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उमा का संदेह

रामचरितमानस · उत्तरकाण्ड · उमा का संदेह

उमा का संदेह

एक स्तुति पूरी होती है और उसके साथ ही अयोध्या पन्ने से उठ जाती है। कैलास पर बैठा हुआ कहनेवाला अपनी कही हुई कथा का हिसाब देता है, सुननेवाली के भीतर एक प्रश्न जाग उठता है, और उस प्रश्न का उत्तर देने के लिये उसे बहुत पीछे, अपने ही सबसे दुखी दिनों तक लौटना पड़ता है।

यह पन्ना एक गीत के बीच से खुलता है। कोई पहले से गा रहा है और हम बीच में आकर सुनने लगते हैं, जैसे किसी सभा में देर से पहुँचे हों। गानेवाले का नाम चार चौपाई बाद, दोहे में आता है, मुनि नारद। और उसी दोहे में वे चले भी जाते हैं। उनके जाते ही इस काण्ड का पूरा ढाँचा बदल जाता है, और यह बदलाव किसी घटना से नहीं आता। कोई युद्ध नहीं होता, कोई सभा नहीं जुड़ती, कोई आता या जाता नहीं। बदलाव एक प्रश्न से आता है।

रामचरितमानस कौन सुना रहा है, यह बात इस ग्रन्थ के भीतर हमेशा से मालूम रही है। शंकर कहते हैं और उमा सुनती हैं। पर अब तक वह ढाँचा पीछे रहा है, पर्दे के पीछे की उन रस्सियों की तरह जिन्हें कोई देखता नहीं और जिनसे पर्दा चलता रहता है। इस पन्ने पर वे रस्सियाँ सामने आ जाती हैं। कहनेवाला अपनी कही हुई कथा का हिसाब देता है, सुननेवाली से पूछता है कि अब क्या कहूँ, और सुननेवाली के पास पूछने को बहुत कुछ निकल आता है। यहाँ से आगे का उत्तरकाण्ड घटनाओं से नहीं, उत्तरों से चलेगा।

और जो प्रश्न यहाँ पूछे जाते हैं, उनमें एक ऐसा है जिसे पूछनेवाली स्वयं संदेह कहती हैं। किसी के पास वैराग्य है, ज्ञान है, विज्ञान है, राम के चरणों में अत्यन्त प्रेम है, और भक्ति भी है, और वह कौआ है। सारा अटकाव इसी जोड़ पर है। दूसरा प्रश्न इससे भी बारीक है, कि जिसके पास यह सब है उसके पास सुनने कोई और क्यों गया, और वह कोई और गरुड़ हैं। इस पन्ने पर गरुड़ का ज़िक्र पाँच बार आता है, पाँच अलग नामों से, और वे स्वयं एक बार भी नहीं आते। उनकी कथा अगले पन्ने की है, और इस पन्ने पर उसकी केवल छाया पड़ती है।

इस प्रसंग के मुख्य किरदार

  • नारद वे मुनि जिनकी स्तुति से यह पन्ना खुलता है और जो उसे पूरा करके ब्रह्मा के धाम को लौट जाते हैं।
  • शंकर इस पूरी कथा के कहनेवाले, जो इस पन्ने पर पहली बार अपने कहे हुए का हिसाब देते हैं और फिर अपनी ही कथा के भीतर उतर जाते हैं।
  • उमा सुननेवाली, जिनके चार प्रश्नों पर यहाँ से आगे का सारा काण्ड टिका हुआ है। पहले जन्म में उनका नाम सती था और वह जन्म इसी पन्ने पर लौटकर आता है।
  • काकभुशुण्डि वह कौआ जिसके पास वैराग्य, ज्ञान, विज्ञान और भक्ति सब है, और जिसका शरीर इस पन्ने का सबसे बड़ा प्रश्न बन जाता है।
  • गरुड़ पक्षियों के राजा, हरि के सेवक और उनके सबसे निकट रहनेवाले, जिनका नाम यहाँ पाँच बार आता है और जो आते एक बार भी नहीं।

गाना पूरा होता है

स्तुति के बीच में आकर सबसे पहले जो चीज़ कान में पड़ती है वह अर्थ नहीं, भाषा है। पहली पंक्ति अवधी में नहीं है। वह संस्कृत में है, और वह इस पूरे पन्ने की सबसे ऊँचे सुर में बँधी हुई पंक्ति है। गानेवाला मुनि है, सुननेवाला राजसभा में बैठा हुआ है, और गाना उसी सुर से उठता है जिस सुर से कोई पुराना मन्त्र उठता है।

मामवलोकय पंकज लोचन। कृपा बिलोकनि सोच बिमोचन॥
नील तामरस स्याम काम अरि। हृदय कंज मकरंद मधुप हरि॥

चौपाई १

मेरी ओर देख लीजिये, हे कमल जैसी आँखोंवाले। आपकी कृपा की एक दृष्टि ही सोच से छुड़ा देती है। और फिर वह उपमा, जिसमें दो देवता एक ही आधी पंक्ति में आ जाते हैं। आप नील कमल के समान श्यामवर्ण हैं, और आप उस हृदयकमल के भौंरे हैं जो कामदेव के शत्रु का है। यानी जिनका ध्यान महादेव करते हैं, नारद उन्हीं से कह रहे हैं कि आप महादेव के हृदय में भौंरे की तरह बसे हुए हैं। और यह वाक्य ठीक उस पन्ने पर रखा गया है जिस पन्ने पर कुछ ही देर बाद महादेव स्वयं बोलने लगेंगे। स्तुति अपने अगले वक्ता का नाम पहले ही ले चुकी है।

इसके बाद स्तुति बीच में क्या करती है, यह देखने लायक है। वह पूरी रामकथा को कुछ नामों में समेट देती है और आगे बढ़ जाती है। राक्षसों की सेना के बल को तोड़नेवाले। बाहुबल से पृथ्वी का भारी बोझ मिटानेवाले। खर, दूषण और विराध के वध में निपुण। रावण के शत्रु। दशरथ के कुलरूपी कुमुदिनी के चन्द्रमा। जितनी कथा में बरसों बीते, वह यहाँ कुछ ही शब्दों में निपट जाती है, और गिनाने का यह ढंग जान-बूझकर तेज़ रखा गया है, क्योंकि स्तुति का असली ख़र्च कहीं और होना है।

वह ख़र्च कर्मों पर नहीं, स्वभाव पर होता है। मुनियों और सज्जनों को आनन्द देनेवाले। पापों के नाश करनेवाले। ब्राह्मणरूपी खेती के लिये नये मेघों का समूह। करुणा करनेवाले। झूठे मद का नाश करनेवाले। और वह पंक्ति जो इन सबमें सबसे नीचे झुककर खड़ी है, असरन सरन दीन जन गाहक, जिनकी कोई शरण नहीं उनकी शरण, और दीन जनों को अपने आश्रय में ले लेनेवाले। एक ओर वध और भार-हरण, दूसरी ओर शरण और आश्रय, और स्तुति का तौल दूसरी ओर झुका हुआ है।

और जहाँ गिनाना ख़त्म होता है, वहाँ यह गाना दो काम एक साथ कर जाता है। वह कर्मों से हटकर नाम पर आ जाता है, और वह अपने गानेवाले को चुपचाप बदल देता है।

कलि मल मथन नाम ममताहन । तुलसिदास प्रभु पाहि प्रनत जन॥

चौपाई २

आपका नाम कलियुग के मैल को मथ डालनेवाला है और ममता को मारनेवाला है। हे तुलसीदास के प्रभु, शरण में आये हुए जन की रक्षा कीजिये। ध्यान दीजिये कि यह स्तुति नारद गा रहे हैं, और उसकी आख़िरी पंक्ति में जो नाम आता है वह तुलसीदास का है। जिसने यह पूरा गीत लिखा, वह अपने को उसके अन्तिम शब्दों में रख देता है और गानेवाले के मुँह से अपने लिये माँग लेता है। और माँग सबसे छोटी है। सिद्धि नहीं, दर्शन नहीं, मुक्ति नहीं। पाहि प्रनत जन, बस इतना, कि जो शरण में आ गया है उसे बचा लीजिये।

इस जोड़ पर एक बात और है। इसी पंक्ति में नाम को ममताहन कहा गया है, ममता को मारनेवाला। यानी जिस चीज़ को यह नाम मारता है वह मेरापन है। और ठीक अगले दोहे में गानेवाला अपने साथ कुछ लेकर जाता है, और तुलसी उसे बड़े ध्यान से कहते हैं।

प्रेम सहित मुनि नारद बरनि राम गुन ग्राम।
सोभासिंधु हृदयँ धरि गए जहाँ बिधि धाम॥ ५१॥

दोहा ५१

प्रेम सहित रामजी के गुणसमूहों का वर्णन करके मुनि नारद शोभा के समुद्र को हृदय में धरकर वहाँ चले गये जहाँ ब्रह्मा का धाम है। इस दोहे में दो क्रियाएँ हैं और उनके बीच का सम्बन्ध ही सब कुछ है। बरनि, वर्णन करके। धरि, धरकर। पहले उन्होंने भीतर का सब बाहर उँडेल दिया, फिर बाहरवाले को भीतर रख लिया। जो अपना सारा गाना गा चुका, वह ख़ाली होकर नहीं लौटता।

और जो वे साथ ले जा रहे हैं वह कोई वर नहीं है। पिछले पन्नों पर माँगना हो चुका था, यहाँ माँगना नहीं है। वे एक रूप ले जा रहे हैं, हृदय में रखा हुआ। ममता को मारनेवाले नाम के ठीक बाद हृदय में कुछ रख लेना, यह विरोध नहीं है। मेरापन हटने पर जगह ख़ाली नहीं रहती, उसमें कोई और आ बैठता है, और यह पूरा काण्ड आगे इसी एक बात को खोलने में लगेगा।

सार: नारद की स्तुति संस्कृत की एक पंक्ति से उठती है, रामकथा के कर्मों को कुछ ही शब्दों में समेटकर उनके स्वभाव पर ठहर जाती है, और अन्त में नाम की महिमा कहकर तुलसीदास का अपना नाम ले लेती है। फिर दोहा ५१ में नारद रामजी के गुण गाकर, शोभा के समुद्र को हृदय में रखकर ब्रह्मा के धाम को लौट जाते हैं।

कहनेवाला अपनी कथा का हिसाब देता है

नारद के जाते ही पन्ने पर कोई नहीं बचता। अयोध्या यहीं छूट जाती है, और इस पन्ने पर उसका नाम फिर एक बार भी नहीं आता। और तभी एक आवाज़ सुनायी देती है जो इस पूरे ग्रन्थ के नीचे शुरू से बह रही थी। जो अब बोल रहा है वह उस सभा में कभी था ही नहीं। वह कहीं और बैठा है, किसी और से बोल रहा है, और अब तक जो कुछ हमने देखा वह उसी के कहने से देखा था।

गिरिजा सुनहु बिसद यह कथा। मैं सब कही मोरि मति जथा॥
राम चरित सत कोटि अपारा । श्रुति सारदा न बरनै पारा॥

चौपाई ३

हे गिरिजे, सुनिये, यह उज्ज्वल कथा मैंने जैसी मेरी बुद्धि थी वैसी सब कह दी। इस आधी पंक्ति में सबसे भारी शब्द है मोरि मति जथा। कहनेवाले शिव हैं, और वे अपने कहे हुए के ऊपर अपनी ही बुद्धि की सीमा लगा रहे हैं। यह विनय का शिष्टाचार होता तो आगे कोई कारण न आता। पर कारण तुरन्त आ जाता है। रामचरित सौ करोड़ हैं, अपार हैं, और श्रुति तथा शारदा भी उनका वर्णन नहीं कर पातीं। यानी सीमा कहनेवाले की नहीं है, कही जानेवाली चीज़ की है, और उस सीमा में श्रुति भी उसी ओर खड़ी है जिस ओर एक कहनेवाला।

और फिर वह उपमा आती है जो इस पन्ने की सबसे चुपचाप उपमाओं में है। राम अनन्त हैं, उनके गुण अनन्त हैं, जन्म, कर्म और नाम भी अनन्त हैं। जल की बूँदें गिनी जा सकती हों, पृथ्वी के रज-कण गिने जा सकते हों, पर रघुनाथ के चरित्र वर्णन करने से चुकते नहीं। उपमा किस ओर से बाँधी गयी है, यह देखिये। जिसे हम असम्भव कहते हैं, बूँदों का और धूलकणों का गिनना, उसे इस पंक्ति ने मान लिया है। हार वहाँ नहीं मानी गयी जहाँ हम मानेंगे। संख्या हार नहीं मानती, भाषा मान लेती है।

इसके बाद वह वाक्य आता है जिसमें इस पन्ने के दोनों पक्षी पहली बार एक साथ आ जाते हैं, और वह इतने हलके से आता है कि पहली बार में छूट सकता है। यह निर्मल कथा हरि का पद देनेवाली है, इसे सुनकर अविचल भक्ति होती है, और हे उमा, मैंने वही सारी सुन्दर कथा कही जो भुशुण्डि ने खगपति को सुनायी थी। दो नाम, एक ही आधी पंक्ति में, बिना किसी ज़ोर के। कहनेवाले ने उन्हें रास्ते की बात की तरह कहा है। सुननेवाली उन्हें पकड़ लेती हैं, और इसी पकड़ से आगे का सारा काण्ड निकलता है।

और तब कहनेवाला वह करता है जो कोई कहनेवाला अपने अन्त में करता है, और जो इस ग्रन्थ में इससे पहले कभी नहीं हुआ।

कछुक राम गुन कहेउँ बखानी। अब का कहौं सो कहहु भवानी॥
सुनि सुभ कथा उमा हरषानी । बोली अति बिनीत मृदु बानी॥

चौपाई ४

मैंने रामजी के कुछ थोड़े-से गुण बखानकर कहे हैं, अब क्या कहूँ, हे भवानी, सो आप कहिये। यह प्रश्न पूरे ग्रन्थ का सबसे बड़ा मोड़ है और वह बिलकुल बिना शोर के आता है। जो सुना रहा था वह पूछ रहा है कि अब क्या सुनाऊँ। इससे पहले तक सुननेवाली की जगह चुप रहने की थी। इस पंक्ति के बाद उनकी जगह पूछने की हो जाती है, और आगे जो कुछ आयेगा वह इसी पूछने से आयेगा। कथा का आगे बढ़ना अब कहनेवाले के हाथ में नहीं रहा।

और अगली ही आधी पंक्ति में वे बोल पड़ती हैं। मङ्गलमयी कथा सुनकर उमा हर्षित हुईं और अत्यन्त विनम्र तथा कोमल वाणी से बोलीं। तुलसी ने बोलने से पहले तीन बातें बता दी हैं, हर्ष, विनय और कोमलता। जो अब कहा जायेगा वह उलाहना नहीं है और चुनौती नहीं है, यह पहले ही तय कर दिया गया, ताकि आगे का संदेह पढ़ते हुए किसी को उसका रंग ग़लत न लगे।

धन्य धन्य मैं धन्य पुरारी । सुनेउँ राम गुन भव भय हारी॥

चौपाई ५

हे त्रिपुरारि, मैं धन्य हूँ, धन्य हूँ, धन्य हूँ, कि मैंने जन्म-मरण के भय को हरनेवाले रामजी के गुण सुने। तीन बार धन्य। पूछने से पहले सुननेवाली जो पहला काम करती हैं वह प्रश्न नहीं है, वह अपने ऊपर एक निर्णय है। और उसमें एक बात छिपी हुई है जिस पर आगे बहुत कुछ टिकेगा। उन्होंने अपने को इसलिये धन्य नहीं कहा कि उन्हें कुछ मिल गया या कोई सिद्धि हाथ आ गयी। उन्होंने अपने को इसलिये धन्य कहा कि उन्होंने सुन लिया। सुनना यहाँ किसी और फल का साधन नहीं है, वही फल है।

सार: शिव कहते हैं कि उन्होंने यह उज्ज्वल कथा अपनी बुद्धि भर कह दी, पर रामचरित अपार हैं और श्रुति तथा शारदा भी उन्हें नहीं बाँध पातीं। वे बताते हैं कि यही कथा भुशुण्डि ने खगपति को सुनायी थी, और फिर पूछते हैं कि अब क्या कहूँ। उमा हर्षित होकर, विनम्र और कोमल वाणी से, अपने को तीन बार धन्य कहती हैं।

जो तृप्त हो गया, उसने चखा ही नहीं

इसके बाद दो दोहे आते हैं जो एक ही साँस के दो हिस्से हैं। पहले में एक हिसाब पूरा होता है और दूसरे में वही हिसाब उलट जाता है। दोनों को साथ पढ़े बिना आगेवाला संदेह ठीक से समझ में नहीं आता।

तुम्हरी कृपाँ कृपायतन अब कृतकृत्य न मोह।
जानेउँ राम प्रताप प्रभु चिदानंद संदोह॥ ५२ (क)॥

दोहा ५२ (क)

हे कृपा के धाम, आपकी कृपा से अब मैं कृतकृत्य हो गयी, अब मुझे मोह नहीं है। हे प्रभु, मैंने सच्चिदानन्दघन रामजी के प्रताप को जान लिया। इस दोहे को ध्यान से रखना ज़रूरी है, क्योंकि इसके एक ही दोहे बाद जो बात आयेगी उसे पढ़नेवाला आसानी से मोह समझ सकता है। यहाँ पहले ही कह दिया गया है कि मोह नहीं रहा। और तुलसी इन तीनों के लिये तीन अलग शब्द रखते हैं और उन्हें कभी आपस में नहीं मिलाते। मोह, जो जा चुका। भ्रम, जिसके नाश की बात इसी पन्ने पर आगे आयेगी। और संदेह, जो अभी आनेवाला है। भ्रम में आदमी को यह भी नहीं मालूम होता कि वह क्या नहीं जानता। संदेह में उसे ठीक-ठीक मालूम होता है कि वह क्या नहीं जानता, और इसीलिये वह पूछ पाता है।

और उसी दोहे का दूसरा हिस्सा वह चित्र खींच देता है जिसके लिये यह पन्ना अकेले भी पढ़ा जा सकता है।

नाथ तवानन ससि स्रवत कथा सुधा रघुबीर।
श्रवन पुटन्हि मन पान करि नहिं अघात मतिधीर॥ ५२ (ख)॥

दोहा ५२ (ख)

हे नाथ, आपका मुखरूपी चन्द्रमा रघुवीर की कथारूपी अमृत बरसाता है। हे मतिधीर, मेरा मन कानों के दोनों पुटों से उसे पीकर भी तृप्त नहीं होता। इस चित्र में तीन चीज़ें हैं और तीनों अपनी ठीक जगह पर बैठी हैं। ऊपर एक चन्द्रमा है और उससे कुछ चू रहा है। नीचे दो प्याले हैं, और वे कान हैं, श्रवन पुटन्हि। और पीनेवाला मन है। कान केवल बर्तन हैं, वे पीते नहीं। जो पीता है वह भीतर बैठा है और वही नहीं भरता। सुनने का यह पूरा नक्शा सात शब्दों में खड़ा कर दिया गया है और इसमें कहीं कोई उपदेश नहीं है।

और इसके तुरन्त बाद वे अपने इस न भरने को अपने ऊपर से उठाकर एक नियम बना देती हैं। जो बात अभी अपने विषय में कही थी, वह अब सबके विषय में कह दी जाती है, और उसका रुख़ उलटा हो जाता है।

राम चरित जे सुनत अघाहीं । रस बिसेष जाना तिन्ह नाहीं॥
जीवनमुक्त महामुनि जेऊ । हरि गुन सुनहिं निरंतर तेऊ॥

चौपाई ६

जो रामचरित सुनते-सुनते तृप्त हो जाते हैं, उन्होंने उसका विशेष रस जाना ही नहीं। जो जीवन्मुक्त महामुनि हैं, वे भी हरि के गुण निरन्तर सुनते रहते हैं। इस कसौटी का ढंग देखिये। तृप्ति को यहाँ सुनने का फल नहीं माना गया, उसे पूरा होने का प्रमाणपत्र भी नहीं माना गया। उसे चूक माना गया है। और प्रमाण के लिये सबसे ऊपरवालों को बुलाया गया है, उन्हें जिन्हें और कुछ पाना बाकी नहीं। वे भी सुनना बन्द नहीं करते। यानी सुनना किसी कमी को भरने का काम नहीं है, वरना भर जाने पर छूट जाता।

आगे दो पंक्तियाँ ऐसी हैं जिनमें कथा के दो बिलकुल अलग सुननेवाले गिनाये जाते हैं। जो भवसागर के पार जाना चाहता है, उसके लिये रामकथा दृढ़ नाव है। और विषयी लोगों के लिये भी हरि के गुणसमूह कानों को सुख देनेवाले और मन को आनन्द देनेवाले हैं। पहली पंक्ति उनके लिये है जो कहीं जाना चाहते हैं। दूसरी उनके लिये है जो कहीं नहीं जाना चाहते। नाव उसी के काम की है जिसे पार उतरना है, पर कथा दूसरे को भी मना नहीं करती, और यह पूरी बात दो आधी पंक्तियों में बिना किसी शर्त के रख दी जाती है।

और फिर एक तीखी पंक्ति आती है, जो इस कोमल वाणी में अकेली खड़ी है। जगत् में कानवाला ऐसा कौन है जिसे रघुनाथ के चरित्र न सुहाते हों। जिन्हें न सुहायें, वे जड़ जीव अपनी ही आत्मा के घातक हैं। निजात्मक घाती, अपने ही आत्मा का हत्यारा। किसी दूसरे का नुक़सान इसमें गिनाया ही नहीं गया। जो नहीं सुनता वह किसी और का कुछ नहीं बिगाड़ता, और यही उस पंक्ति की चोट है।

सार: उमा कहती हैं कि अब मोह नहीं रहा और रामजी का प्रताप जान लिया, फिर भी आपके मुखचन्द्र से बरसती कथा को कानों से पीकर मन तृप्त नहीं होता। और वे इसे नियम बना देती हैं, कि जो सुनकर तृप्त हो गया उसने रस जाना ही नहीं, क्योंकि जीवन्मुक्त महामुनि तक निरन्तर सुनते रहते हैं। कथा पार जानेवालों के लिये दृढ़ नाव है और विषयी लोगों के लिये भी कानों का सुख है।

एक कौए के शरीर में

अब वह बात आती है जिसके लिये यह सारी भूमिका बनी थी, और वह पूछे जाने से पहले याद दिलायी जाती है। उमा कहती हैं कि आपने रामचरित्रमानस का गान किया और उसे सुनकर मैंने अपार सुख पाया। और फिर वे वह एक वाक्य उठा लेती हैं जो बहुत पहले बिना किसी ज़ोर के कहा गया था, कि यह सुन्दर कथा काकभुशुण्डि ने गरुड़ से कही थी। जो बात कहनेवाले ने रास्ते में कही थी, सुननेवाली ने उसे सँभालकर रख लिया था, और अब उसे वापस उनके सामने रख रही हैं।

बिरति ग्यान बिग्यान दृढ़ राम चरन अति नेह।
बायस तन रघुपति भगति मोहि परम संदेह॥ ५३॥

दोहा ५३

वैराग्य, ज्ञान और विज्ञान में दृढ़, रामजी के चरणों में अत्यन्त प्रेम, और उस पर रघुनाथ की भक्ति, और यह सब कौए के शरीर में। मुझे इसका परम संदेह है। इस दोहे की बनावट में ही उसका काँटा छिपा है। पहली पंक्ति पूरी की पूरी सम्पत्ति की गिनती है, चार चीज़ें, एक के बाद एक, बिना रुके। दूसरी पंक्ति के पहले दो शब्द शरीर बताते हैं, बायस तन, और उसके तुरन्त बाद एक और सम्पत्ति जोड़ दी जाती है, भगति। यानी शरीर को गिनती के बीच में रखा गया है, उसके बाद नहीं। वह गिनती को काटता नहीं, गिनती के साथ बैठा रहता है, और यही खटकता है।

और क्यों खटकता है, यह अगली चार चौपाइयों में गिनकर बताया जाता है। यह हिस्सा इस पूरे प्रसंग का सबसे ठंडा हिस्सा है, क्योंकि इसमें भावना नहीं है, संख्या है। हज़ार मनुष्यों में कोई एक धर्म का व्रत धारण करनेवाला होता है। करोड़ों धर्मात्माओं में कोई एक विषयों से विमुख होकर वैराग्य में लगता है। श्रुति कहती है कि करोड़ों विरक्तों में कोई एक ही सम्यक् ज्ञान पाता है। करोड़ों ज्ञानियों में कोई एक जीवन्मुक्त होता है, और जगत् में ऐसा कोई विरला ही मिलेगा। और हज़ारों जीवन्मुक्तों में भी वह और दुर्लभ है जो सब सुखों की खान है और ब्रह्म में लीन विज्ञानी है।

यह सीढ़ी चार बार गुणा करके ऊपर जाती है और हर बार पिछली से सैकड़ों गुना पतली होती जाती है। ऊपर पहुँचकर वहाँ ब्रह्म में लीन विज्ञानी खड़ा है, और शास्त्र की गिनती में उससे ऊपर कुछ होता नहीं। धर्मात्मा, विरक्त, ज्ञानी, जीवन्मुक्त और ब्रह्मपरायण, ये पाँच नाम एक साथ गिना दिये जाते हैं, जैसे कोई पूरी सूची एक बार फिर से दोहराकर बन्द कर रहा हो। और तब यह सीढ़ी एक कदम और चढ़ जाती है, जिसकी किसी ने अपेक्षा नहीं की थी।

सब ते सो दुर्लभ सुरराया। राम भगति रत गत मद माया॥
सो हरिभगति काग किमि पाई । बिस्वनाथ मोहि कहहु बुझाई॥

चौपाई ७

इन सबसे भी दुर्लभ वह है, हे देवताओं के राजा, जो मद और माया से रहित होकर रामभक्ति में लगा हुआ हो। सो वह हरिभक्ति कौए ने कैसे पा ली, हे विश्वनाथ, मुझे समझाकर कहिये। दो आधी पंक्तियाँ, और उनके बीच में इस पूरे पन्ने का फ़ासला रखा हुआ है। ऊपरवाली में वह चीज़ है जो करोड़ों की गिनती के बाद भी हाथ नहीं आती। नीचेवाली में वह प्राणी है जो हर छत पर, हर आँगन में, बिना बुलाये बैठा मिलता है।

और सबसे ऊपरवाली सीढ़ी की शर्त पर ध्यान दीजिये। वह कोई सामर्थ्य नहीं है। वह एक कमी है, गत मद माया, कि भीतर मद बचा न हो। नीचे की सारी सीढ़ियाँ कुछ पाने की थीं, व्रत, वैराग्य, ज्ञान, मुक्ति, लीनता, एक-एक करके कमायी जानेवाली चीज़ें। आख़िरी सीढ़ी कुछ न बचा रहने की है। और जिस दिन शर्त कमाने की जगह छोड़ने की हो जाती है, उस दिन से यह भी सम्भव हो जाता है कि वह सीढ़ी किसी ऐसे के पास मिले जिसके पास कमाने को कभी कुछ था ही नहीं।

और इसके बाद वह दोहा आता है जिसमें प्रश्न अपना पूरा रूप ले लेता है।

राम परायन ग्यान रत गुनागार मति धीर।
नाथ कहहु केहि कारन पायउ काक सरीर॥ ५४॥

दोहा ५४

हे नाथ, कहिये, रामपरायण, ज्ञान में निरत, गुणों के घर और धीरबुद्धि, इन्होंने कौए का शरीर किस कारण पाया। इस दोहे में क्रम उलटा रखा गया है और वही उसकी मार है। पहले चार विशेषण आते हैं और वे सब भीतर की चीज़ें हैं। शरीर सबसे आख़िर में आता है, आख़िरी दो शब्दों में। जो किसी से मिलने पर सबसे पहले दिखता है, वह इस दोहे में सबसे बाद में आता है, और तब तक सुननेवाला उसे मन में आदमी की तरह खड़ा कर चुका होता है। पूछनेवाली ने प्रश्न को ऐसा बनाया है कि सुननेवाला ठोकर खाये बिना उसके अन्त तक पहुँच ही न सके।

प्रश्न यहीं नहीं रुकता। आगे दो बातें और पूछी जाती हैं, और वे एक ही चौपाई में आती हैं। पहली, कि उस कौए ने प्रभु का यह पवित्र और सुहावना चरित्र कहाँ पाया। दूसरी, और यह इस पन्ने के लिये सबसे महत्त्व की निकलेगी, कि हे कामदेव के शत्रु, आपने इसे किस भाँति सुना। मुझे बड़ा भारी कौतूहल है। अब तक प्रश्न कौए के विषय में थे। यह प्रश्न सामने बैठे हुए कहनेवाले के विषय में है, और अगले पन्नों का सारा रास्ता इसी से खुलेगा।

सार: उमा दोहा ५३ में अपना संदेह रखती हैं, कि वैराग्य, ज्ञान, विज्ञान, प्रेम और भक्ति सब एक कौए के शरीर में कैसे। फिर वे दुर्लभता की सीढ़ी गिनाती हैं, हज़ार में एक व्रती, करोड़ में एक विरक्त, करोड़ में एक ज्ञानी, करोड़ में एक जीवन्मुक्त, हज़ारों में एक ब्रह्मलीन, और इन सबसे दुर्लभ वह जो मद और माया से रहित होकर रामभक्ति में लगा हो। दोहा ५४ में वे पूछती हैं कि ऐसे गुणी ने कौए का शरीर किस कारण पाया, फिर यह भी कि वह चरित्र उसे कहाँ मिला और आपने इसे किस भाँति सुना।

और पक्षियों का राजा वहाँ क्यों गया

एक प्रश्न और बाकी है, और वह सबसे बारीक है। वह किसी कमी पर नहीं टिका, एक निकटता पर टिका है।

गरुड़ महाग्यानी गुन रासी । हरि सेवक अति निकट निवासी॥
तेहिं केहि हेतु काग सन जाई । सुनी कथा मुनि निकर बिहाई॥

चौपाई ८

गरुड़ महान् ज्ञानी हैं, सद्गुणों की राशि हैं, हरि के सेवक हैं और उनके अत्यन्त निकट रहनेवाले हैं। उन्होंने किस कारण मुनियों के समूह को छोड़कर कौए के पास जाकर कथा सुनी। यहाँ फिर चार विशेषण गिनाये गये हैं, और चौथा बाकी तीनों से भारी है, अति निकट निवासी। ज्ञान कहीं भी पाया जा सकता है। गुण कमाये जाते हैं। सेवा की जाती है। पर निकट रहना ऐसी चीज़ है जो और किसी के पास नहीं थी। प्रश्न ठीक उसी निकटता पर उँगली रखता है। जो सबसे पास रहता है वह सुनने के लिये सबसे दूर क्यों गया, और रास्ते में मुनियों का पूरा समूह छोड़कर क्यों गया।

और फिर वह पंक्ति आती है जिसमें दोनों पक्षी एक ही साँस में रख दिये जाते हैं। कहिये, इन दोनों हरिभक्तों की, काग और उरगाद की, बातचीत किस प्रकार हुई। उरगाद, सर्पों को खानेवाला। गरुड़ का नाम यहाँ उनके पद से नहीं लिया गया, उनके भोजन से लिया गया है। एक पक्षी अपनी जाति के नाम से आया, दूसरा अपनी भूख के नाम से, और दोनों को एक ही शब्द बाँध देता है, दोउ हरिभगत। जिस पंक्ति में उनका भेद सबसे नंगा रखा गया, उसी पंक्ति में उन्हें एक कहा गया है।

यह सरल और सुन्दर वाणी सुनकर शिव सुख पाते हैं और आदर के साथ बोलते हैं। पहला काम वे पूछनेवाली की प्रशंसा का करते हैं, और जिस शब्द से करते हैं वह तीन चौपाई बाद नाम बनकर लौटनेवाला है। धन्य सती, आपकी बुद्धि पवित्र है, रघुनाथ के चरणों में आपका प्रेम थोड़ा नहीं है। फिर वे कहते हैं कि अब वह परम पवित्र इतिहास सुनिये जिसे सुनने से सारे लोक का भ्रम नष्ट हो जाता है, राम के चरणों में विश्वास उपजता है, और मनुष्य बिना किसी परिश्रम के भवसागर से तर जाता है। कथा का फल कथा शुरू होने से पहले गिना दिया गया है, और उसमें एक शब्द है बिनहिं प्रयासा, बिना परिश्रम, जो अभी-अभी गिनायी गयी उस पूरी सीढ़ी के ठीक उलटा खड़ा है।

और तब वह दोहा आता है जिससे इस पन्ने का असली आकार खुलता है।

ऐसिअ प्रस्न बिहंगपति कीन्हि काग सन जाइ।
सो सब सादर कहिहउँ सुनहु उमा मन लाइ॥ ५५॥

दोहा ५५

ऐसे ही प्रश्न पक्षिराज ने भी जाकर कौए से किये थे। वह सब मैं आदर सहित कहूँगा, हे उमा, आप मन लगाकर सुनिये। इस एक पंक्ति से पन्ना दुहरा हो जाता है। अब तक लगता था कि यहाँ कोई जिज्ञासा है और आगे उसका उत्तर मिलेगा। इस पंक्ति के बाद मालूम होता है कि यही प्रश्न पहले भी पूछे जा चुके हैं, किसी और ने, किसी और जगह, किसी और से। और उत्तर भी पहले दिया जा चुका है।

इसका अर्थ यह है कि आगे जो कथा आयेगी वह एक कथा नहीं होगी। एक पूछना होगा जिसके भीतर दूसरा पूछना रखा हुआ है, और दोनों को एक ही उत्तर से निपटना होगा। और इसमें एक बात और छिपी है, जो शब्द ऐसिअ में है। ऐसे ही, बिलकुल वैसे नहीं। पूछनेवाले दो हैं, एक देवी हैं और एक पक्षी, एक कैलास पर बैठी हैं और एक उड़कर गया था, और फिर भी जो चीज़ उन्हें अटकी वह एक ही है। प्रश्न का जन्म पूछनेवाले से नहीं हुआ, जिस चीज़ के विषय में पूछा गया उससे हुआ।

सार: उमा का चौथा प्रश्न यह है कि महाज्ञानी, गुणों की राशि, हरि के सेवक और उनके अत्यन्त निकट रहनेवाले गरुड़ मुनियों का समूह छोड़कर कौए के पास क्यों गये, और उन दोनों हरिभक्तों की बातचीत कैसे हुई। शिव प्रसन्न होकर उनकी बुद्धि की सराहना करते हैं, कथा का फल पहले बता देते हैं, और फिर दोहा ५५ में कहते हैं कि ऐसे ही प्रश्न पक्षिराज ने भी जाकर कौए से किये थे।

कहनेवाला अपनी ही कथा में उतरता है

चार प्रश्न पूछे गये थे, और उत्तर उस प्रश्न से शुरू होता है जो सबसे आख़िर में पूछा गया था। कौए का शरीर क्यों, यह बाद में आयेगा। भक्ति कैसे मिली, यह और भी बाद में। पक्षिराज वहाँ क्यों गये, यह भी रुका रहेगा। जो सबसे पहले उठाया जाता है वह सबसे छोटा दिखनेवाला प्रश्न है, कि आपने इसे किस भाँति सुना। और सबसे छोटा दिखनेवाला प्रश्न ही सबसे दूर तक ले जाता है।

मैं जिमि कथा सुनी भव मोचनि । सो प्रसंग सुनु सुमुखि सुलोचनि॥
प्रथम दच्छ गृह तव अवतारा । सती नाम तब रहा तुम्हारा॥

चौपाई ९

मैंने वह भव से छुड़ानेवाली कथा जिस प्रकार सुनी, हे सुमुखी, हे सुलोचनी, वह प्रसंग सुनिये। पहले आपका अवतार दक्ष के घर हुआ था, तब आपका नाम सती था। दो पंक्तियों के बीच में जो मोड़ है वह इस पन्ने का सबसे बड़ा मोड़ है। प्रश्न एक कथा के विषय में था और उत्तर एक जन्म से शुरू हो रहा है। यह बताने के लिये कि मैंने एक बात कहाँ सुनी थी, कहनेवाले को उस समय तक लौटना पड़ रहा है जब सुननेवाली किसी और नाम से किसी और घर में थीं। और वह नाम उसी शब्द से बना है जिससे उन्होंने अभी-अभी इसी पन्ने पर उनकी सराहना की थी।

आगे जो दो पंक्तियाँ आती हैं, उनमें एक पूरी कथा इतनी जल्दी निपटा दी जाती है कि सुनने में सिहरन होती है। दक्ष के यज्ञ में आपका अपमान हुआ। आपने अत्यन्त क्रोध करके तब प्राण त्याग दिये। मेरे सेवकों ने यज्ञ का विध्वंस कर दिया। तीन वाक्य, और तीनों में सबसे बड़ी घटनाएँ हैं। और फिर वह आधी पंक्ति जो इस संक्षेप का कारण बता देती है, वह सारा प्रसंग आप जानती ही हैं। कहनेवाला उस कथा को नहीं दोहराता जिसे सुननेवाली ने अपने ऊपर भोगा है। जो अंश उन्होंने नहीं देखा, वही अंश आगे कहा जाता है, और वह अंश उनके चले जाने के बाद का है।

तब अति सोच भयउ मन मोरें । दुखी भयउँ बियोग प्रिय तोरें॥
सुंदर बन गिरि सरित तड़ागा। कौतुक देखत फिरउँ बेरागा॥

चौपाई १०

तब मेरे मन में बड़ा सोच हुआ, और हे प्रिये, मैं आपके वियोग से दुखी हो गया। मैं सुन्दर वन, पर्वत, नदियाँ और तालाब देखता हुआ विरक्त भाव से घूमता फिरता था। यह इस पन्ने का सबसे विचित्र स्थान है। एक पति अपनी पत्नी को बता रहा है कि उसके न रहने पर वह कैसा हो गया था, और सुननेवाली वही हैं, दूसरे जन्म में, दूसरे नाम से, उन्हीं के सामने बैठी हुईं। जिस दुख का वर्णन हो रहा है उसका कारण भी वही हैं और उसे सुननेवाली भी वही हैं।

और दुख का जो रूप बताया गया है वह भी अनोखा है। न तप, न समाधि, न कोई एकान्त, न कोई प्रतिज्ञा। सुन्दर वन, पहाड़, नदियाँ, तालाब, और कौतुक देखत फिरउँ बेरागा, कौतुक देखता हुआ विरक्त भाव से घूमता फिरता था। शोक यहाँ बैठा हुआ नहीं है, वह चल रहा है, और चलते हुए जो सुन्दर पड़ता है उसे देखता चल रहा है। वैराग्य और कौतुक एक ही आधी पंक्ति में रख दिये गये हैं, और तुलसी ने उनमें कोई विरोध नहीं देखा। जिसका सब छूट गया है वह आँखें बन्द नहीं कर लेता।

और उसी घूमने के भीतर वह जगह आती है जहाँ यह पन्ना ख़त्म होगा। सुमेरु पर्वत से उत्तर दिशा में, और उससे भी दूर, एक बहुत ही सुन्दर नील पर्वत है। उसके सुन्दर स्वर्णमय शिखर हैं, और उनमें से चार शिखर मन को भा गये। पता किसी नगर से नहीं दिया गया, किसी राज्य से नहीं दिया गया। वह एक पर्वत से दिया गया है, और वह भी उससे हटकर, और दूर। जो सब छोड़कर निकला हुआ है उसे ठिकाना भी सबसे परे मिलता है, और इस पूरे काण्ड की अगली सारी कथा इसी परे बैठी हुई जगह पर होनी है।

तिन्ह पर एक एक बिटप बिसाला । बट पीपर पाकरी रसाला॥
सैलोपरि सर सुंदर सोहा । मनि सोपान देखि मन मोहा॥

चौपाई ११

उन शिखरों में एक-एक पर एक-एक विशाल वृक्ष है, बरगद, पीपल, पाकर और आम। पर्वत के ऊपर एक सुन्दर तालाब शोभा पा रहा है, और उसकी मणियों की सीढ़ियाँ देखकर मन मोहित हो जाता है। गिनती पर ध्यान दीजिये। चार शिखर, और हर शिखर पर एक पेड़, और चारों पेड़ों के नाम अलग-अलग गिनाये गये हैं, एक भी छोड़ा नहीं गया। यह वर्णन नहीं है, यह नक्शा है। और नक्शा वहीं बनाया जाता है जहाँ कुछ होनेवाला हो। जो आदमी सोच में डूबा हुआ घूम रहा था, उसने इस एक जगह को इतने हिसाब से देखा कि उसे बाद में दोहराया जा सके।

और पन्ना अपनी आख़िरी पंक्ति उसी तालाब पर ख़र्च करता है।

सीतल अमल मधुर जल जलज बिपुल बहुरंग।
कूजत कल रव हंस गन गुंजत मंजुल भृंग॥ ५६॥

दोहा ५६

उसका जल शीतल है, निर्मल है और मीठा है। उसमें बहुत-से रंग-बिरंगे कमल खिले हुए हैं। हंसों के झुंड मधुर स्वर से बोल रहे हैं और सुन्दर भौंरे गुंजार कर रहे हैं। इस दोहे में एक भी आदमी नहीं है। पानी है, कमल हैं, और दो तरह की आवाज़ें हैं, हंसों की और भौंरों की। जिस पन्ने पर इतने प्रश्न पूछे गये, वह एक ऐसी जगह पर आकर रुकता है जहाँ कोई कुछ नहीं पूछ रहा। जल के तीन विशेषण गिनाये गये हैं और तीनों पीने से जुड़े हैं, शीतल, निर्मल, मीठा। जिस पन्ने पर कान को प्याला कहा गया था, वह पन्ना एक ऐसे पानी पर बन्द होता है जो पिया जा सकता है।

और अन्तिम बात, जो इस दोहे को पढ़ते हुए देर से समझ में आती है। जगह पूरी बन चुकी है। शिखर हैं, पेड़ हैं, सीढ़ियाँ हैं, पानी है, पक्षी हैं, भौंरे हैं। जिसके विषय में यह सारा पूछना हुआ था, उसका नाम इस दोहे में नहीं आता। पन्ना ठीक वहाँ बन्द हो जाता है जहाँ जगह तैयार है और उसमें अभी कोई आया नहीं।

सार: शिव सबसे आख़िर में पूछे गये प्रश्न को सबसे पहले उठाते हैं। वे बताते हैं कि उमा का पहला अवतार दक्ष के घर हुआ था और तब उनका नाम सती था, दक्ष के यज्ञ में अपमान हुआ, उन्होंने क्रोध में प्राण त्याग दिये और शिवगणों ने यज्ञ तोड़ डाला। फिर वे अपने वियोग और विरक्त भटकने की बात कहते हैं, सुमेरु से उत्तर दूर बसे नील पर्वत की, उसके चार स्वर्ण शिखरों की, उन पर खड़े बरगद, पीपल, पाकर और आम की, और शिखर के ऊपर मणियों की सीढ़ियोंवाले उस तालाब की, जिसका जल शीतल, निर्मल और मीठा है।

और अन्त में, अपनी ओर

इस पन्ने पर कहनेवाले बदलते जाते हैं, और यह इतने चुपचाप होता है कि पढ़ते हुए छूट सकता है। शुरू में नारद गा रहे हैं। दोहे में वे चले जाते हैं और शिव बोलने लगते हैं। कुछ चौपाई बाद शिव पूछते हैं कि अब क्या कहूँ, और उमा बोलने लगती हैं। और दोहा ५५ में मालूम होता है कि यही प्रश्न कहीं और, किसी और मुँह से, पहले भी पूछे जा चुके हैं। चार आवाज़ें, और चारों एक ही कथा के आसपास हैं। कथा कहनेवाले को भी कथा के भीतर रख देना, आगे का सारा काण्ड इसी ढंग से बना हुआ है।

दूसरी बात उस गिनती की है, जो देर तक साथ रहती है। हज़ार में एक, करोड़ में एक, फिर करोड़ में एक, फिर करोड़ में एक, फिर हज़ारों में एक। यह सीढ़ी शास्त्र की है और उसमें कोई दया नहीं है। पर जिस चीज़ के लिये वह पूरी सीढ़ी खड़ी की गयी, वह सीढ़ी के सिरे पर नहीं मिली। वह एक कौए के पास मिली। और पूछनेवाली ने इसे अन्याय नहीं कहा। उन्होंने न सीढ़ी को झूठा कहा, न कौए को। उन्होंने इसे संदेह कहा और समझाकर कहने की प्रार्थना की। जहाँ हिसाब और जो सामने है, दोनों आपस में नहीं मिलते, वहाँ हिसाब को फेंका नहीं जाता, उसे लेकर पूछने जाया जाता है।

और तीसरी बात सबसे सीधी है। पूछा गया था कि आपने यह कथा किस भाँति सुनी। उत्तर किसी तीर्थ से शुरू हो सकता था, किसी गुरु से शुरू हो सकता था, किसी समाधि से शुरू हो सकता था। वह शुरू होता है एक मृत्यु से, फिर एक वियोग से, फिर एक लम्बे बेठिकाने घूमने से। जिस दिन सब छूट गया था, उसी दिन वह रास्ता खुला जिस पर चलकर यह कथा मिली। कहनेवाले ने इसे कहीं समझाया नहीं है। उन्होंने बस अपना उत्तर वहीं से शुरू कर दिया है और सुननेवाली को उस दिन तक साथ ले गये हैं जिस दिन वे स्वयं नहीं थीं।

उत्तरकाण्ड यहाँ तक एक नगर की कथा था। इस पन्ने के बाद वह एक पहाड़ की कथा हो जाता है। दोहा ५१ के बाद इस पन्ने पर अयोध्या का नाम एक बार भी नहीं आता, और जो बोलते हैं वे सब उससे बहुत दूर बैठे हैं। जिस राज्य के वर्णन में इतने पन्ने लगे थे, वह एक दोहे में पीछे छूट जाता है, और उसकी जगह एक प्रश्न आकर बैठ जाता है। कथा का रुकना और बातचीत का शुरू होना, दोनों एक ही दोहे में हो जाते हैं, और तुलसी उस पर कोई सूचना नहीं लगाते।

और जो चीज़ इस पन्ने से उठकर आगे तक जाती है, वह प्रश्न नहीं है, वह पूछने का ढंग है। सुननेवाली ने पहले अपने को धन्य कहा। फिर कहा कि अब मोह नहीं रहा। फिर कहा कि फिर भी मन भरता नहीं। और तब पूछा। यानी पूछने से पहले उन्होंने यह साफ़ कर दिया कि वे किसी कमी से नहीं पूछ रहीं। जो अपनी कमी भरने के लिये पूछता है, उसका उत्तर उसकी कमी जितना बड़ा होता है और वहीं ख़त्म हो जाता है। जो भर जाने के बाद पूछता है, उसके लिये कहनेवाले को अपने सबसे पुराने दिनों तक लौटना पड़ता है।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, उत्तरकाण्ड, दोहा ५१ से ५६, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।

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