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कथा का फल, और मानस का विश्राम

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रामचरितमानसउत्तरकाण्डप्रसंग 22

सात सोपानों के अन्त में एक पक्षी अपनी बात पूरी करता है। दूसरा पक्षी अपने लोक को लौट जाता है। शिव अपनी पत्नी को कथा का फल बताते हैं। तब कवि अपना नाम लेकर अपने ही ग्रन्थ के विषय में आख़िरी वाक्य कहता है।

यह पूरे रामचरितमानस का आख़िरी प्रसंग है। इसके अन्त में ग्रन्थ संस्कृत में अपनी बात समेटता है, और फिर पाठ के विश्राम की दो सूचनाएँ आती हैं। इसके आगे इस ग्रन्थ में कुछ नहीं है।

किसी रामकथा के अन्त में जो मिलने की आदत होती है, उसमें से एक भी चीज़ यहाँ नहीं। राम इस पूरे समापन में एक बार भी नहीं बोलते। सीता, लक्ष्मण, भरत, हनुमान, अयोध्या, लङ्का, दशरथ, इनमें से किसी का नाम इस समापन में नहीं। जो बचा है वह कथा के सुननेवाले हैं, उन्हें सुनानेवाले, और उन सबके पीछे वह आदमी जिसने यह सब भाषा में बाँधा।

इसलिये यह समापन एक-एक करके अपने पर्दे गिराता है: भुशुण्डि गरुड़ से अपनी बात पूरी करते हैं। गरुड़ उनके चरणों में सिर नवाकर वैकुण्ठ लौट जाते हैं, और बची रहती है शिव की आवाज़, जो यह सारा वृत्तान्त पार्वती को सुना रहे थे। शिव अपनी बात पूरी करते हैं और पार्वती बोलती हैं। और जब वे दोनों चुप होते हैं, तब एक और आवाज़ बचती है, जो इस समापन में अब तक चुप थी। वह अपना नाम लेकर बोलती है।

और इस सारे उतार के नीचे पिछले प्रसंग से चली आयी एक भाषा लगातार चलती रहती है, वैद्य की: रोग, कुपथ्य, परहेज़, जड़ी, अनुपान, औषध। यही रूपक इस पूरे समापन को बाँधे रखता है।

दो जोड़े और एक कवि

  • काकभुशुण्डि वह पक्षी जो यह सारी कथा सुना रहा था, जो अपने को पक्षियों में नीचा और सब प्रकार से अपवित्र कहता है। वह यहाँ अपनी बात पूरी करके अपने श्रोता को आशीर्वाद देता है।
  • गरुड़ पक्षियों के राजा, जो एक संदेह लेकर आये थे और यहाँ से कृतकृत्य होकर, हृदय में राम को रखकर, वैकुण्ठ लौट जाते हैं।
  • शिव जो यह पूरा भुशुण्डि-गरुड़ संवाद पार्वती को सुना रहे थे, और जो अब कथा का फल और उसका अधिकारी दोनों गिनाते हैं।
  • पार्वती जिनके एक संदेह से यह सारी कथा उठी थी, और जो यहाँ कहती हैं कि वह संदेह अब रहा नहीं।
  • तुलसीदास वह कवि जो इस समापन के अन्त में अपनी ओर से बोलता है, और अपना नाम लेकर अपने मन की माँग रख देता है।

दवा, परहेज़ और अनुपान

पिछला प्रसंग जहाँ छूटा था, वहाँ भुशुण्डि मन के रोगों की लम्बी सूची गिना रहे थे। उसी ढंग से जैसे कोई वैद्य अपनी पोथी में से एक-एक नाम पढ़कर सुनाता है। यहाँ बात उसी सूची के अन्तिम वाक्य से उठती है, और उस वाक्य में एक बात पूरी सूची से बड़ी है।

भुशुण्डि कहते हैं: “इस प्रकार जगत् के सब जीव रोगी हैं, और शोक, हर्ष, भय, प्रीति तथा वियोग से और भी दुखी हो रहे हैं। मैंने कुछ मानस-रोग कह दिये। ये हैं तो सबको, पर इन्हें पहचान पाये हैं कोई विरले ही।” कठिनाई यह नहीं कि रोग दुर्लभ है, यह है कि पहचान दुर्लभ है। और आगे की कड़ी बात, कि यह कथा किससे नहीं कहनी चाहिये, इसी बात से निकलती है।

फिर दवा का नुस्ख़ा, चार टुकड़ों में: पहला, सद्गुरु रूपी वैद्य के वचन में विश्वास। दूसरा, परहेज़, जो एक ही वाक्य में बँधा है, विषयों की आशा न करना। तीसरा, राम की भक्ति, जो संजीवनी जड़ी है। और चौथा, अनुपान। पोद्दार की टीका बताती है कि अनुपान वह चीज़ है जो दवा के साथ ली जाती है, जैसे शहद। यहाँ अनुपान है श्रद्धा से भरी हुई बुद्धि। जड़ी अकेली काम नहीं करेगी। उसे उतारने के लिये कुछ और चाहिये, और वह रोगी के अपने पास से आना है।

और तब वह बात आती है जो रोगी को बताती है कि वह अच्छा हो रहा है या नहीं: यहाँ कोई सिद्धान्त नहीं, केवल लक्षण हैं।

भुशुण्डि कहते हैं: “मन को नीरोग हुआ तब जानना चाहिये जब हृदय में वैराग्य का बल बढ़ जाये, उत्तम बुद्धि रूपी भूख नित नयी बढ़ती रहे। और विषयों की आशा रूपी दुर्बलता मिट जाये।” तीनों लक्षण भूख के हैं, शान्ति के नहीं: बुख़ार उतरने की पहली ख़बर यही होती है कि भूख लौट आयी। भुशुण्डि स्वस्थ मन को भूखा मन कहते हैं, और भूख का विषय बदल देते हैं।

जो नहीं हो सकता, और जो हो सकता है

रोग जाने के बाद क्या होता है, यह भुशुण्डि एक चित्र में कहते हैं। जब मनुष्य निर्मल ज्ञान रूपी जल में स्नान कर लेता है, तब उसके हृदय में रामभक्ति छायी रह जाती है। क्रिया है रह जाना: भक्ति कमायी नहीं जाती, बची रह जाती है, जैसे नहाने के बाद ठण्डक बची रहती है। समापन एक स्नान से शुरू होता है, और ग्रन्थ का आख़िरी वाक्य भी एक डुबकी पर जाकर रुकता है।

फिर भुशुण्डि गवाह खड़े करते हैं: शिव, ब्रह्मा, शुकदेव, सनकादि, नारद, और ब्रह्मविचार में निपुण सब मुनि। इतने बड़े नामों के बाद निष्कर्ष सादा है: “हे गरुड़, उन सबका मत यही है कि राम के चरणों में प्रेम करना चाहिये।” और श्रुति, पुराण तथा सब ग्रन्थ यही कहते हैं कि राम की भक्ति बिना सुख नहीं।

और इसे सिद्ध करने के लिये भुशुण्डि यह नहीं कहते कि भक्ति के बिना सुख कठिन है। वे असम्भव चीज़ों की एक क़तार खड़ी करते हैं, और हर बार कहते हैं, यह सब भले हो जाये, वह नहीं होगा। पहली क़तार में कछुए की पीठ पर बाल उग आते हैं। बाँझ का बेटा किसी को मार डालता है, और आकाश में अनेक प्रकार के फूल खिल उठते हैं। और फिर वही टेक: भगवान् से विमुख होकर जीव सुख नहीं पाता।

मृगतृष्णा का जल पीने से भले प्यास बुझ जाये, खरगोश के सिर पर भले सींग निकल आयें, अन्धकार भले सूर्य का नाश कर दे। पर राम से विमुख होकर जीव सुख नहीं पा सकता। ये तीनों अनहोनी भर नहीं, अपने भीतर से अपना खण्डन हैं: मृगतृष्णा का जल है ही नहीं, और अन्धकार सूर्य के न होने का ही दूसरा नाम है। राम से विमुख होकर सुख खोजना अपने ही न होने से कुछ माँगने जैसा है।

बर्फ़ से भले आग प्रकट हो जाये। जल मथने से भले घी निकल आये और बालू पेरने से भले तेल। पर भगवान् के भजन बिना भवसागर से तरा नहीं जा सकता, यह सिद्धान्त अटल है, टाला नहीं जा सकता। मथना और पेरना घर के रोज़ के काम हैं। दूध मथा जाये तो घी है, जल मथा जाये तो हाथ दुखेंगे। कल्पना की क़तार यहाँ रसोई में उतर आती है।

और फिर वह बात, जिसकी इस जगह अपेक्षा नहीं होती। इतनी देर तक जो नहीं हो सकता उसकी गिनती हुई। अब एक वाक्य में वह आता है जो हो सकता है। राम मच्छर को ब्रह्मा बना सकते हैं, और ब्रह्मा को मच्छर से भी तुच्छ कर सकते हैं। यह प्रसंग असम्भव के विषय में था ही नहीं। इस विषय में था कि असम्भव किसके लिये है। और निष्कर्ष आश्चर्य नहीं, आदेश है: ऐसा विचारकर चतुर लोग संदेह छोड़कर राम को भजते हैं। पहले संदेह छोड़ना, फिर भजन।

भुशुण्डि की आख़िरी बात

भुशुण्डि कहते हैं: “हे नाथ, मैंने राम का अनुपम चरित कहीं विस्तार से और कहीं संक्षेप से, अपनी बुद्धि के अनुसार कहा।” इतनी लम्बी कथा के अन्त में कहनेवाला यह नहीं कहता कि उसने पूरा कह दिया। कहता है कि नाप उसकी बुद्धि थी, कथा नहीं। और फिर निचोड़: “हे गरुड़, श्रुतियों का सिद्धान्त यही है कि सब काम भुलाकर राम का भजन कीजिये।” सब काम भुलाकर: इससे आगे कोई बात नहीं बचती।

फिर वे अपने ऊपर आते हैं, और अपने लिये एक शब्द बोलते हैं: “राम को छोड़कर और किसका सेवन किया जाये, जिनका मुझ-जैसे शठ पर भी ममत्व है?” शठ, यानी धूर्त, मूढ़: जिसने अभी श्रुतियों का सिद्धान्त सुनाकर पूरी कथा बाँधी, वह अपने को इस नाम से पुकार रहा है। यह शब्द आगे दो बार और आता है।

और तब पूरे संवाद की बनावट खुल जाती है: “हे गरुड़, अपने हृदय में विचार कीजिये, क्या मैं राम के भजन का अधिकारी हूँ? पक्षियों में सबसे नीच और सब प्रकार से अपवित्र। पर राम ने मुझे जगत् को पवित्र करनेवाला प्रसिद्ध कर दिया।” सुननेवाला पक्षियों का राजा है, भगवान् का अपना वाहन। नीचा गिना जानेवाला पक्षी पक्षियों के राजा को सिखा रहा है, और यह उलटाव यहाँ आख़िरी बार, उसके अपने मुँह से, कह दिया जाता है। वे यह भी कहते हैं कि संसार में सत्संग दुर्लभ है, पल भर का भी, एक बार का भी।

उनकी अगली बात भी इसी पर बैठती है। “यद्यपि मैं सब प्रकार से हीन हूँ, तो भी आज मैं धन्य हूँ, अत्यन्त धन्य, क्योंकि राम ने मुझे अपना जन जानकर संत-समागम दिया।” इस भेंट में जिसे लाभ हुआ, वह अपने को सुनानेवाला नहीं, पानेवाला मानता है। और फिर वे उसी विनय पर मुहर लगाते हैं: “हे नाथ, मैंने अपनी बुद्धि के अनुसार कहा, कुछ छिपा नहीं रखा। पर राम के चरित्र समुद्र हैं, उनकी थाह क्या कोई पा सकता है?” यही शब्द, अपनी बुद्धि के अनुसार, आगे एक बार और आते हैं, और उस समय बोलनेवाला कोई और है।

पन्द्रह अधिकारी, और तीन नमस्कार

यहाँ कथा एक क़दम बाहर आकर याद दिलाती है कि यह सब कौन सुना रहा है। शिव पार्वती से कहते हैं कि राम के अनेक गुणसमूहों का स्मरण कर-करके सुजान भुशुण्डि बार-बार हर्षित हो रहे हैं। बाहर से जो दिखता है वह उपदेश देता हुआ आचार्य नहीं, बार-बार ख़ुश होता हुआ एक पक्षी है।

फिर भुशुण्डि एक सूची गिनाते हैं। वह किसी निन्दा की नहीं: साधक, सिद्ध, जीवन्मुक्त, उदासीन, कवि, विद्वान्, कर्म के रहस्य के ज्ञाता, संन्यासी, योगी, शूरवीर, बड़े तपस्वी, ज्ञानी, धर्मपरायण, पण्डित और विज्ञानी, पन्द्रह नाम। ये सब उस सीढ़ी के ऊपरी डंडे हैं जिस पर चढ़ने में लोग जन्म खपा देते हैं। इतने आदर से गिनाने का कारण अगली बात में खुलता है।

“इनमें से कोई भी मेरे स्वामी राम का सेवन किये बिना नहीं तर सकता।” और यहीं तर्क टूटकर एक प्रणाम बन जाता है: राम को नमस्कार, नमस्कार, नमस्कार, तीन नमस्कार, एक ही साँस में। फिर वे अपने को भी उसी में डाल देते हैं: “जिनकी शरण जाने पर मुझ-जैसी पापराशि भी शुद्ध हो जाती है, उन अविनाशी को मैं नमस्कार करता हूँ।” पन्द्रह अधिकारी गिने गये थे, और आख़िर में जो बचा वह अपने को पापों का ढेर कहनेवाला एक कौआ है।

और उनकी आख़िरी बात उसी रूपक को लौटा लाती है जिससे उनकी यह आख़िरी बात खुली थी। “जिनका नाम भव-रोग की औषध है और तीनों भयंकर पीड़ाओं को हरनेवाला है, वे कृपालु मुझ पर और आप पर सदा अनुकूल रहें।” थोड़ी देर पहले भक्ति संजीवनी जड़ी थी। यहाँ नाम औषध हो गया है। और असली बात दो शब्दों में है, “मुझ पर और आप पर”। विदा लेते हुए वे आशीर्वाद में अपने को भी शामिल कर लेते हैं, ऊपर से नहीं, साथ बैठकर।

गरुड़ का ऋण, और संत का स्वभाव

गरुड़ कहते हैं: “राम के भक्तिरस में सनी हुई आपकी वाणी सुनकर मैं कृतकृत्य हो गया। राम के चरणों में मेरी नयी प्रीति हो गयी, और माया से उत्पन्न सारी विपत्ति चली गयी। मोह के समुद्र में आप मेरे लिये जहाज़ हुए। इसका बदला मुझसे नहीं हो सकता।” दो शब्द: कृतकृत्य, जो एक बार और सुनायी देगा, किसी और के मुँह से। और नयी: गरुड़ यह नहीं कहते कि अब उन्हें सब मालूम हो गया, कहते हैं कि प्रीति नयी हो गयी।

“आप पूर्णकाम हैं और राम के प्रेमी हैं। हे तात, आपके समान बड़भागी कोई नहीं।” और फिर गरुड़ की वह बात: “संत, वृक्ष, नदी, पर्वत और पृथ्वी, इन सबकी करनी दूसरों के हित के लिये ही होती है।” छोटे से बड़े की ओर, और अन्त में वह चीज़ जिस पर गिनती करनेवाला स्वयं खड़ा है। और इन चारों में से कोई मना नहीं कर सकता। पेड़ छाया नहीं रोक सकता, नदी जल नहीं लौटा सकती, पर्वत हट नहीं सकता, पृथ्वी उठ नहीं सकती। संत को इस क़तार के सिरे पर रखकर गरुड़ उसके परोपकार को स्वभाव कह देते हैं।

और इसके बाद गरुड़ अपने से पहले के सब कवियों को दो वाक्यों में सुधार देते हैं। “कवियों ने कहा है कि संत का हृदय मक्खन के समान होता है, पर उन्होंने कहना नहीं जाना। क्योंकि मक्खन अपने को ताप मिलने से पिघलता है, और संत दूसरे के दुःख से पिघलते हैं।” उपमा ग़लत नहीं थी, उसकी दिशा ग़लत थी। मक्खन तभी नरम होता है जब आँच उसके नीचे हो, और संत तब, जब आँच किसी और के नीचे हो। यह सुधार किसी से झगड़े बिना हो जाता है।

गरुड़ की विदा

भुशुण्डि के चरणों में प्रेमसहित सिर नवाकर, और हृदय में राम को रखकर, धीरबुद्धि गरुड़ तब वैकुण्ठ को चले गये। विशेषण इस यात्रा की रसीद है, धीरबुद्धि: जो मोह लेकर आया था, वह धीरबुद्धि होकर जा रहा है।

फिर शिव की आवाज़ आती है। “पार्वती, संत-समागम के समान दूसरा कोई लाभ नहीं, और वह भगवान् की कृपा के बिना नहीं होता, ऐसा वेद और पुराण गाते हैं।” भुशुण्डि ने कहा था कि सत्संग पल भर का भी दुर्लभ है। अब शिव उसका कारण बताते हैं: वह कमाया नहीं जाता, दिया जाता है। जिस भेंट में दोनों ने अपने को लाभ में बताया, उसे भी कहीं से आना पड़ा था।

सब साधनों का एक फल

अब शिव अपनी ओर से कथा का फल गिनाते हैं, सुननेवाले से सीधे। “मैंने यह परम पावन इतिहास कहा, जिसे कानों से सुनते ही भव के पाश छूट जाते हैं, और शरणागतों पर कृपा करनेवाले राम के चरणों में प्रेम उपजता है।”

और तुरन्त एक सादी-सी शर्त: मन, वचन और कर्म से उपजे पाप उनके जाते हैं जो इस कथा को कान और मन लगाकर सुनते हैं। कान और मन लगाकर: कान अकेला काफ़ी नहीं। यह शर्त कुछ आगे उलटकर आती है, और तब वरदान नहीं, अयोग्यता बनकर।

फिर एक लम्बी सूची, जैसे कोई भरा हुआ थाल सामने रखता जा रहा हो: तीर्थयात्रा, बहुत प्रकार के साधन, योग, वैराग्य, ज्ञान में निपुणता। अनेक कर्म, धर्म, व्रत और दान। संयम, दम, जप, तप और यज्ञ। प्राणियों पर दया, ब्राह्मण और गुरु की सेवा, विद्या, विनय और विवेक की बड़ाई।

शिव कहते हैं: “पार्वती, जहाँ तक वेदों ने साधन बताये हैं, उन सबका फल भगवान् की भक्ति ही है।” इतने सारे साधन, और एक वाक्य में उन सबका निपटारा। पर शिव यहाँ रुकते नहीं। अगले ही वाक्य में वह काँटा रख देते हैं जो इस फलश्रुति को सस्ता होने से बचा लेता है। श्रुतियों में गायी हुई वह भक्ति राम की कृपा से किसी विरले ने ही पायी है। फल एक है, और वह दुर्लभ भी है।

और फिर शिव उस ऊँची टँगी चीज़ को उतारने का सस्ता-सा तरीक़ा बताते हैं। जो मनुष्य विश्वास मानकर यह कथा निरन्तर सुनते हैं, वे बिना परिश्रम उस मुनिदुर्लभ भक्ति को पा लेते हैं। दो शर्तें हैं, निरन्तर सुनना और विश्वास, और इनमें से एक भी जन्म, पद, पढ़ाई या साधन-सामग्री नहीं माँगती।

उसके बाद “धन्य” की एक लम्बी क़तार चलती है। वही सर्वज्ञ है, वही गुणी, वही ज्ञाता, वही पृथ्वी का भूषण, पण्डित और दानी, वही धर्मपरायण और कुल का रक्षक, जिसका मन राम के चरणों में रँगा है। विशेषण पहले, बात आख़िर में, इसलिये देर तक सुननेवाला सोचता चलता है कि किसकी बात हो रही है। वही नीति-निपुण है, वही परम सयाना, उसी ने वेद का सिद्धान्त ठीक जाना, वही कवि, वही विद्वान्, वही रणधीर, जो छल छोड़कर राम को भजता है। फिर धन्य है वह देश जहाँ गङ्गा हैं, वह घड़ी जब सत्संग हो, और वह कुल जिसमें राम-परायण विनम्र पुरुष जन्मे।

यह किससे न कहिये

शिव पहले मानते हैं कि उन्होंने यह कथा अपनी बुद्धि के अनुसार कही, और पहले इसे छिपाकर रखा था। पार्वती के मन में प्रेम की अधिकता देखकर तब सुनायी। फिर कहते हैं: “यह कथा उनसे न कहिये जो शठ हों, हठी स्वभाव के हों, और भगवान् की लीला मन लगाकर न सुनते हों। लोभी, क्रोधी और कामी से भी न कहिये, जो चराचर के स्वामी को नहीं भजते।” चार नाम और एक आदत, और वह आदत ठीक वही है जो अभी वरदान की शर्त थी, मन लगाकर सुनना। जिसने मन लगाकर सुना उसके तीनों प्रकार के पाप गये, और जो मन लगाकर नहीं सुनता उससे कहा ही न जाये। एक ही वाक्य, दो तरफ़ से पढ़ा गया।

फिर एक नाम और जुड़ता है, एक अटपटी शर्त के साथ। ब्राह्मणों के द्रोही को कभी न सुनाइये, चाहे वह इन्द्र के समान ऐश्वर्यवाला राजा ही क्यों न हो। इस सूची में ऊँचाई का ज़िक्र केवल यहाँ आता है, और ख़ारिज होने के लिये: बड़ा पद इस दरवाज़े पर काम नहीं आता। और तुरन्त बता दिया जाता है कि क्या काम आता है। रामकथा के अधिकारी वही हैं जिन्हें सत्संगति अत्यन्त प्यारी है, जिनकी गुरु के चरणों में प्रीति है, जो नीति में रत हैं और ब्राह्मणों के सेवक हैं। और जिसे राम प्राणों के समान प्यारे हैं, उसे यह कथा विशेष सुख देती है। और शिव कहते हैं कि जो राम के चरणों में प्रेम चाहे, या मोक्ष, वह इस कथारूपी अमृत को भाव सहित कानों के दोने से पिये।

अयोग्य बनानेवाली सब चीज़ें आदतें हैं, और योग्य बनानेवाली भी। न एक ओर जन्म है, न दूसरी ओर। और यहीं भुशुण्डि का शब्द लौटता है: सूची का पहला नाम शठ है, और थोड़ी ही देर पहले भुशुण्डि ने अपने को “मुझ-जैसा शठ” कहा था। बाहर वह नहीं रखा जा रहा जो मूढ़ है। बाहर वह रखा जा रहा है जिसे अपने मूढ़ होने की ख़बर नहीं।

सात सोपान

शिव कहते हैं: “पार्वती, मैंने यह रामकथा कही, जो कलि के मल और मन के मैल को हरती है, और संसृति नाम के रोग की संजीवनी है। इसमें सात सुन्दर सीढ़ियाँ हैं, जो राम की भक्ति तक पहुँचने के मार्ग हैं। और जिस पर भगवान् की अत्यन्त कृपा हो, वही इस मार्ग पर पैर रखता है।” यहीं यह ग्रन्थ अपनी बनावट का नाम लेता है: सात सोपान, बालकाण्ड, अयोध्याकाण्ड, अरण्यकाण्ड, किष्किन्धाकाण्ड, सुन्दरकाण्ड, लङ्काकाण्ड और यह उत्तरकाण्ड, जो काण्ड नहीं, सीढ़ियाँ थीं। जो कपट छोड़कर यह कथा कहते, सुनते, या केवल अनुमोदन करते हैं, वे भवसागर को गाय के खुर के गड्ढे की तरह पार कर जाते हैं।

पार्वती की तृप्ति

और अब वह आवाज़ आती है जिससे यह सारी कथा उठी थी। सारी कथा सुनकर पार्वती के हृदय को वह अत्यन्त प्रिय लगी। वे बोलीं: “स्वामी की कृपा से मेरा संदेह जाता रहा, और राम के चरणों में नया स्नेह उपजा।” पोद्दार की टीका यहाँ बताती है कि यह वृत्तान्त भी किसी और के मुँह से आ रहा है, याज्ञवल्क्य के। इस तरह बात एक और सीढ़ी ऊपर चढ़ जाती है।

कैलास पर उसी बरगद की छाया में शिव के सामने बैठी पार्वती हाथ जोड़कर कहती हैं कि स्वामी की कृपा से उनका संदेह मिट गया है और राम के चरणों में दृढ़ भक्ति उपजी है। शिव प्रसन्न होकर आशीर्वाद देते हैं।

पार्वती कहती हैं: “आपकी कृपा से अब मैं कृतकृत्य हो गयी। दृढ़ रामभक्ति उपजी और सारे क्लेश बीत गये।” गरुड़ ने भुशुण्डि से कहा था, “मैं कृतकृत्य हो गया”। पार्वती शिव से कहती हैं, “मैं कृतकृत्य हो गयी”। दो अलग फ़्रेम, दो अलग सुननेवाले, एक ही शब्द। और दोनों आगे वही दो बातें गिनाते हैं, संदेह गया और प्रीति नयी हुई: गरुड़ की नयी प्रीति, पार्वती का नया स्नेह।

दोनों श्रोता यह नहीं कहते कि अब उन्हें सब समझ आ गया। दोनों कहते हैं कि प्रेम नया हुआ। जो पुराना था वह संदेह था और चला गया। जो नया बना वह स्नेह है। कथा का काम भरना नहीं, ताज़ा करना है, जैसे शुरू में कहा गया था कि उत्तम बुद्धि की भूख नित नयी बढ़नी चाहिये।

और पार्वती ने जो पूछा था, उसका उत्तर यहाँ दोहराया नहीं जाता। केवल संदेह का जाना बताया जाता है। जो चीज़ सचमुच चली जाती है, उसकी सूची नहीं बनती।

और तब तुलसी अपनी ओर से बोलते हैं

पार्वती के बोलते ही सारे पर्दे गिर चुके हैं: भुशुण्डि कह चुके, गरुड़ जा चुके, शिव कह चुके, पार्वती सुन चुकीं। अब मंच के बाहर की आवाज़ बचती है। वह पहले इस सामग्री का नाम लेती है: शिव और पार्वती का यह शुभ संवाद सुख देनेवाला और विषाद मिटानेवाला है। वह भव को तोड़नेवाला, संदेहों को मथ डालनेवाला, भक्तों को आनन्द देनेवाला और सज्जनों को प्रिय है। ग्रन्थ अपने को यहाँ शास्त्र नहीं, संवाद कहता है: दो लोगों की बातचीत, जिसे कोई सुन रहा था।

फिर वही आवाज़ अपने बारे में कहती है: “जगत् में जितने रामोपासक हैं, उन्हें इसके समान कुछ प्रिय नहीं। राम की कृपा से मैंने यह पावन चरित अपनी बुद्धि के अनुसार गाया।” अपनी बुद्धि के अनुसार। थोड़ी ही देर पहले भुशुण्डि ने ठीक यही शब्द बरते थे, जब कहा था कि उन्होंने अपनी बुद्धि के अनुसार कहा और राम का चरित्र समुद्र है। भीतर की कथा का कहनेवाला और यह कहनेवाला, दोनों अपनी सीमा एक ही शब्द से नापते हैं। टीका तुलसीदास का अपना बोलना इसके बाद से मानती है।

फिर तुलसीदास कहते हैं कि इस कलिकाल में योग, यज्ञ, जप, तप, व्रत और पूजा, कोई दूसरा साधन नहीं। बस राम का स्मरण, राम का गान, और राम के गुणसमूहों का निरन्तर श्रवण। फिर वे अपने ही मन से बात करने लगते हैं। जिनका बड़ा बाना पतितों को पावन करना है, ऐसा कवि, वेद, संत और पुराण गाते हैं, मन कुटिलता छोड़कर उन्हीं को भजे। राम को भजने से किसने गति नहीं पायी? सम्बोधन बदल चुका है: अब तक सारी कथा किसी और को सुनायी जा रही थी, गरुड़ को, पार्वती को। यहाँ कहनेवाला अपने भीतर मुड़ जाता है। फिर वह अपने मन को उसी नाम से पुकारता है जिससे शिव ने अयोग्य श्रोता को पुकारा था: शठ मन। यह शब्द इस समापन में तीसरी बार आ रहा है: पहले भुशुण्डि ने अपने लिये, फिर शिव ने उसके लिये जिसे कथा न सुनायी जाये। और अब तुलसीदास ने अपने ही मन के लिये।

और उसी पुकार में वह क़तार आती है जो इस ग्रन्थ का एक चौड़ा दरवाज़ा है: गणिका, अजामिल, व्याध, गीध, गज, ऐसे बहुत-से दुष्ट तार दिये गये। आभीर, यवन, किरात, खस, श्वपच, जो अत्यन्त पापरूप ही हैं, वे भी एक बार नाम कहकर पावन हो जाते हैं। कुछ ही पहले पन्द्रह प्रकार के सिद्ध लोग गिनाये गये थे जो राम का सेवन किये बिना नहीं तरते। एक ओर पन्द्रह प्रकार की सिद्धि, जो अकेली काम नहीं आती, दूसरी ओर एक बार लिया हुआ नाम, जो काम आ जाता है।

अनाथों पर प्रीति करनेवाले, निष्काम हित करनेवाले और निर्वाण देनेवाले राम के समान और कौन है? जिनकी कृपा के लवलेश से मन्दबुद्धि तुलसीदास ने भी परम विश्राम पा लिया, उनके समान प्रभु कहीं नहीं। इस समापन में तुलसीदास अपना नाम यहीं पहली बार लेते हैं। उस वाक्य में अपने लिये दो ही चीज़ें रखते हैं: मन्दबुद्धि, और कृपा का लेशमात्र। और जो पाया उसका नाम मोक्ष नहीं, सिद्धि नहीं, दर्शन नहीं: विश्राम। इतनी बड़ी यात्रा का फल एक ऐसे शब्द में है जो थके हुए आदमी का शब्द है।

तुलसीदास प्रार्थना करते हैं: “हे राम, मेरे समान कोई दीन नहीं, और आपके समान कोई दीनों का हित करनेवाला नहीं। ऐसा विचारकर मेरे भव की विषम पीड़ा हर लीजिये।” पूरे ग्रन्थ की आख़िरी प्रार्थना में कोई वरदान नहीं माँगा गया, केवल एक हिसाब रखा गया है, कि दोनों ओर से यही जोड़ा ठीक बैठता है।

और फिर प्रार्थना का दूसरा हिस्सा: “जैसे कामी को स्त्री प्यारी लगती है और लोभी को धन, वैसे ही हे राम, आप मुझे निरन्तर प्रिय लगिये।” कुछ ही पहले कहा गया था कि यह कथा लोभी, क्रोधी और कामी से न कही जाये। और ग्रन्थ की अन्तिम प्रार्थना में तुलसीदास उन्हीं दोनों को अपना नमूना बना लेते हैं। वे उनकी वस्तु नहीं, उनकी लगन माँगते हैं: कामी का विषय ग़लत है और उसका ध्यान अटूट, लोभी का लक्ष्य ग़लत है और उसकी याद निरन्तर। जो चीज़ उनके पास सचमुच है, वही वे माँगते हैं, और उसे दूसरी ओर मोड़ देते हैं।

ग्रन्थ का अपना आख़िरी वाक्य

और अब, अवधी के इस पूरे प्रवाह के बाद, ग्रन्थ संस्कृत में अपनी बात समाप्त करता है। पूरा ग्रन्थ लोगों की बोली में है, और उसका अन्त संस्कृत में। पहले यह पुस्तक अपने ही विषय में आख़िरी बयान देती है। उसमें कवि अपना नाम तीसरे पुरुष में लेता है, जैसे किसी और के काम की रसीद काट रहा हो।

श्रेष्ठ कवि शिव ने पहले एक दुर्गम रामायण रची थी, राम के चरणों में निरन्तर भक्ति पाने के लिये। उसी को राम के नाम में निरत मानकर, अपने ही अन्तःकरण के अन्धकार की शान्ति के लिये, तुलसीदास ने इस मानस के रूप में भाषा में बाँधा। पोद्दार की टीका उस पहली रचना को शिव का रचा हुआ मानस-रामायण कहती है। धुरी दो बातें हैं: जो दुर्गम था, वह उस ज़बान में बाँधा गया जिसमें लोग बात करते हैं। बाँधनेवाला कुछ नया कहने का दावा नहीं करता।

और कारण भी दर्ज है: अपने ही भीतर के अन्धकार को शान्त करने के लिये। जगत् के कल्याण के लिये नहीं, किसी आदेश से नहीं। यह कारण निजी है, और उसी आदमी के अनुरूप जिसने अभी अपने को मन्दबुद्धि कहा और अपने पाये हुए को विश्राम।

यह रामचरितमानस पुण्यरूप है, पापों का हरण करनेवाला, सदा कल्याणकारी, विज्ञान और भक्ति देनेवाला। वह माया, मोह और मल का नाश करनेवाला, परम निर्मल, प्रेमरूपी जल से भरा हुआ और मंगलमय है। जो मनुष्य भक्ति के साथ इसमें गोता लगाते हैं, वे संसाररूपी सूर्य की भयंकर किरणों से नहीं जलते। आख़िरी वाक्य में इस ग्रन्थ का नाम अपना अर्थ चुका देता है। मानस एक सरोवर है, उसका जल प्रेम है, और ग्रन्थ पढ़ने की नहीं, उसमें उतरने की बात करता है।

समापन की शुरुआत में भी एक स्नान था, निर्मल ज्ञान के जल में। अन्त एक डुबकी पर होता है, प्रेम के जल में। जिस समापन में तीन बार दवा की बात हुई, वे आख़िर में दवा नहीं, पानी देकर जाते हैं।

इसके बाद छपे हुए पाठ में केवल दो सूचनाएँ बचती हैं। वे कथा नहीं, पाठ करनेवालों के लिये हैं: एक मासपारायण के क्रम की, जिसमें यह तीसवाँ पड़ाव है, और एक नवाह्नपारायण की, जिसमें यह नवाँ। दोनों में वही शब्द है जो अभी तुलसीदास ने अपने लिये बरता था, विश्राम। कवि ने कहा कि उसने परम विश्राम पा लिया, और उसके ठीक बाद पोथी पाठ करनेवाले से कहती है कि यहाँ विश्राम कीजिये। और उसके नीचे का समापन-वाक्य इस सोपान को सप्तम कहकर पूरा घोषित करता है। वह मानस को उस ग्रन्थ के नाम से पुकारता है जो कलियुग के सारे मल का ध्वंस करनेवाला है।

नायक के बिना अन्त

यह ग्रन्थ अपने नायक के बिना ख़त्म होता है: राम इस समापन में एक बार भी नहीं बोलते। न कोई सभा, न सिंहासन, न अयोध्या। जो बचे हैं वे सुननेवाले हैं: एक पक्षी जो अपने लोक लौट रहा है, एक स्त्री जो कहती है कि उसका संदेह गया। और एक आदमी जो अपने ही मन को डाँट रहा है। यह कथा हमेशा किसी के किसी को सुनाने की कथा थी, और अन्त में सुनाना और सुनना ही बचता है।

दूसरी बात उस शब्द की जो यहाँ तीन बार आया, शठ: भुशुण्डि ने अपने लिये कहा, शिव ने उसके लिये जिसे कथा नहीं सुनानी चाहिये। और तुलसीदास ने अपने ही मन के लिये। तीनों को साथ रखने पर छँटनी का निशाना साफ़ हो जाता है: जो अपने को शठ मान ले, वह भीतर आ गया। जो न माने, वह बाहर रह गया। बीच में कोई परीक्षा नहीं, और इसीलिये तुलसीदास की पुकार में गणिका, व्याध, किरात और श्वपच के नाम बिना किसी सफ़ाई के गिना दिये जाते हैं।

और तीसरी बात उस आख़िरी प्रार्थना की। धर्म, ज्ञान, वैराग्य, भक्ति, साधन और शास्त्र, सब कुछ कह चुकने के बाद अन्तिम उपमा मन्दिर से नहीं, बाज़ार और घर से आती है। कामी की स्त्री और लोभी का धन। जिन दो को इस कथा के अयोग्य कहा गया, उन्हीं की एकाग्रता माँगकर यह ग्रन्थ बन्द होता है। भक्ति कोई नयी शक्ति नहीं माँगती। वह उसी पुरानी लगन को दूसरी ओर मोड़ने का नाम है, जो आदमी के पास पहले से है और जिसे वह रोज़ किसी और चीज़ पर ख़र्च करता है।

सात सोपान यहाँ पूरे होते हैं, बालकाण्ड से इस उत्तरकाण्ड तक। वे काण्ड नहीं, सीढ़ियाँ थीं, और पहली सीढ़ी अपनी जगह पड़ी है, किसी भी दिन फिर से पहली सीढ़ी हो जाने को।

और आख़िरी बात: जिसने यह सब लिखा, उसने अपने लिये मोक्ष या सिद्धि नहीं माँगी। उसने कहा कि उसे विश्राम मिला, और उसके ठीक नीचे छपी सूचनाएँ पाठ करनेवाले से भी यही कहती हैं, कि यहाँ ठहर जाइये। थकान असली चीज़ है, उसके उतरने की जगह भी असली है, और जिसने यह सब लिखा वह भी अन्त में वहीं बैठकर साँस ले रहा था।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, उत्तरकाण्ड, दोहा 122 से 130, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।