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माताओं से भेंट, और वह घर जहाँ वे पहले गये

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रामचरितमानसउत्तरकाण्डप्रसंग 2

अयोध्या अपना सब कुछ वापस पाती है। उस दिन राम एक ही क्षण में अनगिनत रूप धरकर सबसे अलग-अलग मिलते हैं। अपने महल की ओर चलते हुए वे रास्ता बदलकर पहले उस घर जाते हैं जिसकी स्वामिनी उनसे मिलते समय सकुचा गयी थीं।

यह प्रसंग वहीं से उठता है जहाँ पिछला छोड़ गया था, और उसकी पहली भेंट में कोई माता नहीं है। दो भाई गले मिलते हैं, और उनमें से एक का नाम नहीं, केवल रिश्ता लिखा है: वह किसका छोटा भाई है। इसके बाद की कथा में ठीक एक चमत्कार है, ठीक एक प्रश्न है। ठीक एक बार किसी को किसी से ऊपर रखा जाता है, और ठीक एक बार रास्ता बदला जाता है। बाक़ी सब दरवाज़े, थाल, नगाड़े और चरण हैं।

इस हिस्से में एक बात लगातार दिखती है। जो सबसे बड़ा काम होता है, वह सबसे छोटी जगह में होता है और किसी को उसका पता तक नहीं चलता। और जो सबसे छोटा काम दिखता है, एक घर में दूसरे घर से पहले चले जाना, उसी के चारों ओर पूरा प्रसंग बँधा है। उत्सव का ब्योरा ख़ूब है, गलियाँ, चौक, कलश, आरती, नगाड़े। पर जहाँ भी कुछ भीतर का कहना होता है, वहाँ दो शब्द लिखकर कथा आगे बढ़ जाती है। वही दो शब्द सबसे देर तक टिकते हैं।

यह कथा यहाँ शिव के मुँह से चल रही है और सुनने वाली पार्वती हैं। कथा कहते हुए शिव तीन बार पार्वती को पुकारते हैं। तीनों बार वे उसी क्षण पुकारते हैं जब कोई ऐसी चीज़ सामने आती है जिसे भीड़ में खड़ा आदमी देख नहीं सकता था। एक बार वह भेद जिसे कोई जान न सका, एक बार वह गुण जिसे कोई कह न सका, और एक बार वह लज्जा जिसे किसी ने कहा ही नहीं था।

भाई, माताएँ और सखा

  • राम जो इस प्रसंग में एक ही बार शक्ति का प्रयोग करते हैं, और वह भी केवल इसलिये कि किसी को अपनी बारी का इन्तज़ार न करना पड़े।
  • लक्ष्मण जो सब माताओं से मिलकर हर्षित होते हैं, कैकेयी से बार-बार मिलते हैं, और जिनके मन का क्षोभ पूरे उत्सव में नहीं जाता।
  • सीता जिनकी सब सासुओं से भेंट थोड़े में पूरी होती है, और वही आशीर्वाद मिलता है जो उस गली के किसी भी घर में मिलता।
  • भरत और शत्रुघ्न जिनके गले मिलने से कथा यहाँ शुरू होती है। शत्रुघ्न का नाम वहाँ नहीं, केवल रिश्ता लिखा है।
  • कौसल्या जो युद्ध के बारे में किसी से कुछ नहीं पूछतीं, केवल अपने मन से पूछती हैं।
  • सुमित्रा जिनके बारे में पूरे प्रसंग में एक ही बात आती है, और वह बात उनकी तड़प नहीं, उनकी जानकारी बताती है।
  • कैकेयी जो लौटने के इस पूरे दिन एक शब्द भी नहीं बोलतीं। उनके बारे में दो ही बातें कही जाती हैं, और उनके घर राम अपने घर से पहले जाते हैं।
  • वसिष्ठ जिनकी कृपा को राम रण की जीत का कारण बताते हैं, और जो अन्त में ब्राह्मणों से आज्ञा माँगते हैं।
  • विभीषण, सुग्रीव, अंगद, हनुमान और वानर-वीर जो अयोध्या में मनुष्य का शरीर धरकर आते हैं, और उस शरीर में पहला काम भरत की बड़ाई का करते हैं।
  • सुमन्त्र जिन पर यह प्रसंग ख़त्म होता है, रथ-घोड़े सजाकर, दूत दौड़ाकर, और लौटकर गुरु के चरणों में सिर रखकर।
  • शिव और पार्वती जिनकी आपसी बातचीत यह कथा ढोकर ला रही है। वे तीनों बार वहीं आमने-सामने आते हैं जहाँ कहानी की आँख बाक़ी सबसे छिप जाती है।

पहली भेंट में कोई माँ नहीं है

प्रसंग का नाम माताओं का है, पर उसकी पहली भेंट में माता एक भी नहीं। पहले दो भाई मिलते हैं: लक्ष्मण, और भरत के छोटे भाई। कथा शत्रुघ्न को यहाँ नाम से नहीं, रिश्ते से बुलाती है, उस शब्द से जो आदमी को उसके भाई से बाँधता है। यह उस कथा का पहला शब्द है जिसका सारा काम एक-एक को एक-एक से वापस जोड़ना है।

मिलने से क्या हुआ, यह जोड़ में नहीं, घटाव में बताया गया है। वियोग से उपजा दुःसह दुःख मिट गया। यह नहीं लिखा कि आनन्द मिला। पहले यह लिखा कि जो इतने दिनों से भीतर बैठा था, वह पोंछ दिया गया। लौटने का पहला काम कुछ पाना नहीं, किसी चीज़ का हट जाना है। सुख इसके बाद आता है, और तब टिकता भी है।

इसके बाद भरत सीता के चरणों में सिर नवाते हैं। यह सबसे पहले होता है: न माताओं की भेंट हुई है, न नगर में प्रवेश, न कोई सभा जुड़ी है। लौटती हुई टोली में भरत का माथा सबसे पहले जिनके चरणों में जाता है, वे सीता हैं। उन्हें जो मिलता है उसका नाम भी लिखा है, परम सुख। जिस आदमी ने इतने दिन राज्य को सिंहासन पर रखी खड़ाऊँ के हवाले रखा, उसे लौटने के दिन पहला सुख एक प्रणाम से मिलता है।

वह प्रणाम भी वे अकेले नहीं करते, छोटे भाई सहित करते हैं। भरत जो भी करते हैं, किसी को साथ लेकर करते हैं। दोनों भाई एक साथ झुकते हैं, और दोनों को एक ही वाक्य में सुख मिलता है। यह प्रसंग किसी को अकेला खड़ा करने का प्रसंग है ही नहीं।

एक साथ सबसे, और किसी को पता नहीं चला

अब नगर सामने आता है। राम को देखकर अयोध्या के लोग हर्षित होते हैं और वियोग से उपजी सारी विपत्ति नष्ट हो जाती है। इसके बाद कथा एक कारण देती है, और वही आगे की बात खोलता है। यह नहीं लिखा कि भीड़ बहुत थी या समय कम था। लिखा यह है कि राम ने सब लोगों को प्रेम से आतुर देखा, यानी हर एक अपनी बारी के लिये बेचैन।

इसके बाद जो होता है वह एक कौतुक है। पोद्दार की टीका इसे चमत्कार कहती है, पर कौतुक में खेल का भाव है: तमाशा, अचरज। इस पूरे प्रसंग में शक्ति का प्रयोग ठीक एक बार होता है। उसका उद्देश्य इतना ही है कि किसी को क़तार में खड़ा न होना पड़े। जिसने अभी लङ्का जीती है, उसकी पहली अलौकिक चेष्टा अयोध्या में यह है कि भीड़ भीड़ न रहे।

उसी क्षण राम असंख्य रूपों में प्रकट हो गये और सबसे मिले, जिससे जैसा योग्य था वैसे। यानी ये एक ही मुलाक़ात की नक़लें नहीं थीं। हर आदमी को वह मिलना मिला जो उसके लिये ठीक बैठता था। और इसका फल भी लिखा है: कृपा की दृष्टि से देखकर उन्होंने सब नर-नारियों को शोक से रहित कर दिया। जितनी सामर्थ्य लगी, वह कुछ दिखाने में नहीं, किसी का शोक उतारने में लगी।

और फिर शिव कहते हैं, “पार्वती, यह भेद किसी ने नहीं जाना।” राम एक क्षण में सबसे मिल लिये, और किसी को पता नहीं चला कि यह हुआ कैसे। चमत्कार का सारा काम हो गया और उसका कोई निशान नहीं बचा।

यह बात शिव पार्वती से उसी जगह कहते हैं जहाँ भीड़ की आँख काम करना बन्द कर देती है। जो नगर में खड़ा था वह भेद नहीं जान सका, और जो कैलास पर बैठकर सुन रही हैं, उन्हें वह बता दिया गया। इस प्रसंग में यह तीन बार होगा, और तीनों बार ऐसी ही जगह पर।

इसके तुरन्त बाद की बात उतनी ही सादी है: इस तरह सबको सुखी करके राम आगे बढ़ गये। असम्भव एक वाक्य में हुआ, बिना किसी घोषणा के, और कथा फिर पैदल चलने लगती है। चमत्कार यहाँ रास्ते का एक मोड़ है, मंज़िल नहीं।

गौएँ, बछड़े, और वह एक शब्द

अब माताएँ आती हैं, और उनका कोई वर्णन नहीं: न वस्त्र, न आभूषण, न चेहरा, न उम्र। सीधे एक उपमा आती है, और वह महल की नहीं, गोशाला की है। कौसल्या आदि सब माताएँ ऐसे दौड़ीं जैसे नयी ब्यायी हुई गौएँ अपने बछड़ों को देखकर दौड़ती हैं। जो यहाँ दिखाना है, उसका पद से कोई लेना-देना नहीं।

और कथा उपमा देकर आगे नहीं बढ़ती। वह उसी गाय का पूरा दिन लिखती है, और उस दिन का हर टुकड़ा किसी असली चीज़ पर बैठता है।

गाय ने अपने छोटे बछड़े को घर पर छोड़ा और वन में चरने गयी, परवश, अपने वश में न होकर। गाय चरने का समय ख़ुद नहीं चुनती। जाना पड़ता है, इसलिये जाती है। इन माताओं के साथ इतने दिनों में जो बीता, उसका ब्योरा कहीं नहीं दिया गया। इस एक शब्द में दे दिया गया, वह भी गाय के हिस्से में रखकर।

फिर दिन ख़त्म होने पर नगर की ओर। बिछोह पूरा एक दिन है और लौटना शाम है। लौटती गाय के थन से दूध चू रहा है और मुँह से हुंकार निकल रही है। जिसे कोई पीने वाला न मिला हो, वह दूध अपने आप बहने लगता है। जिस माँ के पास देने को सब कुछ हो और लेने वाला सामने न हो, उसका यही चित्र है। वह गाँव के किसी भी शाम के रास्ते पर मिल जाता है।

अब भेंट। राम बहुत प्रेम से सब माताओं से मिले और उनसे बहुत प्रकार के कोमल वचन कहे। उन वचनों में से एक भी लिखा नहीं गया। गिनती मिलती है, बहुत प्रकार, और मिज़ाज मिलता है, कोमल, पर बात नहीं मिलती। माताओं का पक्ष पूरी उपमा लेता है और बेटे का पक्ष दो विशेषण।

अन्त में हिसाब बराबर हो जाता है। वियोग से उपजी भयानक विपत्ति चली गयी, और माताओं ने अगणित सुख और हर्ष पाये। वही क्रम फिर है: पहले जो भीतर बैठा था उसका जाना, फिर जो मिलना था उसका मिलना।

एक साँस में दो माताएँ

इसके बाद का हिस्सा दो टुकड़ों में है, और हर टुकड़े में दो माताओं जितनी बात। कथा न किसी को समझाती है, न किसी पर टीका करती है। दोनों को साथ रखकर छोड़ देती है।

पहले सुमित्रा। पूरे प्रसंग में उनके बारे में यही एक बात आती है, और उसमें उनकी अपनी कोई भावना दर्ज नहीं। यह नहीं लिखा कि वे रोयीं, दौड़ीं या तड़पीं। लिखा यह है कि वे अपने बेटे से यह जानकर मिलीं कि उसकी प्रीति राम के चरणों में है। माँ अपने बेटे से उस चीज़ के रास्ते मिलती है जिससे बेटा प्रेम करता है।

फिर दूसरी माता: राम से मिलते समय कैकेयी हृदय में बहुत सकुचायीं। पूरी सूचना इतनी ही है। किसी ने कुछ कहा नहीं, उन्होंने कुछ कहा नहीं। यह भी नहीं लिखा कि राम ने यह सकुचाहट देखी या नहीं। दोनों माताएँ साथ-साथ आती हैं, और दोनों के बीच तुलना का एक भी शब्द नहीं।

दूसरा टुकड़ा लक्ष्मण का है, और वह दो हिस्सों में टूटता है। पहले हिस्से में सब ठीक है: वे सब माताओं से मिले, आशीर्वाद पाया, हर्षित हुए। फिर कैकेयी से वे बार-बार मिले। बार-बार मिलना उस आदमी का काम है जो शिष्टाचार में कोई कमी नहीं छोड़ना चाहता।

और अन्त में: मन का क्षोभ नहीं जाता। पोद्दार क्षोभ के आगे कोष्ठक में रोष लिखते हैं। इस पूरी बात में कर्ता लक्ष्मण हैं, और आख़िर में जो बचा रह जाता है वह भी उन्हीं के खाते में बैठता है। बाहर से सब ठीक कर लिया गया और भीतर से कुछ ठीक नहीं हुआ।

कथा इस बात का कुछ नहीं करती: न इसे सही ठहराती है, न ग़लत। न कोई उपदेश, न कोई सफ़ाई। यह अकेली गाँठ इस पूरे उत्सव में खुली छोड़ दी जाती है, और कथा सीधे सीता की ओर मुड़ जाती है।

सासुओं का आशीर्वाद और कौसल्या का प्रश्न

सीता की बारी आती है, और वह थोड़े में पूरी होती है। जिनके लिये वह पूरा युद्ध लड़ा गया, उनका ससुराल लौटना दो-चार बातों में पूरा होता है, और उनमें बड़प्पन का एक भी शब्द नहीं।

वे सब सासुओं से मिलीं, उनके चरणों लगीं, और बहुत हर्ष उन्हीं को हुआ, यानी झुकने वाली को। फिर सासुएँ कुशल पूछती हैं, वही सवाल जो किसी भी घर में किसी भी बहू से पूछा जाता है, और आशीर्वाद देती हैं, “आपका सुहाग अचल हो।” यह उस गली के किसी भी घर का आशीर्वाद है। सीता किसी विजय की स्मृति की तरह नहीं, घर की बहू की तरह घर लौटती हैं।

इसके बाद माताओं की आँखों का ब्योरा आता है। सब राम का कमल-सा मुख देख रही हैं, और आँसू उमड़ रहे हैं। पर मंगल का समय जानकर वे आँसू आँखों में ही रोक लेती हैं। जिसे सबसे ज़्यादा बहना चाहिये था, उसे रोका जा रहा है, और रोकने का कारण दुःख नहीं, शुभ है। सोने के थाल से आरती उतरती है और वे बार-बार राम के अंगों की ओर देखती हैं। हाथ काम कर रहे हैं और आँख अपनी जगह से हटती नहीं।

नाना प्रकार से निछावर होती है, हृदय परमानन्द से भरते हैं। इसी बीच कौसल्या बार-बार राम को देखती हैं। कथा उन्हें यहाँ कृपा का समुद्र और युद्ध में धीर कहती है। यहाँ तक सब उत्सव है। फिर कथा उनके मन का पर्दा उठाती है, और भीतर जो मिलता है वह धन्यवाद नहीं है।

कौसल्या सोचती हैं, “इन्होंने लङ्का के राजा रावण को किस तरह मारा?” यह प्रश्न वे किसी से पूछ नहीं रहीं, न बेटे से, न देवर से, न किसी सैनिक से। वे अपने हृदय में पूछ रही हैं, और बार-बार। युद्ध जीता जा चुका है, जीतने वाला सामने खड़ा है, आरती का थाल हाथ में है, और उनके मन में दो तस्वीरें एक साथ नहीं बैठ रहीं।

और जो कारण वे अपने मन को देती हैं, वह और भी छोटा है: “मेरे ये दोनों बच्चे बहुत ही सुकुमार हैं। राक्षस तो बड़े भारी योद्धा और महाबली थे।” जो अभी रणभूमि से उठकर आये हैं, उनके लिये वे बच्चों वाला शब्द इस्तेमाल कर रही हैं। और गिनती दो की है। लक्ष्मण सुमित्रा के पुत्र हैं, पर कौसल्या के हृदय का हिसाब अलग चलता है, और वहाँ दोनों उन्हीं के हैं। किसी ने यह घोषित नहीं किया कि यह एक घर है। माँ के इस एक वाक्य ने कर दिया।

कौसल्या न गर्व करती हैं, न बखान, न किसी से युद्ध का हाल सुनती हैं। वे वही करती हैं जो माँ करती है: बेटे के शरीर को देखकर यह हिसाब लगाना कि इतने से शरीर से इतना बड़ा काम हुआ कैसे। वीरता का प्रमाणपत्र यहाँ किसी दरबार से नहीं, एक हैरान माँ के भीतर से आता है।

और कथा उन्हें वहीं रोक देती है। लक्ष्मण और सीता सहित राम को माता देख रही हैं, मन परमानन्द में डूबा है और शरीर बार-बार पुलकित हो रहा है। प्रश्न का उत्तर नहीं आया। वह प्रश्न उसी देखने में सोख लिया गया जिससे वह उठा था। जो माँ पूछ रही थी कि यह हुआ कैसे, वही अब सामने खड़े तीनों को देखकर परमानन्द में डूबी है।

जो भरत से भी अधिक प्रिय हैं

अब लौटने वाली टोली का दूसरा हिस्सा सामने आता है। विभीषण, वानरराज सुग्रीव, नल, नील, जाम्बवान्, अंगद, हनुमान और बाक़ी सब वीर मनोहर मनुष्य-शरीर धारण कर लेते हैं। उन्होंने ऐसा क्यों किया, किसने कहा, यह नहीं बताया गया। बस इतना कि उन्होंने ऐसा किया।

इस जगह विभीषण को कथा लङ्का का राजा कहती है। थोड़ा ही पहले कौसल्या ने अपने मन में पूछा था कि लङ्का का राजा मारा कैसे गया, और वहाँ वह उपाधि रावण के लिये थी। इतने कम फ़ासले में वही उपाधि मालिक बदल लेती है, और कथा इस पर एक शब्द ख़र्च नहीं करती। जिस पद के लिये वह सारा युद्ध हुआ, वह अब चुपचाप किसी और के नाम के आगे लगा हुआ अयोध्या की गली में चल रहा है।

और मनुष्य के शरीर में उन्होंने सबसे पहले जो काम किया, वह यह है।

वे भरत की बड़ाई करते हैं: उनका प्रेम, उनका स्वभाव, उनका व्रत, उनके नियम, और यह सब आदर से और बहुत प्रेम से। फिर वे नगरवासियों की रीति देखते हैं और राम के चरणों में उनकी प्रीति की सराहना करते हैं। जो अभी समुद्र लाँघकर, युद्ध लड़कर लौटे हैं, वे अयोध्या में अपने पहले क्षण उन लोगों की तारीफ़ में लगाते हैं जो घर पर रह गये थे। थोड़ी ही देर बाद जो कहा जायगा, वह इसी के ऊपर टिका है।

राम अपने सखाओं को बुलाते हैं, और अयोध्या में उनकी पहली सीख यह है कि किसके चरणों में लगना है: “मुनि के चरणों में लगिये।” और इसका कारण शिष्टाचार नहीं बताते। राम कहते हैं, “गुरु वसिष्ठ हमारे पूरे कुल के पूज्य हैं। इन्हीं की कृपा से रण में राक्षस मारे गये।” जीत का श्रेय वे उसे सौंप देते हैं जो युद्ध में था ही नहीं, जिसने समुद्र नहीं लाँघा। यह वे उन्हीं के सामने कहते हैं जो युद्ध में थे।

और फिर वे घूमकर वही चीज़ वापस दे देते हैं। राम मुनि से कहते हैं, “मुनि, सुनिये, ये सब मेरे सखा हैं। ये युद्ध के समुद्र में मेरे लिये बेड़े बने।” बेड़ा हथियार नहीं होता। वह आदमी को उस पार ले जाता है जहाँ वह अपने बल से नहीं जा सकता था। जिसके लिये पूरा समुद्र बाँधा गया था, वह अपने साथियों को पार कराने वाली नाव कहता है, और अपने को वह जिसे पार कराया गया।

फिर राम कहते हैं, “मेरे हित के लिये इन्होंने अपना जन्म तक हार दिया।” फिर वे कहते हैं, “ये मुझे भरत से भी अधिक प्रिय हैं।” अकेले में यह वाक्य किसी को ऊपर और किसी को नीचे रखना लगता है। अपनी जगह पर रखकर यह कुछ और हो जाता है।

क्योंकि थोड़ी ही देर पहले वही वानर भरत की बड़ाई कर रहे थे। अपना सारा आदर उन्होंने भरत के नाम कर दिया था। और अब उनके सामने वह जगह रख दी जाती है जो इस कथा में हमेशा भरत की रही है। यह उत्तर है, तुलना नहीं। इस पूरे हिस्से में कोई अपने पास कुछ नहीं रखता। जो जिसे दिया जाता है, वह उसी के हाथ से वापस चल देता है।

राम के वचन सुनकर सब प्रेम और आनन्द में डूब गये। उस डूबने की नाप भी दी गयी है: पल-पल नये सुख उपज रहे हैं। एक सुख नहीं जो देर तक चले। नये सुख, जो बनते रहते हैं।

और फिर कौसल्या इस काम को पूरा कर देती हैं। वे सब उनके चरणों में माथा नवाते हैं, और कौसल्या हर्षित होकर आशीष देती हैं, “आप मुझे राम के समान प्रिय हैं।” बेटे ने कहा था, भरत से भी अधिक। माँ कहती हैं, राम के समान। इस घर में कोई देने में पीछे रहने को तैयार नहीं। और जो वाक्य इन वानरों को सचमुच घर का बनाता है, वह राजा के मुँह से नहीं, माँ के मुँह से आता है।

नगर, दरवाज़े दरवाज़े

आकाश फूलों की वर्षा से भर जाता है, राम अपने महल की ओर चलते हैं, और नगर के स्त्री-पुरुष अटारियों पर चढ़कर देखते हैं। इसके बाद नगर को अपना हिस्सा मिलता है, और उसमें ख़ुशी एक ख़ास इकाई में नापी जाती है।

सबने अपने-अपने दरवाज़े सजाये। यह किसी की आज्ञा से हुई सजावट नहीं है। सोने के कलश हर घर के सामने अलग-अलग रखे गये, और बंदनवार, ध्वजा और पताकाएँ भी सबने अपने लिये लगायीं, मंगल के लिये। उत्सव यहाँ दरवाज़ों में गिना जा रहा है, और इसीलिये उसका आकार पूरे नगर के बराबर हो जाता है।

फिर ब्योरा फैलता है। सारी गलियाँ सुगन्ध से सींची जाती हैं, गजमुक्ताओं से चौक पुराये जाते हैं, तरह-तरह के मंगल-साज सजते हैं और नगर में बहुत से डंके बजते हैं। स्त्रियाँ जहाँ-तहाँ निछावर कर रही हैं और हर्षित होकर आशीर्वाद दे रही हैं। युवतियाँ सोने के थालों में अनेक प्रकार की आरती सजाकर मंगलगान कर रही हैं। यह किसी एक मंच का उत्सव नहीं। पूरे नगर में एक साथ, हर मोड़ पर अलग-अलग हो रहा है।

जिसकी आरती हो रही है, उसे कथा दो नामों से पुकारती है, और दोनों जीत के नाम नहीं। पहला, दुःख को हरने वाला। दूसरा, रघुकुल के कमल-वन को खिलाने वाला सूर्य। रावण का नाम यहाँ कहीं नहीं, लङ्का का नाम कहीं नहीं। यह नगर पूरे युद्ध की ख़बरें सुनता रहा। वह आरती के समय उस काम का नाम गाता है जो उसके अपने ऊपर हुआ: दुःख का हटना और बन्द फूल का खुलना।

फिर कथा बड़े गवाह बुलाती है, और वे गवाह काम नहीं आते। नगर की शोभा, सम्पत्ति और कल्याण का वर्णन वेद करते हैं, शेष करते हैं, सरस्वती करती हैं। और उसके तुरन्त बाद यह।

वे भी यह चरित्र देखकर ठगे-से रह जाते हैं। और शिव कहते हैं, “पार्वती, तब भला मनुष्य उनके गुण कैसे कह सकते हैं?” यह दूसरी बार है जब शिव पार्वती को पुकारते हैं, और फिर उसी तरह की जगह पर। पहली बार सीमा जानने की थी, किसी ने भेद नहीं जाना। इस बार सीमा कहने की है, कोई कह नहीं सकता। गलियों की सुगन्ध और थालों की आरती के ठीक बाद यह लिखा गया है कि वेद, शेष और सरस्वती भी यहाँ हारकर खड़े रह गये।

और अब वह उपमा जिसमें इस पूरे उत्सव का सार बैठा है। स्त्रियाँ कुमुदिनी हैं, अयोध्या सरोवर है, और राम का विरह सूर्य है। कुमुदिनी रात में खिलती है। उसके लिये दिन की धूप मुरझाना है और चन्द्रमा जीवन। इसीलिये आगे राम को पूर्णिमा का चन्द्रमा कहा गया है, और इसीलिये यहाँ विरह को हराया नहीं जाता।

उसे अस्त होना पड़ता है। सूर्य मारा नहीं जाता, डूब जाता है, और डूबते ही सरोवर भर के फूल अपने आप खिल जाते हैं। किसी ने उन्हें खोला नहीं। जो उन्हें बन्द रखे था, वह हट गया। जो क्रम पहली भेंट में था, वही आख़िरी उपमा में है: पहले कुछ जाता है, फिर कुछ होता है। इसके बाद अनेक शुभ शकुन होते हैं, आकाश में नगाड़े बजते हैं, और नगर के स्त्री-पुरुषों को सनाथ करके राम महल की ओर चल देते हैं।

पहले उनके घर

कथा अपना वाक्य पूरा कर चुकी है। दिशा तय हो गयी है, राम महल की ओर चल दिये हैं, और लगता है कि अगले ही क्षण वे वहाँ पहुँच जायँगे। वे वहाँ नहीं पहुँचते।

राम ने जान लिया कि कैकेयी लज्जित हैं। किसी ने उन्हें बताया नहीं। इस पूरे प्रसंग में कैकेयी एक शब्द नहीं बोलतीं। उनके बारे में दो ही शब्द हैं, सकुचाना और लजाना, और दोनों भीतर की चीज़ें हैं, जिनका बाहर से कोई प्रमाण नहीं होता। जो कहा नहीं गया, वही जाना गया।

शिव कहते हैं, “पार्वती, राम पहले उन्हीं के घर गये।” कथा उन्हें अभी महल की ओर रवाना कर चुकी थी। यह मोड़ चलने और पहुँचने के बीच में है, जिससे लौटते हुए राजा का अयोध्या में पहला प्रवेश इसी घर में हो। और फिर उन्हें समझा-बुझाकर बहुत सुख दिया।

क्या समझाया, यह नहीं लिखा: एक वाक्य नहीं, एक शब्द नहीं। कैकेयी को न कोई भाषण मिलता है, न कोई उलाहना, न कोई दृश्य। उन्हें एक भेंट मिलती है, और उस भेंट का क्रम। कहा कुछ नहीं गया। किया यह गया कि पहले वहाँ जाया गया। बाक़ी हर चीज़ का ब्योरा है, गलियों की सुगन्ध तक का। यहाँ केवल क्रम है, और सारा वज़न उसी पर है।

यह पार्वती को तीसरी पुकार है। पहली बार वह भेद, जिसे कोई जान न सका। दूसरी बार वे गुण, जिन्हें कोई कह न सका। और तीसरी बार वह लज्जा, जिसे किसी ने कहा ही नहीं था और जो फिर भी जान ली गयी। तीनों बार पुकार वहाँ पड़ती है जहाँ कथा भीड़ से ओझल हो जाती है।

इसके बाद राम अपने महल को गये। जिसकी प्रतीक्षा में पूरा नगर अटारियों पर चढ़ा है, उसके अपने घर पहुँचने को कथा आधा वाक्य देती है। कैकेयी के घर जाने को उससे पहले की लगभग पूरी बात मिलती है।

राम जब महल में चले जाते हैं तो नगर के स्त्री-पुरुष सुखी होते हैं, और तभी गुरु वसिष्ठ ब्राह्मणों को बुला लेते हैं। वे कहते हैं, “आज शुभ घड़ी है, सुन्दर दिन है, सब शुभ योग हैं।” और फिर वे आज्ञा नहीं देते, आज्ञा माँगते हैं: “आप सब ब्राह्मण हर्षित होकर आज्ञा दीजिये, जिससे रामचन्द्र सिंहासन पर बैठें।”

वसिष्ठ के वचन सब ब्राह्मणों को बहुत अच्छे लगते हैं। वे वही कहते हैं जो इस नगर का मन है: “राम का अभिषेक सारे जगत् को आनन्द देने वाला है। मुनिश्रेष्ठ, अब विलम्ब न कीजिये, महाराज का तिलक कीजिये।” इस पूरे प्रसंग में किसी ने अपने लिये कुछ नहीं माँगा। यहाँ जो माँगा जा रहा है वह भी किसी और के लिये है, और माँगने वाले वे हैं जिन्हें अभी आज्ञा देने का अधिकार सौंपा गया है।

और प्रसंग सुमन्त्र पर ख़त्म होता है। मुनि ने उनसे कहा, वे सुनते ही हर्षित होकर चले। तुरन्त जाकर उन्होंने अनेक रथ, घोड़े और हाथी सजाये, जहाँ-तहाँ दूत दौड़ाकर मांगलिक वस्तुएँ मँगायीं। फिर लौटकर वसिष्ठ के चरणों में हर्ष के साथ सिर नवाया। जो कथा दो भाइयों के गले मिलने से शुरू हुई थी, वह एक मन्त्री के काम निपटाकर लौटने और झुकने पर रुकती है। सिंहासन पर अभी कोई नहीं बैठा। प्रसंग उस चीज़ के ठीक पहले रुक जाता है जिसके लिये यह सब हो रहा था।

बड़ा काम, छोटी जगह

इस पूरे प्रसंग में दशरथ का नाम एक बार भी नहीं आता, यद्यपि यह कथा माताओं की है। वह उसी घर में खड़ी है, और उसी दिन की है जिस दिन उनका बेटा लौटा है। कौसल्या अपने मन में यह पूछती हैं कि इन सुकुमार बच्चों ने लङ्का के राजा को मारा कैसे, और इसके आगे कुछ नहीं पूछतीं। किसी ने बरसों की गिनती नहीं की। किसी ने यह नहीं बताया कि इस बीच इस नगर में क्या-क्या बीता। दूसरी रामकथाओं में मिलने वाली ऐसी कई चीज़ें इस प्रसंग में नहीं हैं।

कैकेयी का नाम तीन जगह आता है। पहली बार, राम से मिलते हुए वे हृदय में सकुचाती हैं। दूसरी बार, लक्ष्मण उनसे बार-बार मिलते हैं और मन का क्षोभ नहीं जाता। तीसरी बार, वे लज्जित जान ली जाती हैं और उनके घर पहले जाया जाता है। वे एक शब्द नहीं बोलतीं। कोई उनसे कुछ नहीं कहता। कोई उनके बारे में कुछ नहीं कहता। और जो एक चीज़ इस उत्सव में अनसुलझी छोड़ दी जाती है, वह उनके मन की नहीं, दूसरे के मन की है। वह भी वैसी ही छोड़ दी जाती है जैसी है।

इस प्रसंग का ढाँचा संक्षेप में यह है। एक चमत्कार है, जो इसलिये किया जाता है कि किसी को क़तार में न लगना पड़े, और उसका पता किसी को नहीं चलता। एक प्रश्न है, जो किसी से पूछा नहीं जाता। एक माँ अपने ही मन से पूछती है। एक बार किसी को सबसे ऊपर रखा जाता है, और वह जगह उसी क्षण किसी और के हाथ में चली जाती है। और एक मोड़ है, जो घर पहुँचने से ठीक पहले लिया जाता है। बाक़ी सब कलश, थाल, नगाड़े, गलियाँ और चरण हैं।

बड़े और छोटे की जगहें यहाँ आपस में बदल गयी हैं। जो सबसे बड़ा है, एक क्षण में असंख्य होकर पूरे नगर से अलग-अलग मिल लेना, वह एक वाक्य में हो जाता है। उसका भेद किसी को मालूम नहीं पड़ता। जो सबसे छोटा दिखता है, अपने घर से पहले एक दूसरे घर में हो आना, उसके लिये चलने और पहुँचने के बीच में जगह बनायी जाती है। पूरा प्रसंग उसी मोड़ पर आकर सीधा होता है: कौन पहले और कौन बाद में।

अन्त में जो चित्र बचता है वह किसी सिंहासन का नहीं। शाम के रास्ते पर दौड़ती गौएँ, जिनका दूध अपने आप बह रहा है। माताएँ, जो आँसू आँख में ही रोक लेती हैं क्योंकि घड़ी मंगल की है। एक माँ, जो असम्भव को अपनी आँख से देख चुकी है और फिर भी मन में तौल रही है कि इतने सुकुमार बच्चों से यह हुआ कैसे। एक भाई, जो अपना रोष उतार नहीं पाता और फिर भी बार-बार शिष्टाचार निभाने जाता है। और राम, जिनके लिये पूरा नगर अटारियों पर चढ़ा खड़ा है और जो रास्ते से हटकर एक घर में चले जाते हैं। लौटना कोई एक घटना नहीं होती। वह उतने ही टुकड़ों में होता है जितने लोग राह देख रहे थे, और हर टुकड़े को अपनी बारी चाहिये।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, उत्तरकाण्ड, दोहा 6 से 10, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।