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रामचरितमानसउत्तरकाण्डप्रसंग 15
भुशुण्डि को वरदान और भक्ति का उपदेश
एक कौआ धरती पर गिरा पड़ा है और एक बच्चे का हाथ उसके सिर पर है। उस हाथ से जो माँगा जाता है वह सब कुछ नहीं है, और इसीलिये वह सब कुछ से बड़ा निकलता है।
पिछला प्रसंग जहाँ छूटा था, वहाँ एक कौआ अवध के आँगन में एक बच्चे के उदर के भीतर से लौटा था, जहाँ उसने अनगिनत ब्रह्माण्ड देखे थे। यह प्रसंग उसके ठीक अगले क्षण से खुलता है। वह कौआ, काकभुशुण्डि, जो यह सारी कथा गरुड़ को सुना रहा है, धरती पर गिरा पड़ा है। मुँह से बात नहीं निकल रही। और जो बच्चा अभी तक आँगन में खेल रहा था, वह आकर अपना हाथ उसके सिर पर रख देता है। यहाँ से एक सीधा लेन-देन शुरू होता है: एक ओर वह है जो सब कुछ दे सकता है और देने की सूची भी सुना देता है। दूसरी ओर वह है जो सूची सुनते-सुनते एक चीज़ की कमी पकड़ लेता है, और वही एक चीज़ माँग लेता है।
उस माँग के बाद राम जो कहते हैं, उसे वे स्वयं अपना निज सिद्धान्त कहते हैं। इस प्रसंग का बीच का हिस्सा उसी सिद्धान्त का है। उसमें एक सीढ़ी बनती है, जीवों से मनुष्य तक, मनुष्य से द्विज तक, और इसी तरह ऊपर। सीढ़ी के ऊपरी डण्डे पर वह खड़ा किया जाता है जिसे कोई ऊपर रखता ही नहीं, सेवक। फिर एक पिता और उसके बहुत-से बेटों की बात होती है। और फिर, सारा सिद्धान्त कह देने के बाद, वह बच्चा फिर से बच्चा हो जाता है। वह आँखों में पानी भरकर अपनी माता की ओर देखता है, और भूख की शिकायत करता है।
अन्तिम हिस्सा उस कौए की अपनी बात है। कथा सुनाना रोककर वह गरुड़ से वह कहता है जो उसने स्वयं जाना है। वहाँ से “बिना” का एक लम्बा सिलसिला चलता है: बिना गुरु ज्ञान नहीं, बिना वैराग्य ज्ञान नहीं, बिना सन्तोष विश्राम नहीं, बिना जल नाव नहीं। यह सिलसिला उस बात पर रुकता है जो अगले प्रसंग का दरवाज़ा है, कि बिना विश्वास भक्ति नहीं होती और बिना भक्ति राम पिघलते नहीं। यह तुलसीदास का रामचरितमानस है। यहाँ की कथा एक कौए और गरुड़ की बातचीत के भीतर रखी गयी है, और वाल्मीकि की रामायण में यह पूरा ढाँचा है ही नहीं।
वर देनेवाला बालक, वर माँगता कौआ
- राम अवध के आँगन में खेलता हुआ बालक, जो एक क्षण के लिये अपनी माया की प्रभुता रोकता है। वह वरदान देता है, अपना निज सिद्धान्त सुनाता है, और फिर उसी आँगन में भूख की शिकायत करने लगता है।
- काकभुशुण्डि यह सारी कथा सुनानेवाला कौआ। यहाँ वह पहले धरती पर गिरा हुआ है, फिर माँगनेवाला है, और अन्त में अपना अनुभव कहनेवाला।
- गरुड़ सुननेवाले। इस पूरे प्रसंग में वे एक शब्द नहीं बोलते।
- माता जिनकी ओर बालक भूखी आँखों से देखता है। वे दौड़कर उठाती हैं, दूध पिलाती हैं और गोद में बैठे उसी बच्चे की लीलाएँ गाती हैं। इस प्रसंग में उनका नाम नहीं आता।
- शिव एक तुलना में आते हैं, जिन्होंने अवध के सुख के लिये अशुभ वेष धारण किया था। इतना ही कहा गया है। वेष क्या था, यह यहाँ नहीं कहा गया।
धरती पर, और सिर पर एक हाथ
भुशुण्डि की कथा उस जगह पर है जहाँ देखी हुई चीज़ और समझी हुई चीज़ एक साथ आ पड़ती हैं: आँगन में बालक का खेल, जो अभी सामने है। और उदर के भीतर देखी हुई वह प्रभुता, जो अभी-अभी की स्मृति है। दोनों एक ही क्षण में मिलते हैं, और उसका असर कथा एक बात में रखती है: देह की दशा भूल गयी। यह मूर्च्छा नहीं, भूल है। जो शरीर था वह याद ही नहीं रहा।
भुशुण्डि कहते हैं: “मैं धरती पर गिर पड़ा, मुँह से बात नहीं निकलती थी।” फिर भी एक बात निकलती है: “रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये”। यह पुकार सोचकर बोलनेवाले की नहीं, उस पक्षी की है जिसके पास शब्द बचे ही नहीं। और जिसे पुकारा गया उसे दुखियों का रक्षक कहा गया है। कौए ने अभी ब्रह्माण्डों का स्वामी देखा है, पर भय के भीतर से जो पहला नाम निकला, वह प्रभुता का नहीं, रक्षा का था।
और रक्षा तुरन्त आती है। उन्हें प्रेम से व्याकुल देखकर राम ने अपनी माया की प्रभुता रोक दी। जो रोका गया वह प्रभुता है, और रोकनेवाला वही है जिसकी वह प्रभुता है: बच्चे ने अपना बड़ा होना समेट लिया, क्योंकि सामनेवाला उससे टूट रहा था। फिर कमल जैसा हाथ सिर पर आया, और सारा दुःख हर लिया गया।
इसके बाद की बातें भुशुण्डि के भीतर की गिनती हैं। राम ने उनका मोह हटा दिया, और फिर उसी राम की पहली प्रभुता को बार-बार विचारकर मन में बड़ा भारी हर्ष हुआ। जिसे देखकर वे गिरे थे, वही अब याद करने पर खुशी देता है। बीच में केवल एक हाथ है। भरोसा आ जाने के बाद डर की चीज़ भी आनन्द की चीज़ हो गयी।
फिर राम की भक्तवत्सलता देखकर विशेष प्रीति उपजी, आँखें भर आयीं, रोमांच हुआ, हाथ जुड़े, और भुशुण्डि ने बहुत प्रकार से विनती की। धरती से लेकर जुड़े हुए हाथों तक का यह रास्ता थोड़ी ही देर में पूरा हो जाता है।
सूची, और उसमें से छूटी हुई एक चीज़
विनती सुनकर जो उत्तर आता है, उसका स्वर कथा तीन शब्दों में बाँधती है: सुख देनेवाला, गम्भीर, कोमल। अपने दास को दीन देखकर स्वामी बोले, और पहला वाक्य ही एक खुला द्वार है। राम कहते हैं: “काकभुशुण्डि, मुझे अत्यन्त प्रसन्न जानकर वर माँगिये।”
द्वार खोलकर वे भीतर का सामान भी गिना देते हैं: अणिमा आदि सिद्धियाँ, दूसरी ऋद्धियाँ, और मोक्ष, जिसे सारे सुखों की खान कहा गया है। फिर सूची और लम्बी होती है: ज्ञान, विवेक, वैराग्य, विज्ञान, और जगत् के वे अनेक गुण जो मुनियों के लिये भी दुर्लभ हैं। राम कहते हैं: “आज मैं सब दे दूँगा, इसमें संशय नहीं। जो आपके मन को भाये, वही माँगिये।”
सूची में सिद्धि, ऋद्धि, मोक्ष, ज्ञान, वैराग्य, शास्त्रों के गिनाये प्रायः सब फल हैं। भुशुण्डि ने उसे सुना, और सुनते हुए टटोला। वे कहते हैं: “राम के वचन सुनकर मैं और अधिक प्रेम में भर गया। तब मन में अनुमान करने लगा: प्रभु ने सब सुख देने की बात कही, यह सच है, पर अपनी भक्ति देने की बात नहीं कही।” प्रेम में भरे हुए भी उनकी बुद्धि काम कर रही थी।
यही इस प्रसंग की धुरी है: देनेवाला सब कुछ दे रहा है, और लेनेवाला वह एक चीज़ ढूँढ़ रहा है जो नहीं दी जा रही। भुशुण्डि उस कमी का नाप रसोई की उपमा से लेते हैं।
भक्ति से हीन सब गुण और सब सुख वैसे हैं जैसे नमक के बिना बहुत तरह के व्यंजन। यह उपमा थाली से आयी है: नमक न हो तो पकवान कम नहीं होते, बने रहते हैं, सजे रहते हैं, बस खाये नहीं जाते। सिद्धि और मोक्ष की सूची ठीक वही भरी हुई थाली है, जिसमें एक सस्ती-सी चीज़ नहीं है जिसके बिना बाक़ी सब बेकार है। भजन से हीन सुख किस काम का? भुशुण्डि कहते हैं: “हे गरुड़, यह विचार करके मैं बोला।”
बोलने से पहले भुशुण्डि एक शर्त और एक स्तुति रखते हैं। “हे स्वामी, यदि आप प्रसन्न होकर वर देते हैं और मुझ पर कृपा और स्नेह करते हैं, तो मैं अपने मन का भाया वर माँगता हूँ। आप उदार हैं और हृदय की जाननेवाले हैं।” माँगने से पहले ही कह दिया गया कि जो माँगा जायेगा वह राम को मालूम है। फिर भी माँगा जाता है, क्योंकि माँगना ही इस दृश्य का काम है।
पहले भक्ति की पहचान है और फिर माँग। प्रगाढ़ और शुद्ध, जिसे श्रुति और पुराण गाते हैं, जिसे योगीश्वर और मुनि खोजते हैं और राम की कृपा से कोई एक पाता है। खोजना और पाना दो अलग क्रियाएँ हैं, और दोनों के बीच कृपा खड़ी है: खोजनेवाले बहुत, पानेवाला कोई एक। फिर राम को भक्तों का कल्पवृक्ष, शरणागत का हितैषी, कृपा का समुद्र और सुख का धाम कहकर भुशुण्डि माँगते हैं: “हे राम, दया करके वही अपनी भक्ति मुझे दीजिये।” अपनी भक्ति: जो सूची में नहीं थी, वह अब सीधे नाम लेकर माँग ली गयी।
एवमस्तु, और एक रीझ
उत्तर का पहला शब्द ही उत्तर है: एवमस्तु, ऐसा ही हो। वर इस एक शब्द में दे दिया गया। आगे की बातें उस माँग की सराहना हैं। राम कहते हैं: “हे काग, सुनिये, आप स्वभाव से ही चतुर हैं। ऐसा वरदान क्यों न माँगते?” स्वभाव से चतुर: यह प्रश्न नहीं, दाद है।
और दाद आगे खुलती है। राम कहते हैं: “आपने सब सुखों की खान भक्ति माँग ली। जगत् में आपके समान बड़भागी कोई नहीं। जिसे वे मुनि करोड़ों यत्न करके नहीं पाते जो जप और योग की आग में शरीर जलाते रहते हैं, वह आपने माँग ली।” जो जलाते हैं वे नहीं पाते, जो माँगता है वह पा जाता है। साधन और माँग का यह अन्तर यहाँ हँसी की तरह आता है, जैसे कोई बड़ा किसी छोटे की चतुराई पर मुसकरा रहा हो।
राम कहते हैं: “आपकी चतुराई देखकर मैं रीझ गया। आपने भक्ति माँगी, यह मुझे बहुत भाया। हे पक्षी, सुनिये, अब मेरी कृपा से सब शुभ गुण आपके हृदय में बसेंगे।” रीझना इस प्रसंग में एक ही बार आता है। यह वह रीझ है जो बच्चे की चालाकी देखकर बड़ों में आती है। यहाँ रीझनेवाला स्वयं बच्चे के रूप में है, और रीझ रहा है एक कौए की चतुराई पर, जिसने सूची में से छूटी हुई चीज़ पकड़ ली थी। और उस चतुराई का फल हाथ के हाथ मिल जाता है: जो कुछ सूची में था और नहीं माँगा गया, वह सब बिना माँगे साथ आ गया। नमक माँगा था, थाली मिल गयी।
फिर यही बात गिनकर कही जाती है। राम कहते हैं: “भक्ति, ज्ञान, विज्ञान, वैराग्य, योग, मेरे चरित्र, उनके रहस्य और विभाग, इन सबका भेद आप मेरी कृपा से ही जान जायेंगे, और साधन का कष्ट नहीं होगा।” साधन का कष्ट, जो अभी जप और योग में शरीर जलानेवाले मुनियों की बात में था, वह कौए को नहीं झेलना पड़ेगा। फिर राम एक बड़ी बात और एक छोटी बात साथ रखते हैं।
बड़ी बात पहले आती है। राम कहते हैं: “माया से उत्पन्न सब भ्रम अब आपको नहीं व्यापेंगे। मुझे अनादि, अजन्मा, अगुण और गुणों की खान ब्रह्म जानिये।” गुणों से रहित और गुणों की खान, एक ही वाक्य में हैं, और राम उन्हें एक साथ रखकर छोड़ देते हैं। छोटी बात उसके बाद है, और वह बड़ी बात से बड़ी है: “हे काग, सुनिये, मुझे भक्त निरन्तर प्रिय हैं। यह विचारकर शरीर, वचन और मन से मेरे चरणों में अटल प्रेम कीजिये।” ब्रह्म का पूरा लक्षण देने के बाद करने को जो कहा गया, वह ब्रह्म का चिन्तन नहीं, चरणों में प्रेम है। अटल प्रेम: जो भक्ति माँगी गयी थी, वह अब आदेश की तरह लौट आयी है।
निज सिद्धान्त: सीढ़ी, और उसका सबसे ऊपरी डण्डा
वर पूरा हो चुका। अब राम एक ऐसी बात कहने लगते हैं जो माँगी नहीं गयी थी। “अब मेरी परम विमल वाणी सुनिये, जो सत्य है, सुगम है, और वेद आदि ने कही है। मैं आपको अपना निज सिद्धान्त सुनाता हूँ। सुनकर मन में धरिये, और सब छोड़कर मेरा भजन कीजिये।” निज सिद्धान्त, अपना सिद्धान्त: आगे की बात किसी शास्त्र का उद्धरण नहीं, कहनेवाले की अपनी बात होगी।
सिद्धान्त एक सीढ़ी की तरह बनता है, और उसका पहला डण्डा चौड़े से चौड़ा है।
राम कहते हैं: “यह सारा संसार मेरी माया से उत्पन्न है। इसमें अनेक प्रकार के चर और अचर जीव हैं। सब मुझे प्रिय हैं, क्योंकि सब मेरे उत्पन्न किये हुए हैं।” पहली बात में कोई छँटनी नहीं: सब, और फिर सब। जो बनाया है वह सब प्यारा है, बनाने के कारण ही। फिर पहली छँटनी आती है: “सबसे अधिक मुझे मनुष्य भाते हैं।” भाना प्रिय होने से थोड़ा अलग है। इसमें रुचि है, पसन्द है।
अब सीढ़ी ऊपर चढ़ती है, और हर डण्डा पिछले से सँकरा है। मनुष्यों में द्विज। द्विजों में श्रुतिधारी, जिन्होंने वेद कण्ठ में रखे हैं। उनमें वे जो वेद के धर्म पर चलते हैं, क्योंकि रटना और चलना दो चीज़ें हैं। उनमें विरक्त। विरक्तों में ज्ञानी। और ज्ञानियों से भी अधिक प्रिय विज्ञानी, जिसने जाने हुए को जिया है। मनुष्य से ऊपर छह डण्डे, और हर एक पर पिछले से कम लोग। विज्ञानी से ऊपर क्या होगा? और ठीक यहाँ एक और डण्डा आता है।
राम कहते हैं: “उनसे भी अधिक मुझे अपना दास प्रिय है, जिसे मेरी ही गति है और कोई दूसरी आशा नहीं।” विज्ञानी से ऊपर वह है जिसके ज्ञान की कोई गिनती ही नहीं की गयी। उसके पास एक चीज़ है, गति, यानी सहारा, और वह भी एक ही जगह का: कोई दूसरी आशा नहीं। यह लक्षण किसी योग्यता का नहीं, एक छूट का है। जिसने बाक़ी सारे सहारे छोड़ दिये हैं, वह सीढ़ी के ऊपर है। फिर राम दुहराकर कहते हैं: “मैं आपसे बार-बार सत्य कहता हूँ, मुझे सेवक के समान प्रिय कोई नहीं।” यह वाक्य बार-बार सत्य कहकर कहा गया है, जैसे कहनेवाले को मालूम हो कि सुननेवाले को इस पर भरोसा करना मुश्किल होगा।
और अब वह बात, जो अभी-अभी बनायी हुई सीढ़ी को हिला देती है।
राम कहते हैं: “भक्ति से हीन ब्रह्मा ही क्यों न हो, वह मुझे सब जीवों के समान ही प्रिय है। और भक्तिवाला अत्यन्त नीच प्राणी भी मुझे प्राणों के समान प्रिय है, यह मेरी वाणी है।” इस सीढ़ी पर द्विज, श्रुतिधारी, ज्ञानी, विज्ञानी क्रम से ऊपर चढ़ते थे। उसके ऊपर भी यदि कोई बिना भक्ति के पहुँचा है, ब्रह्मा तक पहुँचा है, तो वह पहले डण्डे के बराबर है, सब जीवों के समान। और नीचे से नीचे का प्राणी, यदि भक्ति लेकर खड़ा है, तो वह प्राणों के समान है। सीढ़ी तोड़ी नहीं गयी, पर उसका अर्थ बदल गया: वह किसे ऊपर रखती है, यह अब उसके डण्डों से नहीं, एक ही चीज़ से तय होता है। और वह चीज़ किसी डण्डे पर नहीं है।
“यह मेरी वाणी है”: राम यह ऐसे कहते हैं जैसे कोई राजा घोषणा पर मुहर लगाता है। और फिर यह घोषणा घर की भाषा में उतर आती है।
राम पूछते हैं: “पवित्र, सुशील और सुन्दर बुद्धिवाला सेवक कहिये, किसे प्यारा नहीं लगता?” यह बोलचाल का प्रश्न है, जो कोई भी घर चलानेवाला जानता है। और राम श्रुति और पुराण का नाम लेते हैं: जो बात निज सिद्धान्त कहकर कही गयी थी, वही श्रुति और पुराण की नीति भी है। फिर कौए को सावधान होकर सुनने को कहा गया है, क्योंकि आगे एक उपमा आनेवाली है।
एक पिता, बहुत बेटे
उपमा घर की है। एक पिता के बहुत-से बेटे हैं, और सब अलग-अलग गुण, स्वभाव और आचरण के। राम उन्हें गिनते हैं। गिनती में वही नाम आते हैं जो अभी सीढ़ी पर थे, बस अब वे बेटे हैं: कोई पण्डित, कोई तपस्वी, कोई ज्ञानी, कोई धनवान। कोई शूर, कोई दानी, कोई सर्वज्ञ, कोई धर्म में रत। आठ बेटे, और आठों में कोई भी बुरा नहीं। इस उपमा में कोई कुपुत्र नहीं है, सब अलग-अलग तरह से अच्छे हैं।
और पिता का प्रेम सब पर समान है। यह वही बात है जो सीढ़ी के पहले डण्डे पर थी, “सब मुझे प्रिय हैं”। पर उपमा यहाँ नहीं रुकती।
मान लीजिये, इनमें से कोई मन, वचन और कर्म से पिता का ही भक्त है, और सपने में भी दूसरा धर्म नहीं जानता। तो वह बेटा पिता को प्राणों के समान प्रिय है। चाहे वह हर तरह से अज्ञानी हो। उस बेटे के पास न पण्डिताई है, न तप, न धन, न शूरता। गिने हुए आठ गुणों में से एक भी नहीं। उसके पास बस एक चीज़ है, कि वह पिता का है, और उसे सपने में भी यह नहीं मालूम कि इसके सिवा कुछ और भी हो सकता है। और वही बेटा प्राणों के बराबर है।
यह उपमा पहले कही बात को बदल देती है। वहाँ भक्तिवाले अति नीच प्राणी को प्राणप्रिय कहा गया था, और यह सुनने में कठोर लगता था। उपमा उसे घर के चौके में रखकर दिखा देती है कि इसमें कठोर कुछ नहीं। हर पिता जानता है कि जो बेटा कम काम का है पर ज़्यादा पास बैठता है, उसके लिये उसके भीतर एक अलग जगह होती है। वह किसी न्याय से नहीं बनती, बनती ही है।
फिर उपमा संसार पर फैला दी जाती है। राम कहते हैं: “इसी प्रकार पशु-पक्षी, देवता, मनुष्य और असुर समेत जितने चर और अचर जीव हैं, यह सारा विश्व मेरा ही उपजाया हुआ है। सब पर मेरी बराबर दया है।” बराबर दया पिता का समान प्रेम है। और फिर वही मोड़: “इनमें से जो मद और माया छोड़कर मन, वचन और शरीर से मुझे भजता है…”
“…पुरुष हो, नपुंसक हो, नारी हो, या चर-अचर कोई भी जीव हो, जो सर्वभाव से कपट छोड़कर मुझे भजता है, वह मुझे परम प्रिय है।” पहले तीन शरीर गिनाये जाते हैं और किसी को छोड़ा नहीं जाता, और फिर कोई भी। फिर दोनों शर्तें भीतर की हैं: सर्वभाव, यानी पूरा, आधा नहीं। और कपट छोड़कर, यानी दिखावा नहीं। जो बाहर की चीज़ें थीं, शरीर, जाति, ज्ञान, वे पहले ही उड़ा दी गयीं। जो बचा वह वही है जिसे कोई देख नहीं सकता, और वही तय करता है।
फिर राम वही बात दुहराते हैं जो पहले भी सत्य कहकर कह चुके हैं। “हे पक्षी, मैं आपसे सत्य कहता हूँ, पवित्र सेवक मुझे प्राणों के समान प्रिय है। ऐसा विचारकर सब आशा और भरोसा छोड़कर मेरा भजन कीजिये।” सब आशा और भरोसा छोड़कर: यह वही “कोई दूसरी आशा नहीं” है जो सीढ़ी के ऊपरी डण्डे पर थी, अब आदेश बनकर। और इसके साथ एक वचन भी है, जो तुरन्त बाद आता है: “आपको काल कभी नहीं व्यापेगा। निरन्तर मेरा स्मरण और भजन कीजिये।” जिसने भरोसे छोड़ दिये, उसे मृत्यु से भी छूट मिल गयी।
और फिर वही खेल
राम के वचनामृत सुनकर भुशुण्डि तृप्त नहीं होते। शरीर पुलकित, मन हर्षित। फिर वे अपने सुख के बारे में एक बात कहते हैं जो एक कथावाचक के मुँह से अजीब लगती है। “वह सुख मन और कान ही जानते हैं, जीभ से उसका बखान नहीं हो सकता। राम की शोभा का सुख आँखें जानती हैं, पर वे कैसे कहें, उनके पास वाणी नहीं है।” जो सारी कथा सुना रहा है, वह ठीक यहाँ कह रहा है कि असल चीज़ कही नहीं जा सकती। यह हार नहीं, ईमानदारी है, और यह उस जगह पर है जहाँ कथा सिद्धान्त से उतरकर फिर आँगन में लौटती है।
बहुत प्रकार से समझाकर और सुख देकर राम फिर वही बालकों के खेल करने लगे। वही: जो अभी-अभी अगुण और गुणाकर ब्रह्म का लक्षण कह रहा था, निज सिद्धान्त सुना रहा था, काल से छूट दे रहा था। वह अब आँगन में वही खेल कर रहा है जो पहले कर रहा था। बीच में जो हुआ उसका कोई निशान नहीं। और फिर वह चित्र: आँखों में जल, मुँह कुछ रूखा, और माँ की ओर देखा। भूख लगी है। कथा कोई वाक्य नहीं देती, बच्चा कुछ कहता नहीं, बस देखता है, और उस देखने में सब कह दिया गया।
कुछ ही देर पहले एक कौआ धरती पर गिरा था, मुँह से बात नहीं निकल रही थी, और उसने दुखियों के रक्षक को पुकारा था। अब वह रक्षक स्वयं आँखों में पानी भरे किसी की ओर देख रहा है, और उसके मुँह से भी बात नहीं निकल रही। दोनों दृश्यों में एक ही चीज़ है, आँख में पानी और चुप। पहले में रक्षक ने आकर सिर पर हाथ रखा था। दूसरे में जो आयेगी वह माँ है।
देखते ही माता आतुर होकर उठ दौड़ीं, कोमल वचन कहकर छाती से लगा लिया, और गोद में रखकर दूध पिलाया। और फिर वह बात: गोद में जिसे दूध पिला रही हैं, उसी की ललित लीलाएँ गा रही हैं। माँ को मालूम है या नहीं कि जिसके गीत गा रही हैं वह गोद में है, कथा यह नहीं कहती। बस दोनों को एक ही साँस में रख देती है, दूध और गीत, और गीत का विषय वही बच्चा। यहाँ माता का नाम एक बार भी नहीं आता। वे केवल माता हैं।
तब भुशुण्डि कथा से एक क़दम बाहर आकर गरुड़ को बताते हैं कि जो अभी देखा गया वह क्या था। “जिस सुख के लिये शिव ने अशुभ वेष धारण किया, उस सुख में अवधपुरी के नर-नारी सदा मग्न रहते हैं।” शिव का अशुभ वेष यहाँ केवल एक वाक्य में है, एक तुलना के लिये। जिस चीज़ के लिये शिव को रूप बदलना पड़ा, वह अवध की गली में हर किसी को मिल रही है। और अगली बात उससे भी आगे जाती है। “हे गरुड़, उस सुख का लवलेश भी जिसने एक बार सपने में भी पा लिया, वे सुबुद्धि सज्जन ब्रह्मसुख को कुछ नहीं गिनते।” लवलेश, एक बार, सपने में भी: तीन बातें मिलकर नाप को छोटे से छोटा कर देते हैं, और उसके सामने रखा गया ब्रह्मसुख हल्का निकलता है। यह वही बात है जो कुछ देर पहले नमक और पकवानों में कही गयी थी।
अपना अनुभव
कथा अब तेज़ी से सिमटती है। भुशुण्डि कहते हैं: “मैं कुछ काल और अवध में रहा, रसीली बाललीलाएँ देखीं, राम की कृपा से भक्ति का वर पाया। और उनके चरणों को प्रणाम करके अपने आश्रम आ गया।” चार बातें, एक साथ। उदर के ब्रह्माण्डों और आँगन की भूख वाला वह लम्बा प्रसंग एक वाक्य में बँध जाता है, और कौआ अपने पहाड़ पर लौट जाता है। फिर वह वाक्य जिसमें पूरी कथा का फल है: “जब से राम ने मुझे अपनाया, तब से मुझे माया नहीं व्यापी।” अपनाया वरदान से अलग है: वरदान दिया जाता है, अपनाया जाना कुछ और है। वे कहते हैं: “यह सब गुप्त चरित मैंने गाया, कि राम की माया ने मुझे कैसे नचाया।” गुप्त, क्योंकि यह उनका अपना है। किसी और ने देखा नहीं।
अब स्वर बदलता है। भुशुण्डि कहते हैं: “अब मैं अपना अनुभव कहता हूँ। भगवान् के भजन बिना क्लेश नहीं जाते। और राम की कृपा बिना राम की प्रभुता जानी नहीं जाती।” जो अब तक था वह घटा हुआ था, कथा थी। जो अब आता है वह उस कथा से निकला हुआ है, और भुशुण्डि उसे अनुभव कहते हैं, सिद्धान्त नहीं। दूसरा वाक्य ठीक उस दृश्य से निकला है जिससे वरदान की बात शुरू हुई थी: प्रभुता देखी गयी थी, पर जानी तब गयी जब सिर पर हाथ आया।
फिर एक ज़ंजीर, जिसकी हर कड़ी पिछली कड़ी में फँसी है: जाने बिना प्रतीति, यानी भरोसा, नहीं। प्रतीति बिना प्रीति नहीं। प्रीति बिना भक्ति दृढ़ नहीं होती। यह क्रम उलटा नहीं चलता: भरोसा पहले, प्रेम बाद में, और भक्ति उसके बाद। बिना प्रीति की भक्ति के लिये उपमा पानी की सतह से है: जैसे जल पर चिकनाई। पानी पर तेल की परत दिखती है, चमकती है, पर टिकती नहीं, थोड़ी हवा से बिखर जाती है। बिना प्रीति की भक्ति ठीक वही है: ऊपर से चिकनी, भीतर से पानी।
बिना, बिना, बिना
अब वह हिस्सा जिससे यह प्रसंग अपने अन्त की ओर जाता है। यह प्रश्नों का है, और हर प्रश्न एक ही ढाँचे में है, इसके बिना क्या वह हो सकता है। प्रश्न का शब्द है क्या: गुरु के बिना क्या ज्ञान हो सकता है? इन प्रश्नों के उत्तर नहीं दिये जाते, क्योंकि उत्तर पूछने में ही है।
पहले तीन प्रश्न आते हैं, और उनका क्रम ही उनकी बात है। गुरु के बिना ज्ञान, वैराग्य के बिना ज्ञान: दोनों में ज्ञान ही वह चीज़ है जो नहीं हो सकती, एक बार गुरु के बिना, एक बार वैराग्य के बिना। ज्ञान के दो द्वार हैं, एक बाहर का आदमी और एक भीतर का उचाट, और दोनों में से एक भी न हो तो ज्ञान नहीं आता। फिर वेद-पुराण के हवाले से तीसरा, भगवान् की भक्ति के बिना सुख। फिर सहज सन्तोष के बिना विश्राम पूछा जाता है। उसका उत्तर एक नाव में मिलता है: जल के बिना क्या नाव चलती है, चाहे करोड़ों यत्न करके पच-पच मर जाइये?
इसके बाद प्रश्नों की बारिश है। सन्तोष के बिना काम नहीं मिटते, काम रहते सपने में भी सुख नहीं। राम भजन बिना काम क्या मिटेंगे। बिना धरती के क्या पेड़ जमता है? फिर एक ढाँचा आता है जो देख लेने पर छूटता नहीं: विज्ञान के बिना समता, और साथ में, आकाश के बिना अवकाश। श्रद्धा के बिना धर्म, और साथ में, पृथ्वी के बिना गन्ध। तप के बिना तेज, और साथ में, जल के बिना रस। बुधजनों की सेवा के बिना शील, और साथ में, तेज के बिना रूप। निज सुख के बिना मन की स्थिरता, और साथ में, वायु के बिना स्पर्श।
पाँच जोड़े, और हर जोड़े का दूसरा हिस्सा एक तत्त्व है, आकाश, पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, अपने गुण के साथ, अवकाश, गन्ध, रस, रूप, स्पर्श। जैसे बिना पृथ्वी गन्ध की कल्पना भी नहीं हो सकती, वैसे ही बिना श्रद्धा धर्म की। साधना की ये बातें तर्क से नहीं, पदार्थ के स्वभाव से असम्भव दिखायी गयी हैं।
अन्त में वह शब्द आता है जो आगे की बात का बीज है, विश्वास: विश्वास के बिना क्या कोई सिद्धि हो सकती है? कोई भी, छोटी से छोटी भी। और फिर वह बात जो पहले भी आ चुकी है: भगवान् के भजन बिना भव-भय का नाश नहीं। यह बात पीछे के सारे प्रश्नों को एक शब्द पर ला देती है, विश्वास, और अगली बात उसी शब्द से खुलती है।
बिना विश्वास भक्ति नहीं। और भक्ति के बिना राम द्रवित नहीं होते, यानी पिघलते नहीं। यह नहीं कहा गया कि राम प्रसन्न नहीं होते या कृपा नहीं करते। कहा गया कि पिघलते नहीं। पिघलना वह है जो ठोस के साथ आँच लगने पर होता है, और यहाँ आँच भक्ति है। फिर एक बात चक्र पूरा कर देती है: राम की कृपा बिना जीव सपने में भी विश्राम नहीं पाता। विश्राम, वही शब्द जो पहले सहज सन्तोष के साथ आया था।
भुशुण्डि के अनुभव की पहली ज़ंजीर में कृपा से प्रभुता जानी जाती है, जानने से प्रतीति, प्रतीति से प्रीति, प्रीति से भक्ति। यहाँ विश्वास से भक्ति, भक्ति से राम का पिघलना, और कृपा से विश्राम है। एक में कृपा पहली कड़ी है, दूसरी में आख़िरी: यह उस चक्र का चित्र है जिसमें कोई पहली कड़ी नहीं होती। प्रसंग यहीं रुकता है, और आगे की बात अगले प्रसंग से खुलती है।
माँगी हुई आँच
आँगन में एक चीज़ माँगी गयी और एक बिना माँगे दी गयी। माँगी गयी भक्ति, जिसके लिये सूची में से एक कमी पकड़नी पड़ी। बिना माँगे दिया गया निज सिद्धान्त, जो ठीक उसी कमी का उत्तर था, कि सेवक से प्रिय कोई नहीं। वरदान और उसका कारण, दोनों एक ही बैठक में मिले।
दूसरी बात उस सीढ़ी की है, जो कुछ ही वाक्यों में बनी और एक में पलट दी गयी। सुननेवाले को पहले वह क्रम दिखता है जिस पर उसे भरोसा है, द्विज, ज्ञानी, विज्ञानी, और फिर पता चलता है कि यह क्रम ठीक है, बस अन्तिम नहीं। जो ऊपर है वह किसी डण्डे पर नहीं। वह है जिसके पास और कोई डण्डा नहीं।
तीसरी बात उस खेल की है। निज सिद्धान्त कहने के तुरन्त बाद राम आँखों में पानी भरकर माँ की ओर देखते हैं और भूख की शिकायत करते हैं। कथा बीच में कोई सफ़ाई नहीं देती, बस इतना कहती है, वही खेल। जिसने अभी अगुण ब्रह्म का लक्षण कहा वह गोद में दूध पी रहा है। अवध के नर-नारी उसी सुख में मग्न हैं जिसके लिये शिव को रूप बदलना पड़ा था।
सिद्धियों की सूची, ब्रह्म का लक्षण, सेवक की महिमा, पिता और बेटे, पाँच तत्त्व, सब कहा गया। और अन्त में बचा एक शब्द, पिघलना: एक चीज़ है जो पिघलती है, और एक चीज़ है जिससे वह पिघलती है। कौए ने शुरू में जो माँगा था, वह ठीक वही आँच थी।
अगले प्रसंग से राम की महिमा की वह नाप शुरू होती है जो नापी नहीं जा सकती। यहाँ बात इतनी है कि एक बच्चे ने एक कौए के सिर पर हाथ रखा, और उस हाथ से जो निकला, वह एक पूरा सिद्धान्त था।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, उत्तरकाण्ड, दोहा 83 से 90 (क), और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।