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रामचरितमानसउत्तरकाण्डप्रसंग 13
माया की सेना और आँगन की जूठन
एक कौआ पक्षियों के राजा से कहता है कि आपको मोह नहीं हुआ था। फिर वह गिनाने लगता है कि मोह किसे नहीं हुआ। बीच में माया की पूरी सेना खड़ी होती है, उसके ऊपर वह ब्रह्म जिसकी भौंह पर वह नाचती है। और अन्त में वही कौआ अयोध्या के आँगन में गिरी हुई जूठन उठाकर खाता है।
नील पर्वत की यह बातचीत एक भरी हुई आँख से फिर शुरू होती है। पिछले प्रसंग के अन्त में गरुड़ की विनय भरी वाणी सुनकर काकभुशुण्डि का शरीर पुलकित हो गया था और उनके नेत्रों में जल भर आया था। उसी जल के साथ वे फिर बोलते हैं, और जो कहते हैं वह इस पूरे प्रसंग में चलता है। उसमें एक भी घटना नहीं है: कोई कहीं जाता नहीं, कोई युद्ध नहीं, कोई सभा नहीं। एक पहाड़ पर दो पक्षी बैठे हैं, एक कह रहा है और एक सुन रहा है।
भुशुण्डि का यह कहना तीन बार नीचे उतरता है: नारद, शिव और ब्रह्मा के नाम से उन प्रश्नों तक, जिनका उत्तर हर सुननेवाले को अपने भीतर देना पड़ता है। ब्रह्म के बारह विशेषणों से एक राजा के शरीर और एक नट के वेष तक। और उसी नट से अयोध्या के एक आँगन तक, जहाँ एक छोटा कौआ बच्चों के पीछे उड़ता है और गिरी हुई जूठन उठाकर खा लेता है। हर उतार में बात छोटी नहीं होती, हाथ के पास आती जाती है।
यह तुलसीदास का रामचरितमानस है। काकभुशुण्डि और गरुड़ का यह संवाद मानस का अपना है। जो माया की सेना, जो नट की उपमा, जो फोड़ा चीरनेवाली माँ यहाँ आती है, वह सब इसी संवाद की है। इस प्रसंग में गरुड़ के मुँह से एक भी वाक्य नहीं निकलता। वे केवल सुनते हैं, और उन्हें बार-बार नाम लेकर पुकारा जाता है, कभी खगेश, कभी खगराज, कभी उरगारि, कभी विहंग। यही पुकार इस पूरे विचार को ज़मीन से बाँधे रखती है।
बोलता कौआ, चुप गरुड़
- काकभुशुण्डि कौए के शरीर वाले वे भक्त जो इस पूरी बातचीत में अकेले बोलते हैं। पहले नियम कहते हैं, फिर अपनी कथा शुरू करते हैं, और कथा की पहली बात यह है कि वे अयोध्या के आँगन में जूठन खाते थे।
- गरुड़ पक्षियों के राजा, जो यहाँ सुननेवाले हैं और एक शब्द भी नहीं बोलते। कहनेवाला उन्हें पूज्य कहता है, फिर तात कहता है, और उनके मोह को मोह मानने से ही मना कर देता है।
- राम पहले सच्चिदानन्दघन, निर्गुण, निराकार ब्रह्म के रूप में गिनाये जाते हैं, फिर राजा के शरीर में नट की तरह। और अन्त में अयोध्या के आँगन में खेलते हुए बालक के रूप में।
- माया जिसका परिवार और जिसकी सेना संसार भर में छायी है, जिससे शिव और ब्रह्मा भी डरते हैं। वह फिर भी एक भौंह के इशारे पर नटी की तरह नाचती है।
- तुलसीदास जिनका नाम इस प्रसंग में एक बार आता है, ठीक उस उपमा के बाद जहाँ माँ बच्चे का फोड़ा चीरती है।
पहले शिष्टाचार, फिर बड़ाई का उलटा हिसाब
कौआ फिर बोलता है। बोलने से पहले कथा एक बात दर्ज करती है जो इस पूरे संवाद का सुर तय करती है: गरुड़ पर उनका प्रेम थोड़ा नहीं था। आगे जो कहा जाने वाला है वह कठोर है: मोह किसे नहीं हुआ, कौन माया से नहीं डरता, कौन तम के कुएँ में नहीं पड़ा। यह सब सुननेवाले को चुभ सकता था, इसलिये कहने से पहले बता दिया गया है कि कहनेवाले के भीतर क्या है। प्रेम पहले है, कठोर बात बाद में।
भुशुण्डि का पहला वाक्य अपने सुननेवाले को ऊपर बिठाता है: “हे नाथ, आप सब प्रकार से मेरे पूज्य हैं, और राम के कृपापात्र हैं।” सुननेवाला कोई शिष्य नहीं जिसे पाठ पढ़ाया जा रहा हो। यह शिष्टाचार है, पर केवल शिष्टाचार नहीं, क्योंकि अगले ही वाक्य में यह विनय एक दावा बन जाती है।
भुशुण्डि कहते हैं: “आपको न संदेह है, न मोह, न माया। हे नाथ, आपने तो मुझ पर दया की है। राम ने मोह के बहाने आपको यहाँ भेजकर मुझे बड़ाई दी है।” सारी बात एक शब्द पर टिकी है, बहाना। गरुड़ अपना मोह लेकर आये थे। भुशुण्डि पहले वाक्य में ही वह मोह उनसे छीन लेते हैं: जो चीज़ गरुड़ को इस पहाड़ तक लायी, वह उनकी दृष्टि में मोह नहीं, एक युक्ति है। किसी छोटे को बड़ा करना हो तो बड़े को उसके द्वार तक भेजना पड़ता है, और राम ने यही किया। लाभ किसे हुआ, यह भी उलट गया है: सुननेवाला यहाँ कुछ पाने नहीं, कहनेवाले को कुछ दिलाने आया है।
इतनी विनय के बाद भुशुण्डि प्रश्न से कतराते नहीं। अगली ही साँस में वे उस मोह को उठाते हैं: “आपने अपना मोह कहा, सो इसमें कुछ आश्चर्य नहीं।” और आश्चर्य क्यों नहीं, इसका उत्तर वे तर्क से नहीं, नामों से देते हैं: नारद, शिव, ब्रह्मा, सनकादि, वे मुनिनायक जो आत्मवादी हैं, आत्मा का मर्म जानते और सिखाते हैं। यानी वे, जिनका काम ही दूसरों का मोह छुड़ाना है।
सूची ऊपर से शुरू होती है: यदि नारद, शिव और ब्रह्मा भी नहीं छूटे, तो गरुड़ के मोह पर कोई प्रश्न ही नहीं बनता। यह नहीं कहा गया कि गरुड़ का मोह छोटा था। कहा गया कि मोह से बड़े-बड़े नहीं बचे। सुननेवाले को छोटा किये बिना उसका बोझ हल्का किया गया है।
किसे नहीं
इसके बाद एक लम्बी प्रश्नमाला है। बहुत देर तक भुशुण्डि कोई बात कहते नहीं, बस पूछते चलते हैं: मोह ने किस-किस को अंधा नहीं किया? जगत् में ऐसा कौन है जिसे काम ने न नचाया हो? तृष्णा ने किसे बावला नहीं किया? क्रोध ने किसका हृदय नहीं जलाया? हर प्रश्न का उत्तर एक ही है, कोई नहीं, और वह कहा नहीं जाता। सुननेवाले को स्वयं देना पड़ता है। किसी एक कथन को नकारना आसान है। पर लगातार प्रश्नों के सामने बार-बार अपने ही मुँह से “कोई नहीं” कहना पड़े, तो मन अपनी ही गवाही से हार मान लेता है।
भुशुण्डि पूछते हैं कि इस संसार में ऐसा कौन ज्ञानी, तपस्वी, शूरवीर, कवि, विद्वान् और गुणों का घर है जिसकी लोभ ने विडम्बना न की हो। ये ठीक वे लोग हैं जो कह सकते थे कि यह नियम उन पर नहीं लगता: ज्ञानी के पास ज्ञान है, तपस्वी के पास तप, शूर के पास बल। कवि के पास वाणी, विद्वान् के पास शास्त्र, और गुणों के घर के पास सब कुछ। छहों एक ही शब्द से गिरा दिये गये हैं, विडम्बना, जिसे टीका मिट्टी पलीद करना कहती है। यानी केवल हार नहीं, हँसी।
फिर दो रोग गिनाये जाते हैं। दोनों अलग अंगों में लगते हैं: लक्ष्मी के मद ने किसे टेढ़ा नहीं किया, और प्रभुता ने किसे बहरा नहीं किया। धन का मद आदमी को टेढ़ा कर देता है। प्रभुता कान में लगती है और सुनना बन्द कर देती है। जिसके पास धन आया वह सीधा नहीं चलता, और जिसके पास अधिकार आया उसे कोई बात सुनायी नहीं देती। और अन्त में मृगनयनी के नैन-बाण, जिनसे बचकर कोई नहीं निकला।
फिर हर विकार को एक शरीर मिलता जाता है। गुणों का सन्निपात किसे नहीं हुआ, वह ज्वर जिसमें रोगी बहकने लगता है? मान और मद ने किसे अछूता छोड़ा? यौवन के ज्वर ने किसे आपे से बाहर नहीं किया? ममता ने किसका यश नष्ट नहीं किया? सन्निपात और ज्वर वैद्य की भाषा के शब्द हैं: भुशुण्डि मोह को दार्शनिक भूल नहीं, शरीर में उतरनेवाला रोग कह रहे हैं।
मत्सर ने किसे कलंक नहीं लगाया, शोक की हवा ने किसे नहीं हिलाया, चिन्ता की साँपिन ने किसे नहीं खाया? शोक हवा है, बाहर से झोंके की तरह आता है, हिलाता है और गुज़र जाता है। चिन्ता साँपिन है, भीतर रहती है और धीरे-धीरे खाती ही रहती है। और यह गिनती वहीं पहुँचती है जहाँ से यह माला चली थी: जगत् में ऐसा कौन है जिसे माया न व्यापी हो?
इस माला का बारीक चित्र यह है: मनोरथ कीड़ा है और शरीर लकड़ी। घुन लकड़ी को भीतर से खाता है, चुपचाप, और लकड़ी बाहर से बरसों साबुत दिखती रहती है, यहाँ तक कि एक दिन हाथ लगाने पर चूरा हो जाती है। इच्छा का काम ठीक यही है। ऐसा धीर कौन है जिसे यह घुन न लगा हो? फिर तीन इच्छाएँ नाम लेकर गिनायी जाती हैं: पुत्र की, धन की, और लोक में प्रतिष्ठा की। तीनों में से किसी को पाप नहीं कहा गया, फिर भी तीनों ने बुद्धि को मलिन किया है। बात बुरी इच्छाओं की नहीं, उन इच्छाओं की है जिन्हें हर घर आशीर्वाद में माँगता है।
प्रश्नमाला यहाँ रुकती है और भुशुण्डि पहला कथन करते हैं: यह सब माया का परिवार है, प्रबल और अपार। कौन इसका वर्णन कर सकता है? परिवार, यानी ये विकार अलग-अलग नहीं, एक घर के लोग हैं और एक दूसरे को पालते हैं। फिर वे जोड़ते हैं: शिव और ब्रह्मा जिससे डरते हैं, दूसरे जीव किस गिनती में? यह सारी कथा कैलास पर शिव पार्वती को सुना रहे हैं, और भीतर की कथा में एक कौआ कह रहा है कि शिव भी माया से डरते हैं। कहनेवाले शिव अपना ही नाम डरनेवालों में गिनवाते हैं, और उसे दुहराने में नहीं हिचकते।
एक सेना, और उसकी मालकिन
अब तक परिवार कहा गया था। अब वही परिवार सेना बन जाता है, और सेना की तरह उसके पद भी बँटते हैं। और जैसे ही सेना का पूरा नक्शा खिंचता है, अगली ही बात सारे नक्शे को उलट देती है।
माया की प्रचण्ड सेना संसार भर में छायी हुई है। काम आदि उसके सेनापति हैं, टीका उन्हें काम, क्रोध और लोभ कहती है, और दम्भ, कपट और पाखण्ड उसके योद्धा। सेनापति पीछे रहते हैं और आदेश देते हैं। सामने लड़ने को जो भट खड़े हैं, वे दम्भ, कपट और पाखण्ड हैं, यानी दिखावा, छल और धर्म का झूठा वेश। आदमी से रोज़ जो भिड़ता है वह लोभ नहीं, लोभ दूर बैठा है। रोज़ भिड़ता है दिखावा, छल, धर्म का पाखण्ड। सेनापति को कोई नहीं देखता, सिपाही रोज़ दिखता है।
फिर सारा चित्र पलट जाता है: जिस सेना का अभी वर्णन हुआ, वह राम की दासी है। इतनी बड़ी बात एक शब्द में, दासी। फिर दो बातें साथ रखी जाती हैं: समझ लेने पर वह मिथ्या है, और वह राम की कृपा बिना छूटती नहीं। यानी जानना काफ़ी नहीं। कोई माया को झूठ जान ले और फिर भी उसकी पकड़ में रहे, यह भी उतना ही हो सकता है। यह बात भुशुण्डि पैर ज़मीन पर गाड़कर कहते हैं, जैसे कोई प्रतिज्ञा करता है। इतनी लम्बी प्रश्नमाला में उन्होंने कहीं पैर नहीं गाड़ा था। यह पहली बात है जिस पर वे अपना पूरा भार रख देते हैं।
जो माया सारे जगत् को नचाती है, जिसकी करनी कोई लख नहीं पाया, वही राम की भृकुटी के इशारे पर अपने समाज सहित नटी की तरह नाचती है। नाच यहाँ दो बार आया है, दो उलटी दिशाओं में: पहले माया नचाती है, फिर वही नाचती है। बीच में केवल एक भौंह का हिलना है: आदेश नहीं, वचन नहीं, हाथ का संकेत भी नहीं। और नटी अपने समाज के साथ नाचती है, यानी वह सारी सेना, सेनापति और योद्धा, दम्भ और कपट, सब उसी भौंह की ताल पर हैं।
जिसकी भौंह हिलती है
भौंह किसकी है, यह अब कहना है, और भुशुण्डि कहते हैं। पर यह किसी राजकुमार या धनुर्धर का वर्णन नहीं। नाम राम का है और विशेषण ब्रह्म के हैं। विशेषण एक के बाद एक गिने जाते हैं, और अन्त में आकर वह गिनती एक तर्क बन जाती है।
वे कहते हैं कि वही राम सच्चिदानन्दघन हैं: अजन्मा, विज्ञानरूप, रूप और बल के धाम, व्यापक और व्याप्य दोनों, अखण्ड, अनन्त, अखिल, अमोघशक्ति भगवान्। जो सबमें फैला है वह व्यापक है, और जिसमें सब फैला है वह व्याप्य। दोनों एक ही नाम पर रखे गये हैं, यानी भरनेवाला और भरा जानेवाला अलग नहीं। और अमोघशक्ति, वह शक्ति जो कभी खाली नहीं जाती, अभी वर्णित प्रचण्ड सेना के सामने रखी गयी है। सेना का हर वार खाली जा सकता है, इसका एक भी नहीं।
फिर विशेषणों की माला आती है, बारह विशेषण। वे निर्गुण हैं, छोटे नहीं, वाणी और इन्द्रियों से परे, सब कुछ देखनेवाले, निर्दोष और अजेय। वे ममतारहित, निराकार, मोहरहित, नित्य, मायारहित और सुख की राशि हैं। उनमें आठ निषेध हैं: न गुण, न छोटा, न दोष, न हार, न ममता, न आकार, न मोह, न माया का लेप। जिसके बारे में कहना है, उसके बारे में सीधा कहना यही है कि वह क्या नहीं है। बीच-बीच में तीन सकारात्मक शब्द हैं, सब कुछ देखनेवाला, नित्य, सुख की राशि, जो निषेधों के बीच काले धागे में तीन मोतियों की तरह चमकते हैं।
प्रकृति से परे, सबके हृदय में बसनेवाले, इच्छारहित, विकाररहित, अविनाशी ब्रह्म। और यहीं माला टूटकर तर्क बन जाती है: यहाँ मोह का कारण ही नहीं है। क्या अंधकार कभी सूर्य के सामने जा सकता है? यह नहीं कहा गया कि राम मोह को जीत लेते हैं। कहा गया कि मोह का कारण ही वहाँ नहीं है। सूर्य अंधकार से लड़ता नहीं, न उसे भगाता है। जहाँ वह है वहाँ अंधकार का होना ही सम्भव नहीं। गरुड़ को राम में जो मोह दिखा था, उस पर भुशुण्डि का उत्तर यही है: वहाँ उसकी जगह ही नहीं है।
इसी में एक बात और है जो इतने निषेधों के बीच छूट सकती है: प्रकृति से परे, और सबके हृदय में बसनेवाले, दोनों एक साथ। जो प्रकृति से परे है, वह हर हृदय के भीतर भी है। परे और भीतर, दो उलटी दिशाएँ, अगल-बगल, बिना किसी किन्तु के। यहीं से अगली बात उठती है, क्योंकि जो हर हृदय में है, वह एक शरीर में, एक राजा के रूप में भी आ सकता है।
एक नट, और आँख के रोग
पर यदि वह ऐसा है, तो वह राजा क्यों बना, धनुष क्यों उठाया, वन क्यों गया, रोया क्यों? यह प्रश्न गरुड़ ने पूछा नहीं है, पर भुशुण्डि उसे बिना पूछे उठा लेते हैं। उत्तर एक ही वाक्य में है, और उसका पहला शब्द ही कारण है।
भक्तों के लिये भगवान् राम ने राजा का शरीर धारण किया और साधारण मनुष्यों जैसे परम पावन चरित्र किये। भक्तों के लिये, ये पहले ही शब्द हैं, कारण सबसे आगे। और साधारण मनुष्यों जैसे: मनुष्य के अनुरूप, मनुष्य नहीं। मनुष्य जैसा दिखनेवाला चरित्र, जो फिर भी परम पावन है। इसे समझाने के लिये भुशुण्डि एक नट को खड़ा करते हैं। जैसे कोई नट अनेक वेष धरकर नृत्य करता है और जो वेष होता है उसी का भाव दिखाता है, पर स्वयं उनमें से कोई हो नहीं जाता।
यहाँ पहले का नाच लौट आता है। माया नटी थी और भौंह के इशारे पर नाचती थी। यहाँ राम नट हैं, और अपनी इच्छा से, भक्तों के लिये नाचते हैं। वे हर वेष का भाव पूरा दिखाते हैं, राजा का, वनवासी का, पति का, भाई का, पर उनमें से कोई बनकर रह नहीं जाते। यही रेखा लीला को मोह से अलग करती है। नट रोता है तो सच्चे आँसू दिखते हैं, पर नट दुखी नहीं है।
फिर भुशुण्डि कहते हैं कि यह लीला दो काम करती है: राक्षसों को विशेष रूप से मोहित करती है, और भक्तों को सुख देती है। एक ही लीला, दो देखनेवाले, दो फल। जो लोग राम पर मोह का आरोप लगाते हैं, उनकी पहचान भी दी जाती है: मलिन बुद्धि, विषयों के वश, कामी। इसके बाद चार उदाहरण आते हैं जो एक ही बात अलग-अलग तरह से कहते हैं। जिसकी आँख में रोग है, वह चन्द्रमा को पीला कहता है। जिसे दिशा का भ्रम है, वह कहता है कि सूर्य पश्चिम में उगा। चन्द्रमा पीला नहीं हुआ, सूर्य ने दिशा नहीं बदली। बदली है देखनेवाले की आँख, और देखनेवाला अपनी आँख को नहीं देख सकता, इसलिये चन्द्रमा को दोष देता है।
नाव पर चढ़ा हुआ मनुष्य जगत् को चलता देखता है और मोहवश अपने को अचल समझता है। बालक घूमते हैं, घर नहीं घूमते, और वे आपस में एक दूसरे को झूठा कहते हैं। हर बच्चे को घर घूमता दिखता है, एक कहता है इस ओर घूमा, दूसरा कहता है उस ओर। कोई यह नहीं कहता कि घर ठहरा है और घूम वे रहे हैं। राम के मोह पर आपस में बहस करनेवाले इन्हीं बच्चों की तरह हैं। नाव पर बैठा आदमी बच्चा नहीं, समझदार है, फिर भी उसे किनारा चलता दिखता है। यह भ्रम बुद्धि की कमी से नहीं, उस जगह से आता है जहाँ आदमी बैठा है।
भुशुण्डि कहते हैं: “हे गरुड़, राम के विषय में मोह की कल्पना ऐसी ही है। उनमें स्वप्न में भी अज्ञान का प्रसंग नहीं।” किन्तु जो माया के वश हैं, मन्दबुद्धि, अभागे, और जिनके हृदय पर बहुत प्रकार के परदे पड़े हैं, वे मूर्ख हठ के वश होकर संदेह करते हैं। वे अपना अज्ञान राम पर धर देते हैं। ये परदे रंगमंच के परदे हैं, उसी रंगमंच के जिस पर अभी नट नाचा था, और ये बहुत प्रकार के हैं, तह पर तह। संदेह यहाँ बुद्धि से नहीं, हठ से आता है। और फिर राम पर धर देते हैं, जैसे कोई अपना बोझ किसी और के सिर पर रखे और फिर कहे कि यह कितना बोझ ढो रहा है।
फिर भुशुण्डि उन लोगों की सूची पूरी करते हैं: काम, क्रोध, मद और लोभ में रत, दुखरूप घर में आसक्त, वे राम को कैसे जानें? वे मूर्ख तो अंधकार के कुएँ में पड़े हैं। पर अगली बात वह है जिसकी अपेक्षा कोई नहीं करता, और इसी में इस प्रसंग का मोड़ है।
निर्गुण रूप अत्यन्त सुलभ है, सगुण को कोई नहीं जानता। उसके सुगम और अगम अनेक चरित्र सुनकर मुनियों के मन को भी भ्रम हो जाता है। सोचा यह जाता है कि जिसका कोई रूप नहीं उसे समझना कठिन होगा, और जो धनुष लिये सामने खड़ा है उसे समझना सरल। भुशुण्डि इसे उलट देते हैं। निराकार सुलभ है, क्योंकि उसके बारे में जो कहना है वह कुछ ही देर पहले कहा जा चुका: वह यह नहीं है, वह वह नहीं है। कठिन वह है जो रोता है, हँसता है, वन में भटकता है, सीता के लिये व्याकुल होता है, और फिर भी वही ब्रह्म है। सुगम और अगम एक ही चरित्र में मिले हैं, और यहीं मुनियों का मन भी फिसलता है। यह वाक्य आगे की कथा का द्वार है, क्योंकि जिस कौए का मन कभी फिसला था, वह अब अपनी कथा कहने जा रहा है।
फोड़ा और माँ
यहाँ भुशुण्डि की वाणी बदलती है। अब तक वे नियम कह रहे थे। अब कहते हैं: “हे गरुड़, राम की प्रभुता सुनिये। मैं अपनी बुद्धि के अनुसार वह सुहावनी कथा कहता हूँ, और जिस प्रकार मुझे मोह हुआ, वह सब कथा भी आपको सुनाता हूँ।” अपनी बुद्धि के अनुसार: इतने ऊँचे वर्णन के बाद यह छोटी-सी बात, और अपने बारे में। फिर वे बताते हैं कि क्यों सुना रहे हैं: “आप राम के कृपापात्र हैं, राम के गुणों में आपकी प्रीति है, इसलिये आप मुझे सुख देनेवाले हैं। इसलिये मैं आपसे कुछ नहीं छिपाता और परम रहस्य की मनोहर बातें गाकर सुनाता हूँ।” रहस्य कहा नहीं जाता, गाया जाता है।
वे गरुड़ को तात भी कहते हैं। जिसे पहली ही बात में सब प्रकार से पूज्य कहा था, उसे अब अपना बच्चा कहकर पुकार रहे हैं। यह असंगति नहीं, दूरी का मिटना है: जो कथा आने वाली है वह अपने बारे में है, और अपने बारे में कोई दूर बैठे आदमी से नहीं कहता। पर कथा पर आने से पहले वे एक नियम और रखते हैं, और यह नियम आगे की पूरी कथा की चाबी है।
भुशुण्डि कहते हैं: “राम का सहज स्वभाव सुनिये। वे अपने जन में अभिमान कभी नहीं रहने देते, क्योंकि अभिमान जन्म-मरण के संसार का मूल है, नाना प्रकार के शूल देनेवाला, और सारे शोक का दाता।” सहज स्वभाव: स्वभाव, नियम नहीं। यह कोई निर्णय नहीं जो वे हर बार लें, यह वैसा ही है जैसे आग का गरम होना। अभिमान के तीन दोष एक साथ गिनाये गये हैं: वह जड़ है, वह काँटा है, वह शोक है। पहले की प्रश्नमाला में मान और मद भी गिने गये थे, पर वहाँ वे भीड़ में खड़े थे। यहाँ अभिमान अकेला खड़ा है, संसार की जड़ कहलाकर, क्योंकि आगे की कथा इसी एक की है।
वे आगे कहते हैं: “इसीलिये राम उसे दूर कर देते हैं, क्योंकि सेवक पर उनकी ममता बहुत ही अधिक है। जैसे बच्चे के शरीर में फोड़ा हो जाये तो माता उसे कठोर हृदय वाली की तरह चिरा डालती है।” कठोर हृदय वाली की तरह, कठोर नहीं: माँ कठोर नहीं है, उसे कुछ देर कठोर दिखना पड़ता है। कारण पहले रखा गया है और चीरना बाद में: दूर क्यों करते हैं, क्योंकि ममता अधिक है। ममता कम होती तो वह फोड़ा रहने देती, बच्चे को रोता देख उसका हाथ रुक जाता। गरुड़ को जो उलझन मिली, और आगे भुशुण्डि को जो मिलेगी, दोनों की जड़ इसी उपमा में है।
यद्यपि बच्चा पहले दुख पाता है और अधीर होकर रोता है, तो भी रोग के नाश के लिये माता उसकी पीड़ा को नहीं गिनती। नहीं गिनती: यह नहीं कहा गया कि उसे पीड़ा दिखती नहीं। वह उसे गिनती नहीं, क्योंकि गिनने बैठे तो हाथ रुक जाये। उसी प्रकार राम अपने दास का अभिमान उसके हित के लिये हर लेते हैं। उसके हित के लिये, ठीक वैसे ही जैसे रोग के नाश के लिये: माँ के लिये जो शब्द था, वही राम के लिये है।
फिर तुलसीदास के नाम से एक बात आती है: “ऐसे प्रभु को भ्रम त्यागकर क्यों नहीं भजते?” अब तक कौआ बोल रहा था, गरुड़ सुन रहे थे, शिव सुना रहे थे। यह बात फोड़े और माँ की उपमा के ठीक बाद, उन सबके बीच से, सीधे भजन की बात करती है।
आँगन की जूठन
और अब वह कथा। पहली ही बात में दो चीज़ें एक साथ हैं: राम की कृपा और अपनी जड़ता। भुशुण्डि यह नहीं कहते कि पहले वे मूर्ख थे और फिर कृपा हुई। उनकी कथा में दोनों एक ही घटना के दो नाम हैं, जैसे फोड़ा और चीरा अलग नहीं। और वे गरुड़ से कहते हैं, “मन लगाकर सुनिये”, जैसे कोई कहे कि अब जो आ रहा है उसे हल्के में न लें।
फिर वे उस बात से शुरू करते हैं जो बार-बार होती है। “जब-जब राम मनुष्य का शरीर धारण करते हैं और भक्तों के लिये बहुत-सी लीलाएँ करते हैं, तब-तब मैं अयोध्या जाता हूँ और उनकी बाललीला देखकर हर्षित होता हूँ।” जब-जब, तब-तब: यह एक बार की कथा नहीं, हर बार की है। नियम कहनेवाले भुशुण्डि की अपनी कथा भी एक नियम की तरह शुरू होती है। वे जन्म का महोत्सव देखते हैं और पाँच वर्ष वहीं रह जाते हैं, लुभाकर। यह वही लोभ है जिसने कुछ ही देर पहले ज्ञानी और तपस्वी सबकी विडम्बना की थी। यहाँ वही शब्द एक कौए को पाँच बरस एक आँगन में बाँध रखता है, और इसे कोई दोष नहीं कहा गया। लोभ किस पर लगता है, इससे तय होता है कि वह क्या करेगा।
भुशुण्डि कहते हैं: “बालक राम मेरे इष्टदेव हैं, जिनके शरीर में अरबों कामदेवों की शोभा है। हे गरुड़, अपने प्रभु का मुख देख-देखकर मैं नेत्रों को सफल करता हूँ।” यह वही कह रहा है जिसने कुछ ही देर पहले कहा था: निर्गुण, निराकार, वाणी और इन्द्रियों से परे। अब वही कहता है कि उसका इष्ट एक बालक है। जिसने कहा था कि निर्गुण सुलभ है और सगुण को कोई नहीं जानता, उसने अपने लिये सगुण चुना है, और वह भी बालरूप। देख-देखकर: एक बार देखना काफ़ी नहीं। जो इन्द्रियों से परे है, उसे देखने के लिये इन्द्रियाँ ही चाहिये, और वे भर नहीं पातीं।
वे बताते हैं कि किस रूप में देखते हैं: “छोटे-से कौए का शरीर धरकर, उनके साथ-साथ फिरकर, मैं उनके भाँति-भाँति के बालचरित देखता हूँ।” छोटा कौआ: जो कह सके कि ब्रह्मा और शिव माया से डरते हैं, वह अयोध्या के आँगन में छोटा-सा शरीर चुनता है। कौआ आँगन की साधारण चीज़ है। उसे कोई नहीं भगाता, उस पर कोई ध्यान नहीं देता, और इसी नज़र न आने में वह पास तक पहुँच जाता है। जितना छोटा, उतना निकट।
भुशुण्डि कहते हैं: “लड़कपन में वे जहाँ-जहाँ फिरते हैं, वहाँ-वहाँ मैं साथ-साथ उड़ता हूँ, और आँगन में जो जूठन गिरती है, वही उठाकर खाता हूँ।” यहाँ उनकी बात सबसे नीचे उतरती है। पीछे बारह विशेषणों की माला थी, सच्चिदानन्दघन, अखण्ड, अनन्त, प्रकृति से परे। उसी को कहनेवाला अब बताता है कि वह उस बच्चे के हाथ से आँगन में गिरी जूठन खाता है। न कोई विरोध बताया गया, न कोई सफ़ाई। भुशुण्डि के लिये ये एक ही बात हैं। यहाँ ज्ञान ने कौए को ऊपर उठाकर दूर नहीं किया, आँगन की धूल तक उतारा है, और वह वहाँ बहुत सुखी है।
जूठन प्रसाद नहीं, जो कोई हाथ में देता है। यह वह है जो गिर गया, जिसे किसी ने दिया नहीं। और जो उसे उठाकर खाता है वह कोई भूखा कौआ नहीं। वह वही है जिसने अभी माया की पूरी सेना का नक्शा खींचा था।
फिर एक बात अगली कथा का द्वार है: एक बार राम ने सब चरित्र बहुत अधिकता से किये। और यहाँ कहनेवाला बदलता है। भुशुण्डि की बात ठहर जाती है और कथा बताती है कि उस लीला को स्मरण करते ही उनका शरीर पुलकित हो गया। यह वही पुलक है जिससे यह बातचीत खुली थी। तब वह गरुड़ की विनय सुनकर आया था, अब एक बच्चे की याद से आया है। जो लीला यहाँ केवल याद की गयी है, वह अगले प्रसंग की कथा है। अभी उसके बारे में इतना ही पता है कि उसे याद करने भर से उस कौए के रोंगटे खड़े हो जाते हैं जो इतनी बड़ी बातें बिना काँपे कह गया।
तीन उतरनें और एक चीरा
तीन उतरनें इस प्रसंग की रीढ़ हैं: नारद, शिव और ब्रह्मा से उतरकर हर सुननेवाले के भीतर का प्रश्न। बारह विशेषणों वाले ब्रह्म से उतरकर एक नट, जो राजा का वेष धरकर रोता है और फिर भी वह नहीं है। और नट से उतरकर एक आँगन, एक बच्चा, और गिरी हुई जूठन उठाता एक कौआ। जो ब्रह्म वाणी से परे था, वह प्रसंग के अन्त तक आँगन में खेल रहा है। उसे देखने के लिये किसी योग की नहीं, एक कौए की आँख की ज़रूरत है।
दूसरी बात उस पुकार की है। इस प्रसंग में भुशुण्डि गरुड़ को बार-बार पुकारते हैं: नाथ, खगपति, खगस्वामी, गोसाईं, खगराज, उरगारि, खगेश, विहंग, तात। जब भी बात ब्रह्म तक उठती है, एक पुकार उसे फिर एक चोंच और एक सुननेवाले तक लौटा लाती है। यह सब एक पहाड़ पर बैठे दो पक्षियों की बातचीत है, और इसीलिये कहीं हवा में नहीं उड़ती।
तीसरी बात उस माँ की है। इस बातचीत में दो का मोह है, गरुड़ का, जो कहा जा चुका, और भुशुण्डि का, जो अब कहा जाने वाला है। दोनों के लिये एक ही उपमा है, फोड़ा और चीरा। जो उलझन इस कथा में किसी भक्त को मिलती है, वह दण्ड नहीं, चिकित्सा है। और चीरते समय माँ कठोर की तरह दिखती है, कठोर होती नहीं।
इस प्रसंग की बड़ी बात एक ही वाक्य में है: माया समझ लेने पर मिथ्या है, और वह राम की कृपा बिना छूटती नहीं। समझ चाहिये, और समझ पर्याप्त नहीं। इसीलिये भुशुण्डि ने इस बात पर पैर गाड़ा। और इसीलिये वे, जो समझ के शिखर पर बैठे थे, अपनी कथा एक आँगन से शुरू करते हैं। वहाँ केवल पीछे-पीछे उड़ना है और जो गिरे उसे उठा लेना है।
अगला प्रसंग उसी आँगन में खुलेगा, जहाँ भुशुण्डि बतायेंगे कि एक बार राम ने बहुत अधिकता से क्या किया था। अभी उसकी केवल याद है, और उस याद से खड़े हुए रोंगटे: जो इतने बड़े शब्द बिना काँपे कह गया, वह एक बच्चे की याद पर काँप गया है।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, उत्तरकाण्ड, दोहा 70 से 75, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।