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रामचरितमानसउत्तरकाण्डप्रसंग 19
रुद्राष्टक, शिव की कृपा, और लोमश का शाप
जिस गुरु का अपमान हुआ था वही संस्कृत में शिव के आगे गिड़गिड़ाते हैं। शाप घटता है पर मिटता नहीं। हज़ार जन्म बीत जाने पर वही स्वभाव मेरु के शिखर पर दूसरी बार सिर उठा लेता है।
पिछला प्रसंग वहीं छूटा था जहाँ किसी के लिये कुछ कहने को बचा नहीं था। शिव के मन्दिर में आकाशवाणी हो चुकी थी, दण्ड सुनाया जा चुका था। जिस शिष्य ने गुरु को सामने देखकर उठना भी ज़रूरी नहीं समझा था, उसे सर्प हो जाने को कह दिया गया था। सीधा रास्ता यह होता कि शिष्य रोता, या भागता, या क्षमा माँगता। कथा वह रास्ता नहीं लेती: यहाँ पहली आवाज़ उस आदमी की है जिसका अपमान हुआ था, और वह आवाज़ माँग रही है।
इस प्रसंग में मानस की कथा घरेलू, खुली अवधी में चलती है। पर जहाँ वे ब्राह्मण शिव के सम्मुख हाथ जोड़ते हैं, वहाँ स्तुति संस्कृत में है। जिस स्तुति को लोग आज रुद्राष्टक कहकर गाते हैं, वह इसी जगह खड़ी है।
पर स्तुति के बाद वरदान आता है, वरदान के बाद वह शाप जो घटाया जाता है पर उठाया नहीं जाता, और फिर हज़ार जन्म बीत जाते हैं। उनके पार एक ब्राह्मण-शरीर है, एक वन, और मेरु के शिखर पर बड़ की छाया में बैठे लोमश मुनि। वहाँ वही आदमी दूसरी बार वही काम करता है, और इस बार उसके लिये कोई विनती करने नहीं आता। कथा वहाँ ठहरती है जहाँ एक कौआ मुनि के चरणों में सिर नवाकर उड़ जाता है।
दो शाप देनेवाले, एक विनती करनेवाला
- गुरु जिनका नाम इस पूरे प्रसंग में एक बार नहीं आता। मानस उन्हें गुरु, द्विज और ब्राह्मण ही कहता है, और वे अपने अपमान की चर्चा किये बिना अपमान करनेवाले के लिये वर माँगते हैं।
- शिव जिन्होंने शाप दिया था, और जो यहाँ अपना क्रोध स्वयं मानकर शाप को घटाते हैं, पर व्यर्थ नहीं जाने देते।
- कथा कहनेवाले जो यहाँ केवल “मैं” हैं, जिनका नाम इस प्रसंग में कहीं नहीं आता, और जो अपनी दो हारों की कथा स्वयं सुना रहे हैं।
- लोमश मेरु के शिखर पर बड़ की छाया में बैठे मुनि, जो पूछे गये प्रश्न से बड़ा उत्तर देते हैं। अन्त में वे क्रोध में आकर शाप दे बैठते हैं।
- गरुड़ जिन्हें यह सारी कथा सुनायी जा रही है। कहनेवाला उन्हें पदवियों से पुकारता है और टीका उनका नाम खोलती है।
- पार्वती जिनसे इस पूरी कथा का बाहरी सूत्र कहा जा रहा है, और जिन्हें सम्बोधित करके यह प्रसंग समाप्त होता है।
जिसका अपमान हुआ, वही गिड़गिड़ाता है
इस प्रसंग की पहली बात वह है जो इसमें होती ही नहीं। गुरु कह सकते थे कि दण्ड उचित हुआ, या थोड़ा कम कर दीजिये, लड़का नादान है। वे यह भी कह सकते थे कि उन्होंने तो कुछ कहा ही नहीं था, फिर उनके नाम पर इतना बड़ा शाप क्यों। इनमें से एक भी वाक्य वे नहीं बोलते। जो बोलते हैं वह स्तुति है, और उसमें अपनी बात सबसे आख़िर में रखते हैं।
स्तुति प्रणाम से खुलती है, और यही उसका ढंग बता देता है। माँगने आया आदमी पहले झुकता है, और झुककर जो पहला परिचय देता है वह उस देवता का है जिसे किसी चीज़ की ज़रूरत नहीं।
ब्राह्मण कहते हैं: “हे मोक्षस्वरूप, हे विभु, हे व्यापक, हे ब्रह्म, हे वेदस्वरूप, ईशान दिशा के और सबके स्वामी, मैं आपको नमस्कार करता हूँ।” फिर वे शिव को उन बातों से पहचानते हैं जो उनमें नहीं हैं: वे गुण से रहित हैं, भेद से रहित, इच्छा से रहित। माँगने आया आदमी सबसे पहले यह कहता है कि आप वह हैं जिसे कुछ नहीं चाहिये।
चित्र इस बात पर पूरा होता है कि वे चेतन आकाश हैं, और आकाश ही उनका वस्त्र है। टीका इसके दो अर्थ खोलती है, जो आकाश को पहने हुए हैं, अर्थात् दिगम्बर, और जो आकाश को भी ढँक लेते हैं।
निराकार, ओङ्कार के मूल, तुरीय, वाणी, ज्ञान और इन्द्रियों से परे, कैलासपति। यहाँ तक वही चल रहा है जो आरम्भ में था। फिर स्तुति दो बातें आमने-सामने रख देती है: वे विकराल हैं, महाकाल के भी काल, और कृपालु भी। भयानक और दयालु, दोनों साथ।
जो आदमी यह गा रहा है, वह ठीक इसी दोराहे पर खड़ा है। जिस शक्ति ने अभी उसके शिष्य पर शाप गिराया है, उसी से वह दया की आशा रखता है। स्तुति में उसने अपनी हालत का नक्शा खींच दिया, और अपने बारे में एक शब्द नहीं कहा।
जो देखा नहीं जा सकता, उसका रूप
फिर स्तुति का काम बदल जाता है। अब तक सब निषेध था: गुणों से रहित, आकार से रहित, इन्द्रियों से परे। अब ब्राह्मण उसी को आँखों के सामने खड़ा करने लगते हैं: हिमाचल जैसे गौर और उतने ही गम्भीर, शरीर में करोड़ों कामदेवों की ज्योति और शोभा। सिर पर लहराती गङ्गा, ललाट पर द्वितीया का चन्द्रमा, और गले में सर्प।
गले का वही सर्प: जो शरीर कुछ आगे चलकर दण्ड बनकर आनेवाला है, वही यहाँ शिव के गले का आभूषण है, और स्तुति इस पर एक शब्द नहीं कहती।
फिर चित्र और पास आता है: कानों में हिलते कुण्डल, सुन्दर भौंहें, विशाल नेत्र, प्रसन्न मुख, नीला कण्ठ, और वे दयालु हैं। सिंह का चर्म वस्त्र है और मुण्डों की माला गले में। और यह चित्र जिन दो बातों पर टिकता है वे हैं सबके प्यारे और सबके नाथ। मुण्डमाला के तुरन्त बाद “प्यारे” अपने आप में एक बात कह देता है।
फिर स्तुति तेज़ होती है: प्रचण्ड, श्रेष्ठ, तेजस्वी, परमेश्वर, अखण्ड, अजन्मा, करोड़ों सूर्यों के समान प्रकाशवाले। वे तीनों शूलों को जड़ से उखाड़नेवाले हैं, हाथ में शूल धारण किये हुए। जो हथियार हाथ में है वही दुःख का नाम भी है, और वही उसे निर्मूल भी करता है। स्तुति इस बात पर ठहरती है कि वे भाव से मिलते हैं।
कलाओं से परे, कल्याणस्वरूप, कल्प का अन्त करनेवाले, सज्जनों को सदा आनन्द देनेवाले, त्रिपुर के शत्रु, सच्चिदानन्दघन, मोह को हर लेनेवाले, कामदेव के शत्रु। और फिर, अब तक जो नहीं हुआ था, वह होता है: “हे प्रभो, प्रसन्न हूजिये, प्रसन्न हूजिये।”
यही इस स्तुति की धुरी है। अब तक एक शब्द नहीं माँगा गया था। यहाँ पहली बार माँग आती है, और वह कोई वस्तु नहीं: प्रसन्न हूजिये। दीजिये नहीं, हटाइये नहीं, लौटाइये नहीं। मन बदल जाये, इतना ही। और यह माँग उनके मोह हर लेनेवाले रूप के बगल में रखी है। जिस लड़के के लिये यह सब कहा जा रहा है, उसका अपराध अभिमान और मोह ही था।
फिर ब्राह्मण एक सामान्य नियम कहते हैं। जब तक मनुष्य शिव के चरणों को नहीं भजते, तब तक न इस लोक में सुख-शान्ति मिलती है, न परलोक में, न ताप का नाश होता है। इसमें वह शिष्य कहीं नहीं। और फिर सब जीवों के भीतर बसनेवाले प्रभु से वही माँग दोहरायी जाती है, प्रसन्न हूजिये।
ब्राह्मण कहते हैं: “मैं न योग जानता हूँ, न जप, न पूजा। मैं तो सदा आपको ही नमस्कार करता हूँ।” यह कहनेवाला साधारण उपासक नहीं: वह किसी का गुरु है, मन्दिर में खड़ा है, और इतनी देर से संस्कृत में स्तुति गा रहा है। उसी क्षण वह कहता है कि उसे कुछ आता नहीं। जो जानता है, वही कह सकता है कि नहीं जानता।
और फिर वे कहते हैं: “बुढ़ापे और जन्म के दुःखों के समूह से जलते हुए मुझ दुःखी की रक्षा कीजिये।” यह बचाव जन्म और जरा के ताप से माँगा गया है। थोड़ी ही देर में शिव ठीक यही चीज़ किसी और को देंगे, अपने नाम पर नहीं, इन्हीं ब्राह्मण के कारण।
अन्त में स्तुति अपने ही बारे में बोलती है। रुद्र की यह स्तुति शिव की प्रसन्नता के लिये एक ब्राह्मण ने कही, और जो मनुष्य इसे भक्ति से पढ़ते हैं उन पर शिव प्रसन्न होते हैं। दो बातें: स्तुति अपना मौक़ा अपने भीतर दर्ज करती है, पर कहनेवाले का नाम नहीं लेती, केवल एक ब्राह्मण कहती है। और जो फल पढ़नेवालों को बताया गया है, वह ठीक वही है जो अभी इस मन्दिर में मिलने वाला है, प्रसन्नता।
आकाशवाणी, और माँगने का ढंग
सर्वज्ञ शिव ने विनती सुनी और ब्राह्मण का अनुराग देखा। दो क्रियाएँ, पहले सुनना, फिर देखना। और जो देखा जाता है वह शब्द नहीं, अनुराग है। सर्वज्ञ को सुनने की ज़रूरत नहीं होती। जो देखा जाता है वह प्रेम है, और वही निर्णायक होता है।
फिर वही मन्दिर, वही आकाशवाणी। जिस जगह से शाप उतरा था, उसी से यह वाक्य उतरता है: “हे द्विजश्रेष्ठ, वर माँगिये।” यहाँ क्षमा नहीं कही गयी। वर कहा गया है, और वर माँगना पड़ता है। अगला क़दम ब्राह्मण का है, और वे उसे चार हिस्सों में उठाते हैं।
पहला हिस्सा अपने लिये है, और यह छिपाया नहीं गया। “हे प्रभो, यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं और इस दीन पर आपका स्नेह है, तो पहले अपने चरणों की भक्ति दीजिये, फिर दूसरा वर दीजिये।” स्तुति में अपने को आख़िर में रखनेवाला माँगने में अपने को पहले रखता है। यह हिसाब है, क्योंकि जो माँगना बाक़ी है वह अपने लिये नहीं, और उसे दूसरे वर की जगह चाहिये।
दूसरे हिस्से में वे शिष्य का नाम नहीं लेते: “यह जड़ जीव आपकी माया के वश होकर निरन्तर भूला हुआ फिरता है। हे कृपा के समुद्र, उस पर क्रोध न कीजिये।” एक वाक्य में शिष्य नियम का उदाहरण बन जाता है। अब मामला एक लड़के की धृष्टता का नहीं, सारे जीवों की भूल का है। और उस भूल का कारण भी उसी के सामने रख दिया गया जिससे दया माँगी जा रही है।
तीसरे हिस्से में वे उस लड़के तक आते हैं। यहाँ भी शाप वापस लेने को नहीं कहते। “हे शिव, दीनों पर दया करनेवाले, अब इस पर कृपा कीजिये, जिससे थोड़े ही समय में शाप के बाद इस पर अनुग्रह हो जाये।” वे दण्ड को मिटाने की नहीं, उसकी अवधि की बात करते हैं, थोड़े ही समय की। और चौथे में: “जिससे इसका परम कल्याण हो, अब वही कीजिये।”
और इस पूरी विनती में एक बात एक बार भी नहीं आती: अपमान। वे अपने ऊपर हुई बात का उल्लेख तक नहीं करते, न यह कि उनके साथ ऐसा हुआ, न यह कि उन्होंने क्षमा कर दिया। जिस घटना से यह सारा प्रसंग चला है, वह उनके मुँह से एक बार नहीं निकलती।
शाप घटता है, मिटता नहीं
उत्तर से पहले कथा बता देती है कि उत्तर क्यों मिल रहा है: ब्राह्मण की वाणी दूसरे के हित से सनी हुई है। सनी हुई, छुई हुई नहीं। उसे सुनकर आकाशवाणी फिर होती है, और इस बार दो शब्दों की: “एवमस्तु”, ऐसा ही हो।
शिव कहते हैं: “यद्यपि इसने भयानक पाप किया है और मैंने भी क्रोध करके इसे शाप दिया है, तो भी आपकी साधुता देखकर मैं इस पर विशेष कृपा करूँगा।” तीन बातें एक साथ मानी जाती हैं, किसी को दबाया नहीं जाता: पाप भयानक था। शाप क्रोध में दिया गया था, और यह शिव स्वयं कह रहे हैं। और फिर भी कृपा होगी। कारण लड़के में नहीं, ब्राह्मण की साधुता में है।
इस पूरे भाषण में शिष्य के पक्ष में एक शब्द नहीं, न उम्र, न नादानी, न पश्चात्ताप: छूट किसी और के खाते से मिलती है।
और शिव अपनी पसन्द का नियम बताते हैं: “जो क्षमाशील और परोपकारी हैं, वे द्विज मुझे वैसे ही प्रिय हैं जैसे खरारि।” खरारि, खर के शत्रु, यानी राम: शिव अपनी प्रियता का पैमाना राम को बनाते हैं। यह उस आदमी के लिये कहा जा रहा है जिसने अभी अपने अपराधी के लिये विनती की है। इसके तुरन्त बाद वह वाक्य आता है जो पूरे प्रसंग की रीढ़ है: “मेरा शाप व्यर्थ नहीं जायेगा। यह हज़ार जन्म अवश्य पायेगा।”
“जन्मने और मरने में जो दुःसह दुःख होता है, वह इसे ज़रा भी नहीं व्यापेगा, और किसी भी जन्म में इसका ज्ञान नहीं मिटेगा।” यहाँ कृपा का यही पूरा अर्थ है: दण्ड पूरा खड़ा रहता है, हज़ार के हज़ार जन्म। हटा लिया जाता है दण्ड का दंश, और उससे बड़ी बात, स्मृति नहीं जाती। सज़ा चलती रहेगी, और भोगनेवाला उसे भोगेगा नहीं।
इसी बात के अन्त में सम्बोधन आता है, नरम किये बिना: “हे शूद्र, मेरा प्रामाणिक वचन सुनिये।” कथा इस शब्द को छिपाती नहीं। पर थोड़ी ही देर बाद वही बोलनेवाला उसी सुननेवाले से कहता है: “भाई, अब मेरा सत्य वचन सुनिये।” एक ही भाषण के भीतर सम्बोधन शूद्र से भाई तक आ जाता है, और बीच में वरदान पड़ता है।
वरदान का ब्योरा भी ग़ौर करने लायक है। शिव कहते हैं: “आपका जन्म राम की पुरी में हुआ, फिर आपने मेरी सेवा में मन लगाया। उसी पुरी के प्रभाव और मेरी कृपा से आपके हृदय में राम-भक्ति उपजेगी।” श्रेय कहीं भी उस आदमी को नहीं दिया जाता। जगह को दिया जाता है, और कृपा को।
फिर छोटी-सी शिक्षा: द्विजों की सेवा ही वह व्रत है जिससे भगवान् प्रसन्न होते हैं। अब कभी ब्राह्मण का अपमान न कीजिये। संतों को अनन्त के समान जानिये। और चेतावनी में चार हथियार: इन्द्र का वज्र, शिव का विशाल शूल, काल का दण्ड और विष्णु का विकराल चक्र। जो इनके मारे नहीं मरता, वह भी विप्र-द्रोह की आग में जल जाता है।
और अन्त में एक और आशीर्वाद, जो मेरु के शिखर तक काम आता है: “ऐसा विवेक मन में रखिये, फिर जगत् में आपके लिये कुछ भी दुर्लभ न रहेगा। और मेरा एक आशीर्वाद यह भी है कि आपकी गति कहीं रुकेगी नहीं।” यह वरदान सुनने में छोटा है, और कथा में थोड़ा ही आगे इसका फल साफ़ दिखता है।
हज़ार जन्म, और एक शूल
भुशुण्डि कहते हैं: “शिव के वचन सुनकर गुरु हर्षित हुए, स्वयं भी एवमस्तु कहा, मुझे अच्छी तरह समझाया, और शिव के चरणों को हृदय में रखकर घर चले गये।” एक शब्द चुपचाप बड़ा काम करता है, समझाकर: जिसने उनकी बात कभी सुनी नहीं थी, उसी को वे जाते-जाते एक बार और समझाकर जाते हैं। यह कथा में गुरु का आख़िरी काम है। उसके बाद वे कथा से निकल जाते हैं।
और फिर हज़ार जन्म कुछ ही शब्दों में बीत जाते हैं। “काल की प्रेरणा से विन्ध्याचल जाकर मैं सर्प हुआ, और कुछ समय बाद बिना किसी परिश्रम के वह शरीर छोड़ दिया।” दण्ड ठीक वही मिला जो सुनाया गया था। कुछ कम नहीं हुआ।
फिर यह नियम बन जाता है: “जो भी शरीर धारण करता, उसे बिना परिश्रम वैसे ही छोड़ देता जैसे मनुष्य नया वस्त्र पहनता है और पुराना छोड़ देता है।” उपमा में पहनना पहले आता है, छोड़ना बाद में: शरीर जाने का दुःख इसलिये नहीं कि जाने से पहले ही अगला मिल चुका होता है।
और फिर पूरा सौदा बँध जाता है: “शिव ने वेद की नीति रख ली, और मुझे क्लेश भी नहीं हुआ। इस प्रकार मैंने अनेक शरीर धारण किये, पर ज्ञान नहीं गया।” नियम का पालन हुआ, दण्ड चला, और दण्ड पानेवाले को वह लगा नहीं।
इसके तुरन्त बाद इस वरदान की एक दरार दिखती है। भुशुण्डि कहते हैं: “तिर्यक्, देवता या मनुष्य, जो भी शरीर मिलता, उसमें राम का भजन चलता रहता। पर एक शूल मुझे कभी नहीं भूला: गुरु का कोमल और सुशील स्वभाव।”
हज़ार जन्मों में से किसी में दुःख नहीं, यह शिव का वचन था और पूरा उतरा। पर एक शूल है, और वह दण्ड का नहीं, याद का है। शिव ने सज़ा से पीड़ा निकाल दी। पश्चात्ताप उनके अधिकार में नहीं था।
अन्तिम शरीर, और पिता की हार
भुशुण्डि कहते हैं: “अन्तिम शरीर मैंने ब्राह्मण का पाया, जिसे पुराण और वेद देवताओं को भी दुर्लभ बताते हैं। वहाँ भी बालकों में मिलकर खेलता तो राम की ही लीलाएँ करता। सयाना होने पर पिता मुझे पढ़ाने लगे। मैं समझता, सुनता, विचारता, पर अच्छा नहीं लगता था। मन से सारी वासनाएँ भाग गयीं, और लय केवल राम के चरणों में लगी।” यहीं वह स्वभाव फिर दिखता है।
वे कहते हैं: “हे गरुड़, कहिये, ऐसा कौन अभागा होगा जो कामधेनु को छोड़कर गदही की सेवा करे? प्रेम में मग्न रहने से मुझे कुछ नहीं सुहाता था, और पिता पढ़ा-पढ़ाकर हार गये।”
यह कहावत उसी की है जो अपनी उसी आदत का बचाव कर रहा है जिसके कारण आगे उसे दूसरा शाप मिलेगा। पहली बार पढ़ाई ठुकरायी गयी और उसके लिये यह सुन्दर कारण है। दूसरी बार उपदेश ठुकराया जायेगा, और वहाँ कथा एक शब्द जोड़ देती है, सादर: दूसरी बार वह उपदेश आदर के साथ नहीं सुनता।
माता-पिता के जाने के बाद वह वन चला जाता है, और वहाँ की दिनचर्या सीधी है। वे कहते हैं: “जहाँ-जहाँ मुनियों के आश्रम मिलते, वहाँ-वहाँ जाकर सिर नवाता, राम के गुणों की कथाएँ पूछता। वे कहते और मैं हर्षित होकर सुनता।” और यहीं वह बात आती है जो हज़ार जन्म पीछे बँधे धागे को खींच देती है: शिव की कृपा से उनकी गति कहीं रुकती नहीं थी।
जो आशीर्वाद शिव ने शाप घटाते समय जोड़ा था, वह यहाँ ख़र्च होता है, किसी बड़े काम में नहीं, आश्रम-आश्रम घूमकर कथा सुनने में।
इसी बीच तीनों प्रकार की गहरी एषणाएँ छूट जाती हैं, पुत्र की, धन की और मान की, और एक ही लालसा बढ़ती जाती है। भुशुण्डि कहते हैं: “राम के चरणकमल जब देखूँ, तब अपना जन्म सफल मानूँ।” पर जिस मुनि से पूछते, वही कहता: “ईश्वर सर्वभूतमय है।” यह निर्गुण मत उन्हें सुहाता नहीं, और हृदय में सगुण ब्रह्म की प्रीति बढ़ती जाती है। बहस अभी किसी से हुई नहीं, पर उसका सामान इकट्ठा हो चुका है।
मेरु के शिखर पर, बड़ की छाया में
गुरु के वचनों का स्मरण करके मन राम के चरणों में लगा रहता है, और वे क्षण-क्षण नया अनुराग पाते हुए राम का यश गाते फिरते हैं। इसी घूमने में वह जगह आती है जहाँ कथा का दूसरा आधा खुलता है।
भुशुण्डि कहते हैं: “मेरु के शिखर पर बड़ की छाया में लोमश मुनि बैठे थे। उन्हें देखकर मैंने चरणों में सिर नवाया और अत्यन्त दीन वचन कहे।” इस प्रसंग में लोमश अकेले मनुष्य हैं जिनका नाम लिया गया है। बाक़ी सब गुरु, द्विज, ब्राह्मण, मुनि, और “मैं” हैं। आगे जो होना है, वह इसी नाम से जुड़ जायेगा।
और भेंट सिर नवाकर, अति दीन वचनों से शुरू होती है: जिस बातचीत का अन्त शाप में होगा, उसका आरम्भ इससे अधिक विनम्र नहीं हो सकता था।
मुनि भी उसी तरह पेश आते हैं। नम्र और कोमल वचन सुनकर वे आदर से पूछते हैं: “हे द्विज, किस काम से आये हैं?” और उत्तर में प्रश्न बिलकुल साफ़ है: “आप सर्वज्ञ हैं और सुजान हैं। मुझे सगुण ब्रह्म की आराधना कहिये।” माँग में कोई धुँधलापन नहीं: सगुण, और आराधना।
मुनि पहले वही करते हैं जो माँगा गया था: राम के गुणों की कुछ कथाएँ आदर के साथ कहते हैं। फिर वह होता है जिससे सारा झगड़ा उठता है। वह उदारता से उठता है: ब्रह्मज्ञान में रत उन विज्ञानी मुनि ने सुननेवाले को परम अधिकारी जान लिया, और परम अधिकारी को वही दिया जाता है जो ऊँचा हो।
वह उपदेश गिनाने लायक है: अजन्मा, अद्वैत, निर्गुण, हृदय का स्वामी। बुद्धि से न नापा जा सकनेवाला, इच्छारहित, नामरहित, रूपरहित, अनुभव से जानने योग्य, अखण्ड, उपमारहित। मन और इन्द्रियों से परे, निर्मल, अविनाशी, निर्विकार, सीमारहित, सुख की राशि। और अन्त में, जल और लहर की उपमा के साथ, कि उसमें और सुननेवाले में कोई भेद नहीं।
यहाँ तक कोई किसी के साथ बुरा नहीं कर रहा: प्रश्न सगुण का था और उत्तर निर्गुण का है, पर उत्तर देनेवाले ने सामनेवाले को ऊँचा समझकर ऐसा किया। बड़ी लड़ाइयाँ अक्सर वहीं से शुरू होती हैं जहाँ कोई किसी को माँगे से ज़्यादा देता है।
मुनि ने अनेक प्रकार से समझाया, और निर्गुण मत हृदय में नहीं बैठा। तब भुशुण्डि ने फिर चरणों में सिर नवाकर वही माँग दोहरायी, एक ऐसी उपमा के साथ जो तर्क भी है और प्रार्थना भी। “मेरा मन राम-भक्ति के जल में मछली हो रहा है। हे प्रवीण मुनीश्वर, वह उससे अलग कैसे हो सकता है? दया करके वही उपदेश कहिये, जिससे मैं अपनी आँखों राम को देख सकूँ। पहले नेत्र भरकर अयोध्या के स्वामी को देख लूँ, तब निर्गुण का उपदेश सुनूँगा।” यह इनकार नहीं, क्रम था।
मुनि दूसरी बार राम की अनुपम कथा कहते हैं, और फिर एक नया काम करते हैं: सगुण मत का खण्डन करके निर्गुण का निरूपण। खण्डन: अब तक वे बना रहे थे, यहाँ से तोड़ने लगते हैं, और दूसरी ओर से जवाब आना यहीं से शुरू होता है।
उत्तर, और प्रत्युत्तर
भुशुण्डि कहते हैं: “तब मैंने निर्गुण मत को हटाकर बहुत हठ करके सगुण का निरूपण किया। मैंने उत्तर-प्रत्युत्तर किया, और इससे मुनि के शरीर में क्रोध के चिह्न उत्पन्न हो गये।” यह आत्मकथा अपने ऊपर रहम नहीं करती: बहुत हठ करके, ये शब्द कहनेवाले ने अपने ही विरुद्ध चुने हैं।
मुनि अभी कुछ बोले नहीं हैं। क्रोध के चिह्न शरीर पर उभरे हैं। मुँह खुलने से पहले चेहरा बदलता दिखता है, और उसके बाद कहनेवाला इस दृश्य पर एक उदार टिप्पणी करता है।
भुशुण्डि गरुड़ से कहते हैं: “सुनिये, बहुत अपमान करने पर ज्ञानी के हृदय में भी क्रोध उत्पन्न हो जाता है। यदि कोई चन्दन की लकड़ी को बहुत अधिक रगड़े, तो उससे भी आग प्रकट हो जाती है।”
कहनेवाला वह है जिसे उसी क्रोध से शाप मिला, और जिसके बारे में कहा जा रहा है वह शाप देनेवाला है। उपमा की लकड़ी चन्दन है, ठण्डी और सुगन्धित, जिसे घिसा ही इसलिये जाता है कि लेप ठण्डा हो। उससे भी आग निकल सकती है, बशर्ते रगड़ बहुत हो।
और अपने हिस्से का शब्द वह नरम नहीं चुनता, अपमान: रगड़ बहुत हो गयी थी, और रगड़नेवाला वह ख़ुद था। यह वाक्य उस मुनि के पक्ष में है जिसने उसे शाप दिया।
बैठे-बैठे जो सोचा गया
पर यह उदारता बरसों बाद की है, गरुड़ को सुनाते समय की। उस दिन मेरु पर जो सोचा जा रहा था, वह इसका ठीक उलटा था। भुशुण्डि कहते हैं: “मुनि बार-बार क्रोध के साथ ज्ञान का निरूपण करते, और मैं बैठा-बैठा अपने मन में तरह-तरह के अनुमान करता।” वे अनुमान क्या थे, यह कथा बताती है।
बिना द्वैतबुद्धि के क्रोध कैसा, और बिना अज्ञान के द्वैतबुद्धि कैसी? माया के वश रहनेवाला परिच्छिन्न जड़ जीव क्या ईश्वर के समान हो सकता है? तर्क में कहीं छेद नहीं: क्रोध है, तो भेद की बुद्धि है। भेद की बुद्धि है, तो अज्ञान है। इसलिये जो अद्वैत सिखा रहे हैं, वे स्वयं उसमें खड़े नहीं।
पर यह तर्क किस काम में लगाया गया? गुरु के क्रोध को गुरु के सिद्धान्त के विरुद्ध गवाही बना दिया गया। जिस क्षण किसी की चूक को उसकी बात काटने का औज़ार बना लिया जाता है, उस क्षण सीखना बन्द हो जाता है। इसके तुरन्त बाद की बातें यही बताती हैं कि सीखना सचमुच बन्द हो गया।
इसके बाद प्रश्नों की एक लम्बी लड़ी है, और वह सब मन के भीतर चलती है। सबका हित चाहनेवाले को कभी दुःख हो सकता है क्या? जिसके पास पारसमणि है, उसके पास दरिद्रता रह सकती है क्या? दूसरों से द्रोह करनेवाले निर्भय हो सकते हैं क्या, और कामी कलंक से बच सकते हैं क्या?
लड़ी आगे बढ़ती है: ब्राह्मण का अहित करने पर वंश रह सकता है क्या? स्वरूप की पहचान हो जाने पर कर्म रह सकते हैं क्या? दुष्टों के संग से किसी को सुबुद्धि उपजी है क्या? परस्त्रीगामी शुभ गति पा सकता है क्या? परमात्मा को जाननेवाले जन्म-मरण में पड़ सकते हैं क्या? भगवान् की निन्दा करनेवाले कभी सुखी हुए हैं क्या? नीति जाने बिना राज्य रह सकता है क्या? भगवान् का चरित्र कहने पर पाप रह सकते हैं क्या?
और अन्त में वे प्रश्न जो तराज़ू उठा लेते हैं: बिना पुण्य के पवित्र यश मिलता है क्या, और बिना पाप के अपयश? भगवान् की भक्ति के समान कोई लाभ है क्या, जिसे श्रुति, संत और पुराण गाते हैं? जगत् में इससे बड़ी हानि कोई है क्या, कि मनुष्य का शरीर पाकर भी राम का भजन न किया जाये? चुग़लख़ोरी के समान कोई पाप है क्या, और दया के समान कोई धर्म?
इस लड़ी के बीच एक प्रश्न अलग खड़ा है, ब्राह्मण का अहित करने पर वंश रह सकता है क्या? वह उसी के मन में चल रहा है जिसे पिछले जन्म में शिव ने विप्र-द्रोह की आग की चेतावनी दी थी। वह उसे उसी क्षण दोहरा रहा है जिस क्षण सामने बैठे मुनि का उपदेश आदर के साथ नहीं सुन रहा।
कथा इस पर कोई टिप्पणी नहीं करती। बस दो बातें एक के बाद एक रख देती है। भुशुण्डि कहते हैं: “इस प्रकार मैं अनगिनत युक्तियाँ मन में विचारता था, और मुनि का उपदेश आदर के साथ नहीं सुनता था।” ये प्रश्न किसी से पूछे नहीं गये, एक भी मुनि की ओर नहीं फेंका गया। सब भीतर ही भीतर, बैठे-बैठे। मुँह भरा है सच्ची बातों से, और कान बन्द है।
कौए की तरह, और फिर कौआ
भुशुण्डि ने जब बार-बार सगुण का पक्ष गाड़ा, तब मुनि क्रोध से भरे वचन बोले। क्रोध से भरा उनका यह भाषण छोटा है।
लोमश कहते हैं: “अरे मूढ़, मैं सर्वोत्तम शिक्षा देता हूँ और वह मानी नहीं जाती। बहुत-से उत्तर-प्रत्युत्तर लाकर रख दिये जाते हैं। सत्य वचन पर विश्वास नहीं होता।” और फिर वह उपमा, जिसके आगे इस प्रसंग का अन्त लिखा है: कौए की भाँति सभी से डरता है।
यह बात शाप से ठीक पहले आती है, और यही इसका महीन हिस्सा है। मुनि पहले उसे कौआ कहते हैं, उपमा की तरह, चिढ़कर। फिर अगली ही साँस में उसे कौआ बना देते हैं। जो दण्ड निकला, वह कहीं बाहर से नहीं आया। उसी शब्द में से निकला जो एक पल पहले मुँह से गिरा था।
कौआ इसलिये नहीं कहा गया कि वह कहीं भी बैठ जाता है या शोर करता है। इसलिये कि वह सभी से डरता है, किसी पर भरोसा नहीं करता। जिसने गुरु के, फिर मुनि के उपदेश पर भरोसा नहीं किया, उसे उसी अविश्वास का चेहरा दे दिया जाता है।
लोमश उसे मूर्ख कहकर शाप देते हैं: उसके हृदय में अपने पक्ष का हठ बहुत बड़ा है, इसलिये वह शीघ्र ही चाण्डाल पक्षी हो जाये। भुशुण्डि कहते हैं: “मैंने शाप को सिर पर चढ़ा लिया। उससे मुझे न कुछ भय हुआ, न दीनता आयी।”
सिर पर चढ़ाना: यह क्रिया उस चीज़ के लिये होती है जो आदर के साथ ली जाती है, प्रसाद के लिये, आज्ञा के लिये। यहाँ वह शाप के लिये है। और जिन दो चीज़ों को उन्होंने आने नहीं दिया, वे भी गिनी हुई हैं: भय और दीनता। वे यह नहीं कहते कि दुःख नहीं हुआ। कहते हैं कि डर नहीं लगा और गिड़गिड़ाहट नहीं आयी।
इतनी शान्ति का उत्तर शिव के वरदान में है: किसी भी जन्म में ज्ञान नहीं मिटेगा। जिसे मालूम है कि शरीर बदलने से वह नहीं बदलेगा जो उसके पास है, उसके लिये एक और शरीर एक और कपड़ा है।
भुशुण्डि कहते हैं: “तुरन्त ही मैं कौआ हो गया। फिर मुनि के चरणों में सिर नवाकर, राम का स्मरण करके, हर्षित होकर उड़ चला।” नये शरीर का पहला काम एक प्रणाम है, और वह उसी के चरणों में है जिसने यह शरीर दिया। इस पूरी कथा की जड़ में एक ऐसा ही प्रणाम था जो नहीं दिया गया था। यहाँ वह बिना माँगे दिया जाता है, उसे जिससे कोई इसकी आशा न करता।
और फिर वह बात, जिसके साथ कथा अपनी बाहरी परत पर लौटती है: टीका बताती है कि यह शिव का वचन है, पार्वती से। शिव पार्वती से कह रहे हैं, उनके भीतर एक कौआ गरुड़ से, और उसके भीतर एक ब्राह्मण शिव से कह रहा था।
और जो कहा जाता है वह पूरी कथा का उत्तर है। शिव कहते हैं: “पार्वती, जो राम के चरणों में रत हैं और काम, मद तथा क्रोध से रहित हैं, वे जगत् को अपने प्रभु से भरा हुआ देखते हैं। फिर वे किससे विरोध करें?” तीन में से दो इसी प्रसंग में नाम लेकर चल चुके हैं: मद, जिससे पहला अपराध हुआ, और क्रोध, जो मेरु के शिखर पर उठा। विवाद निर्गुण और सगुण का था, और शिव का अन्तिम वाक्य उसका फ़ैसला नहीं करता। एक प्रश्न रख देता है: वे किससे विरोध करें?
वरदान से न बदला स्वभाव
एक गुरु ने अपना अपमान करनेवाले शिष्य के लिये भीख माँगी, और यही बात इस प्रसंग के नाम से याद रहती है। यह सच है, और कथा का पहला हिस्सा है। पर कथा वहीं नहीं रुकती: उसी आदमी को हज़ार जन्म आगे ले जाकर दुबारा उसी जगह खड़ा कर देती है। इस बार उसके लिये विनती करने कोई नहीं आता। कथा यह नहीं कहती कि वह सुधर गया। दिखाती है कि वरदान मिलने से स्वभाव नहीं बदलता।
दूसरी बात: कथा कहनेवाले का नाम यहाँ एक बार नहीं आता, वह केवल “मैं” है। जो अपनी दो हारें ख़ुद सुना रहा हो, उसके लिये नाम के बिना बोलना आसान भी है और ईमानदार भी।
तीसरी बात शिव की: वे झुकते हैं, पर पलटते नहीं। हज़ार जन्म पूरे रहते हैं। जो घटता है वह संख्या नहीं, दाम है। और रियायत का कारण भी वे नहीं छिपाते: वह उसके खाते से मिली है जिसका अपमान हुआ था।
चौथी बात उन ब्राह्मण की, जिनका नाम भी नहीं है: वे किसी से बहस नहीं करते, किसी को शाप नहीं देते, अपने लिये केवल भक्ति माँगते हैं। वे शिव की लम्बी स्तुति गाते हैं, और उसी में कहते हैं कि उन्हें न योग आता है, न जप, न पूजा। और उतने से काम बन जाता है।
और एक शान्त बात: शिव के वचन सुनकर गुरु हर्षित हुए, शिष्य को एक बार और समझाया, और घर चले गये। उसके बाद वे कथा में लौटते नहीं। हज़ार जन्म उनके बिना बीतते हैं, और उन जन्मों की अकेली पीड़ा उन्हीं की याद है।
और आख़िरी बात: दोनों शाप अनादर से निकले हैं, एक गुरु के, एक उपदेश के। पहली बार एक शिष्य गुरु के आने पर उठा नहीं। दूसरी बार एक जिज्ञासु ने वह उत्तर नहीं लिया जो उसे दिया जा रहा था, और अपनी बात के पक्ष में अनगिनत सही युक्तियाँ जुटा लीं। कथा यह नहीं कहती कि उसकी युक्तियाँ ग़लत थीं। बस उनके बगल में एक बात रख देती है, कि उपदेश आदर के साथ नहीं सुना जा रहा था।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, उत्तरकाण्ड, दोहा 108 से 112, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।