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रामचरितमानसउत्तरकाण्डप्रसंग 20
ऋषि निर्दोष, वह वरदान, और ज्ञान तथा भक्ति का भेद
काकभुशुण्डि पहले यह सिद्ध करते हैं कि शाप देनेवाले ऋषि का उसमें कोई दोष नहीं था। फिर गरुड़ का वह प्रश्न आता है जिसका उत्तर एक गाय, एक मथानी और एक बत्ती के सहारे दिया जाता है।
इस प्रसंग की पहली बात एक सफ़ाई है, और सफ़ाई देनेवाला वही है जिसका नुकसान हुआ था। काकभुशुण्डि अभी बता चुके हैं कि उन्हें यह कौए का देह कैसे मिला। अगला प्रश्न होता कि शाप देनेवाले मुनि का ऐसा करना क्या ठीक था। भुशुण्डि पूछे जाने से पहले उत्तर दे देते हैं, और उत्तर में मुनि का बचाव करते हैं।
यह प्रसंग दो हिस्सों का है, और दोनों के बीच एक प्रश्न खड़ा है। पहले हिस्से में कथा अपने अन्त तक पहुँचती है: मुनि पछताते हैं, बुलाकर मन्त्र देते हैं, बालरूप का ध्यान बताते हैं, कुछ समय अपने पास रखकर रामचरितमानस सुनाते हैं। और अन्त में सिर पर हाथ रखकर वह वरदान देते हैं जिसके कारण भुशुण्डि आज उसी आश्रम में बैठे हैं। आकाश से एक गम्भीर वाणी उस वरदान पर मुहर लगाती है, और भुशुण्डि कह देते हैं कि गरुड़ के सब प्रश्नों का उत्तर हो गया।
पर उत्तर होते ही कथा के भीतर से एक नया प्रश्न खड़ा हो जाता है। गरुड़ ने सुना है कि मुनि ने ज्ञान का उपदेश दिया और सुननेवाले ने उसे भक्ति जितना आदर नहीं दिया। सो वे पूछते हैं कि ज्ञान और भक्ति में अन्तर कितना है। उत्तर घर के आँगन की तरह खुलता है: एक गाय, हरी घास, एक छोटा बछड़ा, दूध, जामन, मथानी, मक्खन, और अन्त में एक दिया और एक बत्ती। यह सब एक कौआ गरुड़ को सुना रहा है, और यह पूरी बातचीत शिव पार्वती को।
पछताते मुनि, पूछते गरुड़
- काकभुशुण्डि वह कौआ जो यह सारी कथा कह रहा है। उसे अपना यह देह इतना प्रिय है कि इच्छा से रूप बदल सकने पर भी वह इसे बदलता नहीं।
- गरुड़ जो सुनने आये थे और अब पूछने लगे हैं। कथा का दूसरा आधा उन्हीं के एक प्रश्न से खुलता है।
- मुनि वह ऋषि जिनके शाप से यह देह मिला और जिनके आशीर्वाद से यह वरदान। टीका उनका नाम लोमश बताती है।
- राम जो इस प्रसंग में सामने नहीं आते, पर जिन्हें भुशुण्डि शुरू में ही सब हृदयों का प्रेरक कहते हैं। उनकी भक्ति के पक्ष पर अड़े रहने से यह सारा प्रसंग शुरू हुआ था।
- शिव जो यह पूरी बातचीत पार्वती को सुना रहे हैं, और जिनकी कृपा से वह गुप्त रामचरितमानस पहले मुनि को मिला था।
- माया यहाँ एक पात्र की तरह आती है, नर्तकी कही जाती है, और भक्ति के सामने सकुचा जाती है।
पहली बात: ऋषि का कोई दोष नहीं
भुशुण्डि गरुड़ को पुकारकर बात शुरू करते हैं। जो कहा जाने वाला है वह अपेक्षा के उलटा है। जिसने शाप पाया, वह शाप देनेवाले को निर्दोष बता रहा है, और उदारता से नहीं, कारण देकर।
वे कहते हैं: “इसमें ऋषि का कुछ भी दोष नहीं है। सबके हृदय में प्रेरणा करनेवाले राम हैं। उन्होंने मुनि की बुद्धि को भोली करके मेरे प्रेम की परीक्षा ली।” पहले इनकार आता है, कारण बाद में: बात मुनि को बचाने से शुरू होती है, किसी सिद्धान्त से नहीं। और कारण में शब्द है हृदय का प्रेरक: जो हर हृदय के भीतर बैठकर प्रेरणा देता है, उसके रहते किसी एक हृदय पर उँगली रखना बनता ही नहीं।
फिर भुशुण्डि उस हाथ का नाम कृपासिंधु रखते हैं: जिसने मुनि की बुद्धि भुलावे में डाली, उसे क्रोधी नहीं, कृपा का समुद्र कहा गया। और जो किया गया उसे दण्ड नहीं, परीक्षा कहा गया। परीक्षा किसकी, यह भी टाला नहीं गया: ज्ञान की नहीं, तर्क की नहीं, प्रेम की।
आगे की बात इस बचाव को पूरा करती है। “मन, वचन और कर्म से जब राम ने मुझे अपना दास जान लिया, तब भगवान् ने मुनि की बुद्धि फिर पलट दी।” भुलाने और लौटाने, दोनों के लिये एक ही हाथ बताया गया है, और बीच का आदमी दोनों बार साधन भर रह जाता है।
और ऋषि ने जो देखा: “उन्होंने मेरा महान् पुरुषों का-सा स्वभाव देखा, और राम के चरणों में विशेष विश्वास देखा।” टीका इस महान् स्वभाव को धैर्य, अक्रोध और विनय बताती है। मुनि का मन किसी नयी दलील से नहीं, शाप पा चुकने के बाद के बरताव से बदलता है।
इसके बाद जो होता है वह जल्दी-जल्दी आ जाता है। पहले बहुत विस्मय, फिर बार-बार पछतावा, फिर आदर के साथ बुलावा, फिर अनेक प्रकार से सन्तोष, और तब जाकर, हर्षित होकर, राममन्त्र। देना आख़िर में है। उससे पहले चार काम हैं, और चारों मुनि अपने ऊपर करते हैं।
और जो दिया जाता है वह पात्र के हिसाब से है। मुनि ने उन्हें बालरूप राम का ध्यान बताया, जो अभी-अभी पक्षी बनाये गये के हाथ में भारी साधना नहीं, एक बच्चे का रूप है। भुशुण्डि कहते हैं कि वह ध्यान उन्हें सुन्दर, सुखद और बहुत प्यारा लगा, और वह वे गरुड़ को पहले सुना चुके हैं।
गुप्त सर, और उसे सुनाने की एक शर्त
अब मुनि वह करते हैं जो पछतावे से बड़ी चीज़ है: उसे जाने नहीं देते। भुशुण्डि कहते हैं: “मुनि ने कुछ समय मुझे वहाँ रखा, और तब रामचरितमानस कहा, आदर के साथ यह कथा मुझे सुनायी।” यही ग्रन्थ, अपने ही भीतर, एक हाथ से दूसरे हाथ में जा रहा है। जिस हाथ में जा रहा है वह कुछ दिन पहले तक शाप का पात्र था।
कथा सुनाकर मुनि फिर सुन्दर वाणी में बोले: “हे तात, यह सुन्दर और गुप्त रामचरित रूपी सर मैंने शिव की कृपा से पाया था।” सर, सरोवर, और गुप्त: छिपा हुआ, पर किसी तिजोरी में नहीं। सरोवर होता किसी के पीने के लिये ही है, और कौन पिये, यह मुनि की अगली बात तय कर देती है।
दूसरी बात सुनाने का कारण है: “आपको राम का निज भक्त जाना, इसी से मैंने सब विस्तार के साथ कहा।” पात्रता की कोई और कसौटी नहीं, न शास्त्र का अभ्यास, न जन्म, न आश्रम। एक ही बात देखी गयी, कि यह किसका है।
और इसके तुरन्त बाद वही कसौटी उलटी दिशा में, एक मनाही की शक्ल में, रख दी जाती है।
मुनि कहते हैं: “हे तात, जिनके हृदय में राम की भक्ति नहीं है, उनके सामने इसे कभी नहीं कहना चाहिये।” जिस कारण से यह कथा एक को सुनायी गयी, उसके न होने पर दूसरे को नहीं सुनायी जायेगी। मनाही इसलिये नहीं कि बात कठिन है, इसलिये कि उस चीज़ के बिना यह कथा केवल शब्द रह जायेगी।
मुनि ने बहुत प्रकार से समझाया और भुशुण्डि ने प्रेम के साथ उनके चरणों में सिर नवाया। फिर वह क्षण आता है जिसमें इस प्रसंग की बड़ी पलटी दिखती है। भुशुण्डि कहते हैं: “मुनीश्वर ने अपने करकमलों से मेरा सिर स्पर्श किया।” जिस मुँह से शाप निकला था उसी से आशीर्वाद निकल रहा है, और सिर पर रखा हाथ उसी का है। भुशुण्डि इस पर एक शब्द टिप्पणी नहीं करते।
आशीर्वाद की भाषा भी देखने लायक है। मुनि कहते हैं: “अब मेरी कृपा से आपके हृदय में सदा अविरल रामभक्ति बसेगी।” मुनि अपने ही प्रसाद की बात कर रहे हैं, उसी की जो कुछ दिन पहले क्रोध बनकर गिरा था। और जो माँगा नहीं गया था वही दिया जा रहा है, क्योंकि भक्ति के लिये तो यह आदमी पहले ही अड़ चुका था।
वह वरदान, और आकाश से एक शब्द
अब वह वरदान आता है जिसके लिये यह सारा प्रसंग बना है, दो हिस्सों में। पहले हिस्से में वरदान उस आदमी पर उतरता है, दूसरे में उस ज़मीन पर जिस पर वह बैठेगा।
मुनि कहते हैं: “आप सदा राम के प्रिय हों, कल्याणरूप गुणों के धाम, मानरहित, इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले, इच्छा से मृत्यु पानेवाले, और ज्ञान तथा वैराग्य के भण्डार हों।” इनमें एक चीज़ बाक़ी सबसे अलग खड़ी है, मान से रहित होना: बाक़ी सब देने की चीज़ें हैं और यह एक हटाने की। और वह बीच में रखी गयी है। उन्हें इच्छा से रूप बदलने और इच्छा से मरने की शक्ति दी जा रही है। उनके भीतर से पहले वह चीज़ निकाल ली जाती है जो ऐसी शक्ति पाकर पहले फूलती है।
फिर वरदान देह से निकलकर जगह पर फैल जाता है: “भगवान् का स्मरण करते हुए आप जिस आश्रम में बसेंगे, वहाँ एक योजन तक अविद्या नहीं व्यापेगी।” टीका जोड़ती है कि योजन चार कोस का होता है। उसके भीतर आनेवाले पेड़, पक्षी, रास्ते और लोग बिना कुछ किये उसकी छाया में आ गये। पर शर्त एक शब्द में है, स्मरण: घेरा तब तक है जब तक भीतर बैठा आदमी स्मरण कर रहा है।
आगे मुनि और भी कहते हैं: “काल, कर्म, गुण, दोष और स्वभाव से उत्पन्न कोई भी दुःख आपको कभी नहीं व्यापेगा। राम के अनेक सुन्दर रहस्य, जो इतिहास और पुराणों में कहीं छिपे हैं और कहीं खुले, वे सब आप बिना परिश्रम जान लेंगे। जो इच्छा आप मन में करेंगे, भगवान् की कृपा से कुछ भी दुर्लभ नहीं रहेगा।”
इन्हीं वाक्यों के बीच एक वाक्य अलग बना है: “राम के चरणों में आपका नित नया प्रेम हो।” बाक़ी सब कथन हैं, यह प्रार्थना है। जो चीज़ें मुनि दे सकते थे, वे उन्होंने दे दीं। जो किसी के देने की नहीं है, उसके लिये माँग रख दी, बीचोंबीच, बिना कुछ कहे।
और तभी ऊपर से बात में कोई और शामिल हो जाता है।
मुनि का आशीर्वाद सुनकर आकाश में गम्भीर ब्रह्मवाणी हुई: “हे ज्ञानी मुनि, आपका वचन ऐसा ही हो। यह कर्म, मन और वाणी से मेरा भक्त है।” आकाश से कोई नयी सूची नहीं उतरती। वरदान मुनि का है, और ऊपर से केवल “ऐसा ही हो” आता है, और साथ में एक बात जो देने की नहीं, अपनाने की है: “मेरा भक्त”।
वह वाणी अपना नाम नहीं बताती। कथा उसे ब्रह्मवाणी कहती है, और बोलनेवाला अपना परिचय नाम से नहीं, सम्बन्ध से देता है: मेरा।
भुशुण्डि कहते हैं: “आकाशवाणी सुनकर मुझे बड़ा हर्ष हुआ। मैं प्रेम में मग्न हो गया और मेरा सब सन्देह जाता रहा।” वरदान की इतनी लम्बी सूची से जो काम नहीं हुआ था, वह दो शब्दों से हो गया: सन्देह मिटाने के लिये गिनती नहीं, पहचान चाहिये थी। फिर मुनि से विनती करके, आज्ञा पाकर, और उनके चरणों में बार-बार सिर नवाकर वे चल दिये।
सत्ताईस कल्प, और हर बार वही आँगन
अब कथा वहाँ पहुँच जाती है जहाँ सुननेवाले बैठे हैं। भुशुण्डि कहते हैं: “मैं हर्ष के साथ इसी आश्रम में आया, और राम की कृपा से दुर्लभ वर पा लिया।” और उसके तुरन्त बाद वह गिनती आती है जिससे इस कथा का पैमाना बदल जाता है।
“हे गरुड़, सुनिये, मुझे यहाँ रहते सात और बीस कल्प बीत गये।” संख्या जोड़कर नहीं, तोड़कर कही गयी है, सात और बीस, जैसे गिनते हुए कही जा रही हो।
इतने समय वे करते क्या हैं, यह वे आगे बताते हैं। “मैं यहाँ सदा राम के गुणों का गान करता हूँ, और चतुर पक्षी उसे आदर के साथ सुनते हैं।” जिसे पक्षी बना दिया गया था, उसने पक्षियों की ही सभा बना ली। जो देह शाप से मिला था, वही उसे उसके श्रोता दे गया।
पर वे वहीं बँधे नहीं रहते। अयोध्या में जब-जब राम भक्तों के लिये मनुष्य-शरीर धारण करते हैं, तब-तब वे जाते हैं। “जब-जब” और “तब-तब” के बीच ही यात्रा का सारा ब्योरा है: न कोई बुलावा, न कोई सूचना। अवतार होता है, और यह पक्षी उड़ जाता है।
“तब-तब मैं जाकर राम की नगरी में रहता हूँ और उनकी शिशुलीला देखकर सुख पाता हूँ। फिर, हे गरुड़, राम के शिशुरूप को हृदय में रखकर अपने आश्रम लौट आता हूँ।” वे पूरी लीला देखने नहीं रुकते: धनुष, वन, सेतु, युद्ध, राज्य, इनमें से किसी का नाम यहाँ नहीं। वे केवल बचपन देखने जाते हैं, और उतना देखकर लौट आते हैं।
यह बात उस ध्यान से जा मिलती है जो मुनि ने दिया था, बालरूप का। वही देखने वे हर बार अयोध्या जाते हैं, और लौटते समय कोई कथा नहीं, एक रूप साथ लाते हैं। हर बार वही आँगन और वही बालक।
फिर भुशुण्डि अपनी बात बाँध देते हैं: “जिस कारण से मैंने कौए का देह पाया, वह सारी कथा मैंने आपको सुना दी। हे तात, मैंने आपके सब प्रश्नों के उत्तर कह दिये।” और इसके बाद एक वाक्य जोड़ते हैं, जो उत्तर का हिस्सा नहीं, उद्गार है: “रामभक्ति की महिमा बड़ी भारी है।”
इसीलिये यह देह प्रिय है
और तब वह बात आती है जिसमें इस कथा का निचोड़ है, और जिसमें भुशुण्डि वह कहते हैं जो शाप पाया हुआ कोई सामान्यतः नहीं कहता।
भुशुण्डि कहते हैं: “इसीलिये यह शरीर मुझे प्रिय हो गया, कि इसमें मुझे राम के चरणों का प्रेम मिला। इसी से मैंने अपने प्रभु के दर्शन पाये और मेरे सब सन्देह जाते रहे।” कारण गिनाते समय उन्होंने वरदान का नाम नहीं लिया, न इच्छामृत्यु, न रूप बदलने की शक्ति, न वह घेरा जिसमें अविद्या नहीं घुसती। दो चीज़ें गिनायीं, प्रेम और दर्शन, और दोनों के साथ एक छोटा शब्द, अपना: अपने प्रभु।
सन्देह वहाँ भी गये थे, आकाशवाणी सुनते ही, और यहाँ भी वही कहा जा रहा है। जिसका सन्देह दो बार मिट चुका हो, उसके लिये देह का सुन्दर या कुरूप होना छोटी बात रह जाती है।
और फिर वह बात, जिसमें वे अपने ही ऊपर एक शब्द चलाते हैं और उसे हटाते नहीं।
“मैं हठ करके भक्ति के पक्ष पर अड़ा रहा, और महर्षि ने शाप दिया। पर मुनियों को भी दुर्लभ वर मैंने पाया। भजन का प्रताप देखिये!” अपने लिये कोई नरमी नहीं: वे न यह कहते हैं कि उनके साथ अन्याय हुआ, न यह कि वे सही थे और मुनि ग़लत। तीन बातें एक साँस में हैं, अपना हठ, मुनि का शाप, और अपना वर। बीच की कड़ी पर कोई फ़ैसला नहीं सुनाया जाता।
और अन्तिम शब्द सुननेवाले के हाथ में सौंप दिया जाता है, “देखिये”: इस कथा का निष्कर्ष वे ख़ुद नहीं निकालते, उसकी ओर उँगली उठाकर चुप हो जाते हैं। और उँगली उनके धैर्य या भाग्य की ओर नहीं, भजन की ओर है।
इसके बाद दो उपमाएँ आती हैं, उनके लिये जो यह सब जानकर भी दूसरा रास्ता पकड़ते हैं। पहली घर के भीतर की है।
जो भक्ति की ऐसी महिमा जानकर भी उसे छोड़ देते हैं और केवल ज्ञान के लिये श्रम करते हैं। वे मूर्ख घर पर खड़ी कामधेनु को छोड़कर दूध के लिये आक ढूँढ़ते फिरते हैं। टीका आक को मदार बताती है। उपमा की मार दो जगह है: गाय घर में खड़ी है, कहीं से लानी नहीं पड़ी। और खोजनेवाला आलसी नहीं, खोजता फिर रहा है, यानी मेहनत पूरी है और दिशा उलटी।
दूसरी उपमा घर के बाहर, और बड़ी है। जो राम की भक्ति छोड़कर दूसरे उपायों से सुख चाहते हैं, वे बिना जहाज़ के तैरकर महासमुद्र के पार जाना चाहते हैं। तैरना आता हो तब भी समुद्र समुद्र ही रहता है। जो चाहिये वह हाथ-पाँव नहीं, नाव है।
गरुड़ का प्रश्न, और उसका स्वागत
यहाँ कथा याद दिलाती है कि यह सब कौन सुना रहा है। शिव कहते हैं: “पार्वती, भुशुण्डि के वचन सुनकर गरुड़ हर्षित होकर कोमल वाणी से बोले।” शिव पार्वती से कह रहे हैं, गरुड़ भुशुण्डि से। भुशुण्डि को यह कथा उस मुनि से मिली थी जिसे वह शिव की कृपा से मिली थी।
गरुड़ पहले हिसाब चुकाते हैं: “हे प्रभो, आपके प्रसाद से मेरे हृदय में अब सन्देह, शोक, मोह और भ्रम कुछ भी नहीं रह गया। मैंने राम के पवित्र गुणसमूह सुने और आपकी कृपा से विश्राम पाया।” चारों का जाना गिनकर बताया गया है। और तभी, विश्राम पा चुकने के बाद, वे कहते हैं कि एक बात और पूछनी है।
जो पूछा जाता है वह किसी पोथी से नहीं, इसी कथा से निकला है: “संत, मुनि, वेद और पुराण कहते हैं कि ज्ञान के समान दुर्लभ कुछ भी नहीं। वही ज्ञान मुनि ने आपसे कहा, पर आपने भक्ति की तरह उसका आदर नहीं किया।” गरुड़ ने कथा इतने ध्यान से सुनी है कि उसके भीतर की एक असंगति उन्हें खटक गयी, और वे उसे छिपाते नहीं।
“ज्ञान और भक्ति में कितना अन्तर है, यह सब मुझसे कहिये।” और अगली ही बात उत्तर देनेवाले की मुद्रा बता देती है, जो इस प्रश्न को बदल देती है। गरुड़ के वचन सुनकर सुजान काकभुशुण्डि ने सुख माना और आदर के साथ कहा। जिस पर उँगली उठायी गयी थी, वह नाराज़ नहीं हुआ, प्रसन्न हुआ।
और पहला उत्तर वह है जिसकी उम्मीद पूछनेवाले को भी नहीं रही होगी: “भक्ति और ज्ञान में कुछ भी भेद नहीं है। दोनों ही संसार से उत्पन्न क्लेशों को हर लेते हैं।” जिस पर एक पक्ष लेने का आरोप था, उसने पहले वाक्य में दोनों को बराबर कह दिया। और बराबरी का आधार भी बता दिया, कि दोनों वही काम करते हैं।
उसके बाद वह शर्त आती है जिसके सहारे बाक़ी उपदेश खड़ा है: “हे नाथ, मुनीश्वर इनमें कुछ अन्तर बतलाते हैं। हे पक्षिश्रेष्ठ, उसे सावधान होकर सुनिये।” आगे जो कहा जायेगा वह अपनी ओर से नहीं, मुनियों के मत के रूप में कहा जा रहा है। सुननेवाले से सावधानी माँगी जा रही है। सावधानी वहीं माँगी जाती है जहाँ बात ग़लत सुनी जा सकती है।
जिसे बलवान् कहा गया, वही विवश हो जाता है
मुनियों का बताया अन्तर एक उपमा के सहारे रखा जाता है, जो दो कोटियों में बाँटकर चलती है। भुशुण्डि कहते हैं कि ज्ञान, वैराग्य, योग और विज्ञान, ये सब पुरुष हैं, और पुरुष का प्रताप सब प्रकार से प्रबल होता है। उनके अनुसार दूसरी ओर अबला है, जिसे टीका माया बताती है, जो स्वभाव से ही निर्बल और जाति से ही जड़ है। यहाँ तक बात सीधी चलती है, और लगता है कि आगे बलवान् की जीत होगी।
अगली बात उसी दिशा में एक क़दम और बढ़ती है: जो विरक्त और धीरबुद्धि पुरुष हैं, वही स्त्री को त्याग सकते हैं। वे कामी नहीं जो विषयों के वश में हैं और राम के चरणों से विमुख हैं। कसौटी और ऊँची हो जाती है, और उस पर खरा वही उतरता है जिसके पास विराग भी हो और धीरज भी।
और ठीक इसके बाद, बिना किसी भूमिका के, वह बात आती है जिसमें बनायी हुई सारी सीढ़ी एक साथ भरभरा जाती है।
वे ज्ञान के भण्डार मुनि भी मृगनयनी के चन्द्रमुख को देखकर विवश हो जाते हैं। हे गरुड़, स्त्री साक्षात् विष्णु की माया है, जो प्रकट होकर सामने आयी है। पहला ही शब्द, वे: वही मुनि जिसे अभी प्रबल कहा गया था। जिसे जिताने के लिये मैदान तैयार किया गया था, उसी को तुरन्त गिरा दिया जाता है।
और गिराने के लिये कोई युद्ध नहीं: एक मुख है, उसे देखा जाता है, और देखने भर से विवशता आ जाती है। क्रिया एक ही है, देखना। न कोई बातचीत, न कोई प्रलोभन। पूरा तर्क एक नज़र में तय हो जाता है।
यहाँ भुशुण्डि रुककर अपने ऊपर लगा शक हटाते हैं: “मैं यहाँ कुछ पक्षपात नहीं रखता। वेद, पुराण और संतों का मत ही कहता हूँ।” थोड़ी देर पहले उन्होंने अपने लिये पक्ष शब्द बरता था, कि वे भक्ति के पक्ष पर हठ करके अड़े रहे। अब कहते हैं कि इस विवेचन में पक्षपात नहीं है। पक्ष अपनी जगह है, पर नाप करते समय अंगुल किसी के लिये छोटा-बड़ा नहीं किया जा रहा।
और तब वह वाक्य आता है जो पूरे उपदेश की कील है, और जिसे भुशुण्डि अनुपम रीति कहते हैं: एक स्त्री के रूप पर दूसरी स्त्री मोहित नहीं होती। यहाँ तक की सारी बात इसी एक वाक्य के लिये थी, और अगली ही बात में इसका उपयोग हो जाता है।
माया नर्तकी है, और भक्ति घर की
अब वह चाल चली जाती है जिसके लिये पिछली सारी बात बिछायी गयी थी।
भुशुण्डि कहते हैं: “सुनिये, माया और भक्ति, ये दोनों ही स्त्रीवर्ग की हैं, यह सब कोई जानते हैं। फिर राम को भक्ति प्यारी है, और माया बेचारी तो निश्चय ही नर्तकी है।” दोनों को एक ही कोटि में रखकर अभी बनाया हुआ नियम उन पर चला दिया जाता है। यदि स्त्री के रूप पर स्त्री मोहित नहीं होती, तो जिस माया के सामने ज्ञान का भण्डार विवश हो गया था, वह भक्ति के सामने कुछ नहीं कर सकती।
और अन्तर दो शब्दों में तय हो जाता है, कौन किसे प्यारी है: भक्ति के लिये शब्द है प्यारी, और माया के लिये नर्तकी। नाचनेवाली तब तक नाचती है जब तक देखनेवाला है। जिस घर में उसका नाच नहीं देखा जाता, वहाँ उसका कोई काम नहीं। टीका माया को नटिनीमात्र कहती है।
आगे यह बात पूरी होती है: राम भक्ति के अनुकूल रहते हैं, इसीसे माया उससे अत्यन्त डरती है। जिसके हृदय में उपमारहित और उपाधिरहित रामभक्ति बिना रोक-टोक बसती है, उसे देखकर माया सकुचा जाती है। वह अपनी प्रभुता उस पर कुछ भी नहीं चला सकती।
शब्द लड़ाई का नहीं है, सकुचाना: माया हारती नहीं, संकोच में पड़ जाती है। जिस चीज़ ने सारे संसार को बाँध रखा है, वह एक हृदय के सामने सिकुड़ जाती है, और वह हृदय किसी योद्धा का नहीं है।
और तब वह निष्कर्ष आता है जो पूरे तर्क को उलट देता है। ऐसा विचारकर जो विज्ञानी मुनि हैं, वे भी सब सुखों की खान भक्ति की ही याचना करते हैं। बात वहीं से शुरू हुई थी कि ज्ञान, वैराग्य, योग और विज्ञान प्रबल हैं। यहाँ आकर रुकती है कि वही विज्ञानी माँगने चले आते हैं। जिसे उपमा में बलवान् कहा गया था, वह अन्त में याचक है, और उसी के दरवाज़े पर जिसे निर्बल कहा गया था।
भुशुण्डि इस बात पर ताला लगा देते हैं: राम का यह रहस्य जल्दी कोई नहीं जान पाता। और जो उनकी कृपा से जान जाता है, उसे स्वप्न में भी मोह नहीं होता। और साथ ही अगला हिस्सा खोल देते हैं: “ज्ञान और भक्ति का और भी भेद सुनिये, जिसे सुनकर राम के चरणों में सदा अविच्छिन्न प्रेम हो जाता है।”
वह गाँठ जो झूठी है और फिर भी नहीं छूटती
दूसरा भेद बताने से पहले भुशुण्डि एक चेतावनी देते हैं, जो अपने ही कहने के विरुद्ध है: “हे तात, यह अकथ कहानी सुनिये। यह समझते ही बनती है, कही नहीं जा सकती।” पहले कहा कि यह कही नहीं जा सकती, और फिर कहते हैं। यानी आगे के शब्द पूरी चीज़ नहीं, उसकी ओर इशारा होंगे।
जीव ईश्वर का अंश है, इसलिये अविनाशी है, चेतन है, निर्मल है, और स्वभाव से ही सुख की राशि है। चारों विशेषण सकारात्मक हैं। बन्धन की बात अभी आयी ही नहीं। जो आगे बिगड़ेगा, उससे पहले बता दिया गया कि मूल में कुछ बिगड़ा हुआ नहीं था। और जो सुख वह ढूँढ़ रहा है वह बाहर से आनेवाली चीज़ नहीं, उसकी अपनी राशि है।
और अगली ही बात में गिरावट आती है, दो चित्रों के सहारे: वह माया के वश होकर तोते और वानर की तरह बँध गया। जड़ और चेतन में गाँठ पड़ गयी, और यद्यपि वह गाँठ झूठी है, फिर भी उसके छूटने में कठिनाई है।
तोते और वानर की कथाएँ यहाँ सुनायी नहीं जातीं, न मानस में, न टीका में। दोनों नाम लेकर छोड़ दिये जाते हैं। टीका जो एक बात जोड़ती है वह भारी है, कि वह अपने आप ही बँध गया: बाँधनेवाला कोई बाहर से नहीं आया।
गाँठ जड़ और चेतन को जोड़ती है, जैसे रस्सी के दो सिरे आपस में लिपट जायें। और वह झूठी है, और छूटती फिर भी नहीं। झूठी चीज़ को काटने का औज़ार नहीं बना, क्योंकि जिसे काटा जा सके वह तो सच्ची होती।
आगे यह असमर्थता गिनकर बतायी जाती है: तभी से जीव संसारी हो गया। न गाँठ छूटती है, न वह सुखी होता है। वेदों और पुराणों ने बहुत-से उपाय बताये, पर वह छूटती नहीं, उलटे अधिक से अधिक उलझती जाती है। उपाय बेकार नहीं, उलझानेवाले बताये गये, और बतानेवालों के नाम भी ले लिये गये, श्रुति और पुराण।
फिर कारण, रोशनी की भाषा में: जीव के हृदय में अज्ञान का अन्धकार विशेष रूप से छाया है, इससे गाँठ दिखायी ही नहीं देती, छूटे तो कैसे? समस्या खोलने की नहीं, देखने की है। और अन्त में बात सँभलकर कही जाती है: जब ईश्वर ऐसा संयोग उपस्थित कर देते हैं, तब भी कदाचित् ही वह छूट पाती है। ईश्वर के हाथ लगाने के बाद भी कदाचित् शब्द नहीं हटाया जाता।
एक गाय, एक मथानी, और एक बत्ती
अब उत्तर घर के आँगन में उतर आता है, और यहाँ से देर तक एक ही चित्र चलता है। ज्ञान और भक्ति के अन्तर के प्रश्न का उत्तर एक गाय से शुरू होता है।
सात्त्विक श्रद्धा सुन्दर गाय है, यदि भगवान् की कृपा से वह हृदय में आकर बस जाये। पूरी लम्बी विधि इसी एक शर्त पर टिकी है: गाय पाली नहीं जाती, कमायी नहीं जाती, आकर बसती है, और लानेवाली कृपा है। आगे जो कुछ किया जाना है, वह इस गाय के होने पर ही होगा।
फिर चारा: असंख्य जप, तप, व्रत, यम और नियम, और वे सब शुभ धर्म तथा आचार जिन्हें श्रुतियों ने कहा है, वही हरी घास है जिसे गाय चरती है। एक उपमा में पूरी साधना को उसकी जगह मिल जाती है। घास ज़रूरी है, घास के बिना दूध नहीं, पर घास दूध नहीं है, और घास पी नहीं जाती।
फिर वह बात जो इस चित्र की धुरी है: भाव रूपी छोटा बछड़ा पाकर गाय पेन्हाती है, दूध उतारती है। गाय चर ले तो भी दूध अपने आप नहीं आता। उसके लिये बछड़ा चाहिये, और भुशुण्डि उसके साथ “छोटा” शब्द भी लगाते हैं। जब तक भीतर कोई छोटी, कोमल चीज़ न आ जाये, तब तक सारा जप-तप घास ही रह जाता है।
फिर दुहने का सामान, किसी मन्दिर का नहीं, गोशाला का: नोई निवृत्ति है, वह रस्सी जिससे दुहते समय गाय के पिछले पैर बाँधे जाते हैं। बरतन विश्वास है। और दुहनेवाला अहीर वह निर्मल मन है जो अपने वश में है। जिस मन को बाक़ी सब जगह मालिक बनकर बैठने की आदत है, वह यहाँ नौकर की जगह पर है, और तभी दूध निकाल सकता है।
परम धर्ममय दूध दुहकर उसे निष्काम भाव रूपी अग्नि पर भली भाँति औटाया जाये। फिर सन्तोष रूपी हवा से, क्षमा के साथ, ठंडा किया जाये। और धैर्य तथा शम का जामन देकर जमाया जाये। हर क़दम रसोई का है, और हर क़दम की अपनी शर्त: आँच तेज़ नहीं, निष्काम। ठंडा करनेवाली चीज़ हवा, जो छूती नहीं, बस बहती है। और जमाने के लिये थोड़ा-सा जामन, जो ख़ुद पहले से जमा हुआ हो।
फिर मथना: मुदिता रूपी बरतन में तत्त्वविचार की मथानी से, दम के सहारे, सत्य और सुन्दर वाणी की रस्सी लगाकर मथा जाये। और तब उसमें से निर्मल, सुन्दर और अत्यन्त पवित्र वैराग्य रूपी मक्खन निकाल लिया जाये। वैराग्य मक्खन है, अन्त नहीं: जिसे बहुत लोग मंज़िल समझते हैं, वह यहाँ बीच का माल है, और उसे अभी एक बार और आग पर चढ़ना है।
और अब वह बात, जिसमें दूसरी आग जलती है और उत्तर अपने असली शब्द तक पहुँचता है।
योग रूपी अग्नि प्रकट करके उसमें शुभ और अशुभ, दोनों प्रकार के कर्मों का ईंधन लगा दिया जाये। ईंधन में पुण्य भी है। जब ममता रूपी मैल जल जाये, तब जो बचता है वह ज्ञान रूपी घी है, और उसे बुद्धि से ठंडा किया जाता है। यहाँ प्रश्न का उत्तर मिल जाता है। ज्ञान घी है, और घी वही मक्खन है जिसे दुबारा आग पर चढ़ाया गया और जिसमें से एक चीज़ जल गयी।
फिर वह घी काम पर लगता है। विज्ञानरूपिणी बुद्धि उस निर्मल घी को पाकर चित्त रूपी दिये को भरती है, और समता की दीवट बनाकर उसे दृढ़ता से उस पर रखती है। दीवट का काम केवल दिये को हिलने न देना है, और उसका नाम यहाँ समता है।
और तीसरे हिस्से में बत्ती बनती है: तीनों अवस्थाओं और तीनों गुणों रूपी कपास में से तुरीय रूपी रूई निकालकर, उसे सँवारकर, एक कड़ी बत्ती बनायी जाये। कपास से रूई निकालना, फिर उसे बटकर कड़ी बत्ती बनाना, दिये की तैयारी का धीमा, हाथ का काम है। और इसी पर यह प्रसंग ख़त्म होता है।
यानी इस प्रसंग के अन्त में दिया भरा रखा है, दीवट पक्की है, बत्ती बट चुकी है, और आग कहीं नहीं। जलाना आगे आयेगा। पूरे उत्तर में कोई मन्त्र, तीर्थ या आसन नहीं आया, और यह सब उस प्रश्न का उत्तर है कि ज्ञान और भक्ति में अन्तर कितना है।
पक्ष और पक्षपात
दो बड़ी बातें यहाँ एक ही मुँह से निकली हैं: जिसने शाप दिया उसका कोई दोष नहीं था। और जिन दो रास्तों के नाम लेकर लोग लड़ते हैं, उनमें कोई भेद नहीं। जो अपने साथ हुए को किसी के खाते में नहीं डालता, वही दो रास्तों के बीच खड़ा होकर किसी को नीचा नहीं दिखाता।
और फिर भी उन्होंने एक पक्ष लिया था और उसे छिपाते नहीं। पर नाप के समय अपने पक्ष को तराज़ू पर नहीं रखते। पक्ष और पक्षपात, दोनों शब्द कुछ ही देर के अन्तर पर हैं, और उनके बीच का फ़र्क़ भुशुण्डि का अपना बरताव दिखा देता है।
तीसरी बात: भुशुण्डि को इच्छा से रूप बदलने का वरदान मिला हुआ है। चाहें तो कुछ भी बन सकते हैं, और सत्ताईस कल्पों से यह चुनाव उनके सामने रोज़ रखा है। फिर भी वे कौआ ही बने बैठे हैं, और कहते हैं कि यह देह उन्हें प्रिय है। कारण में वरदान का नाम नहीं: इसी देह में चरणों का प्रेम मिला, और इसी से राम को देखा। इतना कहकर वे आगे बढ़ जाते हैं।
यह हिस्सा शान्त है, क्योंकि यहाँ कोई किसी से कुछ छीन नहीं रहा: मुनि पछताते हैं और देते हैं। आकाश केवल सहमति देता है। गरुड़ पूछते हैं और डाँट नहीं पड़ती। कहनेवाला सुख मानता है। और दो रास्तों का झगड़ा पहले ही वाक्य में उठा दिया जाता है।
और अन्त वहाँ होता है जहाँ कुछ भी पूरा नहीं हुआ: एक भरा हुआ दिया अपनी दीवट पर, और पास में अभी बटी हुई एक बत्ती। आगे जो होगा वह रोशनी का काम है। रोशनी से पहले हर घर में यही दिखता है: तेल भरा दिया, और उसके पास रखी एक सूखी बत्ती।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, उत्तरकाण्ड, दोहा 113 से 117 (ग), और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।