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कथा का फल, और मानस का विश्राम

रामचरितमानस · उत्तरकाण्ड · कथा का फल, और मानस का विश्राम

कथा का फल, और मानस का विश्राम

सात सोपानों के अन्त में एक पक्षी अपनी बात पूरी करता है, दूसरा पक्षी अपने लोक को लौट जाता है, शिव अपनी पत्नी को कथा का फल बताते हैं, और तब कवि अपना नाम लेकर अपने ही ग्रन्थ के विषय में आख़िरी वाक्य कहता है।

यह पूरे रामचरितमानस का आख़िरी पन्ना है। नौ दोहे हैं, एक सौ बाईस से एक सौ तीस तक, और उनके बाद छन्द, फिर दो संस्कृत श्लोक, और फिर पाठ के विश्राम की दो सूचनाएँ। इसके आगे इस ग्रन्थ में कुछ नहीं है।

जो चीज़ें किसी रामकथा के अन्त में मिलने की आदत हमें है, उनमें से एक भी यहाँ नहीं है। राम इस पूरे पन्ने पर एक बार भी नहीं बोलते। सीता का नाम एक बार भी नहीं आता। लक्ष्मण, भरत, हनुमान, अयोध्या, लङ्का, दशरथ, इनमें से किसी का नाम इन नौ दोहों में नहीं है। जिसे हम कथा कहते हैं, वह बहुत पहले पूरी हो चुकी। जो यहाँ बचा है वह उस कथा के सुननेवाले हैं, और उन सुननेवालों को सुनानेवाले, और उन सबके पीछे बैठा हुआ वह आदमी जिसने यह सब भाषा में बाँधा।

इसलिये यह पन्ना एक के बाद एक करके अपने पर्दे गिराता जाता है। पहले भुशुण्डि गरुड़ से अपनी बात पूरी करते हैं। फिर गरुड़ उनके चरणों में सिर नवाकर वैकुण्ठ लौट जाते हैं, और उनके जाते ही जो आवाज़ बची रहती है वह शिव की है, जो यह सारा वृत्तान्त पार्वती को सुना रहे थे। फिर शिव अपनी बात पूरी करते हैं और पार्वती बोलती हैं। और जब वे दोनों चुप हो जाते हैं, तब एक और आवाज़ बचती है, जो अब तक कहीं नहीं सुनायी दी थी, और वह अपना नाम लेकर बोलती है।

और इस सारे उतार के नीचे एक चीज़ लगातार चलती रहती है, जो पिछले पन्ने से यहाँ तक चली आयी है: वैद्य की भाषा। रोग, कुपथ्य, परहेज़, जड़ी, अनुपान, औषध। तुलसी इस एक रूपक को इस पूरे समापन में कहीं नहीं छोड़ते, और वही इस पन्ने को बाँधे रखता है।

इस प्रसंग के मुख्य किरदार

  • काकभुशुण्डि वह पक्षी जो यह सारी कथा सुना रहा था, जो अपने को पक्षियों में सबसे नीच कहता है, और जो यहाँ अपनी बात पूरी करके अपने श्रोता को आशीर्वाद देता है।
  • गरुड़ पक्षिराज, जो एक संदेह लेकर आये थे और यहाँ से कृतकृत्य होकर, हृदय में रघुवीर को रखकर, वैकुण्ठ लौट जाते हैं।
  • शिव जो यह पूरा भुशुण्डि-गरुड़ संवाद पार्वती को सुना रहे थे, और जो अब कथा का फल और उसका अधिकारी दोनों गिनाते हैं।
  • पार्वती गिरिजा, जिनके एक संदेह से यह सारी कथा उठी थी, और जो इस पन्ने पर कहती हैं कि वह संदेह अब रहा नहीं।
  • तुलसीदास वह कवि जो पूरे ग्रन्थ में कहीं सामने नहीं आया, और जो अन्तिम छन्द तथा अन्तिम श्लोक में अपना नाम लेकर अपने मन की माँग रख देता है।

दवा, परहेज़ और अनुपान

पिछला पन्ना जहाँ छूटा था, वहाँ भुशुण्डि मन के रोगों की सूची गिना रहे थे, और वह सूची लम्बी थी। वे उसे उसी ढंग से गिना रहे थे जिस ढंग से कोई वैद्य अपनी पोथी में से पढ़कर सुनाता है, एक-एक करके, नाम लेकर। यह पन्ना उसी सूची के अन्तिम वाक्य से खुलता है, और उस वाक्य में एक बात ऐसी है जो पूरी सूची से बड़ी है।

एहि बिधि सकल जीव जग रोगी। सोक हरष भय प्रीति बियोगी॥
मानस रोग कछुक मैं गाए। हहिं सब कें लखि बिरलेन्ह पाए॥

चौपाई १

इस प्रकार जगत् के सब जीव रोगी हैं, और शोक, हर्ष, भय, प्रीति तथा वियोग से और भी दुखी हो रहे हैं। मैंने कुछ मानस-रोग कह दिये। ये हैं तो सबको, पर इन्हें पहचान पाये हैं कोई विरले ही। अन्तिम आधी पंक्ति पर रुकिये, क्योंकि उसी से इस पूरे समापन का मिज़ाज बनता है। कठिनाई यह नहीं बतायी गयी कि रोग दुर्लभ है। कठिनाई यह बतायी गयी कि पहचान दुर्लभ है। रोग सबके पास है और नज़र किसी-किसी के पास, और आगे इस पन्ने पर जो सबसे कड़ी बात आयेगी, कि यह कथा किससे नहीं कहनी चाहिये, वह इसी एक आधी पंक्ति से निकलती है।

अब दवा का नुस्ख़ा आता है, और वह चार टुकड़ों में है। पहला: सद्गुरुरूपी वैद्य के वचन में विश्वास। दूसरा: परहेज़, और वह परहेज़ एक ही वाक्य में बाँध दिया जाता है, विषयों की आशा न करना। तीसरा: रघुनाथ की भक्ति, जो संजीवनी जड़ी है। और चौथा वह जिसे पढ़ते हुए लोग प्रायः छोड़ देते हैं, अनुपान। पोद्दार की टीका बताती है कि अनुपान वह चीज़ है जो दवा के साथ ली जाती है, जैसे शहद, और यहाँ अनुपान है श्रद्धा से भरी हुई बुद्धि। यानी जड़ी अकेली काम नहीं करेगी, उसे उतारने के लिये कुछ और चाहिये, और वह कुछ और रोगी के अपने पास से आना है।

और तब वह चौपाई आती है जिसमें रोगी को यह जानने का तरीक़ा बताया जाता है कि वह अच्छा हो रहा है या नहीं। यह इस पूरे प्रसंग की सबसे व्यावहारिक जगह है, क्योंकि यहाँ कोई सिद्धान्त नहीं, केवल लक्षण हैं।

जानिअ तब मन बिरुज गोसाँई । जब उर बल बिराग अधिकाई॥
सुमति छुधा बाढ़इ नित नई । बिषय आस दुर्बलता गई॥

चौपाई २

हे गोसाईं, मन को नीरोग हुआ तब जानना चाहिये जब हृदय में वैराग्य का बल बढ़ जाय, उत्तम बुद्धिरूपी भूख नित नयी बढ़ती रहे, और विषयों की आशारूपी दुर्बलता मिट जाय। तीन लक्षण गिनाये गये हैं और तीनों ही भूख के हैं, शान्ति के नहीं। यह बात इतनी सीधी है कि उसकी चोट छूट जाती है। बीमार आदमी की सबसे पहली पहचान यही होती है कि उसका खाने को मन नहीं करता, और बुख़ार उतरने की सबसे पहली ख़बर यह होती है कि भूख लौट आयी। तुलसी ने स्वस्थ मन की परिभाषा शान्त मन नहीं रखी, भूखा मन रखी, और भूख का विषय बदल दिया।

सार: मानस-रोगों की सूची यहाँ पूरी होती है। रोग सबको है, पहचान विरलों को। जान लेने से वे क्षीण होते हैं, मरते नहीं, और विषयरूपी कुपथ्य मिलते ही मुनि के हृदय में भी फिर उग आते हैं। दवा चार टुकड़ों की है: सद्गुरु के वचन में विश्वास, विषयों की आशा छोड़ने का परहेज़, रघुपति की भक्तिरूपी संजीवनी, और श्रद्धा से भरी बुद्धिरूपी अनुपान। और नीरोग मन के तीनों लक्षण भूख के हैं: वैराग्य का बल, सुमति की नित नयी भूख, और विषय-आशा की दुर्बलता का जाना।

जो नहीं हो सकता, और जो हो सकता है

रोग जाने के बाद क्या होता है, यह अगली चौपाई एक ही चित्र में कह देती है। जब मनुष्य निर्मल ज्ञानरूपी जल में स्नान कर लेता है, तब उसके हृदय में रामभक्ति छायी रह जाती है। क्रिया पर ध्यान दीजिये: रह। भक्ति कमायी नहीं जाती, वह बची रह जाती है, जैसे नहाने के बाद ठण्डक बची रहती है। इस पन्ने की शुरुआत एक स्नान से हो रही है, और यह याद रखिये, क्योंकि पन्ने का आख़िरी श्लोक भी एक डुबकी पर ही जाकर रुकेगा।

फिर भुशुण्डि गवाह खड़े करते हैं, और गवाही देनेवालों के नाम गिनाते हैं: शिव, ब्रह्मा, शुकदेव, सनकादि, नारद, और वे सब मुनि जो ब्रह्मविचार में निपुण हैं। इतने बड़े नामों के बाद जो निष्कर्ष सुनाया जाता है वह चौंकाने के लिये नहीं, बल्कि थकाने के लिये सादा है: हे पक्षिराज, उन सबका मत यही है कि राम के चरणकमलों में प्रेम करना चाहिये। और श्रुति, पुराण तथा सब ग्रन्थ यही कहते हैं कि रघुपति की भक्ति बिना सुख नहीं है।

और अब उस बात को सिद्ध करने के लिये तुलसी वह चाल चलते हैं जो इस पूरे पन्ने पर सबसे अधिक याद रखी जाती है। वे यह नहीं कहते कि भक्ति के बिना सुख कठिन है। वे असम्भव चीज़ों की एक क़तार खड़ी करते हैं और हर बार कहते हैं, यह सब भले ही हो जाय, वह नहीं होगा। पहली क़तार में कछुए की पीठ पर बाल उग आते हैं, बाँझ का बेटा किसी को मार डालता है, और आकाश में अनेक प्रकार के फूल खिल उठते हैं। इन तीनों के बाद वही टेक लौटती है, कि हरि से विमुख होकर जीव सुख नहीं पाता।

तृषा जाइ बरु मृगजल पाना। बरु जामहिं सस सीस बिषाना॥
अंधकारु बरु रबिहि नसावै। राम बिमुख न जीव सुख पावै॥

चौपाई ३

मृगतृष्णा का जल पीने से भले ही प्यास बुझ जाय, खरगोश के सिर पर भले ही सींग निकल आवें, अन्धकार भले ही सूर्य का नाश कर दे, पर राम से विमुख होकर जीव सुख नहीं पा सकता। यहाँ क़तार का दर्जा बदल जाता है। पहली क़तार में जो चीज़ें थीं वे केवल अनहोनी थीं। ये तीनों अपने भीतर से अपना खण्डन करती हैं। मृगजल वह जल है जो है ही नहीं, इसलिये उसे पीना कठिन नहीं, असम्भव है, क्योंकि पीने को कुछ है ही नहीं। और अन्धकार सूर्य का नाश कैसे करे, जब अन्धकार सूर्य के न होने का ही दूसरा नाम है। तुलसी यहाँ यह कह रहे हैं कि रामविमुख होकर सुख खोजना अपने ही न होने से कुछ माँगने जैसा है।

बारि मथें घृत होइ बरु सिकता ते बरु तेल।
बिनु हरि भजन न भव तरिअ यह सिद्धांत अपेल॥ १२२ (क)॥
मसकहि करइ बिरंचि प्रभु अजहि मसक ते हीन।
अस बिचारि तजि संसय रामहि भजहिं प्रबीन॥ १२२ (ख)॥

दोहा १२२ (क, ख)

जल को मथने से भले ही घी निकल आये और बालू को पेरने से भले ही तेल निकल आये, पर हरि के भजन बिना भवसागर से तरा नहीं जा सकता, यह सिद्धान्त अपेल है, टाला नहीं जा सकता। इस पूरी क़तार में यही दो चीज़ें ऐसी हैं जो किसी के घर का काम हैं। मथना और पेरना दोनों करते हुए लोग रोज़ दिखते हैं, और दोनों से कुछ निकलता भी है। बस निकालनेवाले को यह मालूम होना चाहिये कि वह किसमें से निकाल रहा है। दूध मथिये तो घी है, जल मथिये तो हाथ दुखेंगे। कल्पना की क़तार यहाँ आकर रसोई में उतर आती है, और यही उसका निशाना था।

और फिर दोहे का दूसरा भाग वह करता है जिसकी इस जगह कोई अपेक्षा नहीं करता। इतनी देर तक जो नहीं हो सकता उसकी गिनती हुई, और अब एक वाक्य में वह आता है जो हो सकता है: प्रभु मच्छर को ब्रह्मा बना सकते हैं और ब्रह्मा को मच्छर से भी तुच्छ कर सकते हैं। यानी यह पूरा प्रसंग असम्भव के विषय में था ही नहीं। यह इस विषय में था कि असम्भव किसके लिये है। और इससे जो निष्कर्ष निकाला जाता है वह आश्चर्य नहीं है, आदेश है: ऐसा विचारकर चतुर लोग संदेह छोड़कर राम को भजते हैं। पहले तजि संसय, फिर भजन। संदेह छोड़ना पहली क्रिया है।

सार: निर्मल ज्ञान के जल में नहाने पर हृदय में रामभक्ति बची रह जाती है, और शिव, ब्रह्मा, शुकदेव, सनकादि तथा नारद सबका मत एक ही है। फिर असम्भवों की क़तार: कछुए की पीठ पर बाल, बाँझ का बेटा, आकाश के फूल, मृगजल से बुझती प्यास, खरगोश के सींग, सूर्य को नष्ट करता अन्धकार, बर्फ़ से निकलती आग, मथे हुए जल से घी और पेरी हुई बालू से तेल। इन सबके बाद यह कि मच्छर को ब्रह्मा बना देना प्रभु के लिये सम्भव है, इसलिये संदेह छोड़कर भजन कीजिये।

भुशुण्डि की आख़िरी बात

कहेउँ नाथ हरि चरित अनूपा। ब्यास समास स्वमति अनुरूपा॥
श्रुति सिद्धांत इहइ उरगारी । राम भजिअ सब काज बिसारी॥

चौपाई ४

हे नाथ, मैंने हरि का अनुपम चरित्र कहीं विस्तार से और कहीं संक्षेप से, अपनी बुद्धि के अनुसार कहा। ब्यास समास स्वमति अनुरूपा। इतनी लम्बी कथा के अन्त में कहनेवाला यह नहीं कहता कि मैंने पूरा कह दिया। वह यह कहता है कि जहाँ मेरी बुद्धि फैली वहाँ मैंने फैलाकर कहा और जहाँ नहीं फैली वहाँ समेटकर, और नाप मेरी बुद्धि थी, कथा नहीं। और उसके तुरन्त बाद वह निचोड़ रख देता है, हे सर्पों के शत्रु, श्रुतियों का सिद्धान्त यही है कि सब काम भुलाकर राम का भजन कीजिये। सब काम भुलाकर, यह अवधी में सब काज बिसारी है, और यही वह जगह है जहाँ से आगे कोई बात नहीं बचती।

फिर वे अपने ऊपर आते हैं, और अपने विषय में एक शब्द बोलते हैं जिसे इस पन्ने पर याद रखना ज़रूरी है। रघुपति को छोड़कर और किसका सेवन किया जाय, जिनका मुझ-जैसे सठ पर भी ममत्व है। शठ, यानी धूर्त, मूढ़। जिसने अभी-अभी श्रुतियों का सिद्धान्त सुनाकर पूरी कथा बाँधी, वह अपने को इस नाम से पुकार रहा है। यह शब्द इस पन्ने पर आगे दो बार और आयेगा, और तीनों बार का जोड़ इस पूरे समापन की सबसे बारीक बात निकालेगा।

और तब वह जगह आती है जहाँ पूरे संवाद की बनावट खुलकर सामने आ जाती है। हे गरुड़, अपने हृदय में विचार कर देखिये, क्या मैं राम के भजन का अधिकारी हूँ। पक्षियों में सबसे नीच और सब प्रकार से अपवित्र। पर प्रभु ने मुझे जगत् को पवित्र करनेवाला प्रसिद्ध कर दिया। अब यह देखिये कि यह किससे कहा जा रहा है। सुननेवाला पक्षियों का राजा है, और भगवान् का अपना वाहन। इस पूरे उत्तरकाण्ड की बुनियाद यही उलटाव है, कि पक्षियों में सबसे नीच पक्षियों में सबसे ऊँचे को सिखा रहा है, और वह उलटाव यहाँ आख़िरी बार, अपने ही मुँह से, साफ़ कह दिया जाता है।

उनका दोहा भी इसी पर बैठता है। यद्यपि मैं सब प्रकार से हीन हूँ, तो भी आज मैं धन्य हूँ, अत्यन्त धन्य, क्योंकि राम ने मुझे अपना जन जानकर संत-समागम दिया। यानी इस भेंट में जिसे लाभ हुआ वह अपने को सुनानेवाला नहीं, पानेवाला मानता है। और दोहे का दूसरा भाग उसी विनय पर मुहर लगाता है: हे नाथ, मैंने जथामति कहा, कुछ छिपा नहीं रखा, पर रघुनायक के चरित्र समुद्र हैं, उनकी थाह क्या कोई पा सकता है। यह शब्द, जथामति, अपनी बुद्धि के अनुसार, इस पन्ने पर एक बार और आयेगा, और उस समय बोलनेवाला कोई और होगा।

सार: भुशुण्डि अपनी कथा पूरी करते हैं, यह कहकर कि उन्होंने अपनी बुद्धि के अनुसार कहीं विस्तार और कहीं संक्षेप से कहा और श्रुति का सिद्धान्त यही है कि सब काम छोड़कर राम को भजा जाय। वे अपने को शठ और पक्षियों में सबसे नीच कहते हैं, सत्संग को पल भर के लिये भी दुर्लभ बताते हैं, और दोहे में कहते हैं कि उन्होंने कुछ छिपाया नहीं, पर रघुनायक का चरित्र समुद्र है और उसकी थाह किसी को नहीं मिलती।

चौदह अधिकारी, और तीन नमस्कार

यहाँ कथा एक क़दम बाहर आती है और हमें याद दिला देती है कि यह सब कौन सुना रहा है। राम के अनेक गुणसमूहों का स्मरण कर-करके सुजान भुशुण्डि बार-बार हर्षित हो रहे हैं, ऐसा शिव पार्वती से कहते हैं। पहली बार इस पूरे संवाद में कहनेवाले को बाहर से देखा जा रहा है, और जो दिखता है वह उपदेश देता हुआ आचार्य नहीं है, बार-बार ख़ुश होता हुआ एक पक्षी है।

उसके बाद वे एक सूची गिनाते हैं, और यह सूची किसी निन्दा की नहीं है। साधक, सिद्ध, जीवन्मुक्त, उदासीन, कवि, विद्वान्, कर्म के रहस्य के ज्ञाता, संन्यासी, योगी, शूरवीर, बड़े तपस्वी, ज्ञानी, धर्मपरायण, पण्डित और विज्ञानी। ये सब उस सीढ़ी के ऊपरी डंडे हैं जिस पर चढ़ने में लोग जन्म खपा देते हैं। और इतने आदर से गिनाने का कारण अगली ही पंक्ति में खुल जाता है।

तरहिं न बिनु सेए मम स्वामी। राम नमामि नमामि नमामी॥
सरन गएँ मो से अघ रासी। होहिं सुद्ध नमामि अबिनासी॥

चौपाई ५

ये कोई भी मेरे स्वामी राम का सेवन किये बिना नहीं तर सकते। और यहीं तर्क टूट जाता है और उसकी जगह एक प्रणाम आ जाता है। राम नमामि नमामि नमामी। तीन नमस्कार, एक ही आधी पंक्ति में, और तीसरा लम्बा। पहला दो नमामि छन्द में बैठ जाते हैं और तीसरा खिंचकर नमामी हो जाता है, जैसे सिर उठने में देर लगा रहा हो। इसके बाद वे अपने को भी उसी में डाल देते हैं: जिनकी शरण जाने पर मुझ-जैसी पापराशि भी शुद्ध हो जाती है, उन अविनाशी को मैं नमस्कार करता हूँ। चौदह अधिकारी गिने गये थे, और आख़िर में जो बचा वह अपने को पापों का ढेर कहनेवाला एक कौआ है।

और उनका आख़िरी दोहा उस रूपक को लौटा लाता है जिससे यह पन्ना खुला था। जिनका नाम भव-रोग की भेषज है और तीनों भयंकर पीड़ाओं को हरनेवाला है, वे कृपालु मुझ पर और आप पर सदा अनुकूल रहें। दवा का प्रसंग इस पन्ने के पहले दोहे से पहले शुरू हुआ था, वहाँ भक्ति संजीवनी जड़ी थी, और यहाँ नाम औषध हो गया है। पर असली बात उस दोहे के दो शब्दों में है, मुझ पर और आप पर। विदा लेते हुए वे जो आशीर्वाद देते हैं उसमें अपने को भी शामिल कर लेते हैं, यानी वे आशीर्वाद ऊपर से नहीं दे रहे, साथ बैठकर दे रहे हैं।

सार: शिव पार्वती को बताते हैं कि भुशुण्डि राम के गुण याद करके बार-बार हर्षित हो रहे हैं। वे साधक, सिद्ध, जीवन्मुक्त, कवि, संन्यासी, योगी, तपस्वी, पण्डित आदि चौदह प्रकार के लोग गिनाकर कहते हैं कि इनमें से कोई भी राम का सेवन किये बिना नहीं तरता, और तीन बार नमस्कार करते हैं। फिर वे यह आशीर्वाद देते हैं कि जिनका नाम भव-रोग की औषध है वे मुझ पर और आप पर सदा अनुकूल रहें, और गरुड़ संदेह से छूटकर बोलने लगते हैं।

गरुड़ का ऋण, और संत का स्वभाव

मैं कृतकृत्य भयउँ तव बानी। सुनि रघुबीर भगति रस सानी॥
राम चरन नूतन रति भई । माया जनित बिपति सब गई॥

चौपाई ६

रघुवीर के भक्तिरस में सनी हुई आपकी वाणी सुनकर मैं कृतकृत्य हो गया। राम के चरणों में मेरी नयी प्रीति हो गयी, और माया से उत्पन्न सारी विपत्ति चली गयी। दो शब्दों पर ठहरिये। पहला कृतकृत्य है, और वह इस पन्ने पर एक बार और सुनायी देगा, किसी और के मुँह से, एक और दोहे में। दूसरा नूतन है। इतनी लम्बी कथा सुनकर गरुड़ यह नहीं कहते कि अब मुझे सब मालूम हो गया। वे कहते हैं कि प्रीति नयी हो गयी। कथा का असर ज्ञान के खाते में नहीं, स्नेह के खाते में जमा हुआ है।

पूरन काम राम अनुरागी । तुम्ह सम तात न कोउ बड़भागी॥
संत बिटप सरिता गिरि धरनी । पर हित हेतु सबन्ह कै करनी॥

चौपाई ७

आप पूर्णकाम हैं और राम के प्रेमी हैं, हे तात, आपके समान बड़भागी कोई नहीं। और फिर वह पंक्ति जिसे लोग इस पूरे काण्ड में से अलग करके याद रखते हैं: संत, वृक्ष, नदी, पर्वत और पृथ्वी, इन सबकी करनी दूसरों के हित के लिये ही होती है। गिनती के क्रम पर ध्यान दीजिये। वृक्ष, फिर नदी, फिर पर्वत, फिर पृथ्वी। छोटे से बड़े की ओर, और अन्त में वह चीज़ जिस पर गिनती करनेवाला स्वयं खड़ा है। और इन चारों में एक बात साझी है जो कहीं कही नहीं गयी: इनमें से कोई मना नहीं कर सकता। पेड़ अपनी छाया रोक नहीं सकता, नदी अपना जल लौटा नहीं सकती, पर्वत हट नहीं सकता, पृथ्वी उठ नहीं सकती। संत को इस क़तार के सिरे पर रखकर तुलसी ने उसके परोपकार को गुण नहीं, स्वभाव कह दिया है।

और इसके बाद वह दो पंक्तियाँ आती हैं जिनमें एक कवि अपने से पहले के सब कवियों को सुधार देता है। कवियों ने कहा है कि संत का हृदय मक्खन के समान होता है, पर उन्होंने कहना नहीं जाना। कारण यह कि मक्खन अपने को ताप मिलने से पिघलता है और संत दूसरे के दुःख से पिघलते हैं। उपमा ग़लत नहीं थी, उसकी दिशा ग़लत थी। मक्खन तभी नरम होता है जब आँच उसके नीचे हो, और संत तब नरम होते हैं जब आँच किसी और के नीचे हो। यह सुधार दो पंक्तियों में हो जाता है और किसी से झगड़े बिना हो जाता है, और यही इसकी ताक़त है।

सार: गरुड़ कहते हैं कि आपकी वाणी सुनकर मैं कृतकृत्य हो गया, राम के चरणों में नयी प्रीति हो गयी और माया से उपजी विपत्ति चली गयी। आप मोह के समुद्र में मेरे लिये जहाज़ हुए, और इसका बदला मुझसे नहीं हो सकता। वे संत को वृक्ष, नदी, पर्वत और पृथ्वी की पंक्ति में रखते हैं, जिनकी करनी दूसरों के लिये होती है, और कवियों की मक्खनवाली उपमा को सुधारते हैं कि मक्खन अपने ताप से पिघलता है और संत दूसरे के दुःख से।

गरुड़ की विदा

तासु चरन सिरु नाइ करि प्रेम सहित मतिधीर।
गयउ गरुड़ बैकुंठ तब हृदयँ राखि रघुबीर॥ १२५ (क)॥
गिरिजा संत समागम सम न लाभ कछु आन।
बिनु हरि कृपा न होइ सो गावहिं बेद पुरान॥ १२५ (ख)॥

दोहा १२५ (क, ख)

उनके चरणों में प्रेमसहित सिर नवाकर, और हृदय में रघुवीर को रखकर, धीरबुद्धि गरुड़ तब वैकुण्ठ को चले गये। दो चीज़ें साथ ले जायी गयीं और दोनों गिना दी गयीं: सिर नवाना, और हृदय में रघुवीर। और गरुड़ के साथ जो विशेषण लगाया गया है वह इस पूरी यात्रा की रसीद है, मतिधीर। जो यहाँ मोह लेकर आया था वह यहाँ से धीरबुद्धि होकर जा रहा है, और यह बात किसी घोषणा में नहीं, चलते-चलते एक विशेषण में कह दी गयी है।

फिर दोहे का दूसरा भाग शिव की आवाज़ में आता है, और उसमें वह वाक्य है जो इस पन्ने पर तीसरी बार लौट रहा है: हे गिरिजा, संत-समागम के समान दूसरा कोई लाभ नहीं, और वह हरि की कृपा के बिना नहीं होता, ऐसा वेद और पुराण गाते हैं। भुशुण्डि ने कहा था कि सत्संग पल भर का भी दुर्लभ है। अब शिव उसका कारण बताते हैं: वह कमाया नहीं जाता, दिया जाता है। जिस भेंट में दोनों ने अपने को लाभ में बताया, उस भेंट को भी कहीं से आना पड़ा था।

सार: गरुड़ भुशुण्डि के चरणों में सिर नवाकर, हृदय में रघुवीर को रखकर वैकुण्ठ लौट जाते हैं, और जाते समय उन्हें मतिधीर कहा जाता है। शिव पार्वती से कहते हैं कि संत-समागम के समान कोई लाभ नहीं है और वह हरि की कृपा के बिना नहीं होता। भुशुण्डि को कोई विदा-वाक्य नहीं दिया जाता।

सब साधनों का एक फल

अब शिव अपनी ओर से कथा का फल गिनाते हैं, और यह हिस्सा पूरे ग्रन्थ का सबसे व्यावहारिक हिस्सा है, क्योंकि यहाँ सुननेवाले से सीधे बात की जा रही है। मैंने यह परम पावन इतिहास कहा, वे कहते हैं, जिसे कानों से सुनते ही भव के पाश छूट जाते हैं और शरणागतों के कल्पवृक्ष तथा करुणा के पुंज राम के चरणकमलों में प्रेम उपजता है।

और तुरन्त उसके बाद एक शर्त रख दी जाती है, जो इतनी सादी है कि लोग उसे पढ़कर आगे बढ़ जाते हैं। मन, वचन और कर्म से उपजे पाप उनके जाते हैं जो इस कथा को कान और मन लगाकर सुनते हैं। श्रवन मन लाई। कान अकेला काफ़ी नहीं है। यह शर्त इस पन्ने पर आगे उलटकर आयेगी, और तब वह वरदान नहीं, अयोग्यता बनकर आयेगी।

फिर एक लम्बी सूची शुरू होती है, और वह सूची जान-बूझकर लम्बी है। तीर्थयात्रा, बहुत प्रकार के साधन, योग, वैराग्य, ज्ञान में निपुणता। अनेक कर्म, धर्म, व्रत और दान। अनेक संयम, दम, जप, तप और यज्ञ। प्राणियों पर दया, ब्राह्मण और गुरु की सेवा, विद्या, विनय और विवेक की बड़ाई। तीन पूरी चौपाइयाँ इसी गिनती में चली जाती हैं, और गिनती इस ढंग से की जाती है जैसे कोई भरा हुआ थाल सामने रखता जा रहा हो।

जहँ लगि साधन बेद बखानी। सब कर फल हरि भगति भवानी॥
सो रघुनाथ भगति श्रुति गाई । राम कृपाँ काहूँ एक पाई॥

चौपाई ८

जहाँ तक वेदों ने साधन बताये हैं, हे भवानी, उन सबका फल हरि की भक्ति ही है। तीन चौपाई भर के साधन, और आधी पंक्ति में उन सबका निपटारा। पर तुलसी यहाँ रुकते नहीं, और अगली ही आधी पंक्ति में वह काँटा रख देते हैं जो इस पूरी फलश्रुति को सस्ता होने से बचा लेता है: श्रुतियों में गायी हुई वह भक्ति राम की कृपा से किसी विरले ने ही पायी है। यानी फल एक है, और वह फल दुर्लभ भी है। पहले सब साधनों को एक जगह समेटा गया, और फिर उस एक जगह को भी ऊँचा टाँग दिया गया।

और अगला दोहा उस टँगी हुई चीज़ को उतारने का तरीक़ा बताता है, और तरीक़ा इतना सस्ता है कि उस पर विश्वास करने में कठिनाई होती है। जो मनुष्य विश्वास मानकर यह कथा निरन्तर सुनते हैं, वे बिना परिश्रम के उस मुनिदुर्लभ हरिभक्ति को पा लेते हैं। दो शर्तें हैं, निरंतर और बिस्वास, और इनमें से एक भी जन्म, पद, पढ़ाई या साधन-सामग्री की माँग नहीं करती। जो चीज़ मुनियों को दुर्लभ बतायी गयी थी, उसका रास्ता सुनने में से निकाल दिया गया।

उसके बाद धन्य कहने की एक लम्बी क़तार चलती है, और उसकी बनावट चालाक है। वही सर्वज्ञ है, वही गुणी, वही ज्ञाता, वही पृथ्वी का भूषण, पण्डित और दानी, वही धर्मपरायण और कुल का रक्षक, जिसका मन राम के चरणों में रँगा हुआ है। नाम आख़िर में आता है, विशेषण पहले, इसलिये आधी पंक्ति तक सुननेवाला यह सोचता चलता है कि यह किसकी बात हो रही है। वही नीति-निपुण है, वही परम सयाना, उसी ने वेद का सिद्धान्त ठीक जाना, वही कवि, वही विद्वान्, वही रणधीर, जो छल छोड़कर रघुवीर को भजता है।

सार: शिव कथा का फल गिनाते हैं। सुनने से भवपाश छूटते हैं, पर शर्त यह है कि कान के साथ मन भी लगे। तीर्थ, योग, वैराग्य, व्रत, दान, जप, तप, यज्ञ, दया, सेवा, विद्या, विनय, जहाँ तक वेदों ने साधन बताये, सबका फल हरिभक्ति ही है, और वह भक्ति विरलों को मिलती है। पर जो विश्वास मानकर यह कथा निरन्तर सुनते हैं वे उसे बिना परिश्रम पा लेते हैं। फिर धन्य की एक क़तार: वही सर्वज्ञ जिसका मन राम में रँगा है, वह देश जहाँ गङ्गा हैं, वह घड़ी जब सत्संग हो, और वह कुल जिसमें रामपरायण विनम्र पुरुष जन्मे।

यह किससे न कहिये

यह न कहिअ सठही हठसीलहि। जो मन लाइ न सुन हरि लीलहि॥
कहिअ न लोभिहि क्रोधिहि कामिहि । जो न भजइ सचराचर स्वामिहि॥

चौपाई ९

यह कथा उनसे न कहिये जो शठ हों, हठी स्वभाव के हों, और हरि की लीला मन लगाकर न सुनते हों। लोभी, क्रोधी और कामी से भी न कहिये, जो चराचर के स्वामी को नहीं भजते। चार नाम गिनाये गये और एक आदत। और वह आदत ठीक वही है जो अभी-अभी वरदान की शर्त थी: मन लगाकर सुनना। जिसने मन लगाकर सुना उसके तीनों प्रकार के पाप गये, और जो मन लगाकर नहीं सुनता उससे कहा ही न जाय। एक ही वाक्य है, दो तरफ़ से पढ़ा गया।

अगली चौपाई में एक और नाम जुड़ता है, और उसके साथ एक शर्त जो सुनने में अटपटी लगती है: ब्राह्मणों के द्रोही को कभी न सुनाइये, चाहे वह इन्द्र के समान ऐश्वर्यवाला राजा ही क्यों न हो। इस पूरी सूची में ऊँचाई का ज़िक्र केवल यहाँ आता है, और आता इसलिये है कि उसे ख़ारिज किया जा सके। बड़ा पद इस दरवाज़े पर काम नहीं आता। और तुरन्त बाद यह बता दिया जाता है कि क्या काम आता है: रामकथा के अधिकारी वही हैं जिन्हें सत्संगति अत्यन्त प्यारी है, जिनकी गुरु के चरणों में प्रीति है, जो नीति में रत हैं और ब्राह्मणों के सेवक हैं।

अब इन दोनों सूचियों को आमने-सामने रखिये। जो चीज़ें अयोग्य बनाती हैं वे सब आदतें हैं, और जो चीज़ें योग्य बनाती हैं वे भी सब आदतें हैं। न एक ओर जन्म है, न दूसरी ओर। इस दरवाज़े को कोई भी पार कर सकता है और कोई भी ख़रीद नहीं सकता। और यहीं वह शब्द लौटता है जिसे हम भुशुण्डि के मुँह से सुन चुके हैं। सूची का पहला नाम शठ है, और कुछ ही चौपाई पहले भुशुण्डि ने अपने को मुझ-जैसा शठ कहा था। यह विरोध नहीं है, यही पूरी छँटनी की कुंजी है: बाहर वह नहीं रखा जा रहा जो मूढ़ है, बाहर वह रखा जा रहा है जिसे अपने मूढ़ होने की ख़बर नहीं। जो अपने को शठ कहकर बैठा, वह पूरी कथा सुनने बैठा और सुनाने लायक भी हो गया।

सार: शिव पहले क़बूल करते हैं कि उन्होंने यह कथा पहले छिपाकर रखी थी और तब सुनायी जब प्रेम की अधिकता देखी। फिर वे बताते हैं कि यह कथा शठ, हठी, मन लगाकर न सुननेवाले, लोभी, क्रोधी, कामी और ब्राह्मणों के द्रोही से नहीं कहनी चाहिये, चाहे वह इन्द्र जैसा राजा ही हो, और अधिकारी वे हैं जिन्हें सत्संग प्यारा है, जिनकी गुरु के चरणों में प्रीति है और जो ब्राह्मणों के सेवक हैं। दोहे में दोनों प्रकार के चाहनेवालों को एक ही घाट पर भेज दिया जाता है।

सात सोपान

एहि महँ रुचिर सप्त सोपाना। रघुपति भगति केर पंथाना॥
अति हरि कृपा जाहि पर होई । पाउँ देइ एहिं मारग सोई॥

चौपाई १०

इसमें सात सुन्दर सीढ़ियाँ हैं, जो रघुपति की भक्ति तक पहुँचने के मार्ग हैं। यही वह जगह है जहाँ यह ग्रन्थ अपनी बनावट का नाम लेता है। सात सोपान: बालकाण्ड, अयोध्याकाण्ड, अरण्यकाण्ड, किष्किन्धाकाण्ड, सुन्दरकाण्ड, लङ्काकाण्ड और यह उत्तरकाण्ड। जो पाठक यहाँ तक पहुँचा है, वह इन सातों से होकर आया है, और अब उसे बताया जा रहा है कि वे काण्ड नहीं, सीढ़ियाँ थीं। और जिसने अभी शुरू करना है, उसके लिये यह वाक्य पहली सीढ़ी का पता है: पहला नाम लेकर लौट जाइये, बालकाण्ड से।

सार: शिव कहते हैं कि यह रामकथा कलि के मल और मन के मैल को हरती है और संसृति नाम के रोग की संजीवनी है। इसमें सात सुन्दर सीढ़ियाँ हैं, जो भक्ति के मार्ग हैं, और उस मार्ग पर पैर भी वही रखता है जिस पर अत्यन्त कृपा हो। जो कपट छोड़कर यह कथा कहते, सुनते, या केवल अनुमोदन करते हैं, वे भवसागर को गाय के खुर के गड्ढे की तरह पार कर जाते हैं।

पार्वती की तृप्ति

और अब वह आवाज़ आती है जिससे यह सारी कथा उठी थी। सारी कथा सुनकर पार्वती के हृदय को वह अत्यन्त प्रिय लगी और वे सुन्दर वाणी बोलीं: स्वामी की कृपा से मेरा संदेह जाता रहा और राम के चरणों में नया स्नेह उपजा। पोद्दार की टीका इस जगह याद दिलाती है कि यह वृत्तान्त भी किसी और के मुँह से आ रहा है, याज्ञवल्क्य के, और इस तरह हम एक और सीढ़ी ऊपर चढ़ जाते हैं।

मैं कृतकृत्य भइउँ अब तव प्रसाद बिस्वेस।
उपजी राम भगति दृढ़ बीते सकल कलेस॥ १२९॥

दोहा १२९

हे विश्वेश, आपकी कृपा से अब मैं कृतकृत्य हो गयी, दृढ़ रामभक्ति उपजी और सारे क्लेश बीत गये। अब इस दोहे को कुछ पन्ने पीछे रखकर देखिये। गरुड़ ने भुशुण्डि से कहा था कि मैं कृतकृत्य हो गया। पार्वती शिव से कहती हैं कि मैं कृतकृत्य हो गयी। दो अलग-अलग फ़्रेमों में, दो अलग सुननेवाले, एक ही शब्द उठाते हैं। और दोनों आगे एक ही दो बातें गिनाते हैं: संदेह गया, और प्रीति नयी हुई। गरुड़ की नूतन रति, पार्वती का नव नेहा

और यहीं इस पूरे ग्रन्थ की एक बात खुलती है। इतनी लम्बी कथा के बाद दोनों श्रोता यह नहीं कहते कि अब हमें सब समझ आ गया। दोनों कहते हैं कि प्रेम नया हुआ। जो चीज़ पुरानी थी वह संदेह था, और वह चला गया। जो चीज़ नयी बनी वह स्नेह है। यानी कथा का काम भरना नहीं, ताज़ा करना है, और इसी से यह समझ आता है कि इसी पन्ने पर पहले क्यों कहा गया था कि सुमति की भूख नित नयी बढ़नी चाहिये।

और एक बात जो इस दोहे में नहीं है। पार्वती ने जो पूछा था, उसका उत्तर यहाँ दोहराया नहीं जाता। संदेह का हल गिनाया नहीं जाता, केवल उसका जाना बताया जाता है। जिस चीज़ के लिये इतनी लम्बी कथा चली, उसे अन्त में एक पंक्ति भी नहीं दी जाती, और यह कंजूसी नहीं है। जो चीज़ सचमुच चली जाती है, उसकी सूची नहीं बनती।

सार: पार्वती कहती हैं कि स्वामी की कृपा से संदेह जाता रहा और राम के चरणों में नया स्नेह उपजा, और दोहे में कि अब वे कृतकृत्य हो गयीं, दृढ़ रामभक्ति उपजी और सारे क्लेश बीत गये। गरुड़ ने भी यही शब्द कहा था और उन्होंने भी प्रीति को नयी बताया था। किसी श्रोता ने यह नहीं कहा कि उसे सब समझ आ गया।

और तब तुलसी अपनी ओर से बोलते हैं

पार्वती के बोलते ही सारे पर्दे गिर चुके हैं। भुशुण्डि जा चुके, गरुड़ जा चुके, शिव कह चुके, पार्वती सुन चुकीं। अब जो बचा है वह मंच के बाहर बैठा हुआ वह आदमी है जिसने यह सब लिखा, और वह पहले अपनी सामग्री का नाम लेता है: यह शुभ शम्भु-उमा संवाद सुख देनेवाला और विषाद मिटानेवाला है, भव को तोड़नेवाला, संदेहों को मथ डालनेवाला, भक्तों को आनन्द देनेवाला और सज्जनों को प्रिय है। ग्रन्थ अपने को यहाँ शास्त्र नहीं, संवाद कहता है। दो लोगों की बातचीत, जिसे कोई सुन रहा था।

और अगली चौपाई में वह अपने बारे में एक वाक्य कहता है, जिसमें एक शब्द ऐसा है जिसे हम इसी पन्ने पर पहले सुन चुके हैं। जगत् में जितने रामोपासक हैं उन्हें इसके समान कुछ प्रिय नहीं है, और रघुपति की कृपा से मैंने यह पावन चरित जथामति गाया। अपनी बुद्धि के अनुसार। कुछ दोहे पहले भुशुण्डि ने ठीक यही शब्द इस्तेमाल किया था, जब उन्होंने कहा था कि मैंने जथामति कहा और रघुनायक का चरित्र समुद्र है। भीतर का कहनेवाला और बाहर का कहनेवाला, दोनों अपनी सीमा एक ही शब्द से नापते हैं। यह संयोग हो सकता था, पर पूरे ग्रन्थ के अन्तिम पन्ने पर यह संयोग जैसा नहीं लगता।

एहिं कलिकाल न साधन दूजा। जोग जग्य जप तप ब्रत पूजा॥
रामहि सुमिरिअ गाइअ रामहि। संतत सुनिअ राम गुन ग्रामहि॥

चौपाई ११

अगली पंक्तियों में वह अपने ही मन से बात करने लगता है। जिनका बड़ा बाना पतितों को पावन करना है, ऐसा कवि, वेद, संत और पुराण गाते हैं, अरे मन, कुटिलता छोड़कर उन्हीं को भज, राम को भजने से किसने गति नहीं पायी। सम्बोधन बदल चुका है। अब तक सारी कथा किसी और को सुनायी जा रही थी, गरुड़ को, पार्वती को। यहाँ कहनेवाला अपने भीतर मुड़ जाता है, और छन्द में वह अपने मन को उसी नाम से पुकारता है जिससे शिव ने अयोग्य श्रोता को पुकारा था। सुन, शठ मन। यह शब्द इस पन्ने पर तीसरी बार आ रहा है: पहले भुशुण्डि ने अपने लिये, फिर शिव ने उसके लिये जिसे कथा न सुनायी जाय, और अब तुलसी ने अपने ही मन के लिये।

और उसी छन्द में वह क़तार आती है जो इस ग्रन्थ का सबसे चौड़ा दरवाज़ा है। गणिका, अजामिल, व्याध, गीध, गज, ऐसे बहुत से तार दिये गये। आभीर, यवन, किरात, खस, श्वपच, जो अत्यन्त पापरूप ही हैं, वे भी एक बारक नाम कहकर पावन हो जाते हैं। एक बार। अब इसे उस पंक्ति के बग़ल में रखिये जो इसी पन्ने पर कुछ पहले कही गयी थी, कि साधक, सिद्ध, जीवन्मुक्त, कवि, योगी, तपस्वी और पण्डित, चौदह प्रकार के सिद्ध पुरुष भी उनका सेवन किये बिना नहीं तरते। एक ओर चौदह प्रकार की सिद्धि, जो अकेली काम नहीं आती। दूसरी ओर एक बार लिया हुआ नाम, जो काम आ जाता है। इन दो पंक्तियों के बीच में इस पूरे ग्रन्थ का सिद्धान्त खड़ा है।

सुंदर सुजान कृपा निधान अनाथ पर कर प्रीति जो।
सो एक राम अकाम हित निर्बानप्रद सम आन को॥
जाकी कृपा लवलेस ते मतिमंद तुलसीदासहूँ।
पायो परम बिश्रामु राम समान प्रभु नाहीं कहूँ॥॥ ३॥

छंद ३

सुन्दर, सुजान, कृपानिधान, और जो अनाथों पर प्रीति करते हैं, ऐसे एक राम ही हैं, निष्काम हित करनेवाला और निर्वाण देनेवाला उनके समान और कौन है। जिनकी कृपा के लवलेश से मन्दबुद्धि तुलसीदास ने भी परम विश्राम पा लिया, उनके समान प्रभु कहीं नहीं है। यहाँ पहली बार कवि अपना नाम लेता है, और जिस वाक्य में लेता है उसमें अपने लिये दो ही चीज़ें रखता है: मतिमंद और लवलेस। मन्दबुद्धि, और कृपा की लेशमात्र। और जो पाया उसका नाम भी चुनकर रखा गया है। मोक्ष नहीं, सिद्धि नहीं, दर्शन नहीं। बिश्रामु। विश्राम। इतनी बड़ी यात्रा का फल एक ऐसे शब्द में रखा गया है जो थके हुए आदमी का शब्द है।

मो सम दीन न दीन हित तुम्ह समान रघुबीर।
अस बिचारि रघुबंस मनि हरहु बिषम भव भीर॥ १३०(क)॥
कामिहि नारि पिआरि जिमि लोभिहि प्रिय जिमि दाम।
तिमि रघुनाथ निरंतर प्रिय लागहु मोहि राम॥ १३० (ख)॥

दोहा १३० (क, ख)

हे रघुवीर, मेरे समान कोई दीन नहीं और आपके समान कोई दीनों का हित करनेवाला नहीं, ऐसा विचारकर हे रघुवंशमणि, मेरे भव की विषम पीड़ा हर लीजिये। पूरे ग्रन्थ की आख़िरी प्रार्थना में कोई वरदान नहीं माँगा गया, केवल एक हिसाब रखा गया है, कि दोनों ओर से यही जोड़ा ठीक बैठता है।

और फिर दोहे का दूसरा भाग, जो इस पूरे पन्ने की सबसे साहसी पंक्ति है। जैसे कामी को स्त्री प्यारी लगती है और लोभी को धन, वैसे ही हे रघुनाथ, आप मुझे निरन्तर प्रिय लगिये। अब इसे उस चौपाई के साथ रखिये जो इसी पन्ने पर कुछ ही पहले पढ़ी गयी थी, जिसमें कहा गया था कि यह कथा लोभी, क्रोधी और कामी से न कही जाय। जिन दो लोगों को इस कथा से बाहर रखा गया था, ग्रन्थ की अन्तिम पंक्ति में कवि उन्हीं दोनों को अपना नमूना बना लेता है। वह उनकी वस्तु नहीं माँगता, उनकी लगन माँगता है। कामी का विषय ग़लत है और उसका ध्यान अटूट है, लोभी का लक्ष्य ग़लत है और उसकी याद निरन्तर है। तुलसी उनसे वही एक चीज़ उधार लेते हैं जो उनके पास सचमुच है, और उसे दूसरी ओर मोड़ देते हैं। पूरा ग्रन्थ इसी मोड़ के विषय में था।

सार: तुलसी अपनी ओर से बोलते हैं। वे इस ग्रन्थ को शम्भु और उमा का संवाद कहते हैं, कहते हैं कि उन्होंने इसे जथामति गाया, और कलिकाल में स्मरण, गान और श्रवण के सिवा कोई साधन नहीं बताते। छन्द में वे गणिका, अजामिल, व्याध, गीध, गज, आभीर, यवन, किरात, खस और श्वपच को गिनाकर कहते हैं कि एक बार नाम लेने से भी ये पावन हो जाते हैं, और अपना नाम लेकर अपने को मन्दबुद्धि तथा अपने पाये हुए को परम विश्राम कहते हैं। अन्तिम दोहे में वे कामी और लोभी की लगन माँगते हैं, वस्तु नहीं।

ग्रन्थ का अपना आख़िरी वाक्य

और अब, अवधी के इस पूरे प्रवाह के बाद, दो संस्कृत श्लोक आते हैं। पूरा ग्रन्थ लोगों की बोली में लिखा गया और उसकी आख़िरी दो साँसें उस भाषा में ली गयीं जिससे बचने के लिये ही यह ग्रन्थ लिखा गया था। पहला श्लोक इस पुस्तक का अपने ही विषय में आख़िरी बयान है, और उसमें कवि अपना नाम तीसरे पुरुष में लिखता है, जैसे किसी और के काम की रसीद काट रहा हो।

यत्पूर्वं प्रभुणा कृतं सुकविना श्रीशम्भुना दुर्गमं
श्रीमद्रामपदाब्जभक्तिमनिशं प्राप्त्यै तु रामायणम्।
मत्वा तद्रघुनाथनामनिरतं स्वान्तस्तमःशान्तये
भाषाबद्धमिदं चकार तुलसीदासस्तथा मानसम्॥ १॥

श्लोक १

श्रेष्ठ कवि शम्भु ने पहले जो दुर्गम रामायण रची थी, राम के चरणकमलों में निरन्तर भक्ति पाने के लिये, उसी को रघुनाथ के नाम में निरत मानकर, अपने ही अन्तःकरण के अन्धकार की शान्ति के लिये, तुलसीदास ने इस मानस के रूप में भाषा में बाँधा। पोद्दार की टीका उस पहली रचना को शिव का रचा हुआ मानस-रामायण कहती है। और दो शब्द इस श्लोक की धुरी हैं। पहला दुर्गमं है, दुर्गम, जिसमें से होकर निकलना कठिन। दूसरा भाषाबद्धम् है, भाषा में बाँधा हुआ। जो दुर्गम था, वह भाषा में बाँधा गया, और बाँधनेवाले ने इसी को अपना काम बताया। उसने यह नहीं कहा कि मैंने कुछ नया कहा। उसने कहा कि जो पहले से था उसे मैंने उस ज़बान में बाँध दिया जिसमें लोग बात करते हैं।

और उससे भी ज़्यादा ध्यान देने की चीज़ वह कारण है जो इस काम के लिये गिनाया गया है: स्वान्तस्तमःशान्तये, अपने ही भीतर के अन्धकार को शान्त करने के लिये। जगत् के कल्याण के लिये नहीं, किसी आदेश से नहीं, किसी की प्रेरणा से नहीं। इतनी लम्बी यात्रा के अन्त में इस पुस्तक के लिखे जाने का जो एकमात्र कारण दर्ज किया गया है, वह निजी है, और वह उसी आदमी के अनुरूप है जिसने अभी अपने को मन्दबुद्धि कहा और अपने पाये हुए को विश्राम कहा।

पुण्यं पापहरं सदा शिवकरं विज्ञानभक्तिप्रदं
मायामोहमलापहं सुविमलं प्रेमाम्बुपूरं शुभम्।
श्रीमद्रामचरित्रमानसमिदं भक्त्यावगाहन्ति ये
ते संसारपतङ्गघोरकिरणैर्दह्यन्ति नो मानवाः॥ २॥

श्लोक २

यह रामचरितमानस पुण्यरूप है, पापों का हरण करनेवाला, सदा कल्याणकारी, विज्ञान और भक्ति देनेवाला, माया, मोह और मल का नाश करनेवाला, परम निर्मल, प्रेमरूपी जल से भरा हुआ और मंगलमय है। जो मनुष्य भक्ति के साथ इसमें गोता लगाते हैं, वे संसाररूपी सूर्य की भयंकर किरणों से नहीं जलते। और यहीं, आख़िरी पंक्ति में, इस ग्रन्थ का नाम अपना अर्थ चुका देता है। मानस एक सरोवर है, और उसका जल प्रेम है, और पाठक से कहा जा रहा है कि पढ़िये नहीं, उतरिये।

और अब इसी पन्ने की शुरुआत याद कीजिये। वहाँ भी एक स्नान था: निर्मल ज्ञानरूपी जल में नहाने पर हृदय में रामभक्ति छायी रह जाती है। पन्ना एक स्नान से खुला और एक डुबकी पर बन्द होता है, और दोनों के बीच की सारी दूरी यह है कि पहला जल ज्ञान का था और आख़िरी जल प्रेम का है। जिस आदमी ने इन नौ दोहों में तीन बार दवा की बात की, वह आख़िर में दवा नहीं, पानी देकर जाता है।

श्लोक के बाद छपे हुए पाठ में केवल दो सूचनाएँ बची रहती हैं, और वे कथा नहीं हैं। वे पाठ करनेवालों के लिये रखी गयी हैं: एक मासपारायण के क्रम की, जिसमें यह तीसवाँ पड़ाव है, और एक नवाह्नपारायण के क्रम की, जिसमें यह नवाँ। दोनों में वही शब्द है जो अभी छन्द में तुलसी ने अपने लिये इस्तेमाल किया था, विश्राम। कवि ने कहा कि उसने परम विश्राम पा लिया, और उसके ठीक बाद पोथी पाठक से कहती है कि यहाँ विश्राम कीजिये। एक ही शब्द, एक बार जीवन के लिये और एक बार पढ़ने के लिये। और उसके नीचे छपा हुआ समापन-वाक्य इस सोपान को सप्तम कहकर पूरा घोषित कर देता है, और मानस को उस ग्रन्थ के नाम से पुकारता है जो कलियुग के सारे मल का ध्वंस करनेवाला है।

सार: दो संस्कृत श्लोक ग्रन्थ को सील कर देते हैं। पहले में तुलसीदास अपना नाम लेकर कहते हैं कि शम्भु की रची हुई दुर्गम रामायण को उन्होंने भाषा में बाँधा, और कारण अपने ही अन्तःकरण के अन्धकार की शान्ति बताया। दूसरे में मानस को प्रेमरूपी जल से भरा सरोवर कहा गया है, जिसमें भक्ति के साथ डुबकी लगानेवाले संसाररूपी सूर्य की किरणों से नहीं जलते। उसके बाद केवल पाठ के विश्राम की दो सूचनाएँ और समापन-वाक्य बचते हैं।

और अन्त में, अपनी ओर

इस पन्ने को पढ़कर उठते हुए सबसे पहले जो बात मन में रह जाती है वह यह है कि यह ग्रन्थ अपने नायक के बिना ख़त्म होता है। राम इन नौ दोहों में एक बार भी नहीं बोलते। न कोई सभा है, न सिंहासन, न अयोध्या। जो बचे हैं वे सुननेवाले हैं: एक पक्षी जो अपने लोक लौट रहा है, एक स्त्री जो कहती है कि मेरा संदेह गया, और एक आदमी जो अपने ही मन को डाँट रहा है। अन्त का यह ढंग इस पूरी रचना के अनुरूप है, क्योंकि यह कथा कभी भी कथा भर नहीं थी। यह हमेशा किसी के किसी को सुनाने की कथा थी, और अन्त में जो बचता है वह सुनाना और सुनना ही है।

दूसरी बात उस शब्द की है जो इस पन्ने पर तीन बार आया। शठ। भुशुण्डि ने अपने लिये कहा, शिव ने उसके लिये कहा जिसे यह कथा नहीं सुनानी चाहिये, और तुलसी ने अपने ही मन के लिये कहा। तीनों जगह वही शब्द है और तीनों जगह उसका काम अलग है। और तीनों को साथ रखकर पढ़िये तो उस कड़ी छँटनी की धार भोथरी नहीं होती, उसका निशाना साफ़ हो जाता है। जो अपने को शठ मान ले वह भीतर आ गया। जो न माने वह बाहर रह गया। बीच में कोई परीक्षा नहीं है, कोई योग्यता-सूची नहीं है, और यही कारण है कि इसी पन्ने पर गणिका, व्याध, किरात और श्वपच के नाम बिना किसी सफ़ाई के गिना दिये जाते हैं।

और तीसरी बात उस आख़िरी दोहे की है, जिसे इस ग्रन्थ को बन्द करते समय जल्दी में नहीं पढ़ना चाहिये। इतनी लम्बी पुस्तक में धर्म, ज्ञान, वैराग्य, भक्ति, साधन और शास्त्र, सब कुछ कह चुकने के बाद, कवि जो अन्तिम उपमा उठाता है वह मन्दिर से नहीं आती। वह बाज़ार से आती है और घर से आती है: कामी की स्त्री और लोभी का धन। जिन दो आदमियों को इस कथा के अयोग्य कहा गया, उन्हीं दोनों की एकाग्रता माँगकर यह ग्रन्थ बन्द होता है। इससे साफ़ बात इस पूरी पुस्तक में और कोई नहीं है: भक्ति कोई नयी शक्ति नहीं माँगती, वह उसी पुरानी लगन को दूसरी ओर मोड़ने का नाम है, जो हमारे पास पहले से है और जिसे हम रोज़ किसी और चीज़ पर ख़र्च करते हैं।

सात सोपान यहाँ पूरे होते हैं। जो इस पन्ने तक आया है वह बालकाण्ड से चलकर आया है, और अयोध्याकाण्ड, अरण्यकाण्ड, किष्किन्धाकाण्ड, सुन्दरकाण्ड और लङ्काकाण्ड से होता हुआ इस उत्तरकाण्ड तक पहुँचा है, जिसकी लम्बी बैठकों में बात ही बात थी। अब उससे कहा जा रहा है कि वे काण्ड नहीं थे, सीढ़ियाँ थीं, और सीढ़ियाँ चढ़ने के बाद पीछे मुड़कर देखने में कोई हर्ज नहीं। पहली सीढ़ी अपनी जगह पड़ी है, और वह किसी भी दिन फिर से पहली सीढ़ी हो जाती है।

और आख़िरी बात इस ग्रन्थ के अपने आख़िरी शब्द की। जिस आदमी ने यह सब लिखा, उसने अपने लिये मोक्ष नहीं माँगा, सिद्धि नहीं माँगी, और जो मिला उसे भी इन नामों से नहीं पुकारा। उसने कहा कि उसे विश्राम मिला। और उसके ठीक नीचे छपी हुई पंक्तियाँ पढ़नेवाले से भी वही कहती हैं, कि यहाँ ठहर जाइये। यह पोथी अपने पाठक से आख़िर में जो माँगती है वह श्रद्धा या विद्वत्ता नहीं है। वह इतना ही कहती है कि थकान असली चीज़ है, और उसके उतरने की जगह भी असली है, और जिसने यह सब लिखा वह भी अन्त में वहीं बैठकर साँस ले रहा था।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, उत्तरकाण्ड, दोहा १२२ से १३०, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।

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