रामचरितमानस · उत्तरकाण्ड · वानरों की विदा और राम-राज्य का आरम्भ
वानरों की विदा और राम-राज्य का आरम्भ
जिस सभा में श्रीराम अपने साथियों से कहते हैं कि अब घर जाइये, उसी सभा में एक आदमी बैठा रह जाता है और हिलता तक नहीं, और उत्तरकाण्ड का सबसे भीगा हुआ हिस्सा वहीं से खुलता है।
यह पन्ना एक ऐसे वाक्य से खुलता है जिसका कर्ता यहाँ है ही नहीं। पहली पंक्ति उन लोगों के बारे में है जिन्हें अपने घर की इस तरह सुध नहीं रही कि सपने में भी उसकी याद नहीं आती, और वे लोग कौन हैं यह इस प्रसंग में कहीं नहीं लिखा; वे पिछले प्रसंग में खड़े हैं। ठीक उसके बाद वाली पंक्ति में श्रीरघुनाथ उन्हीं को बुला भेजते हैं, और पाँच पंक्तियाँ आगे बढ़कर दोहा सोलह में उनसे कहते हैं कि अब घर जाइये। जिन्हें याद ही नहीं रहा कि घर नाम की कोई चीज़ उनकी भी है, उन्हें घर भेजा जा रहा है। इस प्रसंग की सारी तकलीफ़ इसी थोड़ी-सी दूरी में रखी हुई है।
आगे जो होता है वह एक समारोह जैसा है और बीच में टूट जाता है। गहने और कपड़े मँगाये जाते हैं, भरत अपने हाथ से सुग्रीव को पहनाते हैं, लक्ष्मण लंकापति को पहनाते हैं, और जाम्बवान् तथा नील आदि को स्वयं रघुनाथ पहनाते हैं। सब लोग सिर नवाकर चल देते हैं। एक आदमी अपनी जगह से हिलता भी नहीं, और प्रभु उसे बुलाते तक नहीं। फिर जब सभा खाली हो जाती है तब वह उठता है, और चार चौपाइयाँ तक बोलता चला जाता है। इस पूरे प्रसंग में इतनी देर तक लगातार विनती करता हुआ और कोई नहीं मिलता।
पन्ने का आख़िरी हिस्सा अचानक चौड़ा हो जाता है। हनुमान अपने राजा से कुछ दिन माँगकर रुक जाते हैं, एक निषाद को बुलाकर भेजा जाता है, और फिर तीन ही पंक्तियों में तीनों लोक हर्षित हो जाते हैं और राम-राज्य शुरू हो जाता है। यह तुलसीदास का रामचरितमानस है, और इसमें राज्य का आरम्भ किसी विजय-घोषणा से नहीं, इस बात से दर्ज होता है कि अब कोई किसी से वैर नहीं करता।
इस प्रसंग के मुख्य किरदार
- श्रीराम जो इस पन्ने पर पहले अपने साथियों को अपने भाइयों और अपनी सम्पत्ति से बढ़कर बताते हैं, और फिर उन सबको घर भेज देते हैं।
- अंगद बालि के पुत्र, जो गहने पहनने की पंक्ति में उठते ही नहीं और बाद में अकेले खड़े होकर यह कहते हैं कि अब घर जाने को मत कहिये।
- सुग्रीव जिन्हें सबसे पहले वस्त्राभूषण पहनाये जाते हैं, और जो थोड़ी देर बाद हनुमान को रुक जाने की अनुमति देते हैं।
- हनुमान जो इस प्रसंग के अकेले आदमी हैं जिनकी रुकने की विनती मान ली जाती है, और जो अंगद का सन्देश लेकर लौटते हैं।
- लंकापति जिन्हें इस पन्ने पर तुलसी नाम से नहीं पुकारते, केवल पद से; लक्ष्मण उन्हें भूषण-वस्त्र पहनाते हैं और यह रघुनाथ के मन को भाता है।
- भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न जो पहनाने का काम करते हैं और फिर वानरों को बड़े आदर के साथ पहुँचाने जाते हैं।
- जाम्बवान् और नील जिन्हें रघुनाथ अपने हाथ से पहनाते हैं, और जो श्रीराम का रूप हृदय में रखकर चरणों में माथा नवाकर चलते हैं।
- निषाद जिसे सबके बाद बुलाया जाता है, और अकेले जिसे श्रीराम अपना सखा और भरत के समान भाई कहते हैं।
- खगेश जिन्हें दोहा उन्नीस का तीसरा हिस्सा सम्बोधित करता है; टीका उस सुनने वाले को गरुड़ और कहने वाले को काकभुशुण्डि बताती है।
जिन्हें अपने घर की सुध नहीं रही
पहली पंक्ति एक उपमा है, और उपमा का चुनाव ही सब कुछ बता देता है। तुलसी यह नहीं कहते कि वे लोग घर इस तरह भूले जैसे कोई खेल में डूबा बच्चा भूल जाता है। वे कहते हैं कि उन्हें घर की सुध वैसी नहीं आती जैसी संतों के मन में दूसरे का बुरा चाहने की बात नहीं आती। यानी यह भूलना कोई चूक नहीं है, किसी चीज़ का न होना है। संत को द्रोह याद नहीं रहता, ऐसा नहीं; उसके भीतर उसके लिये जगह ही नहीं बची। और यह बड़ी प्रशंसा श्रीराम के मुँह खोलने से पहले ही कह दी जाती है।
बिसरे गृह सपनेहुँ सुधि नाहीं । जिमि परद्रोह संत मन माहीं॥
चौपाई १
तब रघुपति सब सखा बोलाए । आइ सबन्हि सादर सिरु नाए॥
दूसरी पंक्ति में केवल एक शब्द बदलता है और दृश्य बदल जाता है: तब। तब रघुनाथ ने सब सखाओं को बुलाया। बुलावा किसलिये है, यह न बुलाने वाला बताता है न आने वाले पूछते हैं। वे आते हैं और आदर के साथ सिर नवा देते हैं। इस पूरे प्रसंग में यही एक जगह है जहाँ वानरों की ओर से कोई प्रश्न बन सकता था, और तुलसी उसे बनने ही नहीं देते।
बुलाने वाला शब्द भी देख लेने लायक़ है। यहाँ वे सेवक नहीं बुलाये जाते, सखा बुलाये जाते हैं। यह शब्द इस पन्ने पर तीन बार गिरता है: यहाँ, फिर उस दोहे में जहाँ उन्हें घर भेजा जाता है, और फिर सबसे अन्त में एक ऐसे आदमी के लिये जिसका नाम तक नहीं लिखा जाता। तीसरी बार वह शब्द वही रहकर भी वही नहीं रहता।
सार: प्रसंग उन साथियों की प्रशंसा से खुलता है जिन्हें अपने घर की सुध नहीं रही, और उपमा संतों के निर्द्रोह मन की है। उसके तुरन्त बाद रघुनाथ उन सबको बुलाते हैं और वे आकर सिर नवाते हैं।
मुँह पर बड़ाई किस तरह करें
श्रीराम उन्हें बड़े प्रेम से अपने पास बैठाते हैं और कोमल वचन बोलते हैं, और पहला ही वाक्य उस अड़चन के बारे में है जो वे अभी करने जा रहे हैं। आपने मेरी बड़ी सेवकाई की, अब मुँह पर आपकी बड़ाई किस तरह करूँ। यह वाक्य प्रशंसा नहीं है, प्रशंसा की मर्यादा पर टिप्पणी है। कहकर वे ठीक वही काम अगली तीन पंक्तियों तक करते चले जाते हैं।
अड़चन को पहले नाम दे देने का एक ही असर होता है। इसके बाद जो कहा जायगा वह शिष्टाचार नहीं समझा जायगा, क्योंकि कहने वाले ने ख़ुद बता दिया है कि शिष्टाचार यहाँ रुकने को कह रहा था और वे नहीं रुके।
ताते मोहि तुम्ह अति प्रिय लागे। मम हित लागि भवन सुख त्यागे॥
चौपाई २
अनुज राज संपति बैदेही । देह गेह परिवार सनेही॥
अब पंक्ति का क्रम देखिये। ताते, यानी इसलिये, वाक्य के शुरू में है और कारण उसके बाद आता है। पहले फ़ैसला, फिर सबूत। और सबूत उनके अपने मन की कोई बात नहीं है, वह इन लोगों का किया हुआ काम है: मेरे हित के लिये इन्होंने घर और सुख छोड़ दिये। प्रेम का प्रमाण यहाँ भावना नहीं, छोड़ी हुई चीज़ों की सूची है।
और सूची तुरन्त शुरू हो जाती है, आठ नामों की: छोटा भाई, राज्य, सम्पत्ति, बैदेही, देह, घर, परिवार, स्नेही। चौपाई यहीं ख़त्म हो जाती है और वाक्य अधूरा छूट जाता है। जो वाक्य इन आठ को गिनकर अटक गया है, वह अगली चौपाई की पहली ही पंक्ति में पूरा होता है, और पूरा होते ही बहुत बड़ा हो जाता है।
सब मम प्रिय नहिं तुम्हहि समाना । मृषा न कहउँ मोर यह बाना॥
चौपाई ३
सब कें प्रिय सेवक यह नीती। मोरें अधिक दास पर प्रीती॥
ये सब मुझे प्रिय हैं, पर आपके समान नहीं। यह वाक्य इतना बड़ा है कि बोलने वाले को उसी साँस में उसकी ज़मानत देनी पड़ती है: मैं झूठ नहीं कहता, यह मेरा बाना है। बाना उस टेक को कहते हैं जिसके सहारे आदमी पहचाना जाता है। बड़ाई मुँह पर करने की झिझक जिस वाक्य से शुरू हुई थी, वह वहाँ पहुँच गया है जहाँ अपनी टेक की क़सम खानी पड़ रही है।
आख़िरी दो पंक्तियाँ दो चीज़ों को अलग करती हैं। सेवक सबको प्रिय लगते हैं, यह नीति है, यानी दुनिया का चलन। और इसके बाद: मेरा दास पर प्रेम उससे अधिक है। नीति सबकी एक-सी है; अधिकता अपनी है। श्रीराम यह नहीं कहते कि इन वानरों ने ऐसा कुछ किया है जिससे यह अधिकता बनती है। वे उसे अपने स्वभाव के खाते में डाल देते हैं।
सार: श्रीराम साथियों को पास बैठाकर कहते हैं कि उन्होंने उनके हित के लिये घर और सुख त्यागे, इसलिये वे अत्यन्त प्रिय हैं। भाई, राज्य, सम्पत्ति, बैदेही, देह, घर, परिवार और स्नेही, ये सब प्रिय तो हैं पर इनके समान नहीं, और दास पर उनका प्रेम नीति से अधिक है।
अब घर जाइये
इतनी बड़ी बात कहने के बाद जो दोहा आता है, वह उसी साँस में उन्हें भेज देता है। दोहा सोलह इस प्रसंग का पहला दोहा है और इसी में वह वाक्य है जिससे आगे का सारा झगड़ा पैदा होता है।
अब गृह जाहु सखा सब भजेहु मोहि दृढ़ नेम।
दोहा १६
सदा सर्बगत सर्बहित जानि करेहु अति प्रेम॥ १६॥
दोहे में तीन आदेश हैं और जाने वाला उनमें से केवल पहला है। जाइये, भजिये, प्रेम कीजिये। पहले आदेश को आधी पंक्ति मिली है और बाक़ी डेढ़ पंक्ति उसके बाद क्या करना है इस पर ख़र्च होती है। यानी विदाई इस दोहे का विषय नहीं है, विदाई के बाद का बरताव उसका विषय है।
दूसरी पंक्ति वह कारण देती है जिसके बल पर किसी को अपने पास से हटाया जा सकता है: सदा सर्वगत और सर्वहित जानकर अत्यन्त प्रेम कीजिये। जो सब जगह है, उससे दूर जाना सम्भव ही नहीं; जो सबका हित करता है, उसके भेजने में अहित नहीं हो सकता। जिस आपत्ति के लिये अंगद चार चौपाइयाँ लगाने वाले हैं, उसका उत्तर वह आपत्ति उठने से पहले ही यहाँ रखा जा चुका है। तुलसी सवाल से पहले जवाब रख देते हैं और फिर सवाल पूछने देते हैं।
और शब्द पर ग़ौर कीजिये। पाँच पंक्ति पहले गृह वह चीज़ थी जिसकी इन लोगों को सपने में भी सुध नहीं आती थी। अब वही गृह वह जगह है जहाँ जाने का आदेश है। इस पन्ने पर यह शब्द कुल पाँच बार आता है, और हर बार किसी न किसी का पक्ष बदलकर आता है।
सार: दोहा सोलह में श्रीराम सबको घर जाने, दृढ़ नियम से भजने और उन्हें सर्वव्यापक तथा सबका हित करने वाला जानकर अत्यन्त प्रेम करने को कहते हैं। विदाई के साथ ही उसका उत्तर भी उसी दोहे में रख दिया जाता है।
उत्तर में एक भी शब्द नहीं
इतनी बात का जो उत्तर आता है, वह चुप्पी है। प्रभु के वचन सुनते ही सब प्रेम में मग्न हो गये; को हम कहाँ, हम कौन हैं और कहाँ हैं, यह देह की सुध तक जाती रही। वे हाथ जोड़े एकटक सामने खड़े रह गये और अत्यन्त अनुराग के कारण कुछ कह नहीं सके। जिस सभा में अभी-अभी यह कहा गया है कि आप मुझे मेरे राज्य और मेरे भाई से बढ़कर प्रिय हैं, उसी सभा में उत्तर में एक शब्द भी नहीं निकलता।
यह चुप्पी बिना कारण नहीं रखी गयी। शुरू में उपमा यह थी कि इन्हें घर की सुध नहीं; अब देह की सुध भी नहीं रही। भूलने का दायरा पाँच पंक्तियों में घर से बढ़कर शरीर तक आ गया है, और यह ठीक उसी क्षण होता है जब उस शरीर को उठाकर घर ले जाने का आदेश मिल चुका है।
इसके बाद प्रभु उनका परम प्रेम देखकर उन्हें अनेक प्रकार से विशेष ज्ञान का उपदेश देते हैं। उस उपदेश का एक शब्द भी तुलसी नहीं लिखते। यह उन्हीं तुलसी का पन्ना है जो थोड़ी देर बाद एक वानर की मिन्नत को चार चौपाइयाँ पूरी देने वाले हैं। जगह उन्होंने ज्ञान को नहीं दी, न मानने वाले को दी। और चौपाई का अन्त इस पर होता है कि वे प्रभु के सामने कुछ कह नहीं पाते और बार-बार चरणकमलों को देखते हैं। जो काम अंगद आगे चलकर माँगने वाले हैं, आँखें वह काम यहाँ पहले से कर रही हैं।
सार: साथी उत्तर में कुछ कह नहीं पाते, देह की सुध तक भूल जाते हैं, और हाथ जोड़े खड़े रहते हैं। प्रभु उन्हें बहुत प्रकार से ज्ञान का उपदेश देते हैं, जिसका एक शब्द भी पाठ में दर्ज नहीं है।
गहने, कपड़े, और एक आदमी जो हिला नहीं
अब प्रसंग एक समारोह में बदल जाता है। प्रभु अनेक रंगों के अनुपम और सुन्दर भूषण-वस्त्र मँगवाते हैं। यह विदाई का व्यवहार है और तुलसी इसे क़ायदे से, एक-एक करके, नाम लेकर दर्ज करते हैं।
तब प्रभु भूषन बसन मगाए । नाना रंग अनूप सुहाए॥
चौपाई ४
सुग्रीवहि प्रथमहिं पहिराए। बसन भरत निज हाथ बनाए॥
पहले सुग्रीव को पहनाया जाता है, और पहनाने वाले भरत हैं, अपने हाथ से सँवारकर। यह छोटी-सी बात बहुत कुछ तय कर देती है। कपड़े किसी सेवक के हाथ नहीं भेजे जाते; जो पहनाता है वह श्रीराम का भाई है, और जिसे पहनाया जा रहा है वह वानरों का राजा है। समारोह की पहली जोड़ी ही बराबरी की जोड़ी है।
प्रभु प्रेरित लछिमन पहिराए। लंकापति रघुपति मन भाए॥
चौपाई ५
अंगद बैठ रहा नहिं डोला। प्रीति देखि प्रभु ताहि न बोला॥
दूसरी बारी लक्ष्मण की है, और वे प्रभु की प्रेरणा से पहनाते हैं। जिन्हें पहनाया जा रहा है उन्हें यह पंक्ति नाम से नहीं बुलाती, केवल लंकापति कहती है। इस पूरे पन्ने पर उनका नाम एक बार भी नहीं आता; जो आता है वह उस नगरी का पद है जो अब उनके पास है। और पंक्ति का दूसरा आधा यह जोड़ देता है कि यह रघुनाथ के मन को भाया। तीनों पहनावों में केवल इसी पर प्रभु के मन की प्रतिक्रिया लिखी गयी है।
फिर वाक्य के बीच में समारोह टूट जाता है। अंगद बैठे रह गये, हिले तक नहीं। यह किसी झगड़े की तरह नहीं लिखा गया, केवल एक देखी हुई बात की तरह लिखा गया है। और उसके तुरन्त बाद दूसरा आधा आता है, जो अंगद के बारे में नहीं, प्रभु के बारे में है: उनकी प्रीति देखकर प्रभु ने उन्हें बुलाया ही नहीं।
यहाँ तुलसी वह लिखते हैं जो नहीं हुआ। न कोई डाँट है, न बुलावा, न यह कि उठो और अपनी बारी लो। जो आदमी पंक्ति में नहीं आया, उसे पंक्ति में लाया नहीं जाता। समारोह उसके बिना पूरा होता है, और यही चुप्पी आगे का सारा हिस्सा खोलती है।
सार: भूषण-वस्त्र मँगाये जाते हैं। भरत अपने हाथ से सुग्रीव को पहनाते हैं, लक्ष्मण प्रभु की प्रेरणा से लंकापति को पहनाते हैं और यह रघुनाथ के मन को भाता है। अंगद अपनी जगह से हिलते तक नहीं, और उनकी प्रीति देखकर प्रभु उन्हें बुलाते नहीं।
बालि की गोद
समारोह उसके बाद भी चलता रहता है। जाम्बवान् और नील आदि सबको स्वयं रघुनाथ भूषण-वस्त्र पहनाते हैं, और वे सब श्रीराम का रूप हृदय में धरकर चरणों में माथा नवाकर चल देते हैं। तीन पहनाने वाले हुए: भरत, लक्ष्मण, और अन्त में स्वयं रघुनाथ। सीढ़ी ऊपर की ओर चढ़ती है। और जो आदमी अपनी जगह पर बैठा रह गया, उसे इन तीनों में से किसी के हाथ से कुछ नहीं मिलता।
वह तब उठता है जब सभा ख़ाली हो चुकी है। दोहा सत्रह का दूसरा हिस्सा उसके उठने का ब्योरा है, और ब्योरे में चार चीज़ें एक साथ हैं: सिर नवाया, आँखों में पानी भर आया, हाथ जोड़ लिये, और वचन ऐसे निकले मानो प्रेम के रस में डुबोकर निकाले गये हों।
तब अंगद उठि नाइ सिरु सजल नयन कर जोरि।
दोहा १७ (ख)
अति बिनीत बोलेउ बचन मनहुँ प्रेम रस बोरि॥ १७ (ख)॥
बोलने से पहले वे चार सम्बोधन लगाते हैं, और हर सम्बोधन एक दावा है। सर्वज्ञ, यानी आपको बताना नहीं पड़ेगा। कृपा और सुख के समुद्र, यानी माँगने की जगह ठीक है। दीनों पर दया करने वाले, यानी मैं दीन हूँ और श्रेणी यही है। आर्तों के बन्धु, यानी दुखी होना ही मेरा परिचय-पत्र है। चारों में एक बार भी अपनी सेवा, अपने कुल या अपने युद्ध का नाम नहीं आता।
सुनु सर्बग्य कृपा सुख सिंधो। दीन दयाकर आरत बंधो॥
चौपाई ६
मरती बेर नाथ मोहि बाली। गयउ तुम्हारेहि कोंछें घाली॥
और फिर पहला तर्क, जो अपने बारे में है ही नहीं। मरते समय बालि मुझे आपकी ही कोंछें में डाल गये थे। कोंछ आँचल की उस गोद को कहते हैं जिसमें कोई चीज़ थमा दी जाती है। अंगद यह नहीं कहते कि मुझे रख लीजिये क्योंकि मैंने कुछ किया है। वे कहते हैं कि मुझे यहाँ रखा गया था। दावा उनकी अपनी पात्रता पर नहीं, एक मरते हुए आदमी को दिये गये भरोसे पर है, और उस आदमी की तरफ़ से अब कोई बोलने वाला नहीं बचा।
सार: रघुनाथ स्वयं जाम्बवान् और नील आदि को पहनाते हैं और वे सब माथा नवाकर चल देते हैं। सभा ख़ाली होने पर अंगद उठते हैं, आँखों में जल भरकर हाथ जोड़ते हैं, और अपनी पहली दलील यह रखते हैं कि मरते समय बालि उन्हें श्रीराम की गोद में डाल गये थे।
जाऊँ कहाँ
असरन सरन बिरदु संभारी । मोहि जनि तजहु भगत हितकारी॥
चौपाई ७
मोरें तुम्ह प्रभु गुर पितु माता। जाउँ कहाँ तजि पद जलजाता॥
दूसरा तर्क पहले से भी कम अपने बारे में है। अशरण के शरण होने का बिरदु सँभालकर मुझे मत छोड़िये। बिरद वह नाम है जो आदमी के आगे-आगे चलता है और जिसे निभाना पड़ता है। अंगद श्रीराम से अपनी याद नहीं माँग रहे, उनकी अपनी टेक की याद दिला रहे हैं। फिर वे चार रिश्ते एक साथ जोड़ते हैं: आप ही मेरे स्वामी, गुरु, पिता और माता हैं। और इसके बाद जो प्रश्न आता है वह मुड़ा हुआ है: आपके चरणकमल छोड़कर जाऊँ कहाँ। सवाल यह नहीं कि जाऊँ या न जाऊँ; सवाल यह है कि कोई जगह बची कहाँ है।
तुम्हहि बिचारि कहहु नरनाहा । प्रभु तजि भवन काज मम काहा॥
चौपाई ८
बालक ग्यान बुद्धि बल हीना। राखहु सरन नाथ जन दीना॥
तीसरे तर्क में वे न्याय करने का काम उसी के हाथ में दे देते हैं जिसने आदेश दिया है। हे नरनाह, आप ही विचार कर कहिये। और विचार का विषय यह है: प्रभु को छोड़कर घर में मेरा काम क्या है। यहाँ घर जगह नहीं रह जाता, प्रयोजन बन जाता है, और प्रयोजन ख़ाली निकलता है। आदेश पर उँगली नहीं रखी जा रही; आदेश को एक ऐसे सवाल में बदल दिया गया है जिसका उत्तर देने वाला वही है जिसने आदेश दिया।
और दूसरी पंक्ति में दलील गिर जाती है। बालक हूँ, ज्ञान से हीन, बुद्धि से हीन, बल से हीन, दीन जन हूँ, शरण में रखिये। जिन तीन चीज़ों के बल पर कोई सभा में अपनी बात मनवाता है, उन तीनों को वे यहाँ छोड़ देते हैं। इसके बाद उनके पास केवल एक ही चीज़ बची है, और वह माँगना है।
नीचि टहल गृह कै सब करिहउँ । पद पंकज बिलोकि भव तरिहउँ॥
चौपाई ९
अस कहि चरन परेउ प्रभु पाही । अब जनि नाथ कहहु गृह जाही॥
चौथा तर्क सबसे नीचे उतरकर बोलता है। घर की सारी नीची-से-नीची सेवा मैं कर लूँगा, और चरणकमलों को देख-देखकर भवसागर तर जाऊँगा। गृह शब्द अब उनके मुँह में है, और वे उसे वहीं रख देते हैं जहाँ वे रहना चाहते हैं। जिस घर जाने को कहा गया था, वह उनका था। जिस घर की टहल वे माँग रहे हैं, वह यह है।
फिर वे चरणों में गिर पड़ते हैं और आख़िरी पंक्ति बोलते हैं, जो इस पूरे पन्ने की सबसे कसी हुई पंक्ति है: हे नाथ, अब यह मत कहिये कि घर जाओ। दोहा सोलह में वाक्य था कि अब घर जाइये। वही तीन शब्द लौटकर आते हैं, उसी क्रम में, और उनके आगे एक निषेध लग जाता है। अंगद आदेश से बहस नहीं करते। वे कहते हैं कि वह कहा ही न जाय।
सार: अंगद अशरण-शरण के बिरद की याद दिलाते हैं, श्रीराम को अपना स्वामी, गुरु, पिता और माता कहते हैं, ज्ञान, बुद्धि और बल तीनों से हीन बालक बताकर शरण माँगते हैं, घर की नीची-से-नीची सेवा करने को तैयार होते हैं, और अन्त में विनती करते हैं कि अब घर जाने को न कहा जाय।
करुणा की सीमा
उत्तर में जो होता है, वह पहले शरीर से होता है और बाद में शब्दों से।
अंगद बचन बिनीत सुनि रघुपति करुना सींव।
दोहा १८ (क)
प्रभु उठाइ उर लायउ सजल नयन राजीव॥ १८ (क)॥
दोहा यह नहीं कहता कि श्रीराम को दया आ गयी। वह उन्हें करुणा की सींव कहता है, यानी वह हद जहाँ तक करुणा जा सकती है, और उसके बाद केवल क्रियाएँ गिनाता है: उठाया, हृदय से लगाया, और कमल जैसे नेत्रों में जल भर आया। जो आदमी चरणों में पड़ा था वह छाती तक उठा लिया जाता है, और उतनी दूरी ही पूरा जवाब है।
इस आधे दोहे को अगर किसी और कविता से निकालकर पढ़ा जाय तो लगेगा कि विनती मान ली गयी। तुलसी उसे यहीं तोड़ देते हैं और दूसरा आधा शुरू करते हैं।
निज उर माल बसन मनि बालितनय पहिराइ।
दोहा १८ (ख)
बिदा कीन्हि भगवान तब बहु प्रकार समुझाइ॥ १८ (ख)॥
अपने हृदय की माला, वस्त्र और मणि, बालि के पुत्र को पहनाकर, और बहुत प्रकार से समझाकर, भगवान् ने उनकी विदाई की। जो आदमी पहनाने की पंक्ति में उठा ही नहीं था, उसे वे चीज़ें मिलती हैं जो मँगायी नहीं गयीं, जो देने वाले के अपने वक्ष पर थीं। समारोह में उसका हिस्सा सबसे बाद में और सबसे पास से आता है।
और उसी पंक्ति में विनती अस्वीकार हो जाती है। पाठ कहीं यह नहीं लिखता कि अंगद को रोक लिया गया। बिदा शब्द इस पूरे पन्ने पर एक ही बार आता है, ठीक यहाँ, उसी आदमी के लिये जो अकेला विदा नहीं लेना चाहता था। आँसू और निर्णय एक ही दोहे के दो हिस्सों में रख दिये गये हैं, और एक ने दूसरे को नहीं बदला।
सार: श्रीराम अंगद को उठाकर हृदय से लगा लेते हैं और उनके नेत्रों में जल भर आता है। फिर वे अपने हृदय की माला, वस्त्र और मणि उन्हें पहनाकर, बहुत प्रकार से समझाकर, उनकी विदाई कर देते हैं। विनती मानी नहीं जाती।
फिर फिर देखना
भरत छोटे भाई शत्रुघ्न और लक्ष्मण के साथ उन्हें पहुँचाने चलते हैं, और तुलसी कारण भी लिख देते हैं: भक्त की करनी याद करके। वानरों को विदा करना यहाँ शिष्टाचार नहीं है, हिसाब है, और हिसाब चुकाने राजा के भाई जाते हैं।
अंगद के हृदय में प्रेम को तुलसी सीधे नहीं नापते। वे कहते हैं कि थोड़ा नहीं है। यह उलटी नाप उन्हीं की है, और आगे की पंक्ति उसे चलता हुआ दिखा देती है: वे फिर-फिरकर श्रीराम की ओर देखते हैं और बार-बार दण्डवत् करते हैं। चलना और मुड़ना साथ-साथ चल रहे हैं।
बार बार कर दंड प्रनामा। मन अस रहन कहहिं मोहि रामा॥
चौपाई १०
राम बिलोकनि बोलनि चलनी। सुमिरि सुमिरि सोचत हँसि मिलनी॥
दूसरी पंक्ति का आधा हिस्सा उनके मन के भीतर से लिखा गया है: मन में ऐसा आता है कि श्रीराम मुझे रहने को कह दें। यह आशा किसी से कही नहीं जाती। अंगद अब माँग नहीं रहे, प्रतीक्षा कर रहे हैं, और जिस वाक्य की प्रतीक्षा है वह पीछे से कभी नहीं आता।
और जो उन्हें याद आ रहा है, उसकी सूची देखिये। श्रीराम का देखना, बोलना, चलना, और हँसकर मिलना। इनमें एक भी बात बड़ी नहीं है। न धनुष, न युद्ध, न राज्याभिषेक। जिसने अभी-अभी प्रभु के हृदय की माला पहनी है, उसे याद उनकी चाल और उनकी हँसी आ रही है। तुलसी विरह को इसी नाप पर तौलते हैं: बड़ी चीज़ों की कमी सही जाती है, रोज़ की छोटी आदतों की कमी नहीं सही जाती।
अन्त इसी में होता है कि वे प्रभु का रुख देखकर, बहुत विनय के वचन कहकर, और चरणकमलों को हृदय में रखकर चल देते हैं। रुख यानी चेहरे का रुझान। मना कहीं किया नहीं गया; अंगद उसे पढ़ लेते हैं और चल पड़ते हैं। इसके बाद सब वानर बड़े आदर के साथ पहुँचा दिये जाते हैं और भरत भाइयों सहित लौट आते हैं।
सार: भरत, शत्रुघ्न और लक्ष्मण वानरों को पहुँचाने जाते हैं। अंगद बार-बार मुड़कर देखते हैं और मन में चाहते हैं कि श्रीराम उन्हें रुकने को कह दें, पर वह वचन नहीं आता; वे प्रभु का रुख देखकर विनयवचन कहकर चल देते हैं।
जिसने अपने राजा से माँगा
इसके तुरन्त बाद पन्ना एक और विनती दिखाता है, और वह ठीक उलटी दिशा से की जाती है। हनुमान सुग्रीव के चरण पकड़ लेते हैं और अनेक प्रकार से विनती करते हैं: कुछ दिन रघुनाथ के चरणों की सेवा करके फिर आकर आपके चरणों के दर्शन करूँगा। पाठ कहता है दस दिन, और टीका उसे कुछ दिन के अर्थ में खोलती है।
माँगने की जगह पर ध्यान दीजिये। हनुमान श्रीराम से नहीं माँगते। वे अपने राजा से माँगते हैं, और चरण पकड़कर माँगते हैं। जिस अनुमति की ज़रूरत है वह वहीं से आनी है जहाँ से आदमी बँधा हुआ है, और वे उसी दरवाज़े पर जाते हैं।
उत्तर में सुग्रीव अनुमति भर नहीं देते, आशीर्वाद देते हैं। आप पुण्य की राशि हैं, हे पवनकुमार; जाकर कृपा के घर की सेवा कीजिये। वह जाना जिसे रोका जा सकता था, भेजा हुआ जाना बन जाता है। इतना कहते ही सब वानर तुरन्त चल पड़ते हैं।
दो लोग थोड़ी-सी पंक्तियों के भीतर एक ही चीज़ माँगते हैं: श्रीराम के पास रह जाना। एक ने प्रभु के चरणों में पड़कर माँगा और उसे घर भेज दिया गया। दूसरे ने अपने राजा के चरण पकड़कर माँगा और वह रह गया। तुलसी इन दोनों को पास-पास रख देते हैं और इस पर एक शब्द भी नहीं कहते।
सार: हनुमान सुग्रीव के चरण पकड़कर रघुनाथ की सेवा में कुछ दिन रुकने की अनुमति माँगते हैं और सुग्रीव उन्हें पुण्य की राशि कहकर भेज देते हैं। वानर तुरन्त चल पड़ते हैं।
याद दिलाते रहिये
चलते-चलते अंगद हनुमान को पुकारते हैं, और इस पन्ने पर उनका आख़िरी वाक्य श्रीराम से नहीं, हनुमान से कहा जाता है।
कहेहु दंडवत प्रभु सैं तुम्हहि कहउँ कर जोरि।
दोहा १९ (क)
बार बार रघुनायकहि सुरति कराएहु मोरि॥ १९ (क)॥
दो ही बातें हैं, और दोनों हाथ जोड़कर कही जाती हैं। पहली, प्रभु से मेरा दण्डवत् कह दीजियेगा। दूसरी, रघुनायक को बार-बार मेरी याद कराते रहियेगा। लौटने की बात इसमें कहीं नहीं है। जो आदमी अभी-अभी रुक जाने की विनती कर चुका है, वह अब केवल इतना चाहता है कि भुलाया न जाय। माँग छोटी होते-होते स्मृति तक आ गयी है।
और दोहे का दूसरा हिस्सा उसे तुरन्त पूरा कर देता है। ऐसा कहकर बालिपुत्र चल दिये, और हनुमान लौट आये, और लौटकर उन्होंने प्रभु से उनका प्रेम कह सुनाया, और भगवान् मग्न हो गये। याद दिलाने की विनती इतनी जल्दी पूरी होती है कि माँगने वाला अभी आँख से ओझल भी नहीं हुआ।
कुलिसहु चाहि कठोर अति कोमल कुसुमहु चाहि।
दोहा १९ (ग)
चित्त खगेस राम कर समुझि परइ कहु काहि॥ १९ (ग)॥
यहाँ कविता दृश्य से बाहर निकल आती है और किसी और से बात करने लगती है। सम्बोधन खगेस का है, और टीका उस सुनने वाले को गरुड़ तथा कहने वाले को काकभुशुण्डि बताती है। बात यह है कि श्रीराम का चित्त वज्र से भी अधिक कठोर और फूल से भी अधिक कोमल है, तो कहिये, किसकी समझ में आ सकता है।
यह दोहा कहीं भी रखा जा सकता था और ठीक यहाँ रखा गया है। कठोर वाला आधा अभी-अभी दिखाया जा चुका है: चरणों में पड़े हुए आदमी को उठाकर, गले लगाकर, अपनी माला पहनाकर भी घर भेज दिया गया। कोमल वाला आधा उसी दोहे के एक हिस्सा पहले है: उसी आदमी के प्रेम का हाल सुनकर भगवान् मग्न हो गये। दोनों एक ही हृदय के हैं और दोनों एक ही आदमी पर बरते गये हैं। इसीलिये यह प्रश्न पूछने लायक़ बनता है।
सार: अंगद हनुमान से कहते हैं कि प्रभु से उनका दण्डवत् कहें और रघुनायक को बार-बार उनकी याद कराते रहें। हनुमान लौटकर उनका प्रेम प्रभु से कहते हैं और भगवान् मग्न हो जाते हैं। उसके तुरन्त बाद का दोहा खगेश से कहता है कि श्रीराम का चित्त वज्र से कठोर और फूल से कोमल है।
और एक आदमी, जो घर पहुँचा
इसके बाद कृपालु एक निषाद को बुला लेते हैं और उसे भूषण-वस्त्र प्रसाद में देते हैं। बुलाया वह सबके बाद जाता है, और उसका अपना नाम पाठ में कहीं नहीं आता; पंक्ति उसे केवल निषाद कहती है। जिन साथियों को अभी-अभी विदा किया गया है, उनके साथ उसकी गिनती नहीं हुई थी, और अब अलग से हुई है।
उससे भी वही तीन बातें कही जाती हैं जो दोहा सोलह में कही गयी थीं: घर जाइये, मेरा स्मरण करते रहियेगा, और मन, वचन तथा कर्म से धर्म के अनुसार चलियेगा। यहाँ तक यह विदाई उसी साँचे की है।
फिर एक वाक्य जुड़ता है जो इस पन्ने पर और किसी को नहीं मिलता। आप मेरे सखा हैं और भरत के समान भाई हैं, अयोध्या में सदा आते-जाते रहियेगा। वानरों को घर भेजा गया था और उन्हें वहीं से भजने को कहा गया था। इससे घर भेजते हुए यह भी कह दिया जाता है कि लौटते रहियेगा। वही शब्द सखा, जिससे यह प्रसंग शुरू हुआ था, यहाँ तीसरी बार गिरता है, और इस बार उसके साथ आने-जाने का रास्ता भी खुला रह जाता है।
सुनते ही उसे भारी सुख होता है और वह आँखों में जल भरकर चरणों में गिर पड़ता है। और फिर वह पंक्ति आती है जिसे यह पन्ना बहुत देर से टालता आ रहा था: चरणकमलों को हृदय में धरकर वह घर आया, और आकर अपने कुटुम्बियों को प्रभु का स्वभाव सुनाया।
यह इस पन्ने पर गृह शब्द का पाँचवाँ और आख़िरी फेरा है। पहली बार वह वह चीज़ थी जिसकी किसी को सुध नहीं थी। दूसरी बार वह आदेश था। तीसरी और चौथी बार वह अंगद के मुँह में था, एक बार उस घर के रूप में जिसकी टहल वे करना चाहते थे और एक बार उस वाक्य के रूप में जिसे वे कहलाना नहीं चाहते थे। पाँचवीं बार कोई सचमुच घर पहुँचता है, और चरण अपने साथ ले जाता है। जिस झगड़े का हल चार चौपाइयों में नहीं निकला था, वह उस आदमी के पहुँचने से निकल आता है जिसने बहस की ही नहीं। अयोध्या के लोग यह चरित देखकर बार-बार कहते हैं कि सुख की राशि श्रीरामचन्द्र धन्य हैं।
सार: श्रीराम निषाद को बुलाकर भूषण-वस्त्र देते हैं, घर जाने, स्मरण करने और धर्म पर चलने को कहते हैं, और उसे अपना सखा तथा भरत के समान भाई कहकर सदा आते-जाते रहने को कहते हैं। वह चरणकमल हृदय में रखकर घर पहुँचता है और अपने कुटुम्ब को प्रभु का स्वभाव सुनाता है।
राम राज बैठें
अब पन्ना एक ही पंक्ति में घर के भीतर से निकलकर तीनों लोकों तक फैल जाता है।
राम राज बैठें त्रैलोका। हरषित भए गए सब सोका॥
चौपाई ११
बयरु न कर काहू सन कोई। राम प्रताप बिषमता खोई॥
श्रीरामचन्द्र के राज्य पर बैठते ही तीनों लोक हर्षित हुए और सब शोक चले गये। इसके बाद राज्य के बारे में जो पहली ठोस बात लिखी जाती है, वह किसी के होने की नहीं, किसी के न होने की है: कोई किसी से वैर नहीं करता। न कोष का बखान, न सेना का, न विजय का। और दूसरी पंक्ति बताती है कि यह किया किसने: राम के प्रताप ने विषमता खो दी। प्रताप का काम यहाँ किसी को हराना नहीं है; उसका काम भीतर का भेदभाव मिटा देना है।
बरनाश्रम निज निज धरम निरत बेद पथ लोग।
दोहा २०
चलहिं सदा पावहिं सुखहि नहिं भय सोक न रोग॥ २०॥
दोहा बीस उसी बात को लोगों के दिन-प्रतिदिन में उतार देता है। सब लोग अपने-अपने वर्ण और आश्रम के धर्म में लगे हुए सदा वेद के मार्ग पर चलते हैं और सुख पाते हैं। और अन्त फिर तीन निषेधों पर होता है: न भय, न शोक, न रोग। जिस प्रसंग की शुरुआत ऐसे लोगों से हुई थी जिन्हें अपने घर की सुध नहीं थी, उसका अन्त ऐसे संसार पर होता है जहाँ हर आदमी अपनी जगह पर है और उस जगह पर डरने को कुछ नहीं है।
सार: श्रीराम के राज्यासीन होते ही तीनों लोक हर्षित होते हैं और शोक जाते रहते हैं, कोई किसी से वैर नहीं करता, और उनके प्रताप से विषमता मिट जाती है। दोहा बीस कहता है कि लोग अपने-अपने वर्ण और आश्रम के धर्म में लगे वेद-मार्ग पर चलते हैं और उन्हें न भय है, न शोक, न रोग।
और अन्त में, अपनी ओर
इस प्रसंग का असली विषय विदाई नहीं है, विदाई और छूट जाने के बीच का फ़र्क़ है। दोहा सोलह उस फ़र्क़ को एक ही शब्द पर टिका देता है: सर्बगत। जो सब जगह है, उससे दूर जाना हो ही नहीं सकता, इसलिये घर भेजना अपने से हटाना नहीं है। अंगद यह मानने से इनकार करते हैं और चार चौपाइयाँ लगाकर इनकार करते हैं, और उनका इनकार ग़लत नहीं ठहराया जाता, बस स्वीकार नहीं किया जाता। पन्ना दोनों को खड़ा रहने देता है।
जो इस पन्ने पर नहीं है, वह भी बताने लायक़ है। सीता एक बार आती हैं, बैदेही नाम से, उस सूची के भीतर जिसे कहा जाता है कि इनके समान नहीं। व्यक्ति की तरह वे इस प्रसंग में कहीं नहीं हैं। दशरथ का नाम एक बार भी नहीं आता। रावण का नाम एक बार भी नहीं आता। जिस युद्ध से ये सब लोग अभी-अभी लौटे हैं, उसका ब्योरा एक पंक्ति भी नहीं पाता। और लंका के स्वामी पूरे पन्ने पर बिना नाम के रहते हैं।
अन्त में वह छोटी-सी माँग बची रह जाती है जो अंगद ने चलते-चलते रखी थी: याद दिलाते रहियेगा। यह इस पूरे प्रसंग की सबसे कम माँगने वाली प्रार्थना है, और अकेली वही है जो उसी दोहे के भीतर पूरी हो जाती है। रुकने की विनती नहीं मानी गयी। याद रखे जाने की मान ली गयी, और मानने वाला सुनते ही मग्न हो गया।
जो पाठक इस पन्ने पर पहली बार आता है, वह शायद यह सोचकर आता है कि युद्ध के बाद का हिस्सा ठंडा होता है, कि लौटने और बाँटने और बैठने में कोई कसक नहीं बचती। यह प्रसंग उसी धारणा पर हाथ रख देता है। यहाँ किसी को चोट नहीं लगती, कोई हथियार नहीं उठता, और फिर भी एक आदमी चलते-चलते बार-बार मुड़कर देखता है और मन में यही चाहता है कि पीछे से कोई आवाज़ आ जाय।
और वह आवाज़ नहीं आती। जो आता है वह माला है, वस्त्र है, मणि है, छाती से लगाना है, भीगी हुई आँखें हैं, और फिर भी विदा है। तुलसी दोनों को एक ही दोहे में रखकर आगे बढ़ जाते हैं, और थोड़ी देर बाद, जैसे किसी और से बात करते हुए, इतना भर कहते हैं कि यह चित्त वज्र से कठोर भी है और फूल से कोमल भी, और इसे समझ पाना किसी के बस का नहीं।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, उत्तरकाण्ड, दोहा १६ से २०, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।