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रामचरितमानसउत्तरकाण्डप्रसंग 6
अयोध्या नगरी, और प्रताप का सूर्य
घर-घर की दीवारों पर वही कथा जो यह ग्रन्थ कह रहा है। सरयू के बँधे हुए घाट जिनके किनारे पर कीचड़ तक नहीं। और अन्त में एक सूर्य, जिसके उगते ही कुछ खिल जाते हैं और कुछ छिपने की जगह ढूँढ़ने लगते हैं।
इस प्रसंग में कथा एक अंगुल भी आगे नहीं बढ़ती। कोई आता नहीं, कोई जाता नहीं, किसी के मुँह से ऐसा वाक्य नहीं निकलता जिससे अगला दृश्य बने। पूरे प्रसंग में एक नगर दिखाया जाता है। जैसे कोई अपने शहर में किसी को घुमाने निकला हो और रास्ते में हर चीज़ पर रुक जाता हो: पहले घरों की भीतरी दीवारें, फिर बाग़ और छतें। फिर राजद्वार, गली, चौराहा और बाज़ार। फिर उत्तर की ओर नदी, उसके घाट और घाटों का साफ़ बँटवारा। फिर नगर के बाहर की बावलियाँ और बगीचे। और इस पूरी सैर में एक बार भी यह नहीं कहा जाता कि यही रामराज्य है।
यह प्रसंग तीन हिस्सों में बँटा है। पहला हिस्सा सैर है, और उसमें आँख काम करती है: दीवार, फूल, परछाईं, छत, बाज़ार, घाट, बावली। दूसरे हिस्से में सैर के बीच से एक भजन उठता है: नगर के लोग जहाँ-तहाँ बैठकर एक-दूसरे को सिखाते हैं कि किसे भजना है। वह सीख देर तक चलती है। तीसरा हिस्सा नगर छोड़ देता है: वहाँ एक सूर्य उगता है, तीनों लोक उजाले से भर जाते हैं। गिना जाता है कि उस उजाले से किसे सुख हुआ और किसे शोक।
यह तुलसीदास का रामचरितमानस है। जिस पुरी की यह सैर है, उसका नाम इस प्रसंग में केवल एक बार आता है, अवध। और वह भी तब जब बात नगर पर छायी हुई सम्पदा की हो रही होती है। राजा का नाम बार-बार आता है, पर वे स्वयं इस सैर में कहीं चलते-फिरते नहीं दिखते। भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न, हनुमान, वसिष्ठ, किसी का नाम यहाँ नहीं है। सीता का नाम एक बार आता है, और उसी वाक्य में इस पूरे भजन का इकलौता प्रश्न भी है।
बालक, मुनि और अवधवासी
- राम इस प्रसंग के राजा, जो कहीं आते-जाते नहीं दिखते, पर नगर की हर चीज़ जिनसे समझायी जाती है।
- सीता जिनका नाम, मानस में जनकसुता, इस प्रसंग में केवल एक बार आता है, और उसी जगह जहाँ भजन का एकमात्र प्रश्न खड़ा होता है।
- अवध के नर-नारी जो जहाँ-तहाँ बैठकर एक-दूसरे को यही सिखाते हैं कि किसे भजना चाहिये, और जिनके गुणगान का उत्तर राजा की निरन्तर प्रसन्नता से मिलता है।
- बालक जिन्होंने घरों में पक्षी पाल रखे हैं और जो तोते-मैना को राम का नाम रटाते हैं। नगर की सैर का इकलौता सीधा बोल इन्हीं के मुँह में है।
- मुनि और संन्यासी जो सरयू के किनारे कहीं-कहीं विरक्त होकर बसते हैं और जिन्होंने किनारे-किनारे तुलसी के पौधों के झुंड लगा रखे हैं।
- गरुड़ पक्षियों के राजा, जिन्हें इस प्रसंग के अन्त में पक्षिराज कहकर सम्बोधित किया जाता है। कहने वाले का नाम यहाँ मानस में नहीं है। टीका उन्हें काकभुशुण्डि बताती है।
घर-घर की दीवार पर वही कथा
पिछला प्रसंग रामराज्य का हिसाब देकर बन्द हुआ था: कौन-सा दुःख नहीं रहा, कौन-सा भय नहीं रहा। वह बताने का तरीक़ा था। यह प्रसंग दिखाने से शुरू होता है, और पहली चीज़ जो दिखायी जाती है, वह न राजमहल है, न सिंहासन, न कोई जुलूस। वह घर के भीतर की दीवार है।
घर-घर में सुन्दर चित्रशालाएँ हैं, और हर चित्रशाला में राम का चरित्र सँवारकर अंकित है। जो मुनि उन्हें देखते हैं, उनका मन भी वे चित्र चुरा लेते हैं। किसी राहगीर का मन खींच लेना बड़ी बात नहीं। कथा चोर के सामने उसे खड़ा करती है जिसका सारा अभ्यास मन को न चुराने देने का रहा है। जिसने वर्षों में अपने भीतर पहरा बिठाया, वह एक दीवार के सामने खड़ा होकर वह पहरा भूल जाता है।
चित्रशाला किसी एक जगह नहीं है: हर घर में एक। घर की दीवार पर आदमी वही रखता है जिसे वह रोज़ देखना चाहता है। अवध के लोगों ने अपनी दीवारों के लिये अपने राजा की कथा चुनी, और उसे यों सँवारा कि देखने वाला ठहर जाय।
और जो कथा इन दीवारों पर अंकित है, वही यह ग्रन्थ कह रहा है। जिस चरित को मुनि दीवार पर देख रहे हैं, उसी चरित की यह कथा है। एक क्षण के लिये सुनने वाला और वे मुनि एक ही जगह आ खड़े होते हैं, दोनों राम की कथा के सामने। और जिस राजा की कथा हर दीवार पर है, वह इसी नगर में रहता है, अपने ही चरित्र से घिरा हुआ।
फूल, परछाईं, और वह पाठ जो बच्चे पढ़ाते हैं
दीवार से निकलकर वर्णन आँगन और बाग़ में आता है। सबने तरह-तरह की फूलों की वाटिकाएँ लगा रखी हैं, और यत्न से बनायी हैं। फूल अपने-आप भी उग आते हैं, पर वाटिका अपने-आप नहीं बनती। उसके लिये कोई रोज़ झुकता है, पानी देता है, कुछ काटता है। जिस नगर में किसी को कोई अभाव नहीं, वहाँ भी लोग मिट्टी में हाथ डालते हैं।
उन वाटिकाओं में बहुत जातियों की सुन्दर लताएँ हैं, जो सदा वसन्त की तरह फूलती रहती हैं। यह नहीं कहा गया कि अवध में सदा वसन्त रहता है। कहा गया है कि लताएँ ऐसे फूलती हैं जैसे वसन्त में। ऋतु अपनी जगह चलती रहती है, बस फूलना ऋतु का मुहताज नहीं रहा। यहाँ प्रकृति के नियम तोड़े नहीं गये, उन्हें एक और कारण मिल गया है।
फिर कान की बारी आती है। भौंरे मनोहर स्वर से गुंजार करते हैं, और तीन प्रकार की सुन्दर वायु सदा बहती रहती है। वे तीन कौन-सी हैं, यह न कथा बताती है, न टीका। इतना सामने है कि हवा एक जैसी नहीं, उसमें भेद है, और वह भेद रुककर पहचाना जा सकता है।
फिर पक्षी आते हैं, और उनके साथ इस नगर के बच्चे। बालकों ने बहुत-से पक्षी पाल रखे हैं, जो मीठा बोलते हैं और उड़ते हुए सुन्दर लगते हैं। और छतों पर एक दूसरी ही सभा जमी है।
मोर, हंस, सारस और कबूतर घरों के ऊपर बड़ी शोभा पाते हैं, और जहाँ-तहाँ अपनी परछाईं देखकर बहुत प्रकार से कूजते और नाचते हैं। कथा कहीं नहीं कहती कि घर मणियों के बने हैं या दीवारें चमकती हैं। केवल इतना कहती है कि पक्षियों को वहाँ अपनी परछाईं मिल जाती है। पोद्दार की टीका कोष्ठक में बताती है कि यह परछाईं मणियों की दीवारों और छतों में पड़ती है, पर वह जोड़ टीका का है। मानस में वैभव का नाम नहीं, केवल उसका प्रतिबिम्ब है।
और वह प्रतिबिम्ब जो करता है, वह और सुन्दर है। टीका के अनुसार पक्षी अपनी ही परछाईं को दूसरा पक्षी समझकर उसी से बोलने और उसी के सामने नाचने लगते हैं। इतनी सम्पत्ति का पहला नतीजा घमंड नहीं, छतों पर मची एक भोली-सी ग़लतफ़हमी है। नगर का वैभव यहाँ किसी पर भारी नहीं पड़ता। वह पक्षियों के नाचने का बहाना बन गया है।
छत से नज़र नीचे आती है, और नगर की इस सैर का इकलौता सीधा बोल मिलता है। वह किसी राजा या मुनि के मुँह में नहीं है।
बालक तोते और मैना को तीन शब्द रटाते हैं: राम, रघुपति, जनपालक। पहले नाम, जो सबसे छोटा और सबसे अपना है। फिर कुल, रघुपति, यानी वह पहचान जो जन्म से मिलती है। और फिर काम, जनपालक, यानी वह पहचान जो निभाने से बनती है। बच्चा पक्षी को पूरा परिचय देकर छोड़ता है, और उसका अन्तिम शब्द यह है कि यह आदमी लोगों को पालता है।
पढ़ाने वाला बालक है, और जो पढ़ा रहा है उसे यह पाठ पहले से आता है। यह नगर अपने बच्चों को कुछ सिखाने की चिन्ता में नहीं दिखता। बच्चे सीख चुके हैं और अब आगे सिखा रहे हैं। जिस बात के लिये आगे इसी काण्ड में लम्बे उपदेश आयेंगे, वह यहाँ एक आँगन में, खेल की तरह, अपने-आप चल रही है।
और इस काण्ड का बड़ा हिस्सा एक पक्षी के मुँह से एक पक्षी-राजा को सुनाया जाना है। उसी काण्ड के इस नगर-वर्णन में अवध के बच्चे अपने घर के पक्षियों को राम का नाम रटा रहे हैं।
राजद्वार से बाज़ार तक
फिर कथा घर से बाहर निकल आती है। राजद्वार सब प्रकार से सुन्दर है, और गलियाँ, चौराहे और बाज़ार सुन्दर हैं। राजद्वार को आधा वाक्य मिला है। उसके बाद वर्णन गली, चौराहे और बाज़ार की ओर मुड़ जाता है, और बाज़ार को पूरा एक लम्बा वर्णन मिलता है। इस नगर का असली दृश्य दरवाज़े पर नहीं, दुकानों पर है।
सुन्दर बाज़ार ऐसा है कि वर्णन करते नहीं बनता, और वहाँ वस्तुएँ बिना मूल्य के मिल जाती हैं। यह बाज़ार के वर्णन का पहला वाक्य है, और वह सबसे बड़ी बात कहकर आगे बढ़ जाता है। बिना मूल्य, यानी दुकानदार लेता नहीं: माल है, ग्राहक है, दुकान है, और बीच में से दाम हट गया है। यह किसी दान की बात नहीं, रोज़ का लेन-देन है जिसमें से एक चीज़ निकल गयी।
फिर कारण आता है, और वह किसी व्यवस्था का नहीं: जहाँ स्वयं लक्ष्मी के स्वामी राजा हों, वहाँ की सम्पत्ति का बखान कैसे किया जाय? राजा यहाँ रमानिवास कहलाते हैं, वह जिनमें लक्ष्मी का वास है। बाज़ार में दाम इसलिये नहीं हटे कि किसी ने भाव बाँधे। इसलिये हटे कि जिसके पास सब कुछ है वह इसी नगर में रहता है।
फिर दुकानों पर बैठे लोग आते हैं: बजाज, सराफ़ और दूसरे व्यापारी, जो बैठे हुए ऐसे जान पड़ते हैं मानो अनेक कुबेर हों। वस्तु बिना दाम मिलती है, और बेचने वाला कुबेर जैसा दिखता है। जहाँ दाम नहीं लिया जाता वहाँ दुकानदार का ग़रीब हो जाना सीधा हिसाब होता। यहाँ उलटा हुआ है, और कथा इस विरोध को सुलझाने नहीं बैठती, क्योंकि उसका उत्तर अभी आ चुका है।
फिर नज़र बाज़ार से हटकर उसमें चलने वालों पर जाती है। स्त्री, पुरुष, बच्चे और बूढ़े, जो भी हैं, सब सुखी, सब सदाचारी, सब सुन्दर। चार तरह के लोग गिनाये गये और तीनों विशेषण चारों पर बराबर डाल दिये गये, बिना किसी को छाँटे। सुखी पहले है, सुन्दर आख़िर में, और सदाचारी बीच में: जो दिखता है वह आख़िर में, जो भीतर है वह बीच में।
उत्तर की ओर, सरयू
अब सैर नगर से निकलकर नदी की ओर मुड़ती है, और दिशा बताकर मुड़ती है: नगर के उत्तर में नदी है, और वह नदी सरयू है।
उत्तर दिशा में सरयू बह रही हैं, जल निर्मल है और गहरा, मनोहर घाट बँधे हुए हैं, और किनारे पर ज़रा भी कीचड़ नहीं। ये तीन चीज़ें तीन तरह की हैं। जल का निर्मल और गहरा होना नदी का अपना गुण है। घाट का बँधा होना आदमी का काम है, पत्थर का, मेहनत का। और कीचड़ का न होना तीसरी चीज़ है, और सबसे कठिन।
नदी की तारीफ़ में जल की गहराई गिनायी जाती है, लहरों का वर्णन होता है। किनारे की कीचड़ किसी स्तुति में नहीं आती। वह उसी को याद रहती है जिसका कभी उतरते हुए पैर फिसला हो। पूरे नगर-वर्णन का यह बहुत व्यावहारिक ब्योरा नदी के वर्णन के अन्त में है।
कुछ दूरी पर अलग एक सुन्दर घाट है, जहाँ घोड़े और हाथी झुंड के झुंड जल पीते हैं। और पानी भरने के बहुत-से घाट हैं, बड़े मनोहर, जहाँ पुरुष स्नान नहीं करते। टीका इन्हें स्त्रियों के घाट बताती है। पशु नगर के घाटों से दूर रखे गये हैं, और कारण साथ ही है: वे वहाँ जल पीते हैं। जिस घाट पर हाथी-घोड़े उतरें वहाँ किनारा वैसा नहीं रह सकता जैसा अभी बताया गया था।
पनघटों की व्यवस्था कहीं घोषित नहीं की जाती, बस बता दी जाती है: पनघट बहुत हैं, मनोहर हैं, और वहाँ पुरुष नहीं नहाते। किसी नियम, दण्ड या पहरेदार का नाम नहीं। यह छोटी-सी बात एक पूरे नगर के शिष्टाचार की जानकारी इस तरह देती है जैसे कोई राह चलते बता रहा हो।
राजघाट सब प्रकार से सुन्दर और श्रेष्ठ है, और वहाँ चारों वर्णों के लोग स्नान करते हैं। पनघट की बात और यह बात आमने-सामने हैं। थोड़े-से शब्दों में वे बता देती हैं कि इस नगर में क्या अलग रखा जाता है और क्या अलग नहीं होने दिया जाता। स्त्रियों के घाट अलग हैं, पशुओं का घाट अलग है, और सबसे अच्छा घाट, राजा के नाम का, किसी के लिये अलग नहीं। रामराज्य का एक बहुत साफ़ ब्योरा यही छोटी-सी बात है, और वह उपदेश की तरह नहीं, घाट की तरह आता है।
फिर कथा किनारे पर आगे ले चलती है। सरयू के किनारे-किनारे देवताओं के मन्दिर हैं, और हर मन्दिर के चारों ओर सुन्दर उपवन। मन्दिर अकेले नहीं खड़े। उनके चारों तरफ़ छाया है, और नहाकर निकलने वालों के लिये जाने और बैठने की जगह है।
किनारे पर कहीं-कहीं एक और जमात है: विरक्त और ज्ञान में लगे मुनि और संन्यासी। उनके लिये कोई अलग बस्ती नहीं बनायी गयी, कोई अलग वन नहीं छोड़ा गया। वे उसी किनारे पर हैं जिस पर राजघाट है, पनघट हैं, मन्दिर हैं। जल पीते हाथी और संसार छोड़ चुके संन्यासी एक ही नदी के किनारे मिल जाते हैं।
और साथ ही: किनारे-किनारे तुलसी के पौधों के झुंड के झुंड हैं, और वे मुनियों ने लगाये हैं। जिन्होंने संसार छोड़ा, उन्होंने भी कुछ लगाया। विरक्ति यहाँ हाथ पर हाथ धरकर बैठने का नाम नहीं।
नगर के बाहर, और वह जिसके होने से यह सब है
अब कथा मान लेती है कि पुरी की शोभा कुछ कही नहीं जा सकती, और तुरन्त जोड़ देती है कि नगर के बाहर भी परम सुन्दरता है। हार मानकर वर्णन रुकता नहीं, दरवाज़े से बाहर निकल आता है। और बाहर निकलते ही एक वाक्य आता है जिसमें शर्त बहुत कम है: पुरी के दर्शन करते ही सारे पाप भाग जाते हैं। भीतर जाना नहीं कहा गया, स्नान नहीं, कोई अनुष्ठान नहीं। देखना कहा गया है, और देखना राह चलता आदमी भी कर लेता है।
बाहर क्या है, यह आगे खुलता है, और वह किसी सैर के आख़िरी हिस्से जैसा है, जब चाल धीमी पड़ जाती है। बावलियाँ हैं, तालाब हैं, बड़े मनोहर कुएँ हैं। उनकी सीढ़ियाँ सुन्दर हैं और जल निर्मल, और उन्हें देखकर देवता और मुनि तक मोहित हो जाते हैं। पोद्दार की टीका कोष्ठक में उन सीढ़ियों को रत्नों की बताती है, पर मानस इतना ही कहता है कि सीढ़ियाँ सुन्दर हैं। यहाँ भी मानस वैभव का नाम नहीं लेता, केवल उसका असर बताता है।
तालाबों में अनेक रंगों के कमल खिले हैं, बहुत-से पक्षी कूज रहे हैं, भौंरे गुंजार कर रहे हैं। अनेक रंगों के कमल इसी प्रसंग में लौटकर आयेंगे। और अन्त में रमणीय बगीचे कोयल आदि पक्षियों की बोली से मानो राह चलने वालों को बुला रहे हैं।
अब तक पूरी सैर में नगर को देखा जा रहा था। यहाँ पहली बार नगर कुछ करता है। वह बुलाता है, और अपने बाहरी किनारे से बुलाता है, उसे जो अभी भीतर आया भी नहीं, बस रास्ते से गुज़र रहा है। सैर का अन्त एक निमन्त्रण पर होता है।
जहाँ स्वयं लक्ष्मीपति राजा हों, उस नगर का वर्णन कहीं किया जा सकता है? अणिमा आदि आठों सिद्धियाँ और सारी सुख-सम्पदा अवध पर छायी हुई हैं। पहली बात प्रश्न है। वह तब आता है जब दीवारें, बाग़, बाज़ार, घाट और बावलियाँ गिनायी जा चुकी हैं: अब कहा जाता है कि यह नगर वर्णन के बाहर है। दोनों बातें एक साथ सच हैं। जितना दिखाया गया, वह यह बताने के लिये कि न दिखाया गया कितना है।
दूसरी बात की क्रिया है छाना: सिद्धियाँ और सम्पदाएँ अवध पर छा रही हैं। छाना बादल और छाया का काम है। उनका उपयोग किसी ने किया हो, यह नहीं कहा गया। अणिमा जैसी सिद्धि, जिसके लिये साधक जीवन खपा देते हैं, यहाँ नगर के ऊपर छाँव की तरह पड़ी है। नीचे लोग बाज़ार जा रहे हैं, पनघट पर पानी भर रहे हैं, बच्चे पक्षियों को पढ़ा रहे हैं।
और इस पूरे प्रसंग में नगर का नाम एक ही बार आता है, यहीं, अवध। बाक़ी जगह वह पुरी है, नगर है, पुर है। नाम लेकर उसे केवल यहाँ पुकारा जाता है, ठीक उस बात में जहाँ बात नगर पर पड़ी हुई छाया की हो रही है।
जो नगर आपस में बैठकर एक-दूसरे को सिखाता है
अब तक आँख काम कर रही थी। यहाँ से कान काम करता है। अब तक जो दिखाया जा रहा था वह बाहर था, दीवार, घाट, बाज़ार। अब जो सुनाया जायगा वह नगर के भीतर से, लोगों के मुँह से आ रहा है, और देर तक चलेगा।
लोग जहाँ-तहाँ राम के गुण गाते हैं और बैठकर आपस में एक-दूसरे को यही सिखाते हैं। बैठकर, यानी मंच से नहीं, किसी सभा में नहीं। और आपस में, यानी एक की ओर से दूसरे की ओर नहीं, दोनों ओर से। यहाँ कोई उपदेशक नहीं और कोई श्रोता-समूह नहीं। जो सिखा रहा है, वह अगले ही क्षण सीख रहा है।
और वे एक-दूसरे से कहते हैं, “शरणागत का पालन करने वाले राम को भजिये, जो शोभा, शील, रूप और गुणों के धाम हैं।” भजन की इस लड़ी का पहला शब्द रक्षा का है: पहले यह कि वे शरण में आये को पालते हैं, फिर यह कि वे किन-किन चीज़ों के धाम हैं।
फिर: “कमल जैसे नेत्रों वाले, साँवले शरीर वाले को भजिये। जैसे पलक नेत्रों की रक्षा करती है, वैसे अपने सेवकों की रक्षा करने वाले को भजिये।” इस लम्बी लड़ी में आगे जितने उपमान आयेंगे, गरुड़, किरात, सिंह, अग्नि, सूर्य, वे सब मारने वाले हैं। पलक अकेला उपमान है जो किसी को मारता नहीं।
रक्षा करने वाली चीज़ें प्रायः बाहर से आती हैं: ढाल, दीवार, पहरेदार, छत। पलक ऐसी रक्षा है जो जिसकी रक्षा करती है उसी का अंग है। वह माँगने पर नहीं गिरती। और इतनी तेज़ गिरती है कि उसकी गति देखी नहीं जाती। जो अपने ही भीतर से, बिना कहे, और इतनी जल्दी आये कि दिखे तक नहीं, रक्षा का यह पूरा चित्र है। और यह उसी बात में है जो कमल जैसे नेत्रों से शुरू हुई थी। इसलिये आँख यहाँ दो बार है: एक बार भजने योग्य के मुख पर, एक बार भजने वाले के भीतर।
फिर लोग सुन्दर बाण, धनुष और तरकस धारण करने वाले को, और संतों के कमल-वन के लिये सूर्य, रणधीर राम को भजने को कहते हैं। हथियार और सूर्य एक ही साँस में: जो हाथ धनुष उठाये है वही संतों के कमल-वन को खिलाता है, और खिलाने का काम सूर्य करता है, तोड़ने का नहीं। यह सूर्य इसी प्रसंग में लौटेगा।
फिर लड़ी एक नियम पर चलती है: कालरूपी भयानक सर्प के लिये गरुड़, लोभ और मोह रूपी हरिनों के झुंड के लिये किरात। कामदेव रूपी हाथी के लिये सिंह। और बीच में, निष्काम भाव से प्रणाम करते ही ममता का नाश करने वाले को, और सेवकों को सुख देने वाले को भजने की बात। हर बार पहले भीतर का एक शत्रु रखा जाता है, और फिर ठीक वह चीज़ उसके सामने रखी जाती है जो प्रकृति में उसे खाती है।
और नाप सधी हुई है। सर्प अकेला होता है, उसके सामने एक पक्षी। हरिन झुंड में चलते हैं, उनके सामने शिकारी, जो झुंड को खदेड़ता है। हाथी भारी होता है, उसके सामने सिंह। किसी शत्रु को उसकी नाप से बड़ा या छोटा उपाय नहीं दिया गया। और इनके बीच वह बात है जिसमें कोई शिकार नहीं: प्रणाम करते ही ममता चली जाती है। ममता के लिये शिकारी नहीं चाहिये, सिर झुकाना काफ़ी है।
फिर संशय और शोक के घने अन्धकार के लिये सूर्य, और राक्षसों के घने वन को जलाने वाली अग्नि। और फिर: “जन्म-मृत्यु के भय को तोड़ने वाले, सीता सहित राम को आप क्यों नहीं भजते?” यहाँ दो बातें पहली बार होती हैं। इस लड़ी में पहली बार राम अकेले नहीं, सीता उनके साथ हैं। और पहली बार आज्ञा हटकर प्रश्न आ जाता है।
अब तक हर बात भजिये, भजिये कह रही थी। यहाँ वह कहती है, क्यों नहीं भजते। और यह प्रश्न ठीक वहीं है जहाँ सीता का नाम है। जिस क्षण सिखाने वाले उस जोड़ी का नाम लेते हैं, उनकी आवाज़ बदल जाती है। आज्ञा में एक दूरी होती है। प्रश्न में वह दूरी नहीं बचती।
फिर बहुत-सी वासनाओं रूपी मच्छरों के लिये हिमराशि, बर्फ़ का ढेर। यह अनोखी उपमा है, और उसका कारण नाप में है। वासना बड़ी चीज़ नहीं, बहुत चीज़ है। एक मच्छर से कोई नहीं डरता, फिर भी मच्छर रात भर सोने नहीं देते। ऐसे शत्रु के सामने सिंह या गरुड़ भेजना बेकार है, क्योंकि वह एक जगह खड़ा ही नहीं होता। मच्छरों को कोई शिकारी नहीं, एक ऋतु ख़त्म करती है। बर्फ़ उस हवा को ही बदल देती है जिसमें मच्छर हो सकता था।
उसके तुरन्त बाद वह बात आती है जिसमें कोई उपमा नहीं: सदा एकरस, अजन्मा और अविनाशी को भजिये। सर्प, हरिन, हाथी, वन, मच्छर, सब हट जाते हैं। जो नित्य एक-जैसा है उसकी कोई उपमा बनती भी नहीं, क्योंकि हर उपमा किसी बदलती हुई चीज़ से ली जाती है।
और लड़ी का अन्त: मुनियों को आनन्द देने वाले, पृथ्वी का भार उतारने वाले, और तुलसीदास के उदार स्वामी को भजिये। जो शुरू में शरणागत का पालक था, वह अन्त में उदार है। बीच की सारी मार-काट के बाद अन्तिम शब्द दया का है। और यह पूरी सीख अवध के लोग आपस में दे रहे हैं, पर उसके अन्त में कवि अपना नाम, तुलसीदास, रख देते हैं।
इस प्रकार नगर के स्त्री-पुरुष राम का गुणगान करते हैं, और राम सदा सब पर अनुकूल रहते हैं। ये दो बातें दो दिशाओं में चलती हैं और बीच में कोई शर्त नहीं: नीचे से गान ऊपर जाता है, ऊपर से अनुकूलता नीचे आती है। नीचे गान का यही ढंग है, और ऊपर अनुकूलता लगातार रहती है। और पुरुष से पहले स्त्री का नाम आता है।
वह सूर्य, और जिन्हें उसके उगने से शोक हुआ
यहाँ कथा एक बार में नगर छोड़ देती है। फिर सम्बोधन आता है, और वह किसी नागरिक को नहीं है: कहने वाला गरुड़ को, पक्षियों के राजा को, पुकारता है। कहने वाले का अपना नाम यहाँ मानस में नहीं। पोद्दार की टीका उन्हें काकभुशुण्डि बताती है। जिस भेंट तक कथा अभी पहुँची नहीं, उसकी आवाज़ यहाँ पहले सुनायी देती है।
काकभुशुण्डि कहते हैं कि जब से रामप्रताप रूपी बहुत प्रचंड सूर्य उदित हुआ, तीनों लोकों में प्रकाश भर गया। उससे बहुतों को सुख हुआ और बहुतों के मन में शोक। अभी पूरा नगर दिखाया गया है जिसमें सब सुखी हैं, सब सदाचारी, सब सुन्दर। और उसके ठीक बाद, बिना तैयारी के, यह कहा जाता है कि इस उजाले से कुछ को शोक भी हुआ।
रामराज्य के वर्णन में हारने वालों का हिसाब देना ज़रूरी नहीं था। पर काकभुशुण्डि ठीक यहीं रुकते हैं और कहते हैं, “जिन्हें शोक हुआ, उन्हें मैं बखानकर कहता हूँ।” और वे नाम गिनाते हैं, और गिनाते ही सारा दृश्य पलट जाता है।
पहले अविद्या रूपी रात नष्ट हो गयी। पाप रूपी उल्लू जहाँ-तहाँ छिप गये। काम और क्रोध रूपी कुमुद मुँद गये। जिन्हें शोक हुआ वे कोई राजा, प्रजा या पड़ोसी राज्य नहीं थे। वे अज्ञान, पाप, काम और क्रोध थे। सूर्य वाली उपमा अब पूरी खुलती है: इस राज्य में जिनका बुरा हुआ, वे वही हैं जो अन्धेरे के बिना जी नहीं सकते।
और तीनों की क्रियाएँ अलग-अलग हैं। रात नष्ट हुई, क्योंकि प्रकाश आने पर रात बचती ही नहीं। उल्लू छिपे, क्योंकि उल्लू मरता नहीं, दिन में कहीं दुबक जाता है। और कुमुद मुँद गये, क्योंकि कुमुद रात में खिलने वाला फूल है, वह न मरता है न भागता है, बस बन्द हो जाता है। अविद्या के लिये नाश, पाप के लिये छिपना, और काम-क्रोध के लिये केवल सिकुड़ जाना: तीनों को वही मिला जो उनके स्वभाव से मिल सकता था।
फिर यही काम दो और जोड़ों पर होता है। तरह-तरह के कर्म, गुण, काल और स्वभाव चकोर हैं, और इन्हें कभी सुख नहीं मिलता। चकोर वह पक्षी है जो चन्द्रमा को देखता रहता है और चाँदनी पर जीता है। जहाँ दिन भर प्रचंड सूर्य खड़ा हो, वहाँ उसके हिस्से में कुछ नहीं बचता। और मत्सर, मान, मोह और मद चोर हैं, और इनका हुनर किसी ओर नहीं चलता। चोर के लिये अन्धेरा औज़ार होता है। उजाले में उसकी विद्या लगाने की जगह नहीं मिलती।
धर्म रूपी तालाब में ज्ञान और विज्ञान रूपी अनेक प्रकार के कमल खिल उठे। सुख, संतोष, वैराग्य और विवेक, ये अनेक चकवे शोकरहित हो गये। यह उसी सूर्य का दूसरा पक्ष है, और उसमें भी वही पक्षियों और फूलों की भाषा है। कमल दिन का फूल है, इसलिये जो रात में मुँदा था उसकी जगह अब यह खिलता है। और चकवे के बारे में कहा जाता है कि रात भर वह अपनी जोड़ी से बिछड़ा रहता है और सूरज उगते ही मिलता है। इसीलिये उसके साथ शब्द है, शोकरहित।
यानी एक ही सूर्य ने कुमुद को मूँदा और कमल को खोला, उल्लू को छिपाया और चकवे को मिलाया, चकोर से उसका भोजन छीना और चोर से उसका अन्धेरा। किसी के साथ अलग बर्ताव नहीं हुआ। उजाला सब पर बराबर पड़ा, और हर किसी ने वही पाया जो उसके अपने स्वभाव में लिखा था।
और तालाब: थोड़ा पहले नगर के बाहर की बावलियों और तालाबों में अनेक रंगों के कमल खिले थे। अब धर्म तालाब है और ज्ञान-विज्ञान उसमें खिलने वाले अनेक प्रकार के कमल हैं। वही चित्र दुबारा आया है, पहली बार चूने और पत्थर का, दूसरी बार भीतर का।
यह प्रताप रूपी सूर्य जिसके हृदय में जब प्रकाश करता है, तब जिनका वर्णन पीछे किया गया वे बढ़ जाते हैं। और जिनका वर्णन पहले किया गया वे नष्ट हो जाते हैं। दो शब्द इस बात को खोलते हैं: जिसके, और हृदय। अब तक यह सूर्य तीनों लोकों में उगा हुआ था। यहाँ वह किसी एक के भीतर उगता है।
और जब भी उतना ही ज़रूरी है: जिसके हृदय में जब, यानी किसी के लिये आज, किसी के लिये कभी। सूर्य एक ही है और तीनों लोक भर चुके हैं, पर हृदय में उसका उगना अलग-अलग घड़ी की बात है। और कथा पहले उनका नाम लेती है जो बढ़ते हैं, बाद में उनका जो नष्ट होते हैं। गिनती सुख से शुरू होती है।
दीवार से हृदय तक
यह सैर एक दीवार से शुरू होकर एक हृदय पर ख़त्म होती है। पहले घर के भीतर की चित्रशाला, फिर आँगन, छत, गली, बाज़ार। फिर नदी और नगर के बाहर का सब कुछ, यानी सबसे दूर की चीज़। उसके बाद कथा मुड़ती है और लौटना शुरू करती है। पर इस बार बाहर से नहीं: लोगों की बातचीत के भीतर, फिर उपमाओं के भीतर, फिर उन शत्रुओं के भीतर जो आदमी के अपने ही मन में रहते हैं। और अन्त में एक ही शब्द बचता है, हृदय।
दूसरी बात पक्षियों की है। इस प्रसंग में पक्षी लगातार आते हैं: मोर, हंस, सारस और कबूतर छतों पर नाचते हैं, तोता और मैना बच्चों से राम का नाम सीखते हैं। बावलियों के किनारे पक्षी कूजते हैं और कोयल राहगीरों को बुलाती है। फिर रूपक में भी पक्षी ही हैं: गरुड़, उल्लू, चकोर, चकवा। और यह सब जिसे सुनाया जा रहा है, वह स्वयं पक्षियों का राजा है। जिस काण्ड में एक लम्बी कथा एक पक्षी दूसरे पक्षी को सुनायेगा, उसमें अयोध्या का वर्णन भी पंखों से भरा है।
तीसरी बात वह है जो इस प्रसंग में नहीं है। भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न, हनुमान, वसिष्ठ, कौसल्या, कैकेयी, सुमित्रा, किसी का नाम नहीं। जो कुछ ही पहले तक हर दृश्य में थे, वे यहाँ एक बार भी नहीं आते। राम मानस में यहाँ अपनी उपाधियों से आते हैं, रघुपति, जनपालक, रमानाथ, रमानिवास, कृपानिधान, और सीता एक बार, जनकसुता नाम से। बाक़ी सब जगह नगर है, और नगर के लोग, जिनका कोई नाम नहीं।
रामराज्य का वर्णन दो तरह से होता है। एक वह जो पिछले प्रसंग में था, कि गिनाकर बता दिया जाय कि क्या-क्या नहीं रहा। दूसरा यह सैर है, कि कुछ भी घोषित न किया जाय और बस चला जाय। इस प्रसंग में कहीं नहीं लिखा कि यहाँ न्याय है। लिखा है कि राजघाट पर चारों वर्ण नहाते हैं। कहीं नहीं लिखा कि यहाँ लोभ नहीं। लिखा है कि बाज़ार में वस्तु बिना दाम मिलती है और दुकानदार फिर भी कुबेर जैसा दिखता है। कहीं नहीं लिखा कि यहाँ के लोग धार्मिक हैं। लिखा है कि वे बैठकर आपस में एक-दूसरे को सिखाते हैं।
और अन्त में पता चलता है कि जिस जगह की यह सैर थी, वह कहीं और भी हो सकती है। जिसके हृदय में यह प्रताप का सूर्य उगता है, उसमें भी वही होता है जो अवध में हुआ: कुछ बढ़ जाता है और कुछ नष्ट हो जाता है। यह सैर किसी दूर के नगर की भी थी और किसी बहुत पास की चीज़ की भी। चित्रशाला हर घर में थी, और घरों की गिनती कथा ने नहीं दी।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, उत्तरकाण्ड, दोहा 27 से 31, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।