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रामचरितमानसउत्तरकाण्डप्रसंग 1
अवधि का आख़िरी दिन और भरत-मिलन
लौटने की अवधि का एक ही दिन बचा है। भरत हिसाब लगा रहे हैं कि अवधि बीत गयी और साँस बची रह गयी तो जगत् में उनसे नीच कौन होगा। उसी डूबते हुए मन के पास ब्राह्मण का रूप धरे हनुमान नाव की तरह आ पहुँचते हैं।
सप्तम सोपान का पहला चित्र ज़मीन का नहीं है। काण्ड की पहली स्तुति ही बता देती है कि इस समय राम कहाँ हैं: पुष्पक पर सवार, आकाश में, लौटते हुए। उत्तरकाण्ड, यानी सातवाँ और आख़िरी सोपान, वहाँ से शुरू होता है जहाँ यात्रा पूरी नहीं हुई पर तय हो चुकी है। इसी प्रसंग में वह विमान नीचे उतरता है, ख़ाली होता है और विदा भी हो जाता है।
नीचे, उसी समय, एक आदमी दिन गिन रहा है। अवधि का एक ही दिन बाकी है। नगर के लोग आतुर हैं, स्त्री-पुरुष दुबले हो चुके हैं। पर भरत का सोच दूसरी तरफ़ मुड़ता है। वे यह नहीं सोचते कि राम को कहीं कुछ हो गया होगा। वे सोचते हैं कि कमी उन्हीं में रही होगी। इसी मोड़ से कथा उस बात तक पहुँचती है जिसमें न कोई प्रतिज्ञा है, न कोई आग। उसमें केवल एक हिसाब है: अवधि बीत जाय और प्राण बचे रह जायँ, तो जगत् में उनसे नीच कौन।
इस प्रसंग में पानी बार-बार आता है: विरह का समुद्र, उसमें डूबता हुआ मन, ब्राह्मण के रूप में आयी हुई नाव। भरत की आँखों से बहता जल, प्यासे को मिला अमृत, निर्मल हुई सरयू, पूर्णिमा के चाँद को देखकर उमड़ता हुआ नगर-समुद्र, और अन्त में राम की आँखों में आयी बाढ़।
कुश के आसन से पुष्पक तक
- भरत अवध के बाहर, कुश के आसन पर, जटाओं का मुकुट बाँधे और दुबले शरीर से अवधि का आख़िरी दिन गिनते हुए।
- हनुमान ब्राह्मण का रूप धरकर आते हैं, ख़बर देते हैं, और अपना परिचय तभी देते हैं जब पूछा जाता है।
- राम पुष्पक पर लौटते हुए। ज़मीन पर उतरकर उनका पहला काम धनुष और बाण नीचे रखना है।
- वसिष्ठ कुलगुरु, जिनसे राम सबसे पहले मिलते हैं और जिनकी दया में अपनी कुशल बताते हैं।
- शत्रुघ्न अगवानी में भरत के साथ चलते हैं और मिलन में अपनी बारी पाते हैं।
- सुग्रीव, अंगद और विभीषण वे तीन, जिन्हें राम आकाश से अपना नगर दिखाते हैं। विभीषण को वे लङ्का का राजा कहकर पुकारते हैं।
- पुष्पक कुबेर का विमान, जिसे नगर के समीप उतरते ही विदा दी जाती है और जिसे विदा का दुःख भी होता है।
- अवधपुरी जो ख़बर सुनते ही शोभा की खान हो जाती है और जो एक उपमा में समुद्र बन जाती है।
काण्ड आकाश से खुलता है
यह सोपान तीन संस्कृत स्तुतियों से खुलता है। पहली स्तुति राम का पूरा रूप बनाती है: मोर के कण्ठ जैसा नीलापन, भृगु के चरण का चिह्न, पीला वस्त्र, सदा प्रसन्न चेहरा, हाथों में बाण और धनुष। चारों ओर वानरों का समूह, पास में सेवा करते लक्ष्मण, और इन सबके नीचे पुष्पक। जो आगे एक-एक करके खुलने वाला है, वह इस पहले चित्र में ही रख दिया गया है।
इस चित्र की चार चीज़ें इसी प्रसंग में काम आती हैं। हाथ का धनुष-बाण विमान से उतरते ही पृथ्वी पर रखा जायगा। वानरों का समूह आकाश से अवध देखेगा, और दिखाने वाले राम स्वयं होंगे। सेवा में लगे लक्ष्मण प्रसंग के अन्त में उस भाई से मिलेंगे जो इतनी लम्बी अवधि अवध की तरफ़ खड़ा रहा। और पुष्पक नगर के समीप उतरकर कुबेर के पास लौट जायगा।
दूसरी स्तुति पूरी आकृति से हटकर केवल चरणों पर आ जाती है।
कोसलपुरी के स्वामी के वे दोनों चरण सुन्दर और कोमल हैं। ब्रह्मा और शिव उनकी वन्दना करते हैं, सीता के हाथ उन्हें दुलराते हैं, और चिन्तन करने वाले का मन भौंरे की तरह उन्हीं में बसा रहता है। मिलन के क्षण में, जब भरत राम के चरण पकड़ते हैं, उन चरणों का यही परिचय फिर दिया जाता है: जिन्हें देवता, मुनि, शिव और ब्रह्मा नमस्कार करते हैं। काण्ड के आरम्भ की बात और मिलन के क्षण की बात एक ही है।
चरण इस प्रसंग में बार-बार आते हैं, और हर बार कोई झुका हुआ होता है। भरत लक्ष्मण को इसीलिये धन्य कहते हैं कि वे राम के चरणों के अनुरागी हैं। हनुमान तीन बार भरत के चरणों की तरफ़ जाते हैं: एक बार मस्तक नवाकर, एक बार पुलकित होकर गिरकर, और एक बार विदा लेते हुए सिर नवाकर। राम दौड़कर गुरु के चरण पकड़ते हैं। और भरत पृथ्वी पर पड़े रह जाते हैं। भरत-मिलन का सारा ऊँच-नीच पैरों के पास तय होता है, तलवार के पास नहीं।
तीसरी स्तुति शिव को नमस्कार करती है: कुन्द के फूल, चन्द्रमा और शङ्ख जैसे गौरवर्ण, पार्वती के पति, मनचाहा फल देने वाले, दया करने वाले और काम से छुड़ाने वाले। इसी प्रसंग के अन्त में पता चलता है कि यह सारा हाल शिव ही पार्वती को सुना रहे हैं। जिन्हें काण्ड के आरम्भ में नमस्कार किया गया, कथा उन्हीं के मुँह से चल रही है।
अवधि का एक ही दिन
स्तुतियों के तुरन्त बाद कथा किसी दृश्य से नहीं, गिनती से शुरू होती है।
लौटने की अवधि का एक ही दिन बाकी है, और नगर के लोग बहुत आतुर हैं। राम के वियोग में दुबले हुए स्त्री-पुरुष जहाँ-तहाँ यही सोच रहे हैं कि बात क्या हुई, वे अब तक क्यों नहीं आये। यह दिन पहले पूरा नगर गिनता है, कोई एक आदमी नहीं। दुबला शब्द मिलन से ठीक पहले लौटता है, जब अगवानी में आये सब लोगों के शरीर भी राम के वियोग से दुबले बताये जाते हैं। दुबलापन इस प्रसंग में किसी एक का नहीं है।
इसके बाद की बात शकुनों की है। सब सुन्दर शकुन होने लगे, सबके मन प्रसन्न हो गये, और नगर चारों ओर से रमणीक हो गया, मानो ये चिह्न राम का आगमन जना रहे हों। माताओं के मन में ऐसा आनन्द है जैसे अभी कोई कहना ही चाहता हो कि सीता और लक्ष्मण सहित राम आ गये। और भरत की दाहिनी आँख तथा दाहिनी भुजा बार-बार फड़क रही है। इसे शुभ शकुन जानकर उनके मन में बहुत हर्ष होता है, और वे विचार करने लगते हैं।
शकुन ख़बर से भी पहले आते हैं और भरत के सोच से भी पहले। इसीलिये जब भरत आगे कहते हैं कि उनके हृदय में पक्का भरोसा है कि राम मिलेंगे, और उसका कारण शकुन बताते हैं, तब वह भरोसा हवा में नहीं होता। इन शकुनों में शरीर पर जो अकेली चीज़ घटती है, वह वही फड़कती आँख और भुजा है। बाकी सब मन के भीतर है।
भरत का हिसाब, अपने ही ख़िलाफ़
अब वही एक दिन दुबारा गिना जाता है, पर बाहर से नहीं, एक आदमी के भीतर से।
नगर के लिये यह अवधि थी। भरत के लिये यह वह अवधि है जो प्राणों का आधार है। यह समझते ही उनके मन को अपार दुःख होता है, और वे कारण खोजने लगते हैं: “क्या कारण हुआ कि नाथ नहीं आये? कहीं उन्होंने मुझे कुटिल जानकर भुला तो नहीं दिया?”
जो कारण भरत नहीं खोजते, वह भी उतना ही साफ़ है। वे यह नहीं सोचते कि युद्ध लम्बा खिंच गया होगा, कि रास्ता कठिन रहा होगा, कि राम पर कोई संकट आया होगा। देरी का उनके पास एक ही कारण है, और वह वे स्वयं हैं। पूरा प्रसंग इसी बात को बार-बार गहरा करता है।
फिर ईर्ष्या आती है, पर वह भी नपी हुई है। भरत मन में कहते हैं, “अहा, लक्ष्मण धन्य हैं, बड़भागी हैं, जो राम के चरणों के अनुरागी हैं।” सौभाग्य की नाप यहाँ पद नहीं है, वैभव नहीं है, साथ रहना भी नहीं। नाप चरणों से दूरी है। जिसके लिये सौभाग्य का अर्थ यही हो, उसके लिये यह पूरी अवधि कैसी सज़ा रही होगी, यह कथा कहती नहीं, केवल इशारा कर देती है।
फिर वही बात अपने सबसे कड़े रूप में आती है। भरत मन में कहते हैं, “प्रभु ने मुझे कपटी और कुटिल पहचान लिया, इसीसे नाथ ने मुझे साथ नहीं लिया।” भरत का डर यह नहीं कि राम ने उन्हें भुला दिया। डर यह है कि राम ने उन्हें ठीक-ठीक देख लिया। भूल जाने के डर में आदमी अपने को निर्दोष मानता है। पहचाने जाने के डर में वह अपने को दोषी मानकर चलता है, और उसी को सही भी मानता है।
आगे यह हिसाब आख़िरी अंक तक पहुँचता है। भरत मन में कहते हैं, “यदि प्रभु मेरी करनी पर ध्यान दें, तो सौ करोड़ कल्पों तक भी मेरा निस्तार नहीं हो सकता।” और तुरन्त वाक्य पलट जाता है: “पर प्रभु सेवक का अवगुण कभी नहीं मानते। वे दीनों के बन्धु हैं और बहुत कोमल स्वभाव के हैं।” भरत की सारी आशा अपने पक्ष में नहीं, सामने वाले के स्वभाव में रखी हुई है।
भरत के मन की दो बातें एक-दूसरे को काटती नहीं, साथ खड़ी रहती हैं। पहली बात भरत का पक्का भरोसा है, “राम अवश्य मिलेंगे, क्योंकि शकुन शुभ हो रहे हैं।” दूसरी बात वह है जिसके लिये यह प्रसंग याद किया जाता है। “अवधि बीत जाने पर यदि मेरे प्राण रह गये, तो जगत् में मेरे समान अधम कौन होगा?”
इस बात में कोई प्रतिज्ञा नहीं है। कोई आग नहीं, कोई चिता नहीं, कोई तैयारी नहीं, कल क्या किया जायगा इसकी कोई घोषणा नहीं। बात शर्त और प्रश्न में रखी गयी है, और वहीं छोड़ दी गयी है। भरत अपने प्राणों की धमकी नहीं दे रहे। वे अपने नाम का हिसाब लगा रहे हैं, और उसका नतीजा एक ही शब्द है, अधम। यही मन आगे हनुमान से प्रश्न पूछते समय अपने लिये दास से ऊँचा कोई दर्जा माँगता ही नहीं।
डूबते हुए के पास नाव
और ठीक वहीं, जहाँ यह हिसाब सबसे नीचे पहुँच चुका है, कथा दृश्य को पानी में बदल देती है।
राम के विरह के समुद्र में भरत का मन डूब रहा था। उसी समय हनुमान ब्राह्मण का रूप धरकर इस तरह आ गये मानो नाव आ गयी हो। डूबते हुए आदमी को न दीया चाहिये, न सलाह। उसे नाव चाहिये, और वह भी जो पास तक आ जाय। कथा यह उपमा मानो कहकर देती है, जिससे नाव नाव ही रहती है, चमत्कार नहीं बनती।
ब्राह्मण का रूप क्यों, यह कथा नहीं बताती। पर भरत उस अजनबी को तात कहकर सम्बोधित करते हैं, यह जाने बिना कि वह कौन है, और नाम सुनने के बाद उठकर आदर से गले लगाते हैं। यह रूप उतनी ही देर टिकता है जितनी देर में ख़बर पहुँच जाय, और पूछे जाते ही छोड़ दिया जाता है।
हनुमान जिन्हें देखते हैं वे ये हैं: कुश के आसन पर बैठे, जटाओं का मुकुट बनाये, दुबले शरीर वाले भरत। वे “राम, राम, रघुपति” जप रहे हैं और आँखों से जल बहा रहे हैं। इस पूरे प्रसंग में उस जगह का नाम एक बार भी नहीं आता जहाँ वे बैठे हैं। कथा पता नहीं देती, मुद्रा देती है: आसन कुश का, मुकुट बालों का, शरीर दुबला, मुँह पर एक ही नाम, और चेहरे पर पानी। इस प्रसंग में मुकुट यही एक है, और वह किसी धातु का नहीं।

यह उसी पानी का दूसरा रूप है जो अभी समुद्र था। समुद्र बाहर था और डुबा रहा था। यह जल भीतर से निकलकर आँखों पर आया है।
ख़बर, और उसके भीतर एक शब्द
ख़बर से पहले कथा ख़बर देने वाले पर ठहरती है। भरत को देखते ही हनुमान बहुत हर्षित होते हैं, उनका शरीर पुलकित हो जाता है, आँखों से जल बरसने लगता है। मन में बहुत प्रकार से सुख मानकर वे वह वाणी बोलते हैं जो कानों के लिये अमृत के समान है। वाणी का परिचय उसके अर्थ से नहीं, कान पर पड़ने वाले असर से दिया गया है।
सन्देश राम से शुरू नहीं होता, सुनने वाले से शुरू होता है। हनुमान कहते हैं, “जिनके विरह में आप दिन-रात घुलते रहते हैं, जिनके गुणों की पंक्तियाँ आप निरन्तर रटते रहते हैं, वे राम सकुशल आ गये।” बीच में उपाधियाँ हैं, रघुकुल के तिलक, सज्जनों को सुख देने वाले, देवताओं और मुनियों के रक्षक। पर असली ख़बर दो ही शब्दों में है, आ गये और कुशल। जिस आदमी ने अभी अपने बचे रह जाने का हिसाब लगाया था, उसे यही एक शब्द चाहिये था।
फिर ब्योरा आता है: शत्रु को रण में जीतकर, सीता और लक्ष्मण सहित राम आ रहे हैं, और देवता उनका यश गा रहे हैं। ये वचन सुनते ही भरत के सारे दुःख भूल गये, जैसे प्यासा आदमी अमृत पाकर प्यास का दुःख भूल जाय। उपमा फिर पानी की है, पर अब पानी की कमी की। कुछ ही देर के फ़ासले पर भरत पहले डूबते हुए बताये गये और अब प्यासे। दोनों एक ही विरह के दो चेहरे हैं।
फिर भरत पूछते हैं, “तात, आप कौन हैं और कहाँ से आये हैं, जिन्होंने मुझे इतने प्रिय वचन सुनाये?” उत्तर में हनुमान चार बातें इसी क्रम से कहते हैं, “मैं पवन का पुत्र हूँ, जाति का वानर हूँ, मेरा नाम हनुमान है।” फिर वे कहते हैं, “मैं दीनों के बन्धु राम का दास हूँ।” ब्राह्मण का रूप यहाँ न बचाया जाता है, न समझाया जाता है। परिचय की इस सूची का आख़िरी मद सुनकर ही भरत उठ खड़े होते हैं।
यह सुनते ही भरत उठकर आदर से गले लगते हैं। मिलते समय प्रेम हृदय में नहीं समाता, आँखों से जल बहता है, शरीर पुलकित हो जाता है। वे कहते हैं, “हनुमान, आपके दर्शन से मेरे सारे दुःख बीत गये। आज मुझे प्यारे राम ही मिल गये।” वे बार-बार कुशल पूछते हैं, और फिर पूछते हैं, “भाई, इस संवाद के बदले आपको क्या दूँ?” फिर वे स्वयं हिसाब चुकता होने से मना कर देते हैं: “इस सन्देश के बराबर जगत् में कुछ भी नहीं है, मैंने विचार करके देख लिया। तात, मैं आपसे उऋण नहीं हो सकता।” और फिर जो माँगते हैं वह चुकाना नहीं, लेना है: “अब मुझे प्रभु का चरित सुनाइये।”
दास की तरह
अब वह प्रश्न आता है जिस पर यह पूरा प्रसंग टिका है, और वह उससे पूछा जाता है जो अभी लङ्का से लौटा है।
पहले हनुमान भरत के चरणों में मस्तक नवाकर राम की सारी गुणगाथा कहते हैं। फिर भरत का प्रश्न है: “हनुमान, कहिये, कृपालु स्वामी कभी मुझे अपने दास की तरह याद भी करते हैं?” भरत यह नहीं पूछते कि राम उन्हें भाई की तरह याद करते हैं, या अपना मानते हैं, या उनकी राह देखते हैं। वे नीचे की तुलना माँगते हैं, दास की तरह, और यही उनकी सबसे बड़ी माँग है। यह उसी आदमी की भाषा है जिसने थोड़ी देर पहले अपने लिये अधम शब्द चुना था।
हनुमान वह बहुत नम्र वचन सुनकर पुलकित शरीर से उनके चरणों पर गिर पड़ते हैं। उनके पास पहले उत्तर नहीं, मन का तर्क है। टीका के अनुसार वे मन में सोचते हैं, “इनके गुणों का वर्णन चराचर के स्वामी राम अपने मुँह से करते हैं। ये भरत ऐसे विनम्र, परम पवित्र और सद्गुणों के समुद्र क्यों न हों?”
यानी स्मृति के प्रश्न का पहला उत्तर वाणी का सबूत है: राम आपकी बात करते हैं, और अपने मुँह से करते हैं। इस तर्क में हाँ कहीं नहीं कही गयी, और वह स्वयं एक प्रश्न पर ख़त्म होता है। सीधी हाँ इसके बाद आती है, जब हनुमान कहते हैं, “नाथ, आप राम को प्राणों के समान प्रिय हैं। तात, मेरा वचन सत्य है।” यह सुनकर भरत बार-बार मिलते हैं और हर्ष हृदय में नहीं समाता। जो हनुमान ने मन के भीतर रखा, वह अब सपाट कह देते हैं।
इसके बाद कथा हनुमान को लौटा देती है। वे भरत के चरणों में सिर नवाकर तुरन्त राम के पास जाते हैं, जाकर सब कुशल कहते हैं। राम हर्षित होकर विमान पर चढ़कर चलते हैं। कुशल शब्द इस प्रसंग में बार-बार यात्रा करता है। हनुमान उसे भरत तक लाते हैं। भरत बार-बार हनुमान से कुशल पूछते हैं। हनुमान उसे लौटाकर राम तक ले जाते हैं। भरत उसे नगर में पहुँचाते हैं और माताओं को समझाते हैं। वसिष्ठ राम से कुशल पूछते हैं और राम उसे उन्हीं की दया पर लौटा देते हैं। और अन्त में राम भरत से कुशल पूछते हैं। जिस कथा में एक भी हथियार नहीं उठता, उसमें यही शब्द बार-बार चलता है।
अवध दौड़ पड़ी
इधर भरत हर्षित होकर कोसलपुर आते हैं, और ख़बर उसी क्रम से जाती है जो इस घर में होना चाहिये। पहले वे गुरु को सब समाचार सुनाते हैं, फिर राजमहल में ख़बर जनवाते हैं कि राम कुशल से नगर को आ रहे हैं। उसके बाद नगर को पता चलता है। यह क्रम उस दिन की आख़िरी व्यवस्थित चीज़ है, क्योंकि इसके तुरन्त बाद कोई व्यवस्था नहीं बचती।
सुनते ही सब माताएँ उठकर दौड़ पड़ती हैं, और भरत राम की कुशल कहकर उन्हें समझाते हैं। नगरनिवासियों को समाचार मिलता है तो स्त्री-पुरुष सभी हर्षित होकर दौड़ते हैं। सौभाग्यवती स्त्रियाँ सोने के थालों में दही, दूब, गोरोचन, फल, फूल और मङ्गल की जड़ नवीन तुलसीदल भर-भरकर गाती हुई चलती हैं। वे हथिनी की चाल से चलती हैं, जो जल्दी की नहीं, ठसक की चाल है। बाकी नगर में जल्दी ही जल्दी है, और दोनों चालें साथ चल रही हैं।
जो जिस दशा में है, वह वैसे ही उठकर दौड़ता है। बालकों और बूढ़ों को कोई साथ नहीं लाता। टीका कारण बताती है, देर हो जाने का डर। और दौड़ते-दौड़ते लोग एक-दूसरे से पूछते हैं, “भाई, आपने दयालु राम को देखा है?” यह ऐसा प्रश्न है जिसका उत्तर उस समय किसी के पास हो ही नहीं सकता, क्योंकि अभी कोई पहुँचा ही नहीं। भीड़ का यही लक्षण है, और कथा उसे बिना टिप्पणी के रख देती है। बूढ़े और बच्चे पीछे छूट गये, और यह किसी को बुरा नहीं लगता।
राम को आते जानकर अवधपुरी सारी शोभाओं की खान हो जाती है। तीनों प्रकार की सुहावनी वायु बहने लगती है और सरयू का जल बहुत निर्मल हो जाता है। इसके बाद अगवानी आकार लेती है। गुरु वसिष्ठ, कुटुम्बी, छोटे भाई शत्रुघ्न और ब्राह्मणों के समूह के साथ भरत बहुत प्रेम भरे मन से राम के सामने चलते हैं। बहुत-सी स्त्रियाँ अटारियों पर चढ़कर आकाश में विमान देखती हैं और उसे देखकर मीठे स्वर से मङ्गलगान करती हैं। नगर ऊपर देख रहा है, और जिसे देख रहा है वह अभी आकाश में है।
फिर पूरा नगर-दृश्य एक चित्र में बँध जाता है। राम पूर्णिमा के चन्द्रमा हैं, अवधपुर समुद्र है, और वह समुद्र उस पूर्णचन्द्र को देखकर हर्षित होता हुआ, शोर करता हुआ बढ़ रहा है। इधर-उधर दौड़ती हुई स्त्रियाँ उसकी तरंगें हैं। पहली बार समुद्र राम का विरह था और भरत उसमें डूब रहे थे। अब वही शब्द नगर का नाम है, और वह डुबाता नहीं, उमड़ता है। बीच में हनुमान भरत को ही सद्गुणों का समुद्र मान चुके हैं, और आगे राम दो बार कृपा के सिंधु कहे जायँगे। एक ही शब्द इस प्रसंग में चार अलग चीज़ों का नाम बनता है, और हर बार पानी का बर्ताव बदल जाता है।
राम अपना नगर दिखाते हैं
ऊपर, विमान पर, इसी बीच राम वानरों को मनोहर नगर दिखा रहे हैं। जिन्हें दिखा रहे हैं, उनके नाम लेकर पुकारते हैं: सुग्रीव, अंगद, और विभीषण। विभीषण को वे लङ्का का राजा कहते हैं, वही पद जो उन्हें अभी मिला है। राम कहते हैं, “सुनिये, यह पुरी पवित्र है और यह देश सुन्दर है।” अवध का पहला वर्णन अवध वालों के लिये नहीं है। वह उनके लिये है जिन्होंने यह लौटना सम्भव किया।
फिर राम कहते हैं, “सबने वैकुण्ठ की बड़ाई की है, यह वेद-पुराणों में प्रसिद्ध है और जगत् जानता है। फिर भी अवधपुरी के समान वह भी मुझे प्रिय नहीं है।” और साथ ही वे इस बात को ढक भी देते हैं: “यह बात कोई-कोई ही जानते हैं।” वैकुण्ठ छोटा नहीं कहा गया, केवल कम प्रिय कहा गया, और प्रिय होना नाप से तय नहीं होता।
आगे कारण आता है, और उसमें कोई बड़ाई नहीं। राम कहते हैं, “यह सुहावनी पुरी मेरी जन्मभूमि है। इसके उत्तर में पवित्र करने वाली सरयू बहती है, जिसमें स्नान करने से मनुष्य बिना किसी परिश्रम के मेरे समीप निवास पा जाते हैं। यहाँ के निवासी मुझे बहुत ही प्रिय हैं। यह पुरी सुख की राशि है और मेरा धाम देने वाली है।” सुनकर सब वानर हर्षित होते हैं और कहते हैं, “जिस अवध की बड़ाई स्वयं राम ने की, वह धन्य है।” इस पूरे वर्णन में एक भी इमारत नहीं है: नदी है, जन्म है, और यहाँ के लोग हैं।
फिर विमान उतरता है। सब लोगों को आते देखकर राम विमान को नगर के समीप उतरने की प्रेरणा देते हैं और वह पृथ्वी पर उतर जाता है। उतरकर राम पुष्पक से कहते हैं, “अब आप कुबेर के पास जाइये।” राम की प्रेरणा से वह चला। उसके साथ दो चीज़ें दर्ज हैं, हर्ष और विरह: अपने स्वामी के पास लौटने का हर्ष, और राम से अलग होने का बहुत दुःख। इस घड़ी में विरह महसूस करने वाला आख़िरी नाम किसी आदमी का नहीं, एक विमान का है। कथा दोनों भाव साथ रखती है और किसी को चुनती नहीं, जैसे भरत के भरोसे और भरत की आत्मग्लानि को एक साथ रखा गया था।
धनुष नीचे रखकर
भरत के साथ सब लोग आते हैं, और उनके शरीर उसी वियोग से दुबले हैं जिससे नगर शुरू में दुबला बताया गया था। सामने वामदेव, वसिष्ठ और दूसरे श्रेष्ठ मुनि हैं। उन्हें देखकर राम का पहला काम यह है कि वे धनुष और बाण पृथ्वी पर रख देते हैं। काण्ड के आरम्भ के चित्र में उनके हाथों में बाण और धनुष थे। ज़मीन पर उतरकर पहला काम उन्हें नीचे रखना है। जो सोपान अभी बीता है और जो अभी शुरू हुआ है, उनका फ़र्क़ इसी एक हरकत में है।
फिर वे लक्ष्मण सहित दौड़कर गुरु के चरण पकड़ लेते हैं, और उनके रोम-रोम पुलकित हैं। वसिष्ठ उन्हें गले लगाकर कुशल पूछते हैं, और राम कहते हैं, “हमारी कुशल आपकी ही दया में है।” इसके बाद वे सब ब्राह्मणों से मिलकर उन्हें मस्तक नवाते हैं। और तब, इसके बाद, भरत राम के वे चरण पकड़ते हैं जिन्हें देवता, मुनि, शिव और ब्रह्मा नमस्कार करते हैं। जो इस पूरी अवधि के दिन गिनता रहा, उसकी बारी गुरु और ब्राह्मणों के बाद आती है। कथा इसे बिना टिप्पणी के दर्ज करती है, क्योंकि इस घर में यही क्रम ठीक है, और भरत उसे मानते हैं।
भरत पृथ्वी पर पड़े हैं और उठाये जाने पर भी नहीं उठते। तब राम उन्हें ज़बरदस्ती उठाकर हृदय से लगा लेते हैं। इस प्रसंग में बल का प्रयोग यही एक है, और वह किसी शत्रु पर नहीं, एक भाई को ज़मीन से उठाने में होता है। लङ्का से लौटे हाथों का पहला काम यही है। और फिर वह क्षण आता है जिसकी तरफ़ यह सारा पानी बहता रहा था। साँवले शरीर पर रोएँ खड़े हो गये, और नये कमल जैसी आँखों में जल की बाढ़ आ गयी। ये आँखें भरत की नहीं, राम की हैं।
कथा उसी क्षण को फैला देती है। आँखों से जल बह रहा है, शरीर पर पुलकावली है, और तीनों लोकों के स्वामी राम बहुत प्रेम से छोटे भाई को हृदय से लगाकर मिलते हैं। फिर कहने वाला अपनी हार लिख देता है, “भाई से मिलते समय राम जैसे शोभित हो रहे हैं, उसकी उपमा मुझसे कही नहीं जाती।” उसी साँस में वह उपमा दे भी देता है: मानो प्रेम और शृंगार शरीर धारण करके मिले हों और श्रेष्ठ शोभा को पाये हों। जिस उपमा को असम्भव बताया गया, उसमें मिलने वाले दो लोग नहीं, दो भाव हैं जिन्हें शरीर मिल गया है।
फिर कथा उसी क्षण को एक क़दम आगे ले जाती है। राम भरत से कुशल पूछते हैं, पर आनन्द के मारे भरत के मुँह से वचन जल्दी नहीं निकलते। और यहीं कहने वाला अपने को दिखा देता है। शिव पार्वती से कहते हैं, “सुनिये, वह सुख वचन और मन से परे है। उसे वही जानता है जो उसे पाता है।” यानी यह सारा हाल शिव के मुँह से चल रहा है, उन्हीं के जिन्हें काण्ड की तीसरी स्तुति में नमस्कार किया गया था। फिर भरत बोलते हैं। उनका वाक्य शुरू की उसी नाव पर लौट जाता है: “हे कोसलनाथ, आपने दुखी जानकर दास को दर्शन दिये, इससे अब कुशल है। विरह के समुद्र में डूबते हुए मुझको आपने हाथ पकड़कर बचा लिया।” शुरू में नाव आयी थी। अब हाथ आता है, और वह हाथ राम का है।
प्रसंग का अन्त मिलन को बाँट देता है। राम हर्षित होकर शत्रुघ्न को हृदय से लगाकर मिलते हैं, और तब लक्ष्मण और भरत दोनों भाई परम प्रेम से मिलते हैं। आख़िरी मिलन में राम नहीं हैं। उसमें वे दो हैं जो इस पूरी अवधि के दो सिरों पर खड़े रहे, एक राम के साथ और एक अवध के बाहर। जिस भरत ने अवधि के आख़िरी दिन अकेले बैठकर लक्ष्मण को धन्य और बड़भागी कहा था, वे कथा के आख़िर में उन्हीं से गले मिलते हैं।
पानी, नीचा दर्जा और ज़मीन
पानी के सहारे यह पूरी कथा शुरू से अन्त तक चलती है। विरह का समुद्र जिसमें मन डूबता है, नाव, भरत और हनुमान की आँखों का जल, प्यास और अमृत। निर्मल सरयू, उमड़ता हुआ नगर-समुद्र, और अन्त में राम की आँखों की बाढ़: एक ही पानी जगह बदलता रहता है, और हर जगह उसका काम अलग है।
दूसरी बात उस तुलना की है जो भरत अपने लिये चुनते हैं। वह हर बार नीचे की तरफ़ होती है: कपटी और कुटिल, अवधि के बाद जीवित रहें तो अधम, और राम की याद में केवल दास। मिलन के समय राम भी एक बार यही करते हैं, जब वसिष्ठ कुशल पूछते हैं और वे कहते हैं कि उनकी कुशल गुरु की ही दया में है। दोनों में से कोई अपनी ज़मीन पर खड़ा होना नहीं चाहता, और इसी से यह मिलन ज़मीन के इतने पास होता है।
तीसरी बात उन नामों की है जो इस प्रसंग में नहीं आते। जिस जगह भरत बैठे हैं, उसका नाम एक बार भी नहीं आता। दशरथ का नाम एक बार भी नहीं आता। सीता का नाम इस प्रसंग की कथा में एक ही बार आता है, हनुमान की दी हुई ख़बर में। उसके बाद वे कुछ करती नहीं। काण्ड की आरम्भिक स्तुतियों में उनका नाम दो बार आता है, एक बार राम के परिचय में और एक बार उन चरणों के प्रसंग में जिन्हें उनके हाथ दुलराते हैं। जिस लौटने की यह कथा है, उसमें अभी बहुत लोग बाकी हैं, और कथा उन्हें अभी बुलाती नहीं।
इस प्रसंग में एक भी लड़ाई नहीं है, फिर भी यहाँ कुछ दाँव पर लगा है: एक आदमी का अपने बारे में फ़ैसला। यदि अवधि का आख़िरी दिन बीत जाय, तो भरत के हिसाब से ग़लत राम नहीं, वे स्वयं साबित होंगे। इसीलिये ख़बर का असली शब्द कुशल है। इसीलिये भरत का प्रश्न याद किये जाने का है। और इसीलिये मिलन के क्षण में उन्हें उठाने के लिये ज़ोर लगाना पड़ता है।
यह सोपान आकाश में खुला था, एक उड़ते विमान पर, हाथों में धनुष-बाण लिये हुए। पहला प्रसंग ख़त्म होने तक विमान लौटाया जा चुका है, धनुष और बाण पृथ्वी पर रखे जा चुके हैं। जो बचा है वह एक दुबला शरीर है जिसे सीने से लगाया जा रहा है। सातवाँ सोपान अपनी ऊँचाई से उतरकर वहाँ आ गया है जहाँ बाकी की कथा घटेगी।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, उत्तरकाण्ड, दोहा 1 से 5, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।