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वानरों की विदा और राम-राज्य का आरम्भ

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रामचरितमानसउत्तरकाण्डप्रसंग 4

एक सभा में राम अपने साथियों से कहते हैं कि अब घर जाइये। उसी सभा में एक आदमी बैठा रह जाता है और हिलता तक नहीं। उत्तरकाण्ड का एक बहुत भीगा हुआ हिस्सा वहीं से खुलता है।

कथा यहाँ उन लोगों से उठती है जिन्हें अपने घर की इस तरह सुध नहीं रही कि सपने में भी उसकी याद नहीं आती। वे कौन हैं, यह पिछले प्रसंग से पता है। फिर राम उन्हीं को बुला भेजते हैं, और थोड़ा आगे उनसे कहते हैं कि अब घर जाइये। जिन्हें याद ही नहीं रहा कि उनका भी कोई घर है, उन्हें घर भेजा जा रहा है।

आगे एक समारोह होता है जो बीच में टूट जाता है। गहने और कपड़े मँगाये जाते हैं, भरत सुग्रीव को पहनाते हैं, लक्ष्मण विभीषण को, और जाम्बवान् तथा नील आदि को स्वयं राम। सब सिर नवाकर चल देते हैं। एक आदमी अपनी जगह से हिलता भी नहीं, और राम उसे बुलाते तक नहीं। सभा ख़ाली होने पर वह उठता है, और देर तक विनती करता चला जाता है।

अन्त में दृश्य अचानक चौड़ा हो जाता है। हनुमान अपने राजा से कुछ दिन माँगकर रुक जाते हैं, एक निषाद को बुलाकर भेजा जाता है। फिर कुछ ही वाक्यों में तीनों लोक हर्षित हो जाते हैं और राम-राज्य शुरू हो जाता है। यह तुलसीदास का रामचरितमानस है। इसमें राज्य का आरम्भ किसी विजय-घोषणा से नहीं, इस बात से दर्ज होता है कि अब कोई किसी से वैर नहीं करता।

सखा, भाई और एक निषाद

  • राम जो विदा की इस सभा में पहले अपने साथियों को अपने भाइयों और अपनी सम्पत्ति से बढ़कर बताते हैं, और फिर उन सबको घर भेज देते हैं।
  • अंगद बालि के पुत्र, जो गहने पहनने की पंक्ति में उठते ही नहीं और बाद में अकेले खड़े होकर कहते हैं कि अब घर जाने को मत कहिये।
  • सुग्रीव जिन्हें सबसे पहले वस्त्राभूषण पहनाये जाते हैं, और जो थोड़ी देर बाद हनुमान को रुक जाने की अनुमति देते हैं।
  • हनुमान इस प्रसंग में अकेले, जिनकी रुकने की विनती मान ली जाती है, और जो अंगद का सन्देश लेकर लौटते हैं।
  • विभीषण जिन्हें यह कथा नाम से नहीं, केवल पद से, लङ्का का राजा कहकर पुकारती है। लक्ष्मण उन्हें भूषण-वस्त्र पहनाते हैं और यह राम के मन को भाता है।
  • भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न जो पहनाने का काम करते हैं और फिर वानरों को बड़े आदर के साथ पहुँचाने जाते हैं।
  • जाम्बवान् और नील जिन्हें राम अपने हाथ से पहनाते हैं, और जो राम का रूप हृदय में रखकर चरणों में माथा नवाकर चलते हैं।
  • निषाद जिसे सबके बाद बुलाया जाता है, और अकेले जिसे राम अपना सखा और भरत के समान भाई कहते हैं।
  • गरुड़ जिन्हें कथा यहाँ एक बार पक्षिराज कहकर सम्बोधित करती है। टीका कहने वाले को काकभुशुण्डि बताती है।

जिन्हें अपने घर की सुध नहीं रही

कथा एक उपमा से उठती है, और उपमा ही सब कुछ बता देती है। वे लोग घर इस तरह नहीं भूले जैसे खेल में डूबा बच्चा भूल जाता है। उन्हें घर की सुध वैसे ही नहीं आती जैसे संतों के मन में दूसरे का बुरा चाहने की बात नहीं आती। यानी यह भूलना चूक नहीं, किसी चीज़ का न होना है: संत के भीतर द्रोह के लिये जगह ही नहीं बची। और यह प्रशंसा राम के मुँह खोलने से पहले ही कह दी जाती है।

फिर एक शब्द दृश्य बदल देता है: तब। तब राम ने सब सखाओं को बुलाया। बुलावा किसलिये है, यह न बुलाने वाला बताता है न आने वाले पूछते हैं। वे आते हैं और आदर के साथ सिर नवा देते हैं।

यहाँ सेवक नहीं, सखा बुलाये जाते हैं। यह शब्द इस प्रसंग में तीन बार आता है: यहाँ, फिर वहाँ जहाँ उन्हें घर भेजा जाता है। और अन्त में एक ऐसे आदमी के लिये जिसका नाम तक नहीं लिखा जाता।

मुँह पर बड़ाई किस तरह करें

राम उन्हें बड़े प्रेम से अपने पास बैठाते हैं और कोमल वचन बोलते हैं। पहला ही वाक्य उस अड़चन के बारे में है जो वे अभी करने जा रहे हैं: “आपने मेरी बड़ी सेवा की है। मुँह पर आपकी बड़ाई किस तरह करूँ?” अड़चन को पहले नाम देकर वे ठीक वही काम देर तक करते चले जाते हैं।

राम के वाक्य में फ़ैसला पहले आता है और कारण उसके बाद: पहले फ़ैसला, फिर सबूत। राम कहते हैं, “इसीसे आप मुझे बहुत प्रिय लगते हैं: मेरे हित के लिये आपने घर और सुख छोड़ दिये।” प्रेम का प्रमाण यहाँ भावना नहीं, छोड़ी हुई चीज़ों की बात है।

फिर तुरन्त आठ नामों की सूची शुरू हो जाती है: छोटा भाई, राज्य, सम्पत्ति, सीता, देह, घर, परिवार और मित्र। वाक्य यहीं अधूरा छूट जाता है। जो वाक्य इन आठ को गिनकर अटका है, वह फिर पूरा होता है, और पूरा होते ही बहुत बड़ा हो जाता है।

राम कहते हैं, “ये सब मुझे प्रिय हैं, पर आपके समान नहीं।” यह वाक्य इतना बड़ा है कि उसी साँस में उसकी ज़मानत देनी पड़ती है: “मैं झूठ नहीं कहता, यह मेरा बाना है।” बाना उस टेक को कहते हैं जिससे आदमी पहचाना जाता है। मुँह पर बड़ाई करने की झिझक से शुरू हुआ वाक्य यहाँ अपनी टेक की क़सम तक पहुँच गया है।

फिर दो चीज़ें अलग की जाती हैं। राम कहते हैं, “सेवक सबको प्रिय लगते हैं, यह नीति है। पर मेरा दास पर प्रेम उससे अधिक है।” नीति सबकी एक-सी है। अधिकता उनकी अपनी है। राम यह नहीं कहते कि इन वानरों ने कुछ ऐसा किया जिससे यह अधिकता बनी। वे उसे अपने स्वभाव के खाते में डाल देते हैं।

अब घर जाइये

इतनी बड़ी बात के बाद राम तुरन्त उन्हें भेज देते हैं। इसी में वह वाक्य है जिससे आगे का सारा झगड़ा पैदा होता है।

राम कहते हैं, “सखाओ, अब सब घर जाइये। वहाँ दृढ़ नियम से मुझे भजते रहियेगा, और मुझे सदा सर्वव्यापक और सबका हित करने वाला जानकर बहुत प्रेम कीजियेगा।” तीन आदेश हैं, और जाना उनमें से केवल पहला है। उसे थोड़े-से शब्द मिले हैं। बाक़ी बात उसके बाद क्या करना है, इस पर है। विदाई के बाद का बरताव इस आदेश का विषय है।

राम की बात वह कारण भी देती है जिसके बल पर किसी को अपने पास से हटाया जा सकता है: जो सब जगह है, उससे दूर जाना सम्भव ही नहीं। जिस आपत्ति पर अंगद लम्बी विनती करने वाले हैं, उसका उत्तर उसके उठने से पहले यहाँ रखा जा चुका है।

थोड़ा ही पहले गृह वह चीज़ था जिसकी इन लोगों को सपने में भी सुध नहीं आती थी। अब वही गृह जाने का आदेश है। इस प्रसंग में यह शब्द कुल पाँच बार आता है।

उत्तर में एक भी शब्द नहीं

इतनी बात का उत्तर चुप्पी है। राम के वचन सुनते ही सब प्रेम में मग्न हो गये। वे कौन हैं और कहाँ हैं, यह देह की सुध तक जाती रही। वे हाथ जोड़े एकटक सामने खड़े रह गये और बहुत अनुराग के कारण कुछ कह नहीं सके। शुरू में इन्हें घर की सुध नहीं थी। अब देह की सुध भी नहीं रही। यह उसी क्षण होता है जब उस देह को घर ले जाने का आदेश मिल चुका है।

इसके बाद राम उनका परम प्रेम देखकर उन्हें अनेक प्रकार से विशेष ज्ञान का उपदेश देते हैं। उस उपदेश का एक शब्द भी कथा में नहीं है, जबकि थोड़ी देर बाद एक वानर की विनती पूरी की पूरी आती है। और बात का अन्त इस पर होता है कि वे राम के सामने कुछ कह नहीं पाते और बार-बार उनके चरणों को देखते हैं।

गहने, कपड़े, और एक आदमी जो हिला नहीं

अब प्रसंग एक समारोह में बदल जाता है। राम अनेक रंगों के अनुपम और सुन्दर भूषण-वस्त्र मँगवाते हैं। यह विदाई का व्यवहार है, और कथा इसे क़ायदे से, एक-एक करके, नाम लेकर दर्ज करती है।

पहले सुग्रीव को पहनाया जाता है, और पहनाने वाले भरत हैं, अपने हाथ से सँवारकर। कपड़े किसी सेवक के हाथ नहीं भेजे जाते। पहनाने वाला राम का भाई है, और पहनने वाला वानरों का राजा। समारोह की पहली जोड़ी ही बराबरी की जोड़ी है।

दूसरी बारी लक्ष्मण की है, और वे राम की प्रेरणा से विभीषण को पहनाते हैं। कथा विभीषण को यहाँ नाम से नहीं, केवल लङ्का का राजा कहती है। इस पूरी सभा में उनका नाम एक बार भी नहीं आता, केवल उस नगरी का पद जो अब उनके पास है। और साथ में यह जुड़ता है कि यह राम के मन को भाया। तीनों पहनावों में केवल इसी पर राम के मन की बात लिखी गयी है।

फिर वाक्य के बीच में समारोह टूट जाता है। अंगद बैठे रह गये, हिले तक नहीं। और आगे की बात अंगद के बारे में नहीं, राम के बारे में है: उनकी प्रीति देखकर राम ने उन्हें बुलाया ही नहीं। न कोई डाँट है, न बुलावा। समारोह उनके बिना पूरा होता है।

बालि की गोद

समारोह उसके बाद भी चलता है। जाम्बवान् और नील आदि सबको स्वयं राम भूषण-वस्त्र पहनाते हैं, और वे सब राम का रूप हृदय में धरकर चरणों में माथा नवाकर चल देते हैं। तीन पहनाने वाले हुए: भरत, लक्ष्मण, और अन्त में स्वयं राम। और जो अपनी जगह पर बैठा रह गया, उसे इन तीनों में से किसी के हाथ से कुछ नहीं मिलता।

वह तब उठता है जब सभा ख़ाली हो चुकी है। उसके उठने के ब्योरे में चार बातें एक साथ हैं: सिर नवाया, आँखों में पानी भर आया, हाथ जोड़ लिये। और वचन ऐसे निकले मानो प्रेम के रस में डुबोकर निकाले गये हों।

बोलने से पहले अंगद चार सम्बोधन लगाते हैं, और हर सम्बोधन एक दावा है। सर्वज्ञ, यानी आपको बताना नहीं पड़ेगा। कृपा और सुख के समुद्र, यानी माँगने की जगह ठीक है। दीनों पर दया करने वाले, यानी अंगद दीन हैं। आर्तों के बन्धु, यानी दुखी होना ही उनका परिचय है। चारों में एक बार भी अपनी सेवा, अपने कुल या अपने युद्ध का नाम नहीं आता।

और फिर पहला तर्क, जो अपने बारे में है ही नहीं। अंगद कहते हैं, “नाथ, मरते समय मेरे पिता बालि मुझे आपकी ही गोद में डाल गये थे।” यह आँचल की वह गोद है जिसमें कोई चीज़ थमा दी जाती है। अंगद यह दावा नहीं करते कि उन्होंने कुछ किया है। वे कहते हैं कि उन्हें यहाँ रखा गया था। दावा अपनी पात्रता पर नहीं, एक मरते हुए आदमी के भरोसे पर है, और उस आदमी की ओर से अब कोई बोलने वाला नहीं बचा।

जाऊँ कहाँ

दूसरा तर्क पहले से भी कम अपने बारे में है। अंगद कहते हैं, “अशरण को शरण देने का अपना विरद याद करके मुझे मत छोड़िये।” विरद वह नाम है जो आदमी के आगे-आगे चलता है और जिसे निभाना पड़ता है। अंगद अपनी याद नहीं माँग रहे, राम को उनकी अपनी टेक की याद दिला रहे हैं। फिर वे चार रिश्ते एक साथ जोड़ते हैं, “मेरे तो स्वामी, गुरु, पिता और माता आप ही हैं,” और प्रश्न करते हैं, “आपके चरण छोड़कर मैं कहाँ जाऊँ?” सवाल यह नहीं कि जाऊँ या न जाऊँ। सवाल यह है कि कोई जगह बची कहाँ है।

तीसरे तर्क में अंगद न्याय उसी के हाथ में दे देते हैं जिसने आदेश दिया है: “महाराज, आप ही विचार करके कहिये, आपको छोड़कर घर में मेरा क्या काम है?” यहाँ घर जगह नहीं रह जाता, प्रयोजन बन जाता है, और प्रयोजन ख़ाली निकलता है। आदेश पर उँगली नहीं रखी जा रही। उसे एक ऐसे सवाल में बदल दिया गया है जिसका उत्तर देने वाला वही है जिसने आदेश दिया।

और फिर दलील छोड़ दी जाती है: “नाथ, इस ज्ञान, बुद्धि और बल से हीन बालक और दीन सेवक को शरण में रखिये।” जिन तीन चीज़ों के बल पर कोई सभा में अपनी बात मनवाता है, उन तीनों को अंगद यहाँ छोड़ देते हैं। इसके बाद उनके पास केवल माँगना बचा है।

चौथा तर्क सबसे नीचे उतरकर बोलता है। अंगद कहते हैं, “मैं घर की सारी नीची-से-नीची सेवा करूँगा, और आपके चरणों को देख-देखकर भवसागर तर जाऊँगा।” गृह शब्द अब उनके मुँह में है, और वे उसे वहीं रख देते हैं जहाँ वे रहना चाहते हैं। जिस घर जाने को कहा गया था, वह उनका था। जिस घर की टहल वे माँग रहे हैं, वह यह है।

फिर वे चरणों में गिर पड़ते हैं और आख़िरी बात कहते हैं: “नाथ, अब यह न कहिये कि घर जाइये।” राम का वाक्य था, अब घर जाइये। वही शब्द लौटकर आते हैं, उसी क्रम में, और उनके आगे एक निषेध लग जाता है। अंगद आदेश से बहस नहीं करते। वे कहते हैं कि वह कहा ही न जाय।

करुणा की सीमा

उत्तर पहले शरीर से आता है और बाद में शब्दों से।

कथा यह नहीं कहती कि राम को दया आ गयी। वह उन्हें करुणा की सीमा कहती है, यानी वह हद जहाँ तक करुणा जा सकती है। फिर केवल क्रियाएँ गिनाती है: उठाया, हृदय से लगाया, और कमल जैसे नेत्रों में जल भर आया। जो चरणों में पड़ा था वह छाती तक उठा लिया जाता है, और उतनी दूरी ही पूरा जवाब है।

अयोध्या की लगभग ख़ाली सभा में करुणा की सीमा राम रुके हुए अंगद को उठाकर हृदय से लगा लेते हैं, दोनों की आँखों में जल है, और पास खड़े हनुमान हाथ जोड़े देख रहे हैं।

इतना ही देखें तो लगता है कि विनती मान ली गयी। पर बात यहीं ख़त्म नहीं होती।

अपने हृदय की माला, वस्त्र और मणि बालि के पुत्र को पहनाकर, और बहुत प्रकार से समझाकर, राम ने उनकी विदाई की। जो पहनाने की पंक्ति में उठा ही नहीं था, उसे वे चीज़ें मिलती हैं जो मँगायी नहीं गयी थीं, जो देने वाले के अपने वक्ष पर थीं। समारोह में उसका हिस्सा सबसे बाद में और सबसे पास से आता है।

और साथ ही विनती अस्वीकार हो जाती है। कथा कहीं नहीं कहती कि अंगद को रोक लिया गया। बिदा शब्द इस प्रसंग में एक ही बार आता है, ठीक यहाँ, उसी आदमी के लिये जो विदा नहीं लेना चाहता था। आँसू और निर्णय एक ही क्षण के दो हिस्से हैं, और एक ने दूसरे को नहीं बदला।

फिर फिर देखना

भरत छोटे भाई शत्रुघ्न और लक्ष्मण के साथ उन्हें पहुँचाने चलते हैं, और कथा कारण भी देती है: भक्त की करनी याद करके। वानरों को विदा करना यहाँ शिष्टाचार नहीं, हिसाब है, और हिसाब चुकाने राजा के भाई जाते हैं।

अंगद के हृदय का प्रेम कथा सीधे नहीं नापती। वह कहती है कि थोड़ा नहीं है। और फिर उसे चलता हुआ दिखाती है: वे फिर-फिरकर राम की ओर देखते हैं और बार-बार दण्डवत् करते हैं। चलना और मुड़ना साथ-साथ चल रहे हैं।

फिर बात उनके मन के भीतर से आती है। अंगद मन में चाहते हैं, “राम मुझे रहने को कह दें।” यह आशा किसी से कही नहीं जाती। अंगद अब माँग नहीं रहे, प्रतीक्षा कर रहे हैं, और जिस वाक्य की प्रतीक्षा है वह पीछे से कभी नहीं आता।

और उन्हें जो याद आ रहा है, वह है राम का देखना, बोलना, चलना, और हँसकर मिलना। इनमें एक भी बात बड़ी नहीं: न धनुष, न युद्ध, न राज्याभिषेक। जिसने अभी राम के हृदय की माला पहनी है, उसे उनकी चाल और उनकी हँसी याद आ रही है।

अन्त में वे राम का रुख देखकर, बहुत विनय के वचन कहकर, और चरणों को हृदय में रखकर चल देते हैं। रुख, यानी चेहरे का रुझान। मना कहीं किया नहीं गया। अंगद उसे पढ़ लेते हैं और चल पड़ते हैं। इसके बाद सब वानर बड़े आदर के साथ पहुँचा दिये जाते हैं और भरत भाइयों सहित लौट आते हैं।

जिसने अपने राजा से माँगा

इसके तुरन्त बाद एक और विनती आती है, और वह उलटी दिशा से की जाती है। हनुमान सुग्रीव के चरण पकड़ लेते हैं। वे अनेक प्रकार से विनती करके कहते हैं, “देव, कुछ दिन राम के चरणों की सेवा करके मैं फिर आकर आपके चरणों के दर्शन करूँगा।” हनुमान के शब्द दस दिन हैं, और टीका उन्हें कुछ दिन के अर्थ में खोलती है।

हनुमान राम से नहीं, अपने राजा से माँगते हैं, और चरण पकड़कर माँगते हैं।

उत्तर में सुग्रीव अनुमति भर नहीं देते, आशीर्वाद देते हैं: “हनुमान, आप पुण्य की राशि हैं। जाकर कृपा के धाम राम की सेवा कीजिये।” जो जाना रोका जा सकता था, वह भेजा हुआ जाना बन जाता है। इतना कहते ही सब वानर तुरन्त चल पड़ते हैं।

दो लोग थोड़ी ही देर के भीतर एक ही चीज़ माँगते हैं: राम के पास रह जाना। एक ने राम के चरणों में पड़कर माँगा और उसे घर भेज दिया गया। दूसरे ने अपने राजा के चरण पकड़कर माँगा और वह रह गया। कथा दोनों को पास-पास रख देती है और इस पर एक शब्द भी नहीं कहती।

याद दिलाते रहिये

चलते-चलते अंगद हनुमान को पुकारते हैं, और अयोध्या में उनका आख़िरी वाक्य राम से नहीं, हनुमान से कहा जाता है।

अंगद कहते हैं, “हनुमान, सुनिये, मैं आपसे हाथ जोड़कर कहता हूँ: प्रभु से मेरा दण्डवत् कह दीजियेगा, और राम को बार-बार मेरी याद कराते रहियेगा।” लौटने की बात इसमें कहीं नहीं है। जो अभी रुक जाने की विनती कर चुका है, वह अब केवल इतना चाहता है कि भुलाया न जाय। माँग छोटी होते-होते स्मृति तक आ गयी है।

और कथा उसे तुरन्त पूरा कर देती है। ऐसा कहकर बालि के पुत्र चल दिये, हनुमान लौट आये, और लौटकर उन्होंने राम से अंगद का प्रेम कह सुनाया। राम प्रेम में मग्न हो गये। याद दिलाने की विनती इतनी जल्दी पूरी होती है कि माँगने वाला अभी आँख से ओझल भी नहीं हुआ।

यहाँ कथा दृश्य से बाहर निकलकर किसी और से बात करने लगती है। सम्बोधन पक्षिराज का है। टीका सुनने वाले को गरुड़ और कहने वाले को काकभुशुण्डि बताती है। काकभुशुण्डि कहते हैं, “गरुड़, राम का चित्त वज्र से भी बहुत कठोर और फूल से भी बहुत कोमल है। कहिये, वह किसकी समझ में आ सकता है?”

दोनों आधे अभी दिखाये जा चुके हैं। कठोर वाला: चरणों में पड़े आदमी को उठाकर, गले लगाकर, अपनी माला पहनाकर भी घर भेज दिया गया। कोमल वाला: उसी आदमी के प्रेम का हाल सुनकर राम मग्न हो गये।

और एक आदमी, जो घर पहुँचा

इसके बाद राम एक निषाद को बुला लेते हैं और उसे भूषण-वस्त्र प्रसाद में देते हैं। वह सबके बाद बुलाया जाता है, और उसका अपना नाम कथा में कहीं नहीं आता। वह केवल निषाद कहलाता है। जिन साथियों को अभी विदा किया गया, उनके साथ उसकी गिनती नहीं हुई थी। अब अलग से होती है।

राम उससे कहते हैं, “अब आप भी घर जाइये, वहाँ मेरा स्मरण करते रहियेगा, और मन, वचन और कर्म से धर्म के अनुसार चलियेगा।” यहाँ तक यह विदाई वानरों वाले साँचे की है: घर जाना, और वहाँ से राम को याद रखना।

फिर एक वाक्य जुड़ता है जो विदा होने वालों में और किसी को नहीं मिलता: “आप मेरे सखा हैं और भरत के समान भाई हैं। अयोध्या में सदा आते-जाते रहियेगा।” वानरों को घर भेजा गया था और वहीं से भजने को कहा गया था। इसे घर भेजते हुए यह भी कह दिया जाता है कि लौटते रहियेगा। सखा शब्द, जिससे यह प्रसंग शुरू हुआ था, यहाँ तीसरी बार आता है, और इस बार उसके साथ आने-जाने का रास्ता भी खुला रह जाता है।

सुनते ही उसे भारी सुख होता है और वह आँखों में जल भरकर चरणों में गिर पड़ता है। और फिर वह बात आती है जिसे कथा बहुत देर से टालती आ रही थी। चरणों को हृदय में धरकर वह घर आया, और आकर अपने कुटुम्बियों को राम का स्वभाव सुनाया।

यह गृह शब्द का पाँचवाँ और आख़िरी फेरा है। पहली बार वह वह चीज़ था जिसकी किसी को सुध नहीं थी। दूसरी बार वह आदेश था। तीसरी और चौथी बार वह अंगद के मुँह में था, एक बार उस घर के रूप में जिसकी टहल वे करना चाहते थे। और एक बार उस वाक्य में जिसे वे कहलाना नहीं चाहते थे। पाँचवीं बार कोई सचमुच घर पहुँचता है, और चरण अपने साथ ले जाता है। जिस झगड़े का हल अंगद की लम्बी विनती में नहीं निकला था, वह उस आदमी के पहुँचने से निकल आता है जिसने बहस की ही नहीं। अयोध्या के लोग यह चरित देखकर बार-बार कहते हैं, “सुख की राशि राम धन्य हैं।”

राम राज्य पर बैठे

अब कथा निषाद के घर से निकलकर तीनों लोकों तक फैल जाती है।

राम के राज्य पर बैठते ही तीनों लोक हर्षित हुए और सब शोक चले गये। इसके बाद राज्य के बारे में जो पहली ठोस बात लिखी जाती है, वह किसी के होने की नहीं, किसी के न होने की है। कोई किसी से वैर नहीं करता। न कोष का बखान, न सेना का, न विजय का। और फिर पता चलता है कि यह किया किसने: राम के प्रताप ने विषमता मिटा दी। प्रताप का काम यहाँ किसी को हराना नहीं, भीतर का भेदभाव मिटाना है।

फिर कथा उसी बात को लोगों के रोज़ के जीवन में उतार देती है। सब लोग अपने-अपने वर्ण और आश्रम के धर्म में लगे हुए सदा वेद के मार्ग पर चलते हैं और सुख पाते हैं। अन्त फिर तीन निषेधों पर होता है: न भय, न शोक, न रोग। इस प्रसंग की शुरुआत ऐसे लोगों से हुई थी जिन्हें अपने घर की सुध नहीं थी। उसका अन्त ऐसे संसार पर होता है जहाँ हर आदमी अपनी जगह पर है और वहाँ डरने को कुछ नहीं।

वज्र-सा कठोर, फूल-सा कोमल

इस प्रसंग का विषय विदाई और छूट जाने के बीच का फ़र्क़ है। राम की विदाई उसे एक शब्द पर टिका देती है: सर्वव्यापक। जो सब जगह है, उससे दूर जाना हो ही नहीं सकता। अंगद यह मानने से इनकार करते हैं, और उनका इनकार ग़लत नहीं ठहराया जाता, बस स्वीकार नहीं किया जाता।

जो इस प्रसंग में नहीं है, वह भी बताने लायक़ है। सीता का नाम एक बार आता है, उस सूची के भीतर जिसके बारे में राम कहते हैं कि ये आपके समान नहीं। व्यक्ति की तरह वे इस प्रसंग में कहीं नहीं हैं। दशरथ का नाम एक बार भी नहीं आता, रावण का नाम एक बार भी नहीं। जिस युद्ध से ये सब लोग अभी लौटे हैं, उसका ब्योरा एक वाक्य भी नहीं पाता। और मानस यहाँ विभीषण का नाम शुरू से अन्त तक नहीं लेता। वे केवल लङ्का के राजा हैं।

अन्त में अंगद की वह छोटी-सी माँग बची रह जाती है जो उन्होंने चलते-चलते रखी थी: याद दिलाते रहियेगा। इस प्रसंग में वही प्रार्थना सबसे कम माँगती है, और वही उसी घड़ी पूरी हो जाती है। रुकने की विनती नहीं मानी गयी। याद रखे जाने की मान ली गयी, और मानने वाला सुनते ही मग्न हो गया।

युद्ध के बाद का यह हिस्सा ठंडा नहीं है। एक आदमी चलते-चलते बार-बार मुड़कर देखता है और चाहता है कि पीछे से आवाज़ आ जाय। वह आवाज़ नहीं आती। जो आता है वह माला है, वस्त्र है, मणि है, छाती से लगाना है, भीगी आँखें हैं, और फिर भी विदा है। और थोड़ी देर बाद काकभुशुण्डि गरुड़ से इतना भर कहते हैं कि यह चित्त वज्र से कठोर भी है और फूल से कोमल भी। और इसे समझ पाना किसी के बस का नहीं।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, उत्तरकाण्ड, दोहा 16 से 20, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।