वास।
दोहा १०३ (क, ख)
गाइ राम गुन गन बिमल भव तर बिनहिं प्रयास॥ १०३ (क)॥
प्रगट चारि पद धर्म के कलि महुँ एक प्रधान।
जेन केन बिधि दीन्हें दान करइ कल्यान॥ १०३ (ख)॥
यदि मनुष्य विश्वास करे तो कलियुग के समान दूसरा युग नहीं है, क्योंकि इसी युग में श्रीराम के निर्मल गुणसमूहों को गा-गाकर मनुष्य बिना ही परिश्रम संसार से तर जाता है। पूरा दावा एक शर्त पर टँगा हुआ है, और वह शर्त पहली ही पंक्ति में रख दी गयी है, जौं नर कर बिस्वास। कोई तप नहीं माँगा गया, कोई सामग्री नहीं माँगी गयी, कोई पात्रता नहीं माँगी गयी। जिस युग में परिश्रम की छूट दी गयी, उसी में विश्वास अनिवार्य कर दिया गया, और यह अदला-बदली इस दोहे की पूरी चाल है।
दूसरे आधे दोहे में धर्म के चार चरणों की बात आती है। पद्य इतना ही कहता है कि धर्म के चार चरण प्रसिद्ध हैं और कलि में उनमें से एक ही प्रधान है। कौन-सा, यह पद्य नहीं बताता। टीका चारों को नाम देती है, सत्य, दया, तप और दान, और प्रधान चरण दान को बताती है। और उसके बाद वह अर्धाली आती है जिसमें सारी कठोरता ढीली पड़ जाती है, जेन केन बिधि दीन्हें, जिस किसी भी प्रकार से दिया जाय, दान कल्याण ही करता है।
यह छूट यज्ञ में कभी नहीं मिलती। वहाँ विधि चूकी तो फल चूका, और विधि बड़ी लम्बी होती है। यहाँ विधि की शर्त ही उठा ली गयी है और केवल देना बचा है। और इन चार चरणों में एक बात और देखने की है। सत्य, दया और तप, तीनों अकेले आदमी के भीतर पूरे हो सकते हैं; उनके लिये किसी दूसरे का होना ज़रूरी नहीं। दान अकेले पूरा नहीं होता। उसमें दूसरा आदमी चाहिये, वरना वह दान रहता ही नहीं। जिस युग का परिचय थोड़ी देर बाद चारों ओर के वैर-विरोध से दिया जायेगा, उसी के हिस्से धर्म का वही चरण आया है जो किसी दूसरे के हाथ तक पहुँचे बिना बनता ही नहीं।
सार: दोहा कहता है कि यदि मनुष्य विश्वास करे तो कलियुग के समान कोई युग नहीं, क्योंकि यहाँ राम के निर्मल गुण गाकर बिना परिश्रम पार हुआ जाता है। दूसरे आधे में धर्म के चार चरणों में से एक को कलि में प्रधान बताया गया है; टीका उन चारों को सत्य, दया, तप और दान बताती है और प्रधान चरण दान को, जो जिस किसी प्रकार से भी दिया जाय, कल्याण ही करता है।
युग बीतते कहाँ हैं
यहाँ तक पढ़कर लगता है कि बात युगों की है, यानी समय की, यानी उस चीज़ की जिस पर किसी का वश नहीं चलता। अगली चौपाई यह पूरी समझ उलट देती है, और उलटने में उसे दो अर्धालियाँ भी नहीं लगतीं।
नित जुग धर्म होहिं सब केरे । हृदयँ राम माया के प्रेरे॥
चौपाई ४
सुद्ध सत्व समता बिग्याना। कृत प्रभाव प्रसन्न मन जाना॥
श्रीराम की माया से प्रेरित होकर सबके हृदयों में सभी युगों के धर्म नित्य होते रहते हैं। नित, रोज़। सब केरे, सबके भीतर। यानी युग पंचांग पर नहीं बीत रहे, वे छाती के भीतर चल रहे हैं, और चारों एक साथ चल रहे हैं। जो आदमी आज सत्ययुग में है वह कल द्वापर में हो सकता है, और यह किसी तिथि से तय नहीं होगा। और जो कारण बताया गया है वह भी अपने हाथ का नहीं है, राम माया के प्रेरे। अपने भीतर का युग भी अपनी कमाई नहीं है।
और फिर पहचान के लक्षण गिनाये जाते हैं, जैसे कोई वैद्य नाड़ी देखकर नाम बताता हो। शुद्ध सत्त्वगुण, समता, विज्ञान, और मन का प्रसन्न होना, इसे सत्ययुग का प्रभाव जानिये। इन चारों में चौथा सबसे अनोखा है। पहले तीन बड़े शब्द हैं और उन्हें सिद्ध होना पड़ता है। चौथा केवल एक मनोदशा है, और उसे कोई साधता नहीं। किसी आदमी के भीतर कौन-सा युग चल रहा है, इसका एक हिस्सा इसी बात से नापा जा रहा है कि उसका मन प्रसन्न है या नहीं।
त्रेता का नुस्खा इसके बाद है, सत्त्व अधिक हो, रजोगुण कुछ हो, कर्मों में प्रीति हो, और सब प्रकार से सुख हो। द्वापर का उसके बाद, रजोगुण बहुत, सत्त्व बहुत थोड़ा, कुछ तमोगुण, और मन में हर्ष तथा भय। इस अन्तिम जोड़े पर रुकिये। हर्ष और भय एक साथ रखे गये हैं, अलग-अलग नहीं गिनाये गये। जिसके पास सुख है और जो जानता है कि वह सुख चला भी जा सकता है, उसके मन में दोनों एक ही समय रहते हैं। यही द्वापर की पहचान बना दी गयी है, और इसमें कुछ भी असाधारण नहीं है, यह रोज़ की बात है।
और कलियुग, तमोगुण बहुत, रजोगुण थोड़ा, चारों ओर विरोध। यहाँ सत्त्व का नाम ही नहीं लिया गया। पर इसके तुरन्त बाद जो अर्धाली आती है वह इस पूरे निदान का कारण बता देती है। बुद्धिमान् लोग युगों के इस धर्म को मन में पहचानकर अधर्म छोड़ देते हैं और धर्म में प्रीति करते हैं। यानी यह वर्णन रोने के लिये नहीं दिया गया, पहचानने के लिये दिया गया है; और पहचान का उपयोग यही है कि आदमी अपने भीतर का युग बदल सके। जिस चीज़ को अभी माया की प्रेरणा कहा गया था, उसी के सामने अगली ही साँस में एक दरवाज़ा खोल दिया गया है।
काल धर्म नहिं ब्यापहिं ताही । रघुपति चरन प्रीति अति जाही॥
चौपाई ५
नट कृत बिकट कपट खगराया। नट सेवकहि न ब्यापइ माया॥
जिसका श्रीरघुनाथ के चरणों में अत्यन्त प्रेम है, उसको कालधर्म नहीं व्यापते। यह इस पूरे पन्ने की इकलौती छूट है, और आगे की सारी कथा इसी छूट के चारों ओर घूमती है। और इसे समझाने के लिये जो उपमा लायी गयी है वह किसी शास्त्र से नहीं, किसी चौराहे से उठायी गयी है। नट का किया हुआ कपट देखनेवालों के लिये बड़ा विकट होता है, पर नट के सेवक को वही माया नहीं व्यापती।
इस उपमा की असली बात उसमें है जो इसमें कहा नहीं गया। यह नहीं कहा गया कि सेवक चतुर है। यह नहीं कहा गया कि उसने खेल का भेद पकड़ लिया है। सेवक वही तमाशा देख रहा है जो बाकी सब देख रहे हैं, उतने ही पास से, बल्कि सबसे पास से। उस पर माया इसलिये नहीं चलती कि वह नट का आदमी है। जानकारी से नहीं, रिश्ते से बचाव हो रहा है, और यह ठीक वही बात है जो पहली अर्धाली में चरणों के प्रेम के नाम से कही गयी थी। भीड़ और सेवक के बीच का फ़ासला ज्ञान का नहीं, नौकरी का है।
सार: सब युगों के धर्म सबके हृदय में नित्य चलते रहते हैं, राम की माया से प्रेरित होकर। शुद्ध सत्त्व, समता, विज्ञान और प्रसन्न मन कृतयुग है; अधिक सत्त्व, कुछ रज, कर्मों में प्रीति और सुख त्रेता; बहुत रज, थोड़ा सत्त्व, कुछ तम, और हर्ष तथा भय द्वापर; और बहुत तम, थोड़ा रज और चारों ओर विरोध कलियुग। बुद्धिमान् इसे पहचानकर अधर्म छोड़ देते हैं। जिसका रघुनाथ के चरणों में अत्यन्त प्रेम है उसे कालधर्म नहीं व्यापते, जैसे नट की माया उसके अपने सेवक को नहीं व्यापती।
और तभी बात मुड़ जाती है
अब वह दोहा आता है जिसके दो आधे दो अलग-अलग संसारों के हैं, और जिनके बीच में तुलसी एक शब्द भी नहीं जोड़ते।
हरि माया कृत दोष गुन बिनु हरि भजन न जाहिं।
दोहा १०४ (क, ख)
भजिअ राम तजि काम सब अस बिचारि मन माहिं॥ १०४ (क)॥
तेहिं कलिकाल बरष बहु बसेउँ अवध बिहगेस।
परेउ दुकाल बिपति बस तब मैं गयउँ बिदेस॥ १०४ (ख)॥
पहला आधा अब तक की बात को बाँध देता है। श्रीहरि की माया के रचे हुए दोष और गुण, दोनों, हरि के भजन बिना नहीं जाते। दोष का जाना तो समझ में आता है। गुण भी माया का बनाया हुआ है और उसे भी जाना है, यह सुनने में अटपटा लगता है, और यही इस पंक्ति की चोट है। जिसे आदमी अपनी कमाई समझकर सँभालकर रखता है, वह भी उसी दीवार के इसी तरफ़ का सामान है। इसीलिये अगली ही अर्धाली में कहा जाता है कि सब कामनाएँ छोड़कर राम का भजन कीजिये।
और फिर दूसरा आधा दोहा आता है, और उसमें न कोई भूमिका है, न कोई जोड़ने वाला वाक्य। हे पक्षिराज, उस कलिकाल में मैं बहुत वर्षों तक अवध में रहा; वहाँ अकाल पड़ा, और तब मैं विपत्ति का मारा विदेश चला गया। इस पन्ने पर यह पहला मैं है। अब तक सब कुछ बिना किसी के अपने ऊपर लिये कहा जा रहा था, युग, गुण, धर्म, माया, काल। यहाँ अचानक एक आदमी खड़ा हो जाता है और अपनी बात कहने लगता है।
और जो पहली बात वह अपने विषय में कहता है, वह भूख है। ऊपर की अर्धाली में सब कामनाओं के त्याग की बात कही गयी थी; नीचे की अर्धाली में एक आदमी इसलिये घर छोड़ रहा है कि खाने को नहीं बचा। तुलसी इन दोनों को एक ही दोहे में, एक के नीचे एक, रख देते हैं और बीच में कुछ नहीं कहते। यह मोड़ खटकता है, और खटकना इसका अपना है। जिस आदमी की कथा अभी शुरू हुई है, उसकी शुरुआत किसी साधना से नहीं हुई, अकाल से हुई है।
सार: दोहे का पहला आधा कहता है कि माया के रचे दोष और गुण दोनों हरि के भजन बिना नहीं जाते, इसलिये सब कामनाएँ छोड़कर राम का भजन करना चाहिये। और दूसरे आधे में बिना किसी भूमिका के कहनेवाला अपनी कथा शुरू कर देता है, कि उसी कलिकाल में वह बहुत वर्षों तक अवध में रहा, वहाँ अकाल पड़ा, और वह विपत्ति का मारा विदेश चला गया।
उजेनी, और वह ब्राह्मण
गयउँ उजेनी सुनु उरगारी । दीन मलीन दरिद्र दुखारी॥
चौपाई ६
गएँ काल कछु संपति पाई । तहँ पुनि करउँ संभु सेवकाई॥
हे सर्पों के शत्रु, सुनिये। मैं दीन, मलिन, दरिद्र और दुखी होकर उज्जैन गया। चार विशेषण एक साथ रखे गये हैं और वे चारों एक ही बात नहीं कहते। दीन दशा का नाम है, मलिन देह और मुख का, दरिद्र जेब का, और दुखारी भीतर का। ऊपर से नीचे तक कुछ भी साबुत नहीं बचा है। और यह वही आदमी है जिसने अभी-अभी चारों युगों का हिसाब गिनाया था और कालधर्म से छूट पाने का नियम बताया था; अपनी कथा वह इसी हालत से शुरू करता है।
अगली अर्धाली में जो क्रम है, उसे उलटकर पढ़ने का मन करता है, और इसीलिये वह याद रह जाता है। कुछ समय बीतने पर कुछ सम्पत्ति मिली, और तब वहीं फिर शंकर की सेवा करने लगा। पूजा पहले नहीं आयी। पहले पेट भरा, फिर मन्दिर खुला। भूख के बीचोंबीच कोई भक्ति नहीं जगायी जाती, और इस पूरी कथा की सबसे ईमानदार पंक्तियों में यह एक है। कहनेवाला अपने आरम्भ को सुन्दर बनाने की कोई कोशिश नहीं करता।
बिप्र एक बैदिक सिव पूजा। करइ सदा तेहि काजु न दूजा॥
चौपाई ७
परम साधु परमारथ बिंदक। संभु उपासक नहिं हरि निंदक॥
एक ब्राह्मण थे जो वेद की विधि से सदा शिव की पूजा करते थे, और उन्हें दूसरा कोई काम नहीं था। वे परम साधु थे, परमार्थ के जानकार थे, शम्भु के उपासक थे, और श्रीहरि की निन्दा करनेवाले नहीं थे। इस परिचय की चार बातों में सबसे भारी आख़िरी है, और वह अकेली नकार में कही गयी है। शिव के उपासक थे, और हरि की निन्दा नहीं करते थे। यह अलग से कहने की बात तभी बनती है जब न कहने पर कुछ और समझ लिये जाने का डर हो। आगे का सारा झगड़ा इसी आधी पंक्ति में रखा हुआ है, और अभी उसे कोई नहीं देख सकता।
तेहि सेवउँ मैं कपट समेता । द्विज दयाल अति नीति निकेता॥
चौपाई ८
बाहिज नम्र देखि मोहि साईं । बिप्र पढ़ाव पुत्र की नाईं॥
मैं कपट सहित उनकी सेवा करता था। इस पन्ने पर और कोई पंक्ति इस तरह नहीं लिखी गयी। सेवा हो रही है, नियम से हो रही है, दिखने में पूरी है, और भीतर कपट है। और उसके तुरन्त बाद ब्राह्मण का माप दोहरा दिया जाता है, कि वे बड़े दयालु थे और नीति के घर थे। दो आदमी आमने-सामने हैं और दोनों का तौल एक ही चौपाई में दे दिया गया है, बिना किसी टिप्पणी के।
फिर वह अर्धाली आती है जिसमें एक शब्द सब सँभाले हुए है। हे स्वामी, बाहर से नम्र देखकर ब्राह्मण मुझे पुत्र की भाँति पढ़ाते थे। बाहिज, बाहर से। कहनेवाला अपनी कथा में यह छिपाता नहीं कि जो दिखता था वह ऊपर-ऊपर का था। और उस ऊपरी नम्रता के बदले में जो मिला, वह ऊपरी नहीं था। पुत्र की तरह पढ़ाया जाना कोई शिष्टाचार नहीं होता, वह एक जगह देना होता है, घर के भीतर की जगह। झूठी विनय के बदले सच्ची सन्तानता मिल गयी, और इस कथा का सबसे बड़ा असन्तुलन यहीं बैठा हुआ है।
संभु मंत्र मोहि द्विजबर दीन्हा । सुभ उपदेस बिबिध बिधि कीन्हा॥
चौपाई ९
जपउँ मंत्र सिव मंदिर जाई । हृदयँ दंभ अहमिति अधिकाई॥
उन ब्राह्मणश्रेष्ठ ने मुझको शिव का मन्त्र दिया और अनेक प्रकार के शुभ उपदेश किये। मैं शिव के मन्दिर में जाकर मन्त्र जपता, और मेरे हृदय में दम्भ तथा अहंकार बढ़ते गये। इन दोनों अर्धालियों के बीच कोई पर नहीं है, कोई तदपि नहीं है। मन्त्र सही है, देनेवाला सही है, मन्दिर सही है, जप रोज़ हो रहा है, और आदमी बिगड़ता जा रहा है। दोनों बातें एक ही साँस में कह दी गयी हैं, मानो उनमें कोई विरोध ही न हो; और यह पूरे प्रसंग की सबसे बेचैन करनेवाली बात है।
सार: अकाल से निकलकर वह दीन, मलिन, दरिद्र और दुखी होकर उज्जैन पहुँचता है, कुछ समय बाद कुछ सम्पत्ति पाता है, और तब वहीं शंकर की सेवा करने लगता है। वहाँ एक ब्राह्मण हैं, वेदविधि से शिव के उपासक, परम साधु, और हरि की निन्दा न करनेवाले। उनकी सेवा वह कपट सहित करता है; ब्राह्मण उसे बाहर से नम्र देखकर पुत्र की तरह पढ़ाते हैं, शिव का मन्त्र देते हैं, और उसी जप के साथ-साथ उसके हृदय में दम्भ और अहंकार बढ़ते जाते हैं।
दो आधे, दो चित्र
अब दो आधे दोहे आते हैं और दोनों में एक-एक चित्र है। पहला शिष्य का है और दूसरा गुरु का, और दोनों को आमने-सामने रख देने से जो दिखता है, वह किसी वर्णन से नहीं दिखता।
मैं खल मल संकुल मति नीच जाति बस मोह।
दोहा १०५ (क)
हरिजन द्विज देखें जरउँ करउँ बिष्नु कर द्रोह॥ १०५ (क)॥
मैं दुष्ट था, मलिन बुद्धिवाला था, नीच जाति का था, और मोह के वश था; हरि के भक्तों और द्विजों को देखते ही जल उठता था और विष्णु से द्रोह करता था। अपने विषय में यह सब वही आदमी कह रहा है, और बिना किसी सफ़ाई के कह रहा है। और देखें जरउँ पर रुकिये, देखते ही जल उठता था। इसमें कोई कारण नहीं है, कोई घटना नहीं है, कोई अपमान नहीं है जो सहा गया हो और जिसका बदला बाकी हो। बस दिखायी देना काफ़ी था।
और यह वही आदमी है जो रोज़ शिव का मन्त्र जपता है, जिसके गुरु शिव के उपासक हैं और हरि की निन्दा नहीं करते। उसी गुरु से उसने मन्त्र लिया, उसी के पास बैठकर पढ़ा, और जो सीखकर निकला वह द्वेष है, जो गुरु के पास था ही नहीं। घर में जो चीज़ नहीं थी, वह उसी घर से उठकर आ गयी, और यह इस कथा का दूसरा असन्तुलन है।
गुर नित मोहि प्रबोध दुखित देखि आचरन मम।
सोरठा १०५ (ख)
मोहि उपजइ अति क्रोध दंभिहि नीति कि भावई॥ १०५ (ख)॥
गुरुजी मेरे आचरण देखकर दुखी थे और मुझे नित्य समझाते थे, पर मुझे अत्यन्त क्रोध उठता था। और फिर वह प्रश्न, जिस पर यह सोरठा बन्द होता है, कि दम्भी को कभी नीति अच्छी लगती है। ध्यान दीजिये कि यह वाक्य कथन नहीं है, प्रश्न है, और पूछनेवाला कोई तीसरा नहीं है। कहनेवाला अपने ही विषय में यह प्रश्न पूछ रहा है, बहुत बरसों बाद, जब उत्तर मिल चुका है और भोगा भी जा चुका है।
और एक शब्द और है जिस पर पूरा चित्र टिका हुआ है, दुखित। गुरु क्रुद्ध नहीं हैं, दुखी हैं। इस पूरे प्रसंग में एक ही आदमी है जो लगातार दुख में रहता है, और वह वही है जिसका अपना कुछ भी नहीं बिगड़ रहा। शिष्य को क्रोध आता है, गुरु को दुख होता है, और दोनों एक ही आचरण देख रहे हैं। जो उसे कर रहा है उसे गुस्सा है, और जो उसे केवल देख रहा है उसे तकलीफ़ है।
सार: दोहे में वह अपने को दुष्ट, मलिन बुद्धिवाला, नीच जाति का और मोहवश बताता है, जो हरि के भक्तों और द्विजों को देखकर जल उठता था और विष्णु से द्रोह करता था। सोरठे में गुरु का चित्र है, जो उसका आचरण देखकर दुखी रहते और नित्य समझाते थे, जिस पर उसे क्रोध ही उठता था; और अन्त में वही प्रश्न कि दम्भी को नीति कब अच्छी लगी है।
गुरु की सीख, और शिष्य का जलना
एक बार गुरु ने बुलाकर बहुत प्रकार से नीति की शिक्षा दी, और उस सारी शिक्षा का सार एक ही अर्धाली में है, कि हे पुत्र, शिव की सेवा का फल यही है कि श्रीराम के चरणों में प्रगाढ़ भक्ति हो। यह कहते समय उन्होंने शिव को हटाया नहीं। उन्होंने सेवा को गलत नहीं कहा। उन्होंने केवल यह बताया कि वह सेवा किस ओर फल देती है। और यही एक वाक्य आगे की सारी आग जलाता है।
फिर वे और आगे जाते हैं। हे तात, शिव और ब्रह्मा भी राम को भजते हैं, फिर नीच मनुष्य की बात ही कितनी है। और उसके बाद वह पंक्ति जिसमें पहली बार गुरु की वाणी कड़ी पड़ती है, कि जिनके चरणों के प्रेमी ब्रह्मा और शिव हैं, उनसे द्रोह करके, अरे अभागे, सुख चाहता है। पूरे उपदेश की चाल यह है कि इसमें शिष्य का इष्ट कहीं छोटा नहीं किया गया। गुरु यह नहीं कहते कि जिनकी उपासना हो रही है वे छोटे हैं। वे कहते हैं कि वे स्वयं जिधर देखते हैं, उधर देख लीजिये। यह किसी को उसके देवता से हटाना नहीं है, उसे उसी देवता की आँख के साथ खड़ा कर देना है।
हर कहुँ हरि सेवक गुर कहेऊ । सुनि खगनाथ हृदय मम दहेऊ॥
चौपाई १०
अधम जाति मैं बिद्या पाएँ। भयउँ जथा अहि दूध पिआएँ॥
गुरुजी ने शिव को हरि का सेवक कहा, और यह सुनकर, हे पक्षिराज, मेरा हृदय जल उठा। जिस बात पर आग लगी वह एक ही शब्द है, सेवक। और उसके बाद वह अर्धाली आती है जो इस पूरे प्रसंग की सबसे डरावनी पंक्ति है, क्योंकि उसमें कहनेवाला अपनी सज़ा का नाम स्वयं ले लेता है, बिना जाने कि वह सज़ा का नाम है। नीच जाति का मैं विद्या पाकर ऐसा हो गया, जैसे दूध पिलाने से साँप।
यह उपमा किसी और ने नहीं दी। इसे कहनेवाला अपने ऊपर लगा रहा है, और यह जानते हुए लगा रहा है कि आगे क्या होने वाला है। दूध पिलाया गया साँप विष नहीं छोड़ता, यह पुरानी बात है और उसमें नया कुछ नहीं। पर यहाँ बात इससे आगे चली जाती है। जो शब्द उसने अपने लिये चुना है, वही शब्द थोड़ी देर बाद आकाशवाणी के मुँह से निकलेगा, और तब वह उपमा नहीं रहेगा, देह हो जायेगा। कथा का यह हिस्सा अपना अन्त पहले ही बोल चुका है।
आगे वह अपने ऊपर चार शब्द और लगाता है, अभिमानी, कुटिल, दुर्भाग्य और कुजाति, और कहता है कि दिन-रात गुरु से द्रोह करता रहा। और उसी के बगल में गुरु का माप फिर रख दिया जाता है, कि वे अत्यन्त दयालु थे, उन्हें थोड़ा-सा भी क्रोध नहीं आता था, और वे बार-बार उत्तम ज्ञान की ही शिक्षा देते रहे। पुनि पुनि, बार-बार। दोनों ओर एक ही काम लगातार हो रहा है, एक ओर द्रोह और दूसरी ओर सीख, और कोई पक्ष थकता नहीं।
जेहि ते नीच बड़ाई पावा। सो प्रथमहिं हति ताहि नसावा॥
चौपाई ११
धूम अनल संभव सुनु भाई । तेहि बुझाव घन पदवी पाई॥
नीच मनुष्य जिससे बड़ाई पाता है, वह सबसे पहले उसी को मारकर उसी का नाश करता है। और इसके साथ जो चित्र आता है वह घर का है, कि आग से उत्पन्न हुआ धुआँ मेघ की पदवी पाकर उसी आग को बुझा देता है। पदवी, यही शब्द रखा गया है। धुएँ को पद मिलता है, ओहदा मिलता है, वह ऊपर उठकर बादल कहलाने लगता है। और उस ओहदे का पहला उपयोग वह यही करता है कि नीचे लौटकर अपने जनक को बुझा दे।
अगली चौपाई वही बात दुबारा कहती है, और दुबारा कहना ही उसका ढंग है। धूल रास्ते में निरादर से पड़ी रहती है और सबकी लातें सहती है। पर जब पवन उसे उठाता है तो सबसे पहले वह उसी पवन को भर देती है, और उसके बाद जाकर राजाओं के नेत्रों और मुकुटों पर पड़ती है। प्रथम तेहि भरई, पहले उसी को भरती है। दोनों चित्रों में क्रम एक ही है, कि उठानेवाला पहला शिकार होता है। आग ने धुआँ दिया और आग बुझी; पवन ने धूल उठायी और पवन भर गया। बीच में कोई तीसरा नहीं आता।
इसके बाद निष्कर्ष आता है और वह किसी नीतिवाक्य की तरह रखा जाता है। हे पक्षिराज, ऐसा समझकर बुद्धिमान् लोग अधम का संग नहीं करते; कवि और पण्डित यही नीति कहते हैं कि दुष्ट से न कलह अच्छा है, न प्रेम। और आगे, कि उससे सदा उदासीन ही रहना चाहिये, और कुत्ते की तरह उसे दूर से ही छोड़ देना चाहिये। यह सब किसी शास्त्र-सभा में नहीं कहा जा रहा। यह एक आदमी अपने श्रोता से कह रहा है, बहुत बरसों बाद, और आगे की पंक्ति बता देगी कि वह किसके विषय में कह रहा है।
और तभी वह अपनी ही नीति को अपने ऊपर मोड़ देता है। मैं दुष्ट था, हृदय में कपट और कुटिलता थी, गुरुजी हित की बात कहते थे और मुझे वह सुहाती नहीं थी। यानी ऊपर की सारी नीति उसी के लिये है। धुआँ वही है, धूल वही है, वह कुत्ता भी वही है जिसे दूर से छोड़ देने को कहा गया, और वह अधम भी वही है जिसका संग न करने की सलाह अभी-अभी दी गयी। जो आदमी अपनी कथा सुनाते हुए अपने लिये ये चारों चीज़ें चुनता है, वह सुननेवाले से कुछ छिपा नहीं रहा।
सार: गुरु बुलाकर समझाते हैं कि शिव की सेवा का फल राम के चरणों में भक्ति है, कि शिव और ब्रह्मा भी राम को भजते हैं, और उनसे द्रोह करके सुख नहीं मिलेगा। शिव को हरि का सेवक कहा सुनकर शिष्य का हृदय जल उठता है और वह अपने को दूध पिलाया हुआ साँप कहता है। फिर धुएँ और धूल के दो चित्रों से यह नीति रखी जाती है कि नीच सबसे पहले अपने उठानेवाले को ही मारता है, और अन्त में कहनेवाला वही नीति अपने ऊपर लागू कर देता है।
वह दिन, मन्दिर में
अब वह दिन आता है, और तुलसी उसे बहुत थोड़े शब्दों में निपटा देते हैं। जो होता है वह कोई काम नहीं है, किसी काम का न होना है, और पूरा प्रसंग उसी न होने पर मुड़ जाता है।
एक बार हर मंदिर जपत रहेउँ सिव नाम।
दोहा १०६ (क, ख)
गुर आयउ अभिमान तें उठि नहिं कीन्ह प्रनाम॥ १०६ (क)॥
सो दयाल नहिं कहेउ कछु उर न रोष लवलेस।
अति अघ गुर अपमानता सहि नहिं सके महेस॥ १०६ (ख)॥
एक दिन मैं शिव के मन्दिर में शिव का नाम जप रहा था। उसी समय गुरुजी वहाँ आये, और अभिमान के मारे मैंने उठकर प्रणाम नहीं किया। इस वाक्य में जो कुछ है वह सब सही है, एक चीज़ को छोड़कर। जगह सही है, काम सही है, नाम सही है, समय सही है। गलत केवल एक देह है जो बैठी रह गयी। और अपराध कोई वचन नहीं है; इस पूरे प्रसंग में कहनेवाला गुरु के सामने एक शब्द भी नहीं बोलता। जो हुआ वह चुपचाप हुआ और उसमें कोई हलचल नहीं हुई।
और दूसरा आधा दोहा दोनों ओर का हिसाब एक साथ कर देता है। वे दयालु थे, उन्होंने कुछ नहीं कहा, उनके हृदय में लेशमात्र भी क्रोध नहीं हुआ। पर गुरु का अपमान बहुत बड़ा पाप है, और महादेव उसे सह नहीं सके। जिसका अपमान हुआ उसने कुछ नहीं कहा; जिसका नहीं हुआ था वह चुप नहीं रह सका। और यह सब उसी मन्दिर में हो रहा है जो महादेव का है, उसी जप के बीच जो उन्हीं के नाम का है, और वह शिष्य भी उन्हीं का उपासक है। सारा दृश्य उन्हीं के घर के भीतर का है।
सार: एक दिन वह शिव के मन्दिर में शिव का नाम जप रहा था, गुरु आये, और अभिमान के कारण उसने उठकर प्रणाम नहीं किया। गुरु ने कुछ नहीं कहा और उनके मन में लेशमात्र क्रोध नहीं हुआ, पर गुरु का अपमान बड़ा पाप है और महादेव उसे सह नहीं सके।
आकाश से उतरी हुई आवाज़
मन्दिर में आकाशवाणी होती है, और वह पहले तीन नाम लेती है, तीनों गाली की तरह, अरे हतभाग्य, अज्ञ, अभिमानी। और उसके बाद वह पहला काम यह करती है कि गुरु को बरी कर देती है। यद्यपि गुरु को क्रोध नहीं है, वे अत्यन्त कृपालु चित्त के हैं और उन्हें यथार्थ ज्ञान है। शाप देने से पहले यह कह देना ज़रूरी था, नहीं तो आगे जो होता वह किसी की नाराज़गी का फल लगता, और तब उसका अर्थ ही बदल जाता।
और फिर कारण आता है, और वह कारण क्रोध नहीं है। तो भी शाप दिया जायेगा, क्योंकि नीति का विरोध अच्छा नहीं लगता; और यदि दण्ड न दिया जाय तो मेरा वेदमार्ग ही भ्रष्ट हो जाय। ध्यान दीजिये कि अन्तिम वाक्य में जो चीज़ बचायी जा रही है वह किसी की प्रतिष्ठा नहीं है, एक रास्ता है। शाप इसलिये दिया जा रहा है कि जिस मार्ग पर और लोग चलेंगे वह ठीक बना रहे। दण्ड यहाँ बदला नहीं है, मरम्मत है, और देनेवाला अपने ही नियम के अधीन खड़ा है।
इसके बाद सामान्य विधान सुनाया जाता है, और वह बड़ा है। जो मूर्ख गुरु से ईर्ष्या करते हैं वे करोड़ों युगों तक रौरव नरक में पड़े रहते हैं, फिर तिर्यक् योनियों में शरीर धारण करते हैं और दस हज़ार जन्मों तक पीड़ा पाते रहते हैं। यह किसी एक के लिये नहीं कहा गया, यह सबके लिये कहा गया। और उसके तुरन्त बाद उस एक की बारी आती है, जिसके लिये यह सब कहा जा रहा था।
बैठि रहेसि अजगर इव पापी। सर्प होहि खल मल मति ब्यापी॥
चौपाई १२
महा बिटप कोटर महुँ जाई । रहु अधमाधम अधगति पाई॥
अरे पापी, गुरु के सामने अजगर की तरह बैठा रहा। रे दुष्ट, बुद्धि पाप से ढक गयी है, सर्प हो जा। और अरे अधम से भी अधम, इस अधोगति को पाकर किसी बड़े पेड़ के खोखले में जाकर रह। इस शाप का हर टुकड़ा उसी अपराध से बना है जो हुआ था। उठा नहीं गया था, इसलिये अब पैर ही नहीं रहेंगे। अजगर की तरह बैठा रह गया था, इसलिये अब सचमुच वही जाति मिलेगी जो पड़ी रहती है। मन्दिर की जगह एक पेड़ का खोखला मिलेगा। और अन्तिम शब्द कोई बड़ी क्रिया नहीं है, रहु है, पड़ा रह।
और वह शब्द भी यहीं लौट आता है जो कहनेवाला अपने लिये पहले ही चुन चुका था। उसने अपने को दूध पिलाया हुआ साँप कहा था। अब उसे साँप हो जाने को कहा जा रहा है। जो उपमा थी वह देह बन रही है, और बीच में कुल चार चौपाइयों का फ़ासला है। जिस आदमी ने अपने बारे में सबसे सच्ची बात कही थी, दण्ड ने वही बात उठाकर उसे पहना दी।
हाहाकार कीन्ह गुर दारुन सुनि सिव साप।
दोहा १०७ (क, ख)
कंपित मोहि बिलोकि अति उर उपजा परिताप॥ १०७ (क)॥
करि दंडवत सप्रेम द्विज सिव सन्मुख कर जोरि।
बिनय करत गदगद स्वर समुझि घोर गति मोरि॥ १०७ (ख)॥
शिव का भयानक शाप सुनकर गुरुजी ने हाहाकार किया। इस पन्ने पर जितने लोग हैं, उनमें केवल एक चिल्लाया, और वह वही है जिसका अपमान हुआ था। शिष्य के विषय में एक ही शब्द आया है, कंपित, काँपता हुआ। और गुरु के हृदय में जो उठा वह भी अपने लिये नहीं उठा। काँपते हुए उसे देखकर उनके भीतर बड़ा सन्ताप हुआ। सन्ताप का कारण शाप नहीं है, काँपना है।
और दूसरे आधे दोहे में वे नीचे झुक जाते हैं। प्रेमसहित दण्डवत् करके, शिव के सामने हाथ जोड़कर, गद्गद वाणी से वे विनती करने लगे, यह समझकर कि दण्ड कितना भयंकर है। जिस आदमी को उस दिन प्रणाम नहीं मिला था, वह उसी दिन किसी और के लिये ज़मीन पर लेट गया। और प्रसंग ठीक यहीं बन्द हो जाता है, विनती के शुरू होने पर, उसके पूरे होने पर नहीं। जो कहा जायेगा वह इस पन्ने पर नहीं है। यहाँ केवल एक आदमी है जो बोलना शुरू कर रहा है और जिसका गला भरा हुआ है।
सार: मन्दिर में आकाशवाणी होती है, जो पहले गुरु को निर्दोष बताती है और फिर कहती है कि शाप इसलिये दिया जायेगा कि दण्ड न देने से वेदमार्ग भ्रष्ट हो जायेगा। गुरु से ईर्ष्या करनेवालों का विधान सुनाकर वह उसे सर्प होने और किसी बड़े पेड़ के खोखले में पड़े रहने का शाप देती है। शाप सुनकर गुरु हाहाकार करते हैं, काँपते हुए शिष्य को देखकर सन्तप्त होते हैं, और शिव के सामने दण्डवत् करके गद्गद वाणी से विनती करने लगते हैं।
और अन्त में, अपनी ओर
इस पन्ने के दोनों हिस्सों के बीच जोड़ लिखा नहीं गया, पर वह है। पहले हिस्से में कहा गया था कि युग पंचांग पर नहीं, हृदय में चलते हैं, और यह भी कहा गया था कि कलियुग की पहचान चारों ओर का विरोध है। दूसरे हिस्से में एक आदमी है जो मन्दिर में बैठा शिव का मन्त्र जप रहा है और जिसके भीतर हरि के भक्तों को देखते ही आग लग जाती है। बाहर से देखिये तो वह साधक है, नियम का पक्का है, गुरु का पढ़ाया हुआ है। भीतर का युग कुछ और चल रहा है, और उसकी पहचान वही है जो कुछ दोहे पहले लिख दी गयी थी।
दूसरी बात इस पन्ने की इकलौती छूट से जुड़ी है। कहा गया था कि कालधर्म उसे नहीं व्यापते जिसका रघुनाथ के चरणों में अत्यन्त प्रेम है। कहनेवाले के पास मन्त्र था, गुरु था, मन्दिर था, नियम था, विद्या थी, और वर्षों का अभ्यास था। जो एक चीज़ उसके पास नहीं थी, वही इकलौती शर्त थी। और उसकी जगह जो चीज़ भरी हुई थी वह ठीक उसकी उलटी थी, विष्णु से द्रोह। छूट का दरवाज़ा खुला हुआ था और वह उसी दीवार के सामने खड़ा रहा जिसमें दरवाज़ा है ही नहीं।
और तीसरी बात, जो पूरे पन्ने पर फैली हुई है और इसीलिये आसानी से छूट जाती है। यहाँ किसी आदमी का नाम नहीं है। कहनेवाला अपना नाम नहीं बताता। सुननेवाले को पक्षियों के राजा की पदवियों से पुकारा जाता है, और उसका नाम टीका में मिलता है, पद्य में नहीं। जिस गुरु के चारों ओर आधी कथा घूमती है वह आदि से अन्त तक केवल गुर, बिप्र और द्विज है। नाम केवल दो जगहों के आये हैं, अवध और उजेनी, और नाम केवल उनके आये हैं जिनकी पूजा हो रही है। बाकी सब अपने काम से पहचाने जाते हैं।
इस प्रसंग में सबसे देर तक साथ रहनेवाली चीज़ वह अनुपात है जो इसमें कहीं नहीं मिलता। जो हुआ उसका माप बहुत छोटा है, कि एक आदमी बैठा रहा और खड़ा नहीं हुआ। और जो उसके बदले में आया वह बहुत बड़ा है, करोड़ों युग, दस हज़ार जन्म, और एक पेड़ का खोखला। पर पद्य इस अनुपात को ठीक करने की कोशिश नहीं करता। वह केवल यह दिखा देता है कि जो देह बैठी रह गयी थी, उसके भीतर बहुत दिनों से क्या पक रहा था, और तब वह न उठना उतना छोटा नहीं रह जाता जितना पहली बार लगा था।
और आख़िर में वह चित्र, जिस पर यह पन्ना बन्द होता है। मन्दिर में तीन हैं। एक वह जिसने अपमान किया और अब काँप रहा है। एक वह जिसकी आवाज़ अभी-अभी आकाश से उतरी है। और एक वह जिसका अपमान हुआ था, जो ज़मीन पर लेटा हुआ है, हाथ जोड़े हुए है, गला भर आने के कारण ठीक से बोल भी नहीं पा रहा, और जिसके लिये वह बोल रहा है वह वही है जिसने उसे प्रणाम नहीं किया था।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, उत्तरकाण्ड, दोहा १०३ से १०७, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।