रामचरितमानस · उत्तरकाण्ड · ऋषि निर्दोष, वह वरदान, और ज्ञान तथा भक्ति का भेद
ऋषि निर्दोष, वह वरदान, और ज्ञान तथा भक्ति का भेद
काकभुशुण्डि पहले यह सिद्ध करते हैं कि शाप देनेवाले ऋषि का उसमें कोई दोष नहीं था, और फिर गरुड़ का वह प्रश्न आता है जिसका उत्तर एक गाय, एक मथानी और एक बत्ती के सहारे दिया जाता है।
इस प्रसंग की पहली ही पंक्ति एक सफ़ाई है, और सफ़ाई देनेवाला वही है जिसका नुकसान हुआ था। काकभुशुण्डि अभी-अभी यह बता चुके हैं कि उन्हें यह कौए की देह किस तरह मिली। सुननेवाले के मन में इसके बाद जो प्रश्न उठना चाहिये वह सीधा है, कि शाप देनेवाले मुनि का क्या हुआ, और उनका ऐसा करना क्या ठीक था। भुशुण्डि उस प्रश्न को उठने ही नहीं देते। वे पूछे जाने से पहले उत्तर दे देते हैं, और उत्तर में मुनि का बचाव करते हैं।
पन्ना दो हिस्सों का है और दोनों के बीच एक प्रश्न खड़ा है। पहले हिस्से में कथा अपने अन्त तक पहुँचती है। मुनि पछताते हैं, बुलाकर मन्त्र देते हैं, बालकरूप का ध्यान बताते हैं, कुछ समय अपने पास रखकर रामचरितमानस सुनाते हैं, और अन्त में सिर पर हाथ रखकर वह वरदान देते हैं जिसके कारण भुशुण्डि आज उसी आश्रम में बैठे हुए हैं। आकाश से एक गम्भीर वाणी उस वरदान पर मुहर लगा देती है, और उसके बाद भुशुण्डि कह देते हैं कि आपके सब प्रश्नों का उत्तर हो गया।
पर उत्तर होते ही एक नया प्रश्न खड़ा हो जाता है, और वह कथा के भीतर से ही निकलता है। गरुड़ ने अभी-अभी सुना है कि एक मुनि ने ज्ञान का उपदेश दिया और सुननेवाले ने उसे भक्ति जितना आदर नहीं दिया। सो वे पूछ बैठते हैं कि ज्ञान और भक्ति में अन्तर कितना है। उत्तर किसी शास्त्रार्थ की तरह नहीं खुलता। वह एक घर के आँगन की तरह खुलता है, जिसमें एक गाय है, हरी घास है, एक छोटा बछड़ा है, दूध है, जामन है, मथानी है, मक्खन है, और सबसे अन्त में एक दिया और एक बत्ती। यह सब एक कौआ एक गरुड़ को सुना रहा है, और यह पूरी बातचीत शिवजी भवानी को सुना रहे हैं।
इस प्रसंग के मुख्य किरदार
- काकभुशुण्डि वह कौआ जो यह सारी कथा कह रहा है, और जिसे अपनी यह देह इतनी प्रिय है कि इच्छा होने पर भी वह इसे बदलता नहीं।
- गरुड़ जो सुनने आये थे और अब पूछने लगे हैं। इस पन्ने का दूसरा आधा हिस्सा उन्हीं के एक प्रश्न से खुलता है।
- मुनि वह ऋषि जिनके शाप से यह देह मिली और जिनके आशीर्वाद से यह वरदान। टीका उनका नाम लोमश बताती है।
- श्रीराम जो इस प्रसंग में सामने नहीं आते, पर जिन्हें पहली ही चौपाई सब हृदयों का प्रेरक कहती है, और जिनकी भक्ति के पक्ष पर अड़े रहने से यह सारा प्रसंग शुरू हुआ था।
- शिवजी जो यह पूरी बातचीत भवानी को सुना रहे हैं, और जिनकी कृपा से वह गुप्त रामचरितमानस पहले मुनि को मिला था।
- माया इस पन्ने पर एक पात्र की तरह आती है, नर्तकी कही जाती है, और भक्ति के सामने सकुचा जाती है।
पहली बात: ऋषि का कोई दोष नहीं
भुशुण्डि पुकारकर बात शुरू करते हैं, हे पक्षिराज, सुनिये। पुकार इसलिये है कि जो कहा जाने वाला है वह सुननेवाले की अपेक्षा के उलटा है। जिसने शाप पाया वह शाप देनेवाले को निर्दोष बता रहा है, और बताने के लिये कोई उदारता नहीं दिखाता। वह कारण देता है।
सुनु खगेस नहिं कछु रिषि दूषन। उर प्रेरक रघुबंस बिभूषन॥
चौपाई १
कृपासिंधु मुनि मति करि भोरी । लीन्ही प्रेम परिच्छा मोरी॥
इसमें ऋषि का कुछ भी दोष नहीं है, रघुवंश के विभूषण ही सबके हृदय में प्रेरणा करनेवाले हैं। कृपा के सागर ने मुनि की बुद्धि को भोरी करके मेरे प्रेम की परीक्षा ली। दोनों पंक्तियों का क्रम देखने लायक है। पहले इनकार आता है और कारण बाद में, यानी बात मुनि को बचाने से शुरू होती है, किसी सिद्धान्त से नहीं। और जब कारण आता है तो उसमें वह शब्द रखा जाता है जिसकी इस जगह कोई ज़रूरत नहीं थी, उर प्रेरक। जो हर हृदय के भीतर बैठकर प्रेरणा देता है, उसके रहते किसी एक हृदय पर उँगली रखना बनता ही नहीं।
दूसरी पंक्ति में वह हाथ खुलकर सामने आ जाता है और उसे नाम भी मिल जाता है, कृपासिंधु। जिसने मुनि की बुद्धि भुलावे में डाली उसे यहाँ क्रोधी नहीं कहा गया, कृपा का समुद्र कहा गया है, और जो किया गया उसे दण्ड नहीं कहा गया, परिच्छा कहा गया है। परीक्षा किसकी, यह भी टाला नहीं गया। ज्ञान की नहीं, तर्क की नहीं, प्रेम की।
अगली चौपाई इसी को पूरा करती है, और वह इस पूरे बचाव की सबसे मज़बूत ईंट है। मन, वचन और कर्म से जब प्रभु ने मुझे अपना दास जान लिया, तब भगवान् ने मुनि की बुद्धि फिर पलट दी। ध्यान दीजिये कि बुद्धि को भुलाने और बुद्धि को लौटाने, दोनों के लिये एक ही हाथ बताया गया है। अगर दूसरी बार का पलटना उस हाथ का है तो पहली बार का भुलावा भी उसी का ठहरता है, और बीच में खड़ा हुआ आदमी दोनों बार साधन भर रह जाता है। भुशुण्डि यह बात कहीं समझाते नहीं, वे बस दोनों क्रियाओं को आमने-सामने रख देते हैं।
और तब ऋषि ने जो देखा, वह भी गिनाया जाता है। उन्होंने मेरा महान् पुरुषों का सा स्वभाव देखा और श्रीराम के चरणों में विशेष विश्वास देखा। टीका इस महत सीलता को खोलकर धैर्य, अक्रोध और विनय बताती है। यानी जो चीज़ मुनि का मन बदलती है वह कोई नयी दलील नहीं है, शाप पा चुकने के बाद का बरताव है। और टीका जिन तीन बातों को गिनाती है, वे तीनों कुछ कर दिखाने की नहीं, अपने को रोक लेने की चीज़ें हैं।
इसके बाद जो होता है वह एक ही चौपाई में सारा आ जाता है, और उसका क्रम पढ़ते हुए धीरे चलना चाहिये। पहले बहुत विस्मय, फिर बार-बार पछतावा, फिर आदर के साथ बुलावा, फिर अनेक प्रकार से सन्तोष, और तब जाकर, हर्षित होकर, राममन्त्र। देने की बात सबसे आख़िर में आती है। उससे पहले चार काम होते हैं और चारों मुनि अपने ऊपर करते हैं।
अति बिसमय पुनि पुनि पछिताई । सादर मुनि मोहि लीन्ह बोलाई॥
चौपाई २
मम परितोष बिबिधि बिधि कीन्हा । हरषित राममंत्र तब दीन्हा॥
और जो दिया जाता है, वह भी अपने पात्र के हिसाब से दिया जाता है। कृपानिधान मुनि ने उन्हें बालकरूप श्रीराम का ध्यान बताया। जो अभी-अभी पक्षी बना दिया गया है, उसके हाथ में कोई भारी साधना नहीं थमायी जाती। उसे एक बच्चे का रूप थमाया जाता है। भुशुण्डि कहते हैं कि वह ध्यान उन्हें सुन्दर और सुखद लगा, बहुत ही भाया, और यह भी जोड़ देते हैं कि वह ध्यान वे गरुड़ को पहले ही सुना चुके हैं। यह छोटा सा वाक्य याद रखने लायक है, क्योंकि इसी ध्यान का असर आगे इसी पन्ने पर दिखायी देगा।
सार: भुशुण्डि कहते हैं कि ऋषि का कोई दोष नहीं था, क्योंकि सब हृदयों के प्रेरक श्रीराम ही हैं, और कृपा के सागर ने मुनि की बुद्धि भुलाकर उनके प्रेम की परीक्षा ली। मन, वचन और कर्म से अपना दास जान लेने पर उसी ने मुनि की बुद्धि फिर पलट दी। ऋषि ने उनका धीरज और रामचरणों में विशेष विश्वास देखा, विस्मय और पछतावे के साथ उन्हें आदर से बुलाया, सन्तोष कराया, राममन्त्र दिया और बालकरूप का ध्यान बताया।
गुप्त सर, और उसे सुनाने की एक शर्त
अब मुनि वह करते हैं जो पछतावे से बड़ी चीज़ है। वे उसे जाने नहीं देते। कुछ समय तक उन्होंने मुझको वहाँ रखा, भुशुण्डि कहते हैं, और तब रामचरितमानस कहा। जिस ग्रन्थ को हम पढ़ रहे हैं, उसी के भीतर वह ग्रन्थ एक हाथ से दूसरे हाथ में जा रहा है, और जिस हाथ में जा रहा है वह कुछ दिन पहले तक शाप का पात्र था।
मुनि मोहि कछुक काल तहँ राखा। रामचरितमानस तब भाषा॥
चौपाई ३
सादर मोहि यह कथा सुनाई । पुनि बोले मुनि गिरा सुहाई॥
कथा सुनाकर मुनि फिर सुन्दर वाणी में बोले, और जो बोले उसमें दो बातें हैं। पहली यह कि यह सुन्दर और गुप्त रामचरितमानस उन्हें शिवजी की कृपा से मिला था। तुलसी यहाँ ग्रन्थ के लिये सर शब्द रखते हैं, सरोवर, और सरोवर के साथ गुप्त शब्द जोड़ देते हैं। छिपा हुआ, पर किसी तिजोरी में नहीं। सरोवर छिपा हो तब भी होता किसी के पीने के लिये ही है, और कौन पिये यह अगली ही पंक्ति तय कर देती है।
दूसरी बात यह कि सुनाने का कारण क्या था। आपको श्रीराम का अपना भक्त जाना, इसी से मैंने सब विस्तार के साथ कहा। पात्रता की कोई और कसौटी नहीं रखी गयी। न शास्त्र का अभ्यास, न जन्म, न आश्रम। एक ही बात देखी गयी, कि यह किसका है।
और इसके तुरन्त बाद वही कसौटी उलटी दिशा में रख दी जाती है, एक मनाही की शक्ल में।
राम भगति जिन्ह कें उर नाहीं । कबहुँ न तात कहिअ तिन्ह पाहीं॥
चौपाई ४
मुनि मोहि बिबिधि भाँति समुझावा। मैं सप्रेम मुनि पद सिरु नावा॥
जिनके हृदय में श्रीराम की भक्ति नहीं है, उनके सामने इसे कभी नहीं कहना चाहिये। दोनों वाक्य एक ही तराज़ू के दो पलड़े हैं। जिस कारण से यह कथा एक को सुनायी गयी, उसी के न होने पर दूसरे को नहीं सुनायी जायेगी। मनाही का आधार यह नहीं है कि बात कठिन है या गुप्त विद्या है। आधार यह है कि सुननेवाले के भीतर वह चीज़ हो जिसके बिना यह कथा केवल शब्द रह जायेगी।
मुनि ने बहुत प्रकार से समझाया और भुशुण्डि ने प्रेम के साथ उनके चरणों में सिर नवाया। और तब वह क्षण आता है जिसमें इस पूरे प्रसंग की सबसे बड़ी पलटी दिखायी देती है। मुनीश्वर ने अपने करकमलों से मेरा सिर स्पर्श किया। जिस मुँह से शाप निकला था उसी मुँह से आशीर्वाद निकल रहा है, और सिर पर रखा हुआ हाथ उसी आदमी का है। भुशुण्डि इस पर एक शब्द टिप्पणी नहीं करते।
आशीर्वाद की भाषा भी देखने लायक है। अब मेरी कृपा से आपके हृदय में सदा अबिरल रामभक्ति बसेगी। मुनि अपने ही प्रसाद की बात कर रहे हैं, उसी प्रसाद की जो अभी कुछ दिन पहले क्रोध बनकर गिरा था। और जो माँगा नहीं गया था वही दिया जा रहा है, क्योंकि भक्ति के लिये तो यह आदमी पहले ही अड़ चुका था।
सार: मुनि उन्हें कुछ समय अपने पास रखते हैं और रामचरितमानस सुनाते हैं। वे बताते हैं कि यह गुप्त सरोवर उन्हें शिवजी की कृपा से मिला था और सुनाया इसलिये कि उन्होंने भुशुण्डि को श्रीराम का अपना भक्त जाना। साथ ही यह मनाही भी करते हैं कि जिनके हृदय में रामभक्ति न हो उनके आगे इसे कभी न कहना। फिर अपने करकमलों से सिर छूकर वे आशीर्वाद देते हैं कि सदा अविरल रामभक्ति इस हृदय में बसे।
वह वरदान, और आकाश से एक शब्द
अब वह दोहा आता है जिसके लिये यह सारा प्रसंग बना है, और जो दो हिस्सों में दिया गया है। पहले हिस्से में वरदान उस आदमी पर उतरता है, दूसरे में उस ज़मीन पर जिस पर वह आदमी बैठेगा।
सदा राम प्रिय होहु तुम्ह सुभ गुन भवन अमान।
दोहा ११३ (क, ख)
कामरूप इच्छामरन ग्यान बिराग निधान॥ ११३ (क)॥
जेहिं आश्रम तुम्ह बसब पुनि सुमिरत श्रीभगवंत।
ब्यापिहि तहँ न अबिद्या जोजन एक प्रजंत॥ ११३ (ख)॥
पहली आधी में पाँच चीज़ें हैं और उनमें से एक चीज़ बाकी सबसे अलग खड़ी है। सदा श्रीराम को प्रिय हों, कल्याणरूप गुणों के धाम हों, अमान हों, कामरूप और इच्छामरन हों, ज्ञान और वैराग्य के भण्डार हों। अमान, यानी मान से रहित। बाकी सब देने की चीज़ें हैं और यह एक हटाने की चीज़ है, और वह ठीक बीच में रखी गयी है। जिसे इच्छा से रूप बदलने और इच्छा से मरने की शक्ति दी जा रही है, उसके भीतर से पहले वह चीज़ निकाल ली जाती है जो ऐसी शक्ति पाकर सबसे पहले फूलती है।
दूसरी आधी में वरदान देह से निकलकर जगह पर फैल जाता है। श्रीभगवान् का स्मरण करते हुए जिस आश्रम में आप बसेंगे, वहाँ एक योजन तक अविद्या नहीं व्यापेगी। टीका जोड़ती है कि योजन चार कोस का होता है। यानी उस वरदान की नाप ली जा सकती है, और उसके भीतर आनेवाले पेड़, पक्षी, रास्ते और लोग, किसी ने कुछ नहीं किया, फिर भी वे उसकी छाया में आ गये। पर शर्त एक शब्द में छिपी हुई है, सुमिरत। घेरा तब तक है जब तक भीतर बैठा हुआ आदमी स्मरण कर रहा है।
आगे की चौपाइयों में मुनि और भी कहते हैं। काल, कर्म, गुण, दोष और स्वभाव से उत्पन्न कोई भी दुःख कभी नहीं व्यापेगा। श्रीराम के अनेकों सुन्दर रहस्य, जो इतिहास और पुराणों में कहीं छिपे हैं और कहीं खुले, वे सब बिना परिश्रम के जान लिये जायेंगे। जो इच्छा मन में करेंगे, हरि की कृपा से कुछ भी दुर्लभ नहीं रहेगा।
इन्हीं वाक्यों के बीच एक वाक्य ऐसा है जो बाकियों से अलग बना हुआ है। श्रीराम के चरणों में नित नया प्रेम हो। बाकी सब कथन हैं, यह एक प्रार्थना है। जो चीज़ें मुनि दे सकते थे वे उन्होंने दे दीं, और जो चीज़ किसी के देने की नहीं है उसके लिये उन्होंने माँग रख दी, बीचोंबीच, बिना कुछ कहे।
और तभी छत के ऊपर से बात में कोई और शामिल हो जाता है।
सुनि मुनि आसिष सुनु मतिधीरा । ब्रह्मगिरा भइ गगन गँभीरा॥
चौपाई ५
एवमस्तु तव बच मुनि ग्यानी। यह मम भगत कर्म मन बानी॥
मुनि का आशीर्वाद सुनकर आकाश में गम्भीर ब्रह्मवाणी हुई, ऐसा ही हो, हे ज्ञानी मुनि, आपका वचन सत्य हो। यह कर्म, मन और वाणी से मेरा भक्त है। जो कहा गया उस पर ग़ौर कीजिये। आकाश से कोई नयी सूची नहीं उतरती। वरदान मुनि का है और ऊपर से केवल एवमस्तु आता है, यानी जो नीचे कहा गया उसे सच कर दिया जाता है। और साथ में एक ही बात जोड़ी जाती है, जो देने की नहीं, अपनाने की है, कि यह मेरा है।
यह भी देखिये कि वह वाणी अपना नाम नहीं बताती। चौपाई उसे ब्रह्मगिरा कहती है और टीका ब्रह्मवाणी। कौन बोल रहा है, यह उस एक शब्द से समझना पड़ता है जो उसने अपने लिये रखा, मम। जिस भक्त की बात हो रही थी उसका स्वामी बोल रहा है, और उसने अपना परिचय अपने नाम से नहीं, अपने सम्बन्ध से दिया।
आकाशवाणी सुनकर मुझे बड़ा हर्ष हुआ, भुशुण्डि कहते हैं, मैं प्रेम में मग्न हो गया और मेरा सब सन्देह जाता रहा। वरदान की इतनी लम्बी सूची से जो काम नहीं हुआ था वह दो शब्दों से हो गया। सन्देह मिटाने के लिये गिनती नहीं चाहिये थी, पहचान चाहिये थी। फिर विनती करके, आज्ञा पाकर और चरणकमलों में बार-बार सिर नवाकर वे चल दिये।
सार: मुनि वरदान देते हैं कि वे सदा श्रीराम के प्रिय, शुभ गुणों के धाम, मानरहित, इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले, इच्छामृत्यु और ज्ञान तथा वैराग्य के भण्डार हों, और जिस आश्रम में भगवान् का स्मरण करते हुए बसें वहाँ एक योजन तक अविद्या न व्यापे। काल, कर्म, गुण, दोष और स्वभाव का दुःख कभी न छुए, राम के रहस्य बिना श्रम जान लिये जायँ। तब आकाश से गम्भीर ब्रह्मवाणी होती है, ऐसा ही हो, यह कर्म, मन और वाणी से मेरा भक्त है, और वही सुनकर भुशुण्डि का सारा सन्देह मिट जाता है।
सत्ताईस कल्प, और हर बार वही आँगन
अब कथा वहाँ पहुँच जाती है जहाँ सुननेवाले बैठे हुए हैं। मैं हर्ष के साथ इसी आश्रम में आया, भुशुण्डि कहते हैं, और प्रभु की कृपा से दुर्लभ वर पा लिया। और उसके तुरन्त बाद वह गिनती आती है जिससे इस पूरे पन्ने का पैमाना बदल जाता है।
हरष सहित एहिं आश्रम आयउँ । प्रभु प्रसाद दुर्लभ बर पायउँ॥
चौपाई ६
इहाँ बसत मोहि सुनु खग ईसा । बीते कलप सात अरु बीसा॥
हे पक्षिराज, सुनिये, मुझे यहाँ रहते सात और बीस कल्प बीत गये। तुलसी संख्या को जोड़कर एक शब्द में नहीं कहते, वे उसे तोड़कर कहते हैं, सात और बीस। गिनती इस तरह कही जाती है जैसे गिनते हुए कही जा रही हो, और सुननेवाला उसे गिनने लगता है। जितनी देर में यह संख्या गले से उतरती है, उतनी देर में उस पर्वत का सूनापन भी उतर जाता है।
इतने समय का वे करते क्या हैं, यह अगली पंक्ति बताती है और वह एक तरह से मज़ाक़िया भी है और मार्मिक भी। मैं यहाँ सदा श्रीरघुनाथजी के गुणों का गान करता हूँ और चतुर पक्षी उसे आदर के साथ सुनते हैं। जिसे पक्षी बना दिया गया था, उसने पक्षियों की ही सभा बना ली, और जो देह शाप से मिली थी वही उसे उसके श्रोता दे गयी।
पर वे वहीं बँधे नहीं रहते। अयोध्यापुरी में जब-जब श्रीरघुवीर भक्तों के लिये मनुष्य-शरीर धारण करते हैं, तब-तब वे जाते हैं। जब-जब और तब-तब, यह जोड़ा दो चौपाइयों पर फैला हुआ है और उसी में यात्रा का सारा ब्योरा है। न कोई बुलावा, न कोई सूचना। अवतार होता है और यह पक्षी उड़ जाता है।
तब तब जाइ राम पुर रहऊँ । सिसुलीला बिलोकि सुख लहऊँ॥
चौपाई ७
पुनि उर राखि राम सिसुरूपा। निज आश्रम आवउँ खगभूपा॥
तब-तब मैं जाकर श्रीराम की नगरी में रहता हूँ और शिशुलीला देखकर सुख पाता हूँ। फिर हे पक्षिराज, श्रीराम के शिशुरूप को हृदय में रखकर अपने आश्रम में लौट आता हूँ। ध्यान दीजिये कि वे पूरी लीला देखने नहीं रुकते। धनुष, वन, सेतु, युद्ध, राज्य, इनमें से किसी का नाम यहाँ नहीं है। जो देखने वे जाते हैं वह केवल बचपन है, और उतना देखकर वे लौट आते हैं।
और यह बात इसी पन्ने की एक पिछली पंक्ति से जाकर मिल जाती है। मुनि ने उन्हें जो ध्यान दिया था वह बालकरूप का था। जो ध्यान सिखाया गया, वही देखने ये हर बार अयोध्या जाते हैं, और लौटते समय जो साथ लाते हैं वह कोई कथा नहीं, एक रूप है। सत्ताईस कल्प में यह आना-जाना कितनी बार हुआ होगा, इसका हिसाब तुलसी नहीं देते। वे बस इतना बताते हैं कि हर बार वही आँगन और वही बालक।
इसके बाद भुशुण्डि अपनी बात बाँध देते हैं। जिस कारण से मैंने कौए की देह पायी, वह सारी कथा मैंने आपको सुना दी। हे तात, मैंने आपके सब प्रश्नों के उत्तर कह दिये। और इस बाँधने के तुरन्त बाद वे एक वाक्य और जोड़ देते हैं, जो उत्तर का हिस्सा नहीं है, उद्गार है, कि रामभक्ति की महिमा बड़ी भारी है।
सार: वरदान पाकर भुशुण्डि इसी आश्रम में आ गये और उन्हें यहाँ रहते सत्ताईस कल्प बीत चुके हैं। वे सदा रघुनाथजी के गुण गाते हैं, चतुर पक्षी उन्हें आदर से सुनते हैं, और जब-जब अयोध्या में अवतार होता है तब-तब वे जाकर शिशुलीला देखते हैं और शिशुरूप हृदय में रखकर लौट आते हैं। इसके बाद वे कह देते हैं कि काग-देह मिलने का सारा कारण और गरुड़ के सब प्रश्नों के उत्तर पूरे हो गये।
इसीलिये यह देह प्रिय है
और तब वह दोहा आता है जिसमें इस पूरी कथा का निचोड़ है, और जिसमें भुशुण्डि वह कहते हैं जो शाप पाया हुआ कोई आदमी सामान्यतः नहीं कहता।
ताते यह तन मोहि प्रिय भयउ राम पद नेह।
दोहा ११४ (क)
निज प्रभु दरसन पायउँ गए सकल संदेह॥ ११४ (क)॥
इसीलिये यह शरीर मुझे प्रिय हो गया, कि इसमें श्रीराम के चरणों का प्रेम मिला। इसी से मैंने अपने प्रभु के दर्शन पाये और सब सन्देह जाते रहे। कारण गिनाते समय उन्होंने वरदान का नाम नहीं लिया। न इच्छामृत्यु, न रूप बदलने की शक्ति, न वह घेरा जिसमें अविद्या नहीं घुसती। उन्होंने दो चीज़ें गिनायीं, प्रेम और दर्शन, और दोनों के साथ एक छोटा सा शब्द लगा दिया, निज, अपना। अपने प्रभु।
अगला अर्धभाग उसी पन्ने की पिछली पंक्ति को दोहराता है। सन्देह वहाँ भी गये थे, आकाशवाणी सुनते ही, और यहाँ भी वही कहा जा रहा है। जिस आदमी ने अपनी कथा में दो बार यह गिना हो कि उसका सन्देह मिट गया, उसके लिये देह का सुन्दर या कुरूप होना सचमुच बहुत छोटी बात रह जाती है।
और फिर वह दोहा, जिसमें वे अपने ही ऊपर एक शब्द चलाते हैं और उसे हटाते नहीं।
भगति पच्छ हठ करि रहेउँ दीन्हि महारिषि साप।
दोहा ११४ (ख)
मुनि दुर्लभ बर पायउँ देखहु भजन प्रताप॥ ११४ (ख)॥
मैं हठ करके भक्ति के पक्ष पर अड़ा रहा, महर्षि ने शाप दिया; पर मुनियों को भी दुर्लभ वर मैंने पाया, भजन का प्रताप देखिये। इस पंक्ति में अपने लिये कोई नरमी नहीं रखी गयी। वे यह नहीं कहते कि मेरे साथ अन्याय हुआ। वे यह भी नहीं कहते कि मैं सही था और मुनि ग़लत। वे तीन बातें एक साँस में रख देते हैं, मेरा हठ, उनका शाप, और मेरा वर। बीच की कड़ी पर कोई फ़ैसला नहीं सुनाया जाता।
और अन्तिम शब्द सुननेवाले के हाथ में सौंप दिया जाता है, देखहु। देखिये। यानी इस पूरी कथा का निष्कर्ष वे ख़ुद नहीं निकालते, वे उसकी ओर उँगली उठाकर चुप हो जाते हैं। और जिस चीज़ की ओर उँगली उठी है वह उनका धैर्य नहीं है, उनका भाग्य नहीं है, भजन है।
इसके बाद दो उपमाएँ आती हैं, और दोनों उन लोगों के लिये हैं जो यह सब जानकर भी दूसरा रास्ता पकड़ते हैं। पहली उपमा घर के भीतर की है।
जे असि भगति जानि परिहरहीं । केवल ग्यान हेतु श्रम करहीं॥
चौपाई ८
ते जड़ कामधेनु गृहँ त्यागी। खोजत आकु फिरहिं पय लागी॥
जो भक्ति की ऐसी महिमा जानकर भी उसे छोड़ देते हैं और केवल ज्ञान के लिये श्रम करते हैं, वे मूर्ख घर पर खड़ी कामधेनु को छोड़कर दूध के लिये आकु ढूँढ़ते फिरते हैं। टीका आक को मदार बताती है। उपमा की मार दो जगह है। पहली यह कि गाय घर में खड़ी है, कहीं ले जाकर बाँधनी नहीं पड़ी। दूसरी यह कि खोजनेवाला आलसी नहीं है, वह खोजता फिर रहा है, यानी मेहनत पूरी है और दिशा उलटी है।
दूसरी उपमा घर के बाहर ले जाती है और बड़ी कर दी जाती है। जो श्रीहरि की भक्ति छोड़कर दूसरे उपायों से सुख चाहते हैं, वे बिना जहाज़ के तैरकर महासमुद्र के पार जाना चाहते हैं। यहाँ भी वही बात दुहरायी गयी है। तैरना आता हो तब भी समुद्र समुद्र ही रहता है, और जो चीज़ चाहिये वह हाथ-पाँव नहीं है, नाव है।
सार: भुशुण्डि कहते हैं कि यह देह उन्हें इसलिये प्रिय है कि इसी में रामचरणों का प्रेम और अपने प्रभु का दर्शन मिला और सब सन्देह मिटे। वे अपने हठ को छिपाते नहीं, शाप को गिनाते हैं, और वर को भजन का प्रताप कहकर सुननेवाले के सामने रख देते हैं। जो भक्ति जानकर भी छोड़ते हैं वे घर की कामधेनु छोड़कर मदार से दूध खोजते हैं, और जो और उपायों से सुख चाहते हैं वे बिना नाव के महासागर तैरना चाहते हैं।
गरुड़ का प्रश्न, और उसका स्वागत
यहाँ कथा एक क़दम पीछे हटती है और हमें याद दिलाया जाता है कि यह सब कौन सुना रहा है। हे भवानी, भुशुण्डि के वचन सुनकर गरुड़जी हर्षित होकर कोमल वाणी से बोले। शिवजी पार्वती से कह रहे हैं, गरुड़ भुशुण्डि से कह रहे हैं, और भुशुण्डि को यह कथा उस मुनि से मिली थी जिसे वह शिवजी की कृपा से मिली थी। जितनी बार यह कथा हाथ बदलती है, उतनी बार वह किसी न किसी के प्रेम से ही आगे बढ़ती है।
गरुड़ पहले हिसाब चुकाते हैं। हे प्रभो, आपके प्रसाद से मेरे हृदय में अब सन्देह, शोक, मोह और भ्रम कुछ भी नहीं रह गया। चार चीज़ें गिनायी गयी हैं और चारों का जाना गिनकर बताया गया है। फिर वे कहते हैं कि मैंने श्रीरामचन्द्रजी के पवित्र गुणसमूह सुने और आपकी कृपा से विश्राम पाया। और तभी, विश्राम पा चुकने के बाद, वे कहते हैं कि एक बात और पूछनी है।
जो पूछा जाता है वह किसी पोथी से नहीं उठाया गया। वह उसी कथा में से निकला है जो अभी-अभी सुनायी गयी। संत, मुनि, वेद और पुराण कहते हैं कि ज्ञान के समान दुर्लभ कुछ भी नहीं है। वही ज्ञान, हे गोसाईं, मुनि ने आपसे कहा, पर आपने भक्ति की तरह उसका आदर नहीं किया। गरुड़ ने कथा को ध्यान से सुना है, इतने ध्यान से कि उसके भीतर की एक असंगति उन्हें खटक गयी है, और वे उसे छिपाते नहीं।
ग्यानहि भगतिहि अंतर केता। सकल कहहु प्रभु कृपा निकेता॥
चौपाई ९
सुनि उरगारि बचन सुख माना। सादर बोलेउ काग सुजाना॥
हे कृपा के धाम, ज्ञान और भक्ति में कितना अन्तर है, यह सब मुझसे कहिये। और अगली ही आधी पंक्ति में उत्तर देनेवाले की मुद्रा बता दी जाती है, जो इस प्रश्न को पूरी तरह बदल देती है। गरुड़ के वचन सुनकर सुजान काकभुशुण्डि ने सुख माना और आदर के साथ कहा। सुख माना। जिस पर उँगली उठायी गयी थी वह नाराज़ नहीं हुआ, प्रसन्न हुआ।
और पहला उत्तर वह है जिसकी उम्मीद पूछनेवाले को भी नहीं रही होगी। भक्ति और ज्ञान में कुछ भी भेद नहीं है, दोनों ही संसार से उत्पन्न क्लेशों को हर लेते हैं। जिस आदमी पर यह आरोप था कि उसने एक पक्ष लिया, उसने पहले वाक्य में दोनों को बराबर कह दिया, और बराबरी का आधार भी बता दिया, कि दोनों वही काम करते हैं।
भगतिहि ग्यानहि नहिं कछु भेदा । उभय हरहिं भव संभव खेदा॥
चौपाई १०
नाथ मुनीस कहहिं कछु अंतर । सावधान सोउ सुनु बिहंगबर॥
उसके बाद ही वह शर्त आती है जिसके सहारे बाकी सारा उपदेश खड़ा है। हे नाथ, मुनीश्वर इनमें कुछ अन्तर बतलाते हैं, हे पक्षिश्रेष्ठ, उसे सावधान होकर सुनिये। आगे जो कुछ कहा जायेगा वह अपनी ओर से नहीं कहा जा रहा, मुनियों के मत के रूप में कहा जा रहा है, और सुननेवाले से सावधानी माँगी जा रही है। सावधानी वहीं माँगी जाती है जहाँ बात ग़लत सुनी जा सकती है।
सार: शिवजी भवानी से कहते हैं कि भुशुण्डि के वचन सुनकर गरुड़ ने कहा कि उनके हृदय से सन्देह, शोक, मोह और भ्रम जाते रहे। फिर उन्होंने पूछा कि संत, मुनि, वेद और पुराण ज्ञान को सबसे दुर्लभ कहते हैं, वही ज्ञान मुनि ने आपसे कहा था और आपने उसका भक्ति जैसा आदर नहीं किया, तो ज्ञान और भक्ति में अन्तर कितना है। भुशुण्डि प्रश्न सुनकर प्रसन्न होते हैं और पहले यही कहते हैं कि दोनों में कोई भेद नहीं, दोनों संसार के क्लेश हरते हैं, पर मुनि जो अन्तर बताते हैं उसे सावधान होकर सुनिये।
जिसे बलवान् कहा गया, वही विवश हो जाता है
जो अन्तर मुनि बताते हैं, वह एक उपमा के सहारे रखा जाता है, और उपमा दो कोटियों में बाँटकर चलती है। ज्ञान, वैराग्य, योग और विज्ञान, ये सब पुरुष हैं, और पुरुष का प्रताप सब प्रकार से प्रबल होता है। दूसरी ओर अबला है, जो स्वभाव से ही निर्बल है और जाति से ही जड़ है। यहाँ तक बात सीधी चलती है और सुननेवाला यही सोचेगा कि आगे बलवान् की जीत होगी।
अगला दोहा उसी दिशा में एक क़दम और बढ़ता है। जो विरक्त और धीरबुद्धि पुरुष हैं वही स्त्री को त्याग सकते हैं, न कि वे कामी जो विषयों के वश में हैं और रघुवीर के चरणों से विमुख हैं। यानी कसौटी और ऊँची कर दी जाती है, और उस पर खरा उतरनेवाला वही ठहरता है जिसके पास विराग भी हो और धीरज भी।
और ठीक इसके बाद, बिना किसी भूमिका के, वह सोरठा आता है जिसमें बनायी हुई सारी सीढ़ी एक साथ भरभरा जाती है।
सोउ मुनि ग्याननिधान मृगनयनी बिधु मुख निरखि।
सोरठा ११५ (ख)
बिबस होइ हरिजान नारि बिष्नु माया प्रगट॥ ११५ (ख)॥
वे ज्ञान के भण्डार मुनि भी मृगनयनी के चन्द्रमुख को देखकर बिबस हो जाते हैं। हे गरुड़जी, स्त्री साक्षात् विष्णु की माया ही है, जो प्रकट होकर सामने आयी है। पहला ही शब्द ध्यान खींचता है, सोउ, यानी वही। वही मुनि जिसे अभी प्रबल कहा गया था, वही ज्ञान का भण्डार जिसके लिये कसौटी बाँधी गयी थी। जिसे जिताने के लिये मैदान तैयार किया गया था, उसी को दो पंक्तियों में गिरा दिया जाता है।
और गिराने के लिये कोई युद्ध नहीं दिखाया जाता। एक मुख है, उसे देखा जाता है, और देखने भर से विवशता आ जाती है। क्रिया एक ही रखी गयी है, निरखि, देखकर। बीच में न कोई बातचीत है, न कोई प्रलोभन। पूरा तर्क एक नज़र में तय हो जाता है।
यहाँ कहनेवाला रुककर अपने ऊपर लगा हुआ शक हटाता है। मैं यहाँ कुछ पक्षपात नहीं रखता, वेद, पुराण और संतों का मत ही कहता हूँ। यह वाक्य और भी दिलचस्प इसलिये है कि थोड़ी देर पहले इसी आदमी ने अपने लिये पच्छ शब्द इस्तेमाल किया था, कि मैं भक्ति के पक्ष पर हठ करके अड़ा रहा। जिसने अपना पक्ष माना था, वही अब कह रहा है कि इस विवेचन में पच्छपात नहीं है। पक्ष अपनी जगह है, पर नाप करते समय अंगुल किसी के लिये छोटा-बड़ा नहीं किया जा रहा।
और तब वह वाक्य आता है जो पूरे उपदेश की कील है, और जिसे तुलसी अनुपम रीति कहते हैं। एक स्त्री के रूप पर दूसरी स्त्री मोहित नहीं होती। यहाँ तक की सारी बातचीत इसी एक वाक्य के लिये थी, और अगली चौपाई में इसका उपयोग हो जायेगा।
सार: मुनियों का बताया हुआ अन्तर एक उपमा से खुलता है, कि ज्ञान, वैराग्य, योग और विज्ञान पुरुष हैं और प्रबल हैं, और अबला स्वभाव से निर्बल तथा जाति से जड़ है। स्त्री को वही त्याग सकता है जो विरक्त और धीरबुद्धि हो। पर अगले ही सोरठे में वही ज्ञाननिधान मुनि मृगनयनी के चन्द्रमुख को देखकर विवश हो जाता है, और स्त्री को विष्णु की प्रकट माया कहा जाता है। भुशुण्डि जोड़ते हैं कि वे पक्षपात नहीं रखते, वेद, पुराण और संतों का मत कहते हैं, और यह अनुपम रीति है कि स्त्री के रूप पर स्त्री मोहित नहीं होती।
माया नर्तकी है, और भक्ति घर की
अब वह चाल चली जाती है जिसके लिये पिछली सारी बात बिछायी गयी थी, और वह एक ही चौपाई में पूरी हो जाती है।
माया भगति सुनहु तुम्ह दोऊ। नारि बर्ग जानइ सब कोऊ॥
चौपाई ११
पुनि रघुबीरहि भगति पिआरी । माया खलु नर्तकी बिचारी॥
सुनिये, माया और भक्ति, ये दोनों ही स्त्रीवर्ग की हैं, यह सब कोई जानते हैं। फिर श्रीरघुवीर को भक्ति प्यारी है, और माया बिचारी तो निश्चय ही नर्तकी है। दोनों को एक ही कोटि में रखकर अभी-अभी बनाया हुआ नियम उन पर चला दिया जाता है। अगर स्त्री के रूप पर स्त्री मोहित नहीं होती, तो जिस माया के सामने ज्ञान का भण्डार विवश हो गया था, वही माया भक्ति के सामने कुछ नहीं कर सकती।
और अन्तर दो शब्दों में तय हो जाता है, कौन किसे प्यारी है। भक्ति के लिये शब्द है पिआरी, और माया के लिये नर्तकी। नाचनेवाली तब तक नाचती है जब तक देखनेवाला है। जिस घर में उसका नाच नहीं देखा जाता, उस घर में उसका कोई काम नहीं रह जाता। टीका इस बात को और साफ़ कर देती है और माया को नटिनीमात्र कहती है।
अगली दो चौपाइयों में यह बात पूरी होती है। श्रीरघुनाथजी भक्ति के अनुकूल रहते हैं, इसीसे माया उससे अत्यन्त डरती है। जिसके हृदय में उपमारहित और उपाधिरहित रामभक्ति बिना किसी रोक-टोक के बसती है, उसे देखकर माया सकुचा जाती है और अपनी प्रभुता उस पर कुछ भी नहीं चला सकती।
जो शब्द यहाँ रखा गया है वह लड़ाई का नहीं है, सकुचाई। माया हारती नहीं, माया संकोच में पड़ जाती है। और संकोच वहीं होता है जहाँ सामनेवाले से कोई पुराना रिश्ता हो और उसके सामने अपनी हैसियत छोटी लगने लगे। जिस चीज़ ने सारे संसार को बाँध रखा है, वह एक हृदय के सामने सिकुड़ जाती है, और वह हृदय किसी योद्धा का नहीं है।
और तब वह निष्कर्ष आता है जो इस पूरे तर्क को उलटकर रख देता है। ऐसा विचारकर जो विज्ञानी मुनि हैं, वे भी सब सुखों की खान भक्ति की ही याचना करते हैं। बात वहीं से शुरू हुई थी कि ज्ञान, वैराग्य, योग और विज्ञान प्रबल हैं। बात यहाँ आकर रुकती है कि वही विज्ञानी माँगने चले आते हैं। जिसे उपमा में बलवान् कहा गया था, वह अन्त में याचक है, और जिसे निर्बल कहा गया था उसी के दरवाज़े पर।
दोहे में यह बात एक ताला लगाकर बन्द कर दी जाती है। श्रीरघुनाथजी का यह रहस्य जल्दी कोई नहीं जान पाता, और जो उनकी कृपा से जान जाता है उसे स्वप्न में भी मोह नहीं होता। इसके साथ ही अगला हिस्सा खोल भी दिया जाता है, कि ज्ञान और भक्ति का और भी भेद सुनिये, जिसे सुनकर श्रीराम के चरणों में सदा अविच्छिन्न प्रेम हो जाता है।
सार: माया और भक्ति दोनों एक ही वर्ग की हैं, पर रघुवीर को भक्ति प्यारी है और माया बेचारी नाचनेवाली है। रघुनाथजी भक्ति के अनुकूल रहते हैं, इसलिये माया उससे डरती है, और जिस हृदय में निरुपम तथा निरुपाधि रामभक्ति निर्बाध बसती है उसे देखकर माया सकुचा जाती है और अपनी प्रभुता नहीं चला पाती। यही सोचकर विज्ञानी मुनि भी भक्ति की ही याचना करते हैं। दोहे में कहा जाता है कि यह रहस्य जल्दी कोई नहीं जानता, और जो जान ले उसे स्वप्न में भी मोह नहीं होता।
वह गाँठ जो झूठी है और फिर भी नहीं छूटती
दूसरा भेद बताने से पहले कहनेवाला एक चेतावनी देता है, और चेतावनी अपने ही कहने के विरुद्ध है। हे तात, यह अकथनीय कहानी सुनिये, यह समझते ही बनती है, कही नहीं जा सकती। कहनेवाला पहले यह कहता है कि यह कही नहीं जा सकती, और फिर कहता है। इससे सुननेवाले को यह पता चल जाता है कि आगे जो शब्द आयेंगे वे पूरी चीज़ नहीं होंगे, उसकी ओर इशारा होंगे।
सुनहु तात यह अकथ कहानी । समुझत बनइ न जाइ बखानी॥
चौपाई १२
ईस्वर अंस जीव अबिनासी। चेतन अमल सहज सुखरासी॥
जीव ईश्वर का अंश है, इसलिये वह अविनाशी है, चेतन है, निर्मल है और स्वभाव से ही सुख की राशि है। चार विशेषण, और चारों सकारात्मक हैं। बन्धन का ज़िक्र अभी हुआ ही नहीं। जो कुछ आगे बिगड़ेगा, उससे पहले यह बता दिया गया कि मूल में कुछ बिगड़ा हुआ नहीं था, और जो सुख वह ढूँढ़ रहा है वह बाहर से आने वाली चीज़ नहीं, उसकी अपनी राशि है।
और अगली ही चौपाई में गिरावट आ जाती है, और वह भी दो चित्रों के सहारे। वह माया के वश होकर तोते और वानर की तरह बँध गया। जड़ और चेतन में गाँठ पड़ गयी, और यद्यपि वह गाँठ झूठी है, फिर भी उसके छूटने में कठिनाई है।
तोते और वानर की कथाएँ यहाँ सुनायी नहीं जातीं। न चौपाई उन्हें खोलती है, न टीका। दोनों को केवल नाम लेकर छोड़ दिया जाता है, इस भरोसे पर कि सुननेवाला उन्हें जानता है। टीका जो एक शब्द जोड़ती है, वही सबसे भारी है, कि वह अपने आप ही बँध गया। बाँधनेवाला कोई बाहर से नहीं आया।
गाँठ के लिये जो शब्द चुना गया है वह दो चीज़ों को जोड़ता है, जड़ और चेतन। रस्सी की गाँठ तभी बनती है जब दो सिरे आपस में लिपट जायें। और फिर वह वाक्य आता है जिसके आगे शास्त्र भी हाथ मलता है, कि गाँठ मृषा है, झूठी है, और छूटती फिर भी नहीं। झूठी चीज़ को मिटाने के लिये कोई औज़ार नहीं बना, क्योंकि जिसे काटा जा सके वह तो सच्ची होती।
अगली चौपाई इस असमर्थता को गिनकर बताती है। तभी से जीव संसारी हो गया, न गाँठ छूटती है, न वह सुखी होता है। वेदों और पुराणों ने बहुत से उपाय बताये, पर वह छूटती नहीं, उलटे अधिक से अधिक उलझती जाती है। यह वाक्य पूरे पन्ने पर सबसे कड़ा है। उपाय बेकार नहीं बताये गये, उपाय उलझानेवाले बताये गये, और बतानेवालों के नाम भी ले लिये गये, श्रुति और पुराण।
फिर कारण दिया जाता है, और कारण रोशनी की भाषा में है। जीव के हृदय में अज्ञान का अन्धकार विशेष रूप से छाया हुआ है, इससे गाँठ दिखायी ही नहीं देती, छूटे तो कैसे। समस्या खोलने की नहीं है, देखने की है। और अन्त में जो कहा जाता है वह और भी सँभलकर कहा जाता है। जब ईश्वर ऐसा संयोग उपस्थित कर देते हैं, तब भी कदाचित् ही वह छूट पाती है। ईश्वर के हाथ लगाने के बाद भी कदाचित शब्द नहीं हटाया जाता।
सार: भुशुण्डि कहते हैं कि यह अकथ कहानी है, समझ में आती है, कही नहीं जाती। जीव ईश्वर का अंश है, अविनाशी, चेतन, निर्मल और स्वभाव से सुख की राशि, पर माया के वश होकर वह तोते और वानर की तरह बँध गया और जड़ तथा चेतन में गाँठ पड़ गयी। गाँठ झूठी है फिर भी छूटती नहीं, वेद-पुराणों के बताये उपायों से और उलझती है, क्योंकि हृदय के अन्धकार में वह दिखायी ही नहीं देती, और ईश्वर का संयोग मिलने पर भी कदाचित् ही खुलती है।
एक गाय, एक मथानी, और एक बत्ती
अब उत्तर घर के आँगन में उतर आता है, और यहाँ से लगातार पाँच पदों तक एक ही चित्र चलता है। जो प्रश्न ज्ञान और भक्ति के अन्तर का था, उसका उत्तर एक गाय से शुरू होता है।
सात्त्विक श्रद्धा सुन्दर गाय है, यदि श्रीहरि की कृपा से वह हृदय में आकर बस जाय। पूरी लम्बी विधि इसी एक शर्त पर टिकी हुई है, और वह शर्त पहली ही पंक्ति में रख दी जाती है। गाय पाली नहीं जाती, कमायी नहीं जाती, वह आकर बसती है, और लानेवाली कृपा है। इसके बाद जो कुछ किया जाना है वह सब उस गाय के होने पर ही होगा।
फिर चारा आता है। असंख्य जप, तप, व्रत, यम और नियम, और वे सब शुभ धर्म तथा आचार जिन्हें श्रुतियों ने कहा है, वही हरी घास हैं, जिन्हें गाय चरती है। एक ही उपमा में पूरी साधना को उसकी जगह मिल जाती है। घास ज़रूरी है, घास के बिना दूध नहीं, पर घास दूध नहीं है और घास पीयी नहीं जाती।
फिर वह पंक्ति आती है जो इस पूरे चित्र की धुरी है। भाव रूपी छोटा बछड़ा पाकर गाय पेन्हाती है, यानी दूध उतारती है। गाय चर भी ले तो भी दूध अपने आप नहीं आता। उसके लिये एक बच्चा चाहिये, और तुलसी उसके साथ सिसु शब्द भी लगा देते हैं, छोटा। जब तक भीतर कोई छोटी सी कोमल चीज़ न आ जाय, तब तक सारा जप-तप घास ही रह जाता है।
फिर दुहने का सामान गिनाया जाता है, और वह किसी मन्दिर का नहीं, गोशाला का है। नोइ निवृत्ति है, वही रस्सी जिससे दूहते समय गाय के पिछले पैर बाँधे जाते हैं। बरतन विश्वास है। और दूहनेवाला अहीर वह निर्मल मन है जो अपना ही दास है, यानी अपने वश में है। जिस मन को बाकी सब जगह मालिक बनकर बैठने की आदत है, वह यहाँ नौकर की जगह पर रखा गया है, और तभी दूध निकाल सकता है।
परम धर्ममय पय दुहि भाई । अवटै अनल अकाम बनाई॥
चौपाई १३
तोष मरुत तब छमाँ जुड़ावै । धृति सम जावनु देइ जमावै॥
परम धर्ममय दूध दुहकर उसे अकाम रूपी अग्नि पर भली भाँति औटाया जाय। फिर सन्तोष रूपी हवा से, क्षमा के साथ, उसे ठंडा किया जाय, और धैर्य तथा शम का जावनु देकर जमाया जाय। हर क़दम रसोई का है और हर क़दम की अपनी शर्त है। आँच तेज़ नहीं, निष्काम है। ठंडा करनेवाली चीज़ हवा है, बर्फ़ नहीं, यानी वह चीज़ जो छूती नहीं, बस बहती रहती है। और जमाने के लिये थोड़ा सा जामन चाहिये, जो ख़ुद पहले से जमा हुआ हो।
फिर मथना। मुदिता रूपी बरतन में तत्त्वविचार की मथानी से, दम के सहारे, सत्य और सुन्दर वाणी की रस्सी लगाकर मथा जाय, और तब उसमें से निर्मल, सुन्दर और अत्यन्त पवित्र वैराग्य रूपी मक्खन निकाल लिया जाय। इस पूरी सूची में एक बात चुपचाप कह दी गयी है। वैराग्य नवनीता है, मक्खन है, अन्त नहीं है। जिसे बहुत लोग मंज़िल समझते हैं, उसे यहाँ बीच का माल बताया गया है, और उसे अभी एक बार और आग पर चढ़ना है।
और अब वह दोहा, जिसमें दूसरी आग जलती है और उत्तर अपने असली शब्द तक पहुँचता है।
जोग अगिनि करि प्रगट तब कर्म सुभासुभ लाइ।
दोहा ११७ (क, ख, ग)
बुद्धि सिरावै ग्यान घृत ममता मल जरि जाइ॥ ११७ (क)॥
तब बिग्यानरूपिनी बुद्धि बिसद घृत पाइ।
चित्त दिआ भरि धरै दृढ़ समता दिअटि बनाइ॥ ११७ (ख)॥
तीनि अवस्था तीनि गुन तेहि कपास तें काढ़ि।
तूल तुरीय सँवारि पुनि बाती करै सुगाढ़ि॥ ११७ (ग)॥
योग रूपी अग्नि प्रकट करके उसमें शुभ और अशुभ, दोनों प्रकार के कर्मों का ईंधन लगा दिया जाय। ईंधन की सूची पर ध्यान दीजिये, उसमें पुण्य भी है। जब ममता रूपी मैल जल जाय, तब जो बचता है वह ज्ञान रूपी घी है, और उसे बुद्धि से ठंडा किया जाता है। यहाँ आकर प्रश्न का उत्तर मिल जाता है। ज्ञान घी है, और घी वही मक्खन है जिसे दुबारा आग पर चढ़ाया गया और जिसमें से एक चीज़ जल गयी।
दोहे का दूसरा हिस्सा उस घी को काम पर लगाता है। विज्ञानरूपिणी बुद्धि उस निर्मल घी को पाकर चित्त रूपी दिये को भरती है, और समता की दिअटि बनाकर उसे दृढ़ता से उस पर रखती है। दीवट वह चीज़ है जिसका काम केवल दिये को हिलने न देना है, और उसके लिये समता से अच्छा नाम कोई नहीं हो सकता था।
और तीसरे हिस्से में बत्ती बनती है। तीनों अवस्थाओं और तीनों गुणों रूपी कपास में से तुरीय रूपी तूल निकालकर, उसे सँवारकर, एक सुगाढ़ि बत्ती बनायी जाय। कपास से रूई निकालना, फिर उसे बटकर कड़ी बत्ती बनाना, यह दिये की तैयारी का सबसे धीमा और सबसे हाथ का काम है। और इसी पर हमारा पन्ना ख़त्म हो जाता है।
यानी इस प्रसंग के अन्त में दिया भरा हुआ रखा है, दीवट पक्की है, बत्ती बट चुकी है, और आग कहीं नहीं है। जो जलाना है वह अगली साँस में आयेगा। पूरे उत्तर में कहीं कोई मन्त्र, कोई तीर्थ, कोई आसन नहीं आया। एक गाय, घास, एक बछड़ा, रस्सी, बरतन, ग्वाला, आँच, हवा, जामन, मथानी, मक्खन, फिर आँच, घी, दिया, दीवट और बत्ती। और यह सब उस प्रश्न का उत्तर है कि ज्ञान और भक्ति में अन्तर कितना है।
सार: सात्त्विक श्रद्धा वह गाय है जो हरि की कृपा से हृदय में आकर बसती है, जप, तप, व्रत, यम और नियम उसकी हरी घास हैं, भाव का छोटा बछड़ा पाकर वह दूध उतारती है, निवृत्ति नोई है, विश्वास बरतन और अपने वश में आया निर्मल मन ग्वाला। परम धर्म का दूध निष्काम अग्नि पर औटाया जाता है, सन्तोष और क्षमा की हवा से ठंडा होता है, धैर्य तथा शम के जामन से जमता है, मुदिता में विचार की मथानी से मथकर वैराग्य का मक्खन निकलता है, योग की आग में शुभ और अशुभ कर्म जलाकर ममता का मैल जल जाता है और ज्ञान का घी बचता है। उसी घी से चित्त का दिया भरा जाता है, समता की दीवट बनती है, और तीनों अवस्थाओं तथा तीनों गुणों के कपास से तुरीय की रूई निकालकर कड़ी बत्ती बनायी जाती है।
और अन्त में, अपनी ओर
इस पन्ने पर दो बड़ी बातें कही गयी हैं और दोनों एक ही आदमी ने कही हैं। पहली यह कि जिसने मुझे शाप दिया उसका कोई दोष नहीं था। दूसरी यह कि जिन दो रास्तों का नाम लेकर लोग आपस में लड़ते हैं, उनमें कोई भेद ही नहीं है। दोनों बातें एक ही स्वभाव से निकली हैं। जो आदमी अपने साथ हुए को किसी के खाते में नहीं डालता, वही दो रास्तों के बीच खड़ा होकर किसी को नीचा नहीं दिखाता।
और फिर भी उसने एक पक्ष लिया था, और वह इसे छिपाता नहीं। भक्ति के पक्ष पर मैं हठ करके अड़ा रहा, वह कहता है, और शाप मिला। पर जब नाप का समय आता है तो वह अपने पक्ष को तराज़ू पर नहीं रखता, कहता है कि यहाँ मैं पक्षपात नहीं रखता, वेद, पुराण और संतों का मत कहता हूँ। पक्ष और पक्षपात, दोनों शब्द एक ही पन्ने पर हैं, और उनके बीच का फ़र्क़ यही पन्ना दिखा देता है।
तीसरी बात वह है जो सबसे आसानी से छूट जाती है और जो सबसे देर तक साथ रहती है। इस आदमी को इच्छा से रूप बदलने का वरदान मिला हुआ है। चाहे तो कुछ भी बन सकता है, और सत्ताईस कल्प से उसके पास यह चुनाव रोज़ रखा हुआ है। वह कौआ ही बना बैठा है, और कहता है कि यह देह मुझे प्रिय है। कारण भी वह गिनाता है, और कारण में वरदान का नाम नहीं आता। इसी देह में चरणों का प्रेम मिला और इसी देह से अपने प्रभु को देखा। इतना कहकर वह आगे बढ़ जाता है, और इस पर एक शब्द और नहीं कहता।
उत्तरकाण्ड का यह हिस्सा पूरे रामचरितमानस के सबसे शान्त हिस्सों में है, और उसकी शान्ति किसी वर्णन से नहीं आती। वह इस बात से आती है कि यहाँ कोई किसी से कुछ छीन नहीं रहा। मुनि पछताते हैं और देते हैं, आकाश केवल सहमति देता है, गरुड़ पूछते हैं और पूछने पर डाँट नहीं पड़ती, कहनेवाला सुख मानता है, और दो रास्तों के बीच का झगड़ा पहले ही वाक्य में यह कहकर उठा दिया जाता है कि भेद कुछ भी नहीं है।
और अन्त उस जगह पर होता है जहाँ कुछ भी पूरा नहीं हुआ। एक दिया रखा है, भरा हुआ, अपनी दीवट पर, और पास में एक बत्ती है जो अभी-अभी बटी गयी है। जितनी मेहनत यहाँ तक आने में लगी, उसका ब्योरा तुलसी ने एक-एक क़दम गिनाकर दिया, और फिर उन्होंने दिये को बिना जलाये छोड़ दिया। जो पढ़ रहा है उसे इस जगह एक बार रुकना चाहिये, क्योंकि आगे जो होगा वह रोशनी का काम है, और रोशनी से पहले हर घर में यही दिखता है, तेल भरा हुआ दिया और उसके पास रखी हुई एक सूखी बत्ती।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, उत्तरकाण्ड, दोहा ११३ से ११७, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।