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रामचरितमानसउत्तरकाण्डप्रसंग 21
भक्ति-चिंतामणि और मानस-रोग
एक दीपक जो आँचल की हवा से बुझ जाता है। एक मणि जिसे हवा से बचाना ही नहीं पड़ता। और अन्त में उन रोगों की सूची जिनकी ओषधि इस प्रसंग में नहीं आती।
इस प्रसंग में कोई युद्ध नहीं, कोई यात्रा नहीं, कोई नया पात्र नहीं: दो पक्षी बैठे हैं और एक दूसरे को समझा रहा है। शुरुआत एक दीपक से होती है, अन्त रोगों की एक लम्बी सूची पर, और बीच में वह मोड़ है जिसके लिये भुशुण्डि की यह बात याद रखी जाती है।
पहला हिस्सा ज्ञान का एक दीपक हृदय के घर में जलाता है और फिर उसे आँचल की हवा से बुझते हुए दिखाता है। दूसरा उसी हृदय में एक मणि रख देता है, जिसे किसी से बचाना नहीं पड़ता। तीसरे में सुननेवाला सात प्रश्न एक साथ रखता है, उत्तर उसी क्रम में आते हैं, और सातवाँ उत्तर एक वैद्य की सूची है।
ज्ञान शब्द यहाँ बार-बार आता है, और हर बार उसकी जगह बदलती है: पहले मंज़िल, जहाँ से गिरना होता है। फिर खान खोजने की आँख। फिर समुद्र मथने का मन्दराचल। फिर शत्रु मारने की तलवार। और अन्त में उन ओषधियों की सूची में, जिनसे रोग नहीं जाते।
कहनेवाला, पूछनेवाला और माया
- कहनेवाले इस प्रसंग में उनका नाम एक बार भी नहीं आता। पोद्दार की टीका उन्हें काकभुशुण्डि बताती है।
- गरुड़ सुननेवाले पक्षियों के राजा, जो आधे प्रसंग तक चुपचाप सुनते हैं और फिर सात प्रश्न एक साथ रखते हैं, वह भी अपने को सेवक कहकर।
- राम यहाँ उनका नाम किसी घटना में नहीं, केवल भजन के विषय की तरह आता है। मणि उन्हीं की भक्ति है, और उस मणि के मिलने के लिये कृपा भी उन्हीं की चाहिये।
- माया जो यहाँ किसी सिद्धान्त की तरह नहीं, एक पात्र की तरह बरतती है। वह देखती है, समय चुनती है, दूत भेजती है, और हलके से हलका शस्त्र उठाती है।
- संत और असंत गरुड़ के प्रश्नों के बाद के दो किरदार, जिन्हें आमने-सामने खड़ा करके नहीं, एक ही उपमा के दो सिरों पर रखकर पहचाना जाता है।
जो दीपक अभी-अभी जलाया गया है
यह प्रसंग एक वाक्य के बीच से उठता है। पहले शब्द हैं, इस प्रकार। और “इस प्रकार” पिछले प्रसंग में बताया जा चुका है, जहाँ इस दीपक के हिस्से एक-एक करके गिनाये गये थे। यहाँ उन सबको समेटकर एक ही छोटा-सा काम कहा जाता है: जलाइये।
दीपक तेज की राशि है, विज्ञानमय है। और क्रिया है जलाना: यह दीपक मिलता नहीं, जलाया जाता है। पहला हिस्सा इसी बात पर टिका रहता है कि यह वस्तु किसी की बनायी हुई है, और जो बनायी हुई है वह बुझायी भी जा सकती है।
फिर मद आदि पतंगे जल जाते हैं। पतंगा किसी का शत्रु नहीं, लड़ने नहीं आता। रोशनी की ओर खिंचकर आता है, और वही खिंचाव उसे मार देता है। भुशुण्डि मद को हराने का कोई उपाय नहीं बताते। इतना कहते हैं कि दीपक जल जाये, फिर जो पास आयेगा वह अपने ही आने से जलेगा, समीप जाते ही।
दीपक जल गया, अब लौ: वह कोई भावना नहीं, सोऽहमस्मि की वृत्ति है। टीका उसे अखण्ड इस अर्थ में खोलती है कि वह तेल की धार की तरह कभी टूटती नहीं। एक बार का अनुभव लौ नहीं, चिनगारी है, और चिनगारी से घर उजाला नहीं होता।
फिर प्रकाश फैलता है, और फैलते ही भेद का भ्रम मिट जाता है। अन्धकार को पहले हटाया नहीं जाता, प्रकाश पहले लाया जाता है: अविद्या के परिवार का, मोह आदि का, वह अपार अन्धकार अपने आप मिटता है। अन्धकार से लड़ा नहीं जाता, वह केवल हटता है।
और तब वह चित्र जिस पर आगे का प्रसंग टिका है: उजाला पाकर वही बुद्धि हृदयरूपी घर में बैठकर गाँठ खोलने लगती है। बैठकर, क्योंकि गाँठ खोलना खड़े-खड़े का काम नहीं। उसमें दोनों हाथ, रोशनी और धीरज चाहिये।
घर के झरोखे और उनके पहरेदार
अब एक शर्त आती है जो पूरे उत्तर का दरवाज़ा है: यदि वह बुद्धि गाँठ खोलने पाये, तब यह जीव कृतार्थ हो। और साथ ही बताया जाता है कि यह “यदि” क्यों लगा है: गाँठ खुलते हुए जानकर माया अनेक विघ्न करती है।
“जानकर”: यह शब्द माया को एक आँख दे देता है। वह तब नहीं आयी जब दीपक जलाया जा रहा था, तब भी नहीं जब बुद्धि बैठ रही थी। वह उस क्षण आती है जब गाँठ खुलने ही वाली है। विरोध सफलता के ठीक पहले उठता है।
पहला आक्रमण दीपक पर नहीं, बुद्धि पर होता है: माया बहुत-सी ऋद्धि-सिद्धियाँ भेजती है, जो आकर बुद्धि को लोभ दिखाती हैं। जो नीचे बैठकर गाँठ खोल रहा था, उसे ऊपर देखने पर मजबूर किया जाता है, और गाँठ खोलनेवाले के लिये इतना ही पर्याप्त है।
फिर तीन शब्द, जो एक पूरी रणनीति हैं: कल, बल और छल, कौशल, ज़ोर और धोखा। इतने साधन केवल पास पहुँचने के लिये। उसके बाद का काम इतना छोटा है कि शस्त्र नहीं चाहिये: आँचल हिला, हवा बनी, दीपक बुझ गया।
बचाव भी उतने ही कम शब्दों में है: यदि बुद्धि परम सयानी हुई, तो उन्हें अहितकर जानकर उनकी ओर ताकती ही नहीं। कोई युद्ध नहीं, कोई त्याग की घोषणा नहीं। केवल दृष्टि का न उठना। सयानेपन की परिभाषा यहाँ जानने में नहीं, न देखने में रखी गयी है।
यह विघ्न पार हुआ तो अगला ऊँचे दर्जे से आता है: अब देवता स्वयं उपाधि करते हैं। और वे जहाँ बैठे हैं, वह जगह सुनकर पूरा चित्र पलट जाता है।
घर वही है जिसमें बुद्धि बैठी थी। पर उसमें इन्द्रियों के अनेक झरोखे हैं, और हर झरोखे पर एक देवता थाना जमाये बैठा है। ये बाहर के आक्रमणकारी नहीं, भीतर के पहरेदार हैं: किवाड़ बाहर से नहीं तोड़े जाते, भीतर से खोले जाते हैं।
खोलने की क्रिया के साथ शब्द है हठपूर्वक: वे विषयरूपी हवा को आते देखते हैं और ज़िद करके किवाड़ खोल देते हैं। प्रतीक्षा उन्हीं की है, हवा की नहीं।
अब उस हवा के नाम: पहली बार वह आँचल की हवा थी। दूसरी बार विषय की बयार, एक हलकी बहार। और जैसे ही घर के भीतर पहुँचती है, वह आँधी हो जाती है, और उसी क्षण विज्ञान का दीपक बुझ जाता है। एक ही हवा, तीन नाम, हर नाम पिछले से बड़ा। हवा बढ़ी नहीं, केवल पास आयी है।
और हानि दो हैं: गाँठ भी नहीं छूटी, और प्रकाश भी मिट गया। ऊपर से बुद्धि विकल है। यह आरम्भ पर लौटना नहीं, उससे नीचे गिरना है।
फिर कारण आता है, और उसमें किसी की नीयत का दोष नहीं: इन्द्रियों और उनके देवताओं को ज्ञान सुहाता ही नहीं, क्योंकि उनकी प्रीति सदा से विषयभोग में है। सुहाना: यह शब्द इसी प्रसंग में एक बार और आता है, और तब पूरा पलट चुका होता है।
और इस हिस्से का अन्त प्रश्न पर होता है, उत्तर पर नहीं। बुद्धि को विषय की हवा ने बावला बना दिया, तो उस दीपक को उसी प्रकार दुबारा जलाये कौन? प्रश्न खुला छोड़ दिया जाता है, और अगली बात उसका उत्तर देने के बजाय उसे और भारी कर देती है।
तीन बार कठिन, और एक तलवार की धार
पहले परिणाम आता है: जीव फिर अनेक प्रकार से जन्म और मरण के क्लेश पाता है। और भगवान् की माया अत्यन्त दुस्तर है, वह तरी नहीं जाती। शब्द दुस्तर है, असम्भव नहीं। पर जिसका दीपक अभी बुझा है, उसके लिये यह भेद बहुत बड़ा नहीं रह जाता।
फिर एक ही साँस में एक शब्द तीन बार आता है। हर बार वह किसी और दरवाज़े पर लगता है: कहने में कठिन, समझने में कठिन, साधने में कठिन। विवेक तीन जगह चूक सकता है: कहनेवाला चूक सकता है, सुननेवाला चूक सकता है, और जिसने कह भी लिया और समझ भी लिया, वह करने में चूक सकता है।
और चौथी चोट। यदि घुणाक्षर न्याय से, यानी जैसे घुन लकड़ी काटते-काटते अनजाने में कोई अक्षर बना देता है, वैसे संयोग से यह ज्ञान हो भी जाये, तो फिर अनेक विघ्न हैं। यह कठिनाई पाने की नहीं, बचाने की है: दीपक जलाने का नहीं, जलाये रखने का नाम है।
मार्ग की उपमा के लिये भुशुण्डि कृपाण की धार लेते हैं, दुधारी तलवार का किनारा। यहाँ मार्ग और शस्त्र एक ही हैं, जिस पर पैर रखा जा रहा है वही काटता है, और धार पर कोई चौड़ाई नहीं जिस पर सँभला जा सके। जो इस मार्ग को बिना विघ्न निबाह ले जाता है, वह कैवल्य परमपद पाता है।
जो माँगी नहीं गयी, वही चली आती है
पहले चार गवाह खड़े किये जाते हैं, संत, पुराण, निगम और आगम, और चारों एक ही बात कहते हैं: कैवल्य परमपद अत्यन्त दुर्लभ है। इतनी बड़ी गवाही किसी बात को पक्का करने के लिये जुटायी जाती है। यहाँ वह अगली ही बात के आगे गिर जाती है।
क्योंकि भुशुण्डि आगे कहते हैं कि वही मुक्ति राम को भजने से बिना इच्छा किये आ जाती है, और आती भी है ज़बरदस्ती। मुक्ति उस आदमी पर ज़ोर करती है जिसने उसे नहीं माँगा। जो चारों प्रमाणों की गवाही में दुर्लभ थी, वह अब उसके पीछे पड़ी है जो उसकी ओर देख भी नहीं रहा।
आगे दो उपमाएँ इसे पक्का करती हैं, दोनों गृहस्थी की। पहली जल और थल की: जल स्थल के बिना ठहर नहीं सकता, चाहे करोड़ों उपाय कर लिये जायें। पानी को रोकने के लिये ज़मीन चाहिये। वैसे ही मोक्ष का सुख भगवान् की भक्ति को छोड़कर ठहर नहीं सकता: मोक्ष जल है, और भक्ति उसका थल।
यही विचारकर बुद्धिमान भक्त मुक्ति का निरादर कर देते हैं और भक्ति पर लुभाये रहते हैं। दूसरी उपमा इस निरादर को नरम कर देती है: भोजन तृप्ति के लिये किया जाता है, और उसे जठराग्नि अपने आप पचा देती है। कोई पाचन के लिये थाली पर नहीं बैठता। मुक्ति का निरादर इसी अर्थ में है: उसे लक्ष्य नहीं बनाया जाता।
और भक्ति करने से संसार की जड़ अविद्या बिना यत्न और बिना परिश्रम के नष्ट हो जाती है। जिसके लिये पहले दीपक जलाना पड़ा था और फिर भी एक आँचल सब ले उड़ा था, वह यहाँ अपने आप हो जाता है। जैसे खाया हुआ अन्न पच जाता है।
और फिर वह शब्द लौटता है: ऐसी सुगम और सुख देनेवाली भक्ति जिसे न सुहाये, ऐसा मूढ़ कौन होगा? इन्द्रियों और देवताओं को ज्ञान नहीं सुहाता था, और वह उनका स्वभाव कहा गया था, उस पर कोई दोष नहीं लगाया गया था। भक्ति जिसे न सुहाये, उसके लिये एक ही शब्द है, मूढ़। एक ही क्रिया, दो जगह, और दोनों जगह रुख़ अलग।
अब वह बात आती है जो पूरे उत्तर की कील है: सेवक और सेव्य का भाव, यानी “मैं सेवक और वे स्वामी”, इसके बिना संसार से तरना नहीं होता। ऐसा सिद्धान्त विचारकर राम के चरणों का भजन कीजिये। जो पार उतारता है वह कोई जानकारी नहीं, एक सम्बन्ध है। ज्ञान का मार्ग तलवार की धार था, क्योंकि वहाँ अकेले चलना था। सम्बन्ध में दो होते हैं, और गिरनेवाले को थामनेवाला भी उसी सम्बन्ध के भीतर खड़ा है।
फिर राम का सामर्थ्य दोनों दिशाओं में बताया जाता है। जो चेतन को जड़ कर दे और जड़ को चेतन, ऐसे समर्थ राम को जो जीव भजते हैं, वे धन्य हैं। उठा देना और गिरा देना, दोनों एक ही वाक्य में हैं।
वह मणि जिसे हवा से बचाना नहीं पड़ता
अब कहनेवाले स्वयं घोषणा करते हैं कि एक विषय पूरा हुआ और दूसरा शुरू हो रहा है। यहाँ वे अपने कहे को नाम देकर पीछे छोड़ते हैं।
भुशुण्डि कहते हैं: “ज्ञान का सिद्धान्त मैंने समझाकर कह दिया। अब भक्तिरूपी मणि की प्रभुता सुनिये। हे गरुड़, राम की भक्ति सुन्दर चिन्तामणि है, और वह जिसके हृदय के भीतर बसती है…” हृदय के भीतर: वही हृदय, वही घर। कमरा नहीं बदलता, कमरे का सामान बदलता है।
आगे भुशुण्डि दीपक की हर कमज़ोरी को एक-एक करके उठाकर उसके सामने मणि रख देते हैं। कोई तुलना घोषित नहीं की जाती, वही शब्द दुबारा बोल दिये जाते हैं।
पहला मिलान: दीपक को तेल, बत्ती और जलानेवाला हाथ चाहिये था। मणि दिन और रात परम प्रकाशरूप रहती है, और उसे दीया, घी और बत्ती कुछ नहीं चाहिये। दीपक को दुबारा जलाये कौन, यह प्रश्न यहाँ निरर्थक हो जाता है।
दूसरा मिलान: मोहरूपी दरिद्रता पास नहीं आती। मणि स्वयं धन है, और जहाँ धन रखा हो वहाँ दरिद्रता का कोई काम नहीं।
तीसरा मिलान नुकीला है: लोभ की हवा उसे बुझा नहीं सकती। यही दो शब्द पहले आ चुके हैं: ऋद्धि-सिद्धियाँ बुद्धि को लोभ दिखाकर आयी थीं और आँचल की हवा से दीपक बुझा गयी थीं। लोभ और हवा, दोनों यहाँ ज्यों के त्यों लौटते हैं, और इस बार कुछ नहीं कर पाते।
चौथा मिलान दो शब्दों में है, प्रबल अविद्या: यह जोड़ा पहले हिस्से में भी ठीक इसी तरह आया था, जब बुद्धि ने उजाला पाया था। वही प्रबल अविद्या, वही मिटना।
और पाँचवाँ: प्रसंग के आरम्भ में पतंगे जलते थे। यहाँ पतंगों का सारा समूह हारता है। पतंगा वही है, पर दीपक जिसे भस्म करता था, उसे मणि केवल हरा देती है। मणि का प्रकाश ठंडा है। उसे जीतने के लिये किसी को मारना नहीं पड़ता।
फिर काम आदि दुष्ट पास तक नहीं आते। इसके बाद वह बात आती है जो गरुड़ के सातवें प्रश्न का बीज है: बड़े-बड़े मानस-रोग, जिनके वश में होकर सब जीव दुखी हैं, उसे नहीं व्यापते। मानस-रोग शब्द यहाँ पहली बार आता है, और उत्तर बनकर। प्रश्न अभी पूछा ही नहीं गया।
उसी क्रम में दो बातें और: उसके लिये विष अमृत के समान हो जाता है, और शत्रु मित्र। बाहर की दुनिया वही रहती है, लेनेवाला बदल जाता है। उस मणि के बिना कोई सुख नहीं पाता, और जिसके हृदय में वह बसी है उसे स्वप्न में भी लेशमात्र दुख नहीं होता।
पर यहीं एक कड़वी बात भी, बिना सुलझाये, रख दी जाती है। मणि जगत में प्रकट है, छिपी नहीं, और फिर भी राम की कृपा के बिना कोई उसे नहीं पाता। उसके पाने के उपाय भी सुगम हैं, और फिर भी अभागे मनुष्य उन्हें ठुकरा देते हैं। एक ओर कृपा चाहिये, दूसरी ओर आदमी की अपनी ठोकर। दोनों वाक्य आमने-सामने हैं, और कोई दूसरे पर भारी नहीं किया गया।
पहाड़, खान, और खोदनेवाले
मणि प्रकट है और फिर भी नहीं मिलती, तो मिलेगी कैसे? इसका उत्तर एक पूरी खदान बनाकर दिया जाता है, जिसमें हर औज़ार का नाम लिया गया है।
वेद और पुराण पवित्र पर्वत हैं। राम की नाना कथाएँ उन पर्वतों में सुन्दर खानें हैं। संत मर्मी हैं, यानी वे जो जानते हैं कि सुरंग किस ओर जाती है। सुन्दर बुद्धि कुदाल है। और ज्ञान तथा वैराग्य दो नेत्र हैं।
इस सूची में ज्ञान की जगह बदल चुकी है: थोड़ी देर पहले वह कैवल्य तक का मार्ग था, तलवार की धार। यहाँ वह आँख है। आँख ज़रूरी है, पर खोदती नहीं: खोदती सुन्दर बुद्धि है, और जगह बताता मर्मी संत है।
फिर खोजने की शर्त एक ही है, और वह औज़ारों की सूची में नहीं। जो प्राणी भाव के साथ खोजता है, वही सब सुखों की खान इस भक्तिरूपी मणि को पाता है। “खान” शब्द दुबारा आया, और इस बार मणि के लिये: जिसे पर्वत की खान से निकाला गया, वह स्वयं एक खान निकली।
और यहीं भुशुण्डि एक क्षण के लिये उपदेश छोड़कर अपनी बात कह देते हैं। “मेरे मन में तो ऐसा विश्वास है कि राम के दास राम से भी बढ़कर हैं।” वे इसे शास्त्र नहीं कहते, प्रमाण नहीं देते। “मेरे मन में” कहते हैं, और “विश्वास”। इतनी बड़ी बात इतनी निजी तरह से कही गयी है।
पर अगली ही बात में इसका कारण आता है, और दोनों उपमाएँ पहुँचाने की हैं। राम समुद्र हैं और धीर संत मेघ: समुद्र में पानी अथाह है पर किसी के पीने का नहीं। मेघ वही पानी उठाकर मैदान तक पहुँचा देता है। राम चन्दन के वृक्ष हैं और संत पवन: सुगन्ध वृक्ष की है, पर वृक्ष कहीं जाता नहीं। पवन उसे उस आदमी तक ले आता है जो उस वन तक कभी नहीं पहुँचेगा।
इसलिये राम के दास का बढ़कर होना पद का नहीं, पहुँच का है। और पवन यहाँ लौटा है: पहले हिस्से में हवा ने दीपक बुझाया था। यहाँ वही पवन चन्दन की गन्ध लिये चला आ रहा है। हवा बुरी नहीं ठहरायी गयी। केवल यह दिखाया गया कि वह किस ओर से बह रही है।
फिर सब साधनों का फल एक ही बताया जाता है, सुन्दर भक्ति, और यह भी कि वह संत के बिना किसी को नहीं मिली। जो ऐसा विचारकर सत्संग करता है, उसके लिये राम की भक्ति सुलभ हो जाती है। सुलभ: थोड़ी देर पहले कैवल्य के लिये “अति दुर्लभ” चारों प्रमाणों की गवाही से बाँधा गया था। उसका उलटा शब्द यहाँ बिना गवाही के रख दिया गया है।
फिर समुद्रमन्थन आता है। उसमें भी हर हिस्सा बँटा हुआ: ब्रह्म समुद्र है, ज्ञान मन्दराचल है, संत देवता हैं, और मथकर जो निकलता है वह कथारूपी अमृत है। भक्ति उस अमृत की मधुरता है।
मधुरता अमृत के भीतर कोई अलग वस्तु नहीं जिसे बाद में डाला गया हो। वह अमृत का गुण है। तो भक्ति कथा के बाद मिलनेवाला कोई इनाम नहीं: जो कथा सुनी जा रही है, मिठास उसी में घुली है।
फिर चित्र युद्ध का हो जाता है: वैराग्य ढाल है, ज्ञान तलवार है, और तीन शत्रु मारे जाते हैं, मद, लोभ और मोह। तीनों नाम पहले आ चुके हैं: मद आरम्भ में पतंगा था। लोभ वह हवा था जिसने दीपक बुझाया। मोह वह दरिद्रता था जो मणि के पास नहीं आती। यह कोई नयी सूची नहीं, अपनी ही पुरानी सूची का बन्द होना है।
और विजय किसकी है, यह भी साफ़ है: ढाल वैराग्य की, तलवार ज्ञान की, और जय भक्ति पाती है। भुशुण्डि गरुड़ से कहते हैं: “विचारकर देखिये।” लड़नेवाला हथियार उठाता है, पर जीत हथियार की नहीं होती।
गरुड़ के सात प्रश्न
गरुड़ प्रेम के साथ बोलते हैं: “हे कृपालु, यदि मुझ पर आपका प्रेम है, तो हे नाथ, मुझे अपना सेवक जानकर मेरे सात प्रश्नों के उत्तर बखानकर कहिये।” पहले शर्त नहीं, प्रार्थना। फिर अपना परिचय, और उसमें वही शब्द जो अभी कहा जा चुका है, सेवक। सेवक और सेव्य का भाव, जिसके बिना संसार से तरना नहीं होता, सुननेवाले ने सिद्धान्त की तरह नहीं, माँगने के ढंग की तरह ले लिया।
और माँग सात प्रश्नों की है, गिनकर कहे गये। आगे के उत्तर इसी क्रम में आते हैं।
गरुड़ पूछते हैं: “पहला, सबसे दुर्लभ शरीर कौन-सा है? दूसरा, सबसे बड़ा दुख कौन है? तीसरा, सबसे बड़ा सुख कौन है? चौथा, संत और असंत का मर्म आप जानते हैं, उनका सहज स्वभाव बताइये। पाँचवाँ, श्रुतियों में प्रसिद्ध सबसे बड़ा पुण्य कौन-सा है? छठा, सबसे भयंकर पाप कौन-सा है? और सातवाँ, मानस-रोग समझाकर कहिये।”
पूछने के ढंग में दो बातें और हैं: वे विचारकर और संक्षेप में उत्तर माँगते हैं। और मानस-रोग का नाम, जो मणि की प्रशंसा के बीच बिना समझाये निकला था, सुननेवाले ने पकड़ रखा था।
भुशुण्डि कहते हैं: “हे तात, आदर और अत्यन्त प्रीति के साथ सुनिये। मैं यह नीति संक्षेप में कहता हूँ।” जो माँगा गया था वही दिया जाता है, संक्षेप। और जो कहा जा रहा है उसे सिद्धान्त नहीं, ज्ञान नहीं, नीति कहा गया है। इतने दर्शन के बाद अगला हिस्सा बरतने की बात के रूप में रखा जाता है।
सबसे दुर्लभ देह, और उसका सौदा
पहला उत्तर थोड़े में पूरा हो जाता है: मनुष्य-शरीर के समान कोई शरीर नहीं, और चर तथा अचर सभी जीव उसी की याचना करते हैं। याचना, यानी माँगते हैं, हाथ फैलाते हैं: यह शब्द मनुष्य-देह को ऐसी वस्तु बना देता है जिसके लिये दुनिया में क़तार लगी है।
और उसकी विशेषता ऊँचाई की नहीं: यह देह नरक, स्वर्ग और मोक्ष की सीढ़ी है, और कल्याणकारी ज्ञान, वैराग्य तथा भक्ति देनेवाला है। सीढ़ी दोनों ओर चलती है, और तीनों में नरक का नाम पहले है। मनुष्य-देह को ऊँचा स्थान नहीं, चलने का साधन कहा गया है, और साधन का मूल्य इसी में है कि वह जहाँ चाहे ले जाये।
जो उस देह को पाकर भी भजन नहीं करते, विषयों में रत होकर नीच से नीच होते जाते हैं, वे काँच के टुकड़े बदले में लेते हैं। और पारसमणि हाथ से डालकर देते हैं। फेंकना पहले है, सौदा बाद में: कोई उनसे छीनने नहीं आया, किसी ने ठगा नहीं। हाथ उन्होंने ही खोला।
और मणि पारस है, जिसकी क़ीमत चमक में नहीं, दूसरी धातु को बदल देने में है। यहाँ तीन पत्थर हैं: चिन्तामणि जो माँगा हुआ देती है, पारसमणि जो छूकर बदल देती है, और काँच का टुकड़ा जो केवल उन दोनों जैसा दिखता है।
दूसरा और तीसरा प्रश्न एक ही वाक्य में निबट जाते हैं। दोनों उत्तर चौंकाते हैं: जगत में दरिद्रता के समान दुख नहीं, और संतों के मिलने के समान सुख नहीं। दुख में मृत्यु, रोग या अपमान नहीं गिना गया, दरिद्रता गिनी गयी है।
यह उत्तर ठीक उस आदमी के बाद रखा है जिसने पारसमणि गिराकर काँच ले लिया। दोनों बातें जोड़ी नहीं गयीं, केवल इस क्रम में रखी गयी हैं।
दोनों बातों की बनावट आमने-सामने है: एक जगत् का सबसे बड़ा दुख बताती है, दूसरी सबसे बड़ा सुख। सबसे बड़ा दुख किसी चीज़ का न होना है, और सबसे बड़ा सुख किसी से मिलना: एक अभाव है, दूसरा संगति।
भोजपत्र और सन
चौथे प्रश्न का उत्तर एक वाक्य में बँधा है और फिर देर तक खुलता है। हे गरुड़, मन, वचन और शरीर से परोपकार करना, यही संतों का सहज स्वभाव है। सहज: यह शब्द उत्तर को संकल्प से हटाकर स्वभाव की श्रेणी में डाल देता है। ठीक वैसे ही जैसे पहले हिस्से में इन्द्रियों के देवताओं की विषयों में प्रीति उनका स्वभाव कही गयी थी। दोनों जगह किसी की नीयत पर मुक़दमा नहीं चलता।
फिर भेद बताया जाता है, और भेद दुख से नहीं: संत दूसरों की भलाई के लिये दुख सहते हैं, अभागे असंत दूसरों को दुख पहुँचाने के लिये। सहना दोनों तरफ़ बराबर है।
यही बात दो पौधों से साबित की जाती है। पहला भोज का वृक्ष है: कृपालु संत भोज के वृक्ष के समान दूसरों के हित के लिये बड़ी विपत्ति सहते हैं। टीका इसे खोलकर कहती है कि वह अपनी खाल तक उधड़वा लेता है। और भोजपत्र की छाल पर अक्षर लिखे जाते हैं।
अब दूसरा पौधा, सन: दुष्ट सन की तरह दूसरों को बाँधते हैं। उसकी भी खाल खिंचती है, वह भी विपत्ति सहता है, और वह भी मर जाता है। सहने में रत्ती भर का अन्तर नहीं। अन्तर केवल इसमें है कि उतरी हुई छाल का बनता क्या है। भोज की छाल से पन्ना बनता है और सन की छाल से रस्सी, और रस्सी का काम बाँधना है।
संत और असंत इससे नहीं पहचाने जाते कि कौन कितना सहता है, इससे कि सहे हुए का बनता क्या है। और बाँधने की बात यहाँ अकारण नहीं, यह प्रसंग शुरू ही एक गाँठ खोलने से हुआ था।
फिर दुष्ट का चित्र और नीचे उतरता है: वह बिना किसी स्वार्थ के दूसरों का अपकार करता है, साँप और चूहे की तरह। और यह उपमा जिसे सुनायी जा रही है, उसे यहाँ सर्पों का शत्रु कहकर पुकारा गया है। वह साँपों को जानता है, और उपमा उसी के जीवन से उठायी गयी है।
फिर दुष्टों का हश्र: वे पराये की सम्पत्ति नष्ट करके स्वयं नष्ट हो जाते हैं, जैसे खेती मारकर ओले गल जाते हैं। ओला जब तक गिर रहा है तभी तक है। काम पूरा होते ही वह रह ही नहीं जाता।
फिर उदय शब्द दो बार आता है, उलटी जगहों पर: दुष्ट का उदय जगत के दुख के लिये होता है, जैसे केतु का। संत का उदय सदा सुख के लिये, जैसे चन्द्रमा और सूर्य का। केतु छायाग्रह है, उसके सामने चन्द्रमा और सूर्य रखे गये हैं। सूर्य को यहाँ तमारी, अन्धकार का शत्रु, कहा गया है: जिस अन्धकार से लड़ती हुई बात शुरू हुई थी, वह इस नाम में फिर आ जाता है।
सबसे बड़ा पुण्य, सबसे बड़ा पाप
पाँचवाँ और छठा उत्तर एक साथ आते हैं। साथ रखने पर ही वे खुलते हैं: वेदों में अहिंसा परम धर्म कही गयी है, और परनिन्दा के समान भारी कोई पाप नहीं।
पूछा भी ऐसे ही गया था: सुननेवाले ने श्रुतियों में प्रसिद्ध पुण्य पूछा था, और उत्तर में वही शब्द लौटा, श्रुति में विदित। प्रश्न की भाषा में उत्तर देना इस संवाद की आदत है।
इसके बाद निन्दा के फल गिनाये जाते हैं, और हर दण्ड एक शरीर है, और हर शरीर उस आदत का ही आकार है।
शिव और गुरु का निन्दक मेढक होता है, और हज़ार जन्म तक वही देह पाता है। ब्राह्मणों का निन्दक बहुत-से नरक भोगकर कौए का शरीर धरकर जन्म लेता है। देवताओं और वेदों की निन्दा करनेवाले अभिमानी रौरव नरक में पड़ते हैं। और सबकी निन्दा करनेवाले मूर्ख चमगादड़ होकर जन्म लेते हैं।
बीच में जो एक फल आता है, वह पूरी सूची का ताला खोल देता है: संतों की निन्दा में लगे हुए उल्लू होते हैं। कारण साथ ही लिखा है, उन्हें मोहरूपी रात प्रिय होती है और ज्ञानरूपी सूर्य उनके लिये बीत चुका है। प्रिय: यह दण्ड पसन्द का दिया हुआ आकार है। जिसे रात अच्छी लगती थी, उसे ऐसी आँखें मिल गयीं जो केवल रात में काम करती हैं।
और फिर सम्बोधन बदलता है, और पूरा सुर बदल जाता है। भुशुण्डि कहते हैं: “हे तात, अब मानस-रोग सुनिये, जिनसे सब लोग दुख पाते हैं।” अब तक शब्दावली नरक, जन्म और दण्ड की थी। यहाँ से वह वैद्य की हो जाती है। कहनेवाला डाँटना बन्द करके नाड़ी देखने बैठ जाता है, और आगे एक बार भी दण्ड का नाम नहीं लेता।
मानस-रोग, और वह सूची जो पूरी नहीं होती
पहली ही बात जड़ बता देती है: सब व्याधियों की जड़ मोह है, और उसी से बहुत-से शूल पैदा होते हैं। इसके बाद की सूची ढीली उपमा नहीं, ठीक-ठीक वैद्यक है, और यही उसकी ताक़त है।
काम वात है। लोभ अपार कफ है। क्रोध पित्त है, जो सदा छाती जलाता है। तीन दोष, और आयुर्वेद में शरीर के दोष भी यही तीन हैं। और जिन तीन शत्रुओं को सब गिनाते हैं, वे भी यही तीन। दोनों सूचियाँ एक-दूसरे पर ठीक बैठ जाती हैं, और हर जोड़ी में मिलान केवल संख्या का नहीं।
वात हवा है, टिकती नहीं, और काम का चलन भी यही है। कफ जमता है, रास्ते बन्द करता है, और लोभ के साथ “अपार” है। पित्त जलाता है, और क्रोध के लिये भुशुण्डि छाती जलने का मुहावरा लेते हैं।
और फिर वह बात जो किसी वैद्य को ही सूझ सकती थी। यदि ये तीनों भाई आपस में प्रीति कर लें, तो दुखदायी सन्निपात उत्पन्न होता है, वह अवस्था जिसमें तीनों दोष एक साथ बिगड़ जाते हैं। तीनों एक ही घर के भाई हैं, और बड़ा नुक़सान तब होता है जब आपस में मिल जाते हैं।
इसके बाद कठिनता से पूरे होनेवाले विषयों के मनोरथ हैं, और वे सब शूल कहे गये हैं, ऐसे शूल जिनके नाम कोई नहीं जानता। सूची के बीच में ही मान लिया जाता है कि सूची पूरी नहीं होगी।
फिर भी वह चलती है, और एक-एक मिलान ठीक बैठता जाता है। ममता दाद है। ईर्ष्या खुजली है, जो खुजाने में मीठी लगती है, और यही ईर्ष्या का बरताव है। हर्ष और विषाद मिलकर गले के रोगों की अधिकता हैं। दोनों एक ही रोग गिने गये हैं, इसलिये बीमारी इनमें से कोई एक नहीं, दोनों के बीच का झूलना है। पराये सुख को देखकर जो जलन होती है वही क्षयी है, और क्षय का अर्थ ही घुलना है: आग भीतर जलती है और देह बाहर घटता जाता है। दुष्टता और मन की कुटिलता कोढ़ है।
आगे की बात और भारी है। अहंकार अत्यन्त दुख देनेवाला डमरू रोग है, जिसे टीका गाँठ का रोग बताती है। गाँठ शब्द दीपक वाली बात में भी था: वहाँ एक गाँठ थी जिसे खोलने पर जीव कृतार्थ होता, और यहाँ अहंकार एक गाँठ की तरह उभरा हुआ रोग है।
दम्भ, कपट, मद और मान नहरुआ है, नसों का रोग, जो भीतर ही भीतर चलता है और ऊपर से दिखता नहीं। तृष्णा बहुत बड़ा उदरवृद्धि रोग है, पेट का फूलना, जिसमें पेट बढ़ता जाता है और आदमी दुबला होता जाता है: बरतन बड़ा होता जाता है, और भरता कुछ नहीं।
और तीन प्रकार की प्रबल एषणाएँ, जिन्हें टीका पुत्र, धन और मान की इच्छा बताती है, प्रबल तिजारी हैं, वह बुख़ार जो तीसरे दिन लौट आता है। तीन इच्छाएँ, और बुख़ार भी तीन के हिसाब से लौटनेवाला। अन्त में मत्सर और अविवेक, दो प्रकार के ज्वर।
फिर सूची रुकती है, पर पूरी नहीं होती। भुशुण्डि कहते हैं: “कहाँ तक कहूँ, अनेक बुरे रोग हैं।” कहनेवाला थकता नहीं। केवल मान लेता है कि इस गिनती का कोई सिरा नहीं है।
अब तर्क सीधा है। उसी से डर पैदा होता है: एक ही रोग के वश होकर मनुष्य मर जाते हैं, और ये तो बहुत-से हैं, और असाध्य हैं। ये जीव को निरन्तर पीड़ा देते रहते हैं, तो वह समाधि पाये कैसे? असाध्य और समाधि, दोनों शब्द पास-पास, सुनने में लगभग एक जैसे: जो चाहिये और जो रोक रहा है, दोनों की आवाज़ एक है।
और फिर यह प्रसंग अपनी पूरी यात्रा बन्द कर देता है। हे गरुड़, नियम, धर्म, आचार, तप, ज्ञान, यज्ञ, जप, दान, और इनके अलावा करोड़ों ओषधियाँ, इनमें से किसी से ये रोग नहीं जाते। इस सूची में ज्ञान भी लिखा है।
भुशुण्डि का उत्तर जिस विज्ञानमय दीपक से शुरू हुआ था, उसे एक आँचल की हवा बुझा गयी थी। बीच में वही ज्ञान आँख बना, फिर मन्दराचल, फिर तलवार। और अन्त में वह उन ओषधियों में गिना जाता है जिनसे रोग नहीं जाते।
और उस सूची में एक नाम नहीं है। नियम, धर्म, आचार, तप, ज्ञान, यज्ञ, जप, दान, करोड़ों और भी। भक्ति नहीं है। जिस शब्द पर इस प्रसंग का बीच का पूरा हिस्सा खड़ा था, वह असफल ओषधियों की गिनती से बाहर रह जाता है।
पर ओषधि का नाम इस प्रसंग में नहीं आता। यह प्रसंग निदान पर बन्द होता है, नुस्ख़े पर नहीं: रोग गिना दिये गये, उनका मूल बता दिया गया, जो दवाएँ काम नहीं करतीं वे भी गिना दी गयीं। और वहीं यह प्रसंग समाप्त हो जाता है।
सही जगह पर रखी हर चीज़
दो पक्षियों की इस बातचीत में एक भी घटना नहीं घटती। यह किसी को हराती नहीं: न ज्ञान को, न इन्द्रियों को, न देवताओं को, न उस आदमी को जिसने पारसमणि गिरा दी। हर चीज़ अपनी सही जगह पर रख दी जाती है, और जगह बदलने से ही सारा अर्थ बदल जाता है।
ज्ञान यहाँ झूठा नहीं कहा गया, कैवल्य भी परमपद ही कहा गया है। कहा यह गया कि वह धार पर रखा है और हवा बहुत तरह की चलती है। उसके बगल में एक दूसरी वस्तु रख दी गयी, जिसे हवा से बचाना नहीं पड़ता, और मणि और दीपक एक ही हृदय में रहते हैं।
दूसरी बात पहरेदारों की है। यहाँ की डरावनी बात कोई नरक या रोग नहीं, वह है जिसमें किवाड़ भीतर से खोले जाते हैं, उन्हीं के हाथों जिन्हें किवाड़ों पर बिठाया गया था। और उन्हें कोई बाहर से ख़रीदने भी नहीं आया: उनकी प्रीति पहले से किसी और ओर है।
और आख़िरी बात: उत्तर देनेवाला कहीं नहीं कहता कि उसने अपना कहा पूरा कर लिया। सुननेवाले ने सात प्रश्न पूछे थे और संक्षेप माँगा था। उसे सात उत्तर मिले, और आख़िरी उत्तर, काम न आनेवाली दवाओं की फ़ेहरिस्त, उसके हाथ में एक खुली बात छोड़ जाता है।
रामचरितमानस का यह हिस्सा डर को भी सलीक़े से रखता है: रोग गिनाये जाते हैं, पर किसी पर उँगली नहीं उठती। सूची में ममता है, ईर्ष्या है, हर्ष और विषाद है, यानी वे चीज़ें जो हर दिन हर आदमी के भीतर चलती रहती हैं और जिन्हें कोई अपराध नहीं मानता। भुशुण्डि भी उन्हें अपराध नहीं, रोग कहते हैं, और रोग के बारे में पहली बात यही होती है कि उसे पहचान लिया जाये।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, उत्तरकाण्ड, सोरठा 117 (घ) से दोहा 121, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।