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राम-राज्य

रामचरितमानस · उत्तरकाण्ड · राम-राज्य

राम-राज्य

तुलसी इस राज्य का वर्णन उन चीज़ों से शुरू करते हैं जो वहाँ नहीं हैं, और छह दोहों तक यही करते चले जाते हैं: दण्ड केवल संन्यासी के हाथ में बचा है, भेद केवल नाचने वालों के सुर-ताल में, और जीत केवल अपने मन की।

यह प्रसंग उस जगह से शुरू होता है जहाँ कहानी अपनी सारी घटनाएँ ख़र्च कर चुकी है। वनवास पूरा हो गया, युद्ध पूरा हो गया, सेनाएँ अपने-अपने घर लौट चुकीं, राज्याभिषेक हो चुका, और अब जो बचा है वह घटना नहीं, हालत है। पिछला प्रसंग अपने आख़िरी दोहे में यह कह चुका है कि सब लोग अपने-अपने वर्ण और आश्रम के धर्म में लगे हुए वेद-मार्ग पर चलते हैं और उन्हें न भय है, न शोक, न रोग। इस प्रसंग की पहली ही चौपाई वहीं से उठती है, और पहला काम जो वह करती है वह कुछ जोड़ना नहीं, कुछ हटाना है।

तुलसी यहाँ जिस तरतीब से चलते हैं वह ध्यान माँगती है। पहले मनुष्य आते हैं और उनके साथ वे सब चीज़ें गिनायी जाती हैं जो उन्हें नहीं सतातीं। फिर समाज आता है, फिर राजनीति की पूरी शब्दावली आती है और उसके शब्द बचे रहते हैं पर उनका काम चला जाता है। फिर पन्ना आदमियों को छोड़ देता है और पेड़, हाथी, सिंह, पक्षी, भौंरे, बेलें, गौएँ, पर्वत, नदियाँ, समुद्र, तालाब, चन्द्रमा, सूर्य और बादल इसमें आ जाते हैं। उसके बाद राजा का अपना घर खुलता है, फिर उसका दिन खुलता है, और अन्त में उसका नगर, जहाँ सोने की दीवारें और हीरों से जड़े किवाड़ हैं। छह दोहों की यह दूरी हिन्दी की सबसे ज़्यादा दोहरायी जाने वाली दूरियों में है।

एक बात पहले से जान लेना ठीक रहेगा। इस पूरे प्रसंग में दशरथ का नाम एक बार भी नहीं आता। चारों भाइयों में से सिर्फ़ भरत और शत्रुघ्न का नाम आता है; लक्ष्मण का नहीं। जिन रीछ-वानरों ने युद्ध लड़ा, उनमें से किसी का नाम यहाँ नहीं है, सिवाय हनुमान के, और वे भी लड़ते हुए नहीं, एक उपवन में बैठकर राम के गुण सुनाते हुए मिलते हैं। यह तुलसीदास का रामचरितमानस है, और यह प्रसंग वही गिनाता है जो इसमें है।

इस प्रसंग के मुख्य किरदार

  • श्रीराम सात समुद्रों से घिरी पृथ्वी के एकमात्र राजा, जो कोसल में हैं, और जिनका इस पूरे प्रसंग में सबसे सधा हुआ काम यह है कि वे सुबह सभा में बैठकर वह कथा सुनते हैं जिसे वे पहले से जानते हैं।
  • सीता जिन्हें यहाँ शोभा की खान, सुशील और विनीत कहा गया है, और जो भरे हुए दास-दासियों वाले घर में सेवा अपने ही हाथों से करती हैं।
  • भरत और शत्रुघ्न जो इस प्रसंग में हनुमान के साथ उपवन में जाकर बैठते हैं और बार-बार विनय करके राम के गुण कहलवाते हैं।
  • हनुमान जो अपनी सुन्दर बुद्धि से राम के गुणों में गोता लगाकर उन्हें कहते हैं, और इस प्रसंग में यही उनका काम है।
  • वसिष्ठ जो प्रतिदिन सभा में वेद और पुराणों की कथा बाँचते हैं, और जिनके श्रोता में स्वयं राम बैठे होते हैं।
  • लव और कुश सीता के दो पुत्र, जिनके नाम इस प्रसंग में आते हैं और जिनकी कोई कथा इसमें नहीं आती।
  • गरुड़ जिन्हें दोहा इक्कीस में नभगेस और एक चौपाई में खगेस कहकर सम्बोधित किया गया है, यानी यह सारा वर्णन एक पक्षी को सुनाया जा रहा है।
  • नारद और सनकादि मुनि जो हर रोज़ अयोध्या आते हैं और नगर देखकर अपना वैराग्य भूल जाते हैं।

पहले वह, जो नहीं है

राम-राज्य का वर्णन एक नकारात्मक वाक्य से खुलता है, और यह बात संयोग नहीं है। पहली चौपाई की पहली छमाही में तीन शब्द एक साथ रखे जाते हैं, दैहिक, दैविक और भौतिक। ये तीनों ताप हैं, यानी दुःख के तीन दरवाज़े: वह जो अपने शरीर से उठता है, वह जो ऊपर से आ पड़ता है, और वह जो आस-पास के जीवों और चीज़ों से मिलता है। इनके बीच कोई चौथा रास्ता नहीं छोड़ा गया। जो भी तकलीफ़ किसी आदमी को हो सकती है, इन तीन में से किसी एक दरवाज़े से ही आयेगी। और वाक्य यह कहता है कि राम के राज में ये किसी को व्यापते नहीं।

दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहि ब्यापा॥
सब नर करहिं परस्पर प्रीती। चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती॥

चौपाई १

पंक्ति की बनावट देखिये। वाक्य का कर्ता दुःख है, राजा नहीं। तीनों ताप पहले आते हैं, राज्य बाद में, और राज्य यहाँ वह जगह है जहाँ पहुँचकर ये तीनों नाकाम हो जाते हैं। इसके ठीक बाद दूसरी छमाही सकारात्मक हो जाती है: सब मनुष्य आपस में प्रीति करते हैं, और अपने-अपने धर्म पर चलते हुए श्रुति की बतायी नीति में लगे रहते हैं। यही जोड़ी पूरे प्रसंग की चाल है। एक चीज़ हटती है, उसकी जगह एक चीज़ रखी जाती है, और दोनों एक ही साँस में आती हैं।

अगली चौपाई में धर्म अपने चारों चरणों पर खड़ा हो जाता है। टीका इन चारों को गिना देती है: सत्य, शौच, दया और दान। फिर एक अजीब जगह पर पाप का निषेध किया जाता है, सपनेहुँ अघ नाहीं। बाज़ार में नहीं, सभा में नहीं, स्वप्न में। जहाँ आदमी का पहरा सबसे ढीला होता है, वहाँ भी कुछ नहीं बचा। और उसी चौपाई की दूसरी छमाही स्त्री और पुरुष दोनों को एक साथ राम-भक्ति में रत बताती है और दोनों को परम गति का अधिकारी कहती है। अधिकारी क़ानून का शब्द है, हक़ का शब्द है। यहाँ मोक्ष किसी को दया में नहीं मिल रहा, वह सबका बनता हुआ हक़ है।

अल्पमृत्यु नहिं कवनिउ पीरा । सब सुंदर सब बिरुज सरीरा॥
नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना। नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना॥

चौपाई २

यह चार छमाहियों की चौपाई है और इसमें निषेध पाँच बार आता है। पर गिनती से ज़्यादा ध्यान इस बात पर दीजिये कि निषेध किन चीज़ों का है, क्योंकि तुलसी यहाँ अस्पष्ट होने से साफ़ इनकार कर रहे हैं। अल्पमृत्यु, यानी छोटी उम्र में मर जाना। पीरा, यानी दर्द। फिर शरीर, जिसका कुरूप होना और रोगी होना दोनों अलग-अलग हटाये गये हैं, क्योंकि सबका शरीर सुन्दर है और सबका नीरोग। फिर दरिद्रता। फिर दुःख। फिर दीनता, जो दुःख से अलग गिनायी गयी है, क्योंकि आदमी दुःखी हुए बिना भी दीन हो सकता है और यह उससे बुरा है। फिर मूर्खता। और अन्त में लक्षणहीन होना। यह किसी सुखी राज्य की मुलायम तस्वीर नहीं है। यह उन नौ चीज़ों की सूची है जिनसे आदमी सचमुच डरता है, एक-एक करके नाम लेकर हटायी गयी।

इसके बाद की चौपाई एक और तरह से काम करती है। चार छमाहियों में सब शब्द पाँच बार आता है: सब निर्दम्भ, सब गुणी, सब गुणज्ञ, सब ज्ञानी, सब कृतज्ञ। और पंक्ति जिस शब्द पर ख़त्म होती है वह सबसे बारीक है, नहिं कपट सयानी। सयानापन मना नहीं किया गया, कपट वाला सयानापन मना किया गया है। तुलसी लोगों की चतुराई नहीं छीनते; पहले ही कह चुके हैं कि नर और नारी सब चतुर हैं। वे उस चतुराई में से सिर्फ़ छल निकाल लेते हैं। इस पूरे प्रसंग की वाणी में सब पंद्रह बार अकेले शब्द की तरह आता है, और दो बार सबन्हि बनकर। निषेध के शब्द भी ठीक पंद्रह बार आते हैं, नहिं, , नाहीं और नाहिं मिलाकर। ये दो ही इस वर्णन के दोनों खम्भे हैं।

राम राज नभगेस सुनु सचराचर जग माहिं।
काल कर्म सुभाव गुन कृत दुख काहुहि नाहिं॥ २१॥

दोहा २१

और यहाँ दोहा वह करता है जो चौपाइयाँ नहीं कर रही थीं। चौपाइयाँ मनुष्यों की बात कर रही थीं। दोहा कहता है सचराचर जग माहिं, यानी जड़ और चेतन, पूरा संसार। और वह दुःख को गिनाता नहीं, दुःख के कारख़ाने का नाम लेता है: काल, कर्म, स्वभाव और गुण। यह नहीं कहा जा रहा कि किसी को दुःख नहीं है। यह कहा जा रहा है कि जिन चार चीज़ों से दुःख बनता है, उनसे बना हुआ दुःख किसी को नहीं होता। कारख़ाना खड़ा है और चल नहीं रहा।

एक और बात इसी दोहे में है जिसे आगे याद रखना पड़ेगा। इसमें एक सम्बोधन है, नभगेस सुनु। नभ में चलने वालों का स्वामी, यानी पक्षियों का राजा। यह सारा वर्णन किसी दरबार में नहीं, किसी राजा को नहीं, एक पक्षी को सुनाया जा रहा है। वाणी में सुनने वाले का नाम है; कहने वाले का नहीं। पोद्दार की टीका कहने वाले का नाम कोष्ठक में जोड़ती है, काकभुशुण्डि, क्योंकि पंक्ति स्वयं वह नहीं देती।

सार: राम-राज्य का वर्णन सबसे पहले तीन तापों के न व्यापने से शुरू होता है, फिर नौ नामज़द डरों को एक-एक करके हटाता है, और दोहा इक्कीस पर आकर मनुष्यों से बढ़कर पूरे जड़-चेतन जगत् तक फैल जाता है, जहाँ काल, कर्म, स्वभाव और गुण से बना दुःख किसी को नहीं होता।

सात समुद्रों का राजा, और यह कहना भी छोटा पड़ता है

अब वर्णन एक क़दम पीछे हटकर अपने ही राजा को नापता है। पृथ्वी को सात समुद्रों की मेखला पहनायी जाती है, यानी करधनी, और उस पूरी पृथ्वी का एक ही राजा बताया जाता है, कोसल का रघुपति। पर वाक्य वहाँ रुकता नहीं। अगली ही छमाही कहती है कि जिनके एक-एक रोम में अनेक भुवन हैं, उनके लिये यह प्रभुता कुछ बहुत नहीं है। और फिर वह पंक्ति आती है जो इस प्रसंग की सबसे बेचैन करने वाली पंक्ति है।

सो महिमा समुझत प्रभु केरी । यह बरनत हीनता घनेरी॥
सोउ महिमा खगेस जिन्ह जानी । फिरि एहिं चरित तिन्हहुँ रति मानी॥

चौपाई ३

यह बरनत हीनता घनेरी। जिसे सात समुद्रों से घिरी पृथ्वी का एकछत्र सम्राट् कहा जा रहा है, उसके बारे में यह कहना ही उसकी बड़ी हीनता है। यानी भाषा का सबसे ऊँचा पद इस विषय के लिये नीचा पड़ रहा है। ध्यान दीजिये कि यह बात वर्णन के बीचोंबीच रखी गयी है, वर्णन शुरू होने से पहले नहीं और ख़त्म होने के बाद नहीं। और इतना कहकर तुलसी वर्णन बन्द नहीं करते। वे अगली ही छमाही में उसका कारण दे देते हैं: जिन्होंने वह महिमा जान भी ली है, वे भी लौटकर इसी चरित में प्रेम मानते हैं।

इसके आगे वाली चौपाई इसी को और कस देती है। उस महिमा को जानने का फल भी यही लीला है, और यह बात कहने वाले कौन हैं, यह भी बता दिया गया है: महा मुनिबर दमसीला, यानी इन्द्रियों का दमन करने वाले श्रेष्ठ महामुनि। गवाही उन्हीं से लिवायी जा रही है जिनके इस तरह की किसी चीज़ पर मुग्ध होने की सम्भावना सबसे कम है। और उसी चौपाई की दूसरी छमाही एक ऐसा वाक्य रखती है जो इस पन्ने के आख़िरी दोहे तक जाकर लौटेगा: राम-राज्य की सुख-सम्पदा का वर्णन फनीस और सारदा भी नहीं कर सकते। एक के हज़ार मुँह हैं, दूसरी स्वयं वाणी हैं। बोलने के लिये जो दो सबसे ज़्यादा तैयार हैं, नाम उन्हीं दो का लिया गया है, और वह भी न कर सकने के लिये।

इसके बाद वर्णन घर के भीतर घुसता है। सब उदार हैं, सब परोपकारी हैं, नर और नारी सब ब्राह्मणों के चरणों के सेवक हैं। सब पुरुष एकपत्नीव्रती हैं और स्त्रियाँ मन, वचन और कर्म तीनों से पति का हित करने वाली हैं। और फिर, इसी पड़ोस में, इस प्रसंग का सबसे ज़्यादा दोहराया जाने वाला दोहा आ खड़ा होता है।

दंड जतिन्ह कर भेद जहँ नर्तक नृत्य समाज।
जीतहु मनहि सुनिअ अस रामचंद्र कें राज॥ २२॥

दोहा २२

यह दोहा वह नहीं कहता जो लोग अक्सर इससे सुन लेते हैं। यह नहीं कहता कि राज्य में दण्ड नहीं है। यह कहता है कि दंड शब्द अब भी चालू है और उसने अपना मालिक बदल लिया है: वह अब संन्यासियों के हाथ में रहने वाली लाठी है। भेद शब्द भी चालू है और अब वह नाचने वालों के समाज में है, जहाँ भेद का मतलब सुर और ताल का फ़र्क़ है। और जीतहु शब्द भी सुनायी पड़ता है, पर वह मन के लिये कहा जाता है। पोद्दार की टीका इसके पीछे राजनीति की पूरी चौकड़ी खड़ी कर देती है, साम, दान, दण्ड और भेद। वाणी उन चारों में से दो शब्द अपने पास रखती है और एक तीसरा, जीत, अपनी ओर से जोड़ देती है।

यह तरकीब किसी घोषणा से कहीं ज़्यादा मज़बूत है। अगर कहा जाता कि यहाँ कोई किसी को दण्ड नहीं देता, तो वह एक दावा होता और उस पर बहस हो सकती थी। पर शब्दकोश गवाही देता है। जिस समाज में दण्ड देने का काम बचा नहीं, वहाँ दण्ड शब्द बेकार पड़ा रहता और किसी दूसरे पेशे में जा लगता, और तुलसी ठीक यही दिखाते हैं। अभाव को साबित करने के लिये उन्होंने शब्दों को हटाया नहीं; उन्हें बचा रखा और उनका काम छीन लिया।

सार: वर्णन के बीच में तुलसी रुककर कहते हैं कि सात समुद्रों की पृथ्वी का राजा कहना भी इस विषय के लिये छोटा पड़ता है, और फिर भी वर्णन जारी रखते हैं, क्योंकि उस महिमा को जान लेने वालों का फल भी यही लीला है। दोहा बाईस राजनीति के शब्द बचा लेता है और उनका काम हटा देता है।

जिनसे माँगना पड़ता है

यहाँ से वाक्यों में से आदमी निकल जाते हैं। जो कुछ आगे आता है वह पेड़, वन, हाथी, सिंह, पक्षी, पशु, भौंरे, बेलें, गौएँ, धरती, पर्वत, नदियाँ, समुद्र, तालाब, दिशाएँ, चन्द्रमा, सूर्य और बादल हैं। और इस पूरे हिस्से में ऋतु शब्द एक बार नहीं आता, जबकि ऋतुओं की बात लगातार होती रहती है।

फूलहिं फरहिं सदा तरु कानन। रहहिं एक सँग गज पंचानन॥
खग मृग सहज बयरु बिसराई । सबन्हि परस्पर प्रीति बढ़ाई॥

चौपाई ४

फूलहिं फरहिं सदा तरु कानन। फूलना और फलना एक साथ, और हमेशा। यही ऋतुओं का हिसाब है, बिना ऋतु का नाम लिये। फिर हाथी और सिंह एक साथ रहते हैं। और इसके बाद वह छमाही आती है जिसके शब्द चुनकर रखे गये हैं: पक्षी और पशु अपना सहज बयरु भुलाकर आपस में प्रीति बढ़ा लेते हैं। सहज का मतलब है जो साथ ही पैदा हुआ हो, जो स्वभाव में गुँथा हो। और उस सहज को जीता नहीं गया, न मिटाया गया। उसे भुला दिया गया। क्रिया बिसराई है, और यह क्रिया इस प्रसंग के बिलकुल आख़िर में एक बार फिर आयेगी, दूसरे लोगों के साथ।

अगली चौपाई में पक्षी कूजते हैं और पशुओं के झुंड वन में निर्भय चरते और आनन्द करते हैं। शब्द अभय है। पिछले प्रसंग का आख़िरी दोहा यही बात मनुष्यों के लिये कह चुका था; अब वही बात वन के जानवरों तक पहुँच जाती है। हवा शीतल, सुगन्धित और मन्द चलती है, और भौंरा मकरन्द लेकर चलता हुआ गुंजार करता जाता है। यह ब्योरा छोटा है पर निठल्ला नहीं: भौंरा रस ले भी रहा है और गा भी रहा है, दोनों एक साथ।

लता बिटप मागें मधु चवहीं । मनभावतो धेनु पय स्रवहीं॥
ससि संपन्न सदा रह धरनी। त्रेताँ भइ कृतजुग कै करनी॥

चौपाई ५

अब उस शब्द पर ठहरिये जिस पर यह पूरा हिस्सा टिका है: मागें। बेलें और वृक्ष मधु टपकाते हैं, पर माँगने पर। यह अपने आप बहती हुई अति नहीं है। यह देने वाला है जो पुकार की राह देखता है। गौ भी मनचाहा दूध देती है, यानी जितना चाहिये उतना, न कम न ज़्यादा। धरती सदा खेती से भरी रहती है। और फिर एक पंक्ति युग का हिसाब कर देती है: त्रेता में सत्ययुग की करनी हो गयी। नाम नहीं बदला, करनी बदल गयी। युग वही है, उसका बरताव दूसरा है।

इसके बाद वाली चौपाई एक कारण देती है, और कारण देना यहाँ अनोखा है। पर्वतों ने तरह-तरह की मणियों की खानें प्रकट कर दीं, और क्यों, यह दूसरी छमाही में लिखा है: जगदातमा भूप जग जानी। जगत् के आत्मा को जगत् का राजा जान लिया, इसलिये। न कोई आदेश, न कोई खुदाई, न कोई कर। पहचान हुई और खानें खुल गयीं। नदियाँ भी श्रेष्ठ, शीतल, निर्मल और स्वाद में सुखकारी जल बहाने लगीं।

सागर निज मरजादाँ रहहीं । डारहिं रत्न तटन्हि नर लहहीं॥
सरसिज संकुल सकल तड़ागा। अति प्रसन्न दस दिसा बिभागा॥

चौपाई ६

सागर निज मरजादाँ रहहीं। मर्यादा यहाँ किनारे की हद है, और यह बात उसी सूची में रखी गयी है जिसमें लोगों के आचरण की बातें रखी गयी थीं। समुद्र का अपनी हद में रहना यहाँ एक गुण है, किसी भूगोल का तथ्य नहीं। और उसके तुरन्त बाद: वे लहरों से किनारों पर रत्न डाल देते हैं और मनुष्य उन्हें पा जाते हैं। नर लहहीं, पा जाते हैं। कोई गोता नहीं लगाता, कोई खींचकर नहीं निकालता। धन किनारे तक चलकर आता है। तालाब कमलों से भरे हैं और दसों दिशाओं के विभाग अत्यन्त प्रसन्न हैं, यानी प्रसन्नता का श्रेय अब जगह को दिया जा रहा है, वहाँ रहने वालों को नहीं।

बिधु महि पूर मयूखन्हि रबि तप जेतनेहि काज।
मागें बारिद देहिं जल रामचंद्र कें राज॥ २३॥

दोहा २३

यह दोहा तीन नाप देता है। चन्द्रमा अपनी किरणों से पृथ्वी को भर देता है। सूर्य जेतनेहि काज तपता है, यानी जितने की ज़रूरत है उतना। और बादल माँगने पर जल देते हैं। नौ पंक्तियों के भीतर मागें दूसरी बार आ गया, और दोनों बार देने वाला तब तक रुका हुआ है जब तक कहा न जाये। पूरे प्रसंग में यही दो जगह हैं जहाँ प्रकृति की उदारता की एक शर्त बतायी गयी है, और शर्त यह है कि उससे कहा जाये।

एक और बात इसी दोहे के बारे में। यह लगातार दूसरा दोहा है जो रामचंद्र कें राज पर ख़त्म होता है। इस प्रसंग के छह दोहों में सिर्फ़ ये दो इस तरह बँधे हैं, बाईस और तेईस। दोहा इक्कीस राम राज से शुरू होता है और दोहा छब्बीस नृप राम बिराज पर ख़त्म होता है, पर चौबीस और पच्चीस में यह नाम आता ही नहीं। यानी यह टेक पूरे वर्णन पर नहीं, उसके ठीक बीच वाले जोड़ पर बैठी है, जहाँ बात राजनीति से उठकर मौसम तक चली जाती है।

सार: वर्णन मनुष्यों को छोड़कर प्रकृति में चला जाता है। पेड़ हमेशा फूलते और फलते हैं, हाथी और सिंह सहज वैर भुलाकर साथ रहते हैं, पर्वत राजा को पहचानकर खानें खोल देते हैं, समुद्र अपनी मर्यादा में रहते हैं, और बेलें तथा बादल दोनों तभी देते हैं जब उनसे माँगा जाये।

करोड़ों यज्ञ एक छमाही में, और सीता चार चौपाइयों में

अब पन्ना राजा के अपने घर की ओर मुड़ता है, और मुड़ते ही एक बात दिखाई दे जाती है जिसे गिना जा सकता है। इस पूरे प्रसंग में राजा का कोई शासकीय काम एक ही जगह आता है, और वह एक छमाही में निपट जाता है।

कोटिन्ह बाजिमेध प्रभु कीन्हे । दान अनेक द्विजन्ह कहँ दीन्हे॥
श्रुति पथ पालक धर्म धुरंधर। गुनातीत अरु भोग पुरंदर॥

चौपाई ७

करोड़ों अश्वमेध और ब्राह्मणों को अनेक दान, दोनों मिलाकर आधी पंक्ति। जो अपने आप में एक पूरी कथा है, वह यहाँ गिनती की तरह रख दिया गया है और आगे बढ़ा दिया गया है। और उसके बाद वाली छमाही दो चीज़ों को बग़ल में बैठा देती है और उनके बीच कोई पुल नहीं बनाती: गुनातीत अरु भोग पुरंदर। तीनों गुणों से परे, और भोग में इन्द्र के समान। न यह कहा गया कि भोग असल में भोग नहीं है, न यह कि गुणातीत होना कोई मुहावरा है। दोनों बातें एक ही साँस में कह दी गयीं और वहीं छोड़ दी गयीं।

इसके बाद सीता आती हैं, और उन्हें इस प्रसंग में चार चौपाइयाँ और एक पूरा दोहा मिलता है, जो राजा को मिली जगह से ज़्यादा है। पहले परिचय: शोभा की खान, सुशील, विनीत, पति के अनुकूल। फिर एक ज़रूरी बात, जो सेवा के वर्णन से पहले रखी गयी है: वे कृपासिन्धु की प्रभुता को जानती हैं। यानी जो आगे आ रहा है वह अनजाने में की गयी सेवा नहीं है। जानकर की गयी है।

फिर वाणी स्वयं एक आपत्ति उठाती है और उसका उत्तर देती है। जद्यपि, यद्यपि, घर में बहुत से दास और दासियाँ हैं और वे सब सेवा की विधि में कुशल हैं; तो भी वे घर की परिचर्या अपने ही हाथों से करती हैं और श्रीरामचन्द्र की आज्ञा का अनुसरण करती हैं। यह जद्यपि इस प्रसंग में दो बार आता है, और दूसरी बार वह स्वयं राम के लिये आयेगा। दोनों बार वह एक ही काम करता है: पाठक के मन में जो सवाल उठने वाला था, उसे पहले ही पंक्ति में ले आता है।

अगली चौपाई में एक शब्द-जोड़ी दोहरा दी जाती है और वही उसका जोड़ है। दासियाँ सेवा बिधि में कुशल बतायी गयी थीं; अब सीता के बारे में कहा जाता है कि जिस तरह से कृपासिन्धु सुख मानें, वही वे करती हैं, क्योंकि वे सेवा बिधि जानइ। एक ही शब्द नौकरों के हुनर के लिये और घर की स्वामिनी के लिये, बिना किसी टिप्पणी के। और उसी चौपाई का अन्त: कौसल्या आदि सब सासुओं की वे घर में सेवा करती हैं, और उन्हें न मान है न मद।

इसके बाद की पंक्ति में सम्बोधन बदल जाता है। वहाँ बात उमा से कही जा रही है, और सीता को रमा कहकर ब्रह्मा आदि से वन्दित, जगदम्बा और सदा अनिन्दित बताया जाता है। इसे ध्यान में रखिये: कुछ ही पंक्ति पहले सुनने वाला एक पक्षी था और कहने वाले का नाम वाणी में नहीं था; अब सुनने वाली उमा हैं और कहने वाले का नाम अब भी वाणी में नहीं है। दोनों बार पोद्दार की टीका ही कोष्ठक में बताती है कि बोल कौन रहा है। यह कथा दो बातचीतों पर लदकर आ रही है और वाणी हर बार सिर्फ़ सुनने वाले का नाम लेती है।

जासु कृपा कटाच्छु सुर चाहत चितव न सोइ।
राम पदारबिंद रति करति सुभावहि खोइ॥ २४॥

दोहा २४

यह दोहा इस प्रसंग में अपनी तरह का अकेला है। जिनके कृपाकटाक्ष को देवता चाहते हैं और जो उनकी ओर देखती तक नहीं, वे राम के चरणकमलों में प्रीति करती हैं, और करती हैं सुभावहि खोइ। अपना स्वभाव खोकर। क्रिया खोना है। इस पूरे वर्णन में, जहाँ किसी के पास किसी चीज़ की कमी नहीं है, जहाँ समुद्र रत्न किनारे पर रख जाते हैं और पर्वत खानें खोल देते हैं, सिर्फ़ एक जगह कोई कुछ छोड़ता है। और छोड़ने वाली वही हैं जिनके पास सबसे ज़्यादा था।

सार: राजा का शासकीय काम आधी पंक्ति में निपट जाता है और सीता को चार चौपाइयाँ तथा एक दोहा मिलता है। घर दास-दासियों से भरा है फिर भी वे सेवा अपने हाथों से करती हैं, और दोहा चौबीस कहता है कि जिनकी कृपादृष्टि देवता माँगते हैं, वे अपना स्वभाव खोकर राम के चरणों में प्रीति करती हैं।

जो भाई कुछ काम माँगते हैं

भाइयों का हिस्सा छोटा है और उसमें एक ब्योरा ऐसा है जिसे पढ़कर पूरा प्रसंग एक बार और खुलता है।

सेवहिं सानकूल सब भाई । राम चरन रति अति अधिकाई॥
प्रभु मुख कमल बिलोकत रहहीं । कबहुँ कृपाल हमहि कछु कहहीं॥

चौपाई ८

पहली छमाही सीधी है: सब भाई अनुकूल रहकर सेवा करते हैं और राम के चरणों में उनकी अत्यन्त प्रीति है। दूसरी छमाही वह जगह है जहाँ रुकना चाहिये। वे प्रभु का मुखकमल देखते रहते हैं, इस उम्मीद में कि कृपालु कभी उनसे कुछ कहें। यानी वे इनाम की राह नहीं देख रहे। वे काम की राह देख रहे हैं। इस पन्ने पर अब तक दो बार बताया जा चुका है कि इस राज्य में देने वाला माँगे जाने का इन्तज़ार करता है, बेलें भी और बादल भी। यहाँ वही इन्तज़ार उलटी ओर से दिखता है: कोई है जो चाहता है कि उससे माँगा जाये।

फिर राम की ओर से भी वही प्रीति लौटती है, और उसके साथ एक बात जुड़ी है: वे भाइयों को नाना प्रकार की नीति सिखाते हैं। उसी राज्य में, जिसके दोहे ने अभी-अभी नीति के शब्दों को बेकार बताकर दूसरे पेशों में भेज दिया था, नीति पढ़ायी जा रही है। नगर के लोग हर्षित रहते हैं और ऐसे भोग भोगते हैं जो देवताओं को भी दुर्लभ हैं।

और फिर एक पंक्ति जो चुपचाप गुज़र जाती है। ये लोग दिन-रात ब्रह्मा को मनाते रहते हैं, और माँगते क्या हैं, यह उसी छमाही में है: रघुवीर के चरणों में प्रीति। जो लोग उसी नगर में रहते हैं, जो उन्हें रोज़ देखते हैं, जो उनके साथ भोजन करते हैं, वे रात-दिन एक देवता से यही माँग रहे हैं कि उनसे प्रेम बना रहे। नज़दीकी को यहाँ प्रीति की ज़मानत नहीं माना गया।

अहनिसि बिधिहि मनावत रहहीं । श्रीरघुबीर चरन रति चहहीं॥
दुइ सुत सुंदर सीताँ जाए । लव कुस बेद पुरानन्ह गाए॥

चौपाई ९

सीता के दो सुन्दर पुत्र हुए, लव और कुश, जिनका वेद-पुराणों ने गान किया। दोनों विजयी, विनयी, गुणों के मन्दिर और इतने सुन्दर मानो हरि के प्रतिबिम्ब हों। और फिर एक ही छमाही में पूरी अगली पीढ़ी आ जाती है: दुइ दुइ सुत सब भ्रातन्ह केरे। सब भाइयों के दो-दो पुत्र। आठ लड़के आते हैं और उनमें से छह के नाम नहीं लिये जाते। अयोध्या का भविष्य यहाँ गिनती की तरह रखा गया है, डेढ़ पंक्ति में, और पन्ना आगे बढ़ जाता है। लव और कुश यहाँ जन्म लेते हैं और इस प्रसंग में उनका इसके आगे कोई वृत्तान्त नहीं आता।

ग्यान गिरा गोतीत अज माया मन गुन पार।
सोइ सच्चिदानंद घन कर नर चरित उदार॥ २५॥

दोहा २५

अब देखिये यह दोहा कहाँ रखा गया है। ठीक पुत्रों के जन्म के बाद। जिस विषय की बात हो रही थी वह सबसे मनुष्य जैसी बात थी, बच्चे। और उसके तुरन्त बाद कहा जाता है कि जो ज्ञान, वाणी और इन्द्रियों से परे है, जो अज है, यानी अजन्मा, जो माया, मन और गुणों के पार है, वही सच्चिदानन्दघन यह उदार नर-चरित करता है। अजन्मा को जन्मों की पंक्ति से सटाकर रख दिया गया है, और बीच में कोई सफ़ाई नहीं दी गयी।

और शब्द उदार पर ग़ौर कीजिये। नर-चरित को छोटा, या ओढ़ा हुआ, या दिखावटी नहीं कहा गया। उसे उदार कहा गया है, यानी बड़े दिल का। यह उसी बात की दूसरी क़िस्त है जो कुछ दोहे पहले कही गयी थी, कि महिमा जान लेने वाले भी लौटकर इसी चरित में प्रेम मानते हैं। पहले कहा गया था कि जानने वाले इसे चाहते हैं; अब कहा जा रहा है कि करने वाला इसे उदारता से करता है।

सार: भाई राम का मुख इसलिये देखते रहते हैं कि कभी वे उनसे कोई काम कह दें, और लोग रात-दिन ब्रह्मा से एक ही वर माँगते हैं, राम के चरणों में प्रीति। लव और कुश का जन्म डेढ़ पंक्ति में आता है, और उसके तुरन्त बाद दोहा पच्चीस कहता है कि यह सारा नर-चरित अजन्मा का किया हुआ है।

दिन का हिसाब, और दिन का न बीतना

यहाँ पूरे प्रसंग की इकलौती घड़ी लगती है। अब तक सब कुछ हालत थी, अवस्था थी; अब पहली बार एक दिनचर्या आती है, और वह सुबह से शुरू होती है।

प्रातकाल सरऊ करि मज्जन । बैठहिं सभाँ संग द्विज सज्जन॥
बेद पुरान बसिष्ट बखानहिं । सुनहिं राम जद्यपि सब जानहिं॥

चौपाई १०

प्रातःकाल सरयू में स्नान, फिर ब्राह्मणों और सज्जनों के साथ सभा में बैठना। और सभा में क्या होता है: वसिष्ठ वेद और पुराणों की कथा बाँचते हैं और राम सुनते हैं, जद्यपि सब जानहिं। यह वही जद्यपि है जो थोड़ी देर पहले दास-दासियों के लिये आया था, और दोनों बार वह वही काम कर रहा है। सात समुद्रों वाली पृथ्वी का इकलौता राजा अपनी सुबह उस कथा को सुनने में बिताता है जो उसे पहले से आती है। इस दिनचर्या में उसका पहला काम कुछ करना नहीं, कुछ लेना है।

फिर वे भाइयों को साथ लेकर भोजन करते हैं, और यह देखकर सब माताएँ सुख से भर जाती हैं। माताओं को इस प्रसंग में न कोई वाक्य दिया गया है, न कोई काम। उन्हें सिर्फ़ एक दृश्य दिया गया है, और वही काफ़ी माना गया है।

उसके बाद भरत और शत्रुघ्न दोनों भाई पवनसुत के साथ उपवन में जाते हैं, वहाँ बैठकर राम के गुणों की कथा पूछते हैं, और हनुमान अपनी सुन्दर बुद्धि से उन गुणों में गोता लगाकर उन्हें कहते हैं। वह क्रिया अवगाहा है, डुबकी लगाना। और फिर: निर्मल गुणों को सुनकर वे बहुत सुख पाते हैं और बार-बार विनय करके और कहलवाते हैं। इस राज्य में, जहाँ राम उसी नगर में हैं और थोड़ी देर पहले उनके साथ भोजन हो चुका है, भाइयों का मनपसन्द काम यह है कि कोई उन्हीं के बारे में सुनाये, और सुनाता ही रहे।

और यह सिर्फ़ महल की आदत नहीं है। अगली चौपाई कहती है कि सबके यहाँ घर-घर में पुराणों और अनेक प्रकार के पवित्र राम-चरित की कथा होती है, स्त्री-पुरुष सब राम का गुणगान करते हैं, और उन्हें दिन-रात का बीतना भी पता नहीं चलता। ध्यान दीजिये कि यह पन्ना चार पंक्ति पहले एक घड़ी लगा चुका था, सुबह का स्नान, सभा, भोजन, उपवन। और अब वही पन्ना कहता है कि समय बीतना महसूस ही नहीं होता। दोनों बातें एक साथ सच हैं, और पहली बात दूसरी के लिये ही लगायी गयी थी।

अवधपुरी बासिन्ह कर सुख संपदा समाज।
सहस सेष नहिं कहि सकहिं जहँ नृप राम बिराज॥ २६॥

दोहा २६

यह दोहा उस घेरे को बन्द करता है जो बहुत पहले खुला था। तब कहा गया था कि राम-राज्य की सुख-सम्पदा को फणीश और शारदा नहीं कह सकते। अब हज़ार शेष नहीं कह सकते। एक से हज़ार तक की यह बढ़ोतरी इसी पन्ने के भीतर हुई है। और जिसका वर्णन नहीं हो पा रहा, वह राजा नहीं है: वह अवधपुरी बासिन्ह कर सुख संपदा समाज है, वहाँ के रहने वालों का सुख। राजा पंक्ति के आख़िरी हिस्से में एक कारण की तरह आता है, जहँ नृप राम बिराज

सार: प्रसंग की इकलौती दिनचर्या यहाँ आती है: सरयू-स्नान, सभा, वसिष्ठ की कथा जिसे राम सब जानते हुए भी सुनते हैं, भाइयों के साथ भोजन, और उपवन में हनुमान से राम के गुण सुनना। और उसके तुरन्त बाद यह कि लोगों को दिन-रात का बीतना पता नहीं चलता।

जिस नगर को देखकर वैराग्य भूल जाता है

आख़िरी हिस्सा नगर का है, और वह नगर की ईंटों से नहीं, नगर देखने वालों से शुरू होता है।

नारदादि सनकादि मुनीसा । दरसन लागि कोसलाधीसा॥
दिन प्रति सकल अजोध्या आवहिं । देखि नगरु बिरागु बिसरावहिं॥

चौपाई ११

नारद आदि और सनक आदि मुनीश्वर कोसलाधीश के दर्शन के लिये हर रोज़ अयोध्या आते हैं। दिन प्रति, रोज़, यानी यह कोई एक बार का दर्शन नहीं है, आदत है। और आकर वे क्या करते हैं: नगर देखकर वैराग्य भुला देते हैं। क्रिया बिसरावहिं है। इसी वर्णन की शुरुआत में पक्षी और पशु अपना सहज वैर भुला चुके थे, और वहाँ भी यही क्रिया थी, बिसराई। एक ही क्रिया, वर्णन के दोनों सिरों पर, और दोनों बार भूली जाने वाली चीज़ वही है जिससे भूलने वाले की पहचान बनी थी। सिंह से उसका वैर और मुनि से उसका वैराग्य।

इसके बाद नगर का ब्योरा आता है, और वह लगातार पत्थर और धातु का ब्योरा है: सोने और मणियों से बनी अटारियाँ, अनेक रंगों की ढली हुई सुन्दर फ़र्शें, नगर के चारों ओर परकोटा और उस पर रंग-बिरंगे कँगूरे। और फिर उन कँगूरों पर एक उपमा रखी जाती है जो इस पूरे प्रसंग में अकेली है। वे ऐसे लगते हैं मानो नवग्रहों ने बड़ी सेना बनाकर आकर अमरावती को घेर लिया हो।

इस उपमा को ठहरकर देखिये। इस पन्ने पर, जहाँ किसी से किसी का वैर नहीं है, जहाँ दण्ड संन्यासी की लाठी बनकर रह गया है और भेद नाचने वालों के सुर-ताल में चला गया है, एकमात्र सेना यही है, और वह एक तुलना है। और जिसे वह घेरती है वह इन्द्र की राजधानी है। नगर की ऊँचाई नापने के लिये आकाश का सबसे ऊँचा नगर लाया गया और उसे घेरे में ले लिया गया।

फिर सड़कों पर अनेक रंगों के काँचों की गच ढाली हुई बतायी जाती है, जिसे देखकर श्रेष्ठ मुनियों के मन नाच उठते हैं। कुछ ही पंक्तियों में यह दूसरी बार है कि यह नगर उन्हीं लोगों का धीरज तोड़ता है जिनका धीरज सबसे पक्का माना जाता है, और दोनों बार नगर की नाप उसी से ली गयी है। इसके बाद उज्ज्वल महल आकाश को चूमते हैं और उन पर के कलश मानो सूर्य और चन्द्रमा की दीप्ति की निन्दा करते हैं। कुछ दोहे पहले इसी पन्ने ने कहा था कि सूर्य उतना ही तपता है जितने का काम है; अब उसी सूर्य की चमक को छतों के कलश नीचा दिखा रहे हैं।

चौपाई का अन्त इस पर होता है कि घर-घर में मणियों के दीपक शोभा पा रहे हैं। और अगला छन्द ठीक उन्हीं शब्दों से उठता है।

मनि दीप राजहिं भवन भ्राजहिं देहरीं बिद्रुम रची।
मनि खंभ भीति बिरंचि बिरची कनक मनि मरकत खची॥
सुंदर मनोहर मंदिरायत अजिर रुचिर फटिक रचे।
प्रति द्वार द्वार कपाट पुरट बनाइ बहु बज्रन्हि खचे॥

छन्द

छन्द की पहली कड़ी मनि दीप राजहिं है, यानी वह चौपाई के आख़िरी शब्दों को हाथ में लेकर आगे चल देता है। फिर मूँगों की देहलियाँ, मणियों के खम्भे, सोने की दीवारें जिनमें मरकत जड़ा है और जिन्हें देखकर लगता है कि ब्रह्मा ने ख़ास तौर पर बनायी हों, विशाल और मनोहर महल, उनमें स्फटिक के आँगन, और हर दरवाज़े पर सोने के किवाड़ जिनमें बहुत से हीरे जड़े हैं।

और यहीं यह प्रसंग ख़त्म हो जाता है। जो वर्णन तीनों तापों से और पूरे जड़-चेतन जगत् से शुरू हुआ था, वह चौखट और किवाड़ पर आकर रुकता है। रुकता भी पूरा नहीं: नगर की बात आगे चलती रहती है और अगले प्रसंग में जाती है। पन्ना बीच वाक्य में नहीं छूटता, पर बीच नगर में ज़रूर छूटता है।

सार: नारद और सनकादि मुनि रोज़ अयोध्या आते हैं और नगर देखकर अपना वैराग्य भुला देते हैं, उसी क्रिया से जिससे वन के पशुओं ने अपना सहज वैर भुलाया था। नगर के कँगूरे नवग्रहों की सेना जैसे लगते हैं जिसने अमरावती को घेर लिया हो, और प्रसंग सोने के किवाड़ों पर आकर रुक जाता है।

और अन्त में, अपनी ओर

इस प्रसंग को दो चीज़ें उठाये हुए हैं। एक है सब, जो इसकी वाणी में पंद्रह बार आता है, और दूसरी है निषेध, जो नहिं, , नाहीं और नाहिं के रूप में ठीक पंद्रह बार आता है। बाक़ी सब इन्हीं दो के आस-पास लगा हुआ सामान है। और इन दोनों में से ज़्यादा मेहनत निषेध ने की है, क्योंकि जो चीज़ें हटायी जा रही हैं वे कभी धुँधली नहीं हैं। कहीं यह नहीं कहा गया कि दुःख नहीं है। कहा गया है कि छोटी उम्र में मृत्यु नहीं होती, किसी को पीड़ा नहीं होती, कोई शरीर कुरूप नहीं, कोई रोगी नहीं, कोई दरिद्र नहीं, कोई दुःखी नहीं, कोई दीन नहीं, कोई मूर्ख नहीं, कोई लक्षणहीन नहीं, और किसी की चतुराई में कपट नहीं। नौ चीज़ें एक ही चौपाई में, और एक दसवीं अगली चौपाई में, और हर नाम किसी सचमुच के डर का नाम है।

दूसरी चीज़ माँगने की है, और वह इस पन्ने पर चार जगह से आती है। बेल और वृक्ष माँगने पर मधु टपकाते हैं। बादल माँगने पर जल देते हैं। भाई राम का मुँह इसलिये ताकते रहते हैं कि कभी वे कोई काम कह दें। और लोग रात-दिन ब्रह्मा को मनाते हैं, इसलिये नहीं कि कुछ मिल जाये, बल्कि इसलिये कि राम के चरणों में प्रीति बनी रहे। इस राज्य में सब कुछ उपलब्ध है और कुछ भी छीना हुआ नहीं है। जो मिलता है, कहने पर मिलता है। यह उदारता का तरीक़ा है, और तुलसी का पूरा ज़ोर इसी तरीक़े पर है।

और तीसरी चीज़ भूलने की है। इस वर्णन की दोनों हदों पर एक ही क्रिया खड़ी है। शुरू में पशु और पक्षी अपना सहज वैर भुला देते हैं। अन्त में नारद और सनकादि अपना वैराग्य भुला देते हैं। सिंह की पहचान उसका वैर है और मुनि की पहचान उसका वैराग्य, और दोनों के बीच में जो कुछ है, वही यह पूरा राज्य है। साथ ही इस राज्य के बारे में दो बार यही कहा गया है कि यह कहा नहीं जा सकता: पहले शेष और शारदा से, फिर हज़ार शेषों से। इन दोनों घोषणाओं के बीच हिन्दी की कुछ सबसे ज़्यादा दोहरायी जाने वाली पंक्तियाँ पड़ी हुई हैं।

आज इस नाम का इस्तेमाल ज़्यादातर शासन के वादे की तरह होता है, और तुलसी ने जो लिखा है उसका बड़ा हिस्सा वह है जिसका शासन से कोई लेना-देना नहीं। पेड़ों का हमेशा फूलना और फलना, हाथी और सिंह का एक साथ बैठना, सूर्य का नाप से तपना, बादलों का माँगने पर बरसना, किसी का कुरूप न होना, किसी का कम उम्र में न मरना, रानी का भरे हुए घर में अपने हाथ से काम करना, और मुनियों का नगर देखकर अपना वैराग्य भूल जाना। जो हिस्सा शासन का है वह छोटा है और बहुत सटीक है: दण्ड, भेद और जीत, तीन शब्द जो बचे हुए हैं और जिनका काम बदल गया है। बाक़ी सब कुछ किसी आदेश से नहीं होता। वह पहचान लेने से होता है, माँगे जाने से होता है, और भूल जाने से होता है।

और जो तस्वीर अन्त में हाथ लगती है वह दो जगहों की है। एक सभा, जहाँ पूरी पृथ्वी का राजा सुबह-सुबह बैठकर वह कथा सुन रहा है जो उसे पहले से आती है। और एक उपवन, जहाँ दो भाई उस आदमी के बारे में सुन रहे हैं जिसके साथ वे थोड़ी देर पहले भोजन कर चुके हैं, और सुनाने वाले से बार-बार विनय करके और सुना रहे हैं। इस राज्य में सुख के साथ जो किया जाता है, वह यही है। घर-घर में यही हो रहा है, और उसी में दिन और रात का बीतना किसी को पता नहीं चलता।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, उत्तरकाण्ड, दोहा २१ से २६, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।

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