रामचरितमानस · उत्तरकाण्ड · रुद्राष्टक, शिव की कृपा, और लोमश का शाप
रुद्राष्टक, शिव की कृपा, और लोमश का शाप
जिस गुरु का अपमान हुआ था वही संस्कृत में शिव के आगे गिड़गिड़ाते हैं, शाप घटता है पर मिटता नहीं, और हज़ार जन्म बीत जाने पर वही स्वभाव मेरु के शिखर पर दूसरी बार सिर उठा लेता है।
पिछला प्रसंग वहीं छूटा था जहाँ किसी के लिये कुछ कहने को बचा नहीं था। शिव के मन्दिर में आकाशवाणी हो चुकी थी, दण्ड सुनाया जा चुका था, और जिस शिष्य ने गुरु को सामने देखकर उठना भी ज़रूरी नहीं समझा था उसे सर्प हो जाने को कह दिया गया था। ऐसी जगह कथा का सीधा रास्ता यह होता कि शिष्य रोता, या भागता, या क्षमा माँगता। तुलसी वह रास्ता नहीं लेते। इस पन्ने की पहली आवाज़ शिष्य की नहीं है। वह उस आदमी की है जिसका अपमान हुआ था, और वह आवाज़ माँग रही है।
और यहीं एक और बात होती है जो इस काण्ड में बार-बार नहीं होती। इन पाँच दोहों की सारी कथा अवधी में चलती है, घरेलू और खुली हुई अवधी में, जिसमें पिता पढ़ा-पढ़ाकर हार जाते हैं और मन भक्ति के जल में मछली हो जाता है। पर जहाँ वे ब्राह्मण शिव के सम्मुख हाथ जोड़ते हैं, वहाँ नौ श्लोकों तक तुलसी अवधी छोड़ देते हैं और संस्कृत लिखते हैं। जिस स्तुति को लोग आज रुद्राष्टक कहकर गाते हैं, वह इसी जगह, इसी कारण से, पूरी की पूरी खड़ी है।
पर यह पन्ना उतना ही नहीं है जितना उसके नाम से लगता है। स्तुति के बाद वरदान आता है, वरदान के बाद वह शाप आता है जो घटाया तो जाता है पर उठाया नहीं जाता, और फिर हज़ार जन्म बीत जाते हैं। उन हज़ार जन्मों के पार एक ब्राह्मण-शरीर है, एक वन है, और मेरु के शिखर पर बड़ की छाया में बैठे हुए लोमश मुनि हैं। वहाँ वही आदमी दूसरी बार वही काम करता है जो उसने पहली बार किया था, और इस बार उसके लिये कोई विनती करने नहीं आता। पन्ना जहाँ ख़त्म होता है, वहाँ एक कौआ मुनि के चरणों में सिर नवाकर उड़ जाता है।
इस प्रसंग के मुख्य किरदार
- गुरु इस पूरे प्रसंग में जिनका नाम एक बार नहीं आता; पाठ उन्हें गुर, द्विज और बिप्र ही कहता है, और वे अपने अपमान की चर्चा किये बिना अपमान करनेवाले के लिये वर माँगते हैं।
- शिव सिव, संभु और संकर, जिन्होंने शाप दिया था और जो यहाँ अपना क्रोध स्वयं मानकर शाप को घटाते हैं, पर व्यर्थ नहीं जाने देते।
- कथा कहनेवाले जो यहाँ केवल मैं हैं, जिनका नाम इन पाँच दोहों में कहीं नहीं आता, और जो अपनी दो हारों की कथा स्वयं सुना रहे हैं।
- लोमश मेरु के शिखर पर बड़ की छाया में बैठे मुनि, जो पूछे गये प्रश्न से बड़ा उत्तर देते हैं और अन्त में क्रोध में आकर शाप दे बैठते हैं।
- गरुड़ जिन्हें यह सारी कथा सुनायी जा रही है; पाठ उन्हें खगेस, खगनाथ, खगराज और हरिजान कहकर पुकारता है और टीका उनका नाम खोलती है।
- उमा पार्वती, जिनसे इस पूरी कथा का बाहरी सूत्र कहा जा रहा है, और जिनके नाम पर यह पन्ना समाप्त होता है।
जिसका अपमान हुआ, वही गिड़गिड़ाता है
इस प्रसंग की पहली बात वह है जो इसमें होती ही नहीं। गुरु के पास कहने को बहुत कुछ था। वे कह सकते थे कि दण्ड उचित हुआ। वे कह सकते थे कि थोड़ा कम कर दीजिये, लड़का नादान है। वे यह भी कह सकते थे कि मैंने तो कुछ नहीं कहा था, फिर मेरे नाम पर इतना बड़ा शाप क्यों। इनमें से एक भी वाक्य वे नहीं बोलते। जो बोलते हैं वह स्तुति है, और स्तुति में अपनी बात सबसे आख़िर में रखते हैं।
और स्तुति का पहला शब्द ही उसका पूरा ढंग बता देता है। वह शब्द नमामि है, प्रणाम। जो आदमी कुछ माँगने आया है वह पहले झुकता है, और झुककर जो पहला परिचय देता है वह भी ध्यान देने लायक है। वह उस देवता का परिचय है जिसे किसी चीज़ की ज़रूरत नहीं।
नमामीशमीशान निर्वाणरूपं । विभुं व्यापकं ब्रह्म वेदस्वरूपं॥
रुद्राष्टक, श्लोक १
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं । चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहं॥
हे मोक्षस्वरूप, हे विभु, हे व्यापक, हे ब्रह्म, हे वेदस्वरूप, ईशान दिशा के और सबके स्वामी, मैं आपको नमस्कार करता हूँ। और फिर चार विशेषण एक साथ आते हैं, और चारों में एक ही अक्षर बार-बार लौटता है: निर्गुण, निर्विकल्प, निरीह, और उसके पहले निर्वाणरूप। जो गुण से रहित है, जिसमें भेद नहीं है, जिसे कोई इच्छा नहीं है। माँगने आया हुआ आदमी सबसे पहले यह कहता है कि आप वह हैं जिसे कुछ नहीं चाहिये।
और अन्तिम शब्द उस चित्र को पूरा कर देता है। चिदाकाश, चेतन आकाश, और आकाश ही जिनका वस्त्र है। टीका इस पद के दो अर्थ खोलती है: जो आकाश को पहने हुए हैं, अर्थात् दिगम्बर, और जो आकाश को भी ढँक लेते हैं। जिनके पास पहनने को आकाश के सिवा कुछ नहीं, उन्हीं के सामने खड़े होकर एक आदमी वर माँगने वाला है।
निराकारमोंकारमूलं तुरीयं । गिरा ग्यान गोतीतमीशं गिरीशं॥
रुद्राष्टक, श्लोक २
करालं महाकाल कालं कृपालं । गुणागार संसारपारं नतोऽहं॥
निराकार, ओङ्कार के मूल, तुरीय, वाणी से परे, ज्ञान से परे, इन्द्रियों से परे, कैलासपति। यहाँ तक वही चल रहा है जो पहले श्लोक में था। फिर एक पंक्ति आती है जिसमें तुलसी दो शब्द आमने-सामने रख देते हैं। करालं महाकाल कालं कृपालं। विकराल, और महाकाल के भी काल, और कृपालु। एक ही साँस में भयानक और दयालु।
यह संयोग नहीं है। जो आदमी यह गा रहा है वह ठीक इसी दोराहे पर खड़ा है। जिस शक्ति ने अभी-अभी उसके शिष्य पर शाप गिराया है वही शक्ति वह है जिससे वह दया की आशा रखता है। स्तुति में उसने अपनी हालत का नक्शा खींच दिया, और अपने बारे में एक शब्द नहीं कहा।
सार: शिव के मन्दिर में शाप गिर चुका है, और बोलने के लिये वही ब्राह्मण उठते हैं जिनका अपमान हुआ था। वे शिकायत नहीं करते, दण्ड पर टिप्पणी नहीं करते, और संस्कृत में एक स्तुति आरम्भ करते हैं जो पहले शिव को उस रूप में बाँधती है जिसे कुछ नहीं चाहिये, और फिर विकराल और कृपालु को एक ही पंक्ति में रख देती है।
जो देखा नहीं जा सकता, उसका रूप
तीसरे श्लोक पर आते ही स्तुति का काम बदल जाता है। अब तक जो कुछ कहा गया था वह सब निषेध था, निर्गुण, निराकार, गोतीत। अब ब्राह्मण उसी को आँखों के सामने खड़ा करने लगते हैं। हिमाचल जैसे गौर और उतने ही गम्भीर, जिनके शरीर में करोड़ों कामदेवों की ज्योति और शोभा है, जिनके सिर पर सुन्दर नदी गङ्गा लहराती है, जिनके ललाट पर द्वितीया का चन्द्रमा है, और जिनके गले में सर्प है।
गले का वही सर्प एक बार ठहरकर देखने लायक है। जो शरीर इसी पन्ने पर आगे चलकर दण्ड बनकर आनेवाला है, वही यहाँ शिव के गले का आभूषण है। तुलसी इस पर एक शब्द नहीं कहते। वे बस दोनों को एक ही पन्ने पर रख देते हैं और आगे बढ़ जाते हैं।
चौथे श्लोक में चित्र और पास आ जाता है। कानों में कुण्डल हिल रहे हैं, भौंहें सुन्दर हैं, नेत्र विशाल हैं, मुख प्रसन्न है, कण्ठ नीला है, और वे दयालु हैं। सिंह का चर्म वस्त्र है और मुण्डों की माला गले में है। और इतना सब कहकर श्लोक जिन दो शब्दों पर टिकता है वे हैं प्रियं और सर्वनाथं। सबके प्यारे, और सबके नाथ। मुण्डमाला के तुरन्त बाद प्रिय शब्द रखना अपने आप में एक बात कह देता है।
पाँचवाँ श्लोक फिर तेज हो जाता है। प्रचण्ड, श्रेष्ठ, तेजस्वी, परमेश्वर, अखण्ड, अजन्मा, करोड़ों सूर्यों के समान प्रकाशवाले। और फिर वह पंक्ति आती है जिसमें एक ही चीज़ दो काम करती है: त्रयः शूल निर्मूलनं शूलपाणिं। तीन प्रकार के शूलों को जड़ से उखाड़ देनेवाले, और हाथ में शूल धारण किये हुए। जो हथियार हाथ में है वही दुःख का नाम भी है, और वही उसे निर्मूल भी करता है। और श्लोक का अन्त होता है भावगम्यं पर, अर्थात् जो भाव से मिलते हैं। यह वाक्य उस आदमी के लिये बहुत काम का है जिसके पास भाव के सिवा कुछ है ही नहीं।
कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी । सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी॥
रुद्राष्टक, श्लोक ६
चिदानंद संदोह मोहापहारी । प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी॥
कलाओं से परे, कल्याणस्वरूप, कल्प का अन्त करनेवाले, सज्जनों को सदा आनन्द देनेवाले, त्रिपुर के शत्रु। सच्चिदानन्दघन, मोह को हर लेनेवाले, कामदेव के शत्रु। और फिर, पाँच श्लोक तक जो नहीं हुआ था, वह होता है। प्रसीद प्रसीद प्रभो। प्रसन्न हूजिये, प्रसन्न हूजिये।
यह इस स्तुति की धुरी है। पाँच श्लोकों तक एक शब्द नहीं माँगा गया था। यहाँ पहली बार माँग आती है, और जो माँगा जाता है वह कोई वस्तु नहीं है। प्रसन्न हूजिये। दीजिये नहीं, हटाइये नहीं, लौटाइये नहीं। मन बदल जाय, इतना ही। और ध्यान दीजिये कि यह माँग किस विशेषण के बगल में रखी गयी है: मोहापहारी, मोह को हर लेनेवाले। जिस लड़के के लिये यह सब कहा जा रहा है उसका अपराध अभिमान और मोह ही था।
सातवें श्लोक में ब्राह्मण अपनी ओर से हटकर एक सामान्य नियम कह देते हैं। जब तक मनुष्य उमानाथ के चरणकमलों को नहीं भजते, तब तक न उन्हें इस लोक में सुख और शान्ति मिलती है, न परलोक में, और न उनके ताप का नाश होता है। इसमें कहीं भी वह शिष्य नहीं है। एक वाक्य है जो सब पर लागू होता है। और श्लोक का अन्तिम सम्बोधन है सर्वभूताधिवासं, समस्त जीवों के भीतर बसनेवाले। जो सबके भीतर है, उससे एक के लिये कहने की तैयारी यहीं हो रही है।
न जानामि योगं जपं नैव पूजां । नतोऽहं सदा सर्वदा शंभु तुभ्यं॥
रुद्राष्टक, श्लोक ८
जरा जन्म दुःखौघ तातप्यमानं। प्रभो पाहि आपन्नमामीश शंभो॥
यही वह श्लोक है जिसे लोग सबसे ज़्यादा याद रखते हैं, और उसका कारण भी सामने ही है। न योग जानता हूँ, न जप, न पूजा। यह कहनेवाला कोई साधारण उपासक नहीं है। यह वह ब्राह्मण है जो किसी का गुरु है, जो मन्दिर में खड़ा है, और जो अभी-अभी आठ श्लोक की संस्कृत स्तुति गा चुका है। उसी क्षण वह कहता है कि मुझे कुछ आता नहीं। जो जानता है, वही कह सकता है कि नहीं जानता।
और उसके बाद वह पंक्ति, जिसे इस पन्ने के बाक़ी हिस्से के साथ मिलाकर पढ़ना चाहिये। बुढ़ापे और जन्म के दुःखों के समूह से जलते हुए मुझ दुःखी की रक्षा कीजिये। यह बचाव जन्म और जरा के ताप से माँगा गया है। थोड़ी ही देर में शिव ठीक यही चीज़ किसी और को देंगे, और अपने नाम पर नहीं, इन्हीं के नाम पर।
रुद्राष्टकमिदं
रुद्राष्टक, फलश्रुति श्लोक
प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये।
ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शम्भुः प्रसीदति॥ ९॥
अन्तिम श्लोक स्तुति के भीतर से निकलकर स्तुति के बारे में बोलने लगता है। रुद्र का यह अष्टक शङ्कर की तुष्टि के लिये एक ब्राह्मण के द्वारा कहा गया, और जो मनुष्य इसे भक्ति से पढ़ते हैं उन पर शम्भु प्रसन्न होते हैं। दो बातें यहाँ रखने लायक हैं। पहली, यह स्तुति अपना मौक़ा अपने भीतर दर्ज कर लेती है, पर कहनेवाले का नाम नहीं लेती। विप्रेण, एक ब्राह्मण के द्वारा। दूसरी, जो फल पढ़नेवालों को बताया गया है वह ठीक वही है जो अभी इस मन्दिर में मिलने वाला है: प्रसन्नता।
और नाम पर एक बात। इसे रुद्राष्टक कहा गया है, अष्टक, अर्थात् आठ का समूह। आठ श्लोक स्तुति हैं और नवाँ श्लोक फल बताता है, स्तुति का हिस्सा नहीं है। गिनती तुलसी ने ख़ुद साफ़ कर दी है।
सार: स्तुति निर्गुण से चलकर रूप तक आती है, हिमालय जैसा गौर वर्ण, सिर पर गङ्गा, गले में सर्प, मुण्डमाला, हाथ में शूल। छठे श्लोक में पहली बार माँग आती है और वह वस्तु की नहीं, प्रसन्नता की है। आठवें में ब्राह्मण कहते हैं कि उन्हें न योग आता है, न जप, न पूजा, और जन्म-जरा के ताप से रक्षा माँगते हैं। नवाँ श्लोक बताता है कि यह अष्टक एक ब्राह्मण ने कहा और भक्ति से पढ़नेवालों पर शम्भु प्रसन्न होते हैं।
आकाशवाणी, और माँगने का ढंग
सुनि बिनती सर्बग्य सिव देखि बिप्र अनुरागु।
दोहा १०८ (क)
पुनि मंदिर नभबानी भइ द्विजबर बर मागु॥ १०८ (क)॥
सर्वज्ञ शिव ने विनती सुनी और ब्राह्मण का अनुराग देखा। इस पंक्ति में दो क्रियाएँ हैं और उनका क्रम मामूली नहीं है। पहले सुनना, फिर देखना। और जो देखा जाता है वह शब्द नहीं है, अनुरागु है। सर्वज्ञ को सुनने की ज़रूरत नहीं होती, वे पहले से जानते हैं। जो चीज़ देखी जाती है वह प्रेम है, और वही निर्णायक होती है।
और फिर वही मन्दिर, वही आकाशवाणी। जिस जगह से शाप उतरा था, उसी जगह से यह वाक्य उतरता है: द्विजबर बर मागु। ध्यान दीजिये कि यहाँ क्षमा नहीं कही गयी। वर कहा गया है, और वर माँगना पड़ता है। जो काम अब तक शिव कर रहे थे, वह इसी एक वाक्य से ब्राह्मण के हाथ में आ जाता है। अगला क़दम उनका है, और वे उसे चार हिस्सों में उठाते हैं।
जौं प्रसन्न प्रभु मो पर नाथ दीन पर नेहु।
दोहा १०८ (ख, ग, घ)
निज पद भगति देइ प्रभु पुनि दूसर बर देहु॥ १०८ (ख)॥
तव माया बस जीव जड़ संतत फिरइ भुलान।
तेहि पर क्रोध न करिअ प्रभु कृपासिंधु भगवान॥ १०८ (ग)॥
संकर दीनदयाल अब एहि पर होहु कृपाल।
साप अनुग्रह होइ जेहिं नाथ थोरेहीं काल॥ १०८ (घ)॥
पहला हिस्सा अपने लिये है, और यह बात छिपायी नहीं गयी। हे प्रभो, यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं और इस दीन पर आपका स्नेह है, तो पहले अपने चरणों की भक्ति दीजिये, फिर दूसरा वर दीजिये। जो चीज़ उन्हें सबसे प्यारी है वह वे पहले सुरक्षित कर लेते हैं, और उसके बाद कहते हैं कि अब एक और वर दीजिये। स्तुति में जो आदमी अपने को आख़िर में रख रहा था, वह माँगने में अपने को पहले रखता है, और यह विनम्रता का उलटा नहीं है। यह हिसाब है। जो माँगना बाक़ी है वह अपने लिये नहीं है, इसलिये उसे दूसरे वर की जगह चाहिये।
दूसरा हिस्सा सबसे चतुर है, और सबसे कोमल भी। वे शिष्य का नाम नहीं लेते। वे कहते हैं कि यह जड़ जीव आपकी माया के वश होकर निरन्तर भूला हुआ फिरता है, हे कृपा के समुद्र, उस पर क्रोध न कीजिये। एक वाक्य में वे अपने शिष्य को नियम का उदाहरण बना देते हैं। अब मामला एक लड़के की धृष्टता का नहीं रहा, सारे जीवों की भूल का हो गया, और उस भूल का कारण भी उसी के सामने रख दिया गया जिससे दया माँगी जा रही है।
तीसरा हिस्सा ही वह जगह है जहाँ वे उस लड़के तक आते हैं, और यहाँ भी वे शाप वापस लेने को नहीं कहते। संकर दीनदयाल, अब इस पर कृपालु हूजिये, जिससे थोड़े ही समय में इस पर शाप के बाद अनुग्रह हो जाय। वे दण्ड को मिटाने की नहीं, उसकी अवधि की बात करते हैं। थोरेहीं काल, बस इतना।
और अब वह बात, जो इस पूरी विनती में एक बार नहीं आती। अपमान। चार दोहों में वे अपने ऊपर हुई बात का उल्लेख तक नहीं करते। न यह कि मेरे साथ ऐसा हुआ, न यह कि मैंने क्षमा कर दिया। जिस घटना से यह सारा प्रसंग चला है, वह घटना उनके मुँह से एक बार नहीं निकलती।
सार: शिव विनती सुनते हैं और ब्राह्मण का प्रेम देखते हैं, और उसी मन्दिर में दूसरी बार आकाशवाणी होती है, इस बार वर माँगने के लिये। ब्राह्मण पहले अपने लिये चरणों की भक्ति माँगते हैं, फिर शिष्य का नाम लिये बिना कहते हैं कि माया के वश भूला हुआ जीव क्रोध का पात्र नहीं, और अन्त में यही माँगते हैं कि शाप के बाद अनुग्रह थोड़े ही समय में हो जाय।
शाप घटता है, मिटता नहीं
उत्तर देने से पहले तुलसी एक आधी पंक्ति में यह बता देते हैं कि उत्तर क्यों मिल रहा है। ब्राह्मण की वाणी को वे परहित सानी कहते हैं, दूसरे के हित से सनी हुई। सनी हुई, छुई हुई नहीं। और उसी वाणी को सुनकर आकाशवाणी फिर होती है, और इस बार वह दो शब्दों की है: एवमस्तु, ऐसा ही हो।
जदपि कीन्ह एहिं दारुन पापा। मैं पुनि दीन्हि कोप करि सापा॥
चौपाई १
तदपि तुम्हारि साधुता देखी । करिहउँ एहि पर कृपा बिसेषी॥
यद्यपि इसने भयानक पाप किया है और मैंने भी क्रोध करके इसे शाप दिया है, तो भी आपकी साधुता देखकर मैं इस पर विशेष कृपा करूँगा। इस चौपाई में तीन बातें एक साथ मानी जाती हैं और किसी को दबाया नहीं जाता। पाप भयानक था। शाप क्रोध में दिया गया था, और यह शिव स्वयं कह रहे हैं। और फिर भी कृपा होगी। कारण जो दिया जाता है वह लड़के में नहीं है। वह ब्राह्मण की साधुता है।
इस पूरे भाषण में शिष्य के पक्ष में एक शब्द नहीं कहा जाता। उसकी उम्र, उसकी नादानी, उसका पश्चात्ताप, कुछ भी नहीं। जो छूट मिलती है वह किसी और के खाते से मिलती है, और यह बात साफ़ लिखी हुई है।
और आगे शिव अपनी पसन्द का नियम बता देते हैं। जो क्षमाशील हैं और परोपकारी हैं, वे द्विज मुझे वैसे ही प्रिय हैं जैसे खरारि। खर के शत्रु, अर्थात् राम। शिव अपनी प्रियता नापने के लिये जो पैमाना उठाते हैं वह राम हैं, और यह वाक्य उस आदमी के लिये कहा जा रहा है जिसने अभी-अभी अपने अपराधी के लिये विनती की है। इसके तुरन्त बाद वह वाक्य आता है जो पूरे प्रसंग की रीढ़ है: मेरा शाप व्यर्थ नहीं जायेगा, यह हज़ार जन्म अवश्य पायेगा।
जनमत मरत दुसह दुख होई । एहि स्वल्पउ नहिं ब्यापिहि सोई॥
चौपाई २
कवनेउँ जन्म मिटिहि नहिं ग्याना। सुनहि सूद्र मम बचन प्रवाना॥
जन्मने और मरने में जो दुःसह दुःख होता है, वह इसे ज़रा भी न व्यापेगा, और किसी भी जन्म में इसका ज्ञान नहीं मिटेगा। यही इस पन्ने पर कृपा का पूरा अर्थ है। दण्ड पूरा खड़ा रहता है, हज़ार जन्म के हज़ार जन्म। जो हटा लिया जाता है वह दण्ड का दंश है, और उससे भी बड़ी बात यह कि स्मृति नहीं जाती। सज़ा चलती रहेगी और भोगनेवाला उसे भोगेगा नहीं।
और इसी चौपाई के अन्त में सम्बोधन आता है, जिसे तुलसी नरम नहीं करते। सुनहि सूद्र मम बचन प्रवाना। शिव उसे शूद्र कहकर पुकारते हैं और अपना वचन प्रमाण बताते हैं। यह पन्ना इस शब्द को छिपाता नहीं। पर दो चौपाई आगे बढ़िये और वही बोलनेवाला उसी सुननेवाले से कहता है, सुनु मम बचन सत्य अब भाई। एक ही भाषण के भीतर सम्बोधन शूद्र से भाई तक चला आता है, और बीच में जो पड़ता है वह वरदान है।
वरदान का ब्यौरा भी ग़ौर करने लायक है। शिव कहते हैं कि जन्म रघुनाथ की पुरी में हुआ, फिर मन मेरी सेवा में लगा; उसी पुरी के प्रभाव से और मेरी कृपा से हृदय में राम-भक्ति उपजेगी। श्रेय कहीं भी उस आदमी को नहीं दिया जाता। श्रेय जगह को दिया जाता है और कृपा को।
इसके बाद शिक्षा आती है और वह छोटी है। द्विजों की सेवा ही वह व्रत है जिससे भगवान् प्रसन्न होते हैं। अब कभी ब्राह्मण का अपमान न करना। संतों को अनन्त के समान जानना। और फिर एक चेतावनी, जिसमें चार हथियार गिनाये जाते हैं: इन्द्र का वज्र, शिव का विशाल शूल, काल का दण्ड और हरि का विकराल चक्र। जो इनके मारे नहीं मरता, वह भी विप्र-द्रोह की आग में जल जाता है। जिस आदमी को यह सुनाया जा रहा है, वह हज़ार जन्म के आगे खड़ा है, इसलिये यह चेतावनी भविष्य के लिये है, बीते हुए के लिये नहीं।
और अन्त में एक और आशीर्वाद, जिसे इस पन्ने के आख़िर तक याद रखना चाहिये। ऐसा विवेक मन में रखना, फिर जगत् में कुछ भी दुर्लभ न रहेगा। और मेरा एक आशीर्वाद यह भी है कि गति अप्रतिहत होगी, कहीं रुकेगी नहीं। यह वरदान सुनने में सबसे छोटा है और इसी पन्ने पर इसका फल सबसे साफ़ दिखता है।
सार: शिव एवमस्तु कहते हैं, अपना क्रोध स्वयं मानते हैं, और कृपा का कारण ब्राह्मण की साधुता बताते हैं। शाप वापस नहीं होता, हज़ार जन्म बने रहते हैं, पर जन्म-मरण का दुःख नहीं व्यापेगा और ज्ञान किसी जन्म में नहीं मिटेगा। साथ में द्विज-सेवा की शिक्षा, विप्र-द्रोह की चेतावनी, और अबाध गति का एक आशीर्वाद मिलता है।
हज़ार जन्म, और एक शूल
सुनि सिव बचन हरषि गुर एवमस्तु इति भाषि।
दोहा १०९ (क, ख, ग, घ)
मोहि प्रबोधि गयउ गृह संभु चरन उर राखि॥ १०९ (क)॥
प्रेरित काल बिंधि गिरि जाइ भयउँ मैं ब्याल।
पुनि प्रयास बिनु सो तनु तजेउँ गएँ कछु काल॥ १०९ (ख)॥
जोइ तनु धरउँ तजउँ पुनि अनायास हरिजान।
जिमि नूतन पट पहिरइ नर परिहरइ पुरान॥ १०९ (ग)॥
सिवँ राखी श्रुति नीति अरु मैं नहिं पावा कलेस।
एहि बिधि धरेउँ बिबिधि तनु ग्यान न गयउ खगेस॥ १०९ (घ)॥
शिव के वचन सुनकर गुरु हर्षित हुए, स्वयं भी एवमस्तु कहा, मुझे अच्छी तरह समझाया, और शिव के चरणों को हृदय में रखकर घर चले गये। इस पंक्ति में एक शब्द चुपचाप बहुत बड़ा काम करता है: मोहि प्रबोधि। समझाकर। जिस आदमी ने इनकी बात कभी सुनी नहीं थी, उसी को ये जाते-जाते एक बार और समझाकर जाते हैं। यह इस पन्ने पर गुरु का आख़िरी काम है, और उसके बाद वे कथा से निकल जाते हैं।
और फिर हज़ार जन्म बीस शब्दों में बीत जाते हैं। काल की प्रेरणा से विन्ध्य जाकर मैं सर्प हुआ, और कुछ समय बाद बिना किसी परिश्रम के वह शरीर छोड़ दिया। ध्यान दीजिये कि दण्ड ठीक वही मिला जो सुनाया गया था। कुछ कम नहीं हुआ।
तीसरी पंक्ति उसे नियम बना देती है। हे हरिजान, जो भी शरीर धारण करता, उसे बिना परिश्रम वैसे ही छोड़ देता जैसे मनुष्य नया वस्त्र पहनता है और पुराना छोड़ देता है। उपमा में क्रम पर ध्यान दीजिये: पहनना पहले आता है, छोड़ना बाद में। शरीर जाने का दुःख इसलिये नहीं है कि जाने से पहले ही अगला मिल चुका होता है।
और चौथी पंक्ति में वह वाक्य है जिसमें पूरा सौदा बँधा हुआ है। शिव ने श्रुति की नीति रख ली और मुझे क्लेश भी नहीं हुआ। नियम का पालन हुआ, दण्ड चला, और दण्ड पाने वाले को वह लगा नहीं। इस प्रकार अनेक शरीर धारण किये, पर ज्ञान नहीं गया।
अब उस चौपाई पर आइये जो इसके तुरन्त बाद है, क्योंकि वहीं इस पूरे वरदान की एक दरार दिखती है। तिर्यक्, देवता या मनुष्य, जो भी शरीर मिलता, उसमें राम का भजन चलता रहता। और फिर यह: एक शूल मुझे कभी नहीं भूला, गुरु का कोमल और सुशील स्वभाव।
हज़ार जन्मों में से किसी में कोई दुःख नहीं है, यह शिव का वचन है और वह पूरा उतरा। पर एक शूल है, और वह दण्ड का नहीं है। वह याद का है। जिस आदमी का अपमान किया था उसकी कोमलता याद आती रही, और यही अकेली चीज़ है जिसे वरदान नहीं हटा सका। शिव ने सज़ा से पीड़ा निकाल दी। पश्चात्ताप उनके अधिकार में नहीं था।
सार: गुरु प्रसन्न होकर, समझाकर, शिव के चरण हृदय में रखकर घर लौट जाते हैं। कथा कहनेवाला विन्ध्य में सर्प होता है और फिर बिना क्लेश के अनेक शरीर धारण करता और छोड़ता जाता है, जैसे कोई पुराना वस्त्र छोड़ता है। सारे जन्मों में एक ही पीड़ा बनी रहती है, गुरु के कोमल स्वभाव की याद।
अन्तिम शरीर, और पिता की हार
अन्तिम शरीर ब्राह्मण का मिला, और उसके साथ ही यह भी कह दिया जाता है कि यह शरीर पुराण और वेद के अनुसार देवताओं को भी दुर्लभ है। वहाँ भी वही आदमी बालकों में मिलकर खेलता तो रघुनाथ की ही लीलाएँ करता था। सयाना होने पर पिता पढ़ाने लगे, और यहीं पहली बार वह स्वभाव फिर दिखता है। समझता, सुनता, विचारता, पर अच्छा नहीं लगता था। मन से सारी वासनाएँ भाग गयीं और लय केवल राम के चरणों में लगी।
कहु खगेस अस कवन अभागी। खरी सेव सुरधेनुहि त्यागी॥
चौपाई ३
प्रेम मगन मोहि कछु न सोहाई । हारेउ पिता पढ़ाइ पढ़ाई॥
हे खगेश, कहिये, ऐसा कौन अभागा होगा जो कामधेनु को छोड़कर गदही की सेवा करे। प्रेम में मग्न रहने के कारण मुझे कुछ नहीं सुहाता था, और पिता पढ़ा-पढ़ाकर हार गये।
यह कहावत जिस मुँह से निकल रही है वह ध्यान देने लायक है। यह आत्मकथा है, और सुनानेवाला अपनी उसी आदत का बचाव कर रहा है जिसके कारण इसी पन्ने पर आगे उसे दूसरा शाप मिलेगा। पहली बार पढ़ाई ठुकरायी गयी और उसके लिये यह सुन्दर कारण मौजूद है। दूसरी बार उपदेश ठुकराया जायेगा और उसके लिये कोई कारण नहीं दिया जायेगा। दोनों इनकारों का फ़र्क़ तुलसी बताते नहीं, पर एक शब्द वे रख देते हैं जो दूसरी बार जुड़ता है और पहली बार नहीं: सादर। दूसरी बार वह उपदेश आदर के साथ नहीं सुनता।
माता-पिता के जाने के बाद वह वन चला जाता है, और वहाँ जो दिनचर्या बनती है वह सीधी है। जहाँ-जहाँ मुनियों के आश्रम मिलते, वहाँ-वहाँ जाकर सिर नवाता, राम के गुणों की कथाएँ पूछता, वे कहते और वह हर्षित होकर सुनता। और यहीं वह आधी पंक्ति आती है जो चार जन्म पीछे बँधे हुए धागे को खींच देती है: अब्याहत गति संभु प्रसादा। शिव की कृपा से गति कहीं रुकती नहीं थी।
वह आशीर्वाद, जो शिव ने शाप घटाते समय जोड़ दिया था, यहाँ ख़र्च होता है। और जिस काम में ख़र्च होता है वह कोई बड़ा काम नहीं है। वह आश्रम-आश्रम घूमकर कथा सुनने में ख़र्च होता है। एक वरदान की सबसे सच्ची परीक्षा यही है कि उसे पाकर आदमी करता क्या है।
इसी बीच तीनों प्रकार की गहरी एषणाएँ छूट जाती हैं, पुत्र की, धन की और मान की, और एक ही लालसा बढ़ती जाती है: राम के चरणकमल जब देखूँ तब अपना जन्म सफल मानूँ। पर हर मुनि से एक ही उत्तर मिलता है, ईश्वर सर्वभूतमय है। यह निर्गुण मत उसे सुहाता नहीं, और हृदय में सगुण ब्रह्म की प्रीति बढ़ती जाती है। बहस अभी किसी से हुई नहीं है, पर उसका सामान इकट्ठा हो चुका है।
सार: अन्तिम शरीर ब्राह्मण का मिलता है, पिता पढ़ाने में हार जाते हैं, और माता-पिता के जाने पर वह वन चला जाता है। शिव के दिये हुए अबाध गति के वरदान से वह आश्रम-आश्रम घूमकर राम-कथा सुनता है, तीनों एषणाएँ छूट जाती हैं, और एक ही लालसा रह जाती है, पर हर मुनि निर्गुण का उत्तर देता है जो उसे नहीं भाता।
मेरु के शिखर पर, बड़ की छाया में
गुरु के वचनों का स्मरण करके मन राम के चरणों में लगा रहता है, और वह क्षण-क्षण नया अनुराग पाता हुआ रघुपति का यश गाता फिरता है। इसी घूमने में वह जगह आती है जहाँ इस पन्ने का दूसरा आधा भाग खुलता है।
मेरु सिखर बट छायाँ मुनि लोमस आसीन।
दोहा ११० (ख)
देखि चरन सिरु नायउँ बचन कहेउँ अति दीन॥ ११० (ख)॥
मेरु के शिखर पर बड़ की छाया में लोमश मुनि बैठे थे। उन्हें देखकर मैंने चरणों में सिर नवाया और अत्यन्त दीन वचन कहे। इन पाँच दोहों में यह अकेला नाम है जो किसी व्यक्ति का है। बाक़ी सब गुर, द्विज, बिप्र, मुनि, खगेस, और मैं है। तुलसी नाम तभी देते हैं जब वह काम का हो, और यहाँ वह इसलिये काम का है कि आगे जो होना है वह इसी नाम के साथ जुड़ जायेगा।
और यह भी देखिये कि भेंट किस मुद्रा में शुरू होती है। सिर नवाया गया है, और वचन अति दीन हैं। जिस बातचीत का अन्त शाप में होगा उसका आरम्भ इससे अधिक विनम्र नहीं हो सकता था।
मुनि भी उसी तरह पेश आते हैं। नम्र और कोमल वचन सुनकर वे आदर के साथ पूछते हैं, हे द्विज, किस काम से आये हैं। और उत्तर में प्रश्न बिलकुल साफ़ रखा जाता है: आप सर्वज्ञ हैं और सुजान हैं, मुझे सगुण ब्रह्म की आराधना कहिये। माँग में कोई धुँधलापन नहीं है। सगुण, और आराधना।
मुनि पहले वही करते हैं जो माँगा गया था। वे रघुपति के गुणों की कुछ कथाएँ आदर के साथ कहते हैं। और फिर वह होता है जिससे सारा झगड़ा उठता है, और वह उदारता से उठता है। ब्रह्मज्ञान में रत उन विज्ञानी मुनि ने सुननेवाले को परम अधिकारी जान लिया, और परम अधिकारी को वही दिया जाता है जो सबसे ऊँचा हो।
वह उपदेश गिनाने लायक है क्योंकि उसमें एक भी शब्द ढीला नहीं है। अजन्मा, अद्वैत, निर्गुण, हृदय का स्वामी। बुद्धि से न नापा जा सकनेवाला, इच्छारहित, नामरहित, रूपरहित, अनुभव से जानने योग्य, अखण्ड, उपमारहित। मन और इन्द्रियों से परे, निर्मल, अविनाशी, निर्विकार, सीमारहित, सुख की राशि। और अन्त में वह वाक्य जिससे सारा शास्त्र टिका है, जल और लहर की उपमा के साथ, कि उसमें और सुननेवाले में कोई भेद नहीं है।
यहाँ तक कोई किसी के साथ बुरा नहीं कर रहा। प्रश्न सगुण का था और उत्तर निर्गुण का है, पर उत्तर देनेवाले ने यह इसलिये किया कि उसने सामनेवाले को ऊँचा समझा। बड़ी लड़ाइयाँ अक्सर यहीं से शुरू होती हैं, जहाँ कोई किसी को उससे ज़्यादा देता है जितना उसने माँगा था।
मुनि ने अनेक प्रकार से समझाया और निर्गुण मत हृदय में नहीं बैठा। तब उसने फिर चरणों में सिर नवाकर वही माँग दोहरायी, और इस बार उसके साथ एक उपमा रखी जो तर्क भी है और प्रार्थना भी। मेरा मन राम-भक्ति के जल में मछली हो रहा है, हे प्रवीण मुनीश्वर, वह उससे अलग कैसे हो सकता है। इसके बाद उसने जो शर्त रखी वह इनकार नहीं थी, क्रम था: पहले नेत्र भरकर अवधनाथ को देख लूँ, तब निर्गुण का उपदेश सुनूँगा।
और फिर मुनि दूसरी बार वही कथा कहते हैं, अनुपम हरिकथा, और उसके बाद वे एक नया काम करते हैं। सगुण मत का खण्डन करके निर्गुण का निरूपण। खण्डि, यही शब्द है। अब तक वे बना रहे थे। यहाँ से वे तोड़ने लगते हैं, और दूसरी ओर से जवाब आना यहीं से शुरू होता है।
सार: मेरु के शिखर पर बड़ की छाया में बैठे लोमश मुनि से भेंट होती है। प्रश्न सगुण ब्रह्म की आराधना का है, पर मुनि सुननेवाले को परम अधिकारी जानकर निर्गुण ब्रह्म का उपदेश देते हैं। समझाने पर भी बात हृदय में नहीं बैठती, माँग दोहरायी जाती है, और तब मुनि सगुण मत का खण्डन करके निर्गुण का निरूपण करते हैं।
उत्तर, और प्रत्युत्तर
तब मैं निर्गुन मत कर दूरी । सगुन निरूपउँ करि हठ भूरी॥
चौपाई ४
उत्तर प्रतिउत्तर मैं कीन्हा । मुनि तन भए क्रोध के चीन्हा॥
तब मैंने निर्गुण मत को हटाकर बहुत हठ करके सगुण का निरूपण किया। मैंने उत्तर-प्रत्युत्तर किया, और इससे मुनि के शरीर में क्रोध के चिह्न उत्पन्न हो गये। यह आत्मकथा अपने ऊपर रहम नहीं करती। करि हठ भूरी, बहुत हठ करके। शब्द अपने ही विरुद्ध चुना गया है।
और क्रोध का वर्णन देखिये। मुनि अभी कुछ बोले नहीं हैं। क्रोध के चिह्न शरीर पर उभरे हैं, चेहरे पर, साँस में, जहाँ भी उभरते हों। तुलसी हमें मुँह खुलने से पहले चेहरा बदलते हुए दिखा देते हैं, और उसके बाद जो वाक्य आता है वह उस दृश्य पर की गयी सबसे उदार टिप्पणी है।
सुनु प्रभु बहुत अवग्या किएँ । उपज क्रोध ग्यानिन्ह के हिएँ॥
चौपाई ५
अति संघरषन जौं कर कोई । अनल प्रगट चंदन ते होई॥
हे प्रभो, सुनिये, बहुत अपमान करने पर ज्ञानी के भी हृदय में क्रोध उत्पन्न हो जाता है। यदि कोई चन्दन की लकड़ी को बहुत अधिक रगड़े तो उससे भी अग्नि प्रकट हो जाती है।
यह वाक्य कौन कह रहा है और किसके बारे में, यही इसकी असली बात है। कहनेवाला वह है जिसे उसी क्रोध से शाप मिला। जिसके बारे में कहा जा रहा है वह शाप देनेवाला है। और उपमा के लिये जो लकड़ी चुनी गयी है वह चन्दन है, सबसे ठण्डी और सबसे सुगन्धित लकड़ी, जिसे लोग घिसते ही इसलिये हैं कि लेप ठण्डा हो। उतनी ठण्डी चीज़ से भी आग निकल सकती है, बशर्ते रगड़ बहुत हो।
और जो शब्द वह अपने हिस्से के लिये चुनता है वह भी नरम नहीं है: अवग्या, अपमान। वह यह नहीं कहता कि मुनि से चूक हो गयी। वह कहता है कि रगड़ बहुत हो गयी थी, और रगड़नेवाला वह ख़ुद था। इस पन्ने पर यह सबसे दयालु वाक्य है और वह अपने शत्रु के पक्ष में कहा गया है।
सार: सगुण का पक्ष हठ के साथ रखा जाता है, उत्तर-प्रत्युत्तर चलता है, और मुनि के शरीर पर क्रोध के चिह्न उभर आते हैं। कथा कहनेवाला इस क्रोध का बचाव स्वयं करता है, यह कहकर कि अधिक अपमान से ज्ञानी के हृदय में भी क्रोध उपजता है, जैसे बहुत रगड़ने पर चन्दन से भी आग निकल आती है।
बैठे-बैठे जो सोचा गया
पर जो उदारता अभी पढ़ी गयी वह बरसों बाद की है, गरुड़ को सुनाते समय की। उस दिन मेरु पर जो सोचा जा रहा था वह इसका ठीक उलटा था। मुनि बार-बार क्रोध के साथ ज्ञान का निरूपण करते रहे, और सामने बैठा हुआ आदमी सुनना छोड़कर अपने मन में अनुमान लगाने लगा। वे अनुमान क्या थे, यह दोहे में लिखा है।
क्रोध कि द्वैतबुद्धि बिनु द्वैत कि बिनु अग्यान।
दोहा १११ (ख)
मायाबस परिछिन्न जड़ जीव कि ईस समान॥ १११ (ख)॥
बिना द्वैतबुद्धि के क्रोध कैसा, और बिना अज्ञान के द्वैतबुद्धि कैसी। माया के वश रहनेवाला परिच्छिन्न जड़ जीव क्या ईश्वर के समान हो सकता है। यह इस पन्ने की सबसे तेज़ बात है और सबसे बुरी भी। तर्क में कहीं छेद नहीं है। क्रोध है, तो भेद की बुद्धि है; भेद की बुद्धि है, तो अज्ञान है; इसलिये जो मुझे अद्वैत सिखा रहे हैं वे स्वयं उसमें खड़े नहीं हैं।
पर देखिये यह तर्क किस काम में लगाया गया। गुरु के क्रोध को गुरु के सिद्धान्त के विरुद्ध गवाही बना दिया गया। जिस क्षण किसी की चूक को उसकी बात काटने का औज़ार बना लिया जाता है, उस क्षण सीखना बन्द हो जाता है, और इस दोहे के तुरन्त बाद तुलसी यही बताते हैं कि सीखना सचमुच बन्द हो गया।
क्योंकि इसके बाद जो आता है वह प्रश्नों की एक लम्बी लड़ी है, और वह सब मन के भीतर चलती है। सबका हित चाहने से कभी दुःख हो सकता है क्या। जिसके पास पारसमणि है उसके पास दरिद्रता रह सकती है क्या। दूसरों से द्रोह करनेवाले निर्भय हो सकते हैं क्या, और कामी कलङ्क से बच सकते हैं क्या।
लड़ी आगे बढ़ती है और और तेज़ होती जाती है। ब्राह्मण का बुरा करने पर वंश रह सकता है क्या। स्वरूप की पहचान हो जाने पर कर्म रह सकते हैं क्या। दुष्टों के संग से किसी को सुबुद्धि उपजी है क्या। परस्त्रीगामी शुभ गति पा सकता है क्या। परमात्मा को जाननेवाले जन्म-मरण में पड़ सकते हैं क्या। हरि की निन्दा करनेवाले कभी सुखी हुए हैं क्या। नीति जाने बिना राज्य रह सकता है क्या। हरि का चरित्र कहने पर पाप रह सकते हैं क्या।
और अन्त में वे प्रश्न आते हैं जो तराज़ू उठा लेते हैं। बिना पुण्य के पवित्र यश मिलता है क्या, और बिना पाप के अपयश मिलता है क्या। हरि-भक्ति के समान कोई लाभ है क्या, जिसे श्रुति, संत और पुराण गाते हैं। हे भाई, जगत् में इससे बड़ी हानि कोई है क्या कि मनुष्य का शरीर पाकर भी राम का भजन न किया जाय। चुग़लख़ोरी के समान कोई पाप है क्या, और हे हरिजान, दया के समान कोई धर्म है क्या।
अब इस लड़ी को दुबारा पढ़िये और बीच में पड़ा हुआ एक प्रश्न अलग कीजिये। ब्राह्मण का बुरा करने पर वंश रह सकता है क्या। यह वाक्य उस आदमी के मन में चल रहा है जिसे पिछले जन्म में शिव ने यही चेतावनी दी थी कि जिसे वज्र और त्रिशूल नहीं मार पाते उसे विप्र-द्रोह की आग जला देती है। नियम उसे कण्ठस्थ है। वह उसे उसी क्षण दोहरा रहा है जिस क्षण वह अपने सामने बैठे हुए मुनि का उपदेश आदर के साथ नहीं सुन रहा।
तुलसी इस पर कोई टिप्पणी नहीं करते। वे बस दो अर्ध-पंक्तियाँ एक के बाद एक रख देते हैं। इस प्रकार मैं अनगिनत युक्तियाँ मन में विचारता था, और मुनि का उपदेश आदर के साथ नहीं सुनता था। ये प्रश्न किसी से पूछे नहीं गये। एक भी मुनि की ओर नहीं फेंका गया। सब भीतर ही भीतर, बैठे-बैठे। मुँह भरा हुआ है सच्ची बातों से, और कान बन्द है।
सार: मुनि क्रोध में ज्ञान का निरूपण करते रहते हैं और सुननेवाला सुनना छोड़कर मन में तर्क करता है कि क्रोध द्वैतबुद्धि का प्रमाण है और द्वैतबुद्धि अज्ञान का। इसके बाद उसके मन में सही बातों के प्रश्नों की एक लम्बी लड़ी चलती है, जिनमें ब्राह्मण का अनहित करने का प्रश्न भी है, और उसी समय वह उपदेश आदर के साथ नहीं सुन रहा होता।
कौए की तरह, और फिर कौआ
जब बार-बार सगुण का पक्ष गाड़ा जाने लगा, तब मुनि क्रोध से भरे वचन बोले। यह इस पन्ने पर लोमश का पहला और आख़िरी भाषण है, और वह दो चौपाइयों में पूरा हो जाता है।
मूढ़ परम सिख देउँ न मानसि। उत्तर प्रतिउत्तर बहु आनसि॥
चौपाई ६
सत्य बचन बिस्वास न करही । बायस इव सबही ते डरही॥
अरे मूढ़, मैं सर्वोत्तम शिक्षा देता हूँ और वह मानी नहीं जाती; बहुत सारे उत्तर-प्रत्युत्तर लाकर रख दिये जाते हैं। सत्य वचन पर विश्वास नहीं होता। और फिर वह उपमा, जिसके आगे इस प्रसंग का अन्त लिखा हुआ है: कौए की भाँति सभी से डरता है।
यह पंक्ति शाप से एक पंक्ति पहले आती है, और यही उसका सबसे महीन हिस्सा है। मुनि पहले उसे कौआ कहते हैं, उपमा की तरह, चिढ़कर। फिर अगली ही साँस में वे उसे कौआ बना देते हैं। क्रोध ने जो किया सो किया, पर जो दण्ड निकला वह कहीं बाहर से नहीं आया। वह उसी शब्द में से निकला जो एक पल पहले मुँह से गिरा था।
और उपमा का अर्थ भी ठीक से देखिये। कौआ इसलिये नहीं कहा गया कि वह कहीं भी बैठ जाता है या शोर करता है। कहा गया कि वह सभी से डरता है, अर्थात् किसी पर भरोसा नहीं करता, हर हाथ को उठा हुआ हाथ समझता है। जिस आदमी ने अपने गुरु के उपदेश पर, फिर एक मुनि के उपदेश पर, भरोसा नहीं किया, उसे उसी अविश्वास का चेहरा दे दिया जाता है।
सठ स्वपच्छ तव हृदयँ बिसाला। सपदि होहि पच्छी चंडाला॥
चौपाई ७
लीन्ह श्राप मैं सीस चढ़ाई । नहिं कछु भय न दीनता आई॥
अरे मूर्ख, अपने पक्ष का हठ हृदय में बहुत बड़ा है, इसलिये शीघ्र ही चाण्डाल पक्षी हो जा। मैंने शाप को सिर पर चढ़ा लिया, उससे मुझे न कुछ भय हुआ, न दीनता आयी।
सीस चढ़ाई। यह क्रिया उस चीज़ के लिये होती है जिसे आदर के साथ लिया जाता है, प्रसाद के लिये, आज्ञा के लिये। यहाँ वह शाप के लिये बरती गयी है। और जो दो चीज़ें उसने आने से इनकार किया वे भी गिनी हुई हैं: भय और दीनता। वह यह नहीं कहता कि दुःख नहीं हुआ। वह कहता है कि डर नहीं लगा और गिड़गिड़ाहट नहीं आयी।
वह इतनी शान्ति से यह क्यों ले पाया, इसका उत्तर इसी पन्ने पर कुछ ऊपर रखा हुआ है। किसी भी जन्म में ज्ञान नहीं मिटेगा, यह शिव का वचन था। जिसे यह मालूम है कि शरीर बदलने से वह नहीं बदलेगा जो उसके पास है, उसके लिये एक और शरीर एक और कपड़ा है। पिछली बार यही बात बचाव की तरह काम आयी थी। इस बार वह पहले से तैयार खड़ी है।
तुरत भयउँ मैं काग तब पुनि मुनि पद सिरु नाइ।
दोहा ११२ (क, ख)
सुमिरि राम रघुबंस मनि हरषित चलेउँ उड़ाइ॥ ११२ (क)॥
उमा जे राम चरन रत बिगत काम मद क्रोध।
निज प्रभुमय देखहिं जगत केहि सन करहिं बिरोध॥ ११२ (ख)॥
तुरन्त ही मैं कौआ हो गया। फिर मुनि के चरणों में सिर नवाकर और रघुवंश की मणि राम का स्मरण करके हर्षित होकर उड़ चला। नये शरीर का पहला काम एक प्रणाम है, और वह उसी आदमी के चरणों में है जिसने यह शरीर दिया। इस पूरी कथा की जड़ में एक ऐसा ही प्रणाम था जो नहीं दिया गया था। यहाँ वह बिना माँगे दिया जाता है, और उस व्यक्ति को दिया जाता है जिससे कोई इसकी आशा न करता।
और फिर वह दूसरा दोहा आता है, जिसके साथ पन्ना अपनी सबसे बाहरी परत पर लौट जाता है। सम्बोधन बदल जाता है: उमा। टीका बताती है कि यह शिव का वचन है और वे पार्वती से कह रहे हैं। इस एक पंक्ति से यह याद आ जाता है कि यह सारी कथा कितनी परतों में रखी है। शिव उमा से कह रहे हैं, उनके भीतर एक कौआ गरुड़ से कह रहा है, और उसके भीतर एक ब्राह्मण शिव से कह रहा था।
और जो कहा जाता है वह पूरे पन्ने का उत्तर है। हे उमा, जो राम के चरणों में रत हैं और काम, मद तथा क्रोध से रहित हैं, वे जगत् को अपने प्रभु से भरा हुआ देखते हैं, फिर वे किससे विरोध करें। तीन में से दो इसी पन्ने पर नाम लेकर चल चुके हैं। मद वह था जिससे पहला अपराध हुआ, और क्रोध वह जो मेरु के शिखर पर उठा। विवाद निर्गुण और सगुण का था, और अन्तिम पंक्ति उसका फ़ैसला नहीं करती। वह एक प्रश्न रख देती है: केहि सन करहिं बिरोध।
सार: मुनि क्रोध में कहते हैं कि उपदेश माना नहीं जाता और सत्य वचन पर विश्वास नहीं होता, कौए की तरह सभी से डरता है; और अगली ही चौपाई में वे चाण्डाल पक्षी हो जाने का शाप दे देते हैं। शाप सिर पर चढ़ा लिया जाता है, बिना भय और बिना दीनता के। तुरन्त काक-शरीर मिलता है, मुनि के चरणों में प्रणाम होता है, और राम का स्मरण करके वह उड़ जाता है।
और अन्त में, अपनी ओर
इस प्रसंग को एक वाक्य में कहना हो तो यह कहा जाता है कि एक गुरु ने अपने अपमान करनेवाले शिष्य के लिये भीख माँगी। यह सच है और यह पन्ने का पहला हिस्सा है। पर पन्ना वहीं रुकता नहीं। वह उसी आदमी को हज़ार जन्म आगे ले जाकर दुबारा उसी जगह खड़ा कर देता है, और इस बार उसके लिये विनती करने कोई नहीं आता। कथा यह नहीं कहती कि वह सुधर गया। वह यह दिखाती है कि वरदान मिलने से स्वभाव नहीं बदलता।
दूसरी बात, जो इन पाँच दोहों को दुबारा पढ़ने पर दिखती है, वह एक नाम की अनुपस्थिति है। कथा कहनेवाले का नाम यहाँ एक बार नहीं आता। वह केवल मैं है। सुननेवाले को खगेस, खगनाथ, खगराज और हरिजान कहकर पुकारा जाता है, और उनका नाम टीका खोलती है। जो आदमी अपनी दो हारें ख़ुद सुना रहा हो, उसके लिये नाम के बिना बोलना आसान भी है और ईमानदार भी।
तीसरी बात शिव के बारे में है। इस पन्ने पर वे झुकते हैं, पर पलटते नहीं। शाप व्यर्थ नहीं जायेगा, यह वे साफ़ कह देते हैं, और हज़ार जन्म पूरे के पूरे रहते हैं। जो घटता है वह संख्या नहीं है, दाम है। दण्ड चलता है और दण्ड पाने वाले को चुभता नहीं। और इस रियायत का कारण भी वे छिपाते नहीं: यह उस आदमी के खाते से मिली है जिसका अपमान हुआ था।
और चौथी बात उन्हीं ब्राह्मण के बारे में, जिनका नाम भी नहीं है। इस पूरे प्रसंग में वे अकेले हैं जो किसी से बहस नहीं करते, किसी को शाप नहीं देते, अपने लिये केवल भक्ति माँगते हैं, और अपने साथ हुए बर्ताव का ज़िक्र एक बार नहीं करते। पाठ उन्हें गुर, द्विज और बिप्र ही कहता है। नौ श्लोक संस्कृत में गाकर वे कहते हैं कि मुझे न योग आता है, न जप, न पूजा, और उतने से काम बन जाता है।
इस पन्ने की सबसे शान्त पंक्ति वह है जिसे कोई याद नहीं रखता। शिव के वचन सुनकर गुरु हर्षित हुए, मुझे समझाया, और घर चले गये। वे वर पा चुके थे, शाप घटवा चुके थे, और जाने से पहले उन्होंने एक काम और किया: जिस आदमी ने उनकी बात कभी नहीं सुनी थी, उसे एक बार और समझा गये। उसके बाद वे कथा से निकल जाते हैं और लौटते नहीं। हज़ार जन्म उनके बिना बीतते हैं, और उन हज़ार जन्मों की अकेली पीड़ा उन्हीं की याद है।
और आख़िरी बात, जो इस प्रसंग को पढ़ चुकने के बाद देर तक साथ चलती है। दोनों शाप विद्या के झगड़े से निकले हैं, किसी अपराध से नहीं। पहली बार एक शिष्य गुरु के आने पर उठा नहीं। दूसरी बार एक जिज्ञासु ने वह उत्तर नहीं लिया जो उसे दिया जा रहा था, और अपनी बात के पक्ष में अनगिनत सही युक्तियाँ जुटा लीं। पन्ना यह नहीं कहता कि उसकी युक्तियाँ ग़लत थीं। वह केवल उनके बगल में एक आधी पंक्ति रख देता है, कि उपदेश आदर के साथ नहीं सुना जा रहा था, और पाठक को दोनों एक साथ पढ़ने देता है।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, उत्तरकाण्ड, दोहा १०८ से ११२, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।