रामचरितमानस · उत्तरकाण्ड · भुशुण्डि को वरदान और भक्ति का उपदेश
भुशुण्डि को वरदान और भक्ति का उपदेश
एक कौआ धरती पर गिरा पड़ा है और एक बच्चे का हाथ उसके सिर पर है। उस हाथ से जो माँगा जाता है वह सब कुछ नहीं है, और इसीलिये वह सब कुछ से बड़ा निकलता है।
पिछला प्रसंग जहाँ छूटा था, वहाँ एक कौआ अवध के आँगन में एक बच्चे के पेट के भीतर से लौटा था और उसने वहाँ अनगिनत ब्रह्माण्ड देखे थे। यह प्रसंग उसके ठीक अगले क्षण से खुलता है। वह कौआ, जिसे टीका काकभुशुण्डि कहती है और जो यह सारी कथा गरुड़ को सुना रहा है, धरती पर गिरा पड़ा है। मुँह से बात नहीं निकल रही। और जो बच्चा अभी तक आँगन में खेल रहा था, वह आकर अपना हाथ उसके सिर पर रख देता है। यहाँ से जो शुरू होता है वह उत्तरकाण्ड का सबसे सीधा लेन-देन है। एक ओर वह है जो सब कुछ दे सकता है और देने की सूची भी सुना देता है। दूसरी ओर वह है जो उस सूची को सुनते-सुनते एक चीज़ की कमी पकड़ लेता है, और वही एक चीज़ माँग लेता है।
उस माँग के बाद राम जो कहते हैं, उसे वे स्वयं अपना निज सिद्धान्त कहते हैं। यह आठ दोहों का प्रसंग है और इसका बीच का हिस्सा पूरी तरह उसी सिद्धान्त का है। इसमें एक सीढ़ी बनायी जाती है, जीवों से मनुष्य तक, मनुष्य से द्विज तक, और इसी तरह ऊपर, और फिर सीढ़ी के सबसे ऊपरी डण्डे पर वह खड़ा किया जाता है जिसे कोई ऊपर रखता ही नहीं, सेवक। फिर एक पिता और उसके बहुत से बेटों की बात होती है। और फिर, जब सारा सिद्धान्त कह दिया गया है, वह बच्चा फिर से बच्चा हो जाता है, आँखों में पानी भरकर अपनी माता की ओर देखता है, और भूख की शिकायत करता है।
पन्ने का अन्तिम हिस्सा उस कौए की अपनी बात है। कथा सुनाना रोककर वह गरुड़ से वह कहता है जो उसने स्वयं देखा है, और वहाँ से बिना का एक लम्बा सिलसिला चलता है, बिना गुरु ज्ञान नहीं, बिना वैराग्य ज्ञान नहीं, बिना सन्तोष विश्राम नहीं, बिना जल नाव नहीं। यह सिलसिला ठीक उस पंक्ति पर जाकर रुकता है जो अगले प्रसंग का दरवाज़ा है, कि बिना विश्वास भक्ति नहीं होती और बिना भक्ति राम पिघलते नहीं। यह तुलसीदास का रामचरितमानस है। जो कथा यहाँ है वह एक कौए और एक गरुड़ के बीच की बातचीत के भीतर रखी गयी है, और वाल्मीकि की रामायण में यह पूरा ढाँचा है ही नहीं।
इस प्रसंग के मुख्य किरदार
- राम अवध के आँगन में खेलता हुआ बालक, जो एक क्षण के लिये अपनी माया की प्रभुता रोकता है, वरदान देता है, अपना निज सिद्धान्त सुनाता है, और फिर उसी आँगन में भूख की शिकायत करने लगता है।
- काकभुशुण्डि यह सारी कथा सुनानेवाला कौआ। इस पन्ने पर वह पहले धरती पर गिरा हुआ है, फिर माँगनेवाला है, और अन्त में अपना अनुभव कहनेवाला है। पद्य उन्हें काकभसुंडि लिखता है, टीका काकभुशुण्डि।
- गरुड़ सुननेवाले। पद्य उन्हें खगराज, खगेस, खगपति कहकर पुकारता है, और टीका एक जगह गरुड़ नाम लेती है। इस पूरे प्रसंग में वे एक शब्द नहीं बोलते।
- माता जिनकी ओर बालक भूखी आँखों से देखता है। वे दौड़कर उठाती हैं, दूध पिलाती हैं और गोद में बैठे उसी बच्चे की लीलाएँ गाती हैं। इन पंक्तियों में उनका नाम नहीं आता।
- शिव एक सोरठे में, पुरारि के नाम से, जिन्होंने अवध के सुख के लिये अशुभ वेष धारण किया था। इतना ही कहा गया है, और वेष क्या था, यह इन पंक्तियों में नहीं है।
धरती पर, और सिर पर एक हाथ
भुशुण्डि की कथा उस जगह पर है जहाँ देखी हुई चीज़ और समझी हुई चीज़ एक साथ आ पड़ती हैं। आँगन में बालक का खेल है, जो अभी सामने है। और पेट के भीतर देखी हुई वह प्रभुता है, जो अभी-अभी की स्मृति है। दोनों एक ही क्षण में मिलते हैं, और उस क्षण का जो असर होता है उसे तुलसी एक ही शब्द में रखते हैं, बिसराई। देह की दशा भूल गयी। यह मूर्च्छा नहीं है, यह भूल है। जो शरीर था वह याद ही नहीं रहा।
देखि चरित यह सो प्रभुताई । समुझत देह दसा बिसराई॥
चौपाई १
धरनि परेउँ मुख आव न बाता। त्राहि त्राहि आरत जन त्राता॥
धरती पर गिर पड़ा, मुँह से बात नहीं निकलती। और फिर भी एक बात निकलती है, त्राहि त्राहि। यह पुकार उस आदमी की नहीं है जो कुछ सोचकर बोल रहा है। यह उस पक्षी की है जिसके पास शब्द बचे ही नहीं और जो फिर भी पुकार रहा है। और जिसे पुकारा गया है उसका नाम देखिये, आरत जन त्राता, दुखियों का रक्षक। कौए ने अभी जो देखा है वह ब्रह्माण्डों का स्वामी है, पर पुकारा उसे उस नाम से जो दुखियों के काम का है। भय के भीतर से जो पहला नाम निकला, वह प्रभुता का नहीं, रक्षा का था।
और रक्षा तुरन्त आती है। प्रेमाकुल देखकर प्रभु ने अपनी माया की प्रभुता रोक दी। इस पंक्ति में एक बात छिपी है जिसे सीधे पढ़ लेना चाहिये। जो रोका गया वह प्रभुता है, और रोकनेवाला वही है जिसकी वह प्रभुता है। बच्चे ने अपना बड़ा होना समेट लिया, क्योंकि सामनेवाला उससे टूट रहा था। फिर कमल जैसा हाथ सिर पर आया। तुलसी दीनदयाल शब्द यहीं रखते हैं, और उसी साँस में कहते हैं कि सारा दुःख हर लिया गया।
इसके बाद की दो चौपाइयाँ भुशुण्डि के भीतर की गिनती हैं। मोह हटा। जिसने हटाया उसे सेवक सुखद और कृपा संदोह कहा गया है, यानी कृपा का पूरा ढेर। और फिर, ठीक उलटी बात। जिसने अभी मोह से छुड़ाया, उसी की पहली प्रभुता को बार-बार विचारकर मन में बड़ा भारी हर्ष हुआ। जिस चीज़ को देखकर वह गिरा था, वही चीज़ अब याद करने पर खुशी देती है। बीच में केवल एक हाथ है। पेट के भीतर देखे हुए ब्रह्माण्ड और सिर पर रखा हुआ हाथ, दोनों एक ही के हैं, पर एक से डर लगा और दूसरे से भरोसा आया, और भरोसा आ जाने के बाद डर की चीज़ भी आनन्द की चीज़ हो गयी।
और तब भक्तवत्सलता देखकर विशेष प्रीति उपजी, आँखें भर आयीं, रोमांच हुआ, हाथ जुड़े, और बहुत प्रकार से विनती हुई। गिरा हुआ पक्षी अब हाथ जोड़कर खड़ा है। इतना ही रास्ता है इस पहले हिस्से में, धरती से लेकर जुड़े हुए हाथों तक, और वह चार चौपाइयों में पूरा हो जाता है।
सार: बालक का खेल और पेट के भीतर देखी हुई प्रभुता एक साथ याद आते ही भुशुण्डि देह भूलकर धरती पर गिर पड़ते हैं और त्राहि त्राहि पुकारते हैं। राम अपनी माया की प्रभुता रोककर सिर पर हाथ रखते हैं, मोह हटता है, और वही प्रभुता अब हर्ष देती है। सजल नेत्र और जुड़े हाथों से कौआ विनती करता है।
सूची, और उसमें से छूटी हुई एक चीज़
विनती सुनकर जो उत्तर आता है, उसका स्वर तुलसी तीन शब्दों में बाँधते हैं, सुखद, गंभीर, मृदु। और बोलनेवाले का नाम भी देखिये, रमानिवास, जिनके पास लक्ष्मी रहती हैं। यह नाम यहाँ इसलिये है कि आगे जो दिया जाना है वह धन की तरह गिना जायेगा। अपने दास को दीन देखकर स्वामी बोले, और पहला वाक्य ही एक खुला द्वार है। वर माँगा जाये, यह जानकर कि देनेवाला अत्यन्त प्रसन्न है।
सुनि सप्रेम मम बानी देखि दीन निज दास।
दोहा ८३
बचन सुखद गंभीर मृदु बोले रमानिवास॥ ८३ (क)॥
काकभसुंडि मागु बर अति प्रसन्न मोहि जानि।
अनिमादिक सिधि अपर रिधि मोच्छ सकल सुख खानि॥ ८३ (ख)॥
और द्वार खोलने के बाद वे भीतर का सामान भी गिना देते हैं। अणिमा आदि सिद्धियाँ, दूसरी ऋद्धियाँ, और मोक्ष, जिसे सारे सुखों की खान कहा गया है। इसके बाद अगली चौपाई में सूची और लम्बी होती है, ज्ञान, विवेक, वैराग्य, विज्ञान, और जगत् के वे अनेक गुण जो मुनियों के लिये भी दुर्लभ हैं। सब आज दे देंगे, कोई संशय नहीं। और अन्त में फिर वही खुली बात, जो मन में भाये, वही माँगा जाये।
यह सूची पढ़ते हुए इस पर ध्यान जाना चाहिये कि इसमें क्या-क्या है। सिद्धि है, ऋद्धि है, मोक्ष है, ज्ञान है, वैराग्य है। शास्त्र जितने फल गिनाते हैं, प्रायः सब यहाँ हैं। और भुशुण्डि ने ठीक यही किया। उन्होंने सूची को सुना, और सुनते हुए उसे टटोला। तुलसी का शब्द है अनुमान, मन अनुमान करन तब लागेउँ। यानी प्रेम में भरे हुए भी उनकी बुद्धि काम कर रही थी। और अनुमान से जो निकला वह एक कमी थी। प्रभु ने सब सुख देने की बात कही, यह सच है। पर अपनी भक्ति देने की बात नहीं कही।
यह पूरे प्रसंग की धुरी है, और इसे ध्यान से देखना चाहिये कि यहाँ क्या हो रहा है। देनेवाला सब कुछ दे रहा है, और लेनेवाला उसमें से उस एक चीज़ को ढूँढ़ रहा है जो नहीं दी जा रही। सूची में वह नहीं है, इसीलिये वह चाहिये। और तब भुशुण्डि अपने भीतर उस कमी का नाप लेते हैं, और नाप के लिये जो उपमा चुनते हैं वह रसोई की है।
भगति हीन गुन सब सुख ऐसे । लवन बिना बहु बिंजन जैसे॥
चौपाई २
भजन हीन सुख कवने काजा। अस बिचारि बोलेउँ खगराजा॥
भक्ति से हीन सब गुण और सब सुख वैसे हैं जैसे नमक के बिना बहुत तरह के व्यंजन। यह उपमा किसी शास्त्र से नहीं आयी है, थाली से आयी है। नमक न हो तो पकवान कम नहीं होते, वे बने रहते हैं, सजे रहते हैं, बस खाये नहीं जाते। सिद्धि और मोक्ष की सूची ठीक वही थाली है, भरी हुई, और उसमें एक चीज़ नहीं है जो सबसे सस्ती है और जिसके बिना बाकी सब बेकार है। भजन से हीन सुख किस काम का, यह प्रश्न इसी थाली को देखकर पूछा गया है। और यह विचार करके, तुलसी कहते हैं, मैं बोला। खगराजा यहाँ फिर सम्बोधन में आता है, ताकि हम याद रखें कि यह सब एक कौआ एक गरुड़ को सुना रहा है।
बोलने से पहले भुशुण्डि एक शर्त और एक स्तुति रखते हैं। शर्त यह कि यदि प्रभु प्रसन्न होकर वर देते हैं और कृपा और स्नेह करते हैं, तो मैं मन का भाया वर माँगता हूँ। और स्तुति यह कि आप उदार हैं और अन्तर्यामी हैं। यानी माँगने से पहले ही कह दिया गया कि जो माँगा जायेगा वह आपको मालूम है। फिर भी माँगा जाता है, क्योंकि माँगना ही इस दृश्य का काम है।
अबिरल भगति बिसुद्ध तव श्रुति पुरान जो गाव।
दोहा ८४
जेहि खोजत जोगीस मुनि प्रभु प्रसाद कोउ पाव॥ ८४ (क)॥
भगत कल्पतरु प्रनत हित कृपा सिंधु सुख धाम।
सोइ निज भगति मोहि प्रभु देहु दया करि राम॥ ८४ (ख)॥
दोहे की पहली पंक्ति में भक्ति की पहचान है और दूसरी में माँग। अबिरल और बिसुद्ध, प्रगाढ़ और शुद्ध, जिसे श्रुति और पुराण गाते हैं, जिसे योगीश्वर और मुनि खोजते हैं और प्रभु की कृपा से कोई एक पाता है। यहाँ खोजना और पाना दो अलग क्रियाएँ हैं, और दोनों के बीच कृपा खड़ी है। खोजनेवाले बहुत हैं, पानेवाला कोउ, कोई एक। और दूसरी पंक्ति में चार नाम एक साँस में लिये जाते हैं, भगत कल्पतरु, प्रनत हित, कृपा सिंधु, सुख धाम, और तब कहा जाता है, वही अपनी भक्ति मुझे दीजिये, दया करके। निज भगति, अपनी भक्ति। यानी किसी और की भक्ति नहीं, आपकी अपनी। जो सूची में नहीं थी, वह अब सीधे नाम लेकर माँग ली गयी।
सार: राम प्रसन्न होकर वर माँगने को कहते हैं और सिद्धि, ऋद्धि, मोक्ष, ज्ञान, विवेक, वैराग्य, विज्ञान, सब देने की सूची सुनाते हैं। भुशुण्डि सुनते हुए पकड़ लेते हैं कि सूची में भक्ति नहीं है, उसे नमक के बिना पकवानों से नापते हैं, और श्रुति-पुराणों में गायी हुई वही अविरल, विशुद्ध, निज भक्ति माँग लेते हैं।
एवमस्तु, और एक रीझ
उत्तर का पहला शब्द ही उत्तर है। एवमस्तु, ऐसा ही हो। इसके बाद जो कुछ कहा जाता है वह वर नहीं है, वर तो इस एक शब्द में दे दिया गया। आगे की पंक्तियाँ उस माँग की सराहना हैं, और यह सराहना इस पूरे पन्ने का सबसे हल्का और सबसे प्यारा हिस्सा है। सुनु बायस, राम कहते हैं, कौए को सुनने के लिये पुकारते हैं, और फिर उसे सहज सयाना कहते हैं, स्वभाव से चतुर। ऐसा वरदान क्यों न माँगता। यह प्रश्न नहीं है, यह दाद है।
और दाद आगे और खुलती है। सब सुखों की खान भक्ति माँग ली, जगत् में इसके समान बड़भागी कोई नहीं। जिसे वे मुनि करोड़ों यत्न करके नहीं पाते जो जप और योग की आग में शरीर जलाते रहते हैं, वही भक्ति एक कौए ने एक वाक्य में माँग ली। इस तुलना का काँटा देखिये। जो जलाते हैं वे नहीं पाते, जो माँगता है वह पा जाता है। साधन और माँग के बीच का यह अन्तर पूरे उत्तरकाण्ड में बार-बार आता है, पर यहाँ वह हँसी की तरह आता है, जैसे कोई बड़ा किसी छोटे की चतुराई पर मुसकरा रहा हो।
रीझेउँ देखि तोरि चतुराई । मागेहु भगति मोहि अति भाई॥
चौपाई ३
सुनु बिहंग प्रसाद अब मोरें । सब सुभ गुन बसिहहिं उर तोरें॥
रीझेउँ। मैं रीझ गया। यह शब्द इस पन्ने पर एक बार आता है और इसे भारी नहीं करना चाहिये। यह वह रीझ है जो बच्चे की चालाकी देखकर बड़ों में आती है, और यहाँ रीझनेवाला स्वयं बच्चे के रूप में है और रीझ रहा है एक बूढ़े कौए की चतुराई पर। तोरि चतुराई, यह कौए की चतुराई है, उसने सूची में से छूटी हुई चीज़ पकड़ ली थी। और उस चतुराई का फल उसी साँस में मिल जाता है, सुनु बिहंग, और फिर यह कि मेरी कृपा से अब सब शुभ गुण इस हृदय में बसेंगे। यानी जो कुछ सूची में था और जो नहीं माँगा गया, वह सब बिना माँगे साथ आ गया। नमक माँगा था, थाली मिल गयी।
अगली चौपाई इसी को गिनकर कहती है। भक्ति, ज्ञान, विज्ञान, वैराग्य, योग, चरित्र, उसके रहस्य और विभाग, इन सबका भेद, राम कहते हैं, मेरी कृपा से ही जाना जायेगा, और साधन का कष्ट नहीं होगा। साधन खेद, यही वह चीज़ है जो अभी-अभी जप और योग में शरीर जलानेवाले मुनियों की बात में थी। वह कौए को नहीं झेलना पड़ेगा। और फिर दोहा, जिसमें राम एक बड़ी बात और एक छोटी बात को एक साथ रखते हैं।
माया संभव भ्रम सब अब न ब्यापिहहिं तोहि।
दोहा ८५
जानेसु ब्रह्म अनादि अज अगुन गुनाकर मोहि॥ ८५ (क)॥
मोहि भगत प्रिय संतत अस बिचारि सुनु काग।
कायँ बचन मन मम पद करेसु अचल अनुराग॥ ८५ (ख)॥
बड़ी बात पहली पंक्ति में है। माया से उत्पन्न भ्रम अब नहीं व्यापेंगे, और मुझे अनादि, अजन्मा, अगुण, गुणों की खान ब्रह्म जानना। अगुन और गुनाकर एक ही पंक्ति में हैं, गुणों से रहित और गुणों की खान, और तुलसी इन्हें एक साथ रखकर छोड़ देते हैं, क्योंकि यही उनका ब्रह्म है, जिसमें दोनों बातें एक साथ सच हैं। और छोटी बात दूसरी पंक्ति में है, और वह बड़ी बात से बड़ी है। मुझे भक्त निरन्तर प्रिय हैं, यह विचारकर, राम कहते हैं, शरीर, वचन और मन से मेरे चरणों में अटल प्रेम किया जाये। ब्रह्म का पूरा लक्षण देने के बाद जो करने को कहा गया, वह ब्रह्म का चिन्तन नहीं है। वह चरणों में प्रेम है। अचल अनुराग, यही वह भक्ति है जो माँगी गयी थी, और अब वह आदेश की तरह लौट आयी है।
सार: एवमस्तु कहकर राम कौए की चतुराई पर रीझते हैं, कहते हैं कि जिसे मुनि शरीर जलाकर नहीं पाते वह भक्ति इसने माँग ली, और बिना माँगे सब शुभ गुण, ज्ञान, विज्ञान, वैराग्य और योग के भेद भी दे देते हैं। दोहे में अपने को अगुण और गुणों की खान ब्रह्म जानने को कहते हैं, और उसी साँस में चरणों में अचल अनुराग करने को।
निज सिद्धान्त: सीढ़ी, और उसका सबसे ऊपरी डण्डा
वर पूरा हो चुका। अब राम एक ऐसी बात कहने लगते हैं जो माँगी नहीं गयी थी। वे उसे अपनी परम विमल वाणी कहते हैं, सत्य, सुगम, और वेदों में कही हुई। और फिर एक शब्द जोड़ते हैं जो इस पूरे हिस्से का नाम बन जाता है, निज सिद्धांत। अपना सिद्धान्त। जो आगे कहा जायेगा वह किसी शास्त्र का उद्धरण नहीं होगा, यह कहनेवाले की अपनी बात होगी। और सुनने की शर्त भी साथ है, मन में धरना, और सब छोड़कर मेरा भजन करना।
सिद्धान्त एक सीढ़ी की तरह बनता है, और सीढ़ी का पहला डण्डा सबसे चौड़ा है।
मम माया संभव संसारा। जीव चराचर बिबिधि प्रकारा॥
चौपाई ४
सब मम प्रिय सब मम उपजाए। सब ते अधिक मनुज मोहि भाए॥
यह सारा संसार मेरी माया से उत्पन्न है, इसमें अनेक प्रकार के चर और अचर जीव हैं, और सब मुझे प्रिय हैं, क्योंकि सब मेरे उत्पन्न किये हुए हैं। यहाँ पहली पंक्ति में कोई छँटनी नहीं है। सब, और फिर सब। जो बनाया है वह सब प्यारा है, बनाने के कारण ही। और तब दूसरी आधी पंक्ति में पहली छँटनी आती है, सब ते अधिक मनुज मोहि भाए। सबसे अधिक मनुष्य भाते हैं। भाए, अच्छे लगते हैं, यह शब्द प्रिय से थोड़ा अलग है, इसमें रुचि है, पसन्द है।
और अब सीढ़ी ऊपर चढ़ती है, और हर डण्डा पिछले से सँकरा है। मनुष्यों में द्विज। द्विजों में श्रुतिधारी, यानी जिन्होंने वेद कण्ठ में रखे हैं। उनमें वे जो वेद के धर्म पर चलते हैं, क्योंकि रटना और चलना दो चीज़ें हैं। उनमें विरक्त। विरक्तों में ज्ञानी। और ज्ञानियों से भी अधिक प्रिय विज्ञानी, जिसने जाना ही नहीं, जाने हुए को जिया है। मनुष्य से ऊपर छह डण्डे, और हर एक पर पिछले से कम लोग खड़े हैं। पढ़नेवाला सोचता है कि सीढ़ी यहाँ पूरी हुई, विज्ञानी से ऊपर क्या होगा। और तुलसी ठीक यहाँ एक और डण्डा रख देते हैं।
तिन्ह ते पुनि मोहि प्रिय निज दासा। जेहि गति मोरि न दूसरि आसा॥
चौपाई ५
पुनि पुनि सत्य कहउँ तोहि पाहीं । मोहि सेवक सम प्रिय कोउ नाहीं॥
उनसे भी अधिक प्रिय अपना दास, जिसे मेरी ही गति है और कोई दूसरी आशा नहीं। यानी विज्ञानी से ऊपर वह है जिसके पास ज्ञान की कोई गिनती ही नहीं की गयी। उसके पास एक चीज़ है, गति, यानी सहारा, और वह भी एक ही जगह का। न दूसरि आसा। दूसरी आशा नहीं। यह लक्षण किसी योग्यता का नहीं है, यह एक छूट का लक्षण है। जिसने बाकी सारे सहारे छोड़ दिये हैं, वह सीढ़ी के सबसे ऊपर है। और फिर राम वह वाक्य कहते हैं जिसे वे पुनि पुनि सत्य कहकर दुहराते हैं, मुझे सेवक के समान प्रिय कोई नहीं। सिद्धान्त का यह वाक्य बार-बार सत्य कहकर कहा गया है, जैसे कहनेवाले को मालूम हो कि इस पर भरोसा करना सुननेवाले के लिये मुश्किल होगा।
और अब वह चौपाई, जो अभी-अभी बनायी हुई सीढ़ी को हिला देती है।
भगति हीन बिरंचि किन होई । सब जीवहु सम प्रिय मोहि सोई॥
चौपाई ६
भगतिवंत अति नीचउ प्रानी । मोहि प्रानप्रिय असि मम बानी॥
भक्ति से हीन ब्रह्मा ही क्यों न हो, वह मुझे सब जीवों के समान ही प्रिय है। और भक्तिवाला अत्यन्त नीच प्राणी भी मुझे प्राणों के समान प्रिय है, यह मेरी वाणी है। ध्यान से देखिये कि यहाँ क्या हुआ। पहले एक सीढ़ी बनायी गयी थी जिस पर द्विज, श्रुतिधारी, ज्ञानी, विज्ञानी क्रम से ऊपर चढ़ते थे। और अब कहा जा रहा है कि उस सीढ़ी के सबसे ऊपर भी यदि कोई बिना भक्ति के पहुँचा है, ब्रह्मा तक पहुँचा है, तो वह पहले डण्डे के बराबर है, सब जीवों के समान। और सबसे नीचे का प्राणी, अति नीचउ, यदि भक्ति लेकर खड़ा है, तो वह प्राणों के समान है। सीढ़ी तोड़ी नहीं गयी, पर उसका अर्थ बदल दिया गया। वह किसे ऊपर रखती है यह अब उसके डण्डों से तय नहीं होता, एक ही चीज़ से तय होता है, और वह चीज़ किसी डण्डे पर नहीं है।
असि मम बानी, यह मेरी वाणी है। तुलसी राम से यह वाक्य उसी तरह कहलवाते हैं जैसे कोई राजा घोषणा पर मुहर लगाता है। और फिर दोहे में वे इस घोषणा को घर की भाषा में उतार देते हैं।
सुचि सुसील सेवक सुमति प्रिय कहु काहि न लाग।
दोहा ८६
श्रुति पुरान कह नीति असि सावधान सुनु काग॥ ८६॥
पवित्र, सुशील और सुन्दर बुद्धिवाला सेवक किसे प्यारा नहीं लगता। यह किसी सिद्धान्त का वाक्य नहीं है, यह बोलचाल का प्रश्न है, जो कोई भी घर चलानेवाला जानता है। और तुलसी यहाँ श्रुति और पुराण का नाम इसलिये लेते हैं कि जो बात अभी निज सिद्धान्त कहकर कही गयी थी, वह किसी की निजी राय न लगे। सावधान सुनु काग, सावधान होकर सुनने को कहा गया है। यह चेतावनी इसलिये है कि आगे एक उपमा आनेवाली है, और उपमा में बात प्रायः फिसल जाती है।
सार: राम अपना निज सिद्धान्त कहते हैं: सब जीव प्रिय हैं, उनमें मनुष्य अधिक, मनुष्यों में द्विज, फिर श्रुतिधारी, फिर धर्म पर चलनेवाले, फिर विरक्त, फिर ज्ञानी, फिर विज्ञानी, और उन सबसे ऊपर अपना दास जिसे कोई दूसरी आशा नहीं। फिर वही सीढ़ी पलट दी जाती है: भक्तिहीन ब्रह्मा भी सब जीवों के बराबर, भक्तिवाला अति नीच प्राणी भी प्राणों के समान। दोहा कहता है कि पवित्र, सुशील, सुबुद्धि सेवक किसे प्यारा नहीं लगता।
एक पिता, बहुत बेटे
उपमा घर की है। एक पिता के बहुत से बेटे हैं, और सब अलग-अलग गुण, स्वभाव और आचरण के हैं। तुलसी उन्हें गिनते हैं, और गिनती में जो नाम आते हैं वे वही हैं जो अभी सीढ़ी पर थे, बस अब वे बेटे हैं। कोई पण्डित है, कोई तपस्वी, कोई ज्ञानी, कोई धनवान, कोई शूर, कोई दानी, कोई सर्वज्ञ, कोई धर्म में रत। आठ बेटे, और आठों में कोई भी बुरा नहीं है। यह बात ध्यान देने की है। इस उपमा में कोई कुपुत्र नहीं है। सब अच्छे हैं, बस अलग-अलग तरह से अच्छे हैं।
और पिता का प्रेम सब पर समान है, सब पर पितहि प्रीति सम होई। यह पंक्ति ठीक वही है जो सीढ़ी के पहले डण्डे पर थी, सब मम प्रिय। पर उपमा यहाँ नहीं रुकती।
कोउ सर्बग्य धर्मरत कोई । सब पर पितहि प्रीति सम होई॥
चौपाई ७
कोउ पितु भगत बचन मन कर्मा । सपनेहुँ जान न दूसर धर्मा॥
इनमें से यदि कोई मन, वचन और कर्म से पिता का ही भक्त है, और सपने में भी दूसरा धर्म नहीं जानता, तो वह बेटा पिता को प्राणों के समान प्रिय है। और फिर अगली चौपाई की वह आधी पंक्ति जिसके लिये यह पूरी उपमा बनायी गयी है, जद्यपि सो सब भाँति अयाना, चाहे वह हर तरह से अज्ञानी हो। यानी उस बेटे के पास न पण्डिताई है, न तप, न धन, न शूरता। सूची में गिने हुए आठ गुणों में से एक भी नहीं। उसके पास बस एक चीज़ है, कि वह पिता का है, और उसे यह भी नहीं मालूम कि इसके सिवा कुछ और भी हो सकता है। सपनेहुँ, सपने में भी नहीं। और वही बेटा प्राणों के बराबर है।
यहाँ इस पर ठहरना चाहिये कि यह उपमा पिछली चौपाई को कैसे बदलती है। वहाँ कहा गया था कि भक्तिवाला अति नीच प्राणी प्राणप्रिय है, और यह बात सुनने में कठोर लगती थी, जैसे ऊँचे को नीचा किया जा रहा हो। उपमा उस कठोरता को घर के चौके में रखकर दिखा देती है कि इसमें कठोर कुछ है ही नहीं। हर पिता यह जानता है। जो बेटा सबसे कम काम का है पर सबसे ज़्यादा पास बैठता है, उसके लिये पिता के भीतर एक अलग जगह है, और वह जगह किसी न्याय से नहीं बनती। बनती ही है।
और तब उपमा को फिर संसार पर फैला दिया जाता है। इस प्रकार जितने चर और अचर जीव हैं, पशु-पक्षी, देवता, मनुष्य और असुर समेत, यह सारा विश्व मेरा ही उपजाया हुआ है, और सब पर मेरी बराबर दया है। बराबरि दाया, यह पिता की सम प्रीति है। और फिर वही मोड़, इनमें से जो मद और माया छोड़कर मन, वचन और शरीर से मुझे भजता है, वह।
पुरुष नपुंसक नारि वा जीव चराचर कोइ।
दोहा ८७ (क)
सर्ब भाव भज कपट तजि मोहि परम प्रिय सोइ॥ ८७ (क)॥
पुरुष हो, नपुंसक हो, नारी हो, या चर-अचर कोई भी जीव हो। इस दोहे की पहली पंक्ति में जो गिनती है, वह जान-बूझकर तीन शरीर गिनाती है, और तीनों में से किसी को छोड़ती नहीं। फिर कोइ, कोई भी। और दूसरी पंक्ति में शर्त है, सर्व भाव से, कपट छोड़कर, जो भजता है, वह परम प्रिय है। यहाँ दो शर्तें हैं और दोनों भीतर की हैं। सर्व भाव, यानी पूरा, आधा नहीं। और कपट तजि, यानी दिखावा नहीं। जो बाहर की चीज़ें थीं, शरीर, जाति, ज्ञान, वे सब पहली पंक्ति में उड़ा दी गयीं। जो बच गया वह वही है जिसे कोई देख नहीं सकता, और वही तय करता है।
इसके बाद सोरठे में राम फिर वही बात दुहराते हैं जो वे पहले भी सत्य कहकर कह चुके हैं। सत्य कहता हूँ, पक्षी, पवित्र सेवक मुझे प्राणों के समान प्रिय है, ऐसा विचारकर सब आशा और भरोसा छोड़कर मेरा भजन हो। परिहरि आस भरोस सब। सब आशा और सब भरोसा छोड़कर। यह वही न दूसरि आसा है जो सीढ़ी के ऊपरी डण्डे पर थी, बस अब वह आदेश बन गयी है। और इसके साथ एक वचन भी है, जो अगली चौपाई में आता है, कभी काल नहीं व्यापेगा। जिसने भरोसे छोड़ दिये, उसे मृत्यु से भी छूट मिल गयी।
सार: एक पिता के बहुत बेटे हैं, पण्डित, तपस्वी, धनी, शूर, दानी, और पिता का प्रेम सब पर समान है, पर जो बेटा मन, वचन, कर्म से केवल पिता का है वह प्राणों के समान प्रिय है, चाहे हर तरह से अज्ञानी हो। इसी तरह पुरुष, नपुंसक, स्त्री या कोई भी जीव जो कपट छोड़कर सर्वभाव से भजता है वह परम प्रिय है। सब आशा-भरोसा छोड़कर भजने को कहा जाता है, और वचन मिलता है कि काल नहीं व्यापेगा।
और फिर वही खेल
वचनामृत सुनकर भुशुण्डि तृप्त नहीं होते, तनु पुलकित, मन हर्षित। और फिर वे अपने सुख के विषय में एक बात कहते हैं जो एक कथावाचक के मुँह से अजीब लगती है। वह सुख मन और कान ही जानते हैं, जीभ से उसका बखान नहीं हो सकता। और प्रभु की शोभा का सुख आँखें जानती हैं, पर वे कैसे कहें, उनके पास वाणी नहीं है। जो सारी कथा सुना रहा है, वह ठीक इसी जगह कह रहा है कि जो असल चीज़ थी वह कही नहीं जा सकती। कान ने सुना, आँख ने देखा, और जीभ के पास कुछ नहीं आया। यह हार नहीं है, यह ईमानदारी है, और यह उस जगह पर रखी गयी है जहाँ पन्ना अपने सबसे बड़े सिद्धान्त से उतरकर फिर आँगन में लौटता है।
बहु बिधि मोहि प्रबोधि सुख देई । लगे करन सिसु कौतुक तेई॥
चौपाई ८
सजल नयन कछु मुख करि रूखा। चितइ मातु लागी अति भूखा॥
बहुत प्रकार से समझाकर और सुख देकर, प्रभु फिर वही बालकों के खेल करने लगे। तेई, वही। जो अभी-अभी अगुण और गुणाकर ब्रह्म का लक्षण कह रहा था, जो निज सिद्धान्त सुना रहा था, जिसने काल से छूट दी थी, वह अब आँगन में वही खेल कर रहा है जो पहले कर रहा था। बीच में जो हुआ उसका कोई निशान नहीं। और फिर वह चित्र, जो इस पन्ने का सबसे कोमल चित्र है। आँखों में जल, मुँह कुछ रूखा, और माँ की ओर देखा। भूख लगी है। तुलसी यहाँ कोई वाक्य नहीं देते, बच्चा कुछ कहता नहीं, बस चितइ, देखा। और उस देखने में सब कह दिया गया।
इस दृश्य को पिछले दृश्य के साथ रखकर देखिये। कुछ ही पंक्तियाँ पहले एक कौआ धरती पर गिरा था, मुँह से बात नहीं निकल रही थी, और उसने पुकारा था आरत जन त्राता। अब वह त्राता स्वयं आँखों में पानी भरे हुए किसी की ओर देख रहा है, और उसके भी मुँह से बात नहीं निकल रही। दोनों दृश्यों में एक ही चीज़ है, आँख में पानी और चुप। पहले में रक्षक ने आकर सिर पर हाथ रखा था। दूसरे में जो आयेगा वह माँ है।
देखते ही माता आतुर होकर उठ दौड़ीं। कोमल वचन कहकर छाती से लगा लिया, गोद में रखकर दूध पिलाया। और फिर तुलसी की वह पंक्ति, जिसे पढ़कर एक क्षण रुकना पड़ता है, रघुपति चरित ललित कर गाना। गोद में जिसे दूध पिला रही हैं, उसी की ललित लीलाएँ गा रही हैं। माँ को मालूम है या नहीं कि जिसके गीत गा रही हैं वह गोद में है, तुलसी यह नहीं कहते। वे बस दोनों को एक ही पंक्ति में रख देते हैं, दूध और गीत, और गीत का विषय वही बच्चा। इन पंक्तियों में माता का नाम एक बार भी नहीं आता, वे केवल मातु हैं।
जेहि सुख लागि पुरारि असुभ बेष कृत सिव सुखद।
सोरठा ८८
अवधपुरी नर नारि तेहि सुख महुँ संतत मगन॥ ८८ (क)॥
सोई सुख लवलेस जिन्ह बारक सपनेहुँ लहेउ।
ते नहिं गनहिं खगेस ब्रह्मसुखहि सज्जन सुमति॥ ८८ (ख)॥
और तब भुशुण्डि कथा से एक कदम बाहर आकर गरुड़ को यह बताते हैं कि जो अभी देखा गया वह क्या था। जिस सुख के लिये पुरारि, सुख देनेवाले शिव ने अशुभ वेष धारण किया, उस सुख में अवधपुरी के नर-नारी सदा मग्न रहते हैं। शिव का अशुभ वेष यहाँ केवल एक पंक्ति में है, और यह पंक्ति एक तुलना के लिये है, कि जिस चीज़ के लिये शिव को रूप बदलना पड़ा, वह अवध की गली में हर किसी को मिल रही है। और दूसरा सोरठा उससे भी आगे जाता है। उस सुख का लवलेश भी जिसने एक बार सपने में भी पा लिया, वे सुबुद्धि सज्जन ब्रह्मसुख को कुछ नहीं गिनते। लवलेस, बारक, सपनेहुँ, तीन शब्द एक साथ रखे गये हैं ताकि नाप जितना छोटा हो सके उतना छोटा हो जाये, और उसके सामने ब्रह्मसुख रखा गया है, और वह हल्का निकलता है। यह वही बात है जो कुछ दोहे पहले नमक और पकवानों में कही गयी थी।
सार: भुशुण्डि कहते हैं कि वह सुख कान और मन जानते हैं, जीभ नहीं। राम समझाकर फिर वही बालखेल करने लगते हैं, आँखों में जल भरकर माता की ओर भूखी दृष्टि से देखते हैं, माता दौड़कर गोद में लेती हैं, दूध पिलाती हैं और उसी बच्चे की लीलाएँ गाती हैं। सोरठा कहता है कि जिस सुख के लिये शिव ने अशुभ वेष धरा, उसमें अवध के नर-नारी सदा मग्न हैं, और उसका लवलेश भी पा लेनेवाले ब्रह्मसुख को नहीं गिनते।
अपना अनुभव
कथा अब तेज़ी से सिमटती है। मैं कुछ काल और अवध में रहा, रसीली बाललीलाएँ देखीं, राम की कृपा से भक्ति का वर पाया, प्रभु के चरणों को प्रणाम करके अपने आश्रम आ गया। चार बातें, एक चौपाई। वह लम्बा प्रसंग, जिसमें पेट के भीतर ब्रह्माण्ड थे और आँगन में भूख, यहाँ आकर एक पंक्ति में बाँध दिया जाता है और कौआ अपने पहाड़ पर लौट जाता है। और फिर वह वाक्य जिसमें पूरी कथा का फल है, जब से रघुनायक ने अपनाया, तब से माया नहीं व्यापी। अपनाया। यह शब्द वरदान से अलग है। वरदान दिया जाता है, अपनाया जाना कुछ और है। यह सब गुप्त चरित मैंने गाया, भुशुण्डि कहते हैं, कि हरि की माया ने मुझे कैसे नचाया। गुप्त, क्योंकि यह उनका अपना है, किसी और ने देखा नहीं।
और अब स्वर बदलता है। निज अनुभव अब कहउँ खगेसा। अब मैं अपना अनुभव कहता हूँ। जो अब तक था वह घटा हुआ था, कथा थी। जो अब आता है वह उस कथा से निकाला हुआ है, और भुशुण्डि उसे अनुभव कहते हैं, सिद्धान्त नहीं। हरि के भजन बिना क्लेश नहीं जाते। और राम की कृपा बिना राम की प्रभुता जानी नहीं जाती। यह दूसरा वाक्य ठीक उस दृश्य से निकला है जो इस पन्ने की शुरुआत में था। प्रभुता देखी गयी थी, पर वह जानी तब गयी जब सिर पर हाथ आया।
जानें बिनु न होइ परतीती । बिनु परतीति होइ नहिं प्रीती॥
चौपाई ९
प्रीति बिना नहिं भगति दिढ़ाई । जिमि खगपति जल कै चिकनाई॥
और फिर एक ज़ंजीर, जिसकी हर कड़ी पिछली कड़ी में फँसी है। जाने बिना प्रतीति नहीं, यानी भरोसा नहीं। प्रतीति बिना प्रीति नहीं। प्रीति बिना भक्ति दृढ़ नहीं होती। इस क्रम को ध्यान से पढ़ना चाहिये, क्योंकि यह उलटा नहीं चलता। भरोसा पहले है, प्रेम बाद में, और भक्ति उसके बाद। और जो भक्ति बिना प्रीति की है, उसके लिये जो उपमा आती है वह पानी की सतह से ली गयी है, जिमि खगपति जल कै चिकनाई। जैसे जल की चिकनाई। पानी पर तेल की परत ठहरती नहीं। वह दिखती है, चमकती है, पर टिकती नहीं, थोड़ी हवा से बिखर जाती है। बिना प्रीति की भक्ति ठीक वही है। ऊपर से चिकनी और भीतर से पानी। यह उपमा किसी शास्त्र ने नहीं दी, यह किसी ने बरतन में देखी है।
सार: भुशुण्डि कुछ काल अवध में रहकर भक्ति का वर लेकर अपने आश्रम लौटते हैं और कहते हैं कि जब से राम ने अपनाया, माया नहीं व्यापी। फिर अपना अनुभव कहते हैं: भजन बिना क्लेश नहीं जाते, कृपा बिना प्रभुता नहीं जानी जाती, जाने बिना प्रतीति नहीं, प्रतीति बिना प्रीति नहीं, और प्रीति बिना भक्ति जल पर चिकनाई की तरह टिकती नहीं।
बिना, बिना, बिना
और अब वह हिस्सा जिससे यह प्रसंग अपने अन्त की ओर जाता है। यह हिस्सा प्रश्नों का है, और हर प्रश्न एक ही ढाँचे में है, इसके बिना क्या वह हो सकता है। तुलसी का शब्द है कि, जो यहाँ प्रश्न का चिह्न है। बिनु गुर होइ कि ग्यान। गुरु के बिना क्या ज्ञान हो सकता है। इन प्रश्नों के उत्तर नहीं दिये जाते, क्योंकि उत्तर पूछने में ही है।
बिनु गुर होइ कि ग्यान ग्यान कि होइ बिराग बिनु।
सोरठा ८९
गावहिं बेद पुरान सुख कि लहिअ हरि भगति बिनु॥ ८९ (क)॥
कोउ बिश्राम कि पाव तात सहज संतोष बिनु।
चलै कि जल बिनु नाव कोटि जतन पचि पचि मरिअ॥ ८९ (ख)॥
पहला सोरठा तीन प्रश्न पूछता है और तीनों को एक साथ पढ़ना चाहिये, क्योंकि उनका क्रम ही उनकी बात है। गुरु के बिना ज्ञान। वैराग्य के बिना ज्ञान। ध्यान दीजिये कि दोनों में ज्ञान ही वह चीज़ है जो नहीं हो सकती, पहली बार गुरु के बिना और दूसरी बार वैराग्य के बिना। ज्ञान के दो द्वार बताये गये हैं, एक बाहर का आदमी और एक भीतर का उचाट, और दोनों में से कोई एक न हो तो ज्ञान नहीं आता। फिर वेद-पुराण के हवाले से तीसरा, हरि की भक्ति के बिना सुख। और फिर दूसरा सोरठा, जिसमें सहज सन्तोष के बिना विश्राम पूछा जाता है, और उसका उत्तर एक नाव में दिया जाता है। जल के बिना क्या नाव चलती है, चाहे करोड़ों यत्न करके पच-पच मर जाइये। पचि पचि मरिअ। यह मुहावरा किसी विद्वान का नहीं है, यह उस आदमी का है जिसने किसी को सूखी नदी में नाव खींचते देखा है।
इसके बाद चार चौपाइयाँ हैं और उनमें प्रश्नों की बारिश है। सन्तोष के बिना काम नहीं मिटते, काम रहते सपने में भी सुख नहीं, राम भजन बिना काम क्या मिटेंगे, बिना धरती के क्या पेड़ जमता है। और फिर तीन चौपाइयों में एक ऐसा ढाँचा है जिसे देख लेने पर वह छूटता नहीं। विज्ञान के बिना समता, और साथ में, आकाश के बिना अवकाश। श्रद्धा के बिना धर्म, और साथ में, पृथ्वी के बिना गन्ध। तप के बिना तेज, और साथ में, जल के बिना रस। बुधजनों की सेवा के बिना शील, और साथ में, तेज के बिना रूप। निज सुख के बिना मन की स्थिरता, और साथ में, वायु के बिना स्पर्श।
पाँच जोड़े, और हर जोड़े का दूसरा हिस्सा एक तत्त्व है। आकाश, पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु। और हर तत्त्व के साथ उसका अपना गुण, अवकाश, गन्ध, रस, रूप, स्पर्श। यानी तुलसी ने साधना की पाँच बातों को पाँच महाभूतों के बगल में खड़ा कर दिया है, और कह दिया है कि जैसे बिना पृथ्वी गन्ध की कल्पना भी नहीं हो सकती, वैसे ही बिना श्रद्धा धर्म की। यह तर्क नहीं है, यह पदार्थ का स्वभाव है। जो चीज़ जिससे बनी है, उसके बिना वह हो ही नहीं सकती, और इसी तरह की असम्भवता वे साधना में दिखा रहे हैं।
निज सुख बिनु मन होइ कि थीरा । परस कि होइ बिहीन समीरा॥
चौपाई १०
कवनिउ सिद्धि कि बिनु बिस्वासा । बिनु हरि भजन न भव भय नासा॥
और अन्तिम चौपाई की अन्तिम पंक्ति में वह शब्द आता है जो अगले दोहे का बीज है, बिस्वासा। विश्वास के बिना क्या कोई सिद्धि हो सकती है। कोई भी सिद्धि, कवनिउ, यानी छोटी से छोटी भी। और फिर वही बात जो पहले भी दो बार आयी है, हरि भजन बिना भव-भय का नाश नहीं। यह चौपाई अपने पीछे के सारे प्रश्नों को एक शब्द पर ला देती है, और वह शब्द है विश्वास। और दोहा उसी शब्द से खुलता है।
बिनु बिस्वास भगति नहिं तेहि बिनु द्रवहिं न रामु।
दोहा ९० (क)
राम कृपा बिनु सपनेहुँ जीव न लह बिश्रामु॥ ९० (क)॥
बिना विश्वास भक्ति नहीं। और तेहि बिनु, उसके बिना, यानी भक्ति के बिना, राम द्रवित नहीं होते। द्रवहिं न रामु। पिघलते नहीं। यह क्रिया जान-बूझकर चुनी गयी है। राम प्रसन्न नहीं होते, राम कृपा नहीं करते, ऐसा नहीं कहा गया। कहा गया कि पिघलते नहीं। पिघलना वह है जो ठोस के साथ होता है जब आँच लगे, और यहाँ आँच भक्ति है। और तब दोहे की दूसरी पंक्ति चक्र को पूरा कर देती है, राम की कृपा बिना जीव सपने में भी विश्राम नहीं पाता। विश्राम, वही शब्द जो सोरठे में सहज सन्तोष के साथ आया था।
इस दोहे को भुशुण्डि के अपने अनुभव की उस ज़ंजीर के साथ रखिये जो कुछ ही चौपाइयाँ पहले थी। वहाँ कहा गया था कि कृपा से प्रभुता जानी जाती है, जानने से प्रतीति, प्रतीति से प्रीति, प्रीति से भक्ति। यहाँ कहा जा रहा है कि विश्वास से भक्ति, भक्ति से राम का पिघलना, और पिघलने से कृपा, और कृपा से विश्राम। दोनों ज़ंजीरों में कृपा है, और दोनों में भरोसा है, पर एक में कृपा पहली कड़ी है और दूसरी में आख़िरी। यह उलझन नहीं है। यह उस चक्र का चित्र है जिसमें कोई पहली कड़ी नहीं होती, और भुशुण्डि इसे इसीलिये अनुभव कहते हैं, सिद्धान्त नहीं, कि उन्होंने इसे दोनों ओर से देखा है। प्रसंग यहीं रुकता है। दोहे की दूसरी छमाही, ९० (ख), अगले प्रसंग की पहली पंक्ति है, और उसे वहीं पढ़ा जायेगा।
सार: सोरठा ८९ पूछता है कि गुरु के बिना ज्ञान, वैराग्य के बिना ज्ञान, हरि-भक्ति के बिना सुख, सहज सन्तोष के बिना विश्राम, और जल के बिना नाव कैसे हो। चार चौपाइयों में साधना की बातें पाँच तत्त्वों और उनके गुणों के बगल में रखी जाती हैं। और दोहा ९० (क) कहता है कि बिना विश्वास भक्ति नहीं, बिना भक्ति राम पिघलते नहीं, और बिना राम-कृपा जीव को सपने में भी विश्राम नहीं।
और अन्त में, अपनी ओर
इस पन्ने पर एक चीज़ माँगी गयी और एक चीज़ बिना माँगे दी गयी, और दोनों को साथ रखकर देखना चाहिये। माँगी गयी भक्ति, और उसके लिये माँगनेवाले को सूची में से एक कमी पकड़नी पड़ी। बिना माँगे दिया गया निज सिद्धान्त, और वह सिद्धान्त ठीक उसी कमी का उत्तर था, कि सेवक से प्रिय कोई नहीं। यानी कौए ने जो माँगा, राम ने उसे देने के साथ यह भी बता दिया कि वह क्यों ठीक माँगा गया था। वरदान और उसका कारण, दोनों एक ही बैठक में मिले।
दूसरी बात उस सीढ़ी की है, जो बनायी गयी और फिर पलटी गयी। तुलसी सीढ़ी बनाने में दो चौपाइयाँ लगाते हैं और उसे पलटने में एक। अगर सीढ़ी बनानी ही नहीं थी, तो बनायी क्यों गयी। शायद इसीलिये कि सुननेवाले को पहले वह क्रम दिखे जिस पर उसे भरोसा है, द्विज, ज्ञानी, विज्ञानी, और तब उसे बताया जाये कि यह क्रम ठीक है, बस यह अन्तिम क्रम नहीं है। जो ऊपर है वह किसी डण्डे पर नहीं है। वह वह है जिसके पास और कोई डण्डा नहीं है।
और तीसरी बात उस खेल की है। यह पन्ना उत्तरकाण्ड के सबसे ऊँचे सिद्धान्तों में से एक कहता है, और उसे कहने के तुरन्त बाद कहनेवाला आँखों में पानी भरकर माँ की ओर देखता है और भूख की शिकायत करता है। तुलसी इन दोनों के बीच कोई सीढ़ी नहीं लगाते, कोई सफ़ाई नहीं देते। वे बस तेई लिखते हैं, वही खेल। और शायद यही इस पूरे प्रसंग का सबसे बड़ा सिद्धान्त है, जो कहा नहीं गया, दिखाया गया। जिसने अभी अगुण ब्रह्म का लक्षण कहा वह गोद में दूध पी रहा है, और माँ उसी की लीलाएँ गा रही है, और अवध के नर-नारी उसी सुख में मग्न हैं जिसके लिये शिव को रूप बदलना पड़ा था।
उत्तरकाण्ड के इस प्रसंग को पढ़कर जो एक शब्द सबसे देर तक साथ रहता है, वह द्रवहिं है। पिघलना। सिद्धियों की सूची, ब्रह्म का लक्षण, सेवक की महिमा, पिता और बेटे, पाँच तत्त्व, सब कहा गया, और अन्त में जो बचा वह इतना ही है कि एक चीज़ है जो पिघलती है और एक चीज़ है जिससे वह पिघलती है। कौए ने शुरू में जो माँगा था, वह ठीक वही आँच थी।
और अगली बात, जो इस पन्ने पर नहीं है और जिसका द्वार यहाँ खुला छोड़ दिया गया है। दोहा ९० की दूसरी छमाही अगले प्रसंग में है, और वहाँ से राम की महिमा की वह नाप शुरू होती है जो नापी नहीं जा सकती। पर वह वहाँ की बात है। यहाँ बात इतनी है कि एक बच्चे ने एक कौए के सिर पर हाथ रखा, और उस हाथ से जो निकला, वह एक पूरे काण्ड का सिद्धान्त था।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, उत्तरकाण्ड, दोहा ८३ से ९०, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।