रामचरितमानस · उत्तरकाण्ड · अवधि का आख़िरी दिन और भरत-मिलन
अवधि का आख़िरी दिन और भरत-मिलन
लौटने की अवधि का एक ही दिन बचा है, भरत हिसाब लगा रहे हैं कि अवधि बीत गयी और साँस बची रह गयी तो जगत् में उनसे नीच कौन होगा, और उसी डूबते हुए मन के पास ब्राह्मण का रूप धरे पवनपुत्र नाव की तरह आ पहुँचते हैं।
सप्तम सोपान का पहला चित्र ज़मीन का नहीं है। काण्ड के मुहाने पर जो पहला श्लोक खड़ा है, उसका आख़िरी शब्द ही बता देता है कि इस समय राम कहाँ हैं: पुष्पक पर सवार, आकाश में, लौटते हुए। उत्तरकाण्ड, यानी सातवाँ और आख़िरी सोपान, वहाँ से शुरू होता है जहाँ यात्रा पूरी नहीं हुई है पर तय हो चुकी है। और यही पन्ना उस विमान को नीचे उतारता है, ख़ाली करता है, और विदा भी कर देता है। जो काण्ड आकाश से खुला था, वह इसी प्रसंग के भीतर पाँव ज़मीन पर रखता है।
नीचे, ठीक उसी समय, एक आदमी दिन गिन रहा है। अवधि का एक ही दिन बाकी है। नगर के लोग आतुर हैं, स्त्री-पुरुष दुबले हो चुके हैं, और जहाँ-तहाँ एक ही सोच चल रही है। पर जिस आदमी पर यह प्रसंग टिका हुआ है, उसका सोच दूसरी तरफ़ मुड़ जाता है। वह यह नहीं सोचता कि राम को कहीं कुछ हो गया होगा। वह यह सोचता है कि गड़बड़ उसी में रही होगी। इसी मोड़ से यह पन्ना अपनी सबसे कड़ी पंक्ति तक पहुँचता है, जिसमें कोई प्रतिज्ञा नहीं है और कोई आग नहीं है, सिर्फ़ एक हिसाब है: अवधि बीत जाय और प्राण बचे रह जायँ, तो जगत् में उससे नीच कौन।
और फिर इस पन्ने पर पानी आता है, और बार-बार आता है। विरह का समुद्र, उसमें डूबता हुआ मन, ब्राह्मण के रूप में आयी हुई नाव, कमल जैसी आँखों से बहता हुआ जल, प्यासे को मिला हुआ अमृत, निर्मल हुई सरयू, पूर्णिमा के चाँद को देखकर उमड़ता हुआ नगर-समुद्र, और अन्त में उन आँखों में आयी हुई बाढ़ जिनसे पाठक यह उम्मीद नहीं कर रहा होता। एक ही प्रसंग में पानी इतनी बार पलटा खाता है कि उसे पकड़कर चलना ही इस पन्ने को पढ़ने का एक तरीक़ा है।
इस प्रसंग के मुख्य किरदार
- भरत अवध के बाहर, कुश के आसन पर, जटाओं का मुकुट बाँधे और दुबले शरीर से अवधि का आख़िरी दिन गिनते हुए।
- हनुमान ब्राह्मण का रूप धरकर आते हैं, ख़बर देते हैं, और अपना परिचय तभी देते हैं जब पूछा जाता है।
- राम पुष्पक पर लौटते हुए। ज़मीन पर उतरकर उनका पहला काम धनुष और बाण नीचे रखना है।
- वसिष्ठ मुनिराज, जिनसे राम सबसे पहले मिलते हैं और जिनकी दया में अपनी कुशल बताते हैं।
- शत्रुघ्न अगवानी में भरत के साथ चलते हैं और मिलन में अपनी बारी पाते हैं।
- सुग्रीव, अंगद और विभीषण वे तीन, जिन्हें राम आकाश से अपना नगर दिखाते हैं और विभीषण को लंकापति कहकर पुकारते हैं।
- पुष्पक कुबेर का विमान, जिसे इस पन्ने पर विदा दी जाती है और जिसे विदा का दुःख भी होता है।
- अवधपुरी जो ख़बर सुनते ही शोभा की खान हो जाती है और जिसे दोहा समुद्र कहकर पुकारता है।
काण्ड आकाश से खुलता है
यह सोपान तीन श्लोकों से खुलता है, और पहला श्लोक सिर से पाँव तक एक ही आकृति बना देता है। मोर के कण्ठ की आभा जैसा नीलापन, देवताओं में श्रेष्ठ, ब्राह्मण भृगु के चरणकमल के चिह्न से सुशोभित, शोभा से भरा हुआ रूप, पीला वस्त्र, कमल जैसे नेत्र, और चेहरा सदा परम प्रसन्न। हाथों में बाण और धनुष। चारों ओर वानरों का समूह। पास ही वह भाई, जो सेवा में लगा है। और इन सबके नीचे पुष्पक। तुलसी इस काण्ड के पहले ही चित्र में वह सब रख देते हैं जो आगे एक-एक करके खुलने वाला है।
केकीकण्ठाभनीलं सुरवरविलसद्विप्रपादाब्जचिह्नं शोभाढ्यं पीतवस्त्रं सरसिजनयनं सर्वदा सुप्रसन्नम्। पाणौ नाराचचापं कपिनिकरयुतं बन्धुना सेव्यमानं नौमीड्यं जानकीशं रघुवरमनिशं पुष्पकारूढरामम्॥ १॥
श्लोक १
इस श्लोक की चार चीज़ें इसी प्रसंग में हिलती हैं। हाथ का धनुष-बाण इसी पन्ने पर पृथ्वी पर रखा जायगा। वानरों का समूह इसी पन्ने पर अवध देखेगा, और दिखाने वाले राम स्वयं होंगे। सेवा में लगा हुआ भाई इसी पन्ने के आख़िरी दोहे में उस दूसरे भाई से मिलेगा जो इतनी लम्बी अवधि अवध की तरफ़ खड़ा रहा। और पुष्पक इसी पन्ने पर उतरकर कुबेर के पास लौट जायगा। मङ्गलाचरण यहाँ सजावट नहीं है। वह आने वाले प्रसंग की सूची है, और सूची का हर मद बरता जाता है।
दूसरा श्लोक पूरी आकृति से हटकर सिर्फ़ चरणों पर आ जाता है, और यह उतरना इस काण्ड में छोटी बात नहीं है।
कोसलेन्द्रपदकञ्जमञ्जुलौ कोमलावजमहेशवन्दितौ। जानकीकरसरोजलालितौ चिन्तकस्य मनभृङ्गसङ्गिनौ॥ २॥
श्लोक २
कोसलपुरी के स्वामी के वे दोनों चरणकमल सुन्दर हैं और कोमल हैं। ब्रह्मा और महेश उन्हें वन्दना करते हैं, जानकी के करकमल उन्हें दुलराते हैं, और चिन्तन करने वाले का मन भौंरे की तरह उन्हीं का नित्य संगी रहता है। अब इस पन्ने के अन्त तक ठहरिये। जब भरत प्रभु के चरणकमल पकड़ते हैं, तब उन चरणों का परिचय फिर से दिया जाता है, और वह परिचय वही है: जिन्हें देवता, मुनि, शङ्कर और ब्रह्मा नमस्कार करते हैं। काण्ड के मुहाने का दावा और मिलन के क्षण का दावा एक ही है। बीच में पूरा प्रसंग पड़ा हुआ है, और वह दावा दोहराने के लिये तुलसी को कोई नया शब्द नहीं चाहिये।
चरण इस प्रसंग में बार-बार आते हैं, और हर बार कोई झुका हुआ होता है। लक्ष्मण को भरत इसीलिये धन्य कहते हैं कि वे राम के चरणारविन्द के अनुरागी हैं। हनुमान तीन बार भरत के चरणों की तरफ़ जाते हैं: एक बार मस्तक नवाकर, एक बार पुलकित होकर गिरकर, और एक बार विदा लेते हुए सिर नवाकर। राम दौड़कर गुरु के चरणकमल पकड़ते हैं। और भरत पृथ्वी पर पड़े रह जाते हैं। इस पन्ने का सारा ऊँच-नीच पैरों के पास तय होता है, तलवार के पास नहीं।
तीसरा श्लोक राम से हटकर शङ्कर की तरफ़ मुड़ जाता है। कुन्द के फूल, चन्द्रमा और शङ्ख जैसा सुन्दर गौरवर्ण, अम्बिका के पति, वाञ्छित फल देने वाले, दया करने वाले, सुन्दर कमल जैसे नेत्रों वाले और कामदेव से छुड़ाने वाले शङ्कर को नमस्कार। यह नमस्कार यहाँ केवल शिष्टाचार नहीं है। इसी प्रसंग के आख़िरी छन्द में कहने वाला अपने को दिखा देता है, जब बीच वाक्य में पार्वती को सम्बोधन आता है और पता चलता है कि यह सारा हाल शिव अपनी संगिनी को सुना रहे हैं। जिन्हें काण्ड के मुहाने पर नमस्कार किया गया, कथा उन्हीं के मुँह से चल रही है।
सार: उत्तरकाण्ड तीन श्लोकों से खुलता है। पहला राम को पुष्पक पर, धनुष-बाण सहित और वानरों से घिरा हुआ दिखाता है, दूसरा उन्हीं के चरणों पर ठहरता है जिन्हें ब्रह्मा और महेश वन्दना करते हैं, और तीसरा शङ्कर को नमस्कार करता है, जिनके मुँह से आगे यही कथा चलेगी।
अवधि का एक ही दिन
श्लोकों के तुरन्त बाद जो दोहा आता है, वह किसी दृश्य से नहीं, गिनती से शुरू होता है।
रहा एक दिन अवधि कर अति आरत पुर लोग।
उत्तरकाण्ड का पहला दोहा
जहँ तहँ सोचहिं नारि नर कृस तन राम बियोग॥
लौटने की अवधि का एक ही दिन बाकी रह गया है, और इसीलिये नगर के लोग बहुत आतुर हैं। राम के वियोग में दुबले हुए स्त्री-पुरुष जहाँ-तहाँ यही सोच रहे हैं कि बात क्या हुई, वे अब तक क्यों नहीं आये। ध्यान दीजिये कि तुलसी यह दिन पहले पूरे नगर को गिनवाते हैं, किसी एक आदमी को नहीं। और जो शब्द इस दोहे में शरीर पर पड़ता है, वह है कृस, दुबला। यही शब्द इस पन्ने के अन्त के पास लौटता है, जब सब लोग अगवानी में आते हैं और उनके शरीर भी रघुवीर के वियोग से दुबले बताये जाते हैं। दुबलापन इस प्रसंग में किसी एक का नहीं है, और यह बात पन्ना शुरू में ही तय कर देता है।
इसके बाद, पहली चौपाई से ठीक पहले, तीन दोहे और आते हैं, और तीनों शकुन के हैं। सब सुन्दर शकुन होने लगे, सबके मन प्रसन्न हो गये, और नगर चारों ओर से रमणीक हो गया, मानो ये सारे चिह्न प्रभु का आगमन जना रहे हों। माताओं के मन में ऐसा आनन्द हो रहा है जैसे अभी कोई कहना ही चाहता हो कि सीता और लक्ष्मण सहित प्रभु आ गये। और भरत की दाहिनी आँख तथा दाहिनी भुजा बार-बार फड़क रही है। इसे शुभ शकुन जानकर उनके मन में अत्यन्त हर्ष होता है, और वे विचार करने लगते हैं।
इस क्रम पर रुकिये। शकुन ख़बर से पहले आते हैं, और भरत के सोच से भी पहले आते हैं। इसका नतीजा आगे मिलता है। जब भरत कहेंगे कि उनके हृदय में पक्का भरोसा है कि राम मिलेंगे, और उसका कारण शकुन बतायेंगे, तब वह भरोसा पाठक के लिये हवा में नहीं होगा। सबूत पहले रख दिया गया है और नतीजा बाद में आता है। और इन तीनों दोहों में जो अकेली चीज़ किसी के शरीर में घटती है, वह वही फड़कती हुई आँख और भुजा है। बाकी सब कुछ मन के भीतर है, और मन के भीतर की बात मन ही पलट भी सकता है।
सार: अवधि का एक ही दिन बचा है और नगर आतुर है। पहली चौपाई से पहले तीन दोहे शकुन के हैं: नगर रमणीक हो जाता है, माताओं का मन आनन्द से भर जाता है, और भरत की दाहिनी आँख तथा भुजा बार-बार फड़कती है।
भरत का हिसाब, अपने ही ख़िलाफ़
दोहे से चौपाई में आते ही वही एक दिन दुबारा गिना जाता है, पर अब बाहर से नहीं, एक आदमी के भीतर से।
रहेउ एक दिन अवधि अधारा । समुझत मन दुख भयउ अपारा॥
चौपाई १
कारन कवन नाथ नहिं आयउ। जानि कुटिल किधौं मोहि बिसरायउ॥
नगर ने इसे अवधि कहा था। भरत इसे अवधि अधारा कहते हैं, यानी वह अवधि जो प्राणों का आधार है। गिनती वही है, पकड़ दूसरी है। और यह समझते ही उनके मन को अपार दुःख होता है। फिर वे कारण खोजने लगते हैं, और यहीं इस चरित्र का पूरा ढाँचा खुल जाता है: क्या कारण हुआ कि नाथ नहीं आये, कहीं उन्होंने कुटिल जानकर मुझे भुला तो नहीं दिया।
जो कारण इस चौपाई में नहीं खोजा गया, वह भी उतना ही साफ़ है। भरत यह नहीं सोचते कि युद्ध लम्बा खिंच गया होगा, कि रास्ता कठिन रहा होगा, कि राम पर कोई संकट आया होगा। डर का सबसे स्वाभाविक रास्ता इस चौपाई में खुलता ही नहीं। देरी का उनके पास सिर्फ़ एक कारण है, और वह कारण वे स्वयं हैं। पूरा प्रसंग इसी एक बात को बार-बार गहरा करता है।
अहह धन्य लछिमन बड़भागी। राम पदारबिंदु अनुरागी॥
चौपाई २, पहली पंक्ति
और फिर ईर्ष्या आती है, पर वह भी नपी हुई है। लक्ष्मण धन्य हैं, बड़भागी हैं, और कारण गिना दिया गया है: वे राम के चरणारविन्द के अनुरागी हैं। सौभाग्य की नाप यहाँ पद नहीं है, वैभव नहीं है, यहाँ तक कि साथ रहना भी नहीं है। नाप चरणों से दूरी है। जिस आदमी के लिये सौभाग्य का अर्थ यही हो, उसके लिये इस पूरी अवधि का फ़ासला किस क़िस्म की सज़ा रहा होगा, यह पाठ कहता नहीं, नपवा देता है।
कपटी कुटिल मोहि प्रभु चीन्हा । ताते नाथ संग नहिं लीन्हा॥
चौपाई २, दूसरी पंक्ति
अगली ही पंक्ति में वही बात अपने सबसे कड़े रूप में आती है। प्रभु ने मुझे कपटी और कुटिल पहचान लिया, इसीलिये नाथ ने साथ नहीं लिया। ध्यान दीजिये कि क्रिया कौन-सी चुनी गयी है: चीन्हा, पहचान लिया। भरत का डर यह नहीं है कि राम ने उन्हें भुला दिया। भरत का डर यह है कि राम ने उन्हें ठीक-ठीक देख लिया। भूल जाने के डर में आदमी अपने को भीतर से निर्दोष मानता है। पहचाने जाने के डर में वह अपने को दोषी मानकर चलता है, और उसी को सही भी मानता है।
आगे की चौपाई इस हिसाब को उसके आख़िरी अंक तक ले जाती है। यदि प्रभु मेरी करनी पर ध्यान दें, तो सौ करोड़ कल्पों तक भी मेरा निस्तार नहीं हो सकता। यह संख्या वहाँ भरती के लिये नहीं है। वह इसलिये है कि इस तरफ़ का पलड़ा कभी तुल ही न सके। और इसके तुरन्त बाद वाक्य पलट जाता है: प्रभु सेवक का अवगुण कभी नहीं मानते, वे दीनों के बन्धु हैं और अत्यन्त कोमल स्वभाव के हैं। भरत की सारी आशा अपने पक्ष में कहीं नहीं रखी गयी। वह पूरी की पूरी सामने वाले के स्वभाव में रखी हुई है।
मोरे जियँ भरोस दृढ़ सोई । मिलिहहिं राम सगुन सुभ होई॥
चौपाई ३
बीतें अवधि रहहिं जौं प्राना। अधम कवन जग मोहि समाना॥
अब इस चौपाई को धीरे पढ़िये, क्योंकि इसका पहला आधा और दूसरा आधा एक-दूसरे को काटते नहीं, साथ खड़े रहते हैं। पहले आधे में पक्का भरोसा है कि राम अवश्य मिलेंगे, और उसका आधार वही शकुन हैं जो पाठक पहले ही देख चुका है। दूसरे आधे में वह पंक्ति है जिसके लिये यह प्रसंग याद किया जाता है: अवधि बीत जाने पर यदि प्राण रह गये, तो जगत् में मेरे समान अधम कौन होगा।
इस पंक्ति में जो नहीं है, उसे भी देख लीजिये। कोई प्रतिज्ञा नहीं है। कोई आग नहीं है, कोई चिता नहीं है, कोई तैयारी नहीं है, कल क्या किया जायगा इसकी कोई घोषणा नहीं है। तुलसी इसे शर्त में रखते हैं और प्रश्न में रखते हैं, और वहीं छोड़ देते हैं। भरत यहाँ अपने प्राणों की धमकी नहीं दे रहे। वे अपने नाम का हिसाब लगा रहे हैं, और हिसाब का नतीजा एक ही शब्द है, अधम। यही शब्द इस प्रसंग में आगे लौटेगा, जब वे हनुमान से अपना सबसे बड़ा प्रश्न पूछेंगे और अपने लिये दास से ऊँचा कोई दर्जा माँगेंगे ही नहीं।
सार: भरत अवधि को प्राणों का आधार कहते हैं, न आने का कारण अपने भीतर खोजते हैं, लक्ष्मण को चरणों का अनुरागी होने के कारण धन्य कहते हैं, और अन्त में कहते हैं कि अवधि बीत जाने पर प्राण रह गये तो उनसे नीच कोई नहीं। यहाँ न कोई प्रतिज्ञा है, न कोई आग।
डूबते हुए के पास नाव
और ठीक उसी जगह, जहाँ यह हिसाब सबसे नीचे पहुँच चुका है, दोहा आता है और दृश्य को पानी में बदल देता है।
राम बिरह सागर महँ भरत मगन मन होत।
दोहा १ (क)
बिप्र रूप धरि पवनसुत आइ गयउ जनु पोत॥ १ (क)॥
राम के विरह के समुद्र में भरत का मन डूब रहा था, और उसी समय पवनपुत्र ब्राह्मण का रूप धरकर इस तरह आ गये मानो नाव आ गयी हो। उपमा क्रिया में से निकली है। जो आदमी डूब रहा है उसे न दीया चाहिये, न सलाह, न साथ। उसे नाव चाहिये, और नाव भी वह जो पास तक आ जाय। तुलसी वही देते हैं, और जनु कहकर देते हैं, जिससे नाव नाव ही बनी रहती है और चमत्कार नहीं बनती।
ब्राह्मण का रूप क्यों, यह पाठ बताता नहीं। पर उसका नतीजा दो पंक्ति बाद दिख जाता है। भरत उस अजनबी को तात कहकर सम्बोधित करते हैं, यह जाने बिना कि वह कौन है, और नाम सुनने के बाद उठकर आदर से गले लगाते हैं। यह रूप उतनी ही देर टिकता है जितनी देर में ख़बर पहुँच जाय, और जैसे ही पूछा जाता है, वैसे ही छोड़ दिया जाता है।
बैठे देखि कुसासन जटा मुकुट कृस गात।
दोहा १ (ख)
राम राम रघुपति जपत स्रवत नयन जलजात॥ १ (ख)॥
अब देखिये कि हनुमान को क्या दिखता है। कुश के आसन पर बैठे हुए, जटाओं का मुकुट बनाये हुए, दुबले शरीर वाले भरत, राम राम रघुपति जपते हुए, और कमल जैसे नेत्रों से जल बहाते हुए। इस पूरे प्रसंग में उस जगह का नाम एक बार भी नहीं आता जहाँ वे बैठे हैं। पाठ पता नहीं देता, मुद्रा देता है। आसन कुसासन, मुकुट बालों का, शरीर दुबला, मुँह पर एक ही नाम, और चेहरे पर पानी। और ध्यान दीजिये कि इस पूरे प्रसंग में मुकुट यही एक है, और वह किसी धातु का नहीं है।
यह उसी पानी का दूसरा रूप है जो अभी-अभी समुद्र था। समुद्र बाहर था और डुबा रहा था, यह जल भीतर से निकलकर आँखों पर आया है। आगे यही जल हनुमान की आँखों में बरसेगा, फिर प्यास बनकर आयेगा, फिर सरयू में निर्मल होगा, फिर पूरे नगर का ज्वार बनेगा, और अन्त में उस चेहरे तक पहुँचेगा जिसकी तरफ़ यह सारा प्रसंग चल रहा है।
सार: विरह के समुद्र में डूबते हुए भरत के पास हनुमान ब्राह्मण का रूप धरकर नाव की तरह आते हैं, और उन्हें कुश के आसन पर, जटाओं का मुकुट बाँधे, दुबले शरीर से राम-नाम जपते और आँखों से जल बहाते हुए पाते हैं। जगह का नाम पाठ में कहीं नहीं है।
ख़बर, और उसके भीतर एक शब्द
ख़बर देने से पहले तुलसी एक पूरी चौपाई ख़बर देने वाले पर ख़र्च करते हैं। भरत को देखते ही हनुमान अत्यन्त हर्षित होते हैं, उनका शरीर पुलकित हो जाता है, नेत्रों से जल बरसने लगता है, और मन में बहुत प्रकार से सुख मानकर वे वह वाणी बोलते हैं जो कानों के लिये अमृत के समान है। ध्यान दीजिये कि वाणी का परिचय उसके अर्थ से नहीं, कान पर पड़ने वाले असर से दिया गया है। जो कहा जाने वाला है, उसे सुनने की तैयारी पहले करा दी गयी है।
जासु बिरहँ सोचहु दिन राती। रटहु निरंतर गुन गन पाँती॥
चौपाई ४
रघुकुल तिलक सुजन सुखदाता। आयउ कुसल देव मुनि त्राता॥
अब इस सन्देश की बनावट देखिये। यह राम से शुरू नहीं होता। यह सुनने वाले से शुरू होता है, और सुनने वाले को उसका अपना जीवन लौटाकर सुनाता है: जिनके विरह में आप दिन-रात घुलते रहते हैं, जिनके गुण-समूहों की पंक्तियाँ आप निरन्तर रटते रहते हैं। इसके बाद उपाधियाँ आती हैं, रघुकुल के तिलक, सज्जनों को सुख देने वाले, देवताओं और मुनियों के रक्षक। और इन सबके बीच असली ख़बर दो ही शब्दों में है, आ गये और कुसल। जिस आदमी ने अभी-अभी अपने बचे रह जाने का हिसाब लगाया था, उसे बस यही एक शब्द चाहिये था।
अगली चौपाई ब्योरा देती है, और उसका क्रम भी चुना हुआ है। शत्रु को रण में जीतकर, देवता सुन्दर यश गा रहे हैं, और सीता तथा लक्ष्मण सहित प्रभु आ रहे हैं। और फिर असर दर्ज होता है: ये वचन सुनते ही सारे दुःख भूल गये, जैसे प्यासा आदमी अमृत पाकर प्यास का दुःख भूल जाय। उपमा फिर पानी की है, पर अब पानी की कमी की है। एक ही पन्ने पर एक आदमी पहले डूबता हुआ बताया गया और अब प्यासा बताया जा रहा है, और दोनों बातें एक ही विरह के दो चेहरे हैं।
इसके बाद भरत पूछते हैं कि आप कौन हैं और कहाँ से आये हैं, जिन्होंने मुझे इतने प्रिय वचन सुनाये। उत्तर में हनुमान चार चीज़ें इसी क्रम से देते हैं: पवन का पुत्र, जाति का वानर, नाम हनुमान, और फिर अगली ही पंक्ति में, दीनों के बन्धु रघुनाथ का दास। ब्राह्मण का रूप यहाँ न बचाया जाता है, न समझाया जाता है। और परिचय की इस सूची में सबसे आख़िरी मद ही सबसे बड़ा है, क्योंकि वही सुनकर भरत उठ खड़े होते हैं।
यह सुनते ही भरत उठकर आदरपूर्वक गले लगते हैं, और मिलते समय प्रेम हृदय में नहीं समाता, नेत्रों से जल बहता है, शरीर पुलकित हो जाता है। फिर वे कहते हैं कि आपके दर्शन से मेरे समस्त दुःख बीत गये, आज मुझे प्यारे राम ही मिल गये। बार-बार कुशल पूछते हैं, और फिर पूछते हैं कि इस संवाद के बदले क्या दूँ। अगली चौपाई उस हिसाब को चुकता होने से मना कर देती है: इस सन्देश के बराबर जगत् में कुछ भी नहीं है, मैंने विचार करके देख लिया, मैं उऋण नहीं हो सकता। और इसके बाद वे जो माँगते हैं वह चुकाना नहीं है, और लेना है। अब प्रभु का चरित सुनाइये।
सार: हनुमान की वाणी का परिचय उसके असर से दिया जाता है, ख़बर सुनने वाले के अपने जीवन से शुरू होती है, और उसका असली शब्द कुशल है। भरत सारे दुःख भूल जाते हैं, परिचय पूछते हैं, गले लगते हैं, उऋण होने से इनकार करते हैं, और बदले में और कथा माँग लेते हैं।
दास की नाईं
अब वह प्रश्न आता है जिस पर यह पूरा प्रसंग टिका हुआ है, और वह पूछा उस आदमी से जाता है जो अभी-अभी लङ्का से लौटा है।
तब हनुमंत नाइ पद माथा। कहे सकल रघुपति गुन गाथा॥
चौपाई ५
कहु कपि कबहुँ कृपाल गोसाईं । सुमिरहिं मोहि दास की नाईं॥
पहले आधे में हनुमान भरत के चरणों में मस्तक नवाकर रघुनाथ की सारी गुणगाथा कहते हैं। दूसरे आधे में भरत का प्रश्न आता है: कहो, कृपालु स्वामी कभी मुझे अपने दास की तरह याद भी करते हैं। इस प्रश्न में जो तुलना माँगी गयी है, उस पर ठहरिये। भरत यह नहीं पूछते कि राम उन्हें भाई की तरह याद करते हैं, या अपना मानते हैं, या उनका इन्तज़ार करते हैं। वे नीचे की तुलना माँगते हैं, दास की नाईं, और वही उनकी सबसे बड़ी माँग है। यह उसी आदमी की भाषा है जिसने थोड़ी देर पहले अपने लिये अधम शब्द चुना था।
निज दास ज्यों रघुबंसभूषन कबहुँ मम सुमिरन कर्यो।
छन्द
सुनि भरत बचन बिनीत अति कपि पुलकि तन चरनन्हि पर्यो॥
रघुबीर निज मुख जासु गुन गन कहत अग जग नाथ जो।
काहे न होइ बिनीत परम पुनीत सदगुन सिंधु सो॥
इस छन्द का ढाँचा देखने लायक़ है। पहली पंक्ति भरत का प्रश्न लगभग उन्हीं के शब्दों में दोहरा देती है। दूसरी पंक्ति में हनुमान वह अत्यन्त नम्र वचन सुनकर पुलकित शरीर से उनके चरणों पर गिर पड़ते हैं। और तीसरी तथा चौथी पंक्ति में जो आता है वह उत्तर नहीं, तर्क है: जिनके गुणसमूहों का वर्णन चराचर के स्वामी रघुवीर अपने श्रीमुख से करते हैं, वे विनम्र, परम पवित्र और सद्गुणों के समुद्र क्यों न हों।
यानी स्मृति के प्रश्न का उत्तर वाणी के सबूत से दिया जाता है। भरत ने पूछा था कि क्या वे याद करते हैं, और हनुमान का दिया हुआ प्रमाण यह है कि वे आपकी बात करते हैं, वह भी अपने मुँह से। इस पूरे छन्द में हाँ कहीं नहीं कही गयी, और छन्द स्वयं एक प्रश्न पर ख़त्म होता है। सीधी हाँ के लिये पाठ दोहे तक रुकता है, जहाँ हनुमान कहते हैं कि आप राम को प्राणों के समान प्रिय हैं और मेरा वचन सत्य है। यह सुनकर भरत बार-बार मिलते हैं और हर्ष हृदय में नहीं समाता। जिस बात को छन्द ने घुमाकर कहा, उसे दोहा सपाट कह देता है, और दोनों ज़रूरी हैं।
भरत चरन सिरु नाइ तुरित गयउ कपि राम पहिं।
सोरठा २ (ख)
कही कुसल सब जाइ हरषि चलेउ प्रभु जान चढ़ि॥ २ (ख)॥
इसके बाद सोरठा हनुमान को लौटा देता है। वे भरत के चरणों में सिर नवाकर तुरन्त राम के पास जाते हैं, जाकर सब कुशल कहते हैं, और प्रभु हर्षित होकर विमान पर चढ़कर चलते हैं। यहाँ उस शब्द को गिनना शुरू कीजिये जो इस पन्ने पर सबसे ज़्यादा यात्रा करता है। कुशल हनुमान लेकर भरत तक आती है। कुशल भरत बार-बार हनुमान से पूछते हैं। कुशल हनुमान लौटाकर राम तक ले जाते हैं। कुशल भरत नगर में पहुँचाते हैं और माताओं को समझाते हैं। कुशल मुनिराज वसिष्ठ राम से पूछते हैं और राम उन्हें लौटाते हैं। और अन्त में कुशल राम भरत से पूछते हैं। जिस पन्ने पर एक भी हथियार नहीं उठता, उस पर सबसे ज़्यादा चलने वाला शब्द यही है।
सार: भरत का असली प्रश्न यह है कि क्या राम उन्हें दास की तरह याद करते हैं। हनुमान उत्तर में हाँ नहीं कहते, चरणों पर गिरकर यह कहते हैं कि जिनके गुण राम अपने मुँह से गाते हैं वे विनम्र क्यों न हों। सीधी हाँ दोहे में आती है, और फिर वे कुशल लेकर लौट जाते हैं।
अवध दौड़ पड़ी
इधर भरत हर्षित होकर कोसलपुर आते हैं, और ख़बर देने का क्रम ठीक वही है जो इस घर में होना चाहिये। पहले गुरु को सब समाचार सुनाते हैं, फिर राजमहल में ख़बर जनवाते हैं कि रघुनाथ कुशलपूर्वक नगर को आ रहे हैं, और उसके बाद नगर को पता चलता है। ख़बर सीढ़ी-दर-सीढ़ी उतरती है। यह क्रम इस पन्ने पर आख़िरी व्यवस्थित चीज़ है, क्योंकि इसके तुरन्त बाद जो होता है उसमें कोई व्यवस्था नहीं बचती।
सुनते ही सब माताएँ उठकर दौड़ पड़ती हैं। भरत प्रभु की कुशल कहकर उन्हें समझाते हैं। नगरनिवासियों को समाचार मिलता है तो स्त्री-पुरुष सभी हर्षित होकर दौड़ते हैं। सौभाग्यवती स्त्रियाँ सोने के थालों में दही, दूब, गोरोचन, फल, फूल और मङ्गल की जड़ नवीन तुलसीदल भर-भरकर गाती हुई चलती हैं, और उनकी चाल के लिये पाठ ने हथिनी की चाल वाला शब्द चुना है, जो जल्दी का शब्द नहीं, ठसक का शब्द है। ठीक अगली चौपाई बताती है कि बाकी पूरे नगर में जल्दी ही जल्दी है, और दोनों चालें एक साथ चल रही हैं।
जे जैसेहिं तैसेहिं उठि धावहिं । बाल बृद्ध कहँ संग न लावहिं॥
चौपाई ६
एक एकन्ह कहँ बूझहिं भाई । तुम्ह देखे दयाल रघुराई॥
जो जिस दशा में है, वह वैसे ही उठकर दौड़ता है। बालकों और बूढ़ों को कोई साथ नहीं लाता, और इसका कारण भी बता दिया गया है: देर हो जाने का डर। और दौड़ते-दौड़ते वे एक-दूसरे से पूछते हैं, भाई, दयालु रघुनाथ को देखा। यह ऐसा प्रश्न है जिसका उत्तर उस समय किसी के पास हो ही नहीं सकता, क्योंकि अभी तक कोई पहुँचा ही नहीं है। भीड़ का यही लक्षण है, और तुलसी उसे बिना किसी टिप्पणी के रख देते हैं। इसी एक चौपाई में इस पन्ने का सबसे मानवीय ब्योरा है, बूढ़े और बच्चे पीछे छूट गये, और वह किसी को बुरा नहीं लगता।
प्रभु को आते जानकर अवधपुरी सम्पूर्ण शोभाओं की खान हो जाती है। तीनों प्रकार की सुहावनी वायु बहने लगती है और सरयू का जल अत्यन्त निर्मल हो जाता है। इसके बाद के दोहे अगवानी को आकार देते हैं। गुरु वसिष्ठ, कुटुम्बी, छोटे भाई शत्रुघ्न और ब्राह्मणों के समूह के साथ भरत अत्यन्त प्रेमपूर्ण मन से सामने चलते हैं। बहुत-सी स्त्रियाँ अटारियों पर चढ़कर आकाश में विमान देखती हैं और उसे देखकर मीठे स्वर से सुन्दर मङ्गलगान करती हैं। नगर ऊपर देख रहा है, और जो देख रहा है वह अभी भी आकाश में है।
और तीसरा दोहा वह उपमा देता है जो इस पूरे नगर-दृश्य को एक ही चित्र में बाँध देती है। रघुनाथ पूर्णिमा के चन्द्रमा हैं, अवधपुर समुद्र है, और वह समुद्र उस पूर्णचन्द्र को देखकर हर्षित होता हुआ, शोर करता हुआ बढ़ रहा है। इधर-उधर दौड़ती हुई स्त्रियाँ उसकी तरंगें हैं। अब इस पन्ने का समुद्र गिनिये। पहली बार वह राम का विरह था और भरत उसमें डूब रहे थे। अब वही शब्द नगर का नाम है, और वह डुबाता नहीं, उमड़ता है। बीच के छन्द में हनुमान भरत को ही सद्गुणों का समुद्र कह चुके हैं, और आगे राम दो बार कृपा के सिंधु कहे जायँगे। एक ही शब्द इस प्रसंग में चार बार मालिक बदलता है, और हर बार पानी का बर्ताव बदल जाता है।
सार: ख़बर गुरु, महल और नगर के क्रम से उतरती है, और उसके बाद अवध बिना क्रम के दौड़ पड़ता है। सरयू निर्मल हो जाती है, स्त्रियाँ अटारियों से विमान देखती हैं, और दोहा नगर को समुद्र तथा राम को पूर्णिमा का चाँद कहकर भीड़ की हलचल को ज्वार बना देता है।
राम अपना नगर दिखाते हैं
ऊपर, विमान पर, इसी बीच एक और दृश्य चल रहा है। सूर्यकुल रूपी कमल को खिलाने वाले सूर्य राम वानरों को मनोहर नगर दिखा रहे हैं, और जिन्हें दिखा रहे हैं उनके नाम गिना दिये गये हैं: सुग्रीव, अंगद, और लंकापति। ध्यान दीजिये कि विभीषण को यहाँ उसी उपाधि से पुकारा गया है जो उन्हें अभी-अभी मिली है। अवध का पहला वर्णन अवध वालों के लिये नहीं है। वह दो वानरों और लङ्का के राजा के लिये है, यानी उनके लिये जिन्होंने यह लौटना सम्भव किया।
जद्यपि सब बैकुंठ बखाना। बेद पुरान बिदित जगु जाना॥
चौपाई ७
अवधपुरी सम प्रिय नहिं सोऊ । यह प्रसंग जानइ कोउ कोऊ॥
सबने वैकुण्ठ की बड़ाई की है, यह वेद-पुराणों में प्रसिद्ध है और जगत् जानता है, फिर भी अवधपुरी के समान वह भी प्रिय नहीं है। और इसके तुरन्त बाद वाली आधी पंक्ति इस दावे को ढक भी देती है: यह बात कोउ कोऊ जानता है, यानी कोई-कोई, विरले। राम अपनी सबसे बड़ी बात कहते हैं और उसी साँस में उसे रहस्य बता देते हैं। और यह भी देखिये कि दावा किस तराज़ू पर है। वैकुण्ठ छोटा नहीं कहा गया, बस प्रिय कम कहा गया, और प्रिय होना नाप से नहीं तय होता।
आगे कारण आता है, और कारण में कोई बड़ाई नहीं है। यह सुहावनी पुरी मेरी जन्मभूमि है। इसके उत्तर की दिशा में पवित्र करने वाली सरयू बहती है, जिसमें स्नान करने से मनुष्य बिनहिं प्रयासा, यानी बिना किसी परिश्रम के, मेरे समीप निवास पा जाते हैं। यहाँ के निवासी मुझे बहुत ही प्रिय हैं। यह पुरी सुख की राशि है और मेरा धाम देने वाली है। सुनकर सब वानर हर्षित होते हैं और कहते हैं कि जिस अवध की बड़ाई स्वयं राम ने की, वह धन्य है। ध्यान दीजिये कि इस पूरे वर्णन में एक भी इमारत नहीं है। नदी है, जन्म है, और यहाँ के लोग हैं।
इसके बाद विमान उतरता है। सब लोगों को आते देखकर कृपासागर भगवान् विमान को नगर के समीप उतरने की प्रेरणा देते हैं और वह पृथ्वी पर उतर जाता है। और फिर उसे विदा दी जाती है: अब कुबेर के पास जाइये। राम की प्रेरणा से वह चला, और उसके साथ दो चीज़ें एक ही आधी पंक्ति में दर्ज हैं, हरषु और बिरहु। अपने स्वामी के पास लौटने का हर्ष, और राम से अलग होने का अत्यन्त दुःख। इस पन्ने पर विरह महसूस करने वाला आख़िरी नाम किसी आदमी का नहीं है। वह एक विमान है। और तुलसी उसके दोनों भाव साथ रखकर उनमें से किसी को चुनते नहीं, ठीक वैसे ही जैसे उन्होंने भरत के भरोसे और भरत की आत्मग्लानि को एक ही चौपाई में साथ रख दिया था।
सार: राम आकाश से सुग्रीव, अंगद और लंकापति को अवध दिखाते हैं और कहते हैं कि वैकुण्ठ भी उन्हें इस पुरी के समान प्रिय नहीं, पर यह बात विरले जानते हैं। फिर विमान नगर के पास उतरता है और कुबेर के पास लौटा दिया जाता है, हर्ष और विरह दोनों लेकर।
धनुष नीचे रखकर
भरत के साथ सब लोग आते हैं, और उनके शरीर उसी वियोग से दुबले हैं जिससे नगर पहले दोहे में दुबला बताया गया था। सामने वामदेव, वसिष्ठ और मुनिश्रेष्ठ हैं। और यहाँ राम का पहला काम वह है जिस पर इस काण्ड का पहला श्लोक याद आना चाहिये। वे धनुष और बाण पृथ्वी पर रख देते हैं। मङ्गलाचरण में उनके हाथों में बाण और धनुष थे और वही उस चित्र की सबसे चमकती हुई चीज़ थी। ज़मीन पर उतरकर पहला काम उन्हें नीचे रखना है। जो सोपान अभी-अभी बीता है और जो सोपान अभी शुरू हुआ है, उनका फ़र्क़ इसी एक हरकत में रख दिया गया है।
फिर वे छोटे भाई सहित दौड़कर गुरु के चरणकमल पकड़ लेते हैं, और उनके रोम-रोम पुलकित हैं। मुनिराज उन्हें उठाकर गले लगाते हैं और कुशल पूछते हैं, और उत्तर में राम कहते हैं कि हमारी कुशल आपकी ही दया में है। इसके बाद वे सब ब्राह्मणों से मिलकर उन्हें मस्तक नवाते हैं। और तब भरत प्रभु के वे चरणकमल पकड़ते हैं जिन्हें देवता, मुनि, शङ्कर और ब्रह्मा नमस्कार करते हैं। क्रम पर ध्यान दीजिये, और उस एक शब्द पर भी जो भरत की बारी को चिह्नित करता है, पुनि, इसके बाद। जो इस पूरी अवधि के दिन गिनता रहा है वह इस मिलन में चौथे नम्बर पर आता है, और पाठ इसे बिना किसी टिप्पणी के दर्ज करता है, क्योंकि इस घर में यही क्रम ठीक है और भरत उसे किसी और से ज़्यादा मानते हैं।
परे भूमि नहिं उठत उठाए। बर करि कृपासिंधु उर लाए॥
चौपाई ८
स्यामल गात रोम भए ठाढ़े । नव राजीव नयन जल बाढ़े॥
भरत पृथ्वी पर पड़े हैं और उठाये जाने पर भी नहीं उठते। तब कृपासिंधु उन्हें बर करि, यानी ज़बरदस्ती उठाकर, हृदय से लगा लेते हैं। इस पूरे प्रसंग में बल का प्रयोग यही एक है, और वह किसी शत्रु पर नहीं होता, एक भाई को ज़मीन से उठाने में होता है। लङ्का से लौटे हुए हाथों का पहला काम यही है। और इसके बाद वह पंक्ति आती है जिसकी तरफ़ यह सारा पानी बहता रहा था: साँवले शरीर पर रोएँ खड़े हो गये, और नवीन कमल जैसे नेत्रों में जल की बाढ़ आ गयी। ये आँखें भरत की नहीं हैं। ये उस शरीर की हैं जिसे साँवला कहा गया है।
राजीव लोचन स्रवत जल तन ललित पुलकावलि बनी।
छन्द
अति प्रेम हृदयँ लगाइ अनुजहि मिले प्रभु त्रिभुअन धनी॥
प्रभु मिलत अनुजहि सोह मो पहिं जाति नहिं उपमा कही।
जनु प्रेम अरु सिंगार तनु धरि मिले बर सुषमा लही॥
बूझत कृपानिधि कुसल भरतहि बचन बेगि न आवई। सुनु सिवा सो सुख बचन मन ते भिन्न जान जो पावई॥ अब कुसल कौसलनाथ आरत जानि जन दरसन दियो। बूड़त बिरह बारीस कृपानिधान मोहि कर गहि लियो॥॥ २॥
छन्द उसी क्षण को फैला देता है। कमल जैसे नेत्रों से जल बह रहा है, सुन्दर शरीर पर पुलकावली बनी हुई है, और त्रिभुवन के स्वामी अत्यन्त प्रेम से छोटे भाई को हृदय से लगाकर मिले। फिर तुलसी वह करते हैं जो वे बहुत कम करते हैं। वे अपनी हार लिख देते हैं: भाई से मिलते समय प्रभु जैसे शोभित हो रहे हैं, उसकी उपमा मुझसे कही नहीं जाती। और यह कहकर वे उपमा दे भी देते हैं, मानो प्रेम और शृंगार शरीर धारण करके मिले हों और श्रेष्ठ शोभा को प्राप्त हुए हों। जिस उपमा को असम्भव बताया गया, उसमें मिलने वाले दो लोग नहीं हैं। दो भाव हैं, जिन्हें शरीर मिल गया है।
आगे का छन्द उसी क्षण को एक क़दम और ले जाता है। कृपानिधान भरत से कुशल पूछते हैं, पर आनन्द के मारे उनके मुँह से वचन जल्दी नहीं निकलते। और यहीं कहने वाला अपने को दिखा देता है: सुनो, वह सुख वचन और मन से परे है, उसे वही जानता है जो उसे पाता है। यह वाक्य पार्वती को सम्बोधित है, यानी यह सारा हाल शिव के मुँह से चल रहा है, उन्हीं शङ्कर के मुँह से जिन्हें काण्ड के तीसरे श्लोक में नमस्कार किया गया था। और फिर भरत बोलते हैं, और उनका वाक्य इस पन्ने के पहले दोहे पर लौट जाता है: विरह के समुद्र में डूबते हुए मुझको कृपानिधान ने हाथ पकड़कर बचा लिया। दोहा एक में नाव आयी थी। छन्द में हाथ आता है, और वह हाथ राम का है।
पुनि प्रभु हरषि सत्रुहन भेंटे हृदयँ लगाइ।
दोहा ५
लछिमन भरत मिले तब परम प्रेम दोउ भाइ॥ ५॥
और प्रसंग का आख़िरी दोहा मिलन को बाँट देता है। प्रभु हर्षित होकर शत्रुघ्न को हृदय से लगाकर मिलते हैं, और तब लक्ष्मण और भरत दोनों भाई परम प्रेम से मिलते हैं। ध्यान दीजिये कि यह पन्ना किस मिलन पर ख़त्म होता है। आख़िरी पंक्ति में राम नहीं हैं। उसमें वे दो हैं जो इस पूरी अवधि के दो सिरों पर खड़े रहे, एक राम के साथ और एक अवध के बाहर। और जिस आदमी ने इस पन्ने की शुरुआत में लक्ष्मण को धन्य और बड़भागी कहा था, वह पन्ने के आख़िर में उन्हीं से गले मिलता है।
सार: राम ज़मीन पर उतरते ही धनुष-बाण रख देते हैं, गुरु के चरण पकड़ते हैं, ब्राह्मणों को मस्तक नवाते हैं, और तब भरत को ज़बरदस्ती उठाकर हृदय से लगाते हैं। जल की बाढ़ राम की आँखों में आती है, और प्रसंग लक्ष्मण तथा भरत के मिलने पर ख़त्म होता है।
और अन्त में, अपनी ओर
इस पन्ने को एक बार सिर्फ़ पानी के सहारे पढ़िये और देखिये कि कितनी दूर पहुँचा जाता है। पहले विरह का समुद्र, जिसमें एक मन डूब रहा है। फिर नाव, जो ब्राह्मण के रूप में आती है। फिर कमल जैसे नेत्रों से बहता हुआ जल, जो भरत के चेहरे पर है। फिर हनुमान की आँखों से बरसता हुआ जल। फिर प्यास, और अमृत। फिर सरयू, जिसका जल ख़बर सुनते ही निर्मल हो जाता है। फिर पूरा नगर, जो समुद्र कहलाता है और चाँद को देखकर उमड़ता है। और अन्त में उन नेत्रों में आयी हुई बाढ़ जो साँवले शरीर के हैं। एक ही पानी पूरे प्रसंग में जगह बदलता रहता है, और हर जगह उसका काम अलग है।
दूसरी बात उस तुलना की है जो भरत अपने लिये चुनते हैं, और वह हर बार नीचे की तरफ़ होती है। वे अपने को कपटी और कुटिल कहते हैं। वे कहते हैं कि अवधि बीत जाने पर प्राण रह गये तो उनसे अधम कोई नहीं। और जब उन्हें हनुमान से कुछ भी पूछने का मौक़ा मिलता है, तो वे यह पूछते हैं कि क्या राम उन्हें दास की तरह याद करते हैं। तीनों जगह वे अपने लिये सबसे नीचे का दर्जा माँगते हैं। और इसी पन्ने पर राम भी एक बार यही करते हैं, जब वसिष्ठ कुशल पूछते हैं और वे उत्तर देते हैं कि हमारी कुशल आपकी ही दया में है। दोनों में से कोई अपनी ज़मीन पर खड़ा होना नहीं चाहता, और मिलन इसी वजह से इतना नीचे, ज़मीन के इतने पास होता है।
और तीसरी बात उन नामों की है जो इस प्रसंग में नहीं आते। जिस जगह भरत बैठे हैं, उसका नाम एक बार भी नहीं आता। दशरथ का नाम एक बार भी नहीं आता। सीता का नाम इस प्रसंग की चौपाइयों और दोहों में एक ही बार आता है, हनुमान की दी हुई ख़बर में, और उसके बाद वे इस पन्ने पर कुछ करती नहीं; काण्ड के आरम्भिक श्लोकों में वे जानकी के नाम से दो बार आती हैं, एक बार राम के परिचय में और एक बार उन चरणों के प्रसंग में जिन्हें उनके करकमल दुलराते हैं। जिस लौटने की यह कथा है, उसमें अभी बहुत लोग बाकी हैं, और तुलसी उन्हें इस पन्ने पर बुलाते नहीं।
इस प्रसंग में लड़ाई एक भी नहीं है, और फिर भी यह काण्ड का सबसे तनाव भरा हिस्सा हो सकता था, क्योंकि यहाँ जो दाँव पर लगा है वह किसी का जीवन नहीं, एक आदमी का अपने बारे में फ़ैसला है। अवधि का एक दिन बचा है। यदि वह दिन बीत जाय, तो भरत के हिसाब से जो कुछ ग़लत साबित होगा वह राम नहीं होंगे, वे स्वयं होंगे। इसीलिये ख़बर का असली शब्द कुशल है, इसीलिये सबसे बड़ा प्रश्न याददाश्त का है, और इसीलिये मिलन के क्षण में उठाने के लिये ज़ोर लगाना पड़ता है। जो आदमी अपने को इतना नीचे रख चुका हो, उसे हृदय तक लाने के लिये हाथ का बल ही काम आता है।
और काण्ड की बनावट को एक बार पीछे हटकर देखिये। यह सोपान आकाश में खुला था, एक उड़ते हुए विमान पर, हाथों में धनुष-बाण लिये हुए। यह पहला प्रसंग ख़त्म होने तक विमान लौटाया जा चुका है, धनुष और बाण पृथ्वी पर रखे जा चुके हैं, और जो कुछ बचा है वह एक दुबला शरीर है जिसे सीने से लगाया जा रहा है। सातवाँ सोपान अपनी ऊँचाई से उतरकर वहाँ आ गया है जहाँ बाकी की सारी कथा घटेगी।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, उत्तरकाण्ड, दोहा १ से ५, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।