Lulla Family

अजिर बिहारी: आँगन का बालक और उदर के ब्रह्माण्ड

रामचरितमानस · उत्तरकाण्ड · अजिर बिहारी: आँगन का बालक और उदर के ब्रह्माण्ड

अजिर बिहारी: आँगन का बालक और उदर के ब्रह्माण्ड

अयोध्या के आँगन में एक बालक अपनी परछाईं देखकर नाचता है, एक कौआ उसके चरण छूने बढ़ता है, और फिर वही बालक घुटनों के बल दौड़कर उसे ब्रह्मलोक तक खदेड़ता है और हँसते-हँसते अपने मुख में उतार लेता है।

यह पन्ना एक कथा के भीतर की कथा है। उत्तरकाण्ड में काकभुशुण्डि गरुड़ को अपनी बात सुना रहे हैं, और इस जगह वे उस समय पर पहुँचते हैं जब वे अयोध्या के राजमहल के आँगन में एक बालक के साथ खेलते थे। जो बालक है वह राम हैं, और जो उनके साथ खेल रहा है वह एक कौआ है। सात दोहों में पहले उस बालक का रूप पैर से सिर तक गिनाया जाता है, फिर एक खेल शुरू होता है जो आँगन से उठकर ब्रह्मलोक तक और फिर उसी बालक के मुख के भीतर तक चला जाता है, और वहाँ से लौटकर फिर उसी आँगन में उतर आता है।

इस पन्ने की चाल तीन मोड़ लेती है। पहला मोड़ तब आता है जब भुशुण्डि के मन में एक शंका जगती है, कि जो साधारण बच्चों की तरह रो रहा और हँस रहा है, वह चिदानन्दघन प्रभु यह कौन-सा चरित्र कर रहे हैं। दूसरा मोड़ तब आता है जब वह बालक घुटनों और हाथों के बल उन्हें पकड़ने दौड़ता है और वे उड़कर भागते हैं। तीसरा तब, जब वे उसके मुख में चले जाते हैं और वहाँ असंख्य ब्रह्माण्ड देखते हैं, हर एक में अपनी ही एक अवधपुरी, अपनी ही एक सरयू, और हर एक में वही एक बालक। बीच में तुलसी माया, जीव और ईश्वर पर कुछ चौपाइयाँ रखते हैं, और वे यहाँ इसलिये हैं कि भुशुण्डि को गरुड़ से यह कहना है कि वह माया उन्हें उस तरह क्यों नहीं डुबो पायी जिस तरह और जीवों को डुबोती है।

यह तुलसीदास का रामचरितमानस है। काकभुशुण्डि की यह पूरी कथा तुलसी की अपनी है, वाल्मीकि की रामायण में इसका कोई ठिकाना नहीं। इस पन्ने पर लक्ष्मण का नाम एक बार भी नहीं आता, सीता का नाम केवल राम के एक विशेषण में आता है, और दशरथ तथा कौसल्या का नाम तुलसी की पंक्तियों में एक ही चौपाई में आता है, और वह भी उदर के भीतर के किसी दूसरे ब्रह्माण्ड में। यहाँ सब कुछ एक बालक, एक कौए और उनके बीच की दो अंगुल की दूरी पर टिका है।

इस प्रसंग के मुख्य किरदार

  • काकभुशुण्डि कथा कहनेवाले। वर्षों पहले वे अयोध्या के आँगन में इस बालक के साथ खेले थे, और यहाँ वही स्मृति सुना रहे हैं। तुलसी उन्हें भसुंड भी लिखते हैं।
  • गरुड़ सुननेवाले। भुशुण्डि उन्हें इस पन्ने पर खगनायक, खगराया, हरिजान, बिहंगबर, उरगारी, अंडज राया, तात और मतिधीर कहकर पुकारते हैं, और कई नाम ठीक उसी जगह आते हैं जहाँ कथा को उस नाम की ज़रूरत है।
  • बालक राम रघुराई, अजिर बिहारी। तोतले बोल, दो-दो दाँत, पीली महीन झँगुली, और वह हाथ जो ब्रह्मलोक तक दो अंगुल पीछे रहता है। इस पूरे पन्ने पर वे एक वाक्य नहीं बोलते।
  • चारों भाई आँगन में नित्य खेलनेवाले, जिनमें से किसी का नाम इस पन्ने पर अलग से नहीं लिया गया। खेल का मर्म उन्हें भी नहीं मालूम।
  • दशरथ और कौसल्या माता-पिता, जिन्हें भी खेल का भेद नहीं मालूम, और जिनका नाम तुलसी की पंक्तियों में केवल उदर के भीतर के ब्रह्माण्डों की गिनती में आता है।
  • माया और मोह रघुपति की प्रेरणा से भुशुण्डि पर छानेवाली माया, और उससे उपजा मोह, जो इस पन्ने पर पहले पवन बनकर उड़ाता है और फिर कीचड़ बनकर जमा देता है।

सोने का महल, और वह आँगन जिसका वर्णन नहीं होता

भुशुण्डि पहली चौपाई में गरुड़ को खगनायक कहकर सम्बोधित करते हैं, और जो कहने जा रहे हैं उसके बारे में एक बात पहले ही कह देते हैं, कि राम का चरित्र सेवक को सुख देनेवाला है। फिर वे राजमहल का चित्र खींचते हैं, और जितनी जगह उसे देते हैं वह गिनकर देखने लायक है। महल सब प्रकार से सुन्दर है, सोने का है, उसमें नाना जाति के मणि जड़े हैं। बस। एक पंक्ति, और राजमहल पूरा हो गया।

पर आँगन आते ही कलम ठहर जाती है। बरनि न जाइ, वर्णन नहीं हो सकता। जिस महल में सोना और मणि हैं वह एक पंक्ति में निबट गया, और जिस आँगन के बारे में सोने-मणि जैसा कुछ कहा ही नहीं गया, उसके बारे में तुलसी कहते हैं कि यह कहा नहीं जा सकता। कारण उसी आधी पंक्ति में है, जहँ खेलहिं नित चारिउ भाई। आँगन की सुन्दरता उसकी दीवारों से नहीं, उसमें खेलनेवालों से है। और चारों भाई एक साथ गिनाये गये हैं, कोई नाम नहीं, कोई क्रम नहीं। यह पन्ना उन चारों में से एक पर टिकने जा रहा है, पर उसके पहले तुलसी यह बता देते हैं कि आँगन में चार बच्चे थे, और राम उनमें से एक थे।

बरनि न जाइ रुचिर अँगनाई । जहँ खेलहिं नित चारिउ भाई॥
बालबिनोद करत रघुराई । बिचरत अजिर जननि सुखदाई॥

चौपाई १

बालबिनोद करत रघुराई, बालकों का खेल करते हुए रघुराई। यहाँ रघुराई शब्द पर ठहरना चाहिये। जो आँगन में विचर रहा है उसे कवि रघुकुल का राजा कहकर बुलाता है, और उसी साँस में उसे बच्चों का खेल करते हुए दिखाता है। और खेल किसके लिये है, यह भी उसी पंक्ति में है, जननि सुखदाई। माता को सुख देनेवाला। इस पूरे प्रसंग में यह पहली जगह है जहाँ खेल का कोई प्रयोजन बताया गया है, और प्रयोजन माता हैं। इसे याद रखना चाहिये, क्योंकि आगे एक जगह आयेगी जहाँ तुलसी कहेंगे कि इस खेल का मर्म माता-पिता को भी नहीं मालूम था। जिनके सुख के लिये खेल हो रहा है, उन्हें उस खेल का भेद नहीं मालूम। दोनों बातें एक ही पन्ने पर हैं और दोनों सच हैं।

सार: भुशुण्डि गरुड़ से कहते हैं कि राम का चरित्र सेवक को सुख देता है। सोने और मणियों का राजमहल एक पंक्ति में निबट जाता है, पर वह आँगन जहाँ चारों भाई नित्य खेलते हैं, उसका वर्णन नहीं हो पाता। वहाँ रघुराई बालकों का खेल करते हुए विचर रहे हैं, और वह खेल माता को सुख देनेवाला है।

चरणों से सिर तक

अब भुशुण्डि उस बालक को देखते हैं, और जिस क्रम से देखते हैं वह क्रम ही इस हिस्से की बात है। वे शरीर के रंग से शुरू करते हैं, फिर चरणों पर आते हैं, और वहाँ से ऊपर चढ़ते हैं। नख, तलवे के चिह्न, नूपुर, करधनी, उदर, नाभि, छाती, हथेली, भुजा, कंधे, गला, ठुड्डी, मुख, ओंठ, दाँत, गाल, नाक, मुसकान, नेत्र, ललाट, भौंह, कान, और अन्त में केश। यह क्रम नीचे से ऊपर का है। एक कौआ आँगन की धरती पर है, और उसकी आँख जहाँ पहले पड़ेगी वह चरण ही हैं। कवि ने चित्र उसी की आँख से खींचा है जो देख रहा था।

मरकत मृदुल कलेवर स्यामा। अंग अंग प्रति छबि बहु कामा॥
नव राजीव अरुन मृदु चरना। पदज रुचिर नख ससि दुति हरना॥

चौपाई २

मरकत मणि के समान हरी झलक वाला साँवला और कोमल शरीर, अंग-अंग में बहुत से कामदेवों की छबि। और फिर चरण। नये लाल कमल के समान लाल और कोमल चरण, और उन चरणों के नख जो चन्द्रमा की कान्ति हर लेते हैं। नख एक बच्चे के हैं, और उन नखों के सामने चन्द्रमा हार रहा है। यहाँ से कवि की आँख जिस पर जाती है वह वज्र आदि चार सुन्दर चिह्न हैं, जिन्हें टीका तलवे के चिह्न बताती है और वज्र, अंकुश, ध्वजा और कमल के नाम से गिनाती है। ये चिह्न वहाँ हैं जहाँ से केवल धरती पर बैठा हुआ कोई उन्हें देख सकता है। पैरों में मधुर शब्द करनेवाले नूपुर हैं, कटि में सोने की बनी, मणि-रत्न से जड़ी करधनी है जिसकी किंकिणी सुहावनी बज रही है। यानी बालक जहाँ भी जाता है, उसके पहले उसकी आवाज़ पहुँचती है।

रेखा त्रय सुंदर उदर नाभी रुचिर गँभीर।
उर आयत भ्राजत बिबिधि बाल बिभूषन चीर॥ ७६॥

दोहा ७६

उदर पर तीन रेखाएँ, नाभि सुन्दर और गहरी, और विशाल वक्ष पर बच्चों के अनेक प्रकार के आभूषण और वस्त्र। बाल बिभूषन, यह शब्द देखने का है। छाती चौड़ी है, उर आयत, पर उस पर जो पड़ा है वह बच्चों का गहना है। तुलसी इस बालक को कहीं भी बड़ा बनाकर नहीं दिखाते। उसकी हर चीज़ उसकी उम्र की है। हथेलियाँ लाल हैं, नख और अँगुलियाँ मन हरती हैं, भुजाएँ विशाल हैं और उन पर सुन्दर आभूषण हैं। कंधे सिंह के बच्चे के जैसे हैं, बाल केहरि, यहाँ भी सिंह नहीं, सिंह का शावक। गला शंख के समान है, ठुड्डी सुन्दर है, और मुख छबि की सीमा है।

और तब वह चौपाई आती है जिसमें तुलसी इस बालक की उम्र बता देते हैं, बिना कोई संख्या लिखे। कलबल बचन, तोतले बोल। अधर अरुनारे, लाल-लाल ओंठ। और दुइ दुइ दसन बिसद बर बारे, उज्ज्वल, सुन्दर, छोटे-छोटे दो-दो दाँत। टीका बताती है, ऊपर दो, नीचे दो। इसी से मालूम हो जाता है कि यह बालक किस अवस्था का है। वह उस उम्र में है जब दाँत आना शुरू हुए हैं और बोल अभी साफ़ नहीं हुए। इसीलिये आगे वह घुटनों और हाथों के बल दौड़ेगा, और यह विवरण वहाँ पहुँचकर याद आयेगा। गाल सुन्दर हैं, नाक मनोहर है, और मुसकान चन्द्रमा की किरणों जैसी है, जो सब सुख देती है।

नील कंज लोचन भव मोचन । भ्राजत भाल तिलक गोरोचन॥
बिकट भृकुटि सम श्रवन सुहाए। कुंचित कच मेचक छबि छाए॥

चौपाई ३

नीले कमल के समान नेत्र, भव मोचन, जन्म-मरण से छुड़ानेवाले। इस पूरे नख-शिख में यह अकेला शब्द है जो शरीर का नहीं है। तलवे से केश तक हर चीज़ रंग, आकार और ध्वनि से बतायी गयी है, और बीच में, आँखों पर पहुँचकर, कवि एक क्षण के लिये चित्र से बाहर निकलता है और कह देता है कि ये आँखें क्या करती हैं। फिर तुरन्त चित्र में लौट आता है। ललाट पर गोरोचन का तिलक, टेढ़ी भौंहें, सम और सुन्दर कान, और काले घुँघराले केशों की छबि। चित्र सिर पर जाकर पूरा होता है, और अब यह बालक चलने को तैयार है।

सार: भुशुण्डि बालक राम का रूप नीचे से ऊपर गिनाते हैं, मरकत जैसा कोमल शरीर, लाल कमल जैसे चरण, तलवे के चार चिह्न, नूपुर और किंकिणी, उदर की तीन रेखाएँ, बच्चों के आभूषण, सिंह-शावक जैसे कंधे, तोतले बोल और दो-दो दाँत, और अन्त में जन्म-मरण से छुड़ानेवाले नीले कमल जैसे नेत्र, तिलक, भौंहें, कान और घुँघराले केश।

पीली झँगुली और परछाईं

नख-शिख के बाद वस्त्र आता है, और वस्त्र एक है। पीली और महीन झँगुली, जो शरीर पर सोह रही है। पीत झीनि झगुली, तीन शब्द और पूरा पहनावा। यह राजकुमार का वस्त्र है और फिर भी बच्चे का ही है। और तब भुशुण्डि पहली बार अपने बारे में कुछ कहते हैं। किलकनि चितवनि भावति मोही, उसकी किलकारी और उसकी चितवन मुझे भाती है। अब तक वे केवल दिखा रहे थे। यहाँ पहली बार वे बताते हैं कि उन्हें क्या अच्छा लगता है, और जो अच्छा लगता है वह कोई गहना नहीं है, वह बच्चे की आवाज़ और उसका देखना है।

पीत झीनि झगुली तन सोही । किलकनि चितवनि भावति मोही॥
रूप रासि नृप अजिर बिहारी । नाचहिं निज प्रतिबिंब निहारी॥

चौपाई ४

रूप की राशि, राजा के आँगन में विहार करनेवाला, अपनी परछाईं देखकर नाचता है। इस चौपाई की दूसरी पंक्ति पर तब लौटना चाहिये जब पन्ना पूरा पढ़ लिया जाय। एक बालक आँगन में अपनी छाया देखता है और उस पर नाचता है। कुछ ही दोहों बाद वही बालक अपने उदर में असंख्य ब्रह्माण्ड दिखायेगा, और हर ब्रह्माण्ड में एक अवधपुरी होगी, एक आँगन होगा, और एक वही बालक। तुलसी इन दोनों चित्रों को जोड़कर कुछ कहते नहीं। वे बस पहले एक बालक को उसकी छाया के सामने नचा देते हैं और बाद में असंख्य आँगन दिखा देते हैं, और दोनों के बीच का सूत्र पाठक के हाथ में छोड़ देते हैं।

फिर खेल का ब्योरा आता है, और उसके पहले एक कबूलनामा। मोहि सन करहिं बिबिधि बिधि क्रीड़ा, मुझसे बहुत प्रकार के खेल करते हैं, बरनत मोहि होति अति ब्रीड़ा, और उनका वर्णन करते मुझे बहुत लज्जा आती है। यह लज्जा किस चीज़ की है, इसे समझना चाहिये। जो खेल एक बालक और एक कौए के बीच हुए, वे उतने ही निजी हैं जितने किसी घर के भीतर के होते हैं। भुशुण्डि उन सबको नहीं कहते। वे एक खेल चुनते हैं और वही सुनाते हैं।

मोहि सन करहिं बिबिधि बिधि क्रीड़ा । बरनत मोहि होति अति ब्रीड़ा॥
किलकत मोहि धरन जब धावहिं। चलउँ भागि तब पूप देखावहिं॥

चौपाई ५

किलकारी मारते हुए जब वे मुझे पकड़ने दौड़ते और मैं भाग चलता, तब वे मुझे पूआ दिखलाते। जो पकड़ने दौड़ रहा है वह भागनेवाले को लालच देकर बुला रहा है, और लालच एक पूआ है। यह वही चाल है जो हर घर का बच्चा किसी चिड़िया के साथ चलता है, हाथ में कुछ लेकर उसे पास बुलाना। यहाँ बच्चा राम हैं, चिड़िया भुशुण्डि हैं, और हाथ में पूआ है। इसमें कहीं कोई देवत्व नहीं दिखाया गया, और इसीलिये अगले दोहे में जो शंका उठेगी वह उठेगी।

आवत निकट हँसहिं प्रभु भाजत रुदन कराहिं।
जाउँ समीप गहन पद फिरि फिरि चितइ पराहिं॥ ७७ (क)॥
प्राकृत सिसु इव लीला देखि भयउ मोहि मोह।
कवन चरित्र करत प्रभु चिदानंद संदोह॥ ७७ (ख)॥

दोहा ७७ (क, ख)

मेरे निकट आने पर प्रभु हँसते हैं, भागने पर रोते हैं। और जब मैं चरण पकड़ने पास जाता हूँ तब वे फिर-फिरकर मेरी ओर देखते हुए भाग जाते हैं। इस दोहे में खेल पलट गया है। पहले बालक कौए को पकड़ने दौड़ता था। अब कौआ बालक के चरण पकड़ने बढ़ता है, और बालक भागता है। भुशुण्डि जो करने जा रहे हैं वह पूजा है, चरण छूना। बालक जो कर रहा है वह खेल है, भागना और पीछे मुड़-मुड़कर देखना। फिरि फिरि चितइ, यह मुड़-मुड़कर देखना उस बच्चे का है जो चाहता है कि पीछा किया जाय। चरण छूने को स्वीकार नहीं किया गया, खेल को बढ़ाया गया।

और इसी पर शंका उठती है। प्राकृत सिसु इव लीला देखि भयउ मोहि मोह। साधारण बच्चे जैसी लीला देखकर मुझे मोह हुआ। ध्यान देने की बात यह है कि मोह किस चीज़ से हुआ। किसी चमत्कार से नहीं, किसी विराट रूप से नहीं। इस बात से कि यह बालक ठीक वैसा ही रो रहा है और हँस रहा है जैसे कोई भी बच्चा रोता और हँसता है। और तब वह प्रश्न, जिसमें प्रश्न से अधिक उलझन है, कवन चरित्र करत प्रभु चिदानंद संदोह। चिदानन्द के घनीभूत रूप प्रभु यह कौन-सा चरित्र कर रहे हैं। जिन्हें भुशुण्डि चिदानन्द कहकर पुकार रहे हैं, उन्हीं के आँसू उन्हें उलझा रहे हैं।

सार: पीली महीन झँगुली में वह बालक अपनी परछाईं देखकर नाचता है, कौए के साथ अनेक खेल करता है जिन्हें कहते हुए भुशुण्डि को लज्जा आती है, भागते कौए को पूआ दिखाकर बुलाता है, पास आने पर हँसता है, भागने पर रोता है, और चरण छूने पर आये कौए से मुड़-मुड़कर देखते हुए भाग जाता है। इसी साधारण बच्चे जैसी लीला से भुशुण्डि को मोह होता है।

एक शंका, और उस पर छायी हुई माया

एतना मन आनत खगराया, हे पक्षिराज, मन में इतना लाते ही। यह इतना शब्द बताता है कि शंका कितनी छोटी थी, एक विचार, बस। और उसी क्षण रघुपति की प्रेरणा से माया छा गयी। यहाँ तुलसी दो बातें एक साथ कहते हैं जिन्हें अलग-अलग पढ़ना चाहिये। पहली, माया अपने आप नहीं आयी, वह भेजी गयी, रघुपति प्रेरित। दूसरी, वह माया भुशुण्डि को दुःख देनेवाली नहीं हुई, और उन्हें दूसरे जीवों की तरह संसार में डालनेवाली भी नहीं हुई। वही माया, वही प्रेरक, पर परिणाम दूसरा। और भुशुण्डि कहते हैं कि इसका कारण कुछ और ही है, नाथ इहाँ कछु कारन आना, हे हरि के वाहन, इसे सावधान होकर सुनिये।

कारण बताने के लिये वे पहले एक सिद्धान्त रखते हैं। एक सीतापति ही अखण्ड ज्ञान हैं, और चर-अचर सारे जीव माया के वश हैं। यदि सब जीवों को एकरस ज्ञान रहे तो फिर ईश्वर और जीव में भेद ही कैसा। अभिमानी जीव माया के वश में है, और तीन गुणों की खान माया ईश्वर के वश में है। यह सीढ़ी तीन डण्डों की है, जीव, माया, ईश्वर, और हर डण्डा अपने ऊपर के डण्डे के अधीन है। सीता का नाम इस पूरे पन्ने पर यहीं आता है, सीताबर में, और वह भी ज्ञान की परिभाषा के भीतर।

परबस जीव स्वबस भगवंता। जीव अनेक एक श्रीकंता॥
मुधा भेद जद्यपि कृत माया । बिनु हरि जाइ न कोटि उपाया॥

चौपाई ६

जीव परवश है, भगवान् स्ववश। जीव अनेक हैं, श्रीपति एक। और फिर वह पंक्ति जो इस पूरे तर्क का काँटा है। यह भेद माया का किया हुआ है, इसलिये असत् है, मुधा, फिर भी हरि के बिना करोड़ों उपाय करने पर भी नहीं जाता। यानी जो झूठा है वह भी अपने बल से नहीं हटता। एक झूठ जिसे केवल एक ही हाथ मिटा सकता है। इसी बात को दोहे में और कड़ा करके कहा गया है, और कड़ाई इतनी है कि पढ़ते हुए रुकना पड़ता है।

रामचंद्र के भजन बिनु जो चह पद निर्बान।
ग्यानवंत अपि सो नर पसु बिनु पूँछ बिषान॥ ७८ (क)॥
राकापति षोडस उअहिं तारागन समुदाइ।
सकल गिरिन्ह दव लाइअ बिनु रबि राति न जाइ॥ ७८ (ख)॥

दोहा ७८ (क, ख)

रामचन्द्र के भजन बिना जो निर्वाण पद चाहता है, वह मनुष्य ज्ञानवान् होने पर भी बिना पूँछ और सींग का पशु है। ग्यानवंत अपि, ज्ञानवान् होने पर भी। यह किसी अज्ञानी के लिये नहीं कहा गया। यह उसके लिये कहा गया है जिसके पास ज्ञान है और भजन नहीं। और फिर उपमा आती है जिसमें रात है। सोलह कलाओं का चन्द्रमा सारे तारागण के साथ उग जाय, और जितने पर्वत हैं उन सब में दावाग्नि लगा दी जाय, तो भी सूर्य के बिना रात नहीं जाती। ध्यान दीजिये कि यहाँ ज्ञान को अन्धकार नहीं कहा गया। उसे पूरा चन्द्रमा कहा गया, और पर्वतों पर लगी आग कहा गया। वह सच्चा प्रकाश है, और बहुत है। पर वह प्रकाश रात को रात ही रहने देता है, और जिस प्रकाश से रात जाती है वह एक ही है।

यहीं से भुशुण्डि अपने कारण पर लौटते हैं। इसी प्रकार, हे खगेश, हरि के भजन बिना जीवों का क्लेश नहीं मिटता। और फिर वह पंक्ति जिसके लिये यह पूरा सिद्धान्त रखा गया था।

ऐसेहिं हरि बिनु भजन खगेसा। मिटइ न जीवन्ह केर कलेसा॥
हरि सेवकहि न ब्याप अबिद्या। प्रभु प्रेरित ब्यापइ तेहि बिद्या॥

चौपाई ७

हरि के सेवक को अविद्या नहीं व्यापती, प्रभु की प्रेरणा से उसे विद्या व्यापती है। यह पंक्ति थोड़ी देर पहले की पंक्ति के साथ मिलाकर पढ़ने की है। माया रघुपति प्रेरित थी। विद्या भी प्रभु प्रेरित है। दोनों एक ही जगह से आ रही हैं। अन्तर उनमें नहीं है, अन्तर उसमें है जिस पर वे पड़ रही हैं, और वह अन्तर एक शब्द का है, सेवक। इसीलिये दास का नाश नहीं होता, और भेद-भक्ति बढ़ती है। भेद भगति, यह शब्द ठीक उस मुधा भेद के बाद आया है जिसे कुछ ही पंक्तियाँ पहले असत् कहा गया था। जो भेद माया करती है वह झूठा है, और उसे जाना है। जो भेद सेवक रखता है, कि वह सेवक है और वह स्वामी, वह भक्ति है, और उसे बढ़ना है। एक ही शब्द, दो जगह, और दोनों जगह उसका दाम उलटा।

और फिर कथा लौटती है, एक हँसी से। भ्रम से चकित मुझे देखकर राम हँसे। वह विशेष चरित्र सुनिये। इस पन्ने पर राम की हँसी बार-बार आती है। दोहे ७७ में वह खेल का हिस्सा थी, कौए के पास आने पर हँसना। पर उसके बाद तीन हँसियाँ ऐसी हैं जिन पर कथा मुड़ती है, और यह उनमें पहली है।

सार: शंका मन में आते ही रघुपति की प्रेरित माया भुशुण्डि पर छा जाती है, पर वह उन्हें दुःख नहीं देती और संसार में नहीं डालती। कारण यह कि एक सीतापति ही अखण्ड ज्ञान हैं, जीव माया के वश है और माया ईश्वर के वश, और यह भेद असत् होने पर भी हरि के बिना करोड़ों उपाय से नहीं जाता। भजन बिना निर्वाण चाहनेवाला ज्ञानी भी बिना पूँछ-सींग का पशु है, जैसे पूरे चन्द्रमा और पर्वतों की दावाग्नि से भी रात नहीं जाती। हरि के सेवक को अविद्या नहीं व्यापती, प्रभु-प्रेरित विद्या व्यापती है, इसलिये दास का नाश नहीं होता और भेद-भक्ति बढ़ती है। भ्रम से चकित भुशुण्डि को देखकर राम हँसे।

घुटनों के बल दौड़ता बालक, और ब्रह्मलोक तक वह हाथ

उस कौतुक का मर्म किसी ने नहीं जाना, तेहि कौतुक कर मरमु न काहूँ, न छोटे भाइयों ने, न माता-पिता ने। यहाँ वह बात लौटती है जो पहली चौपाई में रखी गयी थी। खेल माता को सुख देने के लिये था, और माता को उसका मर्म नहीं मालूम। आँगन में जो होने जा रहा है वह सबके सामने होगा, और उसे केवल दो जन समझेंगे, वह जो कर रहा है और वह जिसके साथ किया जा रहा है। बाकी सबको बस एक बच्चा दिखेगा जो एक कौए के पीछे भाग रहा है।

तेहि कौतुक कर मरमु न काहूँ । जाना अनुज न मातु पिताहूँ॥
जानु पानि धाए मोहि धरना। स्यामल गात अरुन कर चरना॥

चौपाई ८

जानु पानि धाए, घुटनों और हाथों के बल दौड़े। यह वह पंक्ति है जिसके लिये दो-दो दाँत गिनाये गये थे। बालक अभी खड़े होकर नहीं दौड़ता, वह घुटनों पर दौड़ता है। स्यामल गात, अरुन कर चरना, साँवला शरीर, और लाल हथेलियाँ और लाल तलवे। जब बच्चा घुटनों के बल चलता है तब उसकी हथेलियाँ और तलवे ही दिखते हैं, और तुलसी ठीक वही दो चीज़ें रंगते हैं। इससे अधिक ठीक चित्र किसी घुटनों पर चलते बच्चे का नहीं बन सकता।

तब भुशुण्डि भागे। तब मैं भागि चलेउँ उरगारी, और यहाँ गरुड़ का नाम उरगारी है, सर्पों का शत्रु, यानी वह जो उड़ता है और झपटता है। भागनेवाला एक पक्षी है और सुननेवाला भी एक पक्षी है, इसीलिये यह नाम यहाँ है। राम ने पकड़ने के लिये भुजा फैलायी। और अब वह आधी पंक्ति जिसमें आँगन ब्रह्माण्ड बन जाता है। जिमि जिमि दूरि उड़ाउँ अकासा, तहँ भुज हरि देखउँ निज पासा। मैं जैसे-जैसे आकाश में दूर उड़ता, वैसे-वैसे वहाँ हरि की भुजा अपने पास देखता। बालक आँगन में है। भुजा आकाश में है। दोनों में कोई विरोध तुलसी को नहीं दिखता, और वे उसे समझाने के लिये एक शब्द भी नहीं जोड़ते।

ब्रह्मलोक लगि गयउँ मैं चितयउँ पाछ उड़ात।
जुग अंगुल कर बीच सब राम भुजहि मोहि तात॥ ७९ (क)॥
सप्ताबरन भेद करि जहाँ लगें गति मोरि।
गयउँ तहाँ प्रभु भुज निरखि ब्याकुल भयउँ बहोरि॥ ७९ (ख)॥

दोहा ७९ (क, ख)

मैं ब्रह्मलोक तक गया, और उड़ते हुए पीछे देखा तो हे तात, राम की भुजा और मेरे बीच केवल दो अंगुल का अन्तर था। जुग अंगुल, दो अंगुल। आँगन से ब्रह्मलोक तक की इतनी उड़ान, और दूरी बढ़ी नहीं। यह उस बच्चे की दूरी है जो पकड़ने-पकड़ने को है और पकड़ता नहीं, क्योंकि पकड़ लेने से खेल समाप्त हो जायगा। फिर, सातों आवरण भेदकर जहाँ तक मेरी गति थी, वहाँ तक मैं गया। यहाँ सीमा किसकी है, यह ध्यान से देखिये। सीमा भुशुण्डि की गति की है, जहाँ लगें गति मोरि। भुजा की कोई सीमा नहीं बतायी गयी। और वहाँ भी प्रभु की भुजा देखकर मैं व्याकुल हो गया। यहाँ तक पीछा है, और यहाँ से आगे उड़ान नहीं बची।

सार: खेल का मर्म न भाइयों ने जाना न माता-पिता ने। साँवले शरीर और लाल हथेली-तलवों वाला बालक घुटनों और हाथों के बल भुशुण्डि को पकड़ने दौड़ा, वे भागे, और जहाँ-जहाँ आकाश में उड़े वहाँ राम की भुजा अपने पास देखी। ब्रह्मलोक तक पहुँचकर पीछे देखा तो भुजा दो अंगुल दूर थी। सातों आवरण भेदकर जहाँ तक उनकी गति थी वहाँ तक गये, और वहाँ भी भुजा देखकर व्याकुल हो गये।

आँख मूँदी, आँख खोली, और मुख के भीतर

जब मैं भयभीत हुआ तब मैंने आँखें मूँद लीं। मूदेउँ नयन त्रसित जब भयऊँ। जो ब्रह्माण्ड के सातवें आवरण के पार था, उसने वह किया जो कोई भी डरा हुआ बच्चा करता है, आँखें बन्द कर लीं। और फिर आँखें खोलकर देखते ही वह कोसलपुर में था। इस पंक्ति में कोई यात्रा नहीं है। न लौटना, न उड़ना। आँख बन्द, ब्रह्मलोक। आँख खुली, अयोध्या का आँगन। जो दूरी उड़कर तय की गयी थी, वह पलक खोलने में मिट गयी, और इससे यह भी मालूम हो जाता है कि वह दूरी थी ही कहाँ।

मूदेउँ नयन त्रसित जब भयऊँ । पुनि चितवत कोसलपुर गयऊँ॥
मोहि बिलोकि राम मुसुकाहीं । बिहँसत तुरत गयउँ मुख माहीं॥

चौपाई ९

मुझे देखकर राम मुसकराये, और उनके हँसते ही मैं तुरन्त उनके मुख में चला गया। बिहँसत तुरत गयउँ मुख माहीं। यह दूसरी हँसी है। कौआ पकड़ा नहीं गया, निगला नहीं गया, उसे बुलाया भी नहीं गया। बालक हँसा और वह मुख के भीतर चला गया, जैसे हँसने से खुला हुआ मुँह ही द्वार हो। और आगे इसी की जोड़ की पंक्ति आयेगी, जब उसी हँसी से वह बाहर आयेगा। भीतर जाना और बाहर आना, दोनों का कारण एक है।

और अब भुशुण्डि गरुड़ को एक नये नाम से पुकारते हैं। उदर माझ सुनु अंडज राया, हे अण्डे से जन्मनेवालों के राजा, उदर के भीतर की बात सुनिये। नाम यहाँ यों ही नहीं बदला। जो देखने जा रहे हैं वह ब्रह्माण्ड हैं, और इस दोहे के अन्त में वे उन्हें अंड कटाह कहेंगे, जिसमें अंड शब्द है। अण्डों की बात एक अण्डे से जन्मे राजा से कही जा रही है। उदर के भीतर उन्होंने बहुत से ब्रह्माण्डों के समूह देखे, और उनमें अनेक विचित्र लोक, जिनकी रचना एक से एक बढ़कर थी।

फिर गिनती शुरू होती है, और गिनती में जो शब्द बार-बार आता है वह अगनित है। करोड़ों चतुरानन, करोड़ों गौरीश। यानी जो हमारे लोक में एक हैं, ब्रह्मा और शिव, वे वहाँ करोड़ों हैं। अनगिनत तारागण, सूर्य और चन्द्र। अनगिनत लोकपाल, यम और काल। अनगिनत पर्वत और विशाल भूमियाँ। अपार समुद्र, नदी, तालाब, वन, नाना प्रकार की सृष्टि का विस्तार। देवता, मुनि, सिद्ध, नाग, मनुष्य, किन्नर, और चारों प्रकार के चर-अचर जीव। सूची लम्बी है और उसमें विशेषण कम हैं, संख्या के शब्द ज़्यादा, और संख्या भी वह जो गिनी नहीं जा सकती। काल भी इस सूची में है, और अनगिनत है। जो सबको खाता है वह यहाँ गिना जा रहा है, और गिनती में नहीं आ रहा।

जो नहिं देखा नहिं सुना जो मनहूँ न समाइ।
सो सब अद्भुत देखेउँ बरनि कवनि बिधि जाइ॥ ८० (क)॥
एक एक ब्रह्मांड महुँ रहउँ बरष सत एक।
एहि बिधि देखत फिरउँ मैं अंड कटाह अनेक॥ ८० (ख)॥

दोहा ८० (क, ख)

जो न देखा, न सुना, जो मन में भी नहीं समाता, वह सब अद्भुत मैंने देखा, उसका वर्णन किस प्रकार हो। इस दोहे में तीन नकार हैं, नहिं देखा, नहिं सुना, मनहूँ न समाइ, और तीनों मिलकर वह बताते हैं जो कहा नहीं जा सकता। और तब दूसरा दोहा समय बताता है। एक-एक ब्रह्माण्ड में मैं एक-एक सौ वर्ष रहता, और इस प्रकार अनेक अंड कटाह देखता फिरता। सौ वर्ष एक में, और ब्रह्माण्ड अनेक। यह संख्या आगे और बढ़ेगी, और अन्त में एक ऐसी संख्या से टकरायेगी जो इससे उलटी है।

सार: भयभीत भुशुण्डि आँखें मूँदते हैं और खोलते ही कोसलपुर में हैं। राम मुसकराते हैं और उनके हँसते ही भुशुण्डि उनके मुख में चले जाते हैं। उदर के भीतर वे बहुत से ब्रह्माण्ड देखते हैं, एक से एक बढ़कर लोक, करोड़ों ब्रह्मा और शिव, अनगिनत तारे, सूर्य, चन्द्र, लोकपाल, यम, काल, पर्वत, भूमि, समुद्र, नदी, वन, और चारों प्रकार के जीव। जो न देखा न सुना न मन में समाता, वह सब देखा। हर ब्रह्माण्ड में सौ वर्ष रहकर वे अनेक ब्रह्माण्ड देखते फिरे।

हर लोक में दूसरी अवधपुरी, और हर लोक में वही बालक

अब भुशुण्डि उस चीज़ पर आते हैं जो इस दर्शन को केवल विशाल होने से बचाती है और उसे कुछ और बना देती है। हर लोक में भिन्न विधाता हैं, भिन्न विष्णु, भिन्न शिव, भिन्न मनु, भिन्न दिक्पाल। मनुष्य, गन्धर्व, भूत, बेताल, किन्नर, निशाचर, पशु, पक्षी, सर्प, देव, दानव, नाना जातियाँ। और सब जीव वहाँ दूसरे ही प्रकार के। पृथ्वी, नदी, समुद्र, तालाब, पर्वत, सब प्रपंच वहाँ दूसरा ही दूसरा। आनइ आना, दूसरा ही दूसरा। तुलसी यह शब्द दो बार लगाते हैं, आनहि भाँती और आनइ आना, क्योंकि अगले दोहे में इसी शब्द की ज़रूरत पड़ेगी, और वहाँ इसका उलटा काम होगा।

अंडकोस प्रति प्रति निज रूपा। देखेउँ जिनस अनेक अनूपा॥
अवधपुरी प्रति भुवन निनारी । सरजू भिन्न भिन्न नर नारी॥

चौपाई १०

प्रत्येक अण्डकोश में मैंने अपना रूप देखा। अंडकोस प्रति प्रति निज रूपा। यह पंक्ति चुपचाप गुज़र जाती है और उस पर लौटना चाहिये। हर ब्रह्माण्ड में एक भुशुण्डि है। जो देख रहा है वह हर जगह पहले से मौजूद है। याद कीजिये वह बालक जो आँगन में अपनी परछाईं देखकर नाचता था। अब कौआ हर लोक में अपना रूप देख रहा है, और नाच नहीं रहा। और फिर, प्रत्येक भुवन में न्यारी ही अवधपुरी, भिन्न ही सरयू, भिन्न ही नर-नारी। यानी वह नगर जिसके आँगन में यह सब शुरू हुआ था, वह भी असंख्य है। जिस आँगन से भुशुण्डि उड़े थे वह असंख्य आँगनों में से एक था।

और तब नाम आते हैं। दशरथ, कौसल्या, और भरत आदि भाई, अनेक रूपों में। इस पूरे पन्ने पर तुलसी की पंक्तियों में दशरथ और कौसल्या का नाम केवल यहाँ आता है, और भरत का भी। और वे यहाँ अयोध्या के आँगन में नहीं हैं। वे राम के उदर के भीतर के किसी दूसरे ब्रह्माण्ड में हैं, और वहाँ उनके रूप बिबिध हैं, भिन्न-भिन्न। प्रत्येक ब्रह्माण्ड में राम का अवतार, और अपार बालविनोद। बालबिनोद, यह वही शब्द है जिससे यह पन्ना खुला था। जो एक आँगन में हो रहा था, वह हर आँगन में हो रहा है।

भिन्न भिन्न मैं दीख सबु अति बिचित्र हरिजान।
अगनित भुवन फिरेउँ प्रभु राम न देखेउँ आन॥ ८१ (क)॥
सोइ सिसुपन सोइ सोभा सोइ कृपाल रघुबीर।
भुवन भुवन देखत फिरउँ प्रेरित मोह समीर॥ ८१ (ख)॥

दोहा ८१ (क, ख)

हे हरिवाहन, मैंने सब कुछ भिन्न-भिन्न और अत्यन्त विचित्र देखा। अनगिनत भुवनों में फिरा, पर प्रभु राम को दूसरा नहीं देखा। राम न देखेउँ आन। आन, दूसरा। यह वही शब्द है जो पिछली चौपाइयों में हर चीज़ के साथ आया था, सब कुछ दूसरा। और यहाँ उसी शब्द के आगे न लगा दिया गया। सब कुछ दूसरा, केवल एक चीज़ दूसरी नहीं। सोइ सिसुपन सोइ सोभा सोइ कृपाल रघुबीर। वही शिशुपन, वही शोभा, वही कृपालु रघुवीर। तीन बार सोइ, और तीनों बार वही बालक। ब्रह्मा बदल गये, शिव बदल गये, अवधपुरी बदल गयी, सरयू बदल गयी, दशरथ बदल गये, भुशुण्डि स्वयं बदल गये। दो-दो दाँत वाला वह बालक नहीं बदला।

और इस सबके बीच भुशुण्डि क्यों फिर रहे हैं, यह दोहे की आख़िरी आधी पंक्ति में है। प्रेरित मोह समीर। मोह की हवा उन्हें उड़ा रही है। जो पक्षी अपने पंखों से ब्रह्मलोक तक गया था, वह अब हवा में उड़ता हुआ एक पत्ता है। और यह हवा भी प्रेरित है, वैसे ही जैसे माया प्रेरित थी और विद्या प्रेरित थी। इस पन्ने पर कोई भी चीज़ अपने आप नहीं चलती।

सार: हर लोक में भिन्न ब्रह्मा, विष्णु, शिव, मनु और दिक्पाल हैं, सब जीव और सारा प्रपंच दूसरे ही प्रकार का है। हर ब्रह्माण्ड में भुशुण्डि अपना रूप देखते हैं, हर भुवन में अलग अवधपुरी, अलग सरयू, अलग नर-नारी, और भिन्न रूपों में दशरथ, कौसल्या और भरत आदि भाई। हर ब्रह्माण्ड में राम का अवतार और अपार बालविनोद। सब कुछ भिन्न, पर राम दूसरे नहीं, वही शिशुपन, वही शोभा, वही कृपालु रघुवीर। मोह की हवा से प्रेरित वे भुवन-भुवन फिरते रहे।

सौ कल्प, दो घड़ी

अनेक ब्रह्माण्डों में भटकते हुए मुझे मानो सौ कल्प बीत गये। मनहुँ, मानो। तुलसी यह शब्द लगाना नहीं भूलते, क्योंकि कुछ ही पंक्तियों बाद वे बताने जा रहे हैं कि सच में कितना समय लगा। फिरते-फिरते भुशुण्डि अपने आश्रम में आये, और कुछ काल वहाँ रहकर बिताया। ध्यान रहे कि मुख से बाहर आने की बात अभी नहीं आयी है, वह दोहे में आयेगी। यह आश्रम भी उदर के भीतर का है। उदर के भीतर उन्हें अपना घर मिल गया और वे वहाँ रह लिये।

और तब वह पंक्ति आती है जो इस पूरे दर्शन को अपनी ही पूँछ पकड़ा देती है। अपने प्रभु का अवध में जन्म सुन पाया तो प्रेम से भरकर उठ दौड़ा, और जाकर जन्म-महोत्सव देखा, जेहि बिधि प्रथम कहा मैं गाई, जिस प्रकार मैं पहले कह चुका हूँ। भुशुण्डि गरुड़ को जो कथा अब तक सुनाते आये हैं, उसमें वे जन्म-महोत्सव देखने की बात पहले कह चुके हैं, और यहाँ वे स्वयं कहते हैं कि यह वही था। अब वही घटना उदर के भीतर के किसी ब्रह्माण्ड में फिर हो रही है, और वे उसे फिर देख रहे हैं। कथा के भीतर कथा, और भीतर की कथा बाहर की कथा को दोहरा रही है। राम के उदर में मैंने बहुत से जगत् देखे, जो देखते ही बनते थे, कहे नहीं जा सकते। और वहाँ फिर मैंने सुजान राम को देखा, माया के पति, कृपालु भगवान्। यानी उदर के भीतर भी राम मिले, और वहाँ उनका नाम मायापति है, उसी माया के जो इस समय भुशुण्डि पर छायी हुई है। जिसने भेजा है, वह भीतर भी खड़ा है।

करउँ बिचार बहोरि बहोरी । मोह कलिल ब्यापित मति मोरी॥
उभय घरी महँ मैं सब देखा। भयउँ भ्रमित मन मोह बिसेषा॥

चौपाई ११

मैं बार-बार विचार करता, पर मेरी बुद्धि मोह के कीचड़ से लिपटी थी। मोह कलिल, मोह का कीचड़। पिछले दोहे में मोह हवा था, मोह समीर, जो उड़ाती थी। अब मोह कीचड़ है, जो जमा देता है। एक ही चीज़ के दो रूप, और दोनों में बुद्धि अपने बल से नहीं चल पाती, एक में इसलिये कि वह बह रही है, दूसरे में इसलिये कि वह धँसी हुई है। और तब वह पंक्ति जिसके लिये मनहुँ शब्द रखा गया था। उभय घरी महँ मैं सब देखा। यह सब मैंने दो घड़ी में देखा। सौ कल्प, हर ब्रह्माण्ड में सौ-सौ वर्ष, अनगिनत ब्रह्माण्ड, और सब मिलाकर दो घड़ी। तुलसी इन दोनों संख्याओं के बीच कोई सेतु नहीं बनाते। वे दोनों को रख देते हैं और पाठक को उनके बीच खड़ा छोड़ देते हैं। मन विशेष मोह से भ्रमित हो गया।

देखि कृपाल बिकल मोहि बिहँसे तब रघुबीर।
बिहँसतहीं मुख बाहेर आयउँ सुनु मतिधीर॥ ८२ (क)॥
सोइ लरिकाई मो सन करन लगे पुनि राम।
कोटि भाँति समुझावउँ मनु न लहइ बिश्राम॥ ८२ (ख)॥

दोहा ८२ (क, ख)

मुझे व्याकुल देखकर तब कृपालु रघुवीर हँसे, और उनके हँसते ही मैं मुख से बाहर आ गया। यह तीसरी हँसी है। पहली हँसी पर पीछा शुरू हुआ था, दूसरी पर कौआ मुख के भीतर गया था, तीसरी पर बाहर आया। बिहँसतहीं, हँसते ही, वही शब्द जो भीतर जाते समय था। और यहाँ गरुड़ का नाम मतिधीर है, धीर बुद्धि वाले। जिसने अभी-अभी अपनी बुद्धि को कीचड़ में धँसी हुई बताया, वह सुननेवाले को धीर बुद्धि कहकर पुकारता है। यह सम्बोधन भी अपनी जगह पर है।

और फिर, बाहर आने पर, कुछ नया नहीं होता। यही इस दोहे की बात है। सोइ लरिकाई मो सन करन लगे पुनि राम। राम मेरे साथ फिर वही लड़कपन करने लगे। जैसे कुछ हुआ ही न हो। ब्रह्मलोक, सात आवरण, असंख्य ब्रह्माण्ड, सौ कल्प, इन सबके बाद वह बालक फिर वही खेल खेलने लगता है। उसके लिये बीच में कुछ नहीं बीता। और भुशुण्डि के लिये सब बीत गया। कोटि भाँति समुझावउँ मनु न लहइ बिश्राम। करोड़ों तरह से मन को समझाता हूँ, पर उसे विश्राम नहीं मिलता। पन्ना यहीं छूटता है, एक ऐसे मन पर जो ठहर नहीं पा रहा। भुशुण्डि ने उसके बाद क्या किया, और उस बालक ने क्या किया, यह अगले प्रसंग की बात है।

सार: मानो सौ कल्प भटककर भुशुण्डि अपने आश्रम में आते हैं, फिर राम का अवध में जन्म सुनकर दौड़ते हैं और वही जन्म-महोत्सव फिर देखते हैं जो पहले कह चुके थे। राम के उदर में अनेक जगत् देखकर वहाँ फिर मायापति राम को देखते हैं। बुद्धि मोह के कीचड़ में है, और यह सब दो घड़ी में देखा गया। व्याकुल भुशुण्डि को देखकर रघुवीर हँसते हैं, हँसते ही वे मुख से बाहर आते हैं, राम फिर वही लड़कपन करने लगते हैं, और भुशुण्डि का मन करोड़ों समझाने पर भी विश्राम नहीं पाता।

और अन्त में, अपनी ओर

इस पूरे पन्ने पर एक संख्या बार-बार बदलती है और एक संख्या बदलती नहीं। बदलनेवाली संख्या ब्रह्माण्डों की है, जो एक आँगन से शुरू होकर अगनित तक जाती है और फिर सौ कल्प तक फैल जाती है। न बदलनेवाली संख्या दो अंगुल की है, वह दूरी जो ब्रह्मलोक में पीछे मुड़कर देखने पर राम की भुजा और भागते हुए कौए के बीच थी। तुलसी ने विशालता के इस पूरे चित्र के भीतर एक छोटी-सी नाप छोड़ दी है जो हिलती नहीं, और वह नाप एक बच्चे के हाथ की है।

दूसरी बात उस शंका की है जिससे यह सब शुरू हुआ। शंका यह नहीं थी कि यह बालक कुछ बड़ा क्यों नहीं करता। शंका यह थी कि यह इतना साधारण क्यों है, प्राकृत सिसु इव, आम बच्चे की तरह। और उस शंका का जो उत्तर मिला वह विशालता से मिला, असंख्य ब्रह्माण्डों से, और फिर उस विशालता को दो घड़ी में तह करके वापस उसी आँगन में रख दिया गया, जहाँ वही बालक वही खेल फिर करने लगा। साधारण होने की शंका का उत्तर यह नहीं है कि वह साधारण नहीं है। उत्तर यह है कि दोनों एक साथ हैं, और भुशुण्डि का मन इसी एक साथ को सँभाल नहीं पा रहा।

और तीसरी बात हँसी की है। इस पन्ने पर राम एक भी वाक्य नहीं बोलते। वे तोतले बोल बोलते हैं, किलकारी मारते हैं, रोते हैं, और हँसते हैं। जो हँसियाँ कथा को मोड़ती हैं, उनमें से हर एक पर कुछ खुलता या बन्द होता है। जो कुछ भुशुण्डि ने देखा, वह किसी उपदेश से नहीं खुला, न किसी वर से। वह एक बच्चे के हँसने से खुला और उसी के हँसने से बन्द हुआ। माया, जीव और ईश्वर पर जो चौपाइयाँ बीच में हैं, वे भुशुण्डि की हैं, गरुड़ को समझाने के लिये। बालक ने उनमें से एक भी नहीं कही। उसने बस हँसा, और मुँह खोला।

उत्तरकाण्ड के इस प्रसंग को पढ़ते हुए सबसे देर तक जो चीज़ साथ रहती है वह ब्रह्माण्डों की गिनती नहीं है। वह पूआ है। एक बालक, जिसके उदर में करोड़ों ब्रह्मा हैं, आँगन में एक कौए को बुलाने के लिये हाथ में पूआ लेकर खड़ा है। तुलसी ने इन दोनों चित्रों को एक ही पन्ने पर, कुछ ही दोहों के अन्तर पर रखा है, और किसी एक को दूसरे से ऊँचा नहीं किया।

और यह भी याद रखना चाहिये कि यह सब किसने देखा। न किसी ऋषि ने, न किसी देवता ने, न माता ने, न भाइयों ने। एक कौए ने, जिसे उस बालक ने पूआ दिखाकर पास बुलाया था और जिसे वह पकड़ नहीं पाया, या पकड़ना नहीं चाहता था। जिसकी आँख सबसे पहले चरणों पर पड़ी, उसी को उदर का द्वार खुला। और बाहर निकलने पर उसे कोई पद नहीं मिला, कोई वर नहीं मिला। उसे वही खेल फिर मिला, और एक मन जो ठहरता नहीं था।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, उत्तरकाण्ड, दोहा ७६ से ८२, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।

English