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माताओं से भेंट, और वह घर जहाँ वे पहले गये

रामचरितमानस · उत्तरकाण्ड · माताओं से भेंट, और वह घर जहाँ वे पहले गये

माताओं से भेंट, और वह घर जहाँ वे पहले गये

जिस दिन अयोध्या अपना सब कुछ वापस पाती है, उस दिन श्रीराम एक ही क्षण में अनगिनत रूप धरकर सबसे अलग-अलग मिलते हैं, और अपने महल की ओर चलते हुए रास्ता बदलकर पहले उस घर जाते हैं जिसकी स्वामिनी उनसे मिलते समय सकुचा गयी थीं।

यह प्रसंग ठीक वहाँ से उठता है जहाँ पिछला छोड़ गया था, और उसकी पहली पंक्ति में कोई माता नहीं है। दो भाई गले मिलते हैं, और तुलसी उनमें से एक का नाम तक नहीं लिखते, सिर्फ़ इतना बताते हैं कि वह किसका छोटा भाई है। इसके बाद जो पन्ना खुलता है उसमें ठीक एक चमत्कार है, ठीक एक प्रश्न है, ठीक एक बार किसी को किसी से ऊपर रखा जाता है, और ठीक एक बार रास्ता बदला जाता है। बाक़ी सब दरवाज़े, थाल, नगाड़े और चरण हैं, और वही इस पन्ने की असली नाप है।

इस हिस्से की बनावट में एक बात लगातार दिखती है। जो सबसे बड़ा काम होता है, वह सबसे छोटी जगह में होता है और किसी को उसका पता तक नहीं चलता। और जो सबसे छोटा काम दिखता है, एक घर में दूसरे घर से पहले चले जाना, उसी के चारों ओर पूरा प्रसंग बाँधा गया है। उत्सव का ब्योरा तुलसी ख़ूब देते हैं, गलियाँ, चौक, कलश, आरती, नगाड़े, पर जब भी कुछ भीतर का कहना होता है, वे दो शब्द लिखकर आगे बढ़ जाते हैं, और वे दो शब्द ही पूरे प्रसंग में सबसे देर तक टिकते हैं।

यह कथा यहाँ शिवजी के मुँह से चल रही है और सुनने वाली पार्वती हैं। इस पन्ने पर तीन बार शिवजी अपनी पत्नी को पुकारते हैं, उमा, उमा और भवानी, और तीनों बार वे ठीक उसी क्षण पुकारते हैं जब कोई ऐसी चीज़ सामने आती है जिसे भीड़ में खड़ा आदमी देख नहीं सकता था। एक बार वह भेद जिसे कोई जान न सका, एक बार वह गुण जिसे कोई कह न सका, और एक बार वह लज्जा जिसे किसी ने कहा ही नहीं था। यह जोड़ संयोग नहीं लगता, और इसी को पकड़कर यह पन्ना पढ़ा जाना चाहिये।

इस प्रसंग के मुख्य किरदार

  • श्रीराम जो इस प्रसंग में एक ही बार शक्ति का प्रयोग करते हैं, और वह भी सिर्फ़ इसलिये कि किसी को अपनी बारी का इन्तज़ार न करना पड़े।
  • लक्ष्मण जो सब माताओं से मिलकर हर्षित होते हैं, कैकेयी से बार-बार मिलते हैं, और जिनके मन का क्षोभ इस पूरे पन्ने पर नहीं जाता।
  • सीता जिन्हें सब सासुओं से भेंट में एक ही चौपाई मिलती है, और जिन्हें वही आशीर्वाद मिलता है जो उस गली के किसी भी घर में मिलता।
  • भरत और शत्रुघ्न जिनसे यह पन्ना शुरू होता है, और जिनमें से एक का नाम तुलसी लिखते ही नहीं, सिर्फ़ रिश्ता लिखते हैं।
  • कौसल्या जो युद्ध के बारे में किसी से कुछ नहीं पूछतीं, सिर्फ़ अपने मन से पूछती हैं, और जिनका प्रश्न इस पन्ने की सबसे बड़ी चीज़ है।
  • सुमित्रा जिन्हें पूरे प्रसंग में आधी पंक्ति मिलती है, और वह आधी पंक्ति उनकी तड़प नहीं, उनकी जानकारी बताती है।
  • कैकेयी जो इस पन्ने पर एक शब्द भी नहीं बोलतीं, जिनके बारे में दो ही बातें कही जाती हैं, और जिनके घर श्रीराम अपने घर से पहले जाते हैं।
  • वसिष्ठ जिनकी कृपा को श्रीराम रण की जीत का कारण बताते हैं, और जो अन्त में ब्राह्मणों से आज्ञा माँगते हैं।
  • विभीषण, सुग्रीव, अंगद, हनुमान और वानर-वीर जो अयोध्या में मनुष्य का शरीर धरकर आते हैं, और उस शरीर में सबसे पहला काम भरतजी की बड़ाई करते हैं।
  • सुमन्त्र जिन पर यह प्रसंग ख़त्म होता है, रथ-घोड़े सजाकर, दूत दौड़ाकर, और लौटकर गुरु के चरणों में सिर रखकर।
  • शिव और उमा जिनकी आपसी बातचीत यह कथा ढोकर ला रही है, और जो तीनों बार ठीक वहीं आमने-सामने आते हैं जहाँ कहानी की आँख बाक़ी सबसे छिप जाती है।

पहली भेंट में कोई माँ नहीं है

प्रसंग का नाम माताओं का है, पर पन्ने की पहली पंक्ति में माता एक भी नहीं है। पहले दो भाई मिलते हैं, और उनमें से एक को तुलसी नाम से नहीं, रिश्ते से बुलाते हैं। भरतानुज, यानी भरत के छोटे भाई, यानी शत्रुघ्न। छन्द में शत्रुघ्न नाम पूरी तरह बैठ जाता, तुलसी को कोई अड़चन नहीं थी। उन्होंने वह शब्द चुना जो आदमी को उसके भाई से बाँधता है, और यह चुनाव ठीक उस पन्ने के पहले शब्द में हुआ जिस पन्ने का सारा काम एक-एक को एक-एक से वापस जोड़ना है।

भरतानुज लछिमन पुनि भेंटे । दुसह बिरह संभव दुख मेटे॥
सीता चरन भरत सिरु नावा। अनुज समेत परम सुख पावा॥

चौपाई १

दूसरी बात यह है कि मिलने से क्या हुआ, यह तुलसी जोड़ में नहीं, घटाव में बताते हैं। दुसह बिरह संभव दुख मेटे, वियोग से उपजा दुःसह दुःख मिटा दिया। यह नहीं लिखा कि आनन्द मिला। पहले यह लिखा कि जो चीज़ इतने दिनों से भीतर बैठी थी, वह पोंछ दी गयी। लौटने का पहला काम कुछ पाना नहीं होता, किसी चीज़ का हट जाना होता है, और तुलसी उसी क्रम में लिखते हैं। सुख की बात इसके बाद आती है, और तब वह टिकती भी है।

इसके बाद भरतजी सीताजी के चरणों में सिर नवाते हैं। ध्यान दीजिये कि यह किस से पहले हो रहा है। न माताओं की भेंट हुई है, न नगर में प्रवेश, न कोई सभा जुड़ी है। लौटती हुई सवारी में सबसे पहले जिस के चरणों में भरत का माथा जाता है, वे सीता हैं। और जो उन्हें मिलता है उसका नाम भी लिखा है, परम सुख। जिस आदमी ने इतने दिन राज्य को सिंहासन पर चढ़ी हुई खड़ाऊँ के हवाले रखा, उसे इस पन्ने पर पहला सुख किसी सिंहासन से नहीं, एक प्रणाम से मिलता है।

और वह प्रणाम भी वे अकेले नहीं करते। अनुज समेत, छोटे भाई सहित। भरतजी के साथ इस पूरी कथा में यह बात लगी हुई है कि जो भी वे करते हैं, किसी को साथ लेकर करते हैं। यहाँ भी झुकने का काम अकेले का नहीं है। दोनों भाई एक साथ झुकते हैं, और दोनों को एक ही वाक्य में सुख मिलता है। तुलसी ने चाहा होता तो भरत को अलग खड़ा करके बड़ा दिखा सकते थे। उन्होंने उन्हें जोड़े में रखा, क्योंकि यह पूरा प्रसंग किसी को अकेला खड़ा करने का प्रसंग है ही नहीं।

सार: पन्ना भाइयों की भेंट से खुलता है, नाम की जगह रिश्ते से, और पहला काम दुःख का मिटना है। भरतजी का पहला प्रणाम सीताजी के चरणों में जाता है, और वह भी छोटे भाई को साथ लेकर।

एक साथ सबसे, और किसी को पता नहीं चला

अब नगर सामने आता है। प्रभु को देखकर अयोध्या के लोग हर्षित होते हैं और वियोग से उपजी सारी विपत्ति नष्ट हो जाती है। यहाँ तक सब सीधा है। पर इसके बाद तुलसी एक कारण लिखते हैं, और वह कारण आगे की सारी बात खोल देता है। वे यह नहीं लिखते कि भीड़ बहुत थी। वे यह नहीं लिखते कि समय कम था। वे लिखते हैं कि प्रभु ने सब लोगों को प्रेमातुर देखा, प्रेम से आतुर, यानी हर एक अपनी बारी के लिये बेचैन।

प्रभु बिलोकि हरषे पुरबासी। जनित बियोग बिपति सब नासी॥
प्रेमातुर सब लोग निहारी । कौतुक कीन्ह कृपाल खरारी॥

चौपाई २

जो इसके बाद होता है उसका नाम तुलसी ने कौतुक रखा है। पोद्दारजी की टीका इसे चमत्कार कहती है, पर शब्द जो है वह खेल का शब्द है, कौतुक, तमाशा, अचरज। इस पूरे प्रसंग में शक्ति का प्रयोग ठीक एक बार होता है, और उसका पूरा उद्देश्य इतना ही है कि किसी को क़तार में खड़ा न होना पड़े। जिस आदमी ने अभी-अभी लंका जीती है, उसकी पहली अलौकिक चेष्टा अयोध्या में यह है कि वह भीड़ को भीड़ न रहने दे।

उसी क्षण वे असंख्य रूपों में प्रकट हो गये और सबसे मिले, पर जिस ढंग से मिले उसका शब्द बहुत सावधानी से चुना हुआ है, जथा जोग, जिससे जैसा योग्य था वैसा। यानी ये एक ही मुलाक़ात की नक़लें नहीं थीं। हर आदमी को वह मिलना मिला जो उस आदमी के लिये ठीक बैठता था। बूढ़े को अलग, बच्चे को अलग, पड़ोसी को अलग। और इसका फल भी गिना हुआ है, कृपा की दृष्टि से देखकर उन्होंने सब नर-नारियों को बिसोकी, शोक से रहित कर दिया। जितनी सामर्थ्य लगी, वह किसी को दिखाने में नहीं, किसी का शोक उतारने में लगी।

छन महिं सबहि मिले भगवाना। उमा मरम यह काहुँ न जाना॥
एहि बिधि सबहि सुखी करि रामा। आगें चले सील गुन धामा॥

चौपाई ३

और अब वह पंक्ति जिसके लिये यह सब बना था। उमा मरम यह काहुँ न जाना। हे उमा, यह भेद किसी ने नहीं जाना। यानी जो लोग मिलकर लौटे, उनमें से हर एक यही समझकर घर गया कि प्रभु उससे अकेले में, आमने-सामने, पूरी तरह मिले। चमत्कार का सारा काम हो गया और चमत्कार का कोई निशान नहीं बचा। जो चीज़ दिखाने के लिये की जाती है, वह पहचानी जाती है। यह चीज़ पहचानी ही नहीं गयी, और यही इसकी बनावट थी।

और यह वाक्य किससे कहा जा रहा है, इस पर ठहरिये। शिवजी यह बात उमा से कहते हैं। पूरी कथा में वे जब चाहें अपनी श्रोता को पुकार सकते थे, पर वे ठीक उस जगह पुकारते हैं जहाँ भीड़ की आँख काम करना बन्द कर देती है। जो नगर में खड़ा था वह मरम नहीं जान सका, और जो कैलास पर बैठकर सुन रही हैं, उन्हें वह बता दिया गया। इस पन्ने पर यह तीन बार होगा, और तीनों बार इसी तरह की जगह पर होगा।

इसके तुरन्त बाद की पंक्ति भी उतनी ही सादी है। एहि बिधि सबहि सुखी करि रामा। आगें चले। इस तरह सबको सुखी करके वे आगे बढ़ गये। असम्भव एक पंक्ति में हुआ, बिना किसी घोषणा के, और अगली ही साँस में कविता वापस पैदल चलने लगती है। तुलसी इस चीज़ पर रुककर वाह-वाह नहीं कराते। उनके यहाँ चमत्कार रास्ते का एक मोड़ है, मंज़िल नहीं।

सार: इस प्रसंग का इकलौता चमत्कार भीड़ को मिटाने के लिये है, हर मुलाक़ात उस आदमी के हिसाब से ढली है, उसका फल शोक का हटना है, और उसका भेद किसी ने नहीं जाना। यही वह पहली जगह है जहाँ शिवजी उमा को पुकारते हैं।

गौएँ, बछड़े, और वह एक शब्द

अब माताएँ आती हैं, और तुलसी उनका वर्णन नहीं करते। न वस्त्र, न आभूषण, न चेहरा, न उम्र। वे सीधे एक उपमा दे देते हैं, और वह उपमा महल की नहीं है, गोशाला की है। कौसल्या आदि सब माताएँ ऐसे दौड़ीं जैसे नयी ब्यायी हुई गौएँ अपने बछड़ों को देखकर दौड़ती हैं। राजमहल की रानियों के लिये यह उपमा जान-बूझकर नीचे से उठायी गयी है, क्योंकि जो चीज़ यहाँ दिखानी है उसका पद से कोई लेना-देना नहीं है।

और फिर वे वह करते हैं जो कम होता है। उपमा देकर आगे बढ़ने के बजाय वे उपमा के भीतर घुस जाते हैं और वहीं रहने लगते हैं। पूरा छन्द उसी गाय का दिन है, और उस दिन का हर टुकड़ा किसी न किसी असली चीज़ पर बैठता है।

जनु धेनु बालक बच्छ तजि गृहँ चरन बन परबस गईं।
दिन अंत पुर रुख स्रवत थन हुंकार करि धावत भईं॥
अति प्रेम प्रभु सब मातु भेटीं बचन मृदु बहुबिधि कहे।
गइ बिषम बिपति बियोगभव तिन्ह हरष सुख अगनित लहे॥

छन्द

गाय का दिन पढ़िये। उसने अपने छोटे बछड़े को घर पर छोड़ा। वह वन में चरने गयी। और वह किस तरह गयी, इसका शब्द है परबस, परवश, यानी अपने वश में न होकर, किसी और के वश में। गाय चरने का समय ख़ुद नहीं चुनती। जाना पड़ता है, इसलिये जाती है। इन माताओं के साथ इतने दिनों में जो कुछ हुआ, उसका पूरा ब्योरा तुलसी ने कहीं नहीं दिया, और इस एक शब्द में दे दिया, वह भी गाय के हिस्से में रखकर।

फिर दिन अंत पुर रुख, दिन ख़त्म होने पर नगर की ओर। बिछोह पूरा एक दिन है और लौटना शाम है। और लौटती हुई गाय का शरीर जैसा है वैसा ही लिखा है, थन से दूध चूता हुआ और मुँह से हुंकार। दूध, जिसे कोई पीने वाला न मिला हो, अपने आप बहने लगता है। जिस माँ के पास देने को सब कुछ हो और लेने वाला सामने न हो, उसके लिये इससे ठीक चित्र तुलसी को नहीं मिल सकता था, और यह चित्र उन्होंने खोजने में देर नहीं लगायी, गाँव के किसी भी शाम के रास्ते पर वह खड़ा रहता है।

और अब भेंट। प्रभु अत्यन्त प्रेम से सब माताओं से मिले और उनसे बहुत प्रकार के कोमल वचन कहे। उन वचनों में से एक भी वचन तुलसी नहीं लिखते। हमें गिनती मिलती है, बहुबिधि, और मिज़ाज मिलता है, मृदु, पर विषय-वस्तु नहीं मिलती। माताओं का पक्ष पूरा छन्द लेता है और बेटे का पक्ष दो विशेषण। यह असन्तुलन इस पन्ने पर बार-बार मिलेगा, और हर बार जान-बूझकर बनाया हुआ लगेगा।

छन्द अपने अन्त में हिसाब भी बराबर कर देता है। गइ बिषम बिपति बियोगभव, वियोग से उपजी भयानक विपत्ति चली गयी, और उन्होंने अगणित सुख और हर्ष पाये। पहले वही क्रम, पहले जो भीतर बैठा था उसका जाना, उसके बाद ही जो मिलना था उसका मिलना। इस पन्ने पर सुख कभी सीधे नहीं आता। वह हमेशा किसी चीज़ के खाली हो जाने के बाद आता है।

सार: माताओं का पूरा चित्र एक गोशाला की उपमा से बनता है, और उसका सबसे भारी शब्द परबस है। भेंट में कहे गये वचन गिने जाते हैं, दोहराये नहीं जाते, और सुख तभी आता है जब विपत्ति पहले जा चुकी होती है।

एक दोहे में दो माताएँ

इसके बाद जो दोहा आता है वह इस पन्ने का सबसे सघन हिस्सा है। दो टुकड़े, और हर टुकड़े में दो माताओं जितनी बात। तुलसी न किसी को समझाते हैं, न किसी पर टीका करते हैं। वे दोनों को एक ही साँस में रखकर छोड़ देते हैं, और पाठक को यह तय करने के लिये अकेला छोड़ देते हैं कि उसने अभी क्या पढ़ा।

भेटेउ तनय सुमित्राँ राम चरन रति जानि।
रामहि मिलत कैकई हृदयँ बहुत सकुचानि॥ ६ (क)॥

दोहा ६ (क)

पहले सुमित्रा। इस पूरे प्रसंग में उन्हें यही आधी पंक्ति मिलती है, और उस आधी पंक्ति में उनकी अपनी कोई भावना दर्ज नहीं है। यह नहीं लिखा कि वे रोयीं, दौड़ीं या तड़पीं। लिखा यह है कि वे अपने बेटे से मिलीं राम चरन रति जानि, यह जानकर कि उसकी प्रीति श्रीराम के चरणों में है। माँ अपने बेटे से उस चीज़ के रास्ते मिलती है जिससे बेटा प्रेम करता है। तुलसी ने उन्हें तड़प नहीं दी, जानकारी दी, और उस घर में यह ज़्यादा बड़ी चीज़ है।

और उसी दोहे की दूसरी पंक्ति में दूसरी माता। रामहि मिलत कैकई हृदयँ बहुत सकुचानि। श्रीराम से मिलते समय कैकेयी हृदय में बहुत सकुचायीं। पूरी सूचना इतनी ही है। किसी ने कुछ कहा नहीं। उन्होंने कुछ कहा नहीं। यह भी नहीं लिखा कि सामने वाले ने इस सकुचाहट को देखा या नहीं। तुलसी ने दोनों माताओं को एक ही दोहे में रखा और दोनों के बीच एक भी शब्द तुलना का नहीं रखा।

लछिमन सब मातन्ह मिलि हरषे आसिष पाइ।
कैकइ कहँ पुनि पुनि मिले मन कर छोभु न जाइ॥ ६ (ख)॥

दोहा ६ (ख)

दूसरा टुकड़ा लक्ष्मणजी का है, और वह दो हिस्सों में टूटता है। पहले हिस्से में सब कुछ ठीक है। वे सब माताओं से मिले, आशीर्वाद पाया, हर्षित हुए। फिर दूसरा हिस्सा आता है। कैकइ कहँ पुनि पुनि मिले, कैकेयी से वे बार-बार मिले। बार-बार मिलना उस आदमी का काम है जो शिष्टाचार में कोई कमी नहीं छोड़ना चाहता। जितनी बार मिलना चाहिये, उतनी बार मिले, शायद उससे भी ज़्यादा।

और पंक्ति का अन्तिम टुकड़ा यह है, मन कर छोभु न जाइ। मन का क्षोभ नहीं जाता। पोद्दारजी इस शब्द के आगे कोष्ठक में रोष लिख देते हैं। पूरी पंक्ति में कर्ता लक्ष्मणजी हैं, मिलने का काम उन्हीं का है, और पंक्ति के आख़िर में जो चीज़ बची रह जाती है वह भी उन्हीं के खाते में बैठती है। बाहर से सब ठीक कर लिया गया और भीतर से कुछ ठीक नहीं हुआ।

अब ध्यान दीजिये कि तुलसी ने इस बात का क्या किया। कुछ नहीं किया। न इसे सही ठहराया, न ग़लत। न कोई उपदेश दिया, न कोई सफ़ाई। इस पन्ने पर आगे जो कुछ भी सुलझेगा, वह इस चीज़ को छूकर नहीं जायगा। यह अकेली गाँठ इस पूरे उत्सव में खुली छोड़ दी जाती है, और कवि उसे खुला छोड़कर सीधे सीताजी की ओर मुड़ जाता है। जो लोग यह मानते हैं कि कथा हर चीज़ का हिसाब बराबर करती है, उनके लिये यह आधी पंक्ति एक सवाल है।

सार: एक ही दोहे में सुमित्रा की जानकारी और कैकेयी की सकुचाहट रखी जाती है, बिना किसी तुलना के। और जो एक चीज़ इस प्रसंग में अनसुलझी रह जाती है, वह कैकेयी के हिस्से नहीं, बार-बार मिलने वाले बेटे के मन में रह जाती है।

सासुओं का आशीर्वाद और कौसल्या का प्रश्न

सीताजी की बारी आती है और उन्हें एक चौपाई मिलती है। इतनी ही। जो लंका से लौटी हैं, जिनके लिये वह पूरा युद्ध लड़ा गया, उनके ससुराल-प्रवेश को तुलसी चार पंक्तियों में निपटा देते हैं, और उन चार पंक्तियों में एक भी शब्द बड़प्पन का नहीं है।

सासुन्ह सबनि मिली बैदेही । चरनन्हि लागि हरषु अति तेही॥
देहिं असीस बूझि कुसलाता। होइ अचल तुम्हार अहिवाता॥

चौपाई ४

वे सब सासुओं से मिलीं, उनके चरणों लगीं, और हर्ष किसके खाते में लिखा गया, यह देखिये, हरषु अति तेही, हर्ष उन्हें हुआ, यानी झुकने वाली को। फिर सासुएँ कुशल पूछती हैं। कुशल, यानी वही सवाल जो किसी भी घर में किसी भी बहू से पूछा जाता है। और फिर आशीर्वाद, होइ अचल तुम्हार अहिवाता, सुहाग अचल हो। यह उस गली के किसी भी घर का आशीर्वाद है। इस पूरे प्रसंग में सीताजी को जो मिलता है वह असाधारण नहीं है, और यही उनका मिलना है। वे किसी विजय की स्मृति की तरह नहीं, घर की बहू की तरह घर में लौटती हैं।

इसके बाद माताओं की आँखों का ब्योरा आता है और वह इस पन्ने की सबसे संयमित चीज़ है। सब श्रीरघुनाथजी का कमल-सा मुख देख रही हैं, और आँसू आ रहे हैं, पर मंगल जानि नयन जल रोकहिं, मंगल का समय जानकर वे आँसुओं को आँखों में ही रोक लेती हैं। जो चीज़ सबसे ज़्यादा बहनी चाहिये थी, उसे रोका जा रहा है, और रोकने का कारण दुःख नहीं, शुभ है। सोने के थाल से आरती उतरती है और बार-बार वे प्रभु के अंगों की ओर देखती हैं। हाथ काम कर रहे हैं और आँख अपनी जगह से हटती नहीं।

नाना प्रकार से निछावर होती है, हृदय परमानन्द से भरते हैं, और इसी बीच कौसल्याजी बार-बार कृपा के समुद्र और रणधीर श्रीरघुवीर को देखती हैं। यहाँ तक सब उत्सव है। और फिर तुलसी उनके मन का पर्दा उठा देते हैं, और भीतर जो मिलता है वह धन्यवाद नहीं है।

हृदयँ बिचारति बारहिं बारा । कवन भाँति लंकापति मारा॥
अति सुकुमार जुगल मेरे बारे । निसिचर सुभट महाबल भारे॥

चौपाई ५

कवन भाँति लंकापति मारा। इन्होंने लंकापति को किस तरह मारा। यह प्रश्न वे किसी से पूछ नहीं रहीं। न बेटे से, न देवर से, न किसी सैनिक से। वे यह अपने हृदय में पूछ रही हैं, और बारहिं बारा, बार-बार पूछ रही हैं। युद्ध जीता जा चुका है, जीतने वाला सामने खड़ा है, आरती का थाल हाथ में है, और उनके मन में दो तस्वीरें एक साथ नहीं बैठ रहीं।

और जो कारण वे अपने मन को देती हैं, वह और भी छोटा है, अति सुकुमार जुगल मेरे बारे। मेरे ये दोनों बच्चे बहुत ही सुकुमार हैं। दो बातें एक साथ हो रही हैं। पहली, जो आदमी अभी-अभी रणभूमि से उठकर आये हैं, उनके लिये वे बच्चों वाला शब्द इस्तेमाल कर रही हैं। और दूसरी, गिनती दो की है। लक्ष्मणजी सुमित्राजी के पुत्र हैं, पर कौसल्याजी के हृदय का हिसाब अलग चलता है, और वहाँ दोनों उन्हीं के हैं। इस पन्ने पर किसी ने यह घोषित नहीं किया कि यह एक घर है। इस आधी पंक्ति ने कर दिया।

यह इस पूरे प्रसंग की सबसे बड़ी चीज़ है और इसे आधी चौपाई मिली है। तुलसी के पास पूरा लंकाकाण्ड पड़ा था। वे कौसल्याजी से गर्व करा सकते थे, बखान करा सकते थे, किसी से युद्ध का हाल सुनवा सकते थे। उन्होंने इनमें से कुछ नहीं किया। उन्होंने एक माँ से वही कराया जो माँ करती है, अपने बेटे के शरीर को देखकर यह हिसाब लगाना कि इतने से शरीर से इतना बड़ा काम हुआ कैसे। वीरता का सबसे बड़ा प्रमाणपत्र इस पन्ने पर किसी दरबार से नहीं, एक हैरान माँ के भीतर से आता है।

लछिमन अरु सीता सहित प्रभुहि बिलोकति मातु।
परमानंद मगन मन पुनि पुनि पुलकित गातु॥ ७॥

दोहा ७

और दोहा उन्हें वहीं रोक देता है। लक्ष्मणजी और सीताजी सहित प्रभु को माता देख रही हैं, मन परमानन्द में डूबा है और शरीर बार-बार पुलकित हो रहा है। प्रश्न का उत्तर नहीं आया। उत्तर आया ही नहीं। वह प्रश्न सोख लिया गया, उसी देखने में जिसमें से वह उठा था। जो माँ पूछ रही थी कि यह हुआ कैसे, वही अब सामने खड़े तीनों को देखकर परमानन्द में डूबी है, और तुलसी को इससे आगे कुछ कहने की ज़रूरत नहीं पड़ी।

सार: सीताजी को घर का साधारण आशीर्वाद मिलता है, माताएँ मंगल के कारण अपने आँसू रोकती हैं, और कौसल्याजी युद्ध के बारे में किसी से कुछ नहीं पूछतीं, अपने मन से पूछती हैं। उनका प्रश्न उत्तर से नहीं, देखने से शान्त होता है।

जो भरत से भी अधिक प्रिय हैं

अब लौटने वाली टोली का दूसरा आधा हिस्सा सामने आता है। विभीषण, वानरराज सुग्रीव, नल, नील, जाम्बवान्, अंगद, हनुमान्जी और बाक़ी सब वीर मनोहर मनुष्य-शरीर धारण कर लेते हैं। तुलसी यह नहीं बताते कि उन्होंने ऐसा क्यों किया, न यह कि किसने कहा। बस इतना कि उन्होंने ऐसा किया, और आगे बढ़ जाते हैं।

इस जगह एक शब्द पर रुकना चाहिये। विभीषणजी को यहाँ तुलसी लंकापति कहते हैं। ठीक दो चौपाई पहले कौसल्याजी ने अपने मन में पूछा था कि लंकापति मारा कैसे गया, और वहाँ वह शब्द रावण के लिये था। इतने कम फ़ासले में वही उपाधि मालिक बदल लेती है, और पन्ना इस पर एक शब्द भी ख़र्च नहीं करता। जिस पद के लिये वह सारा युद्ध हुआ, वह अब चुपचाप किसी और के नाम के आगे लगा हुआ अयोध्या की गली में चल रहा है।

और मनुष्य के शरीर में उन्होंने सबसे पहले जो काम किया, वह यह है।

भरत सनेह सील ब्रत नेमा। सादर सब बरनहिं अति प्रेमा॥
देखि नगरबासिन्ह कै रीती। सकल सराहहिं प्रभु पद प्रीती॥

चौपाई ६

वे भरतजी की बड़ाई करते हैं। उनका प्रेम, उनका सुन्दर स्वभाव, उनका व्रत, उनके नियम, और यह सब आदरपूर्वक और अत्यन्त प्रेम से। फिर वे नगरवासियों की रीति देखते हैं और प्रभु के चरणों में उनकी प्रीति की सराहना करते हैं। जो अभी समुद्र लाँघकर, युद्ध लड़कर, घाव लेकर लौटे हैं, वे अयोध्या में अपने पहले क्षण उन लोगों की तारीफ़ में लगाते हैं जो घर पर रह गये थे। यह बात याद रखिये, क्योंकि दो चौपाई बाद जो कहा जायगा, वह इसी के ऊपर टिका है।

पुनि रघुपति सब सखा बोलाए। मुनि पद लागहु सकल सिखाए॥
गुर बसिष्ट कुलपूज्य हमारे । इन्ह की कृपाँ दनुज रन मारे॥

चौपाई ७

श्रीराम अपने सखाओं को बुलाते हैं, और अयोध्या में उन्हें जो पहली शिक्षा देते हैं वह यह है कि किसके चरणों में लगना है। मुनि पद लागहु। और इसका कारण वे शिष्टाचार नहीं बताते। वे कहते हैं, गुरु वसिष्ठ हमारे पूरे कुल के पूज्य हैं, इन्ह की कृपाँ दनुज रन मारे, इन्हीं की कृपा से रण में राक्षस मारे गये। जीत का श्रेय वे उस आदमी को सौंप देते हैं जो युद्ध में था ही नहीं, जिसने समुद्र नहीं लाँघा, जिस पर एक ख़रोंच नहीं है। और यह वे उन्हीं के सामने कहते हैं जिन पर ख़रोंचें हैं।

ए सब सखा सुनहु मुनि मेरे । भए समर सागर कहँ बेरे॥
मम हित लागि जन्म इन्ह हारे । भरतहु ते मोहि अधिक पिआरे॥

चौपाई ८

और फिर वे घूमकर वही चीज़ वापस दे देते हैं। मुनि से वे कहते हैं कि ये सब मेरे सखा हैं, और उपमा जो चुनते हैं वह समर सागर कहँ बेरे है, युद्ध रूपी समुद्र में बेड़े। बेड़ा हथियार नहीं होता। बेड़ा वह चीज़ है जो आदमी को उस पार ले जाती है जिस पार वह अपने बल से नहीं जा सकता था। जिस आदमी के लिये पूरा समुद्र बाँधा गया था, वह अपने साथियों को समुद्र पार कराने वाली नाव कहता है, और अपने आप को वह कहता है जिसे पार कराया गया।

इसके बाद मम हित लागि जन्म इन्ह हारे, मेरे हित के लिये इन्होंने अपना जन्म तक हार दिया। और फिर वह वाक्य, भरतहु ते मोहि अधिक पिआरे। ये मुझे भरत से भी अधिक प्रिय हैं। इस वाक्य को अकेले पढ़िये तो यह किसी को ऊपर और किसी को नीचे रखना लगता है। इसे उस जगह रखकर पढ़िये जहाँ तुलसी ने इसे रखा है, और यह कुछ और हो जाता है।

क्योंकि ठीक दो चौपाई पहले वही वानर खड़े होकर भरतजी की बड़ाई कर रहे थे। उन्होंने अपना सारा आदर भरतजी के नाम कर दिया था। और अब उनके सामने वह एक जगह रख दी जाती है जो इस कथा में सबसे ऊँची मानी जाती है और जो हमेशा भरतजी की रही है। यह उत्तर है, तुलना नहीं। इस पूरे हिस्से में कोई अपने पास कुछ नहीं रखता। जो जिसे दिया जाता है, वह उसी के हाथ से वापस चल देता है, और यही इस पन्ने की चाल है।

प्रभु के वचन सुनकर सब प्रेम और आनन्द में डूब गये, और तुलसी उस डूबने का नाप भी देते हैं, निमिष निमिष उपजत सुख नए। पल-पल नये सुख उपज रहे हैं। एक सुख नहीं जो देर तक चले। नये सुख, जो बनते रहते हैं। जिस घर में हर पल कुछ नया उपज रहा हो, वहाँ पुराना अपने आप जगह छोड़ता जाता है।

कौसल्या के चरनन्हि पुनि तिन्ह नायउ माथ।
आसिष दीन्हे हरषि तुम्ह प्रिय मम जिमि रघुनाथ॥ ८ (क)॥

दोहा ८ (क)

और फिर कौसल्याजी इस काम को पूरा कर देती हैं। वे सब उनके चरणों में माथा नवाते हैं और वे हर्षित होकर आशीष देती हैं, तुम्ह प्रिय मम जिमि रघुनाथ, आप मुझे रघुनाथ के समान प्रिय हैं। बेटे ने कहा था, भरत से भी अधिक। माँ कहती हैं, राम के समान। इस घर में कोई भी देने में पीछे रहने को तैयार नहीं है। और जो वाक्य इन वानरों को सचमुच घर का बनाता है, वह राजा के मुँह से नहीं, माँ के मुँह से आता है, क्योंकि दरबार पद देता है और माँ जगह देती है।

सार: वानर मनुष्य-शरीर धरकर पहला काम भरतजी की बड़ाई का करते हैं, श्रीराम जीत का श्रेय उस गुरु को देते हैं जो युद्ध में थे ही नहीं, और फिर वही श्रेय सखाओं को लौटा देते हैं। कौसल्याजी उन्हें अपने बेटे के बराबर रखकर बात पूरी कर देती हैं।

नगर, दरवाज़े दरवाज़े

आकाश फूलों की वृष्टि से भर जाता है, आनन्दकन्द अपने महल की ओर चलते हैं, और नगर के स्त्री-पुरुष अटारियों पर चढ़कर देखते हैं। इसके बाद नगर को अपना हिस्सा मिलता है, और इस हिस्से में सबसे ग़ौर करने लायक़ चीज़ यह है कि तुलसी ख़ुशी को किस इकाई में नापते हैं।

कंचन कलस बिचित्र सँवारे । सबहिं धरे सजि निज निज द्वारे॥

चौपाई ९

सबहिं धरे सजि निज निज द्वारे। सबने अपने-अपने दरवाज़े पर रखा। यह नगरपालिका की सजावट नहीं है और किसी की आज्ञा से हुआ काम नहीं है। सोने के कलश हर घर के सामने अलग-अलग रखे गये, और उसके बाद बंदनवार, ध्वजा और पताकाएँ भी सबने अपने लिये लगायीं, और उनका कारण भी लिखा है, मंगल के लिये। उत्सव यहाँ दरवाज़ों में गिना जा रहा है, और इसीलिये उसका आकार पूरे नगर के बराबर हो जाता है।

इसके बाद ब्योरा फैलता है। सारी गलियाँ सुगन्ध से सींची जाती हैं, गजमुक्ताओं से चौक पुराये जाते हैं, तरह-तरह के मंगल-साज सजते हैं और नगर में बहुत से डंके बजते हैं। स्त्रियाँ जहाँ-तहाँ निछावर कर रही हैं, हृदय में हर्षित होकर आशीर्वाद दे रही हैं, और युवतियाँ सोने के थालों में अनेक प्रकार की आरती सजाकर मंगलगान कर रही हैं। यह किसी एक मंच पर हो रहा उत्सव नहीं है। यह पूरे नगर में एक साथ, हर मोड़ पर अलग-अलग हो रहा है।

और वे जिसकी आरती कर रही हैं, उसे तुलसी दो नामों से पुकारते हैं, और दोनों नाम जीत के नहीं हैं। पहला, आरतिहर, दुःख को हरने वाला। दूसरा, रघुकुल रूपी कमल-वन को खिलाने वाला सूर्य। रावण का नाम यहाँ कहीं नहीं है। लंका का नाम कहीं नहीं है। जो नगर पूरे युद्ध की ख़बरें सुनता रहा है, वह आरती के समय जिस नाम को गाता है, वह उस काम का नाम है जो उसके अपने ऊपर हुआ, दुःख का हटना और बन्द फूल का खुलना।

फिर तुलसी अपने सबसे बड़े गवाहों को बुलाते हैं, और वे गवाह काम नहीं करते। नगर की शोभा, सम्पत्ति और कल्याण का वर्णन वेद करते हैं, शेषजी करते हैं, सरस्वतीजी करती हैं। और उसके तुरन्त बाद यह।

तेउ यह चरित देखि ठगि रहहीं । उमा तासु गुन नर किमि कहहीं॥

चौपाई १०

तेउ यह चरित देखि ठगि रहहीं। वे भी यह चरित्र देखकर ठगे-से रह जाते हैं। और फिर, हे उमा, तब मनुष्य उनके गुण कैसे कह सकते हैं। यह इस पन्ने पर दूसरी बार है जब शिवजी अपनी पत्नी को पुकारते हैं, और फिर ठीक उसी तरह की जगह पर। पहली बार सीमा जानने की थी, किसी ने भेद जाना नहीं। इस बार सीमा कहने की है, कोई कह नहीं सकता। जिस कवि ने अभी-अभी गलियों की सुगन्ध और थालों की आरती लिखी है, वह उसी साँस में यह लिख रहा है कि वर्णन करने वाले सबसे बड़े नाम भी यहाँ हारकर खड़े रह गये।

नारि कुमुदिनीं अवध सर रघुपति बिरह दिनेस।
अस्त भएँ बिगसत भईं निरखि राम राकेस॥ ९ (क)॥

दोहा ९ (क)

और अब वह दोहा जिसमें इस पूरे उत्सव का सार बैठा है। स्त्रियाँ कुमुदिनी हैं, अयोध्या सरोवर है, और श्रीरघुनाथजी का विरह सूर्य है। कुमुदिनी वह फूल है जो रात में खिलता है और जिसके लिये सूर्य की रोशनी मुरझाना है। उपलब्ध सारे फूलों में से तुलसी ने ठीक वही चुना जिसके लिये दिन कष्ट है और चन्द्रमा जीवन। इसीलिये आगे श्रीराम को राकेस कहा गया है, पूर्णिमा की रात का स्वामी, और इसीलिये यहाँ विरह को हराया नहीं जाता।

उसे अस्त होना पड़ता है। सूर्य मारा नहीं जाता, वह डूब जाता है, और डूबते ही सरोवर भर के फूल अपने आप खुल जाते हैं। किसी ने उन्हें खोला नहीं। जो चीज़ उन्हें बन्द रखे थी, वह हट गयी और खुलना अपना काम कर गया। इस पन्ने पर जो क्रम पहली चौपाई में था, वही यहाँ आख़िरी उपमा में है, पहले कुछ जाता है, फिर कुछ होता है। और उसके बाद अनेक शुभ शकुन होते हैं, आकाश में नगाड़े बजते हैं, और नगर के स्त्री-पुरुषों को सनाथ करके भगवान् महल की ओर चल देते हैं।

सार: नगर की ख़ुशी दरवाज़ों में गिनी जाती है, आरती में जो नाम गाया जाता है वह दुःख हरने वाले का है, वर्णन करने वाले सबसे बड़े नाम भी ठगे रह जाते हैं, और विरह को हराया नहीं जाता, उसे डूबना पड़ता है।

पहले उनके घर

दोहा अपना वाक्य पूरा कर चुका है। दिशा तय हो गयी है, भगवान् महल की ओर चल दिये हैं, और पाठक मान लेता है कि अगली पंक्ति उन्हें वहाँ पहुँचा देगी। अगली पंक्ति उन्हें वहाँ नहीं पहुँचाती।

प्रभु जानी कैकई लजानी । प्रथम तासु गृह गए भवानी॥
ताहि प्रबोधि बहुत सुख दीन्हा । पुनि निज भवन गवन हरि कीन्हा॥

चौपाई ११

प्रभु जानी कैकई लजानी। प्रभु ने जान लिया कि कैकेयी लज्जित हैं। किसी ने उन्हें बताया नहीं। इस पूरे प्रसंग में कैकेयीजी एक शब्द नहीं बोलतीं। उनके बारे में जो कुछ हमें मिला है वह दो शब्द हैं, सकुचानि और लजानी, और दोनों भीतर की चीज़ें हैं, बाहर से देखने पर जिनका कोई प्रमाण नहीं होता। जो चीज़ कही नहीं गयी, वही जानी गयी, और यह जानना ही इस चौपाई की पहली आधी पंक्ति है।

प्रथम तासु गृह गए भवानी। वे पहले उन्हीं के घर गये। अब देखिये कि तुलसी ने इस पंक्ति को कहाँ रखा है। पिछला दोहा उन्हें महल की ओर रवाना कर चुका था। यह मोड़ चलने और पहुँचने के बीच में डाला गया है, जिससे लौटते हुए राजा का पहला प्रवेश अयोध्या में जिस घर में होता है, वह यही घर हो। और फिर, ताहि प्रबोधि बहुत सुख दीन्हा, उन्हें समझा-बुझाकर बहुत सुख दिया।

क्या समझाया, यह नहीं लिखा। एक वाक्य नहीं, एक शब्द नहीं। पूरे प्रसंग में कैकेयीजी को न कोई भाषण मिलता है, न कोई उलाहना, न कोई दृश्य। उन्हें एक भेंट मिलती है, और उस भेंट का क्रम मिलता है। कहा कुछ नहीं गया, किया यह गया कि पहले वहाँ जाया गया। इस पन्ने पर बाक़ी हर चीज़ के लिये तुलसी के पास ब्योरा है, गलियों की सुगन्ध तक का। यहाँ उनके पास सिर्फ़ क्रम है, और वे उसी पर पूरा वज़न रख देते हैं।

और यह बात किससे कही जा रही है, इस पर तीसरी बार ठहरिये। भवानी। इस पन्ने पर शिवजी तीन बार अपनी पत्नी को पुकारते हैं और तीनों बार ऐसी जगह जहाँ बाहर खड़े आदमी की आँख काम नहीं करती। पहली बार वह भेद, जिसे कोई जान न सका। दूसरी बार वे गुण, जिन्हें कोई कह न सका। और तीसरी बार वह लज्जा, जिसे किसी ने कहा ही नहीं था और जो फिर भी जान ली गयी। तीनों बार पुकार वहाँ पड़ती है जहाँ कथा भीड़ से ओझल हो जाती है।

इसके बाद पुनि निज भवन गवन हरि कीन्हा। फिर श्रीहरि अपने महल को गये। जिस आदमी की प्रतीक्षा में यह पूरा नगर अटारियों पर चढ़ा हुआ है, उसके अपने घर पहुँचने को आधी पंक्ति मिलती है। दूसरे के घर जाने को पूरी दो पंक्तियाँ, अपने घर जाने को आधी। इस पन्ने की सारी नाप-तौल इसी तरह की है, और हर बार वह उसी तरफ़ झुकती है जिधर बाहर से देखने पर कुछ ख़ास नहीं दिख रहा होता।

कृपा के समुद्र जब महल में चले जाते हैं तो नगर के स्त्री-पुरुष सुखी होते हैं, और तभी गुरु वसिष्ठजी ब्राह्मणों को बुला लेते हैं। वे कहते हैं कि आज शुभ घड़ी है, सुन्दर दिन है, सब शुभ योग हैं, और इसके बाद जो वे कहते हैं उसकी दिशा ध्यान देने लायक़ है। वे आज्ञा नहीं देते। वे आज्ञा माँगते हैं, सब द्विज देहु हरषि अनुसासन, आप सब ब्राह्मण हर्षित होकर आज्ञा दीजिये, जिससे श्रीरामचन्द्रजी सिंहासन पर बैठें।

और ब्राह्मण वही कहते हैं जो इस नगर का मन है, कि श्रीरामजी का अभिषेक सारे जगत् को आनन्द देने वाला है, अब विलम्ब न कीजिये, महाराज का तिलक कीजिये। इस पूरे प्रसंग में किसी ने अपने लिये कुछ नहीं माँगा है। यहाँ जो माँगा जा रहा है वह भी किसी और के लिये है, और माँगने वाले वे लोग हैं जिन्हें अभी-अभी आज्ञा देने का अधिकार सौंपा गया है।

जहँ तहँ धावन पठइ पुनि मंगल द्रब्य मगाइ।
हरष समेत बसिष्ट पद पुनि सिरु नायउ आइ॥ १० (ख)॥

दोहा १० (ख)

और प्रसंग यहाँ ख़त्म होता है, सुमन्त्रजी पर। मुनि ने उनसे कहा, वे सुनते ही हर्षित होकर चले, तुरन्त जाकर अनेक रथ, घोड़े और हाथी सजाये, जहाँ-तहाँ दूत दौड़ाकर मांगलिक वस्तुएँ मँगायीं, और फिर लौटकर वसिष्ठजी के चरणों में सिर नवाया, हरष समेत। जो पन्ना दो भाइयों के गले मिलने से शुरू हुआ था, वह एक मन्त्री के काम निपटाकर लौटने और झुकने पर बन्द होता है, और वह ख़ुश है। सिंहासन पर अभी कोई नहीं बैठा। यह पूरा प्रसंग उस चीज़ के ठीक पहले आकर रुक जाता है जिसके लिये यह सब हो रहा था।

सार: महल की ओर चल पड़ने और महल पहुँचने के बीच में तुलसी एक मोड़ रख देते हैं, और श्रीराम अपने घर से पहले कैकेयीजी के घर जाते हैं। वहाँ क्या कहा गया, यह नहीं लिखा जाता। सिर्फ़ यह लिखा जाता है कि पहले वहाँ जाया गया।

और अन्त में, अपनी ओर

इस पूरे प्रसंग में दशरथजी का नाम एक बार भी नहीं आता। यह ध्यान देने लायक़ है, क्योंकि यह पन्ना माताओं से बना है, उसी घर में खड़ा है, और उसी दिन का है जिस दिन उनका बेटा लौटा है। कौसल्याजी अपने मन में यह पूछती हैं कि इन सुकुमार बच्चों ने लंकापति को मारा कैसे, और इसके आगे कुछ नहीं पूछतीं। किसी ने बरसों की गिनती नहीं की। किसी ने यह नहीं बताया कि इस बीच इस नगर में क्या-क्या बीता। जो पाठक किसी और रामकथा से होकर यहाँ आया है, वह इनमें से कई चीज़ों की राह देखता रहेगा, और वे इस प्रसंग में नहीं हैं।

कैकेयीजी को यह पन्ना जितना देता है, उसे गिन लेना चाहिये। तीन जगह उनका नाम आता है। पहली बार, श्रीराम से मिलते हुए वे हृदय में सकुचाती हैं। दूसरी बार, लक्ष्मणजी उनसे बार-बार मिलते हैं और मन का क्षोभ नहीं जाता। तीसरी बार, वे लज्जित जान ली जाती हैं और उनके घर पहले जाया जाता है। वे एक शब्द नहीं बोलतीं। कोई उनसे कुछ नहीं कहता। कोई उनके बारे में कुछ नहीं कहता। और जो एक चीज़ इस पूरे उत्सव में अनसुलझी छोड़ दी जाती है, वह उनके मन की नहीं, दूसरे के मन की है, और तुलसी उसे भी वैसा ही छोड़ देते हैं जैसा वह है।

और अगर इस पन्ने का ढाँचा एक साँस में कहना हो तो वह यह है। इसमें एक चमत्कार है, और वह इसलिये किया जाता है कि किसी को क़तार में न लगना पड़े, और उसका पता किसी को नहीं चलता। इसमें एक प्रश्न है, और वह किसी से पूछा नहीं जाता, एक माँ अपने ही मन से पूछती है। इसमें एक बार किसी को सबसे ऊपर रखा जाता है, और वह जगह उसी क्षण किसी और के हाथ में चली जाती है। और इसमें एक मोड़ है, जो घर पहुँचने से ठीक पहले लिया जाता है। बाक़ी सब कलश, थाल, नगाड़े, गलियाँ और चरण हैं।

इस प्रसंग को पढ़कर सबसे पहले यह खटकता है कि तुलसी ने बड़े और छोटे की जगहें आपस में बदल दी हैं। जो चीज़ सबसे बड़ी है, एक आदमी का एक ही क्षण में असंख्य होकर पूरे नगर से अलग-अलग मिल लेना, वह एक चौपाई में हो जाती है और उसका भेद किसी को मालूम तक नहीं पड़ता। जो चीज़ सबसे छोटी दिखती है, अपने घर जाने से पहले एक दूसरे घर में हो आना, उसके लिये दोहे और चौपाई के बीच में जगह बनायी जाती है और पूरा प्रसंग उसी मोड़ पर आकर सीधा होता है। जिस कवि के पास प्रलय जैसे नगाड़े लिखने का सामान है, वह अपना सबसे भारी वज़न एक क्रम पर रखता है, इस बात पर कि कौन पहले और कौन बाद में।

और जो चित्र अन्त में बचता है वह किसी सिंहासन का नहीं है। शाम के रास्ते पर दौड़ती हुई गौएँ, जिनका दूध अपने आप बह रहा है। एक स्त्री, जो आँसू आँख में ही रोक लेती है क्योंकि घड़ी मंगल की है। एक माँ, जो असम्भव को अपनी आँख से देख चुकी है और फिर भी उसे अपने मन में इस हिसाब से तौल रही है कि इतने सुकुमार बच्चों से यह हुआ कैसे। एक भाई, जो अपना रोष उतार नहीं पाता और फिर भी बार-बार शिष्टाचार निभाने जाता है। और एक आदमी, जिसके लिये पूरा नगर अटारियों पर चढ़ा खड़ा है और जो रास्ते से हटकर एक घर में चला जाता है। उत्तरकाण्ड का यह हिस्सा इतना ही कहता है कि लौटना कोई एक घटना नहीं होती। वह उतने ही टुकड़ों में होता है जितने लोग किसी के लौटने का इन्तज़ार कर रहे थे, और हर टुकड़े को अपनी अलग बारी चाहिये।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, उत्तरकाण्ड, दोहा ६ से १०, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।

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