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रामचरितमानसउत्तरकाण्डप्रसंग 5
राम-राज्य
इस राज्य का वर्णन उन चीज़ों से शुरू होता है जो वहाँ नहीं हैं। देर तक यही चलता रहता है: दण्ड केवल संन्यासी के हाथ में बचा है, भेद केवल नाचने वालों के सुर-ताल में, और जीत केवल अपने मन की।
यह प्रसंग वहाँ से शुरू होता है जहाँ कहानी अपनी सारी घटनाएँ ख़र्च कर चुकी है। वनवास पूरा हो गया, युद्ध पूरा हो गया, सेनाएँ अपने घर लौट चुकीं, राज्याभिषेक हो चुका, और अब जो बचा है वह घटना नहीं, हालत है। पिछला प्रसंग अपने अन्त में कह चुका है कि सब लोग अपने-अपने वर्ण और आश्रम के धर्म में लगे वेद-मार्ग पर चलते हैं। उन्हें न भय है, न शोक, न रोग। कथा वहीं से उठती है, और उसका पहला काम कुछ जोड़ना नहीं, कुछ हटाना है।
वर्णन की तरतीब यह है। पहले मनुष्य आते हैं, और उनके साथ वे सब चीज़ें गिनायी जाती हैं जो उन्हें नहीं सतातीं। फिर समाज आता है, फिर राजनीति के शब्द, जो बचे रहते हैं पर उनका काम चला जाता है। फिर वर्णन आदमियों को छोड़कर पेड़, हाथी, सिंह, पक्षी, भौंरे, बेलें, गौएँ, पर्वत, नदियाँ, समुद्र, तालाब, चन्द्रमा, सूर्य और बादलों तक जाता है। उसके बाद राजा का घर खुलता है, फिर उसका दिन, और अन्त में उसका नगर, जहाँ सोने की दीवारें और हीरों से जड़े किवाड़ हैं।
इस पूरे प्रसंग में दशरथ का नाम एक बार भी नहीं आता। चारों भाइयों में से केवल भरत और शत्रुघ्न का नाम आता है। लक्ष्मण का नहीं। जिन रीछ-वानरों ने युद्ध लड़ा, उनमें से किसी का नाम यहाँ नहीं है, सिवाय हनुमान के। वे भी लड़ते हुए नहीं, एक उपवन में बैठकर राम के गुण सुनाते हुए मिलते हैं। यह तुलसीदास का रामचरितमानस है, और यह प्रसंग वही गिनाता है जो इसमें है।
राजा, रानी, भाई और मुनि
- राम सात समुद्रों से घिरी पृथ्वी के एकमात्र राजा, जो कोसल में हैं, और जो सुबह सभा में बैठकर वह कथा सुनते हैं जिसे वे पहले से जानते हैं।
- सीता जिन्हें यहाँ शोभा की खान, सुशील और विनीत कहा गया है, और जो दास-दासियों से भरे घर में सेवा अपने ही हाथों से करती हैं।
- भरत और शत्रुघ्न जो हनुमान के साथ उपवन में जाकर बैठते हैं और बार-बार विनय करके राम के गुण कहलवाते हैं।
- हनुमान जो अपनी सुन्दर बुद्धि से राम के गुणों में गोता लगाकर उन्हें कहते हैं। इस प्रसंग में यही उनका काम है।
- वसिष्ठ जो प्रतिदिन सभा में वेद और पुराणों की कथा बाँचते हैं, और जिनके श्रोताओं में स्वयं राम बैठे होते हैं।
- लव और कुश सीता के दो पुत्र, जिनके नाम इस प्रसंग में आते हैं और जिनकी कोई कथा इसमें नहीं आती।
- गरुड़ जिन्हें यहाँ दो बार पक्षियों का राजा कहकर सम्बोधित किया गया है, यानी यह वर्णन एक पक्षी को सुनाया जा रहा है।
- नारद और सनकादि मुनि जो हर रोज़ अयोध्या आते हैं और नगर देखकर अपना वैराग्य भूल जाते हैं।
पहले वह, जो नहीं है
राम-राज्य का वर्णन एक नकारात्मक वाक्य से खुलता है। पहले ही वाक्य में तीन शब्द एक साथ हैं, दैहिक, दैविक और भौतिक: दुःख के तीन दरवाज़े। वह जो अपने शरीर से उठता है, वह जो ऊपर से आ पड़ता है, और वह जो आस-पास के जीवों और चीज़ों से मिलता है। कोई चौथा रास्ता नहीं छोड़ा गया। और वाक्य कहता है कि राम के राज में ये तीनों किसी को व्यापते नहीं।
वाक्य का कर्ता दुःख है, राजा नहीं। तीनों ताप पहले आते हैं, राज्य बाद में, और राज्य वह जगह है जहाँ पहुँचकर ये नाकाम हो जाते हैं। वाक्य का दूसरा हिस्सा सकारात्मक है: सब मनुष्य आपस में प्रीति करते हैं, और वेद की बतायी नीति में रहकर अपने-अपने धर्म पर चलते हैं। यही जोड़ी पूरे प्रसंग की चाल है: एक चीज़ हटती है, उसकी जगह एक चीज़ रखी जाती है, और दोनों साथ-साथ आती हैं।
फिर धर्म अपने चारों चरणों पर खड़ा है। टीका इन्हें गिनाती है: सत्य, शौच, दया और दान। फिर पाप का निषेध एक अनोखी जगह पर है: बाज़ार में नहीं, सभा में नहीं, स्वप्न में भी पाप नहीं। और फिर स्त्री और पुरुष दोनों राम-भक्ति में रत बताये जाते हैं, और दोनों परम गति के अधिकारी कहे जाते हैं। अधिकारी हक़ का शब्द है। मोक्ष यहाँ किसी को दया में नहीं मिल रहा, वह सबका हक़ है।
इसके बाद निषेध बार-बार आता है, और हर निषेध का नाम साफ़ है। अल्पमृत्यु, यानी छोटी उम्र में मर जाना। पीड़ा, यानी दर्द। फिर शरीर, जिसका कुरूप होना और रोगी होना अलग-अलग हटाये गये हैं, क्योंकि सबका शरीर सुन्दर है और सबका नीरोग। फिर दरिद्रता, फिर दुःख, फिर दीनता, जो दुःख से अलग गिनायी गयी है। फिर मूर्खता, और अन्त में शुभ लक्षणों से हीन होना। यह किसी सुखी राज्य की मुलायम तस्वीर नहीं, उन नौ चीज़ों की सूची है जिनसे आदमी सचमुच डरता है, एक-एक का नाम लेकर हटायी गयी।
फिर सब शब्द पाँच बार आता है: सब दम्भ से रहित, सब गुणी, सब गुणों का आदर करने वाले, सब ज्ञानी, सब कृतज्ञ। और आख़िरी बात सबसे बारीक है: किसी की चतुराई में कपट नहीं। सयानापन मना नहीं किया गया, कपट वाला सयानापन मना किया गया है। नर और नारी सब चतुर हैं, यह भी कहा गया है। चतुराई बची रहती है, उसमें से केवल छल निकाल लिया जाता है।
फिर कथा वह करती है जो अब तक नहीं कर रही थी। अब तक बात मनुष्यों की थी। अब बात जड़ और चेतन, पूरे संसार की है। और कथा दुःख को गिनाती नहीं, उसके कारख़ाने का नाम लेती है: काल, कर्म, स्वभाव और गुण। जिन चार चीज़ों से दुःख बनता है, उनसे बना दुःख किसी को नहीं होता। कारख़ाना खड़ा है और चल नहीं रहा।
यहीं एक सम्बोधन भी है: आकाश में चलने वालों का स्वामी, यानी पक्षियों का राजा गरुड़। यह वर्णन किसी दरबार में नहीं, एक पक्षी को सुनाया जा रहा है। मानस में सुनने वाले का नाम है, कहने वाले का नहीं। पोद्दार की टीका कहने वाले का नाम कोष्ठक में जोड़ती है, काकभुशुण्डि।
सात समुद्रों का राजा, और यह कहना भी छोटा पड़ता है
अब वर्णन अपने ही राजा को नापता है। पृथ्वी को सात समुद्रों की करधनी पहनायी जाती है, और उस पूरी पृथ्वी का एक ही राजा बताया जाता है, कोसल के राम। पर वाक्य वहाँ रुकता नहीं। फिर कहा जाता है कि जिनके एक-एक रोम में अनेक ब्रह्माण्ड हैं, उनके लिये यह प्रभुता कुछ बहुत नहीं है। और फिर वह बात आती है जो इस वर्णन को बेचैन कर देती है।
उनकी महिमा समझ लेने पर, उन्हें सात समुद्रों से घिरी पृथ्वी का एकछत्र सम्राट् कहना ही उनकी बड़ी हीनता है। भाषा का ऊँचा पद इस विषय के लिये नीचा पड़ रहा है, और यह बात वर्णन के बीचोंबीच कही गयी है। फिर भी वर्णन बन्द नहीं होता। फिर काकभुशुण्डि उसका कारण देते हैं: “गरुड़, जिन्होंने वह महिमा जान भी ली है, वे भी लौटकर इसी लीला में बड़ा प्रेम मानते हैं।”
आगे बात और कस जाती है: उस महिमा को जानने का फल भी यही लीला है। यह कहने वाले हैं इन्द्रियों का दमन करने वाले श्रेष्ठ महामुनि। गवाही उन्हीं से ली जा रही है जिनके ऐसी किसी चीज़ पर मुग्ध होने की सम्भावना कम है। और फिर एक ऐसा वाक्य आता है जो प्रसंग के अन्त में लौटेगा: राम-राज्य की सुख-सम्पदा का वर्णन शेष और सरस्वती भी नहीं कर सकते।
इसके बाद वर्णन घर के भीतर जाता है। सब नर-नारी उदार हैं, सब परोपकारी हैं, सब ब्राह्मणों के चरणों के सेवक हैं। सब पुरुष एकपत्नीव्रती हैं और स्त्रियाँ मन, वचन और कर्म से पति का हित करने वाली हैं। और फिर, इसी पड़ोस में, इस राज्य की सबसे ज़्यादा दोहरायी जाने वाली बात आती है।
यह बात वह नहीं कहती जो अक्सर इससे सुन ली जाती है। यह नहीं कहती कि राज्य में दण्ड नहीं है। यह कहती है कि दंड शब्द अब भी चालू है और उसने अपना मालिक बदल लिया है: वह अब संन्यासियों के हाथ की लाठी है। भेद शब्द भी चालू है, और अब वह नाचने वालों के समाज में है, जहाँ भेद का अर्थ सुर और ताल का फ़र्क़ है। और जीतहु, यानी जीतो, शब्द भी सुनायी पड़ता है, पर केवल मन को जीतने के लिये। पोद्दार की टीका इसके पीछे राजनीति के चारों उपाय खड़े कर देती है, साम, दान, दण्ड और भेद। कवि उनमें से दो शब्द अपने पास रखते हैं और एक तीसरा, जीत, अपनी ओर से जोड़ देते हैं।
यह तरीक़ा किसी घोषणा से ज़्यादा मज़बूत है। अगर कहा जाता कि यहाँ कोई किसी को दण्ड नहीं देता, तो वह एक दावा होता। पर शब्दकोश गवाही देता है: जिस समाज में दण्ड देने का काम बचा नहीं, वहाँ दण्ड शब्द बेकार पड़ा रहता और किसी दूसरे पेशे में जा लगता। अभाव साबित करने के लिये शब्द हटाये नहीं गये। उन्हें बचा रखा गया और उनका काम छीन लिया गया।
जिनसे माँगना पड़ता है
यहाँ से वाक्यों में से आदमी निकल जाते हैं। आगे पेड़, वन, हाथी, सिंह, पक्षी, पशु, भौंरे, बेलें, गौएँ, धरती, पर्वत, नदियाँ, समुद्र, तालाब, दिशाएँ, चन्द्रमा, सूर्य और बादल हैं। और इस पूरे हिस्से में ऋतु शब्द एक बार भी नहीं आता, जबकि ऋतुओं की बात लगातार होती रहती है।
वन के पेड़ फूलते और फलते हैं, एक साथ, और हमेशा। यही ऋतुओं का हिसाब है, बिना ऋतु का नाम लिये। फिर हाथी और सिंह एक साथ रहते हैं। और फिर पक्षी और पशु अपना सहज वैर भुलाकर आपस में प्रीति बढ़ा लेते हैं। सहज यानी जो साथ ही पैदा हुआ हो, स्वभाव में गुँथा हो। उसे जीता नहीं गया, मिटाया नहीं गया। भुला दिया गया। क्रिया भुलाना है, और यह क्रिया इस प्रसंग के बिलकुल आख़िर में एक बार फिर आयेगी, दूसरे लोगों के साथ।
फिर पक्षी कूजते हैं और पशुओं के झुंड वन में निर्भय चरते और आनन्द करते हैं। पिछला प्रसंग अपने अन्त में यही बात मनुष्यों के लिये कह चुका था। अब वही वन के जानवरों तक पहुँचती है। हवा शीतल, सुगन्धित और मन्द चलती है, और भौंरे फूलों का रस लेकर चलते हुए गुंजार करते जाते हैं: रस ले भी रहे हैं और गा भी रहे हैं।
इस हिस्से का केन्द्र एक शब्द है: माँगना। बेलें और वृक्ष मधु टपकाते हैं, पर माँगने पर। यह अपने आप बहती हुई अति नहीं। यह देने वाला है जो पुकार की राह देखता है। गौएँ मनचाहा दूध देती हैं। धरती सदा खेती से भरी रहती है। और फिर एक वाक्य युग का हिसाब कर देता है: त्रेता में सत्ययुग की करनी हो गयी। नाम नहीं बदला, करनी बदल गयी।
फिर एक कारण आता है। पर्वतों ने तरह-तरह की मणियों की खानें प्रकट कर दीं, और क्यों, यह भी बताया गया है: जगत् की आत्मा को जगत् का राजा जानकर। न कोई आदेश, न कोई खुदाई, न कोई कर, पहचान हुई और खानें खुल गयीं। नदियाँ भी श्रेष्ठ, शीतल, निर्मल और स्वाद में सुखकारी जल बहाने लगीं।
समुद्र अपनी मर्यादा में रहते हैं। मर्यादा यहाँ किनारे की हद है, और यह बात उसी सूची में है जिसमें लोगों के आचरण की बातें थीं। समुद्र का अपनी हद में रहना यहाँ एक गुण है। और उसके तुरन्त बाद: वे लहरों से किनारों पर रत्न डाल देते हैं और मनुष्य उन्हें पा जाते हैं। कोई गोता नहीं लगाता। धन किनारे तक चलकर आता है। तालाब कमलों से भरे हैं और दसों दिशाओं के प्रदेश बहुत प्रसन्न हैं।
फिर तीन नाप आते हैं। चन्द्रमा अपनी किरणों से पृथ्वी को भर देता है। सूर्य उतना ही तपता है जितने की ज़रूरत है। और बादल माँगने पर जल देते हैं। थोड़ी ही दूरी पर माँगना दूसरी बार आया, और दोनों बार देने वाला तब तक रुका है जब तक कहा न जाय। पूरे प्रसंग में यही दो जगह हैं जहाँ प्रकृति की उदारता की एक शर्त बतायी गयी है, और शर्त यह है कि उससे कहा जाय।
करोड़ों यज्ञ आधे वाक्य में, और सीता का पूरा घर
अब वर्णन राजा के अपने घर की ओर मुड़ता है। इस पूरे प्रसंग में राजा के राज-काज की बात एक ही जगह आती है, और वह आधे वाक्य में निपट जाती है।
करोड़ों अश्वमेध यज्ञ और ब्राह्मणों को अनेक दान, दोनों मिलाकर आधा वाक्य। और फिर कथा दो चीज़ों को बग़ल में बैठा देती है और उनके बीच कोई पुल नहीं बनाती: वेद-मार्ग के पालक, धर्म की धुरी को धारण करने वाले। तीनों गुणों से परे, और भोग में इन्द्र के समान। दोनों बातें एक ही साँस में कही जाती हैं और वहीं छोड़ दी जाती हैं।
इसके बाद सीता आती हैं, और उन्हें राजा के राज-काज को मिले आधे वाक्य से कहीं ज़्यादा जगह मिलती है। पहले परिचय: शोभा की खान, सुशील, विनीत, सदा पति के अनुकूल। फिर एक ज़रूरी बात, जो सेवा के वर्णन से पहले रखी गयी है: वे राम की महिमा को जानती हैं, और मन लगाकर उनके चरणों की सेवा करती हैं। यानी आगे जो सेवा आ रही है, वह जानकर की गयी है।
फिर कथा स्वयं एक आपत्ति उठाती है और उसका उत्तर देती है। यद्यपि घर में बहुत से दास और दासियाँ हैं और वे सब सेवा की विधि में कुशल हैं। तो भी सीता घर की सारी सेवा अपने ही हाथों से करती हैं। वे राम की आज्ञा पर चलती हैं। यह यद्यपि इस प्रसंग में दो बार आता है, और दूसरी बार स्वयं राम के लिये आयेगा। दोनों बार वह सुनने वाले के मन में उठने वाला सवाल पहले ही ले आता है।
फिर एक शब्द-जोड़ी लौटती है। दासियाँ सेवा की विधि में कुशल बतायी गयी थीं। अब सीता के बारे में कहा जाता है कि जिस तरह राम सुख मानें, वही वे करती हैं, क्योंकि वे सेवा की विधि जानती हैं। एक ही शब्द नौकरों के हुनर के लिये और घर की स्वामिनी के लिये, बिना किसी टिप्पणी के। और बात का अन्त: कौसल्या आदि सब सासुओं की वे घर में सेवा करती हैं, और उन्हें न मान है न मद।
इसके बाद सम्बोधन बदल जाता है। अब बात पार्वती से कही जा रही है, और सीता को रमा कहकर ब्रह्मा आदि से वन्दित, जगत् की माता और सदा अनिन्दित बताया जाता है। कुछ ही देर पहले सुनने वाले गरुड़ थे और कहने वाले का नाम मानस में नहीं था। अब सुनने वाली पार्वती हैं और कहने वाले का नाम अब भी मानस में नहीं है। दोनों बार पोद्दार की टीका ही कोष्ठक में बताती है कि बोल कौन रहा है: पहले काकभुशुण्डि, अब शिव। यह कथा दो बातचीतों पर लदकर आ रही है, और मानस हर बार केवल सुनने वाले का नाम लेता है।
यह बात इस प्रसंग में अपनी तरह की अकेली है। जिनके कृपाकटाक्ष को देवता चाहते हैं और जो उनकी ओर देखती तक नहीं, वे राम के चरणों में प्रीति करती हैं, और करती हैं अपना स्वभाव खोकर। इस पूरे वर्णन में किसी के पास किसी चीज़ की कमी नहीं। यहाँ समुद्र रत्न किनारे पर रख जाते हैं और पर्वत खानें खोल देते हैं। केवल एक जगह कोई कुछ छोड़ता है। छोड़ने वाली वही हैं जिनके पास सब कुछ था।
जो भाई कुछ काम माँगते हैं
भाइयों का हिस्सा छोटा है, और उसमें एक ब्योरा ऐसा है जिससे पूरा प्रसंग एक बार और खुलता है।
पहली बात सीधी है: सब भाई अनुकूल रहकर सेवा करते हैं और राम के चरणों में उनकी बहुत प्रीति है। फिर वे राम का मुख देखते रहते हैं, इस आशा में: “कृपालु राम कभी हमें भी कुछ सेवा करने को कहें।” वे इनाम की राह नहीं देख रहे, काम की राह देख रहे हैं। इस राज्य में अब तक दो बार बताया जा चुका है कि देने वाला माँगे जाने का इन्तज़ार करता है, बेलें भी और बादल भी। यहाँ वही इन्तज़ार उलटी ओर से है: कोई है जो चाहता है कि उससे माँगा जाय।
राम भी भाइयों पर प्रेम करते हैं और उन्हें नाना प्रकार की नीति सिखाते हैं। जिस वर्णन ने अभी राजनीति के शब्दों को बेकार बताकर दूसरे पेशों में भेज दिया था, उसी राज्य में नीति पढ़ायी जा रही है। नगर के लोग हर्षित रहते हैं और ऐसे भोग भोगते हैं जो देवताओं को भी दुर्लभ हैं।
और फिर एक बात जो चुपचाप गुज़र जाती है। ये लोग दिन-रात ब्रह्मा को मनाते रहते हैं, और माँगते हैं राम के चरणों में प्रीति। जो उसी नगर में रहते हैं, जो राम को रोज़ देखते हैं, वे रात-दिन यही माँगते हैं कि उनसे प्रेम बना रहे। नज़दीकी को यहाँ प्रीति की ज़मानत नहीं माना गया।
सीता के दो सुन्दर पुत्र हुए, लव और कुश, जिनका वेद-पुराणों ने वर्णन किया है। दोनों विजयी, विनयी, गुणों के धाम, और इतने सुन्दर मानो भगवान के ही प्रतिबिम्ब हों। फिर पूरी अगली पीढ़ी आ जाती है: सब भाइयों के दो-दो पुत्र। आठ लड़के आते हैं और उनमें से छह के नाम नहीं लिये जाते। अयोध्या का भविष्य यहाँ थोड़े-से शब्दों में गिनती की तरह रखा गया है। लव और कुश का इस प्रसंग में जन्म के आगे कोई वृत्तान्त नहीं आता।
अगली बात ठीक पुत्रों के जन्म के बाद आती है। बात सबसे मनुष्य जैसी चीज़ की हो रही थी, बच्चों की। और उसके तुरन्त बाद कहा जाता है कि जो ज्ञान, वाणी और इन्द्रियों से परे है, जो अजन्मा है, जो माया, मन और गुणों के पार है। वही सच्चिदानन्दघन यह उदार नर-चरित करता है। अजन्मा को जन्मों की पंक्ति से सटाकर रख दिया गया है, और बीच में कोई सफ़ाई नहीं दी गयी।
नर-चरित को छोटा, ओढ़ा हुआ या दिखावटी नहीं कहा गया। उसे उदार कहा गया है, श्रेष्ठ, बड़े दिल का। यह उसी बात की दूसरी क़िस्त है जो कुछ ही पहले कही गयी थी, कि महिमा जान लेने वाले भी लौटकर इसी चरित में प्रेम मानते हैं। पहले कहा गया था कि जानने वाले इसे चाहते हैं। अब कि करने वाला इसे उदारता से करता है।
दिन का हिसाब, और दिन का न बीतना
यहाँ पूरे प्रसंग की इकलौती घड़ी लगती है। अब तक सब कुछ अवस्था थी। अब पहली बार एक दिनचर्या आती है, और वह सुबह से शुरू होती है।
प्रातःकाल सरयू में स्नान, फिर ब्राह्मणों और सज्जनों के साथ सभा में बैठना। सभा में वसिष्ठ वेद और पुराणों की कथा कहते हैं और राम सुनते हैं, यद्यपि वे सब जानते हैं। यह वही यद्यपि है जो थोड़ी देर पहले दास-दासियों के लिये आया था। सात समुद्रों वाली पृथ्वी का इकलौता राजा अपनी सुबह उस कथा को सुनने में बिताता है जो उसे पहले से आती है।
फिर राम भाइयों को साथ लेकर भोजन करते हैं, और यह देखकर सब माताएँ आनन्द से भर जाती हैं। माताओं को इस प्रसंग में न कोई वाक्य मिला है, न कोई काम। केवल एक दृश्य, और वही काफ़ी माना गया है।
उसके बाद भरत और शत्रुघ्न दोनों भाई हनुमान के साथ उपवन में जाते हैं, वहाँ बैठकर राम के गुणों की कथा पूछते हैं। हनुमान अपनी सुन्दर बुद्धि से उन गुणों में गोता लगाकर उन्हें कहते हैं। निर्मल गुणों को सुनकर दोनों भाई बहुत सुख पाते हैं और बार-बार विनय करके और कहलवाते हैं। राम उसी नगर में हैं और थोड़ी देर पहले उनके साथ भोजन हो चुका है। फिर भी भाइयों का मनपसन्द काम यह है कि कोई उन्हीं के बारे में सुनाता रहे।
यह केवल महल की आदत नहीं। कथा कहती है कि घर-घर में पुराणों और अनेक प्रकार के पवित्र राम-चरित की कथा होती है। स्त्री-पुरुष सब राम का गुणगान करते हैं, और उन्हें दिन-रात का बीतना भी पता नहीं चलता। थोड़ा ही पहले एक घड़ी लगी थी, स्नान, सभा, भोजन, उपवन। और अब कहा जाता है कि समय बीतना महसूस ही नहीं होता। दोनों बातें एक साथ सच हैं।
अब वह घेरा बन्द होता है जो पहले खुला था। तब कहा गया था कि राम-राज्य की सुख-सम्पदा को शेष और सरस्वती नहीं कह सकते। अब हज़ारों शेष भी नहीं कह सकते। और जिसका वर्णन नहीं हो पा रहा, वह राजा नहीं, अवधपुरी के रहने वालों का सुख, सम्पत्ति और समाज है। राजा बात के आख़िरी हिस्से में एक कारण की तरह आता है: जहाँ राम स्वयं राजा होकर विराजते हैं।
जिस नगर को देखकर वैराग्य भूल जाता है
आख़िरी हिस्सा नगर का है, और वह नगर की ईंटों से नहीं, नगर देखने वालों से शुरू होता है।
नारद आदि और सनक आदि मुनीश्वर राम के दर्शन के लिये हर रोज़ अयोध्या आते हैं। यह एक बार का दर्शन नहीं, आदत है। और आकर वे नगर देखकर वैराग्य भुला देते हैं। इसी वर्णन की शुरुआत में पक्षी और पशु अपना सहज वैर भुला चुके थे, और वहाँ भी यही क्रिया थी। एक ही क्रिया वर्णन के दोनों सिरों पर। दोनों बार भूली जाने वाली चीज़ वही है जिससे भूलने वाले की पहचान बनी थी: सिंह से उसका वैर, मुनि से उसका वैराग्य।
फिर नगर का ब्योरा आता है, पत्थर और धातु का: सोने और रत्नों से बनी अटारियाँ, अनेक रंगों की ढली हुई सुन्दर फ़र्शें। नगर के चारों ओर परकोटा और उस पर रंग-बिरंगे कँगूरे। उन कँगूरों पर एक उपमा रखी जाती है जो इस प्रसंग में अकेली है। वे ऐसे लगते हैं मानो नवग्रहों ने बड़ी सेना बनाकर आकर अमरावती को घेर लिया हो।
इस राज्य में किसी से किसी का वैर नहीं। यहाँ दण्ड संन्यासी की लाठी बन गया है और भेद नाचने वालों के सुर-ताल में चला गया है। एकमात्र सेना यही है। वह एक तुलना है। और जिसे वह घेरती है वह इन्द्र की राजधानी है। नगर की ऊँचाई नापने के लिये आकाश का नगर लाया गया और उसे घेरे में ले लिया गया।
फिर सड़कों पर अनेक रंगों के काँचों की गच ढाली हुई बतायी जाती है, जिसे देखकर श्रेष्ठ मुनियों के भी मन नाच उठते हैं। कुछ ही देर में यह दूसरी बार है कि यह नगर मुनियों का धीरज तोड़ता है। फिर उज्ज्वल महल आकाश को चूमते हैं, और उन पर के कलश मानो सूर्य और चन्द्रमा के प्रकाश की निन्दा करते हैं। पहले कहा गया था कि सूर्य उतना ही तपता है जितने का काम है। अब उसी सूर्य की चमक को छतों के कलश नीचा दिखा रहे हैं।
फिर घर-घर में मणियों के दीपक शोभा पा रहे हैं।
फिर मूँगों की देहलियाँ, मणियों के खम्भे, मरकत जड़ी सोने की दीवारें, जो ऐसी लगती हैं मानो ब्रह्मा ने ख़ास तौर पर बनायी हों। विशाल और मनोहर महल, उनमें स्फटिक के आँगन, और हर दरवाज़े पर सोने के किवाड़ जिनमें बहुत से हीरे जड़े हैं।
और यहीं यह प्रसंग ख़त्म हो जाता है। जो वर्णन तीनों तापों से और पूरे जड़-चेतन जगत् से शुरू हुआ था, वह चौखट और किवाड़ पर आकर रुकता है। और वह भी पूरा नहीं: नगर की बात अगले प्रसंग में चलती रहती है।
सब, नहीं, माँगना और भूलना
इस प्रसंग को दो चीज़ें उठाये हुए हैं। एक है सब, जो इस प्रसंग में पंद्रह बार आता है। दूसरी है निषेध, जो नहीं के अलग-अलग रूपों में भी पंद्रह बार आता है। और हटायी जाने वाली चीज़ें कभी धुँधली नहीं हैं। यह नहीं कहा गया कि दुःख नहीं है। कहा गया है कि छोटी उम्र में मृत्यु नहीं होती, किसी को पीड़ा नहीं होती, कोई शरीर कुरूप नहीं, कोई रोगी नहीं। कोई दरिद्र नहीं, कोई दुःखी नहीं, कोई दीन नहीं, कोई मूर्ख नहीं, कोई लक्षणहीन नहीं, और किसी की चतुराई में कपट नहीं। नौ चीज़ें पहले, एक दसवीं उसके बाद, और हर नाम किसी सचमुच के डर का नाम है।
दूसरी बात माँगने की है, और वह इस वर्णन में चार जगह आती है। बेलें और वृक्ष माँगने पर मधु टपकाते हैं। बादल माँगने पर जल देते हैं। भाई राम का मुँह इसलिये ताकते रहते हैं कि कभी वे कोई सेवा कह दें। और लोग रात-दिन ब्रह्मा को मनाते हैं, कुछ पाने के लिये नहीं, इसलिये कि राम के चरणों में प्रीति बनी रहे। इस राज्य में सब कुछ उपलब्ध है और कुछ भी छीना हुआ नहीं। जो मिलता है, कहने पर मिलता है।
तीसरी बात भूलने की है। वर्णन की दोनों हदों पर एक ही क्रिया खड़ी है: शुरू में पशु और पक्षी अपना सहज वैर भुला देते हैं, अन्त में नारद और सनकादि अपना वैराग्य। और इस राज्य के बारे में दो बार कहा गया है कि यह कहा नहीं जा सकता: पहले शेष और सरस्वती से, फिर हज़ारों शेषों से।
इस वर्णन का बड़ा हिस्सा वह है जिसका शासन से कोई लेना-देना नहीं: पेड़ों का हमेशा फूलना और फलना, हाथी और सिंह का साथ रहना। सूर्य का नाप से तपना, बादलों का माँगने पर बरसना, किसी का कुरूप न होना, किसी का कम उम्र में न मरना। रानी का भरे हुए घर में अपने हाथ से काम करना, और मुनियों का नगर देखकर वैराग्य भूल जाना। शासन का हिस्सा छोटा है और सटीक: दण्ड, भेद और जीत, तीन शब्द जो बचे हुए हैं और जिनका काम बदल गया है। बाक़ी सब किसी आदेश से नहीं होता। वह पहचान लेने से, माँगे जाने से, और भूल जाने से होता है।
अन्त में जो तस्वीर हाथ लगती है वह दो जगहों की है। एक सभा, जहाँ पूरी पृथ्वी का राजा सुबह बैठकर वह कथा सुन रहा है जो उसे पहले से आती है। और एक उपवन, जहाँ दो भाई उसी के बारे में सुन रहे हैं जिसके साथ वे थोड़ी देर पहले भोजन कर चुके हैं। और वे बार-बार विनय करके और सुन रहे हैं। घर-घर में यही हो रहा है, और उसी में दिन और रात का बीतना किसी को पता नहीं चलता।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, उत्तरकाण्ड, दोहा 21 से 26, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।