रामचरितमानस · उत्तरकाण्ड · भक्ति-चिंतामणि और मानस-रोग
भक्ति-चिंतामणि और मानस-रोग
एक दीपक जो आँचल की हवा से बुझ जाता है, एक मणि जिसे हवा से बचाना ही नहीं पड़ता, और अन्त में उन रोगों की सूची जिनकी ओषधि इस पन्ने पर नहीं आती।
इस प्रसंग में कोई युद्ध नहीं है, कोई यात्रा नहीं, और नाम लेकर आनेवाला कोई नया पात्र नहीं। दो पक्षी बैठे हैं और उनमें से एक दूसरे को समझा रहा है। शुरुआत एक दीपक से होती है और अन्त रोगों की एक लम्बी सूची पर, और बीच में वह मोड़ पड़ता है जिसके लिये यह पन्ना याद रखा जाता है।
पहला हिस्सा एक दीपक जलाता है और फिर उसे बुझते हुए दिखाता है। दीपक ज्ञान का है, घर हृदय का है, और बुझानेवाली हवा इतनी छोटी है कि तुलसी उसे आँचल की हवा कहते हैं। दूसरा हिस्सा उसी हृदय के भीतर एक मणि रख देता है, और उस मणि की सारी बड़ाई इसी एक बात में है कि उसे किसी से बचाना नहीं पड़ता। तीसरे हिस्से में सुननेवाला बीच में रोककर सात प्रश्न एक साथ रख देता है, और उत्तर ठीक उसी क्रम में आते हैं जिस क्रम में प्रश्न रखे गये थे। सातवें उत्तर पर पन्ना समाप्त हो जाता है, और सातवाँ उत्तर एक वैद्य की सूची है।
एक बात पहले से ध्यान में रख लेना इस पन्ने को पढ़ने में बहुत काम आती है। ज्ञान शब्द यहाँ बार-बार आता है और हर बार उसकी जगह बदल जाती है। पहले वह मंज़िल है, और वहीं से गिरना होता है। फिर वह खान खोजने की आँख बनता है। फिर समुद्र मथने का मन्दराचल। फिर शत्रु मारने की तलवार। और अन्तिम दोहे में वही शब्द उन ओषधियों की सूची में लिखा मिलता है जिनसे रोग नहीं जाते। यह पूरा उतार इसी एक प्रसंग के भीतर होता है, और तुलसी इसकी घोषणा कहीं नहीं करते।
इस प्रसंग के मुख्य किरदार
- कहनेवाले इन पंक्तियों की अपनी देह में उनका नाम एक बार भी नहीं आता। पोद्दार की टीका उन्हें काकभुशुण्डि बताती है। वे सुननेवाले को कभी खगेस कहते हैं, कभी भाई, और अन्त में तात।
- गरुड़ सुननेवाले पक्षिराज, जो आधे प्रसंग तक चुपचाप सुनते हैं और फिर सात प्रश्न एक साथ रखते हैं, वह भी अपने को सेवक कहकर।
- राम इस पन्ने पर उनका नाम किसी घटना में नहीं आता, केवल भजन के विषय की तरह आता है। मणि उन्हीं की भक्ति है, और उस मणि के मिलने के लिये कृपा भी उन्हीं की चाहिये।
- माया जो यहाँ किसी सिद्धान्त की तरह नहीं, एक पात्र की तरह बरतती है। वह देखती है, समय चुनती है, दूत भेजती है, और सबसे हलका शस्त्र उठाती है।
- संत और असंत पन्ने के दूसरे आधे हिस्से के दो किरदार, जिन्हें आमने-सामने खड़ा करके नहीं, एक ही उपमा के दो सिरों पर रखकर पहचाना जाता है।
जो दीपक अभी-अभी जलाया गया है
यह प्रसंग एक वाक्य के बीच से उठता है। इसका पहला ही शब्द एहि बिधि है, इस प्रकार, और इस प्रकार कहने के लिये पहले कोई प्रकार बताया जा चुका होना चाहिये। बताया भी जा चुका है, पिछले पन्ने पर, जहाँ इस दीपक के अलग-अलग हिस्से एक-एक करके गिनाये गये हैं। यहाँ उन सबको समेटकर एक ही काम कहा जाता है, और वह काम बहुत छोटा है: जलाओ।
एहि बिधि लेसै दीप तेज रासि बिग्यानमय।
सोरठा ११७ (घ)
जातहिं जासु समीप जरहिं मदादिक सलभ सब॥ ११७ (घ)॥
दीपक का विशेषण देखिये। तेज की राशि, और विज्ञानमय। और क्रिया देखिये, लेसै। यह दीपक मिलता नहीं, जलाया जाता है। पूरे पहले हिस्से में तुलसी इसी एक बात पर टिके रहते हैं कि यह वस्तु किसी की बनायी हुई है, और जो बनायी हुई है वह बुझायी भी जा सकती है।
और दूसरी पंक्ति में जो होता है, उसे धीरे पढ़िये। मद आदि पतंगे जल जाते हैं। पतंगा किसी का शत्रु नहीं है और किसी से लड़ने नहीं आता। वह रोशनी की ओर खिंचकर आता है, और यही खिंचाव उसे मार देता है। तुलसी ने मद को हराने का कोई उपाय नहीं बताया। उन्होंने इतना ही कहा कि दीपक जल जाय, और फिर जो पास आयेगा वह अपने ही आने से जलेगा। जातहिं जासु समीप, समीप जाते ही, उसी क्षण।
दीपक जल गया, अब लौ का नाम आता है। लौ कोई भावना नहीं है, एक वृत्ति है, और वह वृत्ति है सोऽहमस्मि। टीका उसे अखण्ड इस अर्थ में खोलती है कि वह तेल की धार की तरह कभी टूटती नहीं। लौ की पहचान यही है कि वह लगातार है। एक बार का अनुभव लौ नहीं बनता, चिनगारी बनता है, और चिनगारी से घर उजाला नहीं होता।
फिर प्रकाश फैलता है, और फैलते ही भेद का भ्रम मिट जाता है। क्रम पर ध्यान दीजिये। अन्धकार को पहले हटाया नहीं जाता, प्रकाश को पहले लाया जाता है। अविद्या के परिवार का, मोह आदि का, वह अपार अन्धकार अपने आप मिटता है, क्योंकि अन्धकार से लड़ा नहीं जाता, वह केवल हटता है।
और तब वह चित्र आता है जिस पर आगे का सारा प्रसंग टिका हुआ है। उजाला पाकर वही बुद्धि हृदयरूपी घर में बैठ जाती है और गाँठ खोलने लगती है। बैठ जाती है। गाँठ खोलना खड़े-खड़े का काम नहीं है, न दौड़ते हुए का। उसमें दोनों हाथ चाहिये, रोशनी चाहिये, और सबसे ज़्यादा धीरज चाहिये। तुलसी ने बुद्धि को यहाँ कोई वीर मुद्रा नहीं दी, घर के भीतर की एक गृहस्थ मुद्रा दी है।
सार: विज्ञानमय दीपक जलाने को कहा जाता है, जिसके समीप जाते ही मद आदि पतंगे जल जाते हैं। सोऽहमस्मि की अखण्ड वृत्ति उसकी लौ है, प्रकाश फैलते ही अविद्या का अन्धकार मिटता है, और वही बुद्धि हृदयरूपी घर में बैठकर जड़ और चेतन की गाँठ खोलने लगती है।
घर के झरोखे और उनके पहरेदार
अब तुलसी एक शर्त लगाते हैं जो पूरे पन्ने का दरवाज़ा है। यदि वह बुद्धि गाँठ खोलने पावे, तब यह जीव कृतार्थ हो। जौं। और उसी साँस में बताया जाता है कि यह जौं वहाँ क्यों लगा है। गाँठ खुलते हुए जानकर माया अनेकों विघ्न करती है।
जानकर। यह शब्द माया को एक आँख दे देता है। वह पहले नहीं आयी, तब नहीं आयी जब दीपक जलाया जा रहा था, तब भी नहीं जब बुद्धि बैठ रही थी। वह उस क्षण आती है जब गाँठ खुलने ही वाली है। जो बात कभी पूरी नहीं होती उससे किसी को झगड़ा नहीं होता। विरोध सफलता के ठीक पहले उठता है।
रिद्धि सिद्धि प्रेरइ बहु भाई । बुद्धिहि लोभ दिखावहिं आई॥
चौपाई १
कल बल छल करि जाहिं समीपा । अंचल बात बुझावहिं दीपा॥
पहला आक्रमण दीपक पर नहीं होता, बुद्धि पर होता है। ऋद्धि और सिद्धि आकर लोभ दिखाती हैं। जो नीचे बैठकर गाँठ खोल रहा था, उसे पहले ऊपर देखने पर मजबूर किया जाता है, और गाँठ खोलनेवाले के लिये इतना ही पर्याप्त है।
फिर तीन शब्द आते हैं जो एक पूरी रणनीति हैं: कल, बल और छल। कौशल, ज़ोर और धोखा। और इन तीनों का उपयोग किस काम के लिये होता है, यह पढ़कर हँसी भी आती है और डर भी लगता है। इतने साधन जुटाये जाते हैं केवल पास तक पहुँचने के लिये। पास पहुँचने के बाद का काम इतना छोटा है कि उसके लिये कोई शस्त्र ही नहीं चाहिये। आँचल हिला दिया, हवा बनी, दीपक बुझ गया।
बचाव क्या है, यह भी उतने ही कम शब्दों में है। यदि बुद्धि परम सयानी हुई तो वह उन्हें अहितकर जानकर उनकी ओर ताकती ही नहीं। ताकती नहीं। कोई युद्ध नहीं, कोई त्याग की घोषणा नहीं, कोई शाप नहीं। केवल दृष्टि का न उठना। और यह भी ध्यान दीजिये कि सयानेपन की परिभाषा यहाँ जानने में नहीं, न देखने में रखी गयी है।
यह विघ्न पार हुआ तो अगला विघ्न ऊँचे दर्जे से आता है। पहले माया ने भेजा था, अब देवता स्वयं उपाधि करते हैं। और जहाँ वे बैठे हैं, वह जगह सुनकर पूरा चित्र पलट जाता है।
इंद्री द्वार झरोखा नाना। तहँ तहँ सुर बैठे करि थाना॥
चौपाई २
आवत देखहिं बिषय बयारी । ते हठि देहिं कपाट उघारी॥
घर वही है जिसमें बुद्धि बैठी थी। पर अब पता चलता है कि उसमें अनेकों झरोखे हैं, और हर झरोखे पर एक देवता थाना जमाये बैठा है। ये बाहर से आये हुए आक्रमणकारी नहीं हैं। ये पहरेदार हैं, घर के भीतर के, अपनी-अपनी खिड़की पर तैनात। और यही इस चित्र का काँटा है: किवाड़ बाहर से नहीं तोड़े जाते, भीतर से खोले जाते हैं।
खोलने की क्रिया के साथ जो शब्द लगा है वह भी छोड़ने लायक नहीं। हठि। हठपूर्वक। वे विषयरूपी हवा को आते हुए देखते हैं और ज़िद करके किवाड़ खोल देते हैं। प्रतीक्षा उन्हीं की है, हवा की नहीं।
जब सो प्रभंजन उर गृहँ जाई । तबहिं दीप बिग्यान बुझाई॥
चौपाई ३
ग्रंथि न छूटि मिटा सो प्रकासा। बुद्धि बिकल भइ बिषय बतासा॥
अब उस हवा का नाम गिनिये। पहली बार वह आँचल की बात थी। दूसरी बार विषय की बयारी, एक हलकी बहार। और जैसे ही वह घर के भीतर पहुँचती है, वह प्रभंजन हो जाती है, आँधी। एक ही हवा, तीन नाम, और हर नाम पिछले से बड़ा। हवा बढ़ी नहीं है, वह केवल पास आयी है।
और हानि दो हैं, दोनों गिनायी गयी हैं। गाँठ भी नहीं छूटी, और वह प्रकाश भी मिट गया। यह आरम्भ की स्थिति पर लौटना नहीं है, उससे नीचे गिरना है। शुरू में गाँठ बँधी थी और उजाला नहीं था। अब गाँठ भी बँधी है, उजाला भी नहीं है, और ऊपर से बुद्धि विकल है।
फिर जो कारण बताया जाता है, उसमें किसी की नीयत का दोष नहीं है। इन्द्रियों और उनके देवताओं को ज्ञान सुहाता ही नहीं, क्योंकि उनकी प्रीति सदा से विषयभोग में है। सोहाई, यह शब्द याद रखिये, यह इसी प्रसंग में एक बार और आयेगा और तब पूरा पलट चुका होगा।
और हिस्से का अन्त एक प्रश्न पर होता है, उत्तर पर नहीं। बुद्धि को विषय की हवा ने बावला बना दिया, तो अब उस दीपक को उसी प्रकार दुबारा जलाये कौन। प्रश्न खुला छोड़ दिया जाता है, और अगला दोहा उसका उत्तर देने के बजाय उसे और भारी कर देता है।
सार: गाँठ खुलने के ठीक समय माया जागती है। ऋद्धि-सिद्धियाँ कल, बल और छल से पास आकर आँचल की हवा से दीपक बुझाती हैं। बुद्धि उनकी ओर न ताके तो इन्द्रियों के झरोखों पर बैठे देवता हठ करके किवाड़ खोल देते हैं, विषय की आँधी भीतर आती है, और गाँठ भी बँधी रह जाती है और प्रकाश भी नहीं बचता।
तीन बार कठिन, और एक तलवार की धार
तब फिरि जीव बिबिधि बिधि पावइ संसृति कलेस।
दोहा ११८ (क, ख)
हरि माया अति दुस्तर तरि न जाइ बिहगेस॥ ११८ (क)॥
कहत कठिन समुझत कठिन साधत कठिन बिबेक ।
होइ घुनाच्छर न्याय जौं पुनि प्रत्यूह अनेक॥ ११८ (ख)॥
पहले आधे में परिणाम है। जीव फिर अनेकों प्रकार से जन्म और मरण के क्लेश पाता है, और हरि की माया अत्यन्त दुस्तर है, वह तरी नहीं जाती। शब्द दुस्तर है, असम्भव नहीं। पर जिस आदमी का दीपक अभी-अभी बुझा है, उसके लिये यह भेद बहुत बड़ा नहीं रह जाता।
दूसरा आधा वह जगह है जहाँ तुलसी एक ही पंक्ति में तीन बार एक शब्द दोहराते हैं, और हर बार वह किसी और दरवाज़े पर लगता है। कहने में कठिन, समझने में कठिन, साधने में कठिन। यानी विवेक तीन बार छन्न सकता है, और तीनों जगहें अलग-अलग हैं। कहनेवाला चूक सकता है, सुननेवाला चूक सकता है, और जिसने कह भी लिया और समझ भी लिया वह करने में चूक सकता है।
और चौथी चोट, जो सबसे बारीक है। यदि घुणाक्षर न्याय से, यानी जैसे घुन लकड़ी काटते-काटते अनजाने में कोई अक्षर बना देता है, वैसे संयोगवश यह ज्ञान हो भी जाय, तो फिर अनेकों विघ्न हैं। ध्यान दीजिये कि यह चौथी कठिनाई पाने की नहीं, बचाने की है। इसीलिये पूरा पहला हिस्सा दीपक की उपमा पर चला था। दीपक जलाने का नहीं, जलाये रखने का नाम है।
ग्यान पंथ कृपान कै धारा । परत खगेस होइ नहिं बारा॥
चौपाई ४
जो निर्बिघ्न पंथ निर्बहई । सो कैवल्य परम पद लहई॥
मार्ग की उपमा दुनिया में बहुत हैं। सँकरा पुल, काँटों भरी राह, चढ़ाई। तुलसी कोई भी नहीं लेते। वे कृपाण की धार लेते हैं, दुधारी तलवार का किनारा। इस उपमा की चुभन यह है कि यहाँ मार्ग और शस्त्र एक ही वस्तु हैं। जिस पर पैर रखा जा रहा है, वही काटता है। और गिरने में देर नहीं लगती, क्योंकि धार पर कोई चौड़ाई ही नहीं होती जिस पर सँभला जा सके।
सार: ज्ञानदीपक बुझ जाने पर जीव फिर जन्म-मरण के क्लेश पाता है। विवेक कहने, समझने और साधने, तीनों में कठिन है, और संयोगवश हो भी जाय तो उसे बचाये रखने में अनेकों विघ्न हैं। ज्ञान का मार्ग दुधारी तलवार की धार है, जहाँ से गिरने में देर नहीं लगती।
जो माँगी नहीं गयी, वही चली आती है
अति दुर्लभ कैवल्य परम पद। संत पुरान निगम आगम बद॥
चौपाई ५
राम भजत सोइ मुकुति गोसाईं । अनइच्छित आवइ बरिआईं॥
पहली पंक्ति में चार गवाह खड़े किये जाते हैं: संत, पुराण, निगम और आगम। चारों एक ही बात कहते हैं, कि कैवल्य परमपद अत्यन्त दुर्लभ है। इतनी बड़ी गवाही किसी बात को पक्का करने के लिये जुटायी जाती है। यहाँ वह अगली पंक्ति गिराने के लिये जुटायी गयी है।
क्योंकि अगली पंक्ति कहती है कि वही मुक्ति राम को भजने से बिना इच्छा किये आ जाती है, और आती भी है तो बरिआईं, ज़बरदस्ती। इस एक शब्द पर रुकिये। मुक्ति उस आदमी पर ज़ोर करती है जिसने उसे नहीं माँगा। जो चीज़ चारों प्रमाणों की गवाही में सबसे दुर्लभ थी, वह अब उस आदमी के पीछे पड़ी है जो उसकी ओर देख भी नहीं रहा।
आगे इस बात को दो उपमाओं से पक्का किया जाता है, और दोनों गृहस्थी की हैं। पहली जल और थल की है। जल स्थल के बिना ठहर नहीं सकता, चाहे करोड़ों उपाय कर लिये जायँ। पानी को रोकने के लिये पानी काफ़ी नहीं है, ज़मीन चाहिये। वैसे ही मोक्ष का सुख हरि की भक्ति को छोड़कर ठहर नहीं सकता। मोक्ष जल है और भक्ति उसका थल।
यही विचार कर बुद्धिमान भक्त मुक्ति का निरादर कर देते हैं और भक्ति पर लुभाये रहते हैं। निरादर शब्द कड़ा है, पर उसके ठीक बाद दूसरी उपमा आकर उसे नरम कर देती है। भोजन तृप्ति के लिये किया जाता है, और उस भोजन को जठराग्नि अपने आप पचा देती है। कोई आदमी पाचन के लिये थाली पर नहीं बैठता। पाचन होता है, पर वह लक्ष्य नहीं होता। मुक्ति का निरादर इसी अर्थ में है: उसे गाली नहीं दी जाती, उसे लक्ष्य नहीं बनाया जाता।
और इसी के साथ भक्ति करने से क्या होता है, यह भी कह दिया जाता है: संसार की जड़ अविद्या बिना यत्न और बिना परिश्रम के नष्ट हो जाती है। पिछले हिस्से को याद कीजिये, जहाँ उसी अविद्या के परिवार को हटाने के लिये दीपक जलाना पड़ा था, बुद्धि को बैठना पड़ा था, ऋद्धि-सिद्धियों की ओर न ताकना पड़ा था, और फिर भी एक आँचल सब ले उड़ा था। यहाँ वही काम अपने आप हो जाता है, उसी तरह जैसे खाया हुआ अन्न पच जाता है।
और फिर वह शब्द लौटता है जिसे याद रखने को कहा गया था। ऐसी सुगम और सुख देनेवाली हरिभक्ति जिसे न सुहाये, ऐसा मूढ़ कौन होगा। इन्द्रियों और देवताओं को ज्ञान नहीं सुहाता था, यह उनका स्वभाव था और उस पर कोई दोष नहीं लगाया गया था। भक्ति जिसे न सुहाये उसके लिये एक ही शब्द है, और वह शब्द मूढ़ है। एक ही क्रिया, दो जगह, और दोनों जगह तुलसी का रुख़ अलग।
सेवक सेब्य भाव बिनु भव न तरिअ उरगारि।
दोहा ११९ (क, ख)
भजहु राम पद पंकज अस सिद्धांत बिचारि॥ ११९ (क)॥
जो चेतन कहँ जड़ करइ जड़हि करइ चैतन्य।
अस समर्थ रघुनायकहि भजहिं जीव ते धन्य॥ ११९ (ख)॥
दोहे का पहला आधा पूरे उत्तर की कील है। सेवक और सेव्य का भाव, यानी मैं सेवक और वे स्वामी, इसके बिना संसार से तरना नहीं होता। ध्यान दीजिये कि जो चीज़ पार उतारती है वह कोई जानकारी नहीं है, एक सम्बन्ध है। ज्ञान का मार्ग तलवार की धार था क्योंकि वहाँ अकेले चलना था। सम्बन्ध में दो होते हैं, और गिरनेवाले को थामनेवाला भी उसी सम्बन्ध के भीतर खड़ा है।
दूसरा आधा राम का सामर्थ्य बताता है, और वह दोनों दिशाओं में बताया जाता है। जो चेतन को जड़ कर दे और जड़ को चेतन कर दे। स्तुति में प्रायः एक ही दिशा कही जाती है, कि वे उठा देते हैं। यहाँ गिरा देना भी उसी वाक्य में है। और पीछे मुड़कर देखिये तो यह अजनबी नहीं लगता: जिस बुद्धि को विषय की हवा ने बावला किया था, वह भी इसी सामर्थ्य के भीतर की घटना थी।
सार: वही कैवल्य जिसे संत, पुराण, वेद और आगम अत्यन्त दुर्लभ कहते हैं, राम को भजने से बिना माँगे ज़बरदस्ती चला आता है। मोक्ष भक्ति के बिना वैसे ही नहीं ठहरता जैसे जल थल के बिना, और भक्ति करने से अविद्या बिना यत्न के नष्ट होती है, जैसे खाया हुआ अन्न अपने आप पच जाता है। सेवक और सेव्य के भाव के बिना संसार से तरना नहीं होता।
वह मणि जिसे हवा से बचाना नहीं पड़ता
अब कहनेवाले स्वयं घोषणा करते हैं कि एक विषय पूरा हुआ और दूसरा शुरू हो रहा है। यह इस पूरे प्रसंग में इकलौती जगह है जहाँ वे अपने कहे को नाम देकर पीछे छोड़ते हैं।
कहेउँ ग्यान सिद्धांत बुझाई । सुनहु भगति मनि कै प्रभुताई॥
चौपाई ६
राम भगति चिंतामनि सुंदर । बसइ गरुड़ जाके उर अंतर॥
ज्ञान का सिद्धान्त समझाकर कह दिया, अब भक्तिरूपी मणि की प्रभुता सुनिये। और मणि कहाँ बसती है, यह भी उसी साँस में आ जाता है: जाके उर अंतर, जिसके हृदय के भीतर। वही हृदय, वही घर। तुलसी कमरा नहीं बदलते, कमरे का सामान बदलते हैं।
और यहीं से अगली तीन चौपाइयाँ वह करती हैं जो इस पन्ने की सबसे सुन्दर बनावट है। वे दीपक की हर कमज़ोरी को एक-एक करके उठाती हैं और उसके सामने मणि रख देती हैं। कोई तुलना घोषित नहीं की जाती। वही शब्द दुबारा बोल दिये जाते हैं, और पाठक अपने आप जोड़ लेता है।
परम प्रकास रूप दिन राती। नहिं कछु चहिअ दिआ घृत बाती॥
चौपाई ७
मोह दरिद्र निकट नहिं आवा। लोभ बात नहिं ताहि बुझावा॥
पहला मिलान। दीपक को तेल चाहिये था, बत्ती चाहिये थी, जलानेवाला हाथ चाहिये था। मणि दिन और रात परम प्रकाशरूप रहती है और उसे दीया, घी और बत्ती कुछ नहीं चाहिये। इसीलिये पहले हिस्से का वह खुला प्रश्न, कि उस दीपक को दुबारा जलाये कौन, यहाँ उत्तर नहीं पाता। वह प्रश्न ही निरर्थक कर दिया जाता है, क्योंकि जिस वस्तु की बात अब हो रही है उसे कोई जलाता ही नहीं।
दूसरा मिलान। मोहरूपी दरिद्रता पास नहीं आती। मणि स्वयं धन है, और जहाँ धन रखा हो वहाँ दरिद्रता का कोई काम नहीं।
तीसरा मिलान, और यही सबसे नुकीला है। लोभ बात नहिं ताहि बुझावा। लोभ की हवा उसे बुझा नहीं सकती। ठीक यही दो शब्द पहले भी आ चुके हैं। ऋद्धि-सिद्धियाँ बुद्धि को लोभ दिखाकर आयी थीं और आँचल की बात से दीपक बुझा गयी थीं। लोभ वहाँ भी था और बात वहाँ भी थी। वे दोनों यहाँ ज्यों के त्यों लौटते हैं और इस बार कुछ नहीं कर पाते।
प्रबल अबिद्या तम मिटि जाई । हारहिं सकल सलभ समुदाई॥
चौपाई ८
खल कामादि निकट नहिं जाहीं । बसइ भगति जाके उर माहीं॥
चौथा मिलान इस चौपाई के पहले ही शब्दों में है। प्रबल अबिद्या। यह जोड़ा पहले हिस्से में भी ठीक इसी तरह आया था, जब बुद्धि ने उजाला पाया था। वही प्रबल अविद्या, वही मिटना।
और पाँचवाँ मिलान वह है जिस पर देर तक रुका जा सकता है। इस पन्ने की पहली ही सोरठा में पतंगे जलते थे, जरहिं। यहाँ पतंगों का सारा समूह हारता है, हारहिं। वस्तु वही है, पतंगा वही है, पर दीपक जिसे भस्म करता था उसे मणि केवल हरा देती है। मणि का प्रकाश ठंडा है। उसे जीतने के लिये किसी को मारना नहीं पड़ता।
फिर काम आदि दुष्ट पास तक नहीं आते, और इसके बाद वह पंक्ति आती है जो इस पन्ने के आख़िरी हिस्से का बीज है। बड़े-बड़े मानस-रोग, जिनके वश में होकर सब जीव दुखी हैं, उसे नहीं व्यापते। ध्यान दीजिये कि मानस-रोग शब्द यहाँ पहली बार आता है, और यह उत्तर है। प्रश्न अभी पूछा ही नहीं गया।
उसी क्रम में दो और बातें कही जाती हैं। उसके लिये विष अमृत के समान हो जाता है और शत्रु मित्र हो जाता है। विष विष रहता है और शत्रु शत्रु, पर जिसके पास मणि है उसके लिये उनका असर बदल जाता है। बाहर की दुनिया वही रहती है, ले जानेवाला बदल जाता है। और उस मणि के बिना कोई सुख नहीं पाता, स्वप्न में भी लेशमात्र दुख उसे नहीं होता जिसके हृदय में वह बसी है।
पर यहीं एक कड़वी बात भी रख दी जाती है, और वह बिना सुलझाये छोड़ दी जाती है। मणि जगत में प्रकट है, छिपी नहीं है, और फिर भी राम की कृपा के बिना कोई उसे नहीं पाता। उसके पाने के उपाय भी सुगम हैं, और फिर भी अभागे मनुष्य उन्हें ठुकरा देते हैं। एक ओर कृपा चाहिये, दूसरी ओर आदमी की अपनी ठोकर। ये दोनों वाक्य आमने-सामने रखे हैं और तुलसी इनमें से किसी को दूसरे पर भारी नहीं करते।
सार: राम-भक्ति सुन्दर चिन्तामणि है और वह हृदय के भीतर बसती है। उसे दीया, घी और बत्ती नहीं चाहिये, मोह की दरिद्रता उसके पास नहीं आती, लोभ की हवा उसे बुझा नहीं सकती, अविद्या का अन्धकार मिट जाता है और पतंगों का समूह हार जाता है। उसके रहते विष अमृत हो जाता है, शत्रु मित्र हो जाता है, और मानस-रोग नहीं व्यापते।
पहाड़, खान, और खोदनेवाले
मणि प्रकट है और फिर भी नहीं मिलती, तो मिलेगी कैसे। इसका उत्तर एक पूरी खदान बनाकर दिया जाता है, और इस खदान में हर औज़ार का नाम लिया गया है।
वेद और पुराण पवित्र पर्वत हैं। राम की नाना कथाएँ उन पर्वतों में सुन्दर खानें हैं। संत मर्मी हैं, यानी वे जो जानते हैं कि सुरंग किस ओर जाती है। सुन्दर बुद्धि कुदाल है। और ज्ञान तथा वैराग्य दो नेत्र हैं।
इस सूची को धीरे पढ़िये, क्योंकि इसमें ज्ञान की जगह बदल चुकी है और किसी ने इसकी घोषणा नहीं की। कुछ पंक्तियों पहले ज्ञान मंज़िल था, कैवल्य तक ले जानेवाला मार्ग, तलवार की धार। यहाँ वह आँख है। आँख अच्छी चीज़ है, ज़रूरी चीज़ है, पर आँख खोदती नहीं। खोदने का काम सुमति करती है, और जगह बतानेवाला मर्मी संत है। और नेत्र दो कहे गये हैं, ज्ञान और वैराग्य, क्योंकि जोड़े में ही गहराई का अन्दाज़ा लगता है। एक आँख से दिखता तो है, पर कितनी दूर है यह नहीं दिखता।
फिर खोजने की शर्त एक ही रखी जाती है, और वह औज़ारों की सूची में नहीं है। जो प्राणी भाव के साथ खोजता है वही सब सुखों की खान इस भक्तिरूपी मणि को पाता है। खान शब्द दुबारा आया, और इस बार वह मणि के लिये आया है। जिसे पर्वत की खान से निकाला गया, वह स्वयं एक खान निकली।
और यहीं कहनेवाले एक क्षण के लिये उपदेश छोड़कर अपनी बात कह देते हैं। मेरे मन में तो ऐसा विश्वास है कि राम के दास राम से भी बढ़कर हैं। वे इसे शास्त्र नहीं कहते, प्रमाण नहीं देते। वे कहते हैं मेरे मन में, और कहते हैं विश्वास। इतनी बड़ी बात इतनी निजी तरह से कही जाती है।
पर अगली ही चौपाई में इसका कारण आ जाता है, और दोनों उपमाएँ पहुँचाने की हैं। राम समुद्र हैं और धीर संत मेघ। समुद्र में पानी अथाह है और वह किसी के पीने का नहीं। मेघ वही पानी उठाकर मैदान तक पहुँचा देता है। हरि चन्दन के वृक्ष हैं और संत पवन। सुगन्ध वृक्ष की है, पर वृक्ष कहीं जाता नहीं। पवन उसे उस आदमी तक ले आती है जो उस वन तक कभी नहीं पहुँचेगा।
इसलिये राम के दास का बढ़कर होना पद का नहीं, पहुँच का है। और यह भी देखिये कि पवन यहाँ लौटी है। पहले हिस्से में हवा ने ही दीपक बुझाया था, वही तत्त्व तीन नामों से आया था। यहाँ वही पवन चन्दन की गन्ध लिये चली आ रही है। तुलसी ने हवा को बुरा नहीं ठहराया था, उन्होंने केवल यह दिखाया था कि वह किस ओर से बह रही है।
फिर सब साधनों का फल एक ही बताया जाता है, सुन्दर हरिभक्ति, और यह भी कि वह संत के बिना किसी को नहीं मिली। और जो ऐसा विचार कर सत्संग करता है, उसके लिये राम की भक्ति सुलभ हो जाती है। सुलभ। कुछ पंक्तियों पहले कैवल्य के लिये अति दुर्लभ शब्द चारों प्रमाणों की गवाही से बाँधा गया था। उसका उलटा शब्द यहाँ बिना किसी गवाही के रख दिया गया है।
ब्रह्म पयोनिधि मंदर ग्यान संत सुर आहिं ।
दोहा १२० (क, ख)
कथा सुधा मथि काढ़हिं भगति मधुरता जाहिं॥ १२० (क)॥
बिरति चर्म असि ग्यान मद लोभ मोह रिपु मारि।
जय पाइअ सो हरि भगति देखु खगेस बिचारि॥ १२० (ख)॥
पहले आधे में समुद्रमन्थन है, और उसमें भी हर पद बँटा हुआ है। ब्रह्म समुद्र है, ज्ञान मन्दराचल है, संत देवता हैं, और मथकर जो निकलता है वह कथारूपी अमृत है। भक्ति उस अमृत की मधुरता है।
इस अन्तिम बात पर रुकिये। मधुरता अमृत के भीतर कोई अलग वस्तु नहीं है जिसे बाद में डाला गया हो। वह अमृत का गुण है, उसके होने का ढंग है। तो भक्ति कथा के बाद मिलनेवाला कोई इनाम नहीं है। जो कथा सुनी जा रही है, मिठास उसी में घुली है।
दूसरे आधे में चित्र बदलकर युद्ध का हो जाता है। वैराग्य ढाल है, ज्ञान तलवार है, और तीन शत्रु मारे जाते हैं: मद, लोभ और मोह। तीनों नाम इस पन्ने पर पहले आ चुके हैं। मद पहली सोरठा में पतंगा था। लोभ वह हवा था जिसने दीपक बुझाया। मोह वह दरिद्रता था जो मणि के पास नहीं आती। तुलसी यहाँ कोई नयी सूची नहीं बना रहे, वे अपनी ही सूची बन्द कर रहे हैं।
और जिस पर विजय मिलती है, वह विजय किसकी है, यह भी साफ़ लिखा है। ढाल वैराग्य की है, तलवार ज्ञान की है, और जय हरिभक्ति पाती है। लड़नेवाला हथियार उठाता है, पर जीत हथियार की नहीं होती।
सार: वेद-पुराण पर्वत हैं, राम की कथाएँ उनमें खानें, संत मर्मी, सुमति कुदाल, और ज्ञान तथा वैराग्य दो नेत्र। भाव के साथ खोजनेवाला ही वह मणि पाता है। संत राम तक पहुँचाते हैं, जैसे मेघ समुद्र का जल और पवन चन्दन की गन्ध, इसलिये सत्संग से भक्ति सुलभ हो जाती है। ज्ञान मथानी है और तलवार, और जय भक्ति की होती है।
गरुड़ के सात प्रश्न
पुनि सप्रेम बोलेउ खगराऊ। जौं कृपाल मोहि ऊपर भाऊ॥
चौपाई ९
नाथ मोहि निज सेवक जानी। सप्त प्रस्न मम कहहु बखानी॥
पहले शर्त नहीं, प्रार्थना। यदि कृपालु का मुझ पर प्रेम है। फिर अपना परिचय, और परिचय में वही शब्द जो अभी-अभी दोहे में कहा जा चुका है: मुझे अपना सेवक जानकर। सेवक और सेव्य का भाव सुनाया गया था कि उसके बिना संसार से तरना नहीं होता। सुननेवाले ने उसे सिद्धान्त की तरह नहीं लिया, माँगने के ढंग की तरह ले लिया। अगली माँग उसी भाव के भीतर से उठती है।
और माँग है सात प्रश्नों की। सात, और वे गिनकर कहे गये हैं। उन्हें एक-एक करके देखिये, क्योंकि आगे के उत्तर इसी क्रम में आयेंगे।
पहला, सबसे दुर्लभ शरीर कौन-सा है। दूसरा, सबसे बड़ा दुख कौन है। तीसरा, सबसे बड़ा सुख कौन है। चौथा, संत और असंत का मर्म आप जानते हैं, उनका सहज स्वभाव बताइये। पाँचवाँ, श्रुतियों में प्रसिद्ध सबसे बड़ा पुण्य कौन-सा है। छठा, सबसे भयंकर पाप कौन-सा है। और सातवाँ, मानस-रोग समझाकर कहिये।
पूछने के ढंग में दो बातें और हैं। एक, वह संक्षेप माँगता है, विचारकर और संक्षेप में। दो, सातवें प्रश्न में वह जो शब्द बोलता है वह उसने पहले कहीं सुना है। मानस-रोग का नाम कुछ चौपाइयाँ पहले मणि की प्रशंसा के बीच निकल चुका था, और वहाँ वह बिना समझाये छोड़ दिया गया था। सुननेवाले ने उसे पकड़ रखा था।
उत्तर की पहली पंक्ति भी उतनी ही ध्यान देने लायक है। हे तात, आदर और अत्यन्त प्रीति के साथ सुनिये, मैं यह नीति संक्षेप में कहता हूँ। जो माँगा गया था वही दिया जाता है, संक्षेप। और जो कहा जा रहा है उसे सिद्धान्त नहीं, ज्ञान नहीं, नीति कहा जाता है। इतने पन्नों के दर्शन के बाद अगला हिस्सा बरतने की बात के रूप में रखा जाता है।
सार: गरुड़ प्रेम के साथ बोलते हैं, अपने को सेवक बताकर सात प्रश्न रखते हैं: सबसे दुर्लभ शरीर, सबसे बड़ा दुख, सबसे बड़ा सुख, संत और असंत का सहज स्वभाव, श्रुति में प्रसिद्ध सबसे बड़ा पुण्य, सबसे कराल पाप, और मानस-रोग। उत्तर संक्षेप में देने का वचन देकर शुरू होता है, और उसे नीति कहा जाता है।
सबसे दुर्लभ देह, और उसका सौदा
पहला उत्तर दो पंक्तियों में पूरा हो जाता है। मनुष्य-शरीर के समान कोई शरीर नहीं है, और चर तथा अचर सभी जीव उसी की याचना करते हैं। याचना। माँगते हैं, हाथ फैलाते हैं। यह शब्द मनुष्य-देह को एक ऐसी वस्तु बना देता है जिसकी दुनिया में क़तार लगी है।
और उसकी विशेषता क्या है, यह अगली ही पंक्ति में है, और वह विशेषता ऊँचाई की नहीं है। यह देह नरक, स्वर्ग और मोक्ष की सीढ़ी है, और कल्याणकारी ज्ञान, वैराग्य तथा भक्ति देनेवाली है। सीढ़ी। सीढ़ी दोनों ओर चलती है, और इसीलिये तीनों में नरक का नाम पहले लिखा गया है। मनुष्य-देह को कोई ऊँचा स्थान नहीं कहा गया, चलने का साधन कहा गया है, और साधन का मूल्य इसी में है कि वह जहाँ चाहे ले जाये।
सो तनु धरि हरि भजहिं न जे नर । होहिं बिषय रत मंद मंद तर॥
चौपाई १०
काँच किरिच बदलें ते लेहीं । कर ते डारि परस मनि देहीं॥
दूसरी पंक्ति में क्रिया का क्रम देखिये, क्योंकि वही सारी बात है। वे काँच के टुकड़े बदले में लेते हैं, और पारसमणि हाथ से डालकर देते हैं। फेंकना पहले है। सौदा बाद में है। कोई उनसे छीनने नहीं आया, किसी ने ठगा नहीं। हाथ खोला उन्होंने ही।
और मणि पारस चुनी गयी है, यह भी अकारण नहीं है। पारस की क़ीमत अपनी चमक में नहीं है, दूसरी धातु को बदल देने में है। जो वस्तु और सब चीज़ों को बदल सकती थी, उसे छोड़कर एक ऐसा टुकड़ा लिया गया जो केवल चमकता है और किसी काम का नहीं। इस पन्ने पर तीन पत्थर हैं और तीनों अलग काम करते हैं: चिन्तामणि जो माँगा हुआ देती है, पारसमणि जो छूकर बदल देती है, और काँच की किरिच जो केवल उन दोनों जैसी दिखती है।
नहिं दरिद्र सम दुख जग माहीं । संत मिलन सम सुख जग नाहीं॥
चौपाई ११
पर उपकार बचन मन काया। संत सहज सुभाउ खगराया॥
दूसरा और तीसरा प्रश्न एक ही पंक्ति में निबट जाते हैं, और दोनों उत्तर चौंकाते हैं। सबसे बड़ा दुख दरिद्रता है, मृत्यु नहीं, रोग नहीं, अपमान नहीं। और सबसे बड़ा सुख संतों का मिलना है।
अब इस उत्तर की जगह देखिये। यह ठीक उस आदमी के बाद रखा गया है जिसने पारसमणि हाथ से गिरा दी और बदले में काँच ले लिया। दो पंक्तियाँ आगे-पीछे हैं, और तुलसी दोनों को जोड़ते नहीं। वे केवल उन्हें इस क्रम में रख देते हैं।
और दोनों आधों की बनावट भी आमने-सामने है। एक में जग माहीं है और दूसरे में जग नाहीं, एक ही ध्वनि, उलटे अर्थ। सबसे बड़ा दुख किसी चीज़ का न होना है और सबसे बड़ा सुख किसी से मिलना। एक अभाव है, दूसरा संगति।
सार: मनुष्य-शरीर के समान कोई देह नहीं, सब जीव उसकी याचना करते हैं, और वह नरक, स्वर्ग तथा मोक्ष तीनों की सीढ़ी है। जो उसे पाकर भजन नहीं करते वे पारसमणि हाथ से गिराकर काँच की किरिच ले लेते हैं। जगत में दरिद्रता के समान दुख नहीं और संतों के मिलन के समान सुख नहीं।
भूर्ज और सन
चौथे प्रश्न का उत्तर एक पंक्ति में बँधा हुआ है और फिर कई चौपाइयों में खुलता है। मन, वचन और शरीर से परोपकार करना, यही संतों का सहज स्वभाव है। सहज। यह शब्द उत्तर को संकल्प की श्रेणी से हटाकर स्वभाव की श्रेणी में डाल देता है, ठीक वैसे ही जैसे पहले हिस्से में इन्द्रियों के देवताओं की प्रीति विषयों में सहज कही गयी थी। दोनों जगह तुलसी किसी की नीयत पर मुक़दमा नहीं चलाते।
फिर भेद बताया जाता है, और भेद दुख से नहीं बताया जाता। संत दूसरों की भलाई के लिये दुख सहते हैं, अभागे असंत दूसरों को दुख पहुँचाने के लिये। दोनों सहते हैं। सहना दोनों तरफ़ बराबर है।
और इसी बात को दो पेड़ों से साबित किया जाता है, जो एक के बाद एक आते हैं। पहला भूर्ज है। कृपालु संत भोज के वृक्ष के समान दूसरों के हित के लिये बड़ी विपत्ति सहते हैं। टीका इसे खोलकर कहती है कि वह अपनी खाल तक उधड़वा लेता है, और भोजपत्र किस काम आता है यह हर पढ़नेवाला जानता है। छाल उतरती है और उस पर अक्षर लिखे जाते हैं।
सन इव खल पर बंधन करई । खाल कढ़ाइ बिपति सहि मरई॥
चौपाई १२
खल बिनु स्वारथ पर अपकारी । अहि मूषक इव सुनु उरगारी॥
अब दूसरा पौधा। सन। उसकी भी खाल खिंचती है, वह भी विपत्ति सहता है, और वह भी मर जाता है। सहने में रत्ती भर का अन्तर नहीं है। अन्तर केवल इसमें है कि उतरी हुई छाल का बनता क्या है। भूर्ज की छाल से पन्ना बनता है और सन की छाल से रस्सी, और रस्सी का काम बाँधना है।
यह पूरे पन्ने का सबसे कसा हुआ जोड़ा है। तुलसी संत और असंत को इससे नहीं पहचानते कि कौन कितना सहता है। वे इससे पहचानते हैं कि उस सहे हुए का बनता क्या है। और बाँधने की बात यहाँ अकारण नहीं है। यह प्रसंग शुरू ही एक गाँठ खोलने से हुआ था।
फिर दुष्ट का चित्र और नीचे उतरता है। वह बिना किसी स्वार्थ के दूसरों का अपकार करता है, साँप और चूहे की तरह। स्वार्थ भी नहीं। और यह उपमा किसे सुनायी जा रही है, यह भी देखिये। सुननेवाले को यहाँ सर्पों का शत्रु कहकर पुकारा गया है। जिसके आगे साँप की बात रखी जा रही है वह साँपों को जानता है, और उपमा उसी के जीवन से उठायी गयी है।
फिर दुष्टों का हश्र। वे पराये की सम्पत्ति नष्ट करके स्वयं नष्ट हो जाते हैं, जैसे खेती मारकर ओले गल जाते हैं। टीका इस ससि को खेती बताती है, और इसकी पुष्टि ठीक अगली पंक्ति करती है, जहाँ चन्द्रमा के लिये तुलसी दूसरा शब्द, इन्दु, बरतते हैं। ओले का चित्र बहुत सटीक है। ओला जब तक गिर रहा है तभी तक है। काम पूरा होते ही वह रह ही नहीं जाता।
और फिर उदय शब्द लगातार दो बार आता है, दो उलटी जगहों पर। दुष्ट का उदय जगत के दुख के लिये होता है, जैसे केतु का। संत का उदय सदा सुख के लिये, जैसे इन्दु और तमारी का। केतु छायाग्रह है, उसके सामने चन्द्रमा और सूर्य रखे गये हैं। और सूर्य को यहाँ तमारी कहा गया है, अन्धकार का शत्रु, यानी उसे उसके काम से पुकारा गया है। पन्ना जिस अन्धकार से लड़ता हुआ शुरू हुआ था, वह इस नाम में फिर आ जाता है।
सार: परोपकार संत का सहज स्वभाव है। संत भूर्ज के वृक्ष की तरह दूसरों के हित में विपत्ति सहते हैं, दुष्ट सन की तरह अपनी खाल खिंचवाकर मर जाते हैं पर उससे बनता बन्धन है। दुष्ट बिना स्वार्थ अपकार करते हैं, ओलों की तरह दूसरों को मारकर स्वयं मिट जाते हैं, और उनका उदय केतु का उदय है, जबकि संतों का उदय चन्द्रमा और सूर्य का।
सबसे बड़ा पुण्य, सबसे बड़ा पाप
पाँचवाँ और छठा उत्तर एक ही चौपाई की दो पंक्तियों में हैं, और उन्हें साथ रखकर पढ़ना ही उनका मतलब खोलता है। वेदों में अहिंसा परम धर्म कही गयी है, और परनिन्दा के समान भारी कोई पाप नहीं है।
पूछा भी ऐसे ही गया था। सुननेवाले ने कहा था कि श्रुतियों में प्रसिद्ध सबसे बड़ा पुण्य कौन-सा है, और उत्तर में वही शब्द लौटा दिया गया, श्रुति में विदित। प्रश्न की भाषा में उत्तर देना इस पूरे संवाद की आदत है।
इसके बाद निन्दा के फल गिनाये जाते हैं, और उन्हें पढ़ते समय एक बात पर ध्यान दीजिये। हर दण्ड एक शरीर है, और हर शरीर उस आदत का ही आकार है।
शंकर और गुरु का निन्दक मेढक होता है, और हज़ार जन्म तक वही देह पाता है। ब्राह्मणों का निन्दक बहुत से नरक भोगकर कौए का शरीर धरकर जन्म लेता है। देवताओं और वेदों की निन्दा करनेवाले अभिमानी रौरव नरक में पड़ते हैं। और सबकी निन्दा करनेवाले मूर्ख चमगादड़ होकर जन्म लेते हैं।
बीच में जो एक फल आता है, वह इस पूरी सूची का ताला खोल देता है। संतों की निन्दा में लगे हुए उल्लू होते हैं, और कारण साथ ही लिखा है: उन्हें मोहरूपी रात प्रिय होती है और ज्ञानरूपी सूर्य उनके लिये बीत चुका है। प्रिय। यह दण्ड नहीं है, यह पसन्द का दिया हुआ आकार है। जिसे रात अच्छी लगती थी उसे ऐसी आँखें मिल गयीं जो केवल रात में काम करती हैं।
और अगली ही पंक्ति में सम्बोधन बदल जाता है और पूरा सुर बदल जाता है। हे तात, अब मानस-रोग सुनिये, जिनसे सब लोग दुख पाते हैं। अभी तक शब्दावली नरक और जन्म की थी, दण्ड की थी। यहाँ से वह वैद्य की हो जाती है। तुलसी स्वयं डाँटना बन्द करके नाड़ी देखने बैठ जाते हैं, और आगे एक बार भी दण्ड का नाम नहीं लेते।
सार: वेदों में अहिंसा परम धर्म है और परनिन्दा के समान भारी पाप नहीं। शंकर और गुरु का निन्दक मेढक, ब्राह्मण का निन्दक कौआ, देव और वेद का निन्दक रौरव नरक का भागी, संत का निन्दक उल्लू जिसे मोह की रात प्रिय है, और सबका निन्दक चमगादड़ होता है। इसके बाद सुर बदलता है और मानस-रोगों की बात शुरू होती है।
मानस-रोग, और वह सूची जो पूरी नहीं होती
मोह सकल ब्याधिन्ह कर मूला। तिन्ह ते पुनि उपजहिं बहु सूला॥
चौपाई १३
काम बात कफ लोभ अपारा । क्रोध पित्त नित छाती जारा॥
पहली पंक्ति में जड़ बता दी जाती है। सब व्याधियों की जड़ मोह है, और उसी से बहुत से शूल पैदा होते हैं। इसके बाद जो सूची आती है वह ढीली उपमा नहीं है, वह ठीक-ठीक वैद्यक है, और यही उसकी ताक़त है।
काम वात है। लोभ अपार कफ है। क्रोध पित्त है, जो सदा छाती जलाता है। तीन दोष, और आयुर्वेद में शरीर के दोष भी यही तीन हैं। और जिन तीन शत्रुओं को सब गिनाते हैं, वे भी यही तीन हैं। दोनों सूचियाँ एक-दूसरे पर ठीक बैठ जाती हैं, और प्रत्येक जोड़ी में मिलान केवल संख्या का नहीं है।
वात हवा है, वह टिकती नहीं, इधर से उधर भागती है, और काम का चलन भी यही है। कफ जमता है, बढ़ता है, रास्ते बन्द करता है, और लोभ के साथ अपार शब्द इसीलिये जुड़ा है। पित्त जलाता है, और क्रोध के लिये तुलसी ने छाती जलने का ही मुहावरा लिया है, जो पित्त का असली लक्षण भी है। हर रोग अपने स्वभाव के कारण चुना गया है, नाम मिलाने के लिये नहीं।
और फिर वह पंक्ति जो किसी वैद्य को ही सूझ सकती थी। यदि ये तीनों भाई आपस में प्रीति कर लें तो दुखदायी सन्निपात उत्पन्न होता है। सन्निपात वैद्यक में वही अवस्था है जिसमें तीनों दोष एक साथ बिगड़ जाते हैं, और वही सबसे घातक मानी जाती है। इन्हें भाई कहना भी अपनी जगह पूरा चित्र है: तीनों एक ही घर के हैं और अकेले-अकेले भी बहुत कुछ कर लेते हैं, पर सबसे बड़ा नुक़सान तब होता है जब वे आपस में मिल जाते हैं।
इसके बाद कठिनता से पूरे होनेवाले विषयों के मनोरथ हैं, और वे सब शूल कहे गये हैं, ऐसे शूल जिनके नाम कोई नहीं जानता। सूची के बीच में ही यह मान लिया जाता है कि सूची पूरी नहीं होगी।
फिर भी वह चलती है, और चलते हुए एक-एक मिलान ठीक बैठता जाता है। ममता दाद है। ईर्ष्या खुजली है, और खुजली वह अकेला रोग है जिसे खुजाने में मीठा लगता है, जो ईर्ष्या का ठीक बरताव है। हर्ष और विषाद मिलकर गले के रोगों की अधिकता हैं, दोनों एक ही रोग गिने गये हैं, इसलिये बीमारी दोनों में से कोई एक नहीं, दोनों के बीच का झूलना है। पराये सुख को देखकर जो जलन होती है वही क्षयी है, और क्षय का अर्थ ही घुलना है: आग भीतर जलती है और देह बाहर घटती जाती है। दुष्टता और मन की कुटिलता कोढ़ है।
अगली चौपाई और भारी है। अहंकार अत्यन्त दुख देनेवाला डमरुआ रोग है, जिसे टीका गाँठ का रोग बताती है। जो पाठक इस पन्ने की पहली चौपाइयों से चलकर यहाँ तक आया है, उसने गाँठ शब्द पहले भी पढ़ा है। वहाँ एक गाँठ थी जिसे खोलने पर जीव कृतार्थ होता, और यहाँ अहंकार एक गाँठ की तरह उभरा हुआ रोग है।
दम्भ, कपट, मद और मान नहरुआ है, नसों का रोग, जो भीतर ही भीतर चलता है और ऊपर से दिखता नहीं। तृष्णा बहुत बड़ा उदरवृद्धि रोग है, यानी पेट का फूलना, जिसमें पेट बढ़ता जाता है और आदमी दुबला होता जाता है। तृष्णा का इससे ठीक चित्र नहीं हो सकता था: बरतन बड़ा होता जाता है और भरता कुछ नहीं।
और तीन प्रकार की प्रबल एषणाएँ, जिन्हें टीका पुत्र, धन और मान की इच्छा बताती है, प्रबल तिजारी हैं। तिजारी वह बुख़ार है जो तीसरे दिन लौट आता है। तीन इच्छाएँ, और बुख़ार भी वही जो तीन के हिसाब से लौटता है। अन्त में मत्सर और अविवेक, दो प्रकार के ज्वर।
फिर सूची रुकती है, पर पूरी नहीं होती। कहाँ तक कहूँ, अनेकों बुरे रोग हैं। कहनेवाला थकता नहीं, वह केवल यह मान लेता है कि इस गिनती का कोई सिरा नहीं है।
एक ब्याधि बस नर मरहिं ए असाधि बहु ब्याधि।
दोहा १२१ (क, ख)
पीड़हिं संतत जीव कहुँ सो किमि लहै समाधि॥ १२१ (क)॥
नेम धर्म आचार तप ग्यान जग्य जप दान।
भेषज पुनि कोटिन्ह नहिं रोग जाहिं हरिजान॥ १२१ (ख)॥
पहले आधे में जो तर्क है वह सीधा है और उसी से डर पैदा होता है। एक ही रोग के वश होकर मनुष्य मर जाते हैं, और ये तो बहुत से हैं, और असाध्य हैं। ये जीव को निरन्तर पीड़ा देते रहते हैं, तो वह समाधि पाये कैसे। असाधि और समाधि, दोनों शब्द एक ही दोहे में हैं और सुनने में लगभग एक जैसे हैं। जो चाहिये और जो रोक रहा है, दोनों की आवाज़ एक है।
और दूसरा आधा वह जगह है जहाँ यह प्रसंग अपनी पूरी यात्रा बन्द कर देता है। नियम, धर्म, आचार, तप, ज्ञान, यज्ञ, जप, दान, और इनके अलावा करोड़ों ओषधियाँ, इनमें से किसी से ये रोग नहीं जाते। सूची को धीरे पढ़िये। उसमें ज्ञान भी लिखा है।
पन्ना जिस दीपक से शुरू हुआ था, उसका नाम विज्ञानमय था। उसे एक आँचल की हवा बुझा गयी थी। बीच में वही ज्ञान आँख बना, फिर मथानी, फिर तलवार। और अन्तिम दोहे में वह उन ओषधियों में गिना जाता है जिनसे रोग नहीं जाते। यह उतार पाँच सीढ़ियों का है और पूरा इसी एक प्रसंग के भीतर उतरा है।
और उस सूची में एक नाम नहीं है। नियम है, धर्म है, आचार है, तप है, ज्ञान है, यज्ञ है, जप है, दान है, करोड़ों और भी हैं। भक्ति नहीं है। जिस शब्द पर इस पन्ने का बीच का पूरा हिस्सा खड़ा था, वह असफल ओषधियों की गिनती से बाहर रह जाता है।
पर ओषधि का नाम इन पंक्तियों में नहीं आता। यह प्रसंग निदान पर बन्द होता है, नुस्ख़े पर नहीं। रोग गिना दिये गये, उनका मूल बता दिया गया, जो दवाएँ काम नहीं करतीं वे भी गिना दी गयीं, और वहीं पन्ना समाप्त हो जाता है।
सार: सब रोगों की जड़ मोह है। काम वात, लोभ कफ और क्रोध पित्त है, और तीनों मिल जायँ तो सन्निपात। ममता, ईर्ष्या, हर्ष-विषाद, पर-सुख की जलन, दुष्टता, अहंकार, दम्भ, तृष्णा और तीन एषणाएँ सब अपने-अपने रोग हैं। एक रोग से मनुष्य मरता है, ये बहुत हैं और असाध्य हैं, और नियम, धर्म, तप, ज्ञान, यज्ञ, जप, दान तथा करोड़ों ओषधियों से नहीं जाते।
और अन्त में, अपनी ओर
इस पन्ने पर एक भी घटना नहीं घटती, और फिर भी इसे पढ़कर उठने पर कुछ हिला हुआ लगता है। इसका कारण शायद यह है कि तुलसी यहाँ किसी को हराते नहीं। न ज्ञान को, न इन्द्रियों को, न देवताओं को, न उस आदमी को जिसने पारसमणि गिरा दी। वे केवल हर चीज़ को उसकी सही जगह पर रख देते हैं, और जगह बदलने से ही सारा अर्थ बदल जाता है।
ज्ञान इस पन्ने पर कहीं झूठा नहीं कहा गया। कैवल्य को भी परमपद ही कहा गया है, उसे छोटा नहीं बताया गया। जो कहा गया वह यह है कि वह वस्तु धार पर रखी है और हवा बहुत तरह की चलती है। और उसके बगल में एक दूसरी वस्तु रख दी गयी जिसे हवा से बचाना नहीं पड़ता। दोनों में झगड़ा नहीं कराया गया। मणि और दीपक एक ही घर में, एक ही हृदय में रखे गये हैं।
दूसरी बात जो देर तक साथ रहती है, वह पहरेदारों की है। इस पन्ने की सबसे डरावनी पंक्ति कोई नरक नहीं है, कोई रोग नहीं है। वह पंक्ति है जिसमें किवाड़ भीतर से खोले जाते हैं, और खोलनेवाले वही हैं जिन्हें उन्हीं किवाड़ों पर बिठाया गया था। जो चीज़ें रक्षा के लिये रखी गयी थीं वही किसी और की प्रतीक्षा में बैठी हैं, और उन्हें कोई बाहर से ख़रीदने भी नहीं आया। उनकी प्रीति पहले से किसी और ओर है।
और आख़िरी बात, जो इस प्रसंग को पढ़कर बन्द करने पर सबसे आसानी से छूट जाती है। यहाँ उत्तर देनेवाला कहीं यह नहीं कहता कि उसने अपना कहा पूरा कर लिया। सातवें प्रश्न के बीच में ही वह मान लेता है कि सूची का कोई अन्त नहीं, और अन्तिम दोहे में वह जो कुछ गिनाता है वह भी काम न आनेवाली दवाओं की फ़ेहरिस्त है। सुननेवाले ने सात प्रश्न पूछे थे और संक्षेप माँगा था। उसे सात उत्तर मिल गये, और आख़िरी उत्तर उसके हाथ में एक खुली हुई बात छोड़ जाता है।
रामचरितमानस के इस हिस्से की ख़ूबी यही है कि वह डर को भी सलीक़े से रखता है। रोग गिनाये जाते हैं पर किसी पर उँगली नहीं उठती। जो सूची पढ़ी जा रही है उसमें ममता है, ईर्ष्या है, हर्ष और विषाद है, यानी वे चीज़ें जो हर दिन हर आदमी के भीतर चलती रहती हैं और जिन्हें कोई अपराध नहीं मानता। तुलसी उन्हें अपराध कहते भी नहीं। वे उन्हें रोग कहते हैं, और रोग के बारे में पहली बात यही होती है कि उसे पहचान लिया जाय।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, उत्तरकाण्ड, दोहा सोरठा ११७ (घ) से दोहा १२१, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।