रामचरितमानस · उत्तरकाण्ड · संत और असंत के लक्षण
संत और असंत के लक्षण
भरत एक ढिठाई की अनुमति लेकर पूछते हैं कि संत को किस निशानी से पहचाना जाय, और उत्तर में मिलती हैं दो लम्बी सूचियाँ, फिर एक दोहा जो दोनों सूचियों पर हाथ फेर देता है, और अन्त में हाथ जोड़कर कही गयी एक गुप्त बात।
देखने में उत्तरकाण्ड का यह हिस्सा एक सूची है। पहले संत के लक्षण गिनाये जाते हैं, फिर असंत के, और गिनती इतनी लम्बी चलती है कि बीच में यह भूल जाना आसान है कि यह कथा का पन्ना है। पर सूची के अन्त में एक दोहा रखा हुआ है जो पीछे मुड़कर सारी गिनती पर हाथ फेर देता है, और उसके बाद जो कहा जाता है वह सुनने में उलटा लगता है। इसी उलटे लगने में इस पन्ने का असली काम है।
पूछनेवाला यहाँ कोई ऋषि नहीं है, कोई जिज्ञासु राजा नहीं है। उत्तर देते हुए बीच में एक जगह नाम ले लिया जाता है, भरत, और उसी से पता चलता है कि यह प्रश्न किसका था। पूछने से पहले उसे अपने पूछने के लिये एक शब्द चुनना पड़ा है, ढिठाई, और अपने लिये एक हैसियत लेनी पड़ी है, सेवक की। जो बात वे पूछ रहे हैं वह बड़े भाई से नहीं पूछी जा सकती थी।
और यह पन्ना एक जगह पर नहीं रहता। दोहा इकतालीस तक यह उत्तर चलता है, फिर सभा उठ जाती है, राम अपने महल को चले जाते हैं, नारद अयोध्या की कथा ब्रह्मलोक तक ले जाते हैं, और उसके बाद दूसरी सभा बैठती है। उस दूसरी सभा में सुननेवाला भाई नहीं, पूरा नगर है, और वहाँ जो कहा जाता है वह लक्षणों की बात नहीं, मनुष्य देह की बात है, और अन्त में भक्ति की। इस पन्ने की आख़िरी पंक्ति तुलसी की अपनी है और वह पूरी पोथी का भार उठाये हुए है।
इस प्रसंग के मुख्य किरदार
- श्रीराम जो इस पन्ने पर दो बार बोलते हैं, पहले अपने भाई के एक प्रश्न पर और फिर पूरी अयोध्या के सामने, और दूसरी बार बोलने से पहले अपने सुननेवालों को अपने को रोक देने का अधिकार दे देते हैं।
- भरत वे भाई जो ढिठाई की अनुमति लेकर पूछते हैं कि संत और असंत का भेद अलग अलग करके समझाया जाय, और जिनका नाम उत्तर के बीच में एक बार सीधे पुकारा जाता है।
- हनुमान इसी सभा में उपस्थित, जिनके हृदय का हर्ष उत्तर पूरा होने पर सबसे अलग गिनाया जाता है और अपार कहा जाता है।
- नारद जो अयोध्या में बार बार आते हैं, राम के पवित्र चरित्र गाते हैं, और वही कथा ब्रह्मलोक तक पहुँचा देते हैं।
- ब्रह्मा बिरंचि, जो वह कथा सुनकर अत्यन्त सुख मानते हैं और बार बार कहते हैं कि गुणगान और कीजिये।
- सनकादि चार ब्रह्मनिष्ठ मुनि, जो नारद की सराहना करते हैं और गुणगान सुनते ही अपनी समाधि भुला बैठते हैं।
- गुरु और पुरवासी दूसरी सभा के सुननेवाले, जिनमें ब्राह्मण और नगर के सब लोग हैं, और जिनसे कहा जाता है कि जो अच्छा लगे वही कीजिये।
एक ढिठाई, और उसके बाद का प्रश्न
यह प्रसंग किसी घटना से नहीं खुलता, एक अनुमति से खुलता है। बोलनेवाला पहले अपने बोलने के लिये जगह बनाता है, और जो शब्द वह अपने प्रश्न के लिये चुनता है वह ढिठाई है। यानी पूछने से पहले ही यह मान लिया गया है कि पूछना अपनी सीमा से बाहर पाँव रखना है। और उसी साँस में वह कारण भी रख दिया जाता है जिससे यह ढिठाई चल जायगी, कि पूछनेवाला सेवक है और सुननेवाला वह है जो सेवकों को सुख देता है।
करउँ कृपानिधि एक ढिठाई । मैं सेवक तुम्ह जन सुखदाई॥
चौपाई १
संतन्ह कै महिमा रघुराई । बहु बिधि बेद पुरानन्ह गाई॥
हे कृपानिधान, मैं एक धृष्टता करता हूँ, मैं सेवक हूँ और आप जनों को सुख देनेवाले हैं। हे रघुनाथ, संतों की महिमा वेद और पुराण बहुत प्रकार से गा चुके हैं। दो पंक्तियों में दो अलग अलग काम हो गये। पहली में अपनी हैसियत बता दी गयी, दूसरी में विषय खोल दिया गया, और विषय ऐसा चुना गया जिसके लिये किसी नयी गवाही की आवश्यकता नहीं रहती, क्योंकि गवाही पहले से मौजूद है।
अगली चौपाई में वही गवाही एक क़दम और पास आ जाती है। वेद और पुराण तो अपनी जगह हैं, पर उनकी बड़ाई आपने अपने श्रीमुख से भी की है, और उन पर आपका प्रेम भी अधिक है। यानी जिससे पूछा जा रहा है वही इस विषय का पहला साक्षी है। और तब माँग रखी जाती है, मैं उनके लक्षण सुनना चाहता हूँ। लक्षण, यानी वह निशानी जिससे पहचान होती है। पूछनेवाले को संतों की महिमा नहीं चाहिये, उसे पहचान चाहिये।
तीसरी चौपाई में प्रश्न पूरा होता है, और उसका पूरा होना ध्यान देने लायक है। संत और असंत का भेद अलग अलग करके समझाइये। दो सूचियाँ माँगी गयी हैं, एक नहीं। जो केवल संत के लक्षण जानता है वह आधा जानता है, क्योंकि पहचानने का काम वहाँ पड़ता है जहाँ नक़ल भी साथ ही खड़ी रहती है। और उत्तर इसी चौपाई की दूसरी आधी पंक्ति से शुरू हो जाता है, हे भाई सुनो, संतों के लक्षण अनगिनत हैं, वेद और पुराणों में प्रसिद्ध हैं।
उत्तर में जो सम्बोधन आते हैं वे पूछनेवाले को खोल देते हैं। भाई, तात, और एक जगह सीधा नाम, भरत। तो यह किसी दरबार की बातचीत नहीं है। एक भाई ने दूसरे भाई से पूछा है, और पूछने के लिये उसे सेवक की हैसियत लेनी पड़ी, क्योंकि भाई की हैसियत से यह बात पूछी ही नहीं जा सकती थी। इस एक बात को याद रखिये, क्योंकि आगे दूसरी सभा में यही उलट जायगी और वहाँ अधिकार सुननेवालों को दे दिया जायगा।
सार: भरत ढिठाई की अनुमति लेकर, अपने को सेवक बताकर पूछते हैं कि संत और असंत का भेद अलग अलग करके समझाइये, क्योंकि उनकी महिमा वेद और पुराण गा चुके हैं और आपने अपने श्रीमुख से भी उनकी बड़ाई की है। उन्हें महिमा नहीं, पहचान चाहिये। उत्तर उसी चौपाई में शुरू हो जाता है।
कुल्हाड़ी और चन्दन
उत्तर सूची से शुरू नहीं होता। वह एक चित्र से शुरू होता है, और उस चित्र में दो चीज़ें हैं जिनके बीच एक ही रिश्ता है, एक दूसरी को काटती है। यह चुनाव मामूली नहीं है। जिसने भेद पूछा था उसे भेद बताने के बजाय एक ऐसी जोड़ी दिखा दी जाती है जिसमें दोनों एक ही जगह, एक ही समय, एक ही काम के बीच खड़े हैं, और फिर भी दोनों का किया हुआ आमने सामने पड़ा है।
संत असंतन्हि कै असि करनी। जिमि कुठार चंदन आचरनी॥
चौपाई २
काटइ परसु मलय सुनु भाई । निज गुन देइ सुगंध बसाई॥
संत और असंतों की करनी ऐसी है जैसे कुल्हाड़ी और चन्दन का आचरण। हे भाई सुनो, कुल्हाड़ी चन्दन को काटती है, और चन्दन अपना गुण देकर उसे सुगन्ध से बसा देता है। दोनों के लिये एक ही शब्द रखा गया है, करनी और आचरनी, यानी दोनों वही कर रहे हैं जो उनका करना है। कुल्हाड़ी बुरी नहीं कही गयी, उसका काम काटना है। और चन्दन को भला कहकर छोड़ा नहीं गया, उसका काम अपना गुण दे देना है।
इस उपमा की सबसे कड़ी बात यही है कि इसमें चन्दन को कोई निर्णय नहीं लेना पड़ता। वह क्षमा नहीं कर रहा, वह बदला नहीं ले रहा, वह लौटाकर कुछ और दे भी नहीं रहा। जो उसके पास है वही दे रहा है, और उसके पास सुगन्ध के सिवा कुछ है ही नहीं। निज गुन देइ, अपना गुण देकर। इसीलिये यह उत्तर लक्षणों की सूची से पहले आता है, क्योंकि लक्षण गिनाये जा सकते हैं और स्वभाव गिनाया नहीं जाता, वह कटने के समय दिखता है।
ताते सुर सीसन्ह चढ़त जग बल्लभ श्रीखंड।
दोहा ३७
अनल दाहि पीटत घनहिं परसु बदन यह दंड॥ ३७॥
इसी गुण के कारण चन्दन देवताओं के सिरों पर चढ़ता है और जगत् का प्रिय बना हुआ है, और कुल्हाड़ी के मुख को यह दण्ड मिलता है कि उसे आग में जलाकर घन से पीटा जाता है। दण्ड कहाँ पड़ता है, यह देखिये। मुख पर, यानी ठीक उसी धार पर जिससे काटा गया था। जो हिस्सा काम में आया था वही हिस्सा आग में जाता है और वहीं हथौड़ा पड़ता है।
और दोनों का जो होता है वह किसी तीसरे के हाथ से होता है। चन्दन अपने आप देवता के सिर पर नहीं चढ़ता, उसे चढ़ाया जाता है। कुल्हाड़ी अपने को भट्ठी में नहीं डालती, वह डाली जाती है। यानी करनी अपनी है और फल किसी और के हाथ से आता है, और यही बात इस पूरे पन्ने के सबसे अन्त तक साथ चलती है, जहाँ फल देनेवाला अपना नाम ले लेगा।
सार: उत्तर कुल्हाड़ी और चन्दन के चित्र से शुरू होता है। कुल्हाड़ी चन्दन को काटती है और चन्दन अपना गुण देकर उसी कुल्हाड़ी को सुगन्धित कर देता है। इसीलिये चन्दन देवताओं के सिरों पर चढ़ता है और जगत् को प्रिय है, और कुल्हाड़ी के मुख को आग और घन का दण्ड मिलता है।
संत के लक्षण
अब सूची शुरू होती है, और उसका ढंग पहली पंक्ति से ही साफ़ हो जाता है। लक्षण बाहर के काम नहीं हैं। वे भीतर की हालतें हैं, और उन्हें ऐसे गिनाया जाता है जैसे कोई एक ही साँस में सब कह देना चाहता हो।
बिषय अलंपट सील गुनाकर। पर दुख दुख सुख सुख देखे पर॥
चौपाई ३
सम अभूतरिपु बिमद बिरागी। लोभामरष हरष भय त्यागी॥
वे विषयों में लिप्त नहीं होते, शील और सद्गुणों की खान होते हैं। पराया दुख देखकर उन्हें दुख होता है और पराया सुख देखकर सुख। वे समता रखते हैं, किसी को अपना शत्रु नहीं मानते, मद से रहित और वैराग्यवान् होते हैं, और लोभ, क्रोध, हर्ष तथा भय का त्याग किये रहते हैं। इस पूरी गिनती में सबसे अनोखी पंक्ति दूसरी है, जिसमें चार ही शब्द हैं और दो उनमें दोहराये हुए हैं।
और उसी पंक्ति में एक बात छिपी है जो जल्दी में निकल जाती है। त्यागी जानेवाली चीज़ों में हर्ष भी गिना गया है, और फिर भी पराये सुख से सुख होना लक्षण बताया गया है। तो जो छोड़ा गया वह अपना हर्ष है, और जो बचाया गया वह उधार लिया हुआ सुख है। संत के भीतर का मौसम अपना नहीं रह जाता, वह सामनेवाले के हाल से बनता है, और इसीलिये उसमें अपना कुछ रखने को बचता ही नहीं।
अगली चौपाई भीतर से बाहर की ओर आती है। चित्त कोमल, दीनों पर दया, और मन, वचन तथा कर्म से निष्कपट भक्ति। फिर वह पंक्ति जिसमें दो टुकड़े आमने सामने रख दिये गये हैं, सबको मान देते हैं और स्वयं मान नहीं रखते। और इसी पंक्ति के अन्त में उत्तर देनेवाला अपने सुननेवाले का नाम ले लेता है और कहता है कि ऐसे प्राणी मेरे प्राणों के समान हैं। यही वह जगह है जहाँ पूरे पन्ने पर एक बार भरत का नाम आता है।
बिगत काम मम नाम परायन। सांति बिरति बिनती मुदितायन॥
चौपाई ४
सीतलता सरलता मयत्री। द्विज पद प्रीति धर्म जनयत्री॥
उनमें कोई कामना नहीं होती, वे मेरे नाम के परायण होते हैं, और शान्ति, वैराग्य, विनय तथा प्रसन्नता के घर होते हैं। उनमें शीतलता है, सरलता है, सबके प्रति मित्रभाव है, और ब्राह्मण के चरणों में प्रीति है, जो धर्मों को जन्म देनेवाली है। इस पूरी सूची में अन्तिम लक्षण बाकियों से अलग जाति का है। बाक़ी सब हालतें हैं, यह एक काम है, और उसका पता भी दिया हुआ है।
और उसे जो नाम दिया गया है वह और भी अलग है, धर्म जनयत्री, धर्मों को उत्पन्न करनेवाली। यानी यह उन गुणों में से एक नहीं है, यह वह जड़ है जिससे बाक़ी उगते हैं। इस आधी पंक्ति को याद रखिये। इस पन्ने के सबसे अन्त में, जब भक्ति का पूरा रास्ता बताया जा चुका होगा और उसकी एक ही शर्त बची होगी, तब यही बात दूसरे शब्दों में लौटकर आयेगी और उसे जगत् का एकमात्र पुण्य कहा जायगा।
और तब सूची अपने ऊपर मुहर लगाती है। ये सब लक्षण जिसके हृदय में बसते हों उसे सदा सच्चा संत जानिये। फिर दो बातें और जुड़ती हैं, वे शम, दम, नियम और नीति से कभी नहीं डोलते, और मुख से कभी कठोर वचन नहीं बोलते। इतनी ऊँची गिनती का अन्तिम लक्षण सबसे छोटा और सबसे रोज़ का है, कि कड़वा नहीं बोलते। जिन बातों से आदमी परखा जाता है उनमें यह सबसे सस्ती दिखती है और सबसे कम निभती है।
निंदा अस्तुति उभय सम ममता मम पद कंज।
दोहा ३८
ते सज्जन मम प्रानप्रिय गुन मंदिर सुखपुंज॥ ३८॥
जिन्हें निन्दा और बड़ाई दोनों समान हैं और मेरे चरणकमलों में जिनकी ममता है, वे संत मुझे प्राणों के समान प्रिय हैं, वे गुणों के मन्दिर और सुख की राशि हैं। अब तक की पूरी सूची छीनती चली आयी थी, कामना नहीं, मद नहीं, लोभ नहीं, हर्ष नहीं, भय नहीं, अपना मान नहीं। और यहाँ आकर एक चीज़ रख दी जाती है, ममता, वही चीज़ जिसे हर सूची सबसे पहले काटती है।
पर उसे रखते समय उसका पता भी साथ ही लिख दिया गया है, मम पद कंज। यानी संत वह नहीं जिसके भीतर कुछ बचा ही न हो। वह वह है जिसके भीतर जो बचा है उसका एक ही ठिकाना है। और यह बात उसी पंक्ति में कही गयी है जिसमें निन्दा और स्तुति को बराबर बताया गया, क्योंकि जिसकी ममता का एक पता हो चुका है उसे बाक़ी सब पतों से आनेवाली चिट्ठियाँ एक जैसी लगने लगती हैं।
सार: संत के लक्षण इस प्रकार गिनाये जाते हैं, विषयों में अलिप्त, शील और गुणों की खान, पराये दुख से दुखी और पराये सुख से सुखी, समतावान्, किसी को शत्रु न माननेवाले, मद से रहित, वैरागी, लोभ, क्रोध, हर्ष और भय के त्यागी, कोमलचित्त, दीनों पर दयालु, निष्कपट भक्तिवाले, सबको मान देनेवाले और स्वयं मानरहित, शान्ति तथा विनय के घर, और ब्राह्मण के चरणों में प्रीति रखनेवाले। निन्दा और स्तुति जिन्हें समान हैं और जिनकी ममता मेरे चरणकमलों में है, वे मुझे प्राणों के समान प्रिय हैं।
असंत का स्वभाव
दूसरी सूची पहली की तरह शुरू नहीं होती। पहली सूची यह बताकर शुरू हुई थी कि संत कैसे होते हैं। दूसरी यह बताकर शुरू होती है कि उनके साथ क्या नहीं करना है। यानी यह सूची जानने के लिये नहीं, बचने के लिये दी जा रही है, और उसका काम भी उसी पहली पंक्ति में लिख दिया गया है।
सुनहु असंतन्ह केर सुभाऊ। भूलेहुँ संगति करिअ न काऊ॥
चौपाई ५
तिन्ह कर संग सदा दुखदाई । जिमि कपिलहि घालइ हरहाई॥
अब असंतों का स्वभाव सुनिये, भूलकर भी कभी उनकी संगति न कीजिये। उनका संग सदा दुख देनेवाला है, जैसे हरहाई गाय कपिला को अपने संग से बिगाड़ देती है। उपमा में हिंसा नहीं है, यह ध्यान देने की चीज़ है। हरहाई कपिला को मारती नहीं, सींग नहीं चलाती। वह बस पास खड़ी रहती है और उतने से ही काम बिगड़ जाता है। इसीलिये चेतावनी बुराई से नहीं, पास खड़े होने से दी गयी है।
खलन्ह हृदयँ अति ताप बिसेषी। जरहिं सदा पर संपति देखी॥
चौपाई ६
जहँ कहुँ निंदा सुनहिं पराई । हरषहिं मनहुँ परी निधि पाई॥
दुष्टों के हृदय में बहुत अधिक ताप रहता है और वे पराई सम्पत्ति देखकर सदा जलते रहते हैं। जहाँ कहीं पराई निन्दा सुन पाते हैं वहाँ ऐसे हर्षित होते हैं मानो रास्ते में पड़ी हुई निधि मिल गयी हो। अब पीछे मुड़कर संत की उस पंक्ति को देखिये जिसमें पराये दुख से दुख और पराये सुख से सुख कहा गया था। मशीन दोनों जगह एक ही है। दोनों का भीतरी मौसम किसी दूसरे के हाल से बनता है।
अन्तर केवल चिह्न का है। संत में दूसरे का सुख सुख बनकर आता है, असंत में दूसरे का सुख जलन बनकर आता है, और दूसरे की बदनामी उसके लिये वह चीज़ है जो बिना मेहनत के रास्ते में पड़ी मिल जाय। निधि की उपमा यहीं काटती है, क्योंकि निधि वह धन है जो कमाया नहीं जाता, मिल जाता है, और निन्दा भी ठीक वही चीज़ है, बिना कुछ किये हाथ आयी हुई कमाई।
अगली चौपाई में गिनती तेज़ हो जाती है। काम, क्रोध, मद और लोभ के परायण, निर्दय, कपटी, कुटिल, और पापों के घर। और फिर वह पंक्ति जो सबसे अधिक चुभती है, बिना किसी कारण के सबसे वैर करते हैं, और जो भलाई करे उसके साथ भी बुराई करते हैं। अकारन, यानी वैर के लिये उन्हें कोई घटना भी नहीं चाहिये। वैर पहले से तैयार रहता है और सामनेवाला बाद में मिलता है।
झूठइ लेना झूठइ देना। झूठइ भोजन झूठ चबेना॥
चौपाई ७
बोलहिं मधुर बचन जिमि मोरा । खाइ महा अहि हृदय कठोरा॥
उनका लेना झूठा, देना झूठा, भोजन झूठा और चबेना भी झूठा। टीका इस पंक्ति को खोलकर बताती है कि यह लेन देन में झूठ का सहारा लेकर दूसरे का हक़ मार लेना भी है और झूठी डींग हाँकना भी, कि लाखों ले लिये, करोड़ों का दान कर दिया, खाया चने की रोटी और कहा कि आज ख़ूब माल उड़ाकर आये। चार झूठ में पूरा दिन आ जाता है, जो लिया, जो दिया, जो खाया, और बीच में जो मुट्ठी भर चबाया।
और उसी चौपाई की दूसरी पंक्ति में वह पक्षी आता है जिसे सुनकर उपमा एकदम पलट जाती है। वे मीठे वचन ऐसे बोलते हैं जैसे मोर, जिसका हृदय इतना कठोर होता है कि वह बड़े बड़े विषैले साँपों को खा जाता है। मोर को उठाया गया है, कौआ या गीध नहीं, क्योंकि जिस चीज़ की बात हो रही है वह छिपाव है, और छिपाव के लिये सुन्दर पक्षी ही चाहिये था।
पर द्रोही पर दार रत पर धन पर अपबाद।
दोहा ३९
ते नर पाँवर पापमय देह धरें मनुजाद॥ ३९॥
वे दूसरों से द्रोह करते हैं और पराई स्त्री, पराये धन तथा पराई निन्दा में लगे रहते हैं, और ऐसे पामर तथा पापमय मनुष्य मनुष्य की देह धारण किये हुए राक्षस हैं। इस दोहे की पहली पंक्ति में एक ही शब्द चार बार आता है, पर। पर द्रोही, पर दार, पर धन, पर अपबाद। पूरी पहचान एक ही शब्द के आसपास बाँध दी गयी है, और वह शब्द है दूसरा।
सार: असंतों का स्वभाव सुनाते हुए पहले चेतावनी दी जाती है कि भूलकर भी उनकी संगति न हो, जैसे हरहाई गाय कपिला को अपने संग से बिगाड़ देती है। वे पराई सम्पत्ति देखकर जलते हैं और पराई निन्दा सुनकर ऐसे हर्षित होते हैं मानो पड़ी हुई निधि मिल गयी हो, बिना कारण सबसे वैर करते हैं, झूठ में जीते हैं, और मोर की तरह मीठा बोलकर कठोर हृदय रखते हैं। दोहे में उनकी सारी पहचान एक ही शब्द पर टिका दी जाती है।
लोभ का ओढ़ना, और वह युग जो आगे है
सूची यहीं नहीं रुकती, और आगे जो आता है उसमें उपमाएँ और घरेलू होती जाती हैं। लोभ ही उनका ओढ़ना है और लोभ ही बिछौना। ओढ़ना और बिछौना, दोनों एक साथ रख देने से एक पूरी रात बन जाती है, ऊपर भी वही और नीचे भी वही, और बीच में सोनेवाला। फिर कहा जाता है कि वे आहार और मैथुन के परायण रहते हैं और उन्हें यमपुर का भय नहीं लगता।
और उसके बाद दो पंक्तियाँ ऐसी आती हैं जो जोड़े में पढ़ी जानी चाहिये। किसी की बड़ाई सुन पाते हैं तो ऐसी साँस लेते हैं मानो जूड़ी चढ़ आयी हो। और किसी की विपत्ति देखते हैं तो ऐसे सुखी होते हैं मानो जगत् भर के राजा हो गये हों। एक उपमा बीमारी की है और दूसरी राजपद की, और दोनों शरीर पर उतरती हैं। दूसरे की बड़ाई सुनकर उन्हें बुख़ार चढ़ता है और दूसरे की विपत्ति देखकर उन्हें राज्य मिल जाता है।
आगे की गिनती घर के भीतर घुस आती है। वे माता, पिता, गुरु और ब्राह्मण, किसी को नहीं मानते। स्वयं तो नष्ट रहते ही हैं, अपने संग से दूसरों को भी नष्ट करते हैं। मोह के वश दूसरों से द्रोह करते हैं, और उन्हें न संतों का संग भाता है, न हरि की कथा। वे अवगुणों के समुद्र, मन्दबुद्धि, कामी, वेदों के निन्दक और पराये धन के ज़बरदस्ती स्वामी होते हैं, और द्रोह तो सबसे करते हैं पर ब्राह्मण से विशेष रूप से।
और इस सारी गिनती के आख़िर में वह आधी पंक्ति आती है जो इस पूरी सूची को काम का बना देती है। हृदय में दम्भ और कपट भरा रहता है, और ऊपर से सुन्दर वेष धारण किये रहते हैं। जिसने लक्षण पूछे थे उसे यहाँ बता दिया गया कि लक्षण पहने भी जा सकते हैं। इसीलिये पहली सूची में जो गिनाया गया था वह सब भीतर की बात थी, और उसकी मुहर भी यही लगी थी कि ये लक्षण जिसके हृदय में बसते हों।
ऐसे अधम मनुज खल कृतजुग त्रेताँ नाहिं।
दोहा ४०
द्वापर कछुक बृंद बहु होइहहिं कलिजुग माहिं॥ ४०॥
ऐसे नीच और दुष्ट मनुष्य सत्ययुग और त्रेता में नहीं होते, द्वापर में कुछ होंगे, और कलियुग में इनके झुंड के झुंड होंगे। इस दोहे का काल देखिये। कहनेवाला त्रेता में खड़ा है, और वह जो कह रहा है वह आगे की बात है, होइहहिं। जिस युग में यह सूची सबसे अधिक काम आयेगी वह अभी आया नहीं है, और सुननेवालों में से कोई उसे देखेगा भी नहीं।
और यहीं इस पन्ने का सबसे शान्त व्यंग्य बैठा हुआ है। यह पूरी बातचीत उस पोथी का हिस्सा है जो कलियुग में लिखी गयी और कलियुग में ही पढ़ी जाती रही है। जिन लोगों के लिये यह सूची वास्तव में बनी है वे सभा में नहीं बैठे थे। वे बहुत बाद में आये, और पढ़ते समय उन्हें यह भी बता दिया गया कि उनका युग गिना जा चुका है।
सार: लोभ ही असंतों का ओढ़ना और बिछौना है, दूसरे की बड़ाई सुनकर उन्हें जूड़ी चढ़ती है और दूसरे की विपत्ति देखकर वे जगत् भर के राजा हो जाते हैं, वे माता, पिता, गुरु और ब्राह्मण किसी को नहीं मानते, और भीतर दम्भ रखकर ऊपर सुन्दर वेष धारण करते हैं। दोहे में कहा जाता है कि ऐसे लोग सत्ययुग और त्रेता में नहीं होते, द्वापर में कुछ होंगे और कलियुग में झुंड के झुंड।
पर हित, और वह दोहा जिस पर सूची लौट जाती है
दो सूचियाँ पूरी हो चुकीं। अब उत्तर देनेवाला वह करता है जो किसी भी लम्बी गिनती के बाद करना पड़ता है, वह गिनती को एक वाक्य में बाँधता है। और जो वाक्य वह चुनता है वह रामचरितमानस की सबसे अधिक दोहरायी जानेवाली पंक्तियों में है, और उसका ढाँचा ठीक उसी शब्द पर खड़ा है जिस पर अभी अभी असंत की पहचान खड़ी की गयी थी।
पर हित सरिस धर्म नहिं भाई । पर पीड़ा सम नहिं अधमाई॥
चौपाई ८
निर्नय सकल पुरान बेद कर । कहेउँ तात जानहिं कोबिद नर॥
हे भाई, दूसरों की भलाई के समान कोई धर्म नहीं है और दूसरों को पीड़ा देने के समान कोई नीचता नहीं। हे तात, समस्त पुराणों और वेदों का यही निर्णय मैंने कहा है, और इसे पण्डित लोग जानते हैं। अभी कुछ ही पंक्तियाँ पहले असंत की पहचान चार बार आये हुए एक शब्द से बनी थी, पर द्रोही, पर दार, पर धन, पर अपबाद। और अब धर्म की परिभाषा उसी शब्द से बनती है, पर हित।
तो दोनों सूचियों के बीच का सारा अन्तर एक ही शब्द के आगे लगे हुए क्रिया के अन्तर पर आ टिकता है। दूसरा तो दोनों के सामने है। एक उसमें से लेता है और दूसरा उसमें डालता है। और इसीलिये यह बात निर्नय कहकर रखी गयी है, निर्णय, यानी वह जगह जहाँ बहस बन्द होती है। जिसने भेद पूछा था उसे भेद की जड़ एक शब्द में दे दी गयी।
आगे उसी बात का दूसरा पहलू आता है। मनुष्य का शरीर धारण करके जो दूसरों को पीड़ा देते हैं उन्हें जन्म और मृत्यु के महान् संकट सहने पड़ते हैं। मोह के वश होकर मनुष्य स्वार्थ में लगे रहकर अनेकों पाप करते हैं और इसी से उनका परलोक नष्ट रहता है। और फिर वह वाक्य जिसमें उत्तर देनेवाला पहली बार अपने को इस चित्र के भीतर रखता है, मैं उनके लिये कालरूप हूँ और शुभ तथा अशुभ कर्मों का फल देनेवाला हूँ।
और उसके तुरन्त बाद वह बात कही जाती है जिसे पढ़ते हुए रुकना पड़ता है। ऐसा विचारकर जो परम चतुर हैं वे संसार को दुखरूप जानकर मुझे भजते हैं, और शुभ तथा अशुभ फल देनेवाले कर्मों को छोड़ देते हैं। छोड़ा दोनों को जाता है। बुरा कर्म छोड़ना समझ में आता है, पर यहाँ अच्छा कर्म भी छोड़ा जा रहा है, और कारण उसके नाम में ही रख दिया गया है, दोनों फल देनेवाले हैं, और फल ही वह चीज़ है जिससे पहिया घूमता रहता है।
और तब उत्तर अपने को समेटने लगता है। मैंने संतों और असंतों के गुण कह दिये, और जिन्होंने इन्हें समझ रखा है वे जन्म मरण के चक्कर में नहीं पड़ते। सुननेवाला यहीं सन्तुष्ट होकर उठ सकता था। प्रश्न का उत्तर मिल चुका था, सूची दोनों ओर से पूरी थी, और उसका फल भी बता दिया गया था। पर एक दोहा अभी बाक़ी है, और वही इस पूरे हिस्से को पलट देता है।
सुनहु तात माया कृत गुन अरु दोष अनेक।
दोहा ४१
गुन यह उभय न देखिअहिं देखिअ सो अबिबेक॥ ४१॥
हे तात सुनो, गुण और दोष अनेक हैं और वे सब माया के रचे हुए हैं। गुण इसी में है कि दोनों न देखे जायँ, इन्हें देखना ही अविवेक है। जिस आदमी ने अभी अभी दो लम्बी सूचियाँ सुनी हैं, उसी से कहा जा रहा है कि देखना ही अविवेक है। और इस दोहे में गुन शब्द दो बार आता है, दोनों बार अलग अर्थ में, पहले उस चीज़ के लिये जो माया ने रची और फिर उस समझ के लिये जो उसे न देखने में है।
यह दोहा पहले कही गयी बात को काटता नहीं, उसका काम बता देता है। सूची इसलिये दी गयी थी कि संगति चुनी जा सके, और यह उसी पहली पंक्ति में लिखा हुआ था कि भूलकर भी संगति न हो। तौलने के लिये, हिसाब रखने के लिये, किसी पर मुहर लगाने के लिये वह दी ही नहीं गयी थी। जो काम पूरा हो गया उसका औज़ार वापस ले लिया गया है, और यही इस उत्तर का सबसे सुन्दर हिस्सा है।
सार: दोनों सूचियों को एक वाक्य में बाँधते हुए कहा जाता है कि दूसरों की भलाई के समान कोई धर्म नहीं और दूसरों को दुख देने के समान कोई नीचता नहीं, और यही वेद तथा पुराणों का निर्णय है। जो परम चतुर हैं वे शुभ और अशुभ दोनों प्रकार के फल देनेवाले कर्म छोड़कर भजन करते हैं। और अन्त में दोहे में कहा जाता है कि गुण और दोष दोनों माया के रचे हुए हैं, और समझदारी दोनों को न देखने में है।
सभा उठती है, और कथा ऊपर चली जाती है
उत्तर यहाँ पूरा हो जाता है, और तुलसी सुननेवालों की ओर मुड़ जाते हैं। श्रीमुख के ये वचन सुनकर सब भाई हर्षित हो गये और प्रेम उनके हृदयों में समाता नहीं। वे बार बार बहुत विनती करते हैं। और तब एक नाम अलग से गिनाया जाता है, हनुमान, जिनके हृदय में अपार हर्ष है। सब भाई पहले ही गिने जा चुके थे, फिर भी यह नाम अलग रखा गया, और जो हर्ष उसके साथ लगाया गया उसके लिये अपार शब्द चुना गया।
इसके बाद रघुनाथ अपने महल को चले जाते हैं, और तुलसी एक ही वाक्य में यह भी बता देते हैं कि यह किसी एक दिन की बात नहीं है, इसी प्रकार वे नित्य नयी लीला करते रहते हैं। नारद मुनि बार बार अयोध्या आते हैं और राम के पवित्र चरित्र गाते हैं। नित्य नये चरित्र देखकर जाते हैं और ब्रह्मलोक में जाकर सारी कथा कहते हैं। एक मुनि वहाँ की रोज़ की ख़बर ऊपर तक पहुँचाता रहता है।
और ब्रह्मा सुनकर अत्यन्त सुख मानते हैं और कहते हैं, हे तात, बार बार गुणों का गान कीजिये। सनकादि मुनि नारद की सराहना करते हैं, यद्यपि वे स्वयं ब्रह्म में लगे हुए मुनि हैं। गुणगान सुनकर वे अपनी समाधि भुला बैठते हैं और आदर के साथ सुनते हैं, और उन्हें परम अधिकारी कहा जाता है। समाधि टूटती नहीं, बिसारी जाती है, और यह दो अलग बातें हैं। टूटना बाहर से होता है, भूलना भीतर से।
जीवनमुक्त ब्रह्मपर चरित सुनहिं तजि ध्यान।
दोहा ४२
जे हरि कथाँ न करहिं रति तिन्ह के हिय पाषान॥ ४२॥
जीवन्मुक्त और ब्रह्म में लगे हुए पुरुष भी ध्यान छोड़कर चरित्र सुनते हैं, और जो हरि की कथा में प्रीति नहीं करते उनके हृदय पत्थर हैं। इस दोहे का दूसरा आधा तभी लगता है जब पहला आधा मान लिया जाय। जिनके पास खोने को सबसे अधिक था वे उठ खड़े हुए, और जिसे उठने पर कुछ भी नहीं खोना था वह बैठा रह गया। पत्थर की उपमा इसी तुलना से निकलती है, क्योंकि पत्थर की पहचान कठोरता नहीं है, न हिलना है।
सार: उत्तर सुनकर सब भाई हर्षित होते हैं और हनुमान के हृदय का हर्ष अपार बताया जाता है। राम अपने महल को चले जाते हैं और नित्य नयी लीला करते हैं। नारद बार बार आकर उनके चरित्र गाते हैं और ब्रह्मलोक में कथा कहते हैं, ब्रह्मा सुनकर और गाने को कहते हैं, और सनकादि गुणगान सुनकर अपनी समाधि भूल जाते हैं। दोहे में कहा जाता है कि जो हरि कथा से प्रीति नहीं करते उनके हृदय पत्थर हैं।
दूसरी सभा, और वह वाक्य जो राजा नहीं कहते
यहाँ से यह पन्ना दूसरी बार बैठता है, और इस बार सभा दूसरी है। एक बार रघुनाथ ने बुलाया और गुरु, ब्राह्मण तथा सब नगरनिवासी आये। टीका गुरु को वसिष्ठ बताती है। जब गुरु, मुनि, ब्राह्मण और सब सज्जन यथायोग्य बैठ गये तब वे बोले। सुननेवाला अब कोई भाई नहीं है, पूरा नगर है, और जो बात कही जानी है वह लक्षणों की नहीं, सबके अपने जीवन की है।
और पहला ही वाक्य वह जगह बनाता है जो पहली सभा में पूछनेवाले को बनानी पड़ी थी, पर इस बार वह बोलनेवाला अपने लिये बनाता है। हे समस्त नगरनिवासियो, मेरी बात सुनिये। यह बात मैं हृदय में कोई ममता लाकर नहीं कह रहा, न इसमें कोई अनीति है और न इसमें कुछ प्रभुता है। सुनिये, और फिर जो अच्छा लगे वही कीजिये। सुनने के बाद करने का फ़ैसला सुननेवालों पर छोड़ दिया गया है।
और उसके बाद वह वाक्य आता है जो सिंहासन पर बैठा हुआ कोई नहीं कहता। वही मेरा सेवक है और वही प्रियतम है जो मेरी आज्ञा माने। और हे भाई, यदि मैं कुछ अनीति की बात कह दूँ तो भय भुलाकर मुझे रोक देना। एक ही साँस में आज्ञा माननेवाले को प्रियतम कहा गया है और उसी को आज्ञा देनेवाले को रोक देने का अधिकार दे दिया गया है, और रोकने के लिये जो शर्त रखी गयी है वह डर भूल जाने की है।
बड़ें भाग मानुष तनु पावा। सुर दुर्लभ सब ग्रंथन्हि गावा॥
चौपाई ९
साधन धाम मोच्छ कर द्वारा । पाइ न जेहिं परलोक सँवारा॥
बड़े भाग्य से यह मनुष्य का शरीर मिला है, और सब ग्रन्थों ने यही कहा है कि यह देवताओं को भी दुर्लभ है। यह साधन का धाम है और मोक्ष का दरवाज़ा। इसे पाकर भी जिसने परलोक न बना लिया, और यहाँ पंक्ति अधूरी छोड़ दी जाती है। ध्यान दीजिये कि शरीर को दो नाम दिये गये हैं, धाम और द्वार। एक वह जगह जहाँ काम किया जाता है, और दूसरा वह जगह जहाँ से बाहर निकला जाता है।
और वह अधूरी पंक्ति दोहे में पूरी होती है। वह परलोक में दुख पाता है, सिर पीट पीटकर पछताता है, और काल पर, कर्म पर तथा ईश्वर पर झूठा दोष लगाता है। तीन नाम गिनाये गये हैं और तीनों में एक बात साझी है, तीनों ऐसे हैं जिन पर दोष लगाकर आदमी को अपने भीतर कुछ भी नहीं बदलना पड़ता। और इसीलिये उस दोष को मिथ्या कहा गया है, झूठा, न कि अनुचित।
सार: दूसरी सभा बैठती है, जिसमें गुरु, ब्राह्मण और सब नगरनिवासी हैं। राम कहते हैं कि यह बात वे ममता या प्रभुता से नहीं कह रहे, सुनकर जो अच्छा लगे वही कीजिये, और यदि वे कुछ अनीति कहें तो भय भुलाकर रोक देना। फिर वे कहते हैं कि यह मनुष्य शरीर बड़े भाग्य से मिला है, देवताओं को भी दुर्लभ है, साधन का धाम और मोक्ष का द्वार है, और जो इसे पाकर परलोक न बना सके वह पछताता है और काल, कर्म तथा ईश्वर पर झूठा दोष लगाता है।
अमृत बदलकर विष, और वह बेड़ा
अब यह उपदेश उस चीज़ पर आता है जिसके लिये सभा बुलायी गयी थी। हे भाई, इस शरीर के मिलने का फल विषय नहीं है। और उसके तुरन्त बाद वह बात जो सुननेवालों की सबसे बड़ी आशा पर हाथ रख देती है, स्वर्ग का भोग भी बहुत थोड़ा है और अन्त में दुख देनेवाला है। यानी जिस जगह पहुँचने के लिये लोग जीवन भर कर्म करते हैं, वह जगह भी छोटी और अन्त में कड़वी बतायी गयी है।
और फिर सौदा। जो लोग मनुष्य का शरीर पाकर विषयों में मन लगा देते हैं वे मूर्ख अमृत को बदलकर विष ले लेते हैं। जो शब्द यहाँ रखा गया है वह पलटि है, यानी अदला बदली, और अदला बदली में दोनों हाथ चलते हैं। एक चीज़ छोड़ी जाती है और दूसरी ली जाती है। किसी ने अमृत छीना नहीं, वह दे दिया गया, और बदले में जो लिया गया उसे जानते हुए लिया गया।
उसी बात को अगली पंक्ति एक और सौदे से कहती है। जो पारसमणि खोकर बदले में घुँघची ले लेता है, उसे कभी कोई भला नहीं कहता। घुँघची लाल है, चमकीली है, और गले में पहनी जा सकती है। पारसमणि देखने में पत्थर है। इसलिये यह सौदा मूर्खता का है, आँख का नहीं, और दोनों उपमाएँ एक ही ओर इशारा करती हैं, कि गँवाया वही जाता है जिसकी क़ीमत दिखती नहीं।
और तब गिनती आती है, चार खानें और चौरासी लाख योनियाँ, जिनमें यह जीव भटकता रहता है। जिस पंक्ति में यह भटकना कहा गया है उसी में जीव को अविनाशी भी कहा गया है, और दोनों बातें एक साथ रखने से चक्कर और भारी हो जाता है। जो नष्ट हो जाता वह छूट जाता। जो नष्ट नहीं होता उसे चलते रहना पड़ता है। और चलानेवाली कौन है, यह अगली पंक्ति बताती है, माया की प्रेरणा, और काल, कर्म, स्वभाव तथा गुण का घेरा।
और उसी घेरे के बीच वह आधी पंक्ति आती है जिस पर पूरा उपदेश टिका हुआ है। कभी कभी दया करके ईश्वर इसे मनुष्य की देह देते हैं, और वे ईश्वर बिना किसी कारण के स्नेह करनेवाले हैं। बिनु हेतु सनेही। कारण इसलिये नहीं है कि जिस पर दया की जा रही है उसके पास देने को कुछ है ही नहीं, वह चौरासी लाख का चक्कर काटता हुआ आ रहा है। मनुष्य देह उस चक्कर में दिया गया एक विराम है।
नर तनु भव बारिधि कहुँ बेरो। सन्मुख मरुत अनुग्रह मेरो॥
चौपाई १०
करनधार सदगुर दृढ़ नावा। दुर्लभ साज सुलभ करि पावा॥
यह मनुष्य का शरीर भवसागर से पार जाने के लिये बेड़ा है, मेरी कृपा ही अनुकूल वायु है, और सद्गुरु इस मज़बूत नाव के कर्णधार हैं। इस प्रकार दुर्लभ साधन सुलभ होकर पहले ही मिल चुके हैं। तीन चीज़ें गिनायी गयी हैं और तीनों अलग अलग जगह से आती हैं। नाव शरीर है, जो जन्म से मिला। हवा कहनेवाले की अपनी कृपा है, जिसे उन्होंने अपने नाम से गिनाया। और खेनेवाला तीसरा आदमी है, जो बाहर से मिलता है।
और चौथी चीज़ गिनायी नहीं गयी, क्योंकि वह सुननेवाले के पास है। नाव है, हवा है, खेनेवाला है, और बैठनेवाले को केवल बैठना है। इसीलिये अगला दोहा इतना कड़ा हो जाता है। जो ऐसे साधन पाकर भी भवसागर से न तरे, वह कृतघ्न और मन्दबुद्धि है और आत्महत्या करनेवाले की गति को प्राप्त होता है। आत्माहन, यह इस पूरे उपदेश का सबसे कठोर शब्द है, और वह उस आदमी के लिये रखा गया है जिसने कुछ किया ही नहीं।
सार: इस शरीर का फल विषय नहीं है, स्वर्ग का भोग भी थोड़ा और अन्त में दुखदायी है। विषयों में मन लगा देना अमृत बदलकर विष लेना और पारसमणि खोकर घुँघची लेना है। यह जीव चार खानों और चौरासी लाख योनियों में भटकता है, और बिना कारण स्नेह करनेवाले ईश्वर कभी दया करके इसे मनुष्य देह देते हैं। वह देह बेड़ा है, कृपा अनुकूल वायु है, सद्गुरु कर्णधार हैं, और इतना पाकर भी जो न तरे वह आत्मघाती की गति पाता है।
सुलभ मार्ग, और अन्त में हाथ जोड़कर
अब रास्ता बताया जाता है, और बताने से पहले उसकी क़ीमत तय कर दी जाती है। यदि यहाँ और परलोक, दोनों जगह सुख चाहिये, तो मेरे वचन सुनकर उन्हें हृदय में दृढ़ता से पकड़ रखिये। हे भाई, यह मार्ग सुलभ है और सुख देनेवाला है, यह मेरी भक्ति है, और इसे पुराणों तथा वेदों ने गाया है। सुलभ शब्द यहाँ यों ही नहीं रखा गया, क्योंकि उसके ठीक बगल में दूसरा रास्ता आनेवाला है।
ज्ञान अगम है, उसमें अनेकों विघ्न हैं, उसका साधन कठिन है, और उसमें मन के लिये कोई टेक नहीं। बहुत कष्ट करके कोई उसे पा भी ले तो भक्ति से हीन होने के कारण वह भी मुझे प्रिय नहीं होता। इस पूरी गिनती में असली बात तीसरी है, न मन कहुँ टेका। उस रास्ते पर पकड़ने को कुछ नहीं मिलता, और मन वही चीज़ है जो पकड़े बिना खड़ा नहीं रह सकता। कठिनाई दूरी की नहीं है, सहारे की है।
भक्ति सुतंत्र सकल सुख खानी। बिनु सतसंग न पावहिं प्रानी॥
चौपाई ११
पुन्य पुंज बिनु मिलहिं न संता। सतसंगति संसृति कर अंता॥
भक्ति स्वतन्त्र है और सब सुखों की खान है, पर सत्संग के बिना प्राणी उसे नहीं पाते। और पुण्य के समूह के बिना संत नहीं मिलते। सत्संगति ही जन्म मरण के चक्र का अन्त करती है। यहाँ एक सीढ़ी उलटी तरफ़ से उतरती है। सबसे ऊपर वह चीज़ है जो स्वतन्त्र है और किसी की मोहताज नहीं, और फिर भी वह एक शर्त से बँधी है, संतों का साथ। और वह साथ भी अपने आप नहीं मिलता, उसके लिये पुण्य चाहिये।
और यही वह जगह है जहाँ इस पन्ने का पहला प्रश्न दूसरी बार उत्तर पाता है। सभा के शुरू में पूछा गया था कि संत को किस निशानी से पहचानें। तब लक्षण गिनाये गये थे। और अब, बहुत देर बाद, यह बताया जा रहा है कि वह प्रश्न इतना ज़रूरी क्यों था। पहचान का सवाल शौक़ का सवाल नहीं था। जिस चीज़ के बिना भक्ति नहीं मिलती, उसे पहचानना ही पड़ेगा, और भीड़ में सुन्दर वेष भी खड़े रहते हैं।
और तब पुण्य की परिभाषा आती है, और वह एक ही है। जगत् में पुण्य एक है, उसके समान दूसरा नहीं, और वह है मन, कर्म और वचन से ब्राह्मणों के चरणों की पूजा। जो कपट छोड़कर द्विज की सेवा करता है, उस पर मुनि और देवता प्रसन्न रहते हैं। यह वही बात है जो बहुत पहले संत के लक्षणों में एक बार आ चुकी थी, और वहाँ उसे धर्मों को जन्म देनेवाली कहा गया था। जो जड़ वहाँ बतायी गयी थी, वही यहाँ अकेला पुण्य निकली।
औरउ एक गुपुत मत सबहि कहउँ कर जोरि।
दोहा ४५
संकर भजन बिना नर भगति न पावइ मोरि॥ ४५॥
और भी एक गुप्त मत है, मैं उसे सबसे हाथ जोड़कर कहता हूँ, शंकर के भजन बिना मनुष्य मेरी भक्ति नहीं पाता। इस एक दोहे में चार बातें एक साथ रखी गयी हैं। यह और भी है, यानी सब कुछ कह चुकने के बाद एक और। यह गुप्त है। यह सबसे कहा जा रहा है, किसी चुने हुए से नहीं। और यह हाथ जोड़कर कहा जा रहा है, यानी कहनेवाला इसे आज्ञा की तरह नहीं, विनती की तरह रख रहा है।
और शर्त में कोई ढील नहीं है। बिना, और न पावइ। यह नहीं कहा गया कि शंकर का भजन अच्छा है, या उससे रास्ता आसान होता है। कहा यह गया है कि उसके बिना वह चीज़ मिलती ही नहीं जिसके लिये यह सारा उपदेश दिया गया। यह पंक्ति तुलसीदास की अपनी है। जिन राम की भक्ति की बात पूरी पोथी करती है, उन्हीं के मुँह से यह कहलवाया गया है कि उस भक्ति का दरवाज़ा शंकर के पास है, और यही इस पूरी पोथी का जोड़ है।
सार: भक्ति का मार्ग सुलभ और सुखद बताया जाता है, जबकि ज्ञान अगम है, विघ्नों से भरा है और उसमें मन के लिये कोई सहारा नहीं। भक्ति स्वतन्त्र है पर सत्संग के बिना नहीं मिलती, संत पुण्य के समूह के बिना नहीं मिलते, और जगत् में पुण्य एक ही है, मन, कर्म और वचन से ब्राह्मणों के चरणों की पूजा। और अन्त में हाथ जोड़कर एक गुप्त बात कही जाती है, कि शंकर के भजन बिना मनुष्य राम की भक्ति नहीं पाता।
और अन्त में, अपनी ओर
इस पन्ने पर दो सभाएँ हैं और उनके बीच का फ़र्क़ ही इसे पढ़ने का सबसे सीधा रास्ता है। पहली सभा में एक भाई ने पूछने के लिये अपने को सेवक बनाया, क्योंकि जो वह पूछ रहा था वह बराबरी से नहीं पूछा जा सकता था। दूसरी सभा में बोलनेवाले ने अपने को नीचे रखा और सुननेवालों से कहा कि जो अच्छा लगे वही कीजिये, और यदि मैं अनीति कहूँ तो डर भूलकर रोक देना। एक ही व्यक्ति दोनों जगह है, और दोनों बार नीचे वही खड़ा है जिसे बोलना है।
दूसरी बात सूचियों के बारे में है। इतनी लम्बी गिनती के बाद जो दोहा आता है वह उसी गिनती को माया का बनाया हुआ कह देता है और देखने को ही अविवेक बता देता है। इसे पढ़कर पहले लगता है कि कही हुई बात वापस ले ली गयी। पर ध्यान से देखिये तो सूची का काम पहली ही पंक्ति में लिखा हुआ था, कि संगति भूलकर भी न हो। सूची इसलिये थी कि किसके पास बैठना है यह तय हो सके। जब वह काम हो गया, औज़ार नीचे रख दिया गया।
और तीसरी बात, जो इस पन्ने की सबसे शान्त बात है। इतना सब कहने के बाद जिस चीज़ पर सब आकर टिकता है वह कोई ऊँचा साधन नहीं है। संतों का साथ, और उस साथ के लिये पुण्य, और पुण्य में एक ही चीज़, कपट छोड़कर की गयी सेवा। और उसके भी ऊपर, सबसे अन्त में, हाथ जोड़कर कहा गया शंकर का नाम। जो रास्ता चन्दन और कुल्हाड़ी के चित्र से शुरू हुआ था वह आकर दो हथेलियों पर रुकता है, जो जुड़ी हुई हैं।
रामचरितमानस में उपदेश के पन्ने बहुत हैं और उनमें से कई इससे लम्बे हैं। इस पन्ने को अलग करनेवाली चीज़ उसका अन्त है। दो सूचियाँ, एक निर्णय, एक दोहा जो निर्णय को माया का बना हुआ कह देता है, फिर एक नयी सभा, मनुष्य देह की दुर्लभता, एक बेड़ा और उसका कर्णधार, और सबसे अन्त में एक गुप्त बात, जो हाथ जोड़कर कही जाती है। सीधी चाल कहीं नहीं है, और हर मोड़ पर बात एक क़दम नीचे उतरती है।
और जो अन्तिम पंक्ति यहाँ रखी गयी है वह तुलसीदास की अपनी है, वाल्मीकि की रामायण की नहीं। जिस पूरी पोथी का विषय राम की भक्ति है, उसी में राम के मुँह से यह कहलवाया गया है कि शंकर के भजन बिना कोई उस भक्ति तक नहीं पहुँचता। इसे कहते हुए न कोई तर्क दिया गया, न कोई प्रमाण गिनाया गया। बस इतना कहा गया कि यह एक और बात है, गुप्त है, और सबसे हाथ जोड़कर कही जा रही है।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, उत्तरकाण्ड, दोहा ३७ से ४५, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।