रामचरितमानस · उत्तरकाण्ड · अयोध्या नगरी, और प्रताप का सूर्य
अयोध्या नगरी, और प्रताप का सूर्य
घर-घर की दीवारों पर वही कथा जो यह ग्रन्थ कह रहा है, सरजू के बँधे हुए घाट जिनके किनारे पर कीचड़ तक नहीं, और अन्त में एक सूर्य, जिसके उगते ही कुछ खिल जाते हैं और कुछ छिपने की जगह ढूँढ़ने लगते हैं।
इस प्रसंग में कथा एक अंगुल भी आगे नहीं बढ़ती। कोई आता नहीं, कोई जाता नहीं, किसी के मुँह से ऐसा वाक्य नहीं निकलता जिससे अगला दृश्य बने। पाँच दोहों तक तुलसीदास बस एक नगर दिखाते रहते हैं, उस आदमी की तरह जो अपने शहर में किसी को घुमाने निकला हो और रास्ते में हर चीज़ पर रुक जाता हो। पहले घरों के भीतर की दीवारें, फिर बाग़ और छतें, फिर राजद्वार, गली, चौराहा और बाज़ार। फिर वे उत्तर की ओर ले चलते हैं, जहाँ नदी है, नदी के घाट हैं, और घाटों का एक साफ़-साफ़ बँटवारा है। फिर नगर के बाहर की बावलियाँ और बगीचे। और इस पूरी सैर में वे एक बार भी यह कहकर नहीं रुकते कि देखिये, यही रामराज्य है। वे बस चलते रहते हैं और दिखाते रहते हैं, और पढ़नेवाला अपने-आप यह समझ लेता है।
पन्ना तीन हिस्सों में बँटा है और तीनों की चाल अलग है। पहला हिस्सा सैर है और उसमें आँख काम करती है: दीवार, फूल, परछाईं, छत, बाज़ार, घाट, बावली। दूसरे हिस्से में सैर के बीच से एक भजन उठ खड़ा होता है। नगर के लोग जहाँ-तहाँ बैठकर एक-दूसरे को यही सिखाते हैं कि किसे भजना है, और वह सीख पाँच चौपाइयों तक बिना रुके चलती है। और तीसरा हिस्सा नगर छोड़ ही देता है। वहाँ एक सूर्य उगता है, तीनों लोक उजाले से भर जाते हैं, और तुलसी ठहरकर यह गिनने लगते हैं कि उस उजाले से किसे सुख हुआ और किसे शोक। सुख और शोक, दोनों का हिसाब वे नाम लेकर देते हैं।
यह तुलसीदास का रामचरितमानस है, और जिस पुरी में हम घूम रहे हैं उसका नाम इन पाँच दोहों में केवल एक बार आता है, अवध, और वह भी तब जब बात नगर की नहीं, नगर पर छायी हुई सम्पदा की हो रही होती है। राजा का नाम बार-बार आता है, पर राजा स्वयं इस पन्ने पर कहीं चलते-फिरते दिखायी नहीं देते। भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न, हनुमान, वसिष्ठ, किसी का नाम यहाँ नहीं है। जनकसुता का नाम एक बार आता है, एक आधी पंक्ति में, और उसी आधी पंक्ति में इस पूरे भजन का इकलौता प्रश्न भी रखा हुआ है।
इस प्रसंग के मुख्य किरदार
- राम इस प्रसंग के राजा, जो कहीं आते-जाते नहीं दिखते, पर नगर की हर चीज़ जिनसे समझायी जाती है।
- जानकी जनकसुता, जिनका नाम इन पाँच दोहों में केवल एक बार आता है, और ठीक उसी जगह जहाँ भजन का एकमात्र प्रश्न खड़ा होता है।
- अवध के नर-नारी जो जहाँ-तहाँ बैठकर एक-दूसरे को यही सिखाते हैं कि किसे भजना चाहिये, और जिनके गुणगान का उत्तर राजा की निरन्तर प्रसन्नता से मिलता है।
- बालक जिन्होंने घरों में पक्षी पाल रखे हैं और जो तोते-मैना को राम का नाम रटाते हैं। इस पन्ने का इकलौता सीधा संवाद इन्हीं के मुँह में है।
- मुनि और संन्यासी जो सरजू के किनारे कहीं-कहीं विरक्त होकर बसते हैं और जिन्होंने किनारे-किनारे तुलसी के झुंड लगा रखे हैं।
- खगेस पक्षियों के राजा, जिन्हें इस प्रसंग का अन्तिम हिस्सा सम्बोधित है। कहनेवाले का नाम इन पंक्तियों में नहीं है, टीका उन्हें काकभुशुण्डि बताती है।
घर-घर की दीवार पर वही कथा
पिछला प्रसंग रामराज्य का हिसाब देकर बन्द हुआ था। वहाँ बताया गया था कि कौन-सा दुख नहीं रहा, कौन-सा भय नहीं रहा, कौन-सी मर्यादा नहीं टूटी। वह सब बताने का तरीक़ा था, और बताने में एक कमी हमेशा रह जाती है: सुननेवाला मान लेता है, पर देख नहीं पाता। यह प्रसंग दिखाने से शुरू होता है। और पहली चीज़ जो दिखायी जाती है, वह न राजमहल है, न सिंहासन, न कोई जुलूस, न कोई तोरण। वह घर के भीतर की दीवार है।
चारु चित्रसाला गृह गृह प्रति लिखे बनाइ।
दोहा २७
राम चरित जे निरख मुनि ते मन लेहिं चोराइ॥ २७॥
घर-घर में सुन्दर चित्रशालाएँ हैं, और हर चित्रशाला में राम का चरित्र सँवारकर लिखा हुआ है। जो मुनि उन्हें देखते हैं, वे चित्र उन मुनियों का मन तक चुरा ले जाते हैं। इस दोहे को दूसरी बार पढ़िये और इस बार यह देखिये कि चोरी किसकी हो रही है। किसी साधारण राहगीर का मन खींच लेना कोई बड़ी बात नहीं होती। तुलसी चोर के सामने ठीक वही आदमी लाकर खड़ा करते हैं जिसका सारा जीवन-भर का अभ्यास ही मन को न चुराने देने का रहा है। जिसने वर्षों में अपने भीतर पहरा बिठाया, वह एक दीवार के सामने खड़ा होकर वह पहरा भूल जाता है।
और यह भी देखिये कि चित्रशाला किसी एक जगह नहीं है। तुलसी गृह गृह प्रति कहते हैं, यानी हर घर के हिस्से में एक। यह किसी राजा का आदेश नहीं है, यह लोगों की अपनी पसन्द है। घर की दीवार पर आदमी वही टाँगता है जिसे वह रोज़ देखना चाहता है, और अवध के लोगों ने अपनी दीवारों के लिये कोई दृश्य, कोई फूल-पत्ती, कोई शिकार नहीं चुना। उन्होंने अपने राजा की कथा चुनी, और उसे यों चुना कि देखनेवाला ठहर जाये।
तीसरी बात इस दोहे में सबसे चुपचाप रखी हुई है। जो कथा इन दीवारों पर लिखी है, वही कथा यह ग्रन्थ कह रहा है। जिस चरित को मुनि दीवार पर पढ़ रहे हैं, उसी चरित का यह पन्ना है। इसलिये एक क्षण के लिये पढ़नेवाला और वह मुनि एक ही जगह आ खड़े होते हैं, दोनों राम की कथा के सामने, दोनों उससे मन हारते हुए। और जिस राजा की कथा हर दीवार पर है, वह इसी नगर में रहता है। अपने ही चरित्र से घिरा हुआ एक आदमी, जो शायद उन दीवारों के आगे से रोज़ निकलता होगा।
सार: प्रसंग नगर की सबसे भीतरी चीज़ से खुलता है, घर की दीवार से। हर घर में चित्रशाला है, हर चित्रशाला में राम का चरित्र, और वह चित्र मुनियों तक का मन चुरा लेता है। दीवार पर वही कथा है जो यह ग्रन्थ कह रहा है।
फूल, परछाईं, और वह पाठ जो बच्चे पढ़ाते हैं
दीवार से निकलकर तुलसी आँगन और बाग़ में आते हैं। सबने फूलों की वाटिकाएँ लगा रखी हैं, और लगा रखी ही नहीं, यत्न करके बनायी हैं। इस एक शब्द पर रुकिये: जतन। फूल अपने-आप भी उग आते हैं, पर वाटिका अपने-आप नहीं बनती। उसके लिये कोई रोज़ झुकता है, रोज़ पानी देता है, रोज़ कुछ काटता है। जिस नगर में किसी को कोई अभाव नहीं है, वहाँ भी लोग मिट्टी में हाथ डालते हैं, और यह बात नगर के बारे में उसकी सम्पत्ति से ज़्यादा कहती है।
उन वाटिकाओं में बहुत जातियों की सुन्दर लताएँ हैं, और वे सदा वसन्त की तरह फूलती रहती हैं। इस उपमा को ध्यान से पढ़िये। तुलसी यह नहीं कहते कि अवध में सदा वसन्त रहता है। वे कहते हैं कि लताएँ ऐसे फूलती हैं जैसे वसन्त में फूलती हैं। ऋतु अपनी जगह ईमानदारी से चलती रहती है, बस फूलना ऋतु का मुहताज नहीं रहा। यह छोटा-सा अन्तर पूरे वर्णन का सुर तय कर देता है: यहाँ प्रकृति के नियम तोड़े नहीं गये, उन्हें एक और कारण मिल गया है।
फिर कान की बारी आती है। भौंरे मनोहर स्वर से गुंजार कर रहे हैं, और तीन प्रकार की सुन्दर वायु सदा बहती रहती है। तुलसी यह नहीं बताते कि वे तीन कौन-सी हैं, और टीका भी नहीं बताती, इसलिये हम भी नहीं गिनायेंगे। इतना ही सामने है कि हवा एक जैसी नहीं है, उसमें भेद है, और वह भेद रुककर पहचाना जा सकता है। जिस नगर में आदमी हवा के तीन रंग पहचान ले, वहाँ किसी को जल्दी नहीं है।
और फिर पक्षी आते हैं, और उनके साथ इस नगर के बच्चे। तुलसी लिखते हैं कि बहुत-से पक्षी बालकों ने पाल रखे हैं, जो मीठा बोलते हैं और उड़ते हुए सुन्दर लगते हैं। यानी घरों में पिंजरे नहीं, घरों में बच्चों के पाले हुए पक्षी हैं, जो उड़ते भी हैं। और छतों पर एक दूसरी ही सभा जमी हुई है।
मोर हंस सारस पारावत । भवननि पर सोभा अति पावत॥
चौपाई १
जहँ तहँ देखहिं निज परिछाहीं । बहु बिधि कूजहिं नृत्य कराहीं॥
मोर, हंस, सारस और कबूतर घरों के ऊपर बड़ी शोभा पाते हैं, और जहाँ-तहाँ अपनी परछाईं देखकर बहुत प्रकार से कूजते और नाचते हैं। अब इस चौपाई की बनावट देखिये। तुलसी ने कहीं यह नहीं लिखा कि घर मणियों के बने हैं, कि दीवारें चमकती हैं, कि छतें दर्पण जैसी हैं। उन्होंने सिर्फ़ इतना लिखा कि पक्षियों को वहाँ अपनी परछाईं मिल जाती है। पोद्दार की टीका कोष्ठक में जोड़कर बताती है कि यह परछाईं मणियों की दीवारों और छत में पड़ती है, पर वह जोड़ टीकाकार का है। मूल पंक्ति में वैभव का नाम तक नहीं है, केवल उसका प्रतिबिम्ब है।
और वह प्रतिबिम्ब जो करता है, वह और सुन्दर है। टीका के अनुसार पक्षी अपनी ही परछाईं को दूसरा पक्षी समझ लेते हैं, और उसी से बोलने लगते हैं, उसी के सामने नाचने लगते हैं। इतनी सम्पत्ति का पहला नतीजा घमंड नहीं है, छतों पर मची हुई एक भोली-सी ग़लतफ़हमी है। मोर अपने ही आगे पंख खोल रहा है, हंस अपने ही से बात कर रहा है, और किसी को कुछ पता नहीं चल रहा। नगर का वैभव यहाँ किसी के ऊपर भारी नहीं पड़ता, वह बस पक्षियों के नाचने का बहाना बन गया है।
छत से नज़र नीचे आती है, और इस पन्ने का इकलौता सीधा संवाद मिलता है। वह किसी राजा के मुँह में नहीं है, किसी मुनि के मुँह में नहीं है।
सुक सारिका पढ़ावहिं बालक। कहहु राम रघुपति जनपालक॥
चौपाई २
बालक तोते और मैना को पढ़ाते हैं: कहो, राम, रघुपति, जनपालक। तीन शब्द हैं और तीनों का क्रम सोचा हुआ है। पहले नाम, जो सबसे छोटा और सबसे अपना है। फिर कुल, रघुपति, यानी वह पहचान जो जन्म से मिलती है। और फिर काम, जनपालक, यानी वह पहचान जो निभाने से बनती है। बच्चा पक्षी को पूरा परिचय देकर छोड़ता है, और उस परिचय में अन्तिम शब्द यह है कि यह आदमी लोगों को पालता है।
और यह भी देखिये कि पढ़ानेवाला कौन है। पढ़ानेवाला बालक है। जो पढ़ा रहा है, उसे यह पाठ पहले से आता है, वरना वह पढ़ाता क्या। यानी यह नगर अपने बच्चों को कुछ सिखाने की चिन्ता में नहीं दिखता, बच्चे सीख चुके हैं और अब आगे सिखा रहे हैं। जिस बात के लिये आगे इसी काण्ड में लम्बे उपदेश आयेंगे, वह यहाँ एक आँगन में, खेल की तरह, अपने-आप चल रही है।
और एक बात, जो इस काण्ड को जानते हुए पढ़ने पर चुभती है। यह उत्तरकाण्ड है, और इसका सबसे बड़ा हिस्सा एक पक्षी के मुँह से, एक पक्षी-राजा को सुनाया जाना है। उसी काण्ड के इस पन्ने पर अवध के बच्चे अपने घर के पक्षियों को राम का नाम रटा रहे हैं। पक्षी को नाम सिखाना यहाँ कोई भोली-सी बात नहीं रह जाती।
सार: सबने यत्न करके फूलों की वाटिकाएँ लगा रखी हैं और लताएँ वसन्त की तरह फूलती रहती हैं। भौंरे गूँजते हैं, तीन प्रकार की वायु बहती है, बालकों के पाले पक्षी छतों पर अपनी ही परछाईं देखकर नाचते हैं, और वही बालक तोते-मैना को राम, रघुपति, जनपालक कहना सिखाते हैं।
राजद्वार से बाज़ार तक
उसी चौपाई का दूसरा आधा हिस्सा हमें घर से बाहर निकाल देता है। राजद्वार सब प्रकार से सुन्दर है, और गलियाँ, चौराहे और बाज़ार सुन्दर हैं। ध्यान दीजिये कि राजद्वार को कितनी जगह मिली: आधी पंक्ति का एक चौथाई। उसके बाद तुलसी गली और चौराहे और बाज़ार की ओर मुड़ जाते हैं, और बाज़ार को वे पूरा एक छन्द दे देते हैं। किस चीज़ पर कितनी पंक्तियाँ ख़र्च हुईं, इस हिसाब से भी एक कवि अपनी बात कह देता है। इस नगर का असली दृश्य दरवाज़े पर नहीं है, दुकानों पर है।
बाजार रुचिर न बनइ बरनत बस्तु बिनु गथ पाइए।
छंद
जहँ भूप रमानिवास तहँ की संपदा किमि गाइए॥
बैठे बजाज सराफ बनिक अनेक मनहुँ कुबेर ते।
सब सुखी सब सच्चरित सुंदर नारि नर सिसु जरठ जे॥
सुन्दर बाज़ार ऐसा है कि वर्णन करते नहीं बनता, और वहाँ वस्तुएँ बिना मूल्य के मिल जाती हैं। यह छन्द की पहली ही पंक्ति है और वह सबसे बड़ी बात कहकर आगे बढ़ जाती है। बिना मूल्य के, यानी दुकानदार लेता नहीं। एक ऐसा बाज़ार जिसमें माल है, ग्राहक है, दुकान है, और बीच में से दाम हट गया है। यह किसी दान की बात नहीं है, यह रोज़ का लेन-देन है जिसमें से एक चीज़ निकल गयी।
और अगली ही पंक्ति में इसका कारण दे दिया जाता है, पर कारण किसी व्यवस्था का नहीं बताया जाता। जहाँ स्वयं लक्ष्मी के स्वामी राजा हों, वहाँ की सम्पत्ति का बखान कैसे किया जाये। राजा को यहाँ उनकी अपनी उपाधि से नहीं, उनकी पत्नी के नाम से पहचाना गया है, रमानिवास। यानी जिस घर में लक्ष्मी का वास है। बाज़ार में दाम इसलिये नहीं गिरे कि किसी ने भाव बाँधे, बल्कि इसलिये कि जिसके पास सब कुछ है वह इसी नगर में रहता है, और उसकी उपस्थिति ही नगर का बहीखाता है।
फिर दुकानों पर बैठे लोग आते हैं। बजाज, सराफ़ और दूसरे वणिक् बैठे हुए ऐसे जान पड़ते हैं मानो अनेक कुबेर हों। इन दो बातों को एक साथ रखकर देखिये: वस्तु बिना दाम मिलती है, और बेचनेवाला कुबेर जैसा दिखता है। जहाँ दाम नहीं लिया जाता वहाँ दुकानदार का ग़रीब हो जाना सीधा हिसाब होता। यहाँ उलटा हुआ है, और तुलसी इस विरोध को सुलझाने बैठते भी नहीं। वे उसे वैसे ही रख देते हैं, क्योंकि उस विरोध का उत्तर पिछली पंक्ति में पहले ही आ चुका है।
और छन्द की आख़िरी पंक्ति बाज़ार से नज़र हटाकर बाज़ार में चलनेवालों पर डाल देती है। स्त्री, पुरुष, बच्चे और बूढ़े, जो भी हैं, सब सुखी, सब सदाचारी, सब सुन्दर। चार तरह के लोग गिनाये गये और तीनों विशेषण चारों पर बराबर डाल दिये गये, बिना किसी को छाँटे। और इन तीन विशेषणों का क्रम भी देखिये। सुखी पहले है, सुन्दर आख़िर में, और सदाचारी बीच में। जो दिखता है वह आख़िर में रखा गया, जो भीतर है वह बीच में, और वही दोनों को जोड़े हुए है।
सार: राजद्वार को आधी पंक्ति मिलती है और बाज़ार को पूरा छन्द। वहाँ वस्तुएँ बिना दाम मिलती हैं, वणिक् कुबेर जैसे दिखते हैं, और बाज़ार में चलनेवाले स्त्री, पुरुष, बालक और वृद्ध, सब सुखी, सब सदाचारी, सब सुन्दर हैं।
उत्तर की ओर, सरजू
अब सैर नगर से निकलकर नदी की ओर मुड़ती है, और तुलसी दिशा बताकर मुड़ते हैं। यह छोटी-सी बात है और इसी से पता चलता है कि वर्णन किसी कल्पना का नहीं, किसी जगह का है। कल्पना में दिशा नहीं होती। नगर के उत्तर में नदी है, और वह नदी सरजू है।
उत्तर दिसि सरजू बह निर्मल जल गंभीर।
दोहा २८
बाँधे घाट मनोहर स्वल्प पंक नहिं तीर॥ २८॥
उत्तर दिशा में सरजू बह रही हैं, जल निर्मल है और गहरा है, मनोहर घाट बँधे हुए हैं, और किनारे पर ज़रा भी कीचड़ नहीं है। इस दोहे में तीन चीज़ें हैं और तीनों अलग-अलग तरह की हैं। जल का निर्मल और गहरा होना नदी का अपना गुण है, उसमें किसी का हाथ नहीं। घाट का बँधा होना पूरी तरह आदमी का काम है, पत्थर का, मेहनत का, पैसे का। और कीचड़ का न होना, यह तीसरी चीज़ है, और सबसे कठिन है।
कीचड़ पर रुकना चाहिये, क्योंकि यही वह ब्योरा है जो केवल वही लिख सकता है जो सचमुच किसी घाट पर गया हो। नदी की तारीफ़ करनेवाला जल की गहराई गिनाता है, लहरों का वर्णन करता है, सूर्योदय का। किनारे की कीचड़ किसी स्तुति में नहीं आती। वह उसी को याद रहती है जिसने कभी उतरते हुए पैर फिसलाया हो। तुलसी ने पूरे नगर-वर्णन में जो सबसे व्यावहारिक वाक्य लिखा है, वह यही है, और उसे दोहे के अन्तिम चरण में रखा है, जहाँ से आगे कुछ नहीं आता।
दूरि फराक रुचिर सो घाटा। जहँ जल पिअहिं बाजि गज ठाटा॥
चौपाई ३
पनिघट परम मनोहर नाना। तहाँ न पुरुष करहिं अस्नाना॥
कुछ दूरी पर अलग एक सुन्दर घाट है, जहाँ घोड़े और हाथी झुंड के झुंड जल पीते हैं। और पानी भरने के बहुत-से घाट हैं, बड़े मनोहर, और वहाँ पुरुष स्नान नहीं करते। टीका इन घाटों को स्त्रियों के घाट बताती है। पहली पंक्ति में पशु शहर से दूर कर दिये गये हैं, और दूर करने का कारण साथ ही रख दिया गया है: वे वहाँ जल पीते हैं। जिस घाट पर हाथी-घोड़े उतरेंगे वहाँ किनारा वैसा नहीं रह सकता जैसा अभी-अभी दोहे में बताया गया था, इसलिये वह घाट अलग है, और दूर है।
और दूसरी पंक्ति में जो व्यवस्था है वह कहीं घोषित नहीं की जाती, बस बता दी जाती है। पनघट बहुत हैं, वे मनोहर हैं, और वहाँ पुरुष नहीं नहाते। किसी नियम का नाम नहीं, किसी दंड का नाम नहीं, किसी पहरेदार का नाम नहीं। यह अकेली आधी पंक्ति एक पूरे नगर के शिष्टाचार की जानकारी दे देती है, और वह जानकारी इस रूप में आती है जैसे कोई राह चलते बता रहा हो।
राजघाट सब बिधि सुंदर बर । मज्जहिं तहाँ बरन चारिउ नर॥
चौपाई ४
तीर तीर देवन्ह के मंदिर । चहुँ दिसि तिन्ह के उपबन सुंदर॥
राजघाट सब प्रकार से सुन्दर और श्रेष्ठ है, और वहाँ चारों वर्णों के लोग स्नान करते हैं। अब पिछली और इस चौपाई को आमने-सामने रखिये, क्योंकि तुलसी ने उन्हें आमने-सामने ही रखा है। दो पंक्तियों के भीतर उन्होंने बता दिया कि इस नगर में क्या अलग रखा जाता है और क्या अलग नहीं होने दिया जाता। स्त्रियों के घाट अलग हैं, पशुओं का घाट अलग है, और सबसे अच्छा घाट, जिसका नाम ही राजा के नाम पर है, वह किसी के लिये अलग नहीं है। रामराज्य का सबसे साफ़ ब्योरा इस पूरे प्रसंग में यही आधी पंक्ति है, और वह किसी उपदेश की तरह नहीं, घाट की तरह आती है।
उसी चौपाई का दूसरा आधा किनारे पर आगे ले चलता है। सरजू के किनारे-किनारे देवताओं के मन्दिर हैं, और हर मन्दिर के चारों ओर सुन्दर उपवन हैं। यानी मन्दिर अकेले नहीं खड़े, उनके चारों तरफ़ छाया है, बैठने की जगह है। जो लोग नहाकर निकलेंगे उनके पास जाने के लिये कुछ है, और बैठने के लिये भी।
और किनारे पर एक और जमात है, जिसे तुलसी दो शब्दों में रख देते हैं, कहुँ कहुँ। नदी के तट पर कहीं-कहीं विरक्त और ज्ञान में लगे हुए मुनि और संन्यासी बसते हैं। ध्यान दीजिये कि उनके लिये कोई अलग बस्ती नहीं बनायी गयी, कोई अलग वन नहीं छोड़ा गया। वे उसी किनारे पर हैं जिस किनारे पर राजघाट है, पनघट हैं, मन्दिर हैं। जिस नगर में जल पीते हाथी और जल छोड़ चुके संन्यासी एक ही नदी के किनारे पर मिल जायें, वहाँ किसी को किसी से बचाने की ज़रूरत नहीं पड़ी है।
और उसी पंक्ति के दूसरे आधे में तुलसी वह चीज़ रखते हैं जिसका नाम उनका अपना नाम है। किनारे-किनारे तुलसी के झुंड के झुंड लगे हुए हैं, और वे मुनियों ने लगाये हैं। जिन्होंने संसार छोड़ा, उन्होंने भी कुछ लगाया। विरक्ति यहाँ हाथ पर हाथ धरकर बैठने का नाम नहीं है।
सार: नगर के उत्तर में सरजू है, जल निर्मल और गहरा, घाट बँधे हुए, किनारे पर कीचड़ नहीं। पशुओं का घाट दूर है, पनघटों पर पुरुष नहीं नहाते, और राजघाट पर चारों वर्ण स्नान करते हैं। किनारे-किनारे मन्दिर, उपवन, विरक्त मुनि और मुनियों के लगाये तुलसी के झुंड हैं।
नगर के बाहर, और वह जिसके होने से यह सब है
अब तुलसी एक बात मान लेते हैं जो वर्णन करनेवाले अक्सर आख़िर में मानते हैं। वे कहते हैं कि पुरी की शोभा कुछ वर्णन नहीं की जा सकती, और तुरन्त आगे बढ़कर यह जोड़ देते हैं कि नगर के बाहर भी परम सुन्दरता है। यानी हार मानकर वे रुकते नहीं, वे दरवाज़े से बाहर निकल आते हैं। और बाहर निकलते ही एक वाक्य आता है जिसमें शर्त सबसे कम है: पुरी के दर्शन करते ही सम्पूर्ण पाप भाग जाते हैं। भीतर जाना नहीं कहा गया, स्नान करना नहीं कहा गया, कोई अनुष्ठान नहीं कहा गया। देखना कहा गया है, और देखना वह क्रिया है जो राह चलता आदमी भी कर लेता है।
बाहर क्या है, यह अगले छन्द में खुलता है, और वह ब्योरा किसी सैर के आख़िरी हिस्से जैसा है, जब चाल धीमी पड़ जाती है। बावलियाँ हैं, तालाब हैं, और बड़े मनोहर कुएँ हैं। उनकी सीढ़ियाँ सुन्दर हैं और जल निर्मल है, और उन्हें देखकर देवता और मुनि तक मोहित हो जाते हैं। पोद्दार की टीका कोष्ठक में उन सीढ़ियों को रत्नों की बताती है, पर मूल पंक्ति इतना ही कहती है कि सोपान सुन्दर हैं। जैसे पक्षियों की परछाईं के समय हुआ था, वैसे ही यहाँ भी मूल वैभव का नाम नहीं लेता, केवल उसका असर बताता है।
तालाबों में अनेक रंगों के कमल खिले हैं, बहुत-से पक्षी कूज रहे हैं, भौंरे गुंजार कर रहे हैं। अनेक रंगों के कमल, यह अपने-आप में एक सुन्दर ब्योरा है, और आगे इसी प्रसंग में यह लौटकर आयेगा, इसलिये इसे याद रखिये। और फिर छन्द की आख़िरी पंक्ति में वह होता है जो पूरे नगर-वर्णन में सबसे कोमल है। रमणीय बगीचों में कोयल आदि पक्षियों की बोली सुनकर ऐसा लगता है मानो वे राह चलनेवालों को बुला रहे हों।
इस आख़िरी उपमा पर ठहरिये। पूरे पन्ने पर अब तक नगर को देखा जा रहा था। यहाँ पहली बार नगर कुछ करता है। वह बुलाता है, और बुलाता भी अपने बाहरी किनारे से, उस आदमी को जो अभी भीतर आया भी नहीं है, जो बस रास्ते से गुज़र रहा है। जिस पुरी को देखने भर से पाप भाग जाते हैं, वह पुरी अपने बगीचों की आवाज़ से राहगीर को अन्दर बुला रही है। सैर का अन्त एक निमन्त्रण पर होता है।
रमानाथ जहँ राजा सो पुर बरनि कि जाइ।
दोहा २९
अनिमादिक सुख संपदा रहीं अवध सब छाइ॥ २९॥
जहाँ स्वयं लक्ष्मीपति राजा हों, उस नगर का वर्णन कहीं किया जा सकता है? अणिमा आदि सिद्धियाँ और सारी सुख-सम्पदा अवध पर छायी हुई हैं। दोहे का पहला आधा प्रश्न है, और यह प्रश्न पूरे वर्णन के बीचोंबीच आता है, जब बहुत कुछ वर्णन किया जा चुका है। कवि ने अभी-अभी दीवारें, बाग़, बाज़ार, घाट और बावलियाँ गिनायी हैं, और अब कहता है कि यह नगर वर्णन के बाहर है। दोनों बातें एक साथ सच हैं, और यही इस वर्णन का ढंग है: जितना दिखाया गया, उतना ही यह बताने के लिये कि न दिखाया गया कितना है।
और दूसरे आधे में जो क्रिया है, उसे देखिये। सिद्धियाँ और सम्पदाएँ अवध पर छाइ रही हैं। छाना बादल का काम है, छाया का काम है। उनका उपयोग किसी ने किया हो, यह नहीं कहा गया। अणिमा जैसी सिद्धि, जिसके लिये साधक जीवन खपा देते हैं, यहाँ नगर के ऊपर एक छाँव की तरह पड़ी हुई है, और नीचे लोग बाज़ार जा रहे हैं, पनघट पर पानी भर रहे हैं, बच्चे पक्षियों को पढ़ा रहे हैं। किसी को उनकी ख़बर भी नहीं है। यही इस पूरे नगर का सबसे बड़ा वैभव है, कि उसका सबसे बड़ा वैभव किसी के काम नहीं आ रहा।
और इसी दोहे में इस पूरे प्रसंग में एक ही बार नगर का नाम आता है, अवध। पाँच दोहों में वह चित्रशाला है, पुरी है, नगर है, पुर है, और नाम लेकर केवल यहाँ पुकारा जाता है, ठीक उस पंक्ति में जहाँ बात नगर की नहीं, नगर पर पड़ी हुई छाया की हो रही है।
सार: पुरी की शोभा वर्णन के बाहर है, और उसे देख लेना भर पाप हर लेता है। नगर के बाहर बावलियाँ, तालाब और कुएँ हैं, अनेक रंगों के कमल हैं, और बगीचे कोयल की बोली से मानो राहगीरों को बुला रहे हैं। जहाँ लक्ष्मीपति राजा हों, वहाँ सिद्धियाँ और सम्पदाएँ छाया की तरह छायी रहती हैं।
जो नगर आपस में बैठकर एक-दूसरे को सिखाता है
अब तक आँख काम कर रही थी। यहाँ से कान काम करना शुरू करता है, और पन्ना अपना ढंग बदल देता है। अब तक जो दिखाया जा रहा था वह बाहर था, दीवार, घाट, बाज़ार। अब जो सुनाया जायेगा वह नगर के भीतर से आ रहा है, लोगों के मुँह से, और पाँच चौपाइयों तक बिना साँस लिये चलेगा।
जहँ तहँ नर रघुपति गुन गावहिं । बैठि परसपर इहइ सिखावहिं॥
चौपाई ५
भजहु प्रनत प्रतिपालक रामहि। सोभा सील रूप गुन धामहि॥
लोग जहाँ-तहाँ रघुनाथ के गुण गाते हैं और बैठकर एक-दूसरे को यही सिखाते हैं। दो शब्द इस पंक्ति का पूरा ढाँचा बना देते हैं: बैठि और परसपर। बैठकर, यानी खड़े होकर नहीं, मंच से नहीं, किसी सभा में नहीं। और परस्पर, यानी एक की ओर से दूसरे की ओर नहीं, दोनों ओर से। यहाँ कोई उपदेशक नहीं है और कोई श्रोता-समूह नहीं है। जो सिखा रहा है वह अगले ही क्षण सीख रहा है। पूरे उत्तरकाण्ड में आगे बहुत उपदेश आयेंगे, और लगभग हर उपदेश में एक बड़ा और एक छोटा होगा। यह इकलौती जगह है जहाँ सिखानेवाला कोई नहीं है और सीख फिर भी चल रही है।
और वे सिखाते क्या हैं। शरणागत का पालन करनेवाले राम को भजो, जो शोभा, शील, रूप और गुण के धाम हैं। भजन की इस पूरी लड़ी का पहला शब्द ही रक्षा का है। पहले यह कि वे शरण में आये हुए को पालते हैं, फिर यह कि वे किन-किन चीज़ों के घर हैं। और इन चार में से देखिये कि शील कहाँ रखा गया है, शोभा के तुरन्त बाद और रूप से पहले। दिखनेवाली दो चीज़ों के बीच में स्वभाव को रख देना कोई अनजाने में नहीं हुआ।
जलज बिलोचन स्यामल गातहि। पलक नयन इव सेवक त्रातहि॥
चौपाई ६
धृत सर रुचिर चाप तूनीरहि। संत कंज बन रबि रनधीरहि॥
कमल जैसे नेत्रोंवाले और साँवले शरीरवाले को भजो। पलक जिस तरह नेत्रों की रक्षा करती है, उसी तरह अपने सेवकों की रक्षा करनेवाले को भजो। इस उपमा पर पूरा ठहरना चाहिये, क्योंकि इस लम्बी लड़ी में इसके जैसी कोमल चीज़ दूसरी नहीं है। आगे जितने उपमान आयेंगे वे सब मारनेवाले हैं, गरुड़, किरात, सिंह, अग्नि, सूर्य। यह अकेला उपमान किसी को मारता नहीं।
और पलक को ही क्यों चुना गया, यह सोचिये। संसार में रक्षा करनेवाली चीज़ें प्रायः बाहर से आती हैं, ढाल, दीवार, पहरेदार, छत। पलक अकेली ऐसी रक्षा है जो जिसकी रक्षा करती है उसी का अंग है। दूसरी बात, वह माँगने पर नहीं गिरती। आँख को यह भी नहीं पता चलता कि अभी-अभी वह बची है। और तीसरी बात, पलक गिरने में इतनी तेज़ है कि उसकी गति देखी नहीं जाती। जो अपने ही भीतर से, बिना कहे, और इतनी जल्दी आये कि दिखे तक नहीं, रक्षा का इससे पूरा चित्र मिलना कठिन है। और यह चित्र उसी पंक्ति में आया है जो कमल जैसे नेत्रों से शुरू हुई थी, इसलिये आँख इस चौपाई में दो बार है, एक बार भजने योग्य के मुख पर और एक बार भजनेवाले के भीतर।
उसी चौपाई का दूसरा आधा दो चीज़ें साथ रखता है। सुन्दर बाण, धनुष और तरकस धारण करनेवाले को भजो, और संतरूपी कमलवन के लिये सूर्य तथा रणधीर राम को भजो। हथियार और सूर्य एक ही साँस में। जो हाथ धनुष उठाये हुए है वही हाथ संतों के कमलवन को खिलाता है, और खिलाने का काम सूर्य करता है, तोड़ने का नहीं। इस सूर्य को याद रखिये, यह इसी प्रसंग में लौटेगा, और लौटकर सबसे बड़ा हो जायेगा।
काल कराल ब्याल खगराजहि। नमत राम अकाम ममता जहि॥
चौपाई ७
लोभ मोह मृगजूथ किरातहि। मनसिज करि हरि जन सुखदातहि॥
कालरूपी भयानक सर्प के लिये गरुड़ को भजो। निष्काम भाव से प्रणाम करते ही ममता का नाश कर देनेवाले को भजो। लोभ और मोह रूपी हरिनों के झुंड के लिये किरात को भजो। कामदेव रूपी हाथी के लिये सिंह को, और सेवकों को सुख देनेवाले को भजो। यह लड़ी जिस नियम पर बनी है वह हर पंक्ति में एक जैसा है: पहले भीतर का एक शत्रु रखा जाता है, और फिर ठीक वही चीज़ उसके सामने रखी जाती है जो प्रकृति में उसे खाती है। सर्प के सामने गरुड़, हरिन के सामने किरात, हाथी के सामने सिंह।
और नाप का ध्यान रखिये, क्योंकि यही इस लड़ी की असली कारीगरी है। सर्प अकेला होता है, इसलिये उसके सामने एक पक्षी बहुत है। हरिन झुंड में चलते हैं, इसलिये उनके सामने शिकारी रखा गया, जो झुंड को खदेड़ता है। हाथी अकेला होता है पर सबसे भारी होता है, इसलिये उसके सामने सिंह। किसी शत्रु को उसकी नाप से बड़ा या छोटा उपाय नहीं दिया गया। और इन तीनों के बीच में वह आधी पंक्ति रखी है जिसमें कोई शिकार नहीं है: प्रणाम करते ही ममता चली जाती है। ममता के लिये कोई शिकारी नहीं चाहिये, सिर झुकाना काफ़ी है।
संसय सोक निबिड़ तम भानुहि। दनुज गहन घन दहन कृसानुहि॥
चौपाई ८
जनकसुता समेत रघुबीरहि। कस न भजहु भंजन भव भीरहि॥
संशय और शोक रूपी घने अन्धकार के लिये सूर्य को भजो। राक्षस रूपी घने वन को जलानेवाली अग्नि को भजो। और फिर, जन्म-मृत्यु के भय को तोड़नेवाले, जानकी सहित रघुवीर को क्यों नहीं भजते? यहाँ दो बातें एक साथ होती हैं और दोनों पहली बार होती हैं। इस पूरी लड़ी में पहली बार राम अकेले नहीं हैं, जनकसुता उनके साथ हैं। और इस पूरी लड़ी में पहली बार आज्ञा हटकर प्रश्न आ जाता है।
अब तक हर पंक्ति भजो, भजो, भजो कह रही थी। यहाँ वह कहती है, क्यों नहीं भजते। और यह प्रश्न ठीक उसी आधी पंक्ति में आता है जहाँ जानकी का नाम है। जो सिखा रहे हैं वे इतनी देर से आज्ञा दे रहे थे, और जिस क्षण वे उस जोड़ी का नाम लेते हैं जिसमें दोनों साथ हैं, उनकी आवाज़ बदल जाती है। आज्ञा में एक दूरी होती है। प्रश्न में वह दूरी नहीं बचती।
बहु बासना मसक हिम रासिहि । सदा एकरस अज अबिनासिहि॥
चौपाई ९
मुनि रंजन भंजन महि भारहि। तुलसिदास के प्रभुहि उदारहि॥
बहुत-सी वासनाओं रूपी मच्छरों के लिये हिमराशि को भजो। यह लड़ी की सबसे अनोखी उपमा है और उसका कारण नाप में है। वासना बड़ी चीज़ नहीं है, वह बहुत चीज़ है। एक मच्छर से कोई नहीं डरता, और मच्छर फिर भी रात भर सोने नहीं देते। ऐसे शत्रु के सामने सिंह भेजना बेकार है, गरुड़ भेजना बेकार है, क्योंकि वह एक जगह खड़ा ही नहीं होता। जो चीज़ मच्छरों को ख़त्म करती है वह कोई शिकारी नहीं, वह एक ऋतु है। बर्फ़ किसी एक मच्छर को नहीं मारती, वह उस हवा को ही बदल देती है जिसमें मच्छर हो सकता था।
और उसके तुरन्त बाद वह पंक्ति आती है जिसमें कोई उपमा नहीं है। सदा एकरस, अजन्मा और अविनाशी को भजो। इतनी देर से चित्र पर चित्र चल रहे थे, सर्प, हरिन, हाथी, वन, मच्छर, और अचानक सब हट जाते हैं। जो नित्य एक-जैसा है उसके लिये कोई उपमा बनती भी नहीं, क्योंकि हर उपमा किसी बदलती हुई चीज़ से ली जाती है।
और लड़ी का अन्त देखिये। मुनियों को आनन्द देनेवाले को, पृथ्वी का भार उतारनेवाले को, और तुलसीदास के उदार स्वामी को भजो। जो शुरू में शरणागत का पालक था, वह अन्त में उदार है। और बीच की सारी मार-काट के बाद अन्तिम शब्द दया का है। इसके अलावा एक बात और: यह पूरी सीख अवध के लोग आपस में दे रहे हैं, और उनके मुँह में कवि ने अपना नाम रख दिया है। सिखानेवाला और सुननेवाला दोनों नगर के हैं, और उनके बीच में से कहनेवाला अपना नाम लेकर निकल जाता है।
एहि बिधि नगर नारि नर करहिं राम गुन गान।
दोहा ३०
सानुकूल सब पर रहहिं संतत कृपानिधान॥ ३०॥
इस प्रकार नगर के स्त्री-पुरुष राम का गुणगान करते हैं, और कृपानिधान सदा सब पर अनुकूल रहते हैं। दोहे के दो चरण दो दिशाओं में चलते हैं और बीच में कोई शर्त नहीं है। नीचे से गान ऊपर जाता है, ऊपर से अनुकूलता नीचे आती है, और दोनों के साथ एक-एक शब्द जुड़ा है जो उन्हें रोज़ का बना देता है। नीचे एहि बिधि है, यानी यही तरीक़ा है, और ऊपर संतत है, यानी लगातार। और नर से पहले नारि लिखी गयी है।
सार: नगर के लोग जहाँ-तहाँ बैठकर एक-दूसरे को यही सिखाते हैं कि राम को भजो, और पाँच चौपाइयों तक भीतर के शत्रुओं के सामने उनके ठीक नाप के उपमान रखे जाते हैं: सर्प के सामने गरुड़, हरिनों के सामने किरात, हाथी के सामने सिंह, मच्छरों के सामने हिमराशि। बीच में पलक की कोमल उपमा है और अन्त में कवि का अपना नाम।
वह सूर्य, और जिन्हें उसके उगने से शोक हुआ
यहाँ पन्ना एक बार में ही नगर छोड़ देता है। अब तक जो कुछ था वह गली, घाट और छत का था। अगली पंक्ति में सम्बोधन आता है, और सम्बोधन किसी नागरिक को नहीं है। कहनेवाला खगेश को पुकारता है, पक्षियों के राजा को। कहनेवाले का अपना नाम इन पंक्तियों में कहीं नहीं है, पोद्दार की टीका उन्हें काकभुशुण्डि बताती है। पढ़नेवाला जिस भेंट तक अभी पहुँचा नहीं है, उसकी आवाज़ यहाँ पहले ही सुन लेता है।
जब ते राम प्रताप खगेसा। उदित भयउ अति प्रबल दिनेसा॥
चौपाई १०
पूरि प्रकास रहेउ तिहुँ लोका। बहुतेन्ह सुख बहुतन मन सोका॥
जब से रामप्रताप रूपी अत्यन्त प्रचंड सूर्य उदित हुआ, तीनों लोकों में प्रकाश भर गया, और उससे बहुतों को सुख हुआ और बहुतों के मन में शोक। इस चौपाई का आख़िरी आधा हिस्सा इस पूरे प्रसंग का सबसे चौंकानेवाला वाक्य है। अभी-अभी पूरा नगर दिखाया गया है, जिसमें सब सुखी हैं, सब सदाचारी हैं, सब सुन्दर हैं। और उसके ठीक बाद, बिना किसी तैयारी के, यह कहा जाता है कि इस उजाले से कुछ लोगों को शोक भी हुआ।
कोई और कवि इस वाक्य के बाद हारे हुओं की सूची छोड़ देता, क्योंकि रामराज्य के वर्णन में हारनेवालों का हिसाब देना ज़रूरी नहीं था। तुलसी ठीक यहीं रुकते हैं और कहते हैं कि जिन्हें शोक हुआ, उन्हें मैं बखानकर बताता हूँ। और फिर वे नाम गिनाते हैं, और गिनाते ही सारा दृश्य पलट जाता है।
जिन्हहि सोक ते कहउँ बखानी। प्रथम अबिद्या निसा नसानी॥
चौपाई ११
अघ उलूक जहँ तहाँ लुकाने। काम क्रोध कैरव सकुचाने॥
पहले अविद्या रूपी रात्रि नष्ट हो गयी। पाप रूपी उल्लू जहाँ-तहाँ छिप गये। काम और क्रोध रूपी कुमुद मुँद गये। जिन्हें शोक हुआ वे कोई राजा नहीं थे, कोई प्रजा नहीं थी, कोई पड़ोसी राज्य नहीं था। अज्ञान, पाप, काम और क्रोध, इन्हें शोक हुआ। और अब सूर्य वाली उपमा पूरी खुलती है: इस राज्य में जिनका बुरा हुआ, वे वही हैं जो अन्धेरे के बिना जी नहीं सकते।
और इन तीनों के साथ जो क्रियाएँ लगी हैं, वे तीन अलग-अलग क्रियाएँ हैं, और यही इस चौपाई की कारीगरी है। रात नष्ट हुई, क्योंकि प्रकाश आने पर रात बचती ही नहीं। उल्लू छिपे, क्योंकि उल्लू मरता नहीं, वह दिन में कहीं दुबक जाता है। और कुमुद मुँद गये, क्योंकि कुमुद रात में खिलनेवाला फूल है, वह न मरता है न भागता है, बस बन्द हो जाता है। अविद्या के लिये नाश, पाप के लिये छिपना, और काम-क्रोध के लिये सिर्फ़ सिकुड़ जाना। तीनों को वही मिला जो उनके स्वभाव के हिसाब से मिल सकता था।
आगे की चौपाई वही काम दो और जोड़ों पर करती है। भाँति-भाँति के कर्म, गुण, काल और स्वभाव, ये चकोर हैं, और इन्हें कभी सुख नहीं मिलता। चकोर उस पक्षी को कहते हैं जो चन्द्रमा को देखता रहता है और चाँदनी पर जीता है। जहाँ दिन भर एक प्रचंड सूर्य खड़ा हो, वहाँ चकोर के हिस्से में कुछ नहीं बचता, क्योंकि उसका भोजन ही किसी और रोशनी का था। और मत्सर, मान, मोह और मद, ये चोर हैं, और इनका हुनर किसी ओर नहीं चलता। चोर के लिये अन्धेरा औज़ार होता है। उजाले में उसकी विद्या बेकार नहीं होती, उसे लगाने की जगह नहीं मिलती।
धरम तड़ाग ग्यान बिग्याना। ए पंकज बिकसे बिधि नाना॥
चौपाई १२
सुख संतोष बिराग बिबेका। बिगत सोक ए कोक अनेका॥
धर्म रूपी तालाब में ज्ञान और विज्ञान रूपी अनेक प्रकार के कमल खिल उठे। सुख, संतोष, वैराग्य और विवेक, ये अनेक चकवे शोकरहित हो गये। यह उसी सूर्य का दूसरा पक्ष है, और तुलसी ने इसके लिये भी वही पक्षी-शास्त्र इस्तेमाल किया है। कमल दिन का फूल है, इसलिये जो रात में मुँदा था उसकी जगह अब यह खिलता है। और चकवा वह पक्षी है जिसके बारे में कहा जाता है कि रात भर वह अपनी जोड़ी से बिछड़ा रहता है और सूरज उगते ही मिलता है। इसीलिये उसके साथ यह शब्द जोड़ा गया है, शोकरहित। जो रात भर बिछड़ा रहा, उसका शोक दिन आते ही मिटता है।
यानी एक ही सूर्य ने कुमुद को मूँदा और कमल को खोला, उल्लू को छिपाया और चकवे को मिलाया, चकोर से उसका भोजन छीना और चोर से उसका अन्धेरा। किसी के साथ कोई अलग बर्ताव नहीं हुआ। उजाला सब पर बराबर पड़ा, और हर किसी ने वही पाया जो उसके अपने स्वभाव में लिखा था। रामराज्य में दंड इसी तरह काम करता है, और यही इस रूपक का पूरा तर्क है।
और तालाब पर एक क्षण रुकिये। थोड़ी देर पहले हम नगर के बाहर बावलियों और तालाबों के पास खड़े थे, जिनमें अनेक रंगों के कमल खिले थे। अब धर्म तालाब है और ज्ञान-विज्ञान उसमें खिलनेवाले अनेक प्रकार के कमल हैं। वही चित्र दुबारा आया है, पहली बार चूने और पत्थर का, दूसरी बार भीतर का। तुलसी ने बाहर का दृश्य पहले बना लिया था ताकि भीतर का दृश्य बनाते समय उन्हें कुछ नया न गढ़ना पड़े।
यह प्रताप रबि जाकें उर जब करइ प्रकास।
दोहा ३१
पछिले बाढ़हिं प्रथम जे कहे ते पावहिं नास॥ ३१॥
यह प्रताप रूपी सूर्य जिसके हृदय में जब प्रकाश करता है, तब जिनका वर्णन पीछे किया गया वे बढ़ जाते हैं, और जिनका वर्णन पहले किया गया वे नाश को प्राप्त होते हैं। दो शब्द इस दोहे को खोलते हैं: जाकें और उर। जिसके, और हृदय। अब तक यह सूर्य तीनों लोकों में उगा हुआ था। यहाँ वह किसी एक के भीतर उगता है।
और जब भी उतना ही ज़रूरी है। जिसके हृदय में जब, यानी किसी के लिये यह आज हो सकता है, किसी के लिये कभी। सूर्य एक ही है, तीनों लोक भर चुके हैं, पर हृदय में उसका उगना अलग-अलग घड़ी की बात है। और जिस क्रम में दोहा हिसाब देता है, वह भी देखिये। पहले उनका नाम आता है जो बढ़ते हैं, बाद में उनका जो नष्ट होते हैं। गिनती सुख से शुरू होती है।
सार: सम्बोधन बदलकर खगेश का हो जाता है और नगर पीछे छूट जाता है। रामप्रताप एक प्रचंड सूर्य की तरह उगता है, तीनों लोक भर जाते हैं, और तुलसी गिनाते हैं कि किसे सुख हुआ और किसे शोक। अविद्या नष्ट होती है, पाप छिपता है, काम-क्रोध मुँद जाते हैं, कर्म-गुण-काल-स्वभाव चकोर की तरह भूखे रह जाते हैं, और धर्म के तालाब में ज्ञान के कमल खिलते हैं। अन्तिम दोहा यह सारा उजाला एक हृदय के भीतर ले जाता है।
और अन्त में, अपनी ओर
इस पन्ने को एक साथ पढ़िये तो उसकी बनावट साफ़ दिखती है। वह एक दीवार से शुरू होता है और एक हृदय पर ख़त्म होता है, और बीच में वह लगातार भीतर की ओर आता रहता है। पहले घर के भीतर की चित्रशाला, फिर आँगन, फिर छत, फिर गली, फिर बाज़ार। फिर नदी और नगर के बाहर का सब कुछ, यानी सबसे दूर की चीज़। और ठीक उसके बाद कवि मुड़ता है और वापस लौटना शुरू करता है, पर इस बार बाहर से नहीं। लोगों की बातचीत के भीतर, फिर उपमाओं के भीतर, फिर उन शत्रुओं के भीतर जो किसी नगर में नहीं, आदमी के अपने ही मन में रहते हैं। और अन्त में एक ही शब्द बचता है, उर।
दूसरी बात पक्षियों की है, और वह इस काण्ड को जानते हुए पढ़ने पर ही खुलती है। इस पन्ने पर पक्षी लगातार आते हैं। मोर, हंस, सारस और कबूतर छतों पर नाचते हैं। तोता और मैना बच्चों से राम का नाम सीखते हैं। बावलियों के किनारे पक्षी कूजते हैं और कोयल राहगीरों को बुलाती है। फिर रूपक शुरू होता है और वहाँ भी पक्षी ही हैं, गरुड़, उल्लू, चकोर, चकवा। और यह सब जिसे सुनाया जा रहा है, वह स्वयं पक्षियों का राजा है। जिस काण्ड में सबसे लम्बी कथा एक पक्षी दूसरे पक्षी को सुनायेगा, उसमें अयोध्या का वर्णन भी पंखों से भरा हुआ है।
तीसरी बात वह है जो इन पाँच दोहों में नहीं है। भरत का नाम नहीं है, लक्ष्मण का नहीं, शत्रुघ्न का नहीं, हनुमान का नहीं, वसिष्ठ का नहीं। कौशल्या और कैकेयी और सुमित्रा का नहीं। जो अभी कुछ पन्ने पहले तक हर दृश्य में थे, वे यहाँ एक बार भी नहीं आते। राजा उपाधियों से आता है, रघुपति, जनपालक, रमानाथ, रमानिवास, कृपानिधान, और जनकसुता एक आधी पंक्ति में। बाक़ी सब जगह नगर है, और नगर के लोग हैं, जिनका कोई नाम नहीं है।
रामराज्य का वर्णन करने के दो तरीक़े होते हैं और तुलसी दोनों जानते थे। एक तरीक़ा वह है जो पिछले प्रसंग में बरता गया, कि गिनाकर बता दिया जाये कि क्या-क्या नहीं रहा। दूसरा तरीक़ा यह पन्ना है, कि कुछ भी घोषित न किया जाये और सिर्फ़ चला जाये। इस पन्ने पर कहीं यह नहीं लिखा कि यहाँ न्याय है। लिखा यह है कि राजघाट पर चारों वर्ण नहाते हैं। कहीं यह नहीं लिखा कि यहाँ लोभ नहीं है। लिखा यह है कि बाज़ार में वस्तु बिना दाम मिल जाती है और दुकानदार फिर भी कुबेर जैसा दिखता है। कहीं यह नहीं लिखा कि यहाँ के लोग धार्मिक हैं। लिखा यह है कि वे बैठकर आपस में एक-दूसरे को सिखाते हैं। जो चीज़ दिखायी जा सकती है उसे बताया नहीं गया, और शायद इसीलिये पाँच सौ बरस बाद भी यह नगर पढ़ते हुए बना रहता है।
और आख़िरी बात, जो इस पूरे पन्ने का भार उठाये हुए है। हम पूरे समय एक जगह में घूम रहे थे, और अन्तिम दोहे में पता चलता है कि वह जगह कहीं और भी हो सकती है। जिसके हृदय में यह प्रताप का सूर्य उगता है, उसमें भी वही होता है जो अवध में हुआ: कुछ बढ़ जाता है और कुछ नष्ट हो जाता है। इसलिये यह जो सैर अभी पूरी हुई, वह किसी दूर के नगर की सैर भी थी और किसी बहुत पास की चीज़ की भी। चित्रशाला हर घर में थी, और घर की गिनती दोहे ने नहीं दी।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, उत्तरकाण्ड, दोहा २७ से ३१, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।