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माया की सेना और आँगन की जूठन

रामचरितमानस · उत्तरकाण्ड · माया की सेना और आँगन की जूठन

माया की सेना और आँगन की जूठन

एक कौआ पक्षियों के राजा से कहता है कि आपको मोह नहीं हुआ था, और फिर गिनाने लगता है कि मोह किसे नहीं हुआ। बीच में माया की पूरी सेना खड़ी होती है, उसके ऊपर वह ब्रह्म जिसकी भौंह पर वह नाचती है, और अन्त में वही कौआ अयोध्या के आँगन में गिरी हुई जूठन उठाकर खाता है।

यह पन्ना एक भरी हुई आँख से खुलता है। पिछले प्रसंग के अन्त में पक्षिराज की विनय भरी वाणी सुनकर काकभुशुण्डि का शरीर पुलकित हो गया था और उनके नेत्रों में जल भर आया था। उसी जल के साथ वे फिर बोलते हैं। जो कहते हैं वह अगले छह दोहों तक चलता है, और उसमें एक भी घटना नहीं है। कोई कहीं जाता नहीं, कोई युद्ध नहीं, कोई सभा नहीं। एक पहाड़ पर दो पक्षी बैठे हैं, एक कह रहा है और एक सुन रहा है, और जो कहा जा रहा है वह इस काण्ड की सबसे ऊँची बातों में से है।

पर इस पन्ने की बनावट ध्यान देने की चीज़ है। यह तीन बार नीचे उतरता है। पहले नारद, शिव और ब्रह्मा के नाम से चलकर उन प्रश्नों तक आता है जिनका उत्तर हर सुननेवाले को अपने भीतर देना पड़ता है। फिर ब्रह्म के बारह विशेषणों से उतरकर एक राजा के शरीर और एक नट के वेष तक आता है। और अन्त में उसी नट से उतरकर अयोध्या के एक आँगन तक पहुँचता है, जहाँ एक छोटा कौआ बच्चों के पीछे उड़ता है और जो जूठन गिरती है उसे उठाकर खा लेता है। हर उतार में बात छोटी नहीं होती। वह हाथ के पास आती जाती है।

और यह ध्यान में रहे कि यह तुलसीदास का रामचरितमानस है। काकभुशुण्डि और गरुड़ का यह संवाद तुलसी की अपनी रचना का हिस्सा है, और जो माया की सेना, जो नट की उपमा, जो फोड़ा चीरनेवाली माँ यहाँ आती है, वह सब इसी संवाद की है। इस पन्ने पर गरुड़ के मुँह से एक भी वाक्य नहीं निकलता। वे केवल सुनते हैं, और उन्हें बार-बार नाम लेकर पुकारा जाता है, कभी खगेस, कभी खगराज, कभी उरगारी, कभी बिहंग। यही पुकार इस पूरे विचार को ज़मीन से बाँधे रखती है।

इस प्रसंग के मुख्य किरदार

  • काकभुशुण्डि कौए के शरीर वाले वे भक्त जो इस पूरे पन्ने पर बोलते हैं। पहले नियम कहते हैं, फिर अपनी कथा शुरू करते हैं, और कथा की पहली बात यह है कि वे अयोध्या के आँगन में जूठन खाते थे।
  • गरुड़ पक्षियों के राजा, जो यहाँ सुननेवाले हैं और एक शब्द भी नहीं बोलते। कहनेवाला उन्हें पूज्य कहता है, फिर ताता कहता है, और उनके मोह को मोह मानने से ही मना कर देता है।
  • राम पहले सच्चिदानन्दघन, अगुन, निराकार ब्रह्म के रूप में गिनाये जाते हैं, फिर राजा के शरीर में नट की तरह, और अन्त में अयोध्या के आँगन में खेलते हुए बालक के रूप में।
  • माया जिसका परिवार और जिसकी सेना संसार भर में छायी है, जिससे शिव और ब्रह्मा भी डरते हैं, और जो फिर भी एक भौंह के इशारे पर नटी की तरह नाचती है।
  • तुलसीदास कवि, जो इस प्रसंग में एक बार अपना नाम लेकर बीच में आते हैं, ठीक उस दोहे में जहाँ माँ बच्चे का फोड़ा चीरती है।

पहले शिष्टाचार, फिर बड़ाई का उलटा हिसाब

कौआ फिर बोलता है, और बोलने से पहले तुलसी एक बात दर्ज कर देते हैं जो इस पूरे संवाद का सुर तय करती है: पक्षिराज पर उनका प्रेम थोड़ा नहीं था। यह वाक्य यहाँ क्यों है, इस पर रुकना चाहिये। आगे जो कहा जाने वाला है वह कठोर है, मोह किसे नहीं हुआ, कौन माया से नहीं डरता, कौन तम के कुएँ में नहीं पड़ा। यह सब सुननेवाले को चुभ सकता था। इसलिये कहने से पहले कवि बता देता है कि कहनेवाले के भीतर क्या है। प्रेम पहले रखा गया है, कठोर बात बाद में।

और भुशुण्डि का पहला वाक्य अपने सुननेवाले को ऊपर बिठाता है। हे नाथ, आप सब प्रकार से मेरे पूज्य हैं, और रघुनायक के कृपापात्र हैं। सुननेवाला कोई शिष्य नहीं है जिसे पाठ पढ़ाया जा रहा हो। वह ऐसा है जिसे कहनेवाला सब प्रकार से पूज्य कहता है। यह शिष्टाचार है, पर केवल शिष्टाचार नहीं है, क्योंकि अगली ही पंक्ति में यह विनय एक दावा बन जाती है।

तुम्हहि न संसय मोह न माया। मो पर नाथ कीन्हि तुम्ह दाया॥
पठइ मोह मिस खगपति तोही । रघुपति दीन्हि बड़ाई मोही॥

चौपाई १

आपको न संदेह है, न मोह, न माया। हे नाथ, आपने तो मुझ पर दया की है। रघुपति ने मोह के बहाने आपको यहाँ भेजकर मुझे बड़ाई दी है। यहाँ एक शब्द है जिस पर सारी पंक्ति टिकी है, मिस, यानी बहाना। गरुड़ अपना मोह लेकर आये थे, और भुशुण्डि पहले वाक्य में ही वह मोह उनसे छीन लेते हैं। जो चीज़ पक्षिराज को इस पहाड़ तक लायी, वह भुशुण्डि की दृष्टि में मोह नहीं, एक युक्ति है। किसी छोटे को बड़ा करना हो तो बड़े को उसके द्वार तक भेजना पड़ता है, और राम ने यही किया। लाभ किसे हुआ, यह भी उलट दिया गया है। सुननेवाला यहाँ कुछ पाने नहीं आया, कहनेवाले को कुछ दिलाने आया है।

इतनी विनय के बाद कोई यह न समझे कि भुशुण्डि प्रश्न से कतरा रहे हैं। वे अगली ही साँस में उस मोह को उठाते हैं और कहते हैं कि आपने अपना मोह कहा, सो हे गोसाईं, इसमें आश्चर्य कुछ नहीं। और आश्चर्य क्यों नहीं, इसका उत्तर वे तर्क से नहीं, नामों से देते हैं। नारद, शिव, ब्रह्मा, सनकादि। नाम गिनाकर वे इनकी पहचान भी बता देते हैं: ये वे मुनिनायक हैं जो आत्मा के मर्मज्ञ हैं और उसका उपदेश करते हैं। यानी वे जिनका काम ही दूसरों का मोह छुड़ाना है।

सूची जान-बूझकर ऊपर से शुरू की गयी है। जिस दुर्ग की दीवार सबसे ऊँची हो, पहले उसका गिरना दिखा दो, तो छोटे घरों का हिसाब देने की ज़रूरत नहीं रहती। यदि नारद, शिव और ब्रह्मा भी छूटे नहीं, तो गरुड़ के मोह पर कोई प्रश्न ही नहीं बनता। यह सान्त्वना है, पर सान्त्वना का ढंग देखिये। यह नहीं कहा गया कि आपका मोह छोटा था। कहा गया कि मोह से बड़े-बड़े नहीं बचे। सुननेवाले को छोटा किये बिना उसका बोझ हल्का किया गया है।

सार: भुशुण्डि गरुड़ को सब प्रकार से पूज्य कहते हैं, और फिर कहते हैं कि आपको न संदेह है, न मोह, न माया। जो मोह उन्हें यहाँ लाया वह राम का बहाना था, एक कौए को बड़ाई देने का। और यदि मोह हुआ भी, तो आश्चर्य नहीं, क्योंकि नारद, शिव, ब्रह्मा और सनकादि जैसे आत्मवादी मुनिनायक भी उससे नहीं छूटे।

किसे नहीं

इसके बाद जो आता है वह उत्तरकाण्ड की सबसे लम्बी प्रश्नमाला है। चार चौपाइयों और एक दोहे तक भुशुण्डि कोई बात कहते नहीं, वे बस पूछते चलते हैं। उनमें से भी किस-किस को मोह ने अंधा नहीं किया? जगत् में ऐसा कौन है जिसे काम ने न नचाया हो? तृष्णा ने किसे बौरा नहीं दिया? क्रोध ने किसका हृदय नहीं जलाया? हर प्रश्न का उत्तर एक ही है, और वह उत्तर कहा नहीं जाता। सुननेवाले को स्वयं देना पड़ता है। कोई नहीं। यही इस रचना की युक्ति है। एक कथन को नकारना आसान है, कोई कह सकता है कि सब मोहित हैं यह सच नहीं। पर लगातार प्रश्नों के सामने बार-बार अपने ही मुँह से कोई नहीं कहना पड़े, तो मन अपनी ही गवाही से हार मान लेता है।

ग्यानी तापस सूर कबि कोबिद गुन आगार।
केहि कै लोभ बिडंबना कीन्हि न एहिं संसार॥ ७० (क)॥
श्रीमद बक्र न कीन्ह केहि प्रभुता बधिर न काहि।
मृगलोचनि के नैन सर को अस लाग न जाहि॥ ७० (ख)॥

दोहा ७०

इस संसार में ऐसा कौन ज्ञानी, तपस्वी, शूरवीर, कवि, विद्वान् और गुणों का घर है जिसकी लोभ ने विडम्बना न की हो। सूची देखिये। ये ठीक वे लोग हैं जो कह सकते थे कि हम पर यह नियम नहीं लगता। ज्ञानी के पास ज्ञान है, तपस्वी के पास तप, शूर के पास बल, कवि के पास वाणी, कोविद के पास शास्त्र, और गुणों के घर के पास सब कुछ। छहों को एक ही शब्द से गिरा दिया गया है, बिडंबना, जिसे टीका मिट्टी पलीद करना कहती है। यानी केवल हार नहीं, हँसी। लोभ इन सबको हराता ही नहीं, इनका मज़ाक बना देता है।

दोहे का दूसरा आधा दो रोग गिनाता है और दोनों अलग अंगों में लगते हैं। लक्ष्मी के मद ने किसे टेढ़ा नहीं किया, और प्रभुता ने किसे बहरा नहीं किया। धन का मद रीढ़ में लगता है, वह आदमी को बक्र कर देता है, टेढ़ा। और प्रभुता कान में लगती है, वह सुनना बन्द कर देती है। जिसके पास धन आया वह सीधा नहीं चलता, और जिसके पास अधिकार आया उसे कोई बात सुनायी नहीं देती। दो शब्दों में तुलसी ने धन और सत्ता का पूरा रोगशास्त्र रख दिया है। और अन्त में मृगनयनी के नैन-बाण, जिनसे बचकर कोई नहीं निकला।

फिर चौपाइयाँ आगे बढ़ती हैं और हर विकार को एक शरीर मिलता जाता है। गुणों का सन्निपात किसे नहीं हुआ, वह ज्वर जिसमें रोगी बहकने लगता है। मान और मद ने किसे अछूता छोड़ा। यौवन के ज्वर ने किसे आपे से बाहर नहीं किया। ममता ने किसका यश नहीं नष्ट किया। ये विचार की भाषा के शब्द नहीं हैं। सन्निपात, ज्वर, यह वैद्य की भाषा है। भुशुण्डि मोह को कोई दार्शनिक भूल नहीं कह रहे, उसे रोग कह रहे हैं जो शरीर में उतरता है।

मच्छर काहि कलंक न लावा। काहि न सोक समीर डोलावा॥
चिंता साँपिनि को नहिं खाया। को जग जाहि न ब्यापी माया॥

चौपाई २

मत्सर ने किसे कलंक नहीं लगाया, शोक की हवा ने किसे नहीं हिलाया, चिन्ता की साँपिन ने किसे नहीं खाया। ध्यान दीजिये कि शोक हवा है और चिन्ता साँपिन। दोनों को एक शब्द से नहीं बाँधा गया, क्योंकि दोनों एक चीज़ नहीं हैं। शोक बाहर से आता है, झोंके की तरह, हिलाता है और गुज़र जाता है। चिन्ता भीतर रहती है, धीरे खाती है, और खाती ही रहती है। जिसे चिन्ता ने खाया है वह जानता है कि यह उपमा कितनी ठीक है, वह किसी एक दिन नहीं मरता, रोज़ थोड़ा-थोड़ा कम होता जाता है। और चौपाई का अन्त वहीं पहुँचता है जहाँ से यह पूरी माला चली थी: जगत् में ऐसा कौन है जिसे माया न व्यापी हो।

कीट मनोरथ दारु सरीरा । जेहि न लाग घुन को अस धीरा॥
सुत बित लोक ईषना तीनी। केहि कै मति इन्ह कृत न मलीनी॥

चौपाई ३

इस पूरी माला का सबसे बारीक चित्र यह है। मनोरथ कीड़ा है और शरीर लकड़ी। घुन लकड़ी को बाहर से नहीं खाता। वह भीतर से खाता है, चुपचाप, और लकड़ी बाहर से बरसों साबुत दिखती रहती है, यहाँ तक कि एक दिन हाथ लगाने पर वह चूरा हो जाती है। इच्छा का काम ठीक यही है। वह किसी को एक दिन में नहीं गिराती। वह भीतर बैठकर काम करती है, और बाहर सब ठीक दिखता है। ऐसा धीर कौन है जिसे यह घुन न लगा हो। और फिर तीन इच्छाएँ नाम लेकर गिनायी जाती हैं: पुत्र की, धन की, और लोक में प्रतिष्ठा की। तीनों वैध हैं। तीनों में से किसी को पाप नहीं कहा गया। तीनों ने बुद्धि को मलिन किया है। तुलसी यहाँ बुरी इच्छाओं की बात नहीं कर रहे। वे उन इच्छाओं की बात कर रहे हैं जिन्हें हर घर आशीर्वाद में माँगता है।

प्रश्नमाला यहाँ आकर रुकती है और भुशुण्डि पहला कथन करते हैं: यह सब माया का परिवार है, प्रबल और अपार, कौन इसका वर्णन कर सकता है। परिवार शब्द चुना गया है, यानी ये विकार अलग-अलग नहीं हैं, ये एक घर के लोग हैं और एक दूसरे को पालते हैं। और फिर वे एक बात जोड़ते हैं जो इस सभा में विशेष अर्थ रखती है। शिव और ब्रह्मा जिससे डरते हैं, दूसरे जीव किस गिनती में। यह सारी कथा कैलास पर शिव उमा को सुना रहे हैं, और भीतर की कथा में एक कौआ कह रहा है कि शिव भी इससे डरते हैं। कहनेवाले ने अपना ही नाम डरनेवालों में गिनवा लिया है, और उसे दुहराने में कोई हिचक नहीं की।

सार: भुशुण्डि लगातार पूछते हैं कि मोह ने किसे अंधा नहीं किया, काम ने किसे नहीं नचाया, लोभ ने किस ज्ञानी और तपस्वी की विडम्बना नहीं की, धन के मद ने किसे टेढ़ा और प्रभुता ने किसे बहरा नहीं किया। शोक हवा है, चिन्ता साँपिन, मनोरथ शरीर की लकड़ी में लगा घुन। पुत्र, धन और प्रतिष्ठा की तीन इच्छाओं ने हर बुद्धि को मलिन किया। यह सब माया का परिवार है, जिससे शिव और ब्रह्मा भी डरते हैं।

एक सेना, और उसकी मालकिन

अब तक परिवार कहा गया था। दोहे में वही परिवार सेना बन जाता है, और सेना की तरह उसके पद भी बँटते हैं। और जैसे ही सेना का पूरा नक्शा खिंच जाता है, दोहे का दूसरा आधा उस पर एक ऐसी बात कहता है जो सारे नक्शे को उलट देती है।

ब्यापि रहेउ संसार महुँ माया कटक प्रचंड।
सेनापति कामादि भट दंभ कपट पाषंड॥ ७१ (क)॥
सो दासी रघुबीर कै समुझें मिथ्या सोपि।
छूट न राम कृपा बिनु नाथ कहउँ पद रोपि॥ ७१ (ख)॥

दोहा ७१

माया की प्रचण्ड सेना संसार भर में छायी हुई है। काम आदि उसके सेनापति हैं, टीका उन्हें काम, क्रोध और लोभ कहती है, और दम्भ, कपट और पाखण्ड उसके योद्धा। पदों का यह बँटवारा ध्यान देने की चीज़ है। काम, क्रोध, लोभ सेनापति हैं, वे पीछे रहते हैं और आदेश देते हैं। सामने लड़ने के लिये जो भट खड़े हैं, वे दम्भ, कपट और पाखण्ड हैं, यानी दिखावा, छल और धर्म का झूठा वेश। जो आदमी से रोज़ भिड़ता है वह लोभ नहीं है, लोभ दूर बैठा है। जो रोज़ भिड़ता है वह दिखावा है, छल है, धर्म का पाखण्ड है। सेनापति को कोई नहीं देखता, सिपाही रोज़ दिखता है।

और दूसरे आधे में सारा चित्र पलट जाता है। जिस सेना का अभी वर्णन हुआ, वह रघुवीर की दासी है। इतनी बड़ी बात एक शब्द में, दासी। फिर दो बातें साथ रखी जाती हैं जो साथ रखे बिना समझ में नहीं आतीं। समझ लेने पर वह मिथ्या है। और वह राम की कृपा बिना छूटती नहीं। यानी जानना काफ़ी नहीं है। कोई माया को झूठ जान ले, यह हो सकता है, और वह फिर भी उसकी पकड़ में रहे, यह भी उतना ही हो सकता है। जो लोग सोचते हैं कि समझ लेना ही छूट जाना है, उनके लिये यह आधा दोहा है। और इस बात को भुशुण्डि पद रोपि कहते हैं, पैर ज़मीन पर गाड़कर, जैसे कोई प्रतिज्ञा करता है। इतनी लम्बी प्रश्नमाला में उन्होंने कहीं अपना पैर नहीं गाड़ा था। यह पहली बात है जिस पर वे अपना पूरा भार रख देते हैं।

जो माया सब जगहि नचावा। जासु चरित लखि काहुँ न पावा॥
सोइ प्रभु भ्रू बिलास खगराजा । नाच नटी इव सहित समाजा॥

चौपाई ४

जो माया सारे जगत् को नचाती है, जिसकी करनी कोई लख नहीं पाया, वही, हे खगराज, प्रभु की भृकुटी के इशारे पर अपने समाज सहित नटी की तरह नाचती है। नाच इस चौपाई में दो बार आया है, और दो उलटी दिशाओं में। पहली पंक्ति में माया नचाती है, दूसरी में वही नाचती है। बीच में केवल एक भौंह का हिलना है, भ्रू बिलास। आदेश नहीं, वचन नहीं, हाथ का संकेत भी नहीं। भौंह भर। और नटी अकेली नहीं नाचती, अपने समाज के साथ नाचती है, यानी वह सारी सेना, सेनापति और योद्धा, दम्भ और कपट, सब उसी भौंह की ताल पर हैं। जिस माया की चाल कोई नहीं देख पाया, उसे स्वयं एक और चाल पर चलना पड़ता है, और वह चाल इतनी हल्की है कि भौंह से तय हो जाती है।

सार: माया की सेना संसार भर में छायी है, काम आदि उसके सेनापति और दम्भ, कपट, पाखण्ड उसके योद्धा हैं। पर वह रघुवीर की दासी है। समझ लेने पर मिथ्या है, फिर भी राम की कृपा बिना छूटती नहीं, यह भुशुण्डि पैर गाड़कर कहते हैं। जो सारे जगत् को नचाती है, वह प्रभु की भौंह के इशारे पर अपने समाज सहित नटी की तरह नाचती है।

जिसकी भौंह हिलती है

भौंह किसकी है, यह अब कहना पड़ेगा, और भुशुण्डि कहते हैं। पर यहाँ जो कहा गया है वह किसी राजकुमार का, किसी धनुर्धर का वर्णन नहीं है। यहाँ नाम राम का है और विशेषण ब्रह्म के हैं। तीन चौपाइयों में विशेषण गिने जाते हैं, और तीसरी की अन्तिम पंक्ति पर आकर वह गिनती एक तर्क बन जाती है।

सोइ सच्चिदानंद घन रामा। अज बिग्यान रूप बल धामा॥
ब्यापक ब्याप्य अखंड अनंता । अखिल अमोघसक्ति भगवंता॥

चौपाई ५

वही राम सच्चिदानन्दघन हैं। अजन्मा, विज्ञानरूप, रूप और बल के धाम। व्यापक और व्याप्य दोनों, अखण्ड, अनन्त, अखिल, अमोघशक्ति भगवान्। व्यापक और व्याप्य पर ठहरना चाहिये। जो सबमें फैला है वह व्यापक है, और जिसमें सब फैला है वह व्याप्य। दोनों एक ही नाम पर रख दिये गये हैं, यानी भरनेवाला और भरा जानेवाला अलग नहीं हैं। और अमोघसक्ति: वह शक्ति जो कभी खाली नहीं जाती। अभी जिस सेना का वर्णन हुआ था, प्रचण्ड, संसार भर में छायी हुई, उसके सामने यह एक शब्द रखा गया है। सेना बड़ी है, पर उसका हर वार खाली जा सकता है। इसका एक भी नहीं जाता।

अगली चौपाई विशेषणों की माला है, और उसकी बनावट देखने की है। अगुन, अदभ्र, गिरा गोतीता, सबदरसी, अनवद्य, अजीता, निर्मम, निराकार, निरमोहा, नित्य, निरंजन, सुख संदोहा। बारह विशेषण, और उनमें आठ निषेध से बनते हैं, अ या निर् से शुरू होकर। न गुण, न छोटा, न दोष, न हार, न ममता, न आकार, न मोह, न माया का लेप। तुलसी जानते हैं कि जिसके बारे में कहना है, उसके बारे में कहने का सीधा रास्ता यह है कि वह क्या नहीं है। पर माला बीच-बीच में तीन सकारात्मक शब्द भी पहनती है: सब कुछ देखनेवाला, नित्य, सुख की राशि। निषेधों के बीच वे तीन शब्द उस तरह चमकते हैं जैसे काले धागे में तीन मोती। जो कुछ भी नहीं है, वह देखता है, वह सदा है, और वह सुख है।

प्रकृति पार प्रभु सब उर बासी। ब्रह्म निरीह बिरज अबिनासी॥
इहाँ मोह कर कारन नाहीं । रबि सन्मुख तम कबहुँ कि जाहीं॥

चौपाई ६

प्रकृति से परे, प्रभु, सबके हृदय में बसनेवाले, इच्छारहित, विकाररहित, अविनाशी ब्रह्म। और यहीं माला टूटकर तर्क बन जाती है: यहाँ मोह का कारण ही नहीं है। क्या अंधकार कभी सूर्य के सामने जा सकता है। तर्क का रूप देखिये। यह नहीं कहा गया कि राम मोह को जीत लेते हैं। कहा गया कि मोह का कारण ही वहाँ नहीं है। सूर्य अंधकार से लड़ता नहीं, न उसे भगाता है। जहाँ वह है वहाँ अंधकार का होना ही सम्भव नहीं, इसलिये लड़ने का प्रश्न उठता ही नहीं। जो गरुड़ को राम में मोह दिखा था, उस पर भुशुण्डि का उत्तर यही है: वहाँ देखने की जगह ही नहीं है।

और इस चौपाई की पहली पंक्ति में एक बात और छिपी है जिसे इतने निषेधों के बीच छोड़ देना आसान है। प्रकृति से पार, और सब उर बासी, दोनों एक साथ, एक ही पंक्ति में। जो प्रकृति से परे है, वह हर हृदय के भीतर भी है। परे और भीतर, दो उलटी दिशाएँ, और तुलसी ने उन्हें अगल-बगल रख दिया है बिना किसी किन्तु के। यही वह जगह है जहाँ से अगला दोहा उठता है, क्योंकि जो हर हृदय में है, वह एक हृदय में, एक शरीर में, एक राजा के रूप में भी आ सकता है।

सार: वही राम सच्चिदानन्दघन हैं, अजन्मा, व्यापक और व्याप्य, अखण्ड, अनन्त, अमोघ शक्ति वाले। अगुन, निराकार, निरमोह, निरंजन, प्रकृति से परे और फिर भी सबके हृदय में बसे हुए। उनमें मोह का कारण ही नहीं है, जैसे सूर्य के सामने अंधकार जा ही नहीं सकता।

एक नट, और आँख के रोग

पर यदि वह ऐसा है, तो वह राजा क्यों बना। धनुष क्यों उठाया, वन क्यों गया, रोया क्यों। यह प्रश्न गरुड़ ने पूछा नहीं है, पर हर सुननेवाले के मन में है, और भुशुण्डि उसे बिना पूछे उठा लेते हैं। उत्तर एक दोहे में है, और उत्तर का पहला शब्द ही कारण है।

भगत हेतु भगवान प्रभु राम धरेउ तनु भूप।
किए चरित पावन परम प्राकृत नर अनुरूप॥ ७२ (क)॥
जथा अनेक बेष धरि नृत्य करइ नट कोइ।
सोइ सोइ भाव देखावइ आपुन होइ न सोइ॥ ७२ (ख)॥

दोहा ७२

भक्तों के लिये भगवान् प्रभु राम ने राजा का शरीर धारण किया और साधारण मनुष्यों जैसे परम पावन चरित्र किये। भगत हेतु दोहे के पहले दो शब्द हैं, कारण सबसे आगे। और फिर प्राकृत नर अनुरूप: मनुष्य के अनुरूप, मनुष्य नहीं। मनुष्य जैसा दिखनेवाला चरित्र, जो फिर भी परम पावन है। दोहे का दूसरा आधा इसी को समझाने के लिये एक नट को खड़ा करता है। जैसे कोई नट अनेक वेष धारण करके नृत्य करता है, और जो वेष होता है उसी का भाव दिखाता है, पर स्वयं उनमें से कोई हो नहीं जाता।

यहाँ पिछली चौपाई का नाच लौट आता है, और लौटकर कुछ बताता है। माया नटी थी और भौंह के इशारे पर नाचती थी। यहाँ राम नट हैं, और वे नाचते हैं अपनी इच्छा से, भक्तों के लिये। इस पन्ने पर दो नाच हैं। एक नचाया जाता है, दूसरा नाचा जाता है। और दूसरे नाच में नाचनेवाला हर वेष में उसका भाव पूरा दिखाता है, राजा का, वनवासी का, पति का, भाई का, पर उनमें से कोई बनकर रह नहीं जाता। आपुन होइ न सोइ। यही वह रेखा है जो लीला को मोह से अलग करती है। नट रोता है तो सच्चे आँसू दिखते हैं, पर नट दुखी नहीं है। जो नट को दुखी समझ ले, उसने खेल नहीं समझा।

फिर भुशुण्डि कहते हैं कि यह लीला दो काम करती है: राक्षसों को विशेष रूप से मोहित करती है, और भक्तों को सुख देती है। एक ही लीला, दो देखनेवाले, दो फल। और जो लोग प्रभु पर मोह का आरोप लगाते हैं, उनकी पहचान भी दी जाती है: मलिन बुद्धि, विषयों के वश, कामी। इसके बाद चार उदाहरण आते हैं, और चारों एक ही बात कहते हैं, इतनी अलग-अलग तरह से कि बात हर बार नयी लगती है। जिसकी आँख में रोग है, वह चन्द्रमा को पीला कहता है। जिसे दिशा का भ्रम है, वह कहता है कि सूर्य पश्चिम में उगा। चन्द्रमा पीला नहीं हुआ। सूर्य ने दिशा नहीं बदली। जो बदला है वह देखनेवाले की आँख है, और देखनेवाला अपनी आँख को नहीं देख सकता, इसलिये वह चन्द्रमा को दोष देता है।

नौकारूढ़ चलत जग देखा। अचल मोह बस आपुहि लेखा॥
बालक भ्रमहिं न भ्रमहिं गृहादी। कहहिं परस्पर मिथ्याबादी॥

चौपाई ७

नाव पर चढ़ा हुआ मनुष्य जगत् को चलता देखता है और मोहवश अपने को अचल समझता है। बालक घूमते हैं, घर नहीं घूमते, और वे आपस में एक दूसरे को झूठा कहते हैं। इस चौपाई का दूसरा आधा पूरी बहस का चित्र है। बच्चे चक्कर काटते हैं, हर एक को घर घूमता दिखता है, और जब एक कहता है कि घर इस ओर घूमा और दूसरा कहता है कि उस ओर, तो दोनों एक दूसरे को झूठा कहते हैं। कोई यह नहीं कहता कि घर ठहरा हुआ है और हम घूम रहे हैं। जो लोग राम के मोह पर आपस में बहस करते हैं, तुलसी की दृष्टि में वे इन्हीं बच्चों की तरह हैं। बहस में जो एक बात किसी को नहीं सूझती वह यह है कि घूमनेवाला वह स्वयं है। और नाव का चित्र इससे भी बारीक है, क्योंकि नाव पर बैठा आदमी बच्चा नहीं है, वह समझदार है, और फिर भी उसे किनारा चलता दिखता है। यह भ्रम बुद्धि की कमी से नहीं आता। यह जगह से आता है, जहाँ आदमी बैठा है।

हरि बिषइक अस मोह बिहंगा। सपनेहुँ नहिं अग्यान प्रसंगा॥
मायाबस मतिमंद अभागी। हृदयँ जमनिका बहुबिधि लागी॥

चौपाई ८

हे गरुड़, हरि के विषय में मोह की कल्पना ऐसी ही है। उनमें स्वप्न में भी अज्ञान का प्रसंग नहीं। किन्तु जो माया के वश हैं, मन्दबुद्धि, अभागे, और जिनके हृदय पर बहुत प्रकार के परदे पड़े हैं, वे मूर्ख हठ के वश होकर संदेह करते हैं और अपना अज्ञान राम पर धर देते हैं। जमनिका शब्द पर रुकिये: परदा, वह जो रंगमंच पर खिंचता है। नट की उपमा अभी पीछे ही है, और परदा भी उसी रंगमंच से आया है। और परदे बहुबिधि हैं, एक नहीं। किसी के हृदय पर एक परदा नहीं होता, तह पर तह होती है, और हर तह का अपना रंग होता है। फिर अगली अकेली आधी चौपाई में एक शब्द है जिसे छोड़ना नहीं चाहिये: हठ। संदेह यहाँ बुद्धि से नहीं आता, हठ से आता है। और फिर वह क्रिया, राम पर धरहीं, अपना अज्ञान उठाकर राम के ऊपर रख देना, जैसे कोई अपना बोझ किसी और के सिर पर रख दे और फिर कहे कि देखो, यह कितना बोझ ढो रहा है।

दोहे का पहला आधा उन लोगों की सूची पूरी करता है। काम, क्रोध, मद और लोभ में रत, दुखरूप घर में आसक्त, वे रघुपति को कैसे जानें, वे मूर्ख तो अंधकार के कुएँ में पड़े हैं। पर दूसरा आधा वह बात कहता है जिसकी अपेक्षा कोई नहीं करता, और इसी में इस पूरे प्रसंग का मोड़ है।

निर्गुन रूप सुलभ अति सगुन जान नहिं कोइ।
सुगम अगम नाना चरित सुनि मुनि मन भ्रम होइ॥ ७३ (ख)॥

दोहा ७३ (ख)

निर्गुण रूप अत्यन्त सुलभ है, सगुण को कोई नहीं जानता। उनके सुगम और अगम अनेक चरित्र सुनकर मुनियों के मन को भी भ्रम हो जाता है। सोचा यह जाता है कि जिसका कोई रूप नहीं, उसे समझना कठिन होगा, और जो सामने खड़ा है, धनुष लिये, उसे समझना सरल। तुलसी इसे उलट देते हैं। निराकार सुलभ है, क्योंकि उसके बारे में जो कहना है वह कह दिया गया, कुछ चौपाई पहले, वह यह नहीं है, वह वह नहीं है। कठिन वह है जो रोता है, हँसता है, वन में भटकता है, सीता के लिये व्याकुल होता है, और फिर भी वही ब्रह्म है। सुगम और अगम एक ही चरित्र में मिले हुए हैं, और यहीं मुनियों का मन भी फिसलता है। यह वाक्य आगे के पूरे पन्ने का द्वार है, क्योंकि जिस कौए का मन कभी फिसला था, वह अब अपनी कथा कहने जा रहा है।

सार: भक्तों के लिये भगवान् ने राजा का शरीर धरा और मनुष्यों जैसे चरित्र किये, जैसे नट वेष बदलकर हर भाव दिखाता है पर स्वयं वह नहीं होता। पीला चाँद, पश्चिम का सूर्य, चलता हुआ किनारा, घूमते बच्चे: दोष देखनेवाले की आँख में है। हरि में स्वप्न में भी अज्ञान नहीं, हठी लोग अपना अज्ञान उन पर धर देते हैं। निर्गुण सुलभ है, सगुण को कोई नहीं जानता, और उसके सुगम-अगम चरित्र मुनियों को भी भ्रम में डाल देते हैं।

फोड़ा और माँ

यहाँ भुशुण्डि की वाणी बदल जाती है। अब तक वे नियम कह रहे थे, किसे नहीं, कौन नहीं। अब वे कहते हैं: हे पक्षिराज, रघुपति की प्रभुता सुनिये, मैं अपनी बुद्धि के अनुसार वह सुहावनी कथा कहता हूँ, और जिस प्रकार मुझे मोह हुआ, वह सब कथा भी आपको सुनाता हूँ। जथामति, जितनी बुद्धि है उतना। इतना ऊँचा वर्णन करने के बाद यह छोटा शब्द, और यह अपने बारे में कहा गया है। फिर वे बताते हैं कि क्यों सुना रहे हैं। आप राम के कृपापात्र हैं, हरि के गुणों में आपकी प्रीति है, इसलिये आप मुझे सुख देनेवाले हैं, इसलिये मैं आपसे कुछ नहीं छिपाता और परम रहस्य की मनोहर बातें गाकर सुनाता हूँ। रहस्य कहा नहीं जाता, गावउँ, गाया जाता है।

और एक बात और है। वे गरुड़ को ताता कहते हैं। जिसे इसी पन्ने की पहली चौपाई में सब प्रकार से पूज्य कहा था, उसे अब अपना बच्चा कहकर पुकार रहे हैं। यह असंगति नहीं है। यह दूरी का मिटना है। कथा शुरू होने से पहले कहनेवाले और सुननेवाले के बीच का फ़ासला सिमट रहा है, क्योंकि जो कथा आने वाली है वह अपने बारे में है, और अपने बारे में कोई दूर बैठे आदमी से नहीं कहता। पर कथा पर आने से पहले वे एक नियम और रखते हैं, और यह नियम आगे की पूरी कथा की चाबी है।

सुनहु राम कर सहज सुभाऊ । जन अभिमान न राखहिं काऊ॥
संसृत मूल सूलप्रद नाना । सकल सोक दायक अभिमाना॥

चौपाई ९

राम का सहज स्वभाव सुनिये। वे अपने जन में अभिमान कभी नहीं रहने देते। क्योंकि अभिमान जन्म-मरण के संसार का मूल है, नाना प्रकार के शूल देनेवाला, और सारे शोक का दाता। सहज सुभाऊ: स्वभाव, नियम नहीं। यानी यह उनका कोई निर्णय नहीं है जो वे हर बार लें। यह वैसा ही है जैसे आग का गरम होना। और अभिमान के तीन दोष एक पंक्ति में: वह जड़ है, वह काँटा है, वह शोक है। पहले जो प्रश्नमाला चली थी, उसमें मान और मद भी गिने गये थे, पर वहाँ वे एक भीड़ में खड़े थे। यहाँ अभिमान अकेला खड़ा है, और उसे संसार की जड़ कहा गया है। पूरी सेना में से इस एक को चुनकर अलग किया गया है, क्योंकि आगे जो कथा आनी है वह इसी एक की है।

ताते करहिं कृपानिधि दूरी । सेवक पर ममता अति भूरी॥
जिमि सिसु तन बरन होइ गोसाईं । मातु चिराव कठिन की नाईं॥

चौपाई १०

इसीलिये कृपानिधि उसे दूर कर देते हैं, क्योंकि सेवक पर उनकी ममता बहुत ही अधिक है। हे गोसाईं, जैसे बच्चे के शरीर में फोड़ा हो जाये तो माता उसे कठोर हृदय वाली की तरह चिरा डालती है। उपमा को ध्यान से देखिये। कठिन की नाईं, कठोर की तरह, कठोर नहीं। माँ कठोर नहीं है, उसे कुछ देर कठोर दिखना पड़ता है। और चौपाई में कारण पहले रखा गया है और चीरना बाद में। दूर क्यों करते हैं, क्योंकि ममता अधिक है। ममता कम होती तो वह फोड़ा रहने देती, बच्चे को रोता देख उसका हाथ रुक जाता। ममता इतनी अधिक है कि वह चीरना सह लेती है। जो गरुड़ को उलझन में डाला गया, और जो आगे भुशुण्डि को डाला जायेगा, उन दोनों की जड़ इस चौपाई की दूसरी पंक्ति में है।

जदपि प्रथम दुख पावइ रोवइ बाल अधीर।
ब्याधि नास हित जननी गनति न सो सिसु पीर॥ ७४ (क)॥
तिमि रघुपति निज दास कर हरहिं मान हित लागि।
तुलसिदास ऐसे प्रभुहि कस न भजहु भ्रम त्यागि॥ ७४ (ख)॥

दोहा ७४

यद्यपि बच्चा पहले दुख पाता है और अधीर होकर रोता है, तो भी रोग के नाश के लिये माता बच्चे की उस पीड़ा को नहीं गिनती। गनति न, गिनती नहीं। यह नहीं कहा गया कि उसे पीड़ा दिखती नहीं, या वह उसे समझती नहीं। वह उसे गिनती नहीं, क्योंकि गिनने बैठे तो हाथ रुक जाये। और उसी प्रकार रघुपति अपने दास का अभिमान उसके हित के लिये हर लेते हैं। हित लागि, हित के लिये, ठीक वैसे ही जैसे ब्याधि नास हित। माँ के लिये जो शब्द था, वही राम के लिये है।

और फिर वह पंक्ति जिसमें तुलसीदास अपना नाम लेकर बीच में आ जाते हैं: ऐसे प्रभु को भ्रम त्यागकर क्यों नहीं भजते। पूरे प्रसंग में कवि ने अपना मुँह अब तक नहीं खोला था। कौआ बोल रहा था, गरुड़ सुन रहे थे, शिव सुना रहे थे। यहाँ कवि एक क्षण के लिये सबको हटाकर सीधे पढ़नेवाले से बात करता है, और उसने यह क्षण फोड़े और माँ की उपमा के ठीक बाद चुना है। यह चुनाव बताता है कि इस पूरे पन्ने में उसे सबसे ज़रूरी कौन सी बात लगी। सेना नहीं, नट नहीं, विशेषणों की माला नहीं। वह माँ, जो रोते हुए बच्चे का फोड़ा चीरती है और उसकी पीड़ा को गिनती नहीं।

सार: भुशुण्डि अब अपनी बुद्धि भर रघुपति की प्रभुता और अपने मोह की कथा कहने को तैयार होते हैं, और गरुड़ को ताता कहते हैं। राम का सहज स्वभाव है कि वे अपने जन में अभिमान नहीं रहने देते, क्योंकि अभिमान संसार की जड़ और सारे शोक का दाता है। जैसे माँ बच्चे का फोड़ा चीरती है और उसके रोने को गिनती नहीं, वैसे ही राम दास का मान उसके हित के लिये हर लेते हैं। तुलसीदास पूछते हैं, ऐसे प्रभु को भ्रम त्यागकर क्यों न भजें।

आँगन की जूठन

और अब वह कथा। पहली पंक्ति में दो चीज़ें एक साथ रखी गयी हैं: राम की कृपा और अपनी जड़ता। राम कृपा आपनि जड़ताई, एक ही साँस में। भुशुण्डि यह नहीं कहते कि पहले मैं मूर्ख था और फिर कृपा हुई। वे दोनों को जोड़ देते हैं, क्योंकि उनकी कथा में दोनों एक ही घटना के दो नाम हैं। फोड़ा और चीरा अलग नहीं हैं। और वे गरुड़ से कहते हैं, मन लगाकर सुनिये, जैसे कोई कथा से पहले कहता है कि अब जो आ रहा है उसे हल्के में न लें।

फिर वे उस बात से शुरू करते हैं जो बार-बार होती है। जब-जब राम मनुष्य का शरीर धारण करते हैं और भक्तों के लिये बहुत-सी लीलाएँ करते हैं, तब-तब मैं अयोध्यापुरी जाता हूँ और उनकी बाललीला देखकर हर्षित होता हूँ। जब जब, तब तब: यह एक बार की कथा नहीं है, यह हर बार की है। जो भुशुण्डि अभी तक नियम कह रहे थे, उनकी अपनी कथा भी एक नियम की तरह शुरू होती है। वे जन्म का महोत्सव देखते हैं और पाँच वर्ष वहीं रह जाते हैं, लोभाई, लुभाकर। यह वही लोभ है जिसने कुछ ही दोहे पहले ज्ञानी और तपस्वी सबकी विडम्बना की थी। यहाँ वही शब्द एक कौए को पाँच बरस एक आँगन में बाँध रखता है, और इस लोभ को कोई दोष नहीं कहा गया। जिस पर लोभ लगता है, उससे तय होता है कि लोभ क्या करेगा।

इष्टदेव मम बालक रामा । सोभा बपुष कोटि सत कामा॥
निज प्रभु बदन निहारि निहारी । लोचन सुफल करउँ उरगारी॥

चौपाई ११

बालक राम मेरे इष्टदेव हैं, जिनके शरीर में अरबों कामदेवों की शोभा है। हे गरुड़, अपने प्रभु का मुख देख-देखकर मैं नेत्रों को सफल करता हूँ। ठहरिये और सोचिये कि यह कौन कह रहा है। वही जिसने कुछ चौपाइयाँ पहले कहा था: अगुन, निराकार, गिरा गोतीता, वाणी और इन्द्रियों से परे। अब वही कहता है कि मेरा इष्ट एक बालक है, और मैं उसका मुँह देखकर अपनी आँखें सफल करता हूँ। जिसने कहा था कि निर्गुण सुलभ है और सगुण को कोई नहीं जानता, उसने अपने लिये सगुण चुना है, और वह भी उसका सबसे छोटा रूप। निहारि निहारी, देख-देखकर। एक बार देखना काफ़ी नहीं। जो इन्द्रियों से परे है, उसे देखने के लिये इन्द्रियाँ ही चाहिये, और वे भर नहीं पातीं।

और वे बताते हैं कि किस रूप में देखते हैं। छोटे-से कौए का शरीर धरकर, हरि के साथ-साथ फिरकर, वे उनके भाँति-भाँति के बालचरित देखते हैं। लघु बायस बपु: छोटा कौआ। जो कह सके कि ब्रह्मा और शिव माया से डरते हैं, वह अयोध्या के आँगन में सबसे छोटा शरीर चुनता है। कारण सीधा है। बड़ा शरीर होता तो बच्चों के पास जाने न दिया जाता। कौआ आँगन में सबसे साधारण चीज़ है, उसे कोई नहीं भगाता, उस पर कोई ध्यान नहीं देता। इसी नज़र न आने में वह सबसे पास तक पहुँच जाता है। जितना छोटा, उतना निकट।

लरिकाईं जहँ जहँ फिरहिं तहँ तहँ संग उड़ाउँ।
जूठनि परइ अजिर महँ सो उठाइ करि खाउँ॥ ७५ (क)॥
एक बार अतिसय सब चरित किए रघुबीर।
सुमिरत प्रभु लीला सोइ पुलकित भयउ सरीर॥ ७५ (ख)॥

दोहा ७५

लड़कपन में वे जहाँ-जहाँ फिरते हैं, वहाँ-वहाँ मैं साथ-साथ उड़ता हूँ, और आँगन में जो जूठन गिरती है, वही उठाकर खाता हूँ। यह पूरे पन्ने की सबसे नीची पंक्ति है, और इसी में सब कुछ है। पीछे बारह विशेषणों की माला थी, सच्चिदानन्दघन, अखण्ड, अनन्त, अमोघशक्ति, प्रकृति से परे। और उसी को कहनेवाला अब कह रहा है कि मैं वह खाता हूँ जो उस बच्चे के हाथ से आँगन में गिर जाता है। इन दो बातों के बीच कोई विरोध नहीं बताया गया, कोई सफ़ाई नहीं दी गयी। भुशुण्डि के लिये ये दोनों एक ही बात हैं। जिसे पूरा ब्रह्म कहा, उसकी जूठन आँगन में गिरती है, और वह उठा ली जाती है। जो लोग सोचते हैं कि ऊँचा ज्ञान आदमी को ऊपर उठाकर दूर कर देता है, उनके लिये यह पंक्ति है। यहाँ ज्ञान ने कौए को आँगन की धूल तक उतारा है, और वह वहाँ बहुत सुखी है।

और जूठनि शब्द को उसकी पूरी नीचाई के साथ लेना चाहिये। यह प्रसाद नहीं कहा गया, जो कोई हाथ में देता है। यह वह है जो गिर गया, जिसे किसी ने दिया नहीं, जिसे कोई माँगता नहीं। सेना, सेनापति, योद्धा, नट, ब्रह्म, इतने बड़े शब्दों के बाद तुलसी ने अपने सबसे बड़े भक्त के मुँह में सबसे छोटा शब्द रखा है। और जो उसे उठाकर खाता है, वह कोई भूखा कौआ नहीं है। वह वही है जिसने अभी माया की पूरी सेना का नक्शा खींचा था।

दोहे का दूसरा आधा अगले पन्ने का द्वार है। एक बार रघुवीर ने सब चरित्र बहुत अधिकता से किये। और यहाँ कहनेवाला बदलता है। भुशुण्डि की बात बीच में ठहर जाती है और कथा कहनेवाला बताता है कि प्रभु की उस लीला को स्मरण करते ही उनका शरीर पुलकित हो गया। यह वही पुलक है जिससे यह पन्ना खुला था। तब वह गरुड़ की विनय सुनकर आया था, अब एक बच्चे की याद से आया है। जो लीला यहाँ केवल याद की गयी है, वह अगले पन्ने की कथा है। इस पन्ने पर हम उसके बारे में केवल इतना जानते हैं कि उसे याद करने भर से उस कौए के रोंगटे खड़े हो जाते हैं जिसे इतनी बड़ी बातें कहते हुए एक बार भी काँपते नहीं देखा गया।

सार: भुशुण्डि राम की कृपा और अपनी जड़ता की कथा एक साँस में शुरू करते हैं। जब-जब राम मनुष्य का शरीर धरते हैं, वे अयोध्या जाते हैं, जन्म का उत्सव देखते हैं और पाँच वर्ष लुभाकर वहीं रह जाते हैं। बालक राम उनके इष्टदेव हैं, वे छोटे कौए का शरीर धरकर उनके साथ फिरते हैं, जहाँ-जहाँ वे जाते हैं वहाँ साथ उड़ते हैं, और आँगन में गिरी जूठन उठाकर खाते हैं। एक बार रघुवीर ने सब चरित्र बहुत अधिकता से किये, और उसे याद करते ही भुशुण्डि का शरीर पुलकित हो जाता है।

और अन्त में, अपनी ओर

इस प्रसंग को एक साथ पढ़ने पर जो बात सबसे ऊपर रह जाती है, वह इसकी तीन उतरनें हैं। नारद, शिव और ब्रह्मा से उतरकर वह प्रश्न, जिसका उत्तर हर सुननेवाले को अपने भीतर देना पड़ता है। बारह विशेषणों वाले ब्रह्म से उतरकर एक नट, जो राजा का वेष धरकर रोता है और फिर भी वह नहीं है। और नट से उतरकर एक आँगन, एक बच्चा, और एक कौआ जो गिरी हुई जूठन उठाता है। तुलसी हर बार बात को नीचे लाते हैं, और हर बार वह पास आती है। जो ब्रह्म वाणी से परे था, वह दोहा ७५ तक आँगन में खेल रहा है, और उसे देखने के लिये किसी योग की नहीं, एक कौए की आँख की ज़रूरत है।

दूसरी बात उस पुकार की है। इस पन्ने की बारह चौपाइयों और दोहों में गरुड़ को नाम लेकर पुकारा गया है, खगेस, खगराज, खगपति, खगसाईं, उरगारी, बिहंग, नभग नाथ, ताता, गोसाईं। जब भी बात ब्रह्म तक उठती है, तुलसी उसमें एक पुकार डाल देते हैं, और बात फिर से एक चोंच और एक सुननेवाले तक लौट आती है। यह पन्ना कभी नहीं भूलता कि यह एक पहाड़ पर बैठे दो पक्षियों की बातचीत है। जो कुछ भी कहा गया, माया का परिवार, उसकी सेना, सच्चिदानन्दघन, नौका और घूमते बच्चे, सब एक कौए ने एक पक्षी से कहा। और इसीलिये यह कहीं हवा में नहीं उड़ता।

और तीसरी बात उस माँ की है, जिसके बारे में कहा गया कि वह बच्चे की पीड़ा को गिनती नहीं। इस पन्ने पर दो लोगों का मोह है, गरुड़ का, जो कहा जा चुका, और भुशुण्डि का, जो अब कहा जाने वाला है। दोनों के लिये एक ही उपमा रखी गयी है, फोड़ा और चीरा। यानी जो उलझन इस कथा में किसी भक्त को मिलती है, वह दण्ड नहीं है, चिकित्सा है। और चिकित्सा में चीरते समय माँ की जो शक्ल दिखती है, वह कठोर की तरह दिखती है, कठोर होती नहीं। जिसने कभी अपने विश्वास में अचानक कोई फिसलन देखी हो, उसके लिये यह चौपाई एक दूसरा चश्मा देती है: यह भी हो सकता है कि किसी ने फोड़ा देख लिया हो।

इस पन्ने की सबसे बड़ी बात एक आधे दोहे में है, और वह दो वाक्यों को साथ रखने से बनती है। माया समझ लेने पर मिथ्या है। और वह राम की कृपा बिना छूटती नहीं। जिसने यह दोनों बातें एक साथ नहीं पकड़ीं, उसने आधा प्रसंग पढ़ा है। समझ चाहिये, और समझ पर्याप्त नहीं है। इसीलिये कहनेवाले ने इस बात पर पैर गाड़ा, और इसीलिये वह कहनेवाला, जो समझ के शिखर पर बैठा हुआ था, अपनी कथा एक आँगन से शुरू करता है, जहाँ समझ का कोई काम नहीं, केवल पीछे-पीछे उड़ना है और जो गिरे उसे उठा लेना है।

अगला पन्ना उसी आँगन में खुलेगा, और वहाँ भुशुण्डि वह बतायेंगे जो एक बार रघुवीर ने बहुत अधिकता से किया था। इस पन्ने पर उसकी केवल याद है, और उस याद से खड़े हुए रोंगटे। जो इतने बड़े शब्द बिना काँपे कह गया, वह एक बच्चे की याद पर काँप गया है। यही इस कौए की सारी पहचान है।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, उत्तरकाण्ड, दोहा ७० से ७५, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।

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