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रामचरितमानसउत्तरकाण्डप्रसंग 14
अजिर बिहारी: आँगन का बालक और उदर के ब्रह्माण्ड
अयोध्या के आँगन में एक बालक अपनी परछाईं देखकर नाचता है। एक कौआ उसके चरण छूने बढ़ता है। फिर वही बालक घुटनों के बल दौड़कर उसे ब्रह्मलोक तक खदेड़ता है और हँसते-हँसते अपने मुख में उतार लेता है।
आँगन का यह प्रसंग एक कथा के भीतर की कथा है। उत्तरकाण्ड में काकभुशुण्डि गरुड़ को अपनी बात सुना रहे हैं। यहाँ वे उस समय पर पहुँचते हैं जब वे अयोध्या के राजमहल के आँगन में एक बालक के साथ खेलते थे। बालक राम हैं, और उनके साथ खेलनेवाला एक कौआ है। इस प्रसंग में पहले उस बालक का रूप पैर से सिर तक गिनाया जाता है। फिर एक खेल शुरू होता है जो आँगन से उठकर ब्रह्मलोक तक, और फिर उसी बालक के मुख के भीतर तक चला जाता है। वहाँ से वह लौटकर उसी आँगन में उतर आता है।
कथा तीन मोड़ लेती है: भुशुण्डि के मन में शंका जगती है कि साधारण बच्चों की तरह रोते-हँसते चिदानन्दघन राम यह कौन-सा चरित्र कर रहे हैं। वह बालक घुटनों और हाथों के बल उन्हें पकड़ने दौड़ता है और वे उड़कर भागते हैं। और वे उसके मुख में चले जाते हैं, जहाँ असंख्य ब्रह्माण्ड हैं, हर एक में अपनी अवधपुरी, अपनी सरयू, और वही एक बालक। बीच में भुशुण्डि माया, जीव और ईश्वर की बात करके गरुड़ को बताते हैं कि वह माया उन्हें दूसरे जीवों की तरह क्यों नहीं डुबो पायी।
यह तुलसीदास का रामचरितमानस है। काकभुशुण्डि की यह पूरी कथा मानस की अपनी है। वाल्मीकि की रामायण में इसका कोई ठिकाना नहीं। इस पूरे प्रसंग में लक्ष्मण का नाम एक बार भी नहीं आता। सीता का नाम केवल राम के एक विशेषण में आता है। दशरथ तथा कौसल्या का नाम एक ही जगह आता है, वह भी उदर के भीतर के किसी दूसरे ब्रह्माण्ड में। यहाँ सब कुछ एक बालक, एक कौए और उनके बीच की दो अंगुल की दूरी पर टिका है।
आँगन का बालक और उसका कौआ
- काकभुशुण्डि कथा कहनेवाले। वर्षों पहले वे अयोध्या के आँगन में इस बालक के साथ खेले थे, और यहाँ वही स्मृति सुना रहे हैं।
- गरुड़ सुननेवाले। भुशुण्डि उन्हें यहाँ बहुत-से नामों से पुकारते हैं, और कुछ नाम, उरगारि, अण्डजराज, मतिधीर, ठीक उसी जगह आते हैं जहाँ कथा को उस नाम की ज़रूरत है।
- बालक राम तोतले बोल, दो-दो दाँत, पीली महीन झँगुली, और वह हाथ जो ब्रह्मलोक तक दो अंगुल पीछे रहता है। आँगन से ब्रह्मलोक तक वे एक वाक्य नहीं बोलते।
- चारों भाई आँगन में नित्य खेलनेवाले, जिनमें से किसी का नाम इस खेल में अलग से नहीं लिया गया। खेल का मर्म उन्हें भी नहीं मालूम।
- दशरथ और कौसल्या माता-पिता, जिन्हें भी खेल का भेद नहीं मालूम, और जिनका नाम केवल उदर के भीतर के ब्रह्माण्डों की गिनती में आता है।
- माया और मोह राम की प्रेरणा से भुशुण्डि पर छानेवाली माया, और उससे उपजा मोह, जो पहले हवा बनकर उड़ाता है और फिर कीचड़ बनकर जमा देता है।
सोने का महल, और वह आँगन जिसका वर्णन नहीं होता
भुशुण्डि गरुड़ को सम्बोधित करके पहले ही कह देते हैं कि राम का चरित्र सेवक को सुख देनेवाला है। फिर वे राजमहल का चित्र खींचते हैं। उसे बहुत थोड़ी जगह देते हैं: महल सब प्रकार से सुन्दर है, सोने का है, उसमें नाना जाति के मणि जड़े हैं। बस, एक वाक्य, और राजमहल पूरा हो गया।
पर आँगन आते ही बात ठहर जाती है: उसका वर्णन नहीं हो सकता। जिस महल में सोना और मणि हैं वह एक वाक्य में निबट गया। जिस आँगन के बारे में सोने-मणि जैसा कुछ कहा ही नहीं गया, उसके बारे में भुशुण्डि कहते हैं कि उसका वर्णन नहीं हो सकता। कारण तुरन्त आता है: वहाँ चारों भाई नित्य खेलते हैं। आँगन की सुन्दरता उसकी दीवारों से नहीं, उसमें खेलनेवालों से है। चारों भाई एक साथ गिनाये गये हैं, कोई नाम नहीं, कोई क्रम नहीं। कथा उनमें से एक पर टिकने जा रही है, पर पहले यह बता देती है कि आँगन में चार बच्चे थे, और राम उनमें से एक थे।
कथा उन्हें रघुकुल का राजा कहती है, और उसी साँस में बाललीला करते हुए दिखाती है। खेल किसके लिये है, यह भी वहीं है: माता को सुख देनेवाला। इस प्रसंग में खेल का प्रयोजन पहली बार यहीं बताया गया है, और प्रयोजन माता हैं। आगे भुशुण्डि कहेंगे कि इस खेल का मर्म माता-पिता को भी नहीं मालूम था। जिनके सुख के लिये खेल हो रहा है, उन्हें उसका भेद नहीं मालूम। दोनों बातें एक ही आँगन की हैं और दोनों सच हैं।
चरणों से सिर तक
अब भुशुण्डि उस बालक को देखते हैं। उनका क्रम ही इस हिस्से की बात है: शरीर के रंग से शुरू करके वे चरणों पर आते हैं और वहाँ से ऊपर चढ़ते हैं। नख और तलवे से लेकर मुसकान, नेत्र, भौंह, कान और अन्त में केश तक। आँगन की धरती पर बैठे कौए की आँख पहले चरणों पर ही पड़ेगी। चित्र उसी की आँख से है।
मरकत मणि जैसी हरी झलक वाला साँवला, कोमल शरीर, अंग-अंग में बहुत-से कामदेवों की छबि। फिर चरण: नये लाल कमल जैसे लाल और कोमल, और उनके नख जो चन्द्रमा की कान्ति हर लेते हैं। नख एक बच्चे के हैं, और उनके सामने चन्द्रमा हार रहा है। फिर भुशुण्डि की आँख वज्र आदि चार सुन्दर चिह्नों पर जाती है। टीका उन्हें तलवे के चिह्न बताती है और वज्र, अंकुश, ध्वजा और कमल के नाम से गिनाती है। ये चिह्न वही देख सकता है जो धरती पर बैठा हो। पैरों में मधुर शब्द करनेवाले नूपुर हैं, कटि में सोने की, मणि-रत्न जड़ी करधनी जिसकी किंकिणी सुहावनी बज रही है। बालक जहाँ भी जाता है, उसके पहले उसकी आवाज़ पहुँचती है।
उदर पर तीन रेखाएँ, नाभि सुन्दर और गहरी, और विशाल वक्ष पर बच्चों के अनेक प्रकार के आभूषण और वस्त्र। छाती चौड़ी है, पर उस पर जो पड़ा है वह बच्चों का गहना है। इस वर्णन में बालक कहीं बड़ा बनाकर नहीं दिखाया गया। उसकी हर चीज़ उसकी उम्र की है। हथेलियाँ लाल हैं, नख और अँगुलियाँ मन हरती हैं, भुजाएँ विशाल हैं और उन पर सुन्दर आभूषण। कंधे सिंह के नहीं, सिंह के बच्चे के जैसे। गला शंख-सा, ठुड्डी सुन्दर, और मुख छबि की सीमा।
फिर वह बात आती है जो बिना कोई संख्या लिखे इस बालक की उम्र बता देती है: तोतले बोल। लाल-लाल ओंठ। और उज्ज्वल, सुन्दर, छोटे-छोटे दो-दो दाँत, टीका के अनुसार ऊपर दो, नीचे दो। बालक उस उम्र में है जब दाँत आना शुरू हुए हैं और बोल अभी साफ़ नहीं हुए, और इसीलिये आगे वह घुटनों और हाथों के बल दौड़ेगा। गाल सुन्दर हैं, नाक मनोहर है, और मुसकान चन्द्रमा की किरणों जैसी, जो सबको सुख देती है।
नीले कमल जैसे नेत्र, जन्म-मरण से छुड़ानेवाले: यह बात शरीर की नहीं है। आँखों पर पहुँचकर वर्णन एक क्षण के लिये चित्र से बाहर निकलकर कह देता है कि ये आँखें क्या करती हैं। फिर वह लौट आता है: ललाट पर गोरोचन का तिलक, टेढ़ी भौंहें, सम और सुन्दर कान, और काले घुँघराले केशों की छबि। चित्र सिर पर जाकर पूरा होता है, और अब यह बालक चलने को तैयार है।
पीली झँगुली और परछाईं
नख-शिख के बाद वस्त्र आता है, और वस्त्र एक है: पीली और महीन झँगुली जो शरीर पर सोह रही है। राजकुमार का वस्त्र, फिर भी बच्चे का ही। फिर भुशुण्डि अपनी पसन्द बताते हैं: “उसकी किलकारी और उसकी चितवन मुझे भाती है।” अब तक वे केवल दिखा रहे थे। यहाँ बताते हैं कि उन्हें क्या अच्छा लगता है, और वह कोई गहना नहीं, बच्चे की आवाज़ और उसका देखना है।
रूप की राशि, राजा के आँगन में विहार करनेवाला, अपनी परछाईं देखकर नाचता है। कुछ ही देर बाद वही बालक अपने उदर में असंख्य ब्रह्माण्ड दिखायेगा, हर एक में एक अवधपुरी, एक आँगन, और वही बालक। कथा इन दोनों चित्रों को जोड़कर कुछ नहीं कहती। पहले एक बालक को उसकी छाया के सामने नचाती है, बाद में असंख्य आँगन दिखा देती है।
फिर खेल का ब्योरा आता है, और उसके पहले एक स्वीकार। भुशुण्डि कहते हैं: “वे मुझसे बहुत प्रकार के खेल करते हैं, और उनका वर्णन करते मुझे बहुत लज्जा आती है।” जो खेल एक बालक और एक कौए के बीच हुए, वे उतने ही निजी हैं जितने किसी घर के भीतर के होते हैं। भुशुण्डि उन सबको नहीं कहते। एक खेल चुनकर वही सुनाते हैं।
भुशुण्डि कहते हैं: “किलकारी मारते हुए जब वे मुझे पकड़ने दौड़ते और मैं भाग चलता, तब वे मुझे पूआ दिखलाते।” जो पकड़ने दौड़ रहा है वह भागनेवाले को लालच देकर बुला रहा है, और लालच एक पूआ है। यह वही चाल है जो हर घर का बच्चा किसी चिड़िया के साथ चलता है, हाथ में कुछ लेकर उसे पास बुलाना। इसमें कहीं कोई देवत्व नहीं दिखाया गया, और इसीलिये आगे शंका उठती है।
वे आगे कहते हैं: “मेरे निकट आने पर वे हँसते हैं, भागने पर रोते हैं। और जब मैं चरण पकड़ने पास जाता हूँ, तब वे फिर-फिरकर मेरी ओर देखते हुए भाग जाते हैं।” यहाँ खेल पलट गया है। पहले बालक कौए को पकड़ने दौड़ता था। अब कौआ बालक के चरण पकड़ने बढ़ता है, और बालक भागता है। भुशुण्डि जो करने जा रहे हैं वह पूजा है, चरण छूना। बालक जो कर रहा है वह खेल है, भागना और मुड़-मुड़कर देखना। फिर-फिरकर देखना उस बच्चे का देखना है जो चाहता है कि उसका पीछा किया जाये। चरण छूना स्वीकार नहीं हुआ, खेल बढ़ाया गया।
और इसी पर शंका उठती है। भुशुण्डि कहते हैं: “साधारण बच्चे जैसी लीला देखकर मुझे मोह हुआ।” मोह किसी चमत्कार से नहीं, किसी विराट रूप से नहीं, इस बात से हुआ कि यह बालक ठीक वैसे ही रो और हँस रहा है जैसे कोई भी बच्चा। और फिर वह प्रश्न, जिसमें प्रश्न से अधिक उलझन है: “चिदानन्द के घन राम यह कौन-सा चरित्र कर रहे हैं?” जिन्हें भुशुण्डि चिदानन्द कहकर पुकार रहे हैं, उन्हीं के आँसू उन्हें उलझा रहे हैं।
एक शंका, और उस पर छायी हुई माया
भुशुण्डि कहते हैं: “हे गरुड़, मन में इतना लाते ही राम की प्रेरणा से माया मुझ पर छा गयी।” इतना: शंका कितनी छोटी थी, एक विचार, बस। कथा यहाँ दो बातें एक साथ कहती है। पहली, माया अपने आप नहीं आयी, वह भेजी गयी, राम की प्रेरणा से। दूसरी, वह माया भुशुण्डि को दुःख देनेवाली नहीं हुई, और उन्हें दूसरे जीवों की तरह संसार में डालनेवाली भी नहीं हुई। वही माया, वही प्रेरक, पर परिणाम दूसरा। भुशुण्डि कहते हैं: “हे नाथ, इसका कारण कुछ और ही है। उसे सावधान होकर सुनिये।”
कारण बताने के लिये वे पहले एक सिद्धान्त रखते हैं। एक राम ही अखण्ड ज्ञान हैं, और चर-अचर सारे जीव माया के वश हैं। यदि सब जीवों को एकरस ज्ञान रहे तो ईश्वर और जीव में भेद ही कैसा? अभिमानी जीव माया के वश में है, और तीन गुणों की खान माया ईश्वर के वश में। यह सीढ़ी तीन डण्डों की है, जीव, माया, ईश्वर, और हर डण्डा अपने ऊपर वाले के अधीन है। राम को यहाँ कथा सीता के पति कहती है, और आँगन से उदर तक सीता का नाम यहीं आता है, वह भी ज्ञान की परिभाषा के भीतर।
जीव परवश है, भगवान् स्ववश। जीव अनेक हैं, भगवान् एक। और फिर इस तर्क का काँटा: यह भेद माया का किया हुआ है, इसलिये असत् है, फिर भी भगवान् के बिना करोड़ों उपाय करने पर भी नहीं जाता। जो झूठा है वह भी अपने बल से नहीं हटता। उसे केवल एक ही हाथ मिटा सकता है। भुशुण्डि इसी बात को और कड़ा करके कहते हैं।
रामचन्द्र के भजन बिना जो निर्वाण पद चाहता है, वह मनुष्य ज्ञानवान् होने पर भी बिना पूँछ और सींग का पशु है। ज्ञानवान् होने पर भी: यह किसी अज्ञानी के लिये नहीं, उसके लिये कहा गया है जिसके पास ज्ञान है और भजन नहीं। फिर उपमा आती है जिसमें रात है। सोलह कलाओं का चन्द्रमा सारे तारागण के साथ उग जाये, और सब पर्वतों में दावाग्नि लगा दी जाये, तो भी सूर्य के बिना रात नहीं जाती। ज्ञान को यहाँ अन्धकार नहीं कहा गया। उसे पूरा चन्द्रमा और पर्वतों पर लगी आग कहा गया, सच्चा प्रकाश, और बहुत। पर वह प्रकाश रात को रात ही रहने देता है। जिस प्रकाश से रात जाती है वह एक ही है।
यहीं से भुशुण्डि अपने कारण पर लौटते हैं: इसी प्रकार भगवान् के भजन बिना जीवों का क्लेश नहीं मिटता। और फिर वह बात जिसके लिये यह पूरा सिद्धान्त रखा गया था।
भगवान् के सेवक को अविद्या नहीं व्यापती। राम की प्रेरणा से उसे विद्या व्यापती है। माया राम की प्रेरणा से आयी थी, विद्या भी प्रभु की प्रेरणा से है: दोनों एक ही जगह से आ रही हैं। अन्तर उनमें नहीं, उसमें है जिस पर वे पड़ रही हैं, और वह अन्तर एक शब्द का है, सेवक। इसीलिये दास का नाश नहीं होता, और भेद-भक्ति बढ़ती है। यह शब्द ठीक उस भेद के बाद आया है जिसे कुछ ही देर पहले असत् कहा गया था। जो भेद माया करती है वह झूठा है और उसे जाना है। जो भेद सेवक रखता है, कि वह सेवक है और वे स्वामी, वह भक्ति है और उसे बढ़ना है। एक ही शब्द, दो जगह, और दोनों जगह उसका मोल उलटा।
फिर कथा एक हँसी से लौटती है। भुशुण्डि कहते हैं: “भ्रम से चकित मुझे देखकर राम हँसे। वह विशेष चरित्र सुनिये।” राम की हँसी यहाँ बार-बार आती है। पहले वह खेल का हिस्सा थी, कौए के पास आने पर हँसना। पर उसके बाद तीन हँसियाँ ऐसी हैं जिन पर कथा मुड़ती है, और यह उनमें पहली है।
घुटनों के बल दौड़ता बालक, और ब्रह्मलोक तक वह हाथ
भुशुण्डि कहते हैं कि उस कौतुक का मर्म किसी ने नहीं जाना, न छोटे भाइयों ने, न माता-पिता ने। खेल माता को सुख देने के लिये था, और माता को उसका मर्म नहीं मालूम। आँगन में जो होगा वह सबके सामने होगा, पर उसे दो ही समझेंगे, जो कर रहा है और जिसके साथ किया जा रहा है। बाक़ी सबको बस एक बच्चा दिखेगा जो एक कौए के पीछे भाग रहा है।
घुटनों और हाथों के बल दौड़े: यह वह बात है जिसके लिये दो-दो दाँत गिनाये गये थे। बालक अभी खड़े होकर नहीं दौड़ता, घुटनों पर दौड़ता है। साँवला शरीर, और लाल हथेलियाँ और लाल तलवे। घुटनों के बल चलते बच्चे की हथेलियाँ और तलवे ही दिखते हैं, और कथा ठीक वही दो चीज़ें रंगती है।
भुशुण्डि कहते हैं: “हे उरगारि, तब मैं भाग चला।” उरगारि, सर्पों का शत्रु, यानी वह जो उड़ता है और झपटता है: भागनेवाला एक पक्षी है और सुननेवाला भी एक पक्षी, इसीलिये यह नाम यहाँ है। राम ने पकड़ने के लिये भुजा फैलायी। और अब वह बात जिसमें आँगन ब्रह्माण्ड बन जाता है: “मैं जैसे-जैसे आकाश में दूर उड़ता, वैसे-वैसे वहाँ राम की भुजा अपने पास देखता।” बालक आँगन में है, भुजा आकाश में है, और कथा इसे समझाने के लिये एक शब्द भी नहीं जोड़ती।
भुशुण्डि कहते हैं: “मैं ब्रह्मलोक तक गया, और उड़ते हुए पीछे देखा तो, हे तात, राम की भुजा और मेरे बीच केवल दो अंगुल का अन्तर था।” दो अंगुल: आँगन से ब्रह्मलोक तक की उड़ान, और दूरी बढ़ी नहीं। यह उस बच्चे की दूरी है जो पकड़ने-पकड़ने को है और पकड़ता नहीं, क्योंकि पकड़ लेने से खेल समाप्त हो जायेगा। फिर वे कहते हैं: “सातों आवरण भेदकर जहाँ तक मेरी गति थी, वहाँ तक मैं गया, और वहाँ भी राम की भुजा देखकर व्याकुल हो गया।” सीमा भुशुण्डि की गति की है, जहाँ तक उनकी गति थी। भुजा की कोई सीमा नहीं बतायी गयी। यहाँ तक पीछा है, और यहाँ से आगे उड़ान नहीं बची।
आँख मूँदी, आँख खोली, और मुख के भीतर
भुशुण्डि कहते हैं: “जब मैं भयभीत हुआ तब मैंने आँखें मूँद लीं।” सातवें आवरण के पार पहुँचकर उन्होंने वही किया जो कोई डरा हुआ बच्चा करता है। और आँखें खोलकर देखते ही वे अयोध्या में थे। न लौटना, न उड़ना: आँख बन्द, ब्रह्मलोक। आँख खुली, अयोध्या का आँगन। जो दूरी उड़कर तय की गयी थी, वह पलक खोलने में मिट गयी।
वे कहते हैं: “मुझे देखकर राम मुसकराये, और उनके हँसते ही मैं तुरन्त उनके मुख में चला गया।” यह दूसरी हँसी है। कौआ पकड़ा नहीं गया, निगला नहीं गया, बुलाया भी नहीं गया। बालक हँसा और वह मुख के भीतर चला गया, जैसे हँसने से खुला हुआ मुँह ही द्वार हो। आगे इसी की जोड़ की बात आयेगी, जब उसी हँसी से वह बाहर आयेगा। भीतर जाना और बाहर आना, दोनों का कारण एक है।
अब भुशुण्डि गरुड़ को एक नये नाम से पुकारते हैं: “हे अण्डजराज, उदर के भीतर की बात सुनिये।” अण्डजराज, अण्डे से जन्मनेवालों के राजा: जो देखने जा रहे हैं वह ब्रह्माण्ड हैं, यानी ब्रह्म के अण्डे। अण्डों की बात एक अण्डे से जन्मे राजा से कही जा रही है। उदर के भीतर उन्होंने ब्रह्माण्डों के बहुत-से समूह देखे, और उनमें अनेक विचित्र लोक, जिनकी रचना एक से एक बढ़कर थी।
फिर गिनती शुरू होती है, और उसमें बार-बार “अनगिनत” आता है। करोड़ों ब्रह्मा, करोड़ों शिव। अनगिनत तारागण, सूर्य और चन्द्र। अनगिनत लोकपाल, यम और काल। अनगिनत पर्वत और विशाल भूमियाँ। अपार समुद्र, नदी, तालाब, वन। देवता, मुनि, सिद्ध, नाग, मनुष्य, किन्नर, और चारों प्रकार के चर-अचर जीव। सूची में विशेषण कम हैं, संख्या के शब्द ज़्यादा। काल भी इसमें है, और अनगिनत: जो सबको खाता है वह यहाँ गिना जा रहा है, और गिनती में नहीं आ रहा।
भुशुण्डि कहते हैं: “जो न देखा, न सुना, जो मन में भी नहीं समाता, वह सब अद्भुत मैंने देखा। उसका वर्णन किस प्रकार हो?” तीन नकार मिलकर वह बताते हैं जो कहा नहीं जा सकता। फिर भुशुण्डि समय बताते हैं: “एक-एक ब्रह्माण्ड में मैं एक-एक सौ वर्ष रहता, और इस प्रकार अनेक ब्रह्माण्ड देखता फिरता।” सौ वर्ष एक में, और ब्रह्माण्ड अनेक। यह संख्या आगे और बढ़ेगी, और अन्त में एक ऐसी संख्या से टकरायेगी जो इससे उलटी है।
हर लोक में दूसरी अवधपुरी, और हर लोक में वही बालक
अब भुशुण्डि उस बात पर आते हैं जो इस दर्शन को केवल विशाल होने से बचाती है। हर लोक में भिन्न ब्रह्मा हैं, भिन्न विष्णु, भिन्न शिव, भिन्न मनु, भिन्न दिक्पाल। मनुष्य, गन्धर्व, भूत, बेताल, किन्नर, निशाचर, पशु, पक्षी, सर्प, देव, दानव, नाना जातियाँ, और सब जीव वहाँ दूसरे ही प्रकार के। पृथ्वी, नदी, समुद्र, तालाब, पर्वत, सब प्रपंच वहाँ दूसरा ही दूसरा। कथा यह शब्द दो बार लाती है, दूसरे ही प्रकार के, और दूसरा ही दूसरा, और आगे यही शब्द उलटा काम करेगा।
भुशुण्डि कहते हैं: “प्रत्येक ब्रह्माण्ड में मैंने अपना रूप देखा।” यह बात चुपचाप गुज़र जाती है, पर इसमें बड़ी बात है: हर ब्रह्माण्ड में एक भुशुण्डि है, और जो देख रहा है वह हर जगह पहले से मौजूद है। आँगन का बालक अपनी परछाईं देखकर नाचता था। अब कौआ हर लोक में अपना रूप देख रहा है, और नाच नहीं रहा। फिर, प्रत्येक भुवन में न्यारी ही अवधपुरी, भिन्न ही सरयू, भिन्न ही नर-नारी। जिस आँगन से भुशुण्डि उड़े थे, वह असंख्य आँगनों में से एक था।
फिर नाम आते हैं: दशरथ, कौसल्या, और भरत आदि भाई, अनेक रूपों में। पूरे प्रसंग में दशरथ, कौसल्या और भरत के नाम केवल यहीं आते हैं। वे यहाँ अयोध्या के आँगन में नहीं, राम के उदर के भीतर के किसी दूसरे ब्रह्माण्ड में हैं, और वहाँ उनके रूप भिन्न-भिन्न हैं। प्रत्येक ब्रह्माण्ड में राम का अवतार, और अपार बाललीला, वही शब्द जिससे आँगन का खेल खुला था। जो एक आँगन में हो रहा था, वह हर आँगन में हो रहा है।
भुशुण्डि कहते हैं: “हे गरुड़, मैंने सब कुछ भिन्न-भिन्न और अत्यन्त विचित्र देखा। अनगिनत भुवनों में फिरा, पर राम को दूसरा नहीं देखा।” दूसरा, जो पहले हर चीज़ के साथ आया था, यहाँ “नहीं” के साथ आता है: सब कुछ दूसरा, केवल राम दूसरे नहीं। वही शिशुपन, वही शोभा, वही कृपालु राम। ब्रह्मा, शिव, अवधपुरी, सरयू, दशरथ, स्वयं भुशुण्डि, सब बदल गये। दो-दो दाँत वाला वह बालक नहीं बदला।
भुशुण्डि इस सबके बीच क्यों फिर रहे हैं, यह इस बात के अन्त में है: प्रेरणा से चली मोह की हवा उन्हें उड़ा रही है। जो पक्षी अपने पंखों से ब्रह्मलोक तक गया था, वह अब हवा में उड़ता एक पत्ता है। और यह हवा भी प्रेरित है, जैसे माया और विद्या प्रेरित थीं।
सौ कल्प, दो घड़ी
भुशुण्डि कहते हैं: “अनेक ब्रह्माण्डों में भटकते हुए मुझे मानो सौ कल्प बीत गये।” मानो: कुछ ही देर बाद वे बताते हैं कि सच में कितना समय लगा। फिरते-फिरते वे अपने आश्रम में आये, और कुछ काल वहाँ रहकर बिताया। मुख से बाहर आने की बात अभी नहीं आयी, वह आगे आयेगी। यह आश्रम भी उदर के भीतर का है। उदर के भीतर उन्हें अपना घर मिल गया और वे वहाँ रह लिये।
और फिर वह बात आती है जो इस दर्शन को अपनी ही पूँछ पकड़ा देती है। भुशुण्डि कहते हैं: “अपने प्रभु का अवध में जन्म सुन पाया तो प्रेम से भरकर उठ दौड़ा, और जाकर जन्म-महोत्सव देखा, जिस प्रकार मैं पहले कह चुका हूँ।” गरुड़ को जो कथा वे अब तक सुनाते आये हैं, उसमें जन्म-महोत्सव देखने की बात पहले आ चुकी है, और यहाँ वे कहते हैं कि यह वही था। अब वही घटना उदर के भीतर के किसी ब्रह्माण्ड में फिर हो रही है। कथा के भीतर कथा, और भीतर की कथा बाहर की कथा को दोहरा रही है। फिर वे कहते हैं: “राम के उदर में मैंने बहुत-से जगत् देखे, जो देखते ही बनते थे, कहे नहीं जा सकते। और वहाँ फिर मैंने सुजान राम को देखा, माया के पति, कृपालु भगवान्।” उदर के भीतर भी राम मिले, और वहाँ उन्हें मायापति कहा गया है, उसी माया का स्वामी जो इस समय भुशुण्डि पर छायी हुई है। जिसने भेजा है, वह भीतर भी खड़ा है।
भुशुण्डि कहते हैं: “मैं बार-बार विचार करता, पर मेरी बुद्धि मोह के कीचड़ से लिपटी थी।” मोह का कीचड़: पहले मोह हवा था, जो उड़ाती थी। अब कीचड़ है, जो जमा देता है। दोनों में बुद्धि अपने बल से नहीं चल पाती, एक में इसलिये कि वह बह रही है, दूसरे में इसलिये कि धँसी हुई है। और फिर वह बात जिसकी ओर “मानो” इशारा कर रहा था: यह सब मैंने दो घड़ी में देखा। सौ कल्प, हर ब्रह्माण्ड में सौ-सौ वर्ष, अनगिनत ब्रह्माण्ड, और सब मिलाकर दो घड़ी। कथा इन दो संख्याओं के बीच कोई सेतु नहीं बनाती, दोनों को रख देती है। और भुशुण्डि का मन विशेष मोह से भ्रमित हो गया।
भुशुण्डि कहते हैं: “हे मतिधीर, सुनिये: मुझे व्याकुल देखकर तब कृपालु राम हँसे, और उनके हँसते ही मैं मुख से बाहर आ गया।” यह तीसरी हँसी है: पहली पर पीछा शुरू हुआ था, दूसरी पर कौआ मुख के भीतर गया था, तीसरी पर बाहर आया। हँसते ही, वही शब्द जो भीतर जाते समय था। और गरुड़ का नाम यहाँ मतिधीर है, धीर बुद्धि वाले: जिसने अभी-अभी अपनी बुद्धि को कीचड़ में धँसी हुई बताया, वह सुननेवाले को धीर बुद्धि कहकर पुकारता है।
बाहर आने पर कुछ नया नहीं होता, और यही इस बात का मर्म है। भुशुण्डि कहते हैं: “राम मेरे साथ फिर वही लड़कपन करने लगे।” जैसे कुछ हुआ ही न हो। ब्रह्मलोक, सात आवरण, असंख्य ब्रह्माण्ड, सौ कल्प, इन सबके बाद वह बालक फिर वही खेल खेलने लगता है। उसके लिये बीच में कुछ नहीं बीता, और भुशुण्डि के लिये सब बीत गया। वे कहते हैं: “करोड़ों तरह से मन को समझाता हूँ, पर उसे विश्राम नहीं मिलता।” प्रसंग यहीं छूटता है, एक ऐसे मन पर जो ठहर नहीं पा रहा। उसके बाद भुशुण्डि ने क्या किया, और उस बालक ने क्या किया, यह अगले प्रसंग की बात है।
दो अंगुल की नाप
इस प्रसंग में ब्रह्माण्डों की संख्या एक आँगन से अगनित तक और फिर सौ कल्प तक फैलती है। पर एक संख्या नहीं बदलती: दो अंगुल, ब्रह्मलोक में राम की भुजा और भागते कौए के बीच की दूरी। विशालता के इस पूरे चित्र के भीतर यह छोटी-सी नाप हिलती नहीं, और वह एक बच्चे के हाथ की है।
दूसरी बात उस शंका की है जिससे यह सब शुरू हुआ। शंका यह नहीं थी कि यह बालक कुछ बड़ा क्यों नहीं करता। शंका यह थी कि यह इतना साधारण क्यों है, साधारण बच्चे जैसा। उत्तर विशालता से मिला, असंख्य ब्रह्माण्डों से। फिर वह विशालता दो घड़ी में तह करके उसी आँगन में रख दी गयी, जहाँ वही बालक वही खेल फिर करने लगा। साधारण होने की शंका का उत्तर यह नहीं कि वह साधारण नहीं है। उत्तर यह है कि दोनों एक साथ हैं, और भुशुण्डि का मन इसी “एक साथ” को सँभाल नहीं पा रहा।
तीसरी बात हँसी की है। पूरे खेल में राम एक भी वाक्य नहीं बोलते। तोतले बोल, किलकारी, रोना और हँसना। भुशुण्डि ने जो देखा वह किसी उपदेश या वर से नहीं, एक बच्चे के हँसने से खुला और उसी के हँसने से बन्द हुआ। माया, जीव और ईश्वर की बातें भुशुण्डि की हैं, गरुड़ के लिये। बालक ने बस हँसा, और मुँह खोला।
इन ब्रह्माण्डों के बीच एक पूआ है। जिसके उदर में करोड़ों ब्रह्मा हैं, वह बालक आँगन में एक कौए को बुलाने के लिये हाथ में पूआ लिये खड़ा है। इन दोनों में कोई चित्र दूसरे से ऊँचा नहीं किया गया।
यह सब न किसी ऋषि ने देखा, न देवता ने, न माता ने, न भाइयों ने। एक कौए ने, जिसे उस बालक ने पूआ दिखाकर बुलाया था और जिसे वह पकड़ नहीं पाया, या पकड़ना नहीं चाहता था। बाहर निकलने पर उसे कोई पद नहीं मिला, कोई वर नहीं। उसे वही खेल फिर मिला, और एक मन जो ठहरता नहीं था।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, उत्तरकाण्ड, दोहा 76 से 82, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।