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पार्वती का संदेह

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रामचरितमानसउत्तरकाण्डप्रसंग 10

एक स्तुति पूरी होती है और उसके साथ ही अयोध्या कथा से उठ जाती है। कैलास पर बैठा हुआ कहनेवाला अपनी कही हुई कथा का हिसाब देता है। सुननेवाली के भीतर एक प्रश्न जाग उठता है। उस प्रश्न का उत्तर देने के लिये उसे बहुत पीछे, अपने ही सबसे दुखी दिनों तक लौटना पड़ता है।

उत्तरकाण्ड का यह मोड़ एक गीत के बीच से खुलता है: कोई पहले से गा रहा है, और कथा बीच में आकर सुनने लगती है। गाने वाले नारद हैं, और स्तुति के ठीक बाद वे चले भी जाते हैं। उनके जाते ही इस काण्ड का ढाँचा बदल जाता है, और यह बदलाव किसी घटना से नहीं आता: कोई युद्ध नहीं, कोई सभा नहीं, कोई आता-जाता नहीं। बदलाव एक प्रश्न से आता है।

रामचरितमानस कौन सुना रहा है, यह इस ग्रन्थ के भीतर हमेशा से मालूम रहा है: शिव कहते हैं और पार्वती सुनती हैं। अब तक यह ढाँचा पीछे रहा है, पर्दे के पीछे की उन रस्सियों की तरह जिनसे पर्दा चलता रहता है। इस प्रसंग में वे रस्सियाँ सामने आ जाती हैं। कहने वाले अपनी कही हुई कथा का हिसाब देते हैं, सुनने वाली से पूछते हैं, “अब क्या कहूँ?” सुनने वाली के पास पूछने को बहुत कुछ निकल आता है। यहाँ से आगे का उत्तरकाण्ड घटनाओं से नहीं, उत्तरों से चलेगा।

और जो प्रश्न यहाँ पूछे जाते हैं, उनमें एक को पूछने वाली स्वयं संदेह कहती हैं। किसी के पास वैराग्य है, ज्ञान है, विज्ञान है, राम के चरणों में बहुत प्रेम है, और भक्ति भी है, और वह कौआ है। सारा अटकाव इसी जोड़ पर है। दूसरा प्रश्न और बारीक है: जिसके पास यह सब है, उससे सुनने कोई और क्यों गया, और वह कोई और गरुड़ हैं। पार्वती के प्रश्नों और शिव के उत्तर में गरुड़ का ज़िक्र पाँच बार आता है, चार अलग नामों से, और वे स्वयं एक बार भी सामने नहीं आते। उनकी कथा आगे की है। यहाँ उसकी केवल छाया पड़ती है।

गानेवाला, कहनेवाला, पूछनेवाली और दो पक्षी

  • नारद वे मुनि जो राजसभा में स्तुति गाते हैं और उसे पूरा करके ब्रह्मा के धाम को लौट जाते हैं।
  • शिव इस पूरी कथा के कहने वाले, जो कैलास पर अपने कहे हुए का हिसाब देते हैं और फिर अपनी ही कथा के भीतर उतर जाते हैं।
  • पार्वती सुनने वाली, जिनके प्रश्नों पर यहाँ से आगे का सारा काण्ड टिका है। पहले जन्म में उनका नाम सती था, और वह जन्म शिव के उत्तर में लौटकर आता है।
  • काकभुशुण्डि वह कौआ जिसके पास वैराग्य, ज्ञान, विज्ञान और भक्ति सब है, और जिसका शरीर पार्वती का बड़ा प्रश्न बन जाता है।
  • गरुड़ पक्षियों के राजा, विष्णु के सेवक और उनके बहुत निकट रहने वाले, जिनका नाम यहाँ पाँच बार आता है और जो सामने एक बार भी नहीं आते।

गाना पूरा होता है

स्तुति के बीच में आकर पहले जो कान में पड़ता है, वह अर्थ नहीं, भाषा है। नारद संस्कृत के सुर में गाते हैं, और गाना उसी सुर से उठता है जिससे कोई पुराना मन्त्र उठता है।

नारद गाते हैं, “हे कमल जैसी आँखों वाले, मेरी ओर देखिये। आपकी कृपा की एक दृष्टि ही शोक से छुड़ा देती है।” फिर एक उपमा, जिसमें दो देवता एक साथ आ जाते हैं: राम नील कमल के समान साँवले हैं। वे कामदेव के शत्रु शिव के हृदयकमल के भौंरे हैं। यानी नारद उनसे कह रहे हैं कि आप शिव के हृदय में बसे हैं। यह ठीक वहाँ कहा गया है जहाँ कुछ ही देर बाद शिव स्वयं बोलने लगेंगे। स्तुति अपने अगले वक्ता का नाम पहले ही ले चुकी है।

बीच में स्तुति पूरी रामकथा को कुछ नामों में समेटकर आगे बढ़ जाती है: राक्षसों की सेना का बल तोड़ने वाले, बाहुबल से पृथ्वी का भारी बोझ मिटाने वाले। खर, दूषण और विराध के वध में निपुण, रावण के शत्रु, दशरथ के कुल रूपी कुमुदिनी के चन्द्रमा। जिस कथा में बरसों बीते, वह यहाँ कुछ शब्दों में निपट जाती है।

स्तुति का ठहराव कर्मों पर नहीं, स्वभाव पर है: मुनियों और सज्जनों को आनन्द देने वाले, पापों का नाश करने वाले। ब्राह्मणों की खेती के लिये नये मेघ, करुणा करने वाले, झूठे मद का नाश करने वाले। और फिर, जिनकी कोई शरण नहीं उनकी शरण, और दीन जनों को अपने आश्रय में ले लेने वाले। एक ओर वध और भार-हरण, दूसरी ओर शरण और आश्रय, और स्तुति का तौल दूसरी ओर झुका है।

और जहाँ गिनाना ख़त्म होता है, वहाँ गाना कर्मों से हटकर नाम पर आ जाता है।

“आपका नाम कलियुग के मैल को मथ डालने वाला और ममता को मारने वाला है।” और स्तुति के अन्त में तुलसीदास का नाम आता है: “तुलसीदास के प्रभु, शरण में आये जन की रक्षा कीजिये।” स्तुति नारद गा रहे हैं, और उसकी माँग बहुत छोटी है: सिद्धि नहीं, दर्शन नहीं, मुक्ति नहीं। बस इतना कि जो शरण में आ गया है उसे बचा लीजिये।

इसी स्तुति में नाम को ममता को मारने वाला कहा गया है। यानी जिसे यह नाम मारता है, वह मेरापन है। और ठीक इसके बाद गाने वाला अपने साथ कुछ लेकर जाता है।

प्रेम सहित राम के गुणों का वर्णन करके मुनि नारद शोभा के समुद्र राम को हृदय में धरकर वहाँ चले गये जहाँ ब्रह्मा का धाम है। इस वाक्य में दो क्रियाएँ हैं: वर्णन करके, और धरकर। पहले भीतर का सब बाहर उँडेल दिया, फिर बाहर वाले को भीतर रख लिया। जो अपना सारा गाना गा चुका, वह ख़ाली होकर नहीं लौटता।

और जो वे साथ ले जा रहे हैं, वह कोई वर नहीं, हृदय में रखा एक रूप है। ममता को मारने वाले नाम के ठीक बाद हृदय में कुछ रख लेना विरोध नहीं: मेरापन हटने पर जगह ख़ाली नहीं रहती, उसमें कोई और आ बैठता है।

कहनेवाला अपनी कथा का हिसाब देता है

नारद के जाते ही दृश्य ख़ाली हो जाता है। अयोध्या यहीं छूट जाती है, और इस प्रसंग के अन्त तक उसका नाम फिर एक बार भी नहीं आता। और तभी वह आवाज़ सुनायी देती है जो इस पूरे ग्रन्थ के नीचे शुरू से बह रही थी। जो अब बोल रहा है, वह उस सभा में कभी था ही नहीं। वह कहीं और बैठा है, किसी और से बोल रहा है, और अब तक जो कुछ दिखा, वह उसी के कहने से दिखा था।

शिव कहते हैं, “पार्वती, सुनिये, यह उज्ज्वल कथा मैंने जैसी मेरी बुद्धि थी, वैसी सब कह दी।” सबसे भारी बात है, अपनी बुद्धि भर। शिव अपने कहे पर अपनी ही बुद्धि की सीमा लगा रहे हैं। वे कारण तुरन्त देते हैं: “राम के चरित सौ करोड़ हैं, अपार हैं। श्रुति और शारदा भी उनका वर्णन नहीं कर पातीं।” यानी सीमा कहने वाले की नहीं, कही जाने वाली चीज़ की है।

फिर शिव कहते हैं, “राम अनन्त हैं, उनके गुण अनन्त हैं, जन्म, कर्म और नाम भी अनन्त हैं। जल की बूँदें और पृथ्वी के रज-कण चाहे गिने जा सकें, पर राम के चरित्र वर्णन करने से नहीं चुकते।” जिसे असम्भव माना जाता है, बूँदों और धूलकणों का गिनना, उसे शिव ने मान लिया है। संख्या हार नहीं मानती, भाषा मान लेती है।

इसके बाद वह वाक्य आता है जिसमें आगे की कथा के दोनों पक्षी एक साथ आते हैं, और बहुत हलके से। शिव कहते हैं, “यह निर्मल कथा भगवान का परम पद देने वाली है। इसे सुनकर अविचल भक्ति होती है। पार्वती, मैंने वही सारी सुन्दर कथा कही है जो भुशुण्डि ने गरुड़ को सुनायी थी।” दो नाम, एक ही साँस में, रास्ते की बात की तरह। सुनने वाली उन्हें पकड़ लेती हैं, और इसी पकड़ से आगे का सारा काण्ड निकलता है।

और तब कहने वाला वह करता है जो कोई कहने वाला अपनी कथा के अन्त में करता है।

शिव कहते हैं, “मैंने राम के कुछ थोड़े-से गुण बखानकर कहे हैं। पार्वती, अब आप ही कहिये, और क्या कहूँ?” यह इस ग्रन्थ का एक बड़ा मोड़ है, और बिलकुल बिना शोर के आता है। जो सुना रहा था, वह पूछ रहा है कि अब क्या सुनाये। इससे पहले तक सुनने वाली की जगह चुप रहने की थी। अब उनकी जगह पूछने की हो जाती है, और कथा का आगे बढ़ना कहने वाले के हाथ में नहीं रहा।

और उसी क्षण वे बोल पड़ती हैं। मंगलमयी कथा सुनकर पार्वती हर्षित हुईं और बहुत विनम्र और कोमल वाणी से बोलीं। बोलने से पहले कथा तीन बातें बता देती है, हर्ष, विनय और कोमलता: जो आगे कहा जायगा, वह उलाहना या चुनौती नहीं है।

पार्वती कहती हैं, “मैं धन्य हूँ, धन्य हूँ, धन्य हूँ, कि मैंने जन्म-मरण का भय हरने वाले राम के गुण सुने।” तीन बार धन्य। पूछने से पहले उनका पहला काम प्रश्न नहीं, अपने ऊपर एक निर्णय है। उन्होंने अपने को इसलिये धन्य नहीं कहा कि उन्हें कुछ मिल गया। इसलिये कहा कि उन्होंने सुन लिया। सुनना यहाँ किसी और फल का साधन नहीं, वही फल है।

जो तृप्त हो गया, उसने चखा ही नहीं

इसके बाद पार्वती की दो बातें आती हैं जो एक ही बात के दो हिस्से हैं: पहले में एक हिसाब पूरा होता है, दूसरे में वही हिसाब उलट जाता है।

पार्वती कहती हैं, “हे कृपा के धाम, आपकी कृपा से अब मैं कृतकृत्य हो गयी। अब मुझे मोह नहीं है। मैंने सच्चिदानन्दघन राम का प्रताप जान लिया।” थोड़ी देर बाद जो बात आयेगी, उसे मोह समझ लेना आसान है। यहाँ पहले ही कह दिया गया है कि मोह नहीं रहा। कथा यहाँ तीन शब्द अलग-अलग रखती है: मोह, जो जा चुका। भ्रम, जिसके नाश की बात शिव आगे कहेंगे। और संदेह, जो अभी आने वाला है। भ्रम में आदमी को यह भी नहीं मालूम होता कि वह क्या नहीं जानता। संदेह में उसे ठीक-ठीक मालूम होता है, और इसीलिये वह पूछ पाता है।

और उनकी बात का दूसरा हिस्सा एक चित्र खींच देता है।

पार्वती कहती हैं, “नाथ, आपका मुखरूपी चन्द्रमा राम की कथा का अमृत बरसाता है। मेरा मन कानों के दोनों पुटों से उसे पीकर भी तृप्त नहीं होता।” ऊपर एक चन्द्रमा है और उससे कुछ चू रहा है। नीचे दो प्याले हैं, कानों के पुट। और पीने वाला मन है। कान केवल बर्तन हैं, वे पीते नहीं। जो पीता है वह भीतर बैठा है, और वही नहीं भरता।

और इसके तुरन्त बाद वे अपने इस न भरने को एक नियम बना देती हैं: जो अपने विषय में कहा था, वह अब सबके विषय में कहा जाता है।

पार्वती कहती हैं, “जो राम का चरित सुनते-सुनते तृप्त हो जाते हैं, उन्होंने उसका विशेष रस जाना ही नहीं। जो जीवन्मुक्त महामुनि हैं, वे भी भगवान के गुण निरन्तर सुनते रहते हैं।” तृप्ति को यहाँ सुनने का फल नहीं, चूक माना गया है। और प्रमाण के लिये सबसे ऊपर वालों को बुलाया गया है, जिन्हें और कुछ पाना बाक़ी नहीं। वे भी सुनना बन्द नहीं करते। सुनना किसी कमी को भरने का काम नहीं, वरना भर जाने पर छूट जाता।

आगे कथा के दो बिलकुल अलग सुनने वाले गिनाये जाते हैं। जो भवसागर के पार जाना चाहता है, उसके लिये रामकथा दृढ़ नाव है। और विषयी लोगों के लिये भी भगवान के गुण कानों को सुख और मन को आनन्द देने वाले हैं। एक बात उनके लिये जो कहीं जाना चाहते हैं, दूसरी उनके लिये जो कहीं नहीं जाना चाहते। नाव उसी के काम की है जिसे पार उतरना है, पर कथा दूसरे को भी मना नहीं करती।

और फिर एक तीखी बात, इस कोमल वाणी में अकेली: जगत् में कान वाला ऐसा कौन है जिसे राम के चरित्र न सुहाते हों? जिन्हें न सुहायें, वे जड़ जीव अपनी ही आत्मा के घातक हैं। किसी दूसरे का नुक़सान इसमें गिनाया ही नहीं गया। जो नहीं सुनता, वह किसी और का कुछ नहीं बिगाड़ता, और यही उस बात की चोट है।

एक कौए के शरीर में

अब वह बात आती है जिसके लिये यह सारी भूमिका बनी थी। पार्वती कहती हैं, “नाथ, आपने रामचरितमानस का गान किया, और उसे सुनकर मैंने अपार सुख पाया।” और फिर वे वह वाक्य उठा लेती हैं जो पहले बिना ज़ोर के कहा गया था, कि यह सुन्दर कथा काकभुशुण्डि ने गरुड़ से कही थी। जो बात कहने वाले ने रास्ते में कही थी, सुनने वाली ने उसे सँभालकर रख लिया था।

पार्वती कहती हैं, “वैराग्य, ज्ञान और विज्ञान में दृढ़, राम के चरणों में बहुत प्रेम, और राम की भक्ति भी, और यह सब कौए के शरीर में! मुझे इसका परम संदेह है।” पार्वती पहले सम्पत्ति गिनती हैं, चार चीज़ें, एक के बाद एक। फिर कौए का शरीर आता है, और उसके साथ ही एक और सम्पत्ति जुड़ती है, भक्ति। शरीर गिनती के बीच में रखा गया है। वह गिनती को काटता नहीं, उसके साथ बैठा रहता है, और यही खटकता है।

क्यों खटकता है, यह आगे गिनकर बताया जाता है, और इस हिस्से में भावना नहीं, संख्या है। पार्वती कहती हैं कि हज़ार मनुष्यों में कोई एक धर्म का व्रत धारण करने वाला होता है। करोड़ों धर्मात्माओं में कोई एक विषयों से विमुख होकर वैराग्य में लगता है। श्रुति कहती है कि करोड़ों विरक्तों में कोई एक ही सम्यक् ज्ञान पाता है। करोड़ों ज्ञानियों में कोई एक जीवन्मुक्त होता है, ऐसा कोई विरला ही। और हज़ारों जीवन्मुक्तों में भी वह और दुर्लभ है जो सब सुखों की खान, ब्रह्म में लीन विज्ञानी है।

यह सीढ़ी चार बार गुणा करके ऊपर जाती है, और हर बार पतली होती जाती है। ऊपर ब्रह्म में लीन विज्ञानी खड़ा है, और शास्त्र की गिनती में उससे ऊपर कुछ नहीं होता। फिर पाँच नाम एक साथ गिना दिये जाते हैं, धर्मात्मा, विरक्त, ज्ञानी, जीवन्मुक्त और ब्रह्मपरायण, जैसे कोई पूरी सूची दोहराकर बन्द कर रहा हो। और तब सीढ़ी एक क़दम और चढ़ जाती है, जिसकी अपेक्षा नहीं थी।

पार्वती कहती हैं, “इन सबसे भी दुर्लभ वह है जो मद और माया से रहित होकर राम की भक्ति में लगा हो। सो वह भक्ति कौए ने कैसे पा ली? मुझे समझाकर कहिये।” इन दो वाक्यों के बीच पार्वती के पूरे संदेह का फ़ासला है: पहले में वह चीज़ जो करोड़ों की गिनती के बाद भी हाथ नहीं आती। दूसरे में वह प्राणी जो हर छत पर, हर आँगन में, बिना बुलाये बैठा मिलता है।

और सबसे ऊपर वाली सीढ़ी की शर्त कोई सामर्थ्य नहीं, एक कमी है, कि भीतर मद और माया बचे न हों। नीचे की सारी सीढ़ियाँ कुछ पाने की थीं: व्रत, वैराग्य, ज्ञान, मुक्ति, लीनता। आख़िरी सीढ़ी कुछ न बचा रहने की है। और एक दिन शर्त कमाने की जगह छोड़ने की हो जाती है। उस दिन यह भी सम्भव हो जाता है कि वह सीढ़ी किसी ऐसे के पास मिले जिसके पास कमाने को कभी कुछ था ही नहीं।

और फिर वह बात आती है जिसमें प्रश्न अपना पूरा रूप लेता है।

पार्वती कहती हैं, “नाथ, कहिये, राम-परायण, ज्ञान में निरत, गुणों के घर और धीर-बुद्धि भुशुण्डि ने कौए का शरीर किस कारण पाया?” क्रम उलटा है: पहले चार विशेषण आते हैं, और वे सब भीतर की चीज़ें हैं। शरीर सबसे आख़िर में। जो किसी से मिलने पर सबसे पहले दिखता है, वह इस प्रश्न में सबसे बाद में आता है। तब तक सुनने वाला उसे मन में आदमी की तरह खड़ा कर चुका होता है।

प्रश्न यहीं नहीं रुकता। साथ ही दो बातें और पूछी जाती हैं। पार्वती कहती हैं, “उस कौए ने प्रभु का यह पवित्र और सुहावना चरित्र कहाँ पाया? और आपने इसे किस प्रकार सुना? मुझे बड़ा भारी कौतूहल है।” अब तक प्रश्न कौए के विषय में थे। यह प्रश्न सामने बैठे कहने वाले के विषय में है, और आगे का रास्ता इसी से खुलेगा।

और पक्षियों का राजा वहाँ क्यों गया

एक प्रश्न और बाक़ी है, और वह बहुत बारीक है: वह किसी कमी पर नहीं, एक निकटता पर टिका है।

पार्वती कहती हैं, “गरुड़ तो महाज्ञानी हैं, सद्गुणों की राशि हैं, विष्णु के सेवक हैं और उनके बहुत निकट रहने वाले हैं। उन्होंने मुनियों के समूह को छोड़कर कौए के पास जाकर कथा किस कारण सुनी?” फिर चार विशेषण, और चौथा बाक़ी तीनों से भारी है, बहुत निकट रहने वाले। ज्ञान कहीं भी पाया जा सकता है, गुण कमाये जाते हैं, सेवा की जाती है। पर निकट रहना और किसी के पास नहीं था। प्रश्न उसी निकटता पर उँगली रखता है: जो सबसे पास रहता है, वह सुनने के लिये इतनी दूर क्यों गया, और मुनियों का पूरा समूह छोड़कर क्यों गया।

और फिर: “कहिये, इन दोनों हरिभक्तों, कौए और उरगाद की बातचीत किस प्रकार हुई?” उरगाद, सर्पों को खाने वाला: गरुड़ का नाम यहाँ उनके पद से नहीं, उनके भोजन से लिया गया है। एक पक्षी अपनी जाति के नाम से आया, दूसरा अपनी भूख के नाम से, और दोनों को एक ही शब्द बाँध देता है। जिस वाक्य में उनका भेद सबसे खुला रखा गया, उसी में उन्हें एक कहा गया है।

पार्वती की सरल और सुन्दर वाणी सुनकर शिव सुख पाते हैं और आदर से बोलते हैं। पहले वे उनकी प्रशंसा करते हैं, उस शब्द से जो थोड़ा आगे नाम बनकर लौटने वाला है: “सती, आप धन्य हैं, आपकी बुद्धि बहुत पवित्र है। राम के चरणों में आपकी प्रीति थोड़ी नहीं है।” फिर कहते हैं, “अब वह परम पवित्र इतिहास सुनिये जिसे सुनने से सारे लोक का भ्रम नष्ट हो जाता है। उससे राम के चरणों में विश्वास उपजता है, और मनुष्य बिना परिश्रम भवसागर से तर जाता है।” कथा का फल कथा शुरू होने से पहले गिना दिया गया है। उसमें एक बात है, बिना परिश्रम, जो अभी गिनायी गयी पूरी सीढ़ी के ठीक उलटा खड़ी है।

और तब वह बात आती है जिससे इस बातचीत का असली आकार खुलता है।

शिव कहते हैं, “ऐसे ही प्रश्न पक्षिराज गरुड़ ने भी जाकर कौए से किये थे। पार्वती, वह सब मैं आदर सहित कहूँगा। आप मन लगाकर सुनिये।” इस एक वाक्य से बातचीत दुहरी हो जाती है। अब तक लगता था कि यहाँ एक जिज्ञासा है और आगे उसका उत्तर मिलेगा। अब मालूम होता है कि यही प्रश्न पहले भी पूछे जा चुके हैं, किसी और ने, किसी और जगह, किसी और से, और उत्तर भी दिया जा चुका है।

इसलिये आगे की कथा एक कथा नहीं होगी: एक पूछना होगा जिसके भीतर दूसरा पूछना रखा है। और शब्द है ऐसे ही, बिलकुल वैसे नहीं। पूछने वाले दो हैं, एक देवी और एक पक्षी, एक कैलास पर बैठी हैं और एक उड़कर गया था, फिर भी जो चीज़ उन्हें अटकी वह एक ही है। प्रश्न पूछने वाले से नहीं, उस चीज़ से जन्मा जिसके विषय में पूछा गया।

कहनेवाला अपनी ही कथा में उतरता है

कई प्रश्न पूछे गये थे, और उत्तर उनके क्रम से शुरू नहीं होता। कौए का शरीर क्यों, यह बाद में आयेगा। भक्ति कैसे मिली, यह और भी बाद में। पक्षिराज वहाँ क्यों गये, यह भी रुका रहेगा। जो सबसे पहले उठाया जाता है, वह सबसे छोटा दिखने वाला प्रश्न है, कि शिव ने यह कथा किस प्रकार सुनी। और वही सबसे दूर तक ले जाता है।

शिव कहते हैं, “मैंने वह भव से छुड़ाने वाली कथा जिस प्रकार सुनी, वह प्रसंग सुनिये। पहले आपका अवतार दक्ष के घर हुआ था, तब आपका नाम सती था।” इन दो वाक्यों के बीच इस बातचीत का बड़ा मोड़ है: प्रश्न एक कथा के विषय में था, और उत्तर एक जन्म से शुरू हो रहा है। यह बताने के लिये कि उन्होंने कथा कहाँ सुनी, शिव को उस समय तक लौटना पड़ रहा है जब सुनने वाली किसी और नाम से किसी और घर में थीं। और वह नाम वही शब्द है जिससे उन्होंने अभी उनकी सराहना की थी।

आगे एक पूरी कथा इतनी जल्दी निपटा दी जाती है कि सुनने में सिहरन होती है। शिव कहते हैं, “दक्ष के यज्ञ में आपका अपमान हुआ। तब आपने बहुत क्रोध करके प्राण त्याग दिये। फिर मेरे सेवकों ने यज्ञ का विध्वंस कर दिया। वह सारा प्रसंग आप जानती ही हैं।” शिव उस कथा को नहीं दोहराते जिसे सुनने वाली ने अपने ऊपर भोगा है। जो अंश उन्होंने नहीं देखा, वही आगे कहा जाता है, और वह उनके चले जाने के बाद का है।

शिव कहते हैं, “तब मेरे मन में बड़ा सोच हुआ, और प्रिये, मैं आपके वियोग से दुखी हो गया। मैं विरक्त भाव से सुन्दर वन, पर्वत, नदियाँ और तालाब देखता हुआ घूमता फिरता था।” एक पति अपनी पत्नी को बता रहा है कि उसके न रहने पर वह कैसा हो गया था। सुनने वाली वही हैं, दूसरे जन्म में, दूसरे नाम से, उसी के सामने बैठी हुईं। जिस दुःख का वर्णन हो रहा है, उसका कारण भी वही हैं और उसे सुनने वाली भी।

और दुःख का रूप भी अनोखा है: न तप, न समाधि, न एकान्त, न कोई प्रतिज्ञा। शोक यहाँ बैठा नहीं, चल रहा है, और चलते हुए जो सुन्दर पड़ता है उसे देखता चल रहा है। वैराग्य और कौतुक एक ही वाक्य में हैं, और शिव उनमें कोई विरोध नहीं देखते। जिसका सब छूट गया है, वह आँखें बन्द नहीं कर लेता।

और उसी घूमने के भीतर वह जगह आती है जहाँ यह प्रसंग आकर ठहरेगा। शिव कहते हैं, “सुमेरु पर्वत से उत्तर दिशा में, और भी दूर, एक बहुत सुन्दर नील पर्वत है। उसके सुन्दर सोने के शिखर हैं, और उनमें से चार सुन्दर शिखर मेरे मन को भा गये।” पता किसी नगर या राज्य से नहीं, एक पर्वत से दिया गया है, और वह भी उससे हटकर, और दूर। आगे की कथा इसी दूर बसी जगह पर होनी है।

“उन शिखरों में एक-एक पर एक-एक विशाल वृक्ष है, बरगद, पीपल, पाकर और आम। पर्वत के ऊपर एक सुन्दर तालाब है, जिसकी मणियों की सीढ़ियाँ देखकर मन मोहित हो जाता है।” चार शिखर, हर शिखर पर एक पेड़, और चारों पेड़ों के नाम अलग-अलग। एक भी छोड़ा नहीं गया। यह वर्णन नहीं, नक्शा है, और नक्शा वहीं बनता है जहाँ कुछ होने वाला हो। जो सोच में डूबा घूम रहा था, उसने इस एक जगह को इतने हिसाब से देखा कि उसे बाद में दोहराया जा सके।

और शिव का वर्णन अपनी आख़िरी बात उसी तालाब पर ख़र्च करता है।

उसका जल शीतल, निर्मल और मीठा है। उसमें बहुत-से रंग-बिरंगे कमल खिले हैं। हंसों के झुंड मधुर स्वर से बोल रहे हैं और सुन्दर भौंरे गुंजार कर रहे हैं। इस चित्र में एक भी आदमी नहीं: पानी है, कमल हैं, और दो तरह की आवाज़ें, हंसों की और भौंरों की। जिस बातचीत में इतने प्रश्न पूछे गये, वह ऐसी जगह पर आकर रुकती है जहाँ कोई कुछ नहीं पूछ रहा। जल के तीनों विशेषण पीने से जुड़े हैं, शीतल, निर्मल, मीठा। जिस विनती में कान को प्याला कहा गया था, उसका उत्तर एक ऐसे पानी पर रुकता है जो पिया जा सकता है।

और अन्तिम बात: जगह पूरी बन चुकी है, शिखर, पेड़, सीढ़ियाँ, पानी, पक्षी, भौंरे। जिसके विषय में यह सारा पूछना हुआ था, उसका नाम अभी नहीं आता। कथा ठीक वहाँ ठहरती है जहाँ जगह तैयार है और उसमें अभी कोई आया नहीं।

भरे मन से पूछा गया प्रश्न

नारद की स्तुति से शिव के उत्तर तक कहने वाले बदलते जाते हैं, और बहुत चुपचाप। शुरू में नारद गा रहे हैं। फिर वे चले जाते हैं और शिव बोलने लगते हैं। कुछ देर बाद शिव पूछते हैं कि अब क्या कहें, और पार्वती बोलने लगती हैं। और फिर मालूम होता है कि यही प्रश्न कहीं और, किसी और मुँह से, पहले भी पूछे जा चुके हैं। कथा कहने वाले को भी कथा के भीतर रख देना, आगे का सारा काण्ड इसी ढंग से बना है।

दूसरी बात उस गिनती की है: हज़ार में एक, करोड़ में एक, फिर करोड़ में एक, फिर करोड़ में एक, फिर हज़ारों में एक। यह सीढ़ी शास्त्र की है और उसमें कोई दया नहीं। पर जिस चीज़ के लिये वह पूरी सीढ़ी खड़ी की गयी, वह सीढ़ी के सिरे पर नहीं, एक कौए के पास मिली। और पार्वती ने इसे अन्याय नहीं कहा। न सीढ़ी को झूठा कहा, न कौए को। उन्होंने इसे संदेह कहा और समझाकर कहने की प्रार्थना की। जहाँ हिसाब और सामने की बात आपस में नहीं मिलते, वहाँ हिसाब को फेंका नहीं जाता, उसे लेकर पूछने जाया जाता है।

तीसरी बात सबसे सीधी है। पूछा गया था कि शिव ने यह कथा किस प्रकार सुनी। उत्तर किसी तीर्थ, गुरु या समाधि से शुरू हो सकता था। वह शुरू होता है एक मृत्यु से, फिर एक वियोग से, फिर एक लम्बे बेठिकाने घूमने से। जिस दिन सब छूट गया था, उसी दिन वह रास्ता खुला जिस पर चलकर यह कथा मिली। शिव इसे कहीं समझाते नहीं। बस अपना उत्तर वहीं से शुरू करते हैं, और सुनने वाली को उस दिन तक साथ ले जाते हैं जिस दिन वे स्वयं नहीं थीं।

उत्तरकाण्ड यहाँ तक एक नगर की कथा था। नारद के जाते ही वह एक पहाड़ की कथा हो जाता है। उसके बाद इस प्रसंग के अन्त तक अयोध्या का नाम एक बार भी नहीं आता, और जो बोलते हैं वे सब उससे बहुत दूर बैठे हैं। जिस राज्य के वर्णन में इतने प्रसंग लगे थे, वह एक ही क्षण में पीछे छूट जाता है, और उसकी जगह एक प्रश्न आ बैठता है।

और जो चीज़ कैलास की इस बातचीत से उठकर आगे तक जाती है, वह प्रश्न नहीं, पूछने का ढंग है। पार्वती ने पहले अपने को धन्य कहा। फिर कहा कि अब मोह नहीं रहा। फिर कहा कि फिर भी मन भरता नहीं। और तब पूछा। पूछने से पहले उन्होंने साफ़ कर दिया कि वे किसी कमी से नहीं पूछ रहीं। जो अपनी कमी भरने के लिये पूछता है, उसका उत्तर उसकी कमी जितना होता है और वहीं ख़त्म हो जाता है। जो भर जाने के बाद पूछता है, उसके लिये कहने वाले को अपने बहुत पुराने दिनों तक लौटना पड़ता है।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, उत्तरकाण्ड, दोहा 51 से 56, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।