Lulla Family

राज्याभिषेक, और बंदी के भेस में आये वेद

रामचरितमानस · उत्तरकाण्ड · राज्याभिषेक, और बंदी के भेस में आये वेद

राज्याभिषेक, और बंदी के भेस में आये वेद

जिस दिन अयोध्या का सिंहासन भरता है, उस दिन श्रीराम पूरे प्रसंग में एक ही वाक्य बोलते हैं, और वह यह कि पहले मेरे सखाओं को नहलाओ। बाक़ी सारा बोलना उस दिन स्तुति है: देवताओं की, भाटों का भेस बाँधकर आये हुए चारों वेदों की, और अन्त में शंकर की, जो दस छन्द गाकर अपने को दीनजन कहते हैं।

इस प्रसंग में श्रीराम एक ही बार बोलते हैं। एक ही वाक्य, और वह आदेश का है, पर उसका विषय राजगद्दी नहीं है। वे सेवकों को बुलाकर कहते हैं कि जाकर पहले मेरे सखाओं को स्नान कराओ। इसके बाद इस पूरे पन्ने पर उनका कोई बोल नहीं है। जो कुछ बोला जाता है, वह उन्हीं के सामने, उन्हीं के लिये कहा गया स्तवन है: देवताओं का, फिर भाटों का भेस बाँधकर आये हुए चारों वेदों का, और अन्त में शंकर का। अवधपुरी सज चुकी है, आकाश से फूल बरस रहे हैं, और दिन का पहला काम यह है कि सुग्रीव और उनके साथियों को नहलाया जाय।

तुलसी ने इस दिन की तरतीब जिस तरह बाँधी है, उसमें सबसे पहले जो चीज़ खोली जाती है वह जटा है। भरत की जटा, और खोलने वाले हाथ श्रीराम के अपने हैं। निज कर राम जटा निरुआरे, अपने हाथ से उलझी लटें सुलझायीं। ठीक उसी जगह ठहरकर तुलसी कहते हैं कि इस भाग्य को और इस कोमलता को सौ करोड़ शेष भी नहीं गा सकते। तिलक अभी दूर है, सिंहासन अभी मँगाया भी नहीं गया। पहले बाल खुलते हैं, और वे भी अपने नहीं, भाई के।

यह तुलसीदास का रामचरितमानस है, और इसका उत्तरकाण्ड एक पक्षी के मुँह से कहा जा रहा है। बीच-बीच में कथा रुककर सुनने वाले को पुकारती है: सुनु खगेस, बैनतेय सुनु, सुनु खगपति। काकभुशुण्डि गरुड़ को सुना रहे हैं, और वे पुकार ठीक उन्हीं मोड़ों पर आती है जहाँ दृश्य सँभाले नहीं सँभलता: जब देवता विमान लेकर उतरते हैं, जब शोभा कहने से बाहर हो जाती है, जब शंकर आते हैं, और जब कथा अपना फल गिनाने बैठती है। दोहा ग्यारह से पंद्रह तक की यह छोटी दूरी अयोध्या के सबसे भरे हुए दिन की दूरी है, और उसके भीतर छः महीने बीत जाते हैं।

इस प्रसंग के मुख्य किरदार

  • श्रीराम इस पन्ने पर एक ही बार बोलते हैं, और जो कहते हैं वह अपने बारे में नहीं है।
  • जानकी इस प्रसंग में उनका नाम सीता एक बार भी नहीं आता। वे जानकी हैं, रमा हैं, जनकसुता हैं, और वेदों के प्रणाम में सक्ति हैं।
  • भरत जिनकी जटा श्रीराम अपने हाथों सुलझाते हैं, और जिनके भाग्य को सौ करोड़ शेष भी नहीं गा पाते।
  • मुनि वसिष्ठ प्रभु को देखकर सिंहासन मँगवाते हैं, पहला तिलक करते हैं, और फिर बाक़ी ब्राह्मणों को आज्ञा देते हैं।
  • चारों वेद भाटों का भेस बाँधकर दरबार में आते हैं, स्तुति करते हैं, और सबके देखते-देखते अन्तर्धान होकर ब्रह्मलोक लौट जाते हैं।
  • शंकर पहले विमानों की भीड़ में एक नाम, फिर अकेले आकर दस छन्द की स्तुति, और उसके अन्त में अपने लिये दीनजन शब्द।
  • काकभुशुण्डि और गरुड़ कहने वाला और सुनने वाला। यह पूरी कथा इन्हीं दोनों के बीच चल रही है।

पहले सखा, फिर भरत, फिर सब, फिर अपने

दिन की शुरुआत सजावट से होती है और बधाई से। अवधपुरी बहुत सुन्दर बना दी गयी है, और ऊपर से देवता फूल बरसा रहे हैं, इतने कि तुलसी उसे झड़ी कहते हैं, बौछार नहीं। यहाँ एक बात ध्यान देने लायक़ है। देवता अभी आये नहीं हैं। वे बहुत बाद में, दोहा ग्यारह के तीसरे टुकड़े में, विमानों पर चढ़कर उतरेंगे। अभी वे जहाँ हैं वहीं से फूल डाल रहे हैं, दूर से, बिना दिखे। और इसी झड़ी के नीचे खड़े होकर श्रीराम इस पूरे प्रसंग का अपना इकलौता वाक्य बोलते हैं।

अवधपुरी अति रुचिर बनाई । देवन्ह सुमन बृष्टि झरि लाई॥
राम कहा सेवकन्ह बुलाई । प्रथम सखन्ह अन्हवावहु जाई॥

चौपाई १

प्रथम, यानी सबसे पहले। यह शब्द इस पन्ने पर दो बार आता है, और दोनों बार इसी का फ़ैसला करता है कि नम्बर किसका है। यहाँ पहला नम्बर सखाओं का है। जिस घर में आज राजा बैठने वाला है, उस घर में सुबह का पहला हुक्म मेहमानों को नहलाने का है, और मेहमान वे हैं जो लड़ाई से लौटे हैं। सेवक बुलाये जाते हैं, आदेश दिया जाता है, और आदेश में एक भी शब्द सिंहासन का नहीं है। राजा बनने से पहले जो काम करना है, वह मेज़बानी का है।

सुनत बचन जहँ तहँ जन धाए। सुग्रीवादि तुरत अन्हवाए॥
पुनि करुनानिधि भरतु हँकारे । निज कर राम जटा निरुआरे॥

चौपाई २

वचन सुनते ही सेवक जहाँ-तहाँ दौड़ पड़े और सुग्रीव आदि को तुरन्त नहला दिया। तुरन्त: तुलसी यह शब्द जोड़ते हैं, जैसे इस घर में अब देर करने की कोई वजह ही न बची हो। और फिर जो अगली पंक्ति आती है, वह आदेश की नहीं है। करुणानिधि ने भरत को बुलाया, और अपने हाथ से उनकी जटा सुलझायी। सेवक बुलाने के लिये सेवक थे। भरत के बालों के लिये कोई सेवक नहीं बुलाया गया। आदेश दूसरों के लिये था। भरत के लिये हाथ था।

अगली चौपाई इसी दृश्य पर टिकी रहती है, और उसमें तुलसी एक तौल लगाते हैं जिस पर आगे चलकर ध्यान देना पड़ेगा। भक्तवत्सल कृपालु प्रभु ने तीनों भाइयों को स्नान कराया, और फिर यह पंक्ति: भरत का भाग्य और प्रभु की कोमलता, इन दोनों को सौ करोड़ शेष भी नहीं गा सकते। शेष का नाम इस प्रसंग में एक बार और आयेगा, थोड़ी ही देर बाद, और वहाँ वे गा रहे होंगे। यही इस पन्ने की सबसे चुपचाप रखी हुई बात है, और उस तक हम लौटेंगे।

अन्हवाए प्रभु तीनिउ भाई । भगत बछल कृपाल रघुराई॥
भरत भाग्य प्रभु कोमलताई । सेष कोटि सत सकहिं न गाई॥

चौपाई ३

इसके बाद श्रीराम अपनी जटा खोलते हैं, गुरु की आज्ञा माँगते हैं, और तब नहाते हैं। तरतीब पूरी हो गयी: पहले सखा, फिर भरत, फिर तीनों भाई, और सबसे अन्त में वे स्वयं, वह भी बिना आज्ञा लिये नहीं। जिस आदमी के लिये आज सारा नगर सजा है, वह उस नगर में नहाने वाला आख़िरी आदमी है। स्नान के बाद आभूषण पहने जाते हैं, और तुलसी कहते हैं कि उन अंगों को देखकर सैकड़ों कामदेव लजा गये। इस प्रसंग में कामदेव का यह पहला ज़िक्र है। दूसरा बहुत बाद में, शंकर की स्तुति में आयेगा, और वहाँ शंकर उसी कामदेव को मार डालने की प्रार्थना करेंगे।

सार: राज्याभिषेक के दिन श्रीराम एक ही आदेश देते हैं, कि पहले सखाओं को नहलाओ। भरत की जटा वे अपने हाथों सुलझाते हैं, तीनों भाइयों को स्नान कराते हैं, और गुरु की आज्ञा लेकर सबसे बाद में स्वयं नहाते हैं। जिस भाग्य और जिस कोमलता को तुलसी यहाँ अगाध बताते हैं, वह गद्दी का नहीं, बालों का प्रसंग है।

सासुओं ने, और बायीं ओर

इधर जो हो रहा था, उसे तुलसी दोहे में रखते हैं, और पहली ही पंक्ति में जो शब्द चौंकाता है वह है सासुन्ह। जानकी को नहलाने वाली उनकी सासें हैं। घर के जितने रिश्ते हैं, उनमें यह वही रिश्ता है जिसे सबसे ज़्यादा दूरी का माना जाता है, और आज वही सबसे पास का काम कर रहा है, आदर के साथ, और तुरन्त। दिव्य वस्त्र और श्रेष्ठ आभूषण अंग-अंग में सजा दिये जाते हैं। जो हाथ भरत के बालों पर थे, वे यहाँ नहीं हैं। यहाँ सासों के हाथ हैं, और तुलसी को दोनों जगह एक ही जल्दी दिखानी है।

सासुन्ह सादर जानकिहि मज्जन तुरत कराइ।
दिब्य बसन बर भूषन अँग अँग सजे बनाइ॥ ११ (क)॥

दोहा ११ (क)

दूसरे टुकड़े में जानकी अपनी जगह पर आ जाती हैं: श्रीराम के बायें, रूप और गुणों की खान रमा। नाम बदल गया है, और इस पूरे प्रसंग में बदलता ही रहेगा। तुलसी उन्हें यहाँ सीता नहीं कहते, एक बार भी नहीं। वे जानकी हैं, रमा हैं, जनकसुता हैं, और वेदों के प्रणाम में सक्ति हैं। चार नाम, और हर नाम ठीक उस जगह का है जहाँ वे उस क्षण खड़ी हैं। सासों के हाथ में जानकी थीं, सिंहासन के बायें रमा हैं। और जो माताएँ थोड़ी देर बाद आरती उतारने वाली हैं, वे यहाँ पहले ही हर्षित हो चुकी हैं, अपना जन्म सफल जानकर।

राम बाम दिसि सोभति रमा रूप गुन खानि।
देखि मातु सब हरषीं जन्म सुफल निज जानि॥ ११ (ख)॥

दोहा ११ (ख)

अब पहली बार कथा रुककर सुनने वाले को पुकारती है। हे पक्षिराज, सुनिये: उस समय ब्रह्मा, शिव, मुनियों के समूह, और विमानों पर चढ़े हुए सब देवता आनन्दकन्द के दर्शन करने आये। जो फूल सुबह से बरस रहे थे, उन्हें भेजने वाले अब स्वयं उतर आये हैं। और एक नाम इस भीड़ में ऐसा है जिस पर अभी निशान लगा रखिये। शिव यहाँ गिनती के एक नाम की तरह आते हैं, ब्रह्मा और मुनियों के बीच, बिना कुछ कहे। उनकी अपनी बारी बहुत बाद में आयेगी, और तब वे अकेले होंगे और बहुत देर बोलेंगे।

सुनु खगेस तेहि अवसर ब्रह्मा सिव मुनि बृंद।
चढ़ि बिमान आए सब सुर देखन सुखकंद॥ ११ (ग) ॥

दोहा ११ (ग)

सार: सासुएँ जानकी को स्नान कराकर दिव्य वस्त्र और आभूषण पहनाती हैं, और वे श्रीराम के बायीं ओर आ बैठती हैं। माताएँ अपना जन्म सफल मानती हैं। तभी ब्रह्मा, शिव, मुनिगण और विमानों पर चढ़े देवता दर्शन के लिये उतरते हैं, और कथा पहली बार गरुड़ को सम्बोधित करती है।

सिंहासन, तिलक, और जो माँगने वाले नहीं बचे

अब सिंहासन आता है, और उसे मँगाने वाला राजा नहीं है। प्रभु को देखकर मुनि वसिष्ठ के मन में प्रेम भर आया, और उन्होंने तुरन्त दिव्य सिंहासन मँगवाया। तेज सूर्य के समान, और तुलसी वहीं हाथ खड़े कर देते हैं: सो बरनि न जाई। पर उस पर बैठने से पहले एक काम और होता है, और वह इस पूरे दृश्य का सबसे छोटा काम है। श्रीराम ब्राह्मणों को सिर नवाते हैं, और तब बैठते हैं। गद्दी पर चढ़ने का आख़िरी क़दम झुकना है।

प्रभु बिलोकि मुनि मन अनुरागा। तुरत दिब्य सिंघासन मागा॥
रबि सम तेज सो बरनि न जाई । बैठे राम द्विजन्ह सिरु नाई॥

चौपाई ४

जनकसुता के सहित रघुनाथ को देखकर मुनियों का समुदाय हर्ष से भर जाता है। ब्राह्मण वेदमन्त्र उच्चारते हैं, और आकाश में देवता और मुनि जय-जयकार करने लगते हैं। इस पंक्ति पर एक क्षण रुकिये, क्योंकि इसका असर आगे खुलेगा। वेद इस समय मन्त्र के रूप में बोले जा रहे हैं, ब्राह्मणों के मुँह से, बिना अपनी देह के। थोड़ी देर में वे अपने पैरों पर, अपने चुने हुए भेस में, इसी जगह आकर खड़े होंगे। फ़िलहाल वे आवाज़ हैं। इसके तुरन्त बाद तिलक होता है, और तिलक ही इस राज्याभिषेक की असली क्रिया है।

प्रथम तिलक बसिष्ट मुनि कीन्हा । पुनि सब बिप्रन्ह आयसु दीन्हा॥
सुत बिलोकि हरषीं महतारी । बार बार आरती उतारी॥

चौपाई ५

प्रथम तिलक बसिष्ट मुनि कीन्हा। वही शब्द फिर आया, और फिर उसने नम्बर तय किया। पहला तिलक गुरु का, और उसके तुरन्त बाद गुरु ने सब ब्राह्मणों को आज्ञा दी कि वे भी करें। यानी तिलक एक नहीं हुआ, अनेक हुए, और पहला होने का अर्थ अकेला होना नहीं निकला। उसी क्षण माताएँ बेटे को सिंहासन पर देखती हैं और बार-बार आरती उतारती हैं। बार-बार: जिस तरह तिलक एक बार में पूरा नहीं हुआ, उसी तरह आरती भी एक बार में पूरी नहीं होती। इस दरबार में हर शुभ काम दोहराया जा रहा है, जैसे किसी को यक़ीन न आ रहा हो कि यह दिन सचमुच आ गया।

फिर दान। ब्राह्मणों को अनेकों प्रकार के दान दिये गये, और उसी साँस में तुलसी एक वाक्य लिखते हैं जो इस पूरे पन्ने की धुरी बन जाता है: जाचक सकल अजाचक कीन्हे, सब माँगने वालों को न माँगने वाला बना दिया। इस एक पंक्ति के बाद इस दरबार में कोई याचक नहीं बचा। इसके बाद ही देवता नगाड़े बजाते हैं, और वे भी तब, जब त्रिभुवन के स्वामी को अयोध्या के सिंहासन पर बैठा देख लेते हैं। दान पहले, बाजा बाद में। आकाश तब बजता है जब ज़मीन का लेन-देन पूरा हो चुका होता है।

बिप्रन्ह दान बिबिधि बिधि दीन्हे । जाचक सकल अजाचक कीन्हे॥
सिंघासन पर त्रिभुअन साईं । देखि सुरन्ह दुंदुभीं बजाईं॥

चौपाई ६

सार: वसिष्ठ सिंहासन मँगवाते हैं, श्रीराम ब्राह्मणों को सिर नवाकर बैठते हैं, वेदमन्त्र पढ़े जाते हैं, वसिष्ठ पहला तिलक करते हैं और फिर सब ब्राह्मणों से कराते हैं, माताएँ बार-बार आरती उतारती हैं, और दान में सब याचक अयाचक कर दिये जाते हैं। इसके बाद ही देवताओं के नगाड़े बजते हैं।

वह शोभा जो कही नहीं जाती

अब छन्द आता है, और छन्द का काम यहाँ दृश्य को चौड़ा करना है। आकाश में ढेरों नगाड़े, गन्धर्व और किन्नर गाते हुए, अप्सराओं के झुंड नाचते हुए, देवता और मुनि परमानन्द पाते हुए। और फिर नज़र नीचे उतरती है, सिंहासन के क़रीब, और तुलसी गिनने लगते हैं कि कौन क्या पकड़े खड़ा है। भरत और बाक़ी छोटे भाई, विभीषण, अंगद, हनुमान और उनके साथी, और उनके हाथों में छत्र, चँवर, पंखा, धनुष, तलवार, ढाल और शक्ति।

नभ दुंदुभीं बाजहिं बिपुल गंधर्ब किंनर गावहीं।
नाचहिं अपछरा बृंद परमानंद सुर मुनि पावहीं॥
भरतादि अनुज बिभीषनांगद हनुमदादि समेत ते।
गहें छत्र चामर ब्यजन धनु असि चर्म सक्ति बिराजते॥
श्री सहित दिनकर बंस भूषन काम बहु छबि सोहई। नव अंबुधर बर गात अंबर पीत सुर मन मोहई॥ मुकुटांगदादि बिचित्र भूषन अंग अंगन्हि प्रति सजे। अंभोज नयन बिसाल उर भुज धन्य नर निरखंति जे॥॥ २॥

छन्द

इस सूची में तुलसी एक भी नाम के साथ एक भी चीज़ नहीं जोड़ते। पहले सारे नाम आते हैं, एक साँस में, और फिर सातों चीज़ें आती हैं, वे भी एक साँस में। छत्र, चामर, ब्यजन, धनु, असि, चर्म, सक्ति। जोड़ी बिठाने का काम पढ़ने वाले पर छोड़ दिया गया है, और टीका उसे क्रमशः बिठा देती है, आदि शब्द में सुग्रीव को गिनकर, सात हाथों के लिये सात चीज़ें। पर पंक्ति में वह क्रम बँधा हुआ नहीं है। जो बँधा हुआ है वह सिर्फ़ यह है कि सूची भरत से शुरू होती है और हनुमान पर आकर आदि कहकर छोड़ दी जाती है, जैसे नाम अभी और भी हैं और जगह कम पड़ रही है।

छन्द यहीं नहीं रुकता। गीताप्रेस के पन्ने पर इसका दूसरा भाग भी है, और वह सिर से पैर तक का है: श्री के सहित सूर्यवंश के भूषण के शरीर में अनेकों कामदेवों की छबि, नये जलभरे मेघ जैसा साँवला अंग, उस पर पीताम्बर जो देवताओं का मन भी मोह लेता है, मुकुट और बाजूबंद जैसे विचित्र आभूषण अंग-अंग में सजे हुए, कमल जैसे नेत्र, चौड़ी छाती, लंबी भुजाएँ। और अन्त में एक वाक्य जो दृश्य से निकलकर पढ़ने वाले की ओर मुड़ जाता है: धन्य हैं वे मनुष्य जो इन्हें देखते हैं। अभी तक जो कुछ हो रहा था, वह सिंहासन के पास हो रहा था। यह वाक्य पन्ने के बाहर हाथ बढ़ाता है।

और ठीक इसके बाद कहने वाला हार मान लेता है। हे पक्षिराज, वह शोभा, वह समाज और वह सुख मुझसे कहते नहीं बनता। यह उस आदमी का वाक्य है जो अभी-अभी नगाड़े, गन्धर्व, अप्सराएँ, सात राजचिह्न और नख से शिख तक का रूप गिना चुका है। सब गिनाकर वह कहता है कि गिनाया नहीं जा सका। पर रुकते-रुकते वह एक काम और कर जाता है। वह बता जाता है कि जो वह नहीं कह सका, उसे कौन कह सकता है।

वह सोभा समाज सुख कहत न बनइ खगेस।
बरनहिं सारद सेष श्रुति सो रस जान महेस॥ १२ (क)॥

दोहा १२ (क)

चार नाम हैं इस आधी पंक्ति में: सारद, सेष, श्रुति और महेस। पहले तीन बखानते हैं, चौथा रस जानता है। अब वह तौल याद कीजिये जो तीसरी चौपाई में लगी थी, जहाँ भरत के भाग्य और प्रभु की कोमलता के आगे सौ करोड़ शेष भी नहीं गा पाते थे। वही शेष यहाँ गा रहे हैं, और लगातार गा रहे हैं। सिंहासन की शोभा शेष के बस की है। भाई के उलझे बालों में फिरती उँगलियाँ नहीं थीं। तुलसी ने एक ही नाम को दो जगह रखा है, एक जगह असमर्थ और दूसरी जगह समर्थ, और दोनों के बीच एक दोहा, कुछ चौपाइयाँ और एक छन्द भर की दूरी है।

इस दोहे की दूसरी बात और भी बारीक है, और वह आगे के पन्ने पर खुलती है। इन चार नामों में से दो थोड़ी ही देर में सचमुच चलकर इसी दरबार में आते हैं और बोलते हैं। श्रुति, यानी वेद, और महेस, यानी शंकर। सारद और शेष नहीं आते, और नहीं आने की वजह भी इसी पंक्ति में लिखी है: उनके बारे में तुलसी वर्तमान काल में कहते हैं, बरनहिं, वे तो बखान ही रहे हैं, बिना आये, बिना रुके। जो लगातार कह रहा है उसे आने की ज़रूरत नहीं। जिन दो को आना था, उनके आने का ब्योरा अगले कुछ दोहों में है।

सार: छन्द में आकाश के नगाड़े, गन्धर्व, अप्सराएँ और सिंहासन के चारों ओर सात राजचिह्न लिये खड़े साथी हैं, और उसके दूसरे भाग में श्रीराम का नख-शिख रूप। फिर काकभुशुण्डि कह देते हैं कि यह शोभा उनसे कही नहीं जाती, और गिना देते हैं कि सारद, शेष और श्रुति इसे बखानते हैं तथा इसका रस महेस जानते हैं।

बंदी के भेस में

भीड़ अब छँटती है। सब देवता अलग-अलग स्तुति करके अपने-अपने लोक लौट जाते हैं, और दरबार साफ़ हो जाता है। और तभी, ख़ाली हुई उसी जगह पर, चारों वेद वहाँ आते हैं जहाँ श्रीराम हैं, और वे अपने रूप में नहीं आते। वे बंदी का भेस बाँधकर आते हैं, यानी भाट का, जो दरबार में खड़ा होकर राजा की बिरुदावली गाता है। जिनके मन्त्र थोड़ी देर पहले इसी दरबार में पढ़े जा चुके हैं, वे अब ख़ुद चलकर आये हैं, और किसी और के भेस में।

भिन्न भिन्न अस्तुति करि गए सुर निज निज धाम।
बंदी बेष बेद तब आए जहँ श्रीराम॥ १२ (ख)॥
प्रभु सर्बग्य कीन्ह अति आदर कृपानिधान।
लखेउ न काहूँ मरम कछु लगे करन गुन गान॥ १२ (ग)॥

दोहा १२ (ख) और (ग)

तीन बातें एक साथ हो रही हैं और तीनों एक ही दोहे में बँधी हैं। सर्वज्ञ प्रभु ने बहुत ही आदर किया, यानी उन्होंने पहचान लिया। किसी ने कुछ भी भेद नहीं जाना, यानी और कोई नहीं पहचान पाया। और वेद गुणगान करने लगे, यानी भेस टूटा नहीं। जिस दरबार में सब कुछ खुले में हो रहा है, तिलक खुले में, दान खुले में, आरती खुले में, वहाँ एक चीज़ ढकी रह जाती है, और उसे ढका रखने में स्वयं राजा शामिल है। वे भेद खोलते नहीं। वे सिर्फ़ आदर बढ़ा देते हैं। पहचान का एकमात्र चिह्न यही है कि आदर ज़रूरत से कुछ ज़्यादा है, और दरबार को उस ज़्यादती का कारण नहीं बताया जाता।

स्तुति वहीं से शुरू होती है जहाँ से वेद ही शुरू कर सकते हैं। पहला ही शब्द जय है, और जय के तुरन्त बाद दो शब्द आते हैं जो आपस में लड़ते हुए माने जाते हैं, सगुण और निर्गुण, और यहाँ वे एक ही पुकार में बैठा दिये गये हैं।

जय सगुन निर्गुन रूप रूप अनूप भूप सिरोमने।
दसकंधरादि प्रचंड निसिचर प्रबल खल भुजबल हने॥
अवतार नर संसार भार बिभंजि दारुन दुख दहे।
जय प्रनतपाल दयाल प्रभु संजुक्त सक्ति नमामहे॥

छन्द

यह छन्द चार चीज़ें एक के बाद एक कहता है, और उसकी तरतीब इत्तिफ़ाक़ नहीं है। पहले रूप: सगुन और निर्गुन, अनुपम रूप, राजाओं के शिरोमणि। फिर काम: रावण आदि प्रचण्ड, प्रबल और दुष्ट निशाचर भुजाओं के बल से मारे गये। फिर कारण: मनुष्य का अवतार लेकर संसार का भार तोड़ा और कठोर दुःख भस्म किये। और अन्त में प्रणाम, और प्रणाम में एक शब्द जो इस पूरे दिन को बाँध देता है: संजुक्त सक्ति नमामहे, हम शक्ति सहित आपको नमस्कार करते हैं। दोहा ग्यारह ने जिन्हें बायीं ओर बिठाया था, वेद अपना पहला प्रणाम उन्हें साथ लेकर करते हैं। सिंहासन पर दो लोग बैठे हैं, और नमस्कार भी दो को हो रहा है।

पन्ने पर यह स्तुति यहीं ख़त्म नहीं होती, पाँच छन्द और चलती है, और उसकी चाल सीढ़ी की तरह नीचे की ओर है, ऊपर के तत्त्व से शुरू होकर पाँव तक। दूसरे में: आपकी विषम माया के वश में देवता, राक्षस, नाग, मनुष्य और चर-अचर सब काल, कर्म और गुणों से भरे हुए दिन-रात भव के रास्ते भटक रहे हैं, और जिन्हें आपने करुणा करके देख लिया, वे तीनों प्रकार के दुःखों से छूट गये। तीसरे में: जो ज्ञान के अभिमान में मतवाले होकर भक्ति का आदर नहीं करते, वे देवताओं को भी दुर्लभ पद पाकर वहाँ से गिरते देखे जाते हैं, और जो सब आशा छोड़कर दास बने रहते हैं, वे केवल नाम जपकर बिना परिश्रम भवसागर तर जाते हैं।

चौथे छन्द में वेद चरणों तक उतर आते हैं, और चरणों का ब्योरा दो हिस्सों में है। एक हिस्सा महिमा का है: वही चरण जो शिव और ब्रह्मा के पूज्य हैं, जिनकी कल्याणमयी रज छूकर गौतम ऋषि की पत्नी अहल्या तर गयीं, जिनके नख से मुनियों की वन्दित और तीनों लोकों को पवित्र करने वाली सुरसरी निकलीं, और जिनमें ध्वजा, वज्र, अंकुश और कमल के चिह्न हैं। दूसरा हिस्सा उसी पंक्ति में है और बिलकुल दूसरी तरह का है: वन में फिरते हुए काँटे चुभने से उन्हीं चरणों में घट्ठे पड़ गये हैं। एक ही साँस में वज्र का चिह्न और काँटे का निशान। वेद दोनों को अलग नहीं करते।

पाँचवाँ छन्द संसार को एक पेड़ बनाकर खड़ा कर देता है, और उसका ब्योरा गिनती का है: जड़ अव्यक्त, पेड़ अनादि, चार त्वचाएँ, छः तने, पचीस शाखाएँ, अनगिनत पत्ते, घने फूल, दो तरह के फल, एक कड़वा और एक मीठा, और उस पर एक अकेली बेल जो उसी पेड़ के सहारे रहती है। और छठे में वेद वह काम करते हैं जिसकी उनसे कोई उम्मीद नहीं करता। जो ब्रह्म को अजन्मा, अद्वैत, अनुभव से ही जाने जाने वाला और मन से परे कहकर उसका ध्यान करते हैं, वे वैसा कहा करें और वैसा जाना करें; हमें तो नित्य आपका सगुण यश ही गाना है। जिस छन्द ने जय सगुन निर्गुन से शुरू किया था, वह अपने आख़िर में दोनों में से एक चुन लेता है, और चुनने वाला वही है जिसके अधिकार से निर्गुण की बात की जाती है।

और उसी छठे छन्द के अन्त में वेद एक वर माँगते हैं। करुणा के धाम, सद्गुणों की खान, हे देव, यह वर माँगते हैं कि मन, वचन और कर्म से विकारों को छोड़कर आपके चरणों में प्रेम करें। यहाँ रुककर सुबह की एक पंक्ति याद कीजिये। इसी दरबार में, कुछ ही देर पहले, सब याचकों को अयाचक बना दिया गया था। उसके बाद माँगने वाला कोई नहीं बचना चाहिये था। जो बचे, वे वेद हैं, और उनकी माँग में देने-लेने लायक़ एक भी चीज़ नहीं है।

सब के देखत बेदन्ह बिनती कीन्हि उदार।
अंतरधान भए पुनि गए ब्रह्म आगार॥ १३ (क)॥
बैनतेय सुनु संभु तब आए जहँ रघुबीर।
बिनय करत गदगद गिरा पूरित पुलक सरीर॥ १३ (ख)॥

दोहा १३

पहला टुकड़ा दो बातें बताता है और दोनों साथ रखकर पढ़िये। विनती सबके देखते हुई, और फिर वे अन्तर्धान होकर ब्रह्मलोक चले गये। सबके देखते: यानी दरबार ने उन्हें खड़े देखा, गाते सुना, और तब भी नहीं जाना कि ये कौन हैं। भेद तभी खुलता है जब वे हवा में घुल जाते हैं, और उस वक़्त बताने के लिये वहाँ कोई बचा नहीं। दूसरा टुकड़ा उसी साँस में अगला मेहमान ले आता है, और यहाँ कथा दूसरी बार सुनने वाले को पुकारती है। हे बैनतेय, सुनिये: तब शंकर वहाँ आये जहाँ रघुवीर थे।

सार: देवता स्तुति करके लौट जाते हैं, और चारों वेद भाटों का भेस बाँधकर दरबार में आते हैं। श्रीराम उन्हें पहचानकर बहुत आदर देते हैं पर भेद किसी पर नहीं खोलते। वेद छः छन्दों की स्तुति करते हैं, सगुण और निर्गुण दोनों को नमस्कार करके अन्त में सगुण यश गाने का पक्ष चुनते हैं, चरणों में प्रेम का वर माँगते हैं, और सबके देखते अन्तर्धान होकर ब्रह्मलोक लौट जाते हैं।

शंकर की बारी

शंकर इस पन्ने पर पहले भी आ चुके हैं। दोहा ग्यारह में, ब्रह्मा और मुनियों के साथ, विमानों की भीड़ में एक नाम। तब वे देखने आये थे। अब वे बोलने आये हैं, और उनके आने का ब्योरा तुलसी दो टुकड़ों में देते हैं: गदगद गिरा और पूरित पुलक सरीर। आवाज़ भरी हुई, देह रोमांच से भरी हुई। जो बोलने जा रहा है, वह बोलने से पहले काँप रहा है। और जो आगे आता है वह इस प्रसंग की सबसे लम्बी चीज़ है, दस छन्द, जिनमें दरबार का कोई ब्योरा नहीं है।

जय राम रमारमनं समनं। भवताप भयाकुल पाहि जनं॥
अवधेस सुरेस रमेस बिभो । सरनागत मागत पाहि प्रभो॥

छन्द

पहली ही पुकार में शंकर अपनी जगह तय कर लेते हैं। जय राम, रमारमण, भव के ताप का नाश करने वाले; आवागमन के भय से व्याकुल इस जन की रक्षा कीजिये। फिर दूसरी पंक्ति, और उसमें नामों की एक क़तार है: अवधेस, सुरेस, रमेस, विभो। इस क़तार में पहला नाम अवधेस है, अवध का स्वामी। सुरेस और रमेस बाद में आते हैं। जो आज ही इस नगर की गद्दी पर बैठा है, उसे देवताओं का स्वामी और लक्ष्मी का पति कहने से पहले उसी गद्दी के नाम से पुकारा जाता है। और इस पूरी क़तार के बाद जो माँगा जाता है वह एक ही शब्द है: रक्षा कीजिये।

इसके बाद जो नौ छन्द चलते हैं, उनमें एक ही रूपक बार-बार लौटता है, और वह रोग का है। दूसरे छन्द में रावण का विनाश पृथ्वी के महान रोगों को दूर करना कहा जाता है, और राक्षसों का समूह पतंगे बताया जाता है जो बाणरूपी आग के प्रचण्ड तेज में जल गये। पाँचवें में लोग बहुत से रोगों और वियोगों से मारे हुए बताये जाते हैं, और कारण साफ़ लिखा है: ये सब चरणों के निरादर के फल हैं। और नवें में श्रीराम स्वयं दवा हो जाते हैं, भव रोग महागद, जन्म-मरण रूपी रोग की महान औषध। लंका में जो हुआ, शंकर उसे इसी एक इलाज का बाहरी हिस्सा बनाकर रख देते हैं।

बीच के छन्द उसी रोग को भीतर ले आते हैं। तीसरे में मद, मोह और महा ममता की रात है, उसका अन्धकार है, और उसके सामने श्रीराम सूर्य के तेज की किरण-सेना हैं। चौथे में कामदेव भील बनकर खड़ा है, मनुष्य हिरन हैं, और कुभोग के बाण सीधे हृदय में लगते हैं; शंकर कहते हैं कि उसे मारकर विषय के वन में भूले पड़े इन अनाथों की रक्षा कीजिये। यही वह कामदेव है जो इस प्रसंग में एक बार पहले भी आ चुका है, स्नान के तुरन्त बाद, जब सैकड़ों कामदेव श्रीराम के अंगों को देखकर लजा गये थे। पहली बार वह अपने आप हार गया था। दूसरी बार उसे मार डालने की प्रार्थना की जा रही है, और प्रार्थना करने वाले शंकर हैं।

छठे से आठवें छन्द तक शंकर उन लोगों का चित्र खींचते हैं जिन तक यह इलाज पहुँच चुका है। जिन्हें चरणकमलों में प्रीति नहीं, वे नित्य अत्यन्त दीन, मलिन और दुःखी रहते हैं; और जिन्हें आपकी कथा का सहारा है, उन्हें संत और अनन्त सदा प्रिय लगने लगते हैं। उनमें न राग है, न लोभ, न मान, न मद, और उनके लिये वैभव और विपदा बराबर हैं। और यहीं शंकर एक बहुत बड़ी बात बहुत छोटी जगह में कह देते हैं: इसीलिये मुनि लोग योग का भरोसा सदा के लिये छोड़ देते हैं और प्रसन्नता के साथ आपके सेवक बन जाते हैं। योग छोड़ देने की सलाह किसके मुँह से आ रही है, इस पर एक क्षण ठहरना चाहिये। आठवें में वे संत पृथ्वी पर घूमते दिखते हैं, निरादर और आदर को एक बराबर मानकर, और सुखी।

दसवाँ छन्द छोटा है, और उसमें शंकर नीचे उतर आते हैं। गुण, शील और कृपा के परम स्थान, श्रीरमण, आपको निरन्तर प्रणाम; हे रघुनन्दन, द्वन्द्वों के इस घने बादल को नष्ट कीजिये; और फिर आख़िरी पुकार, जो पूरे दस छन्दों में सबसे नीची जगह से आती है: हे महिपाल, इस दीनजन की ओर भी देखिये। महिपाल, यानी पृथ्वी की पालना करने वाला, राजा। जो आज ही सिंहासन पर बैठा है, उसे ठीक उसी दिन के नाम से पुकारा जा रहा है, और पुकारने वाला अपने को दीनजन कह रहा है।

बार बार बर मागउँ हरषि देहु श्रीरंग।
पद सरोज अनपायनी भगति सदा सतसंग॥ १४ (क)॥

दोहा १४ (क)

बार-बार वर माँगता हूँ, और माँग यह है: चरणकमलों की वह भक्ति जो कभी न छूटे, और सदा सत्संग। अनपायनी, यानी जो अपाय न जाने, जो गिरे नहीं। यह इस पन्ने पर तीसरी माँग है। पहली वेदों की थी, चरणों में प्रेम की, और बाक़ी दोनों शंकर की हैं, एक रक्षा की और एक भक्ति तथा सत्संग की। तीनों में से किसी ने ऐसा कुछ नहीं माँगा जो हाथ से दिया और हाथ में लिया जा सके। और यह सब उसी दरबार में हो रहा है जहाँ सुबह हर याचक को अयाचक बना दिया गया था। जिनके पास कमी थी, उनकी कमी सुबह ख़त्म कर दी गयी। जिनके पास कोई कमी नहीं थी, वे शाम तक हाथ फैलाये खड़े हैं।

दोहे का दूसरा टुकड़ा दो काम एक साथ कर देता है, और उन दोनों का एक साथ होना ही उसकी ख़ूबी है। उमापति श्रीराम के गुण बखानकर हर्षित होकर कैलास चले गये, और तब प्रभु ने वानरों को सब प्रकार से सुख देने वाले डेरे दिलवाये। एक ही साँस में देवता की विदा और वानरों की रिहाइश। जिस दरबार से अभी-अभी वेद और शंकर गये हैं, उसी दरबार का अगला काम यह देखना है कि मेहमान रात कहाँ काटेंगे। और यही इस दिन की शुरुआत भी थी। पहला वाक्य भी मेहमानों के बारे में था, कि पहले सखाओं को नहलाओ।

सार: शंकर गद्गद वाणी और पुलकित शरीर से दस छन्दों की स्तुति करते हैं, जिसमें रावण का वध पृथ्वी का रोग मिटाना है, मद-मोह-ममता की रात है, कामदेव भील है, और श्रीराम स्वयं भव-रोग की महान औषध हैं। अन्त में वे अपने को दीनजन कहकर अनपायनी भक्ति और सत्संग माँगते हैं, कैलास लौट जाते हैं, और उसी दोहे में प्रभु वानरों के लिये डेरे दिलवाते हैं।

छः महीने, बिना गिने

अब कथा अपनी ओर मुड़ती है, और तीसरी बार सुनने वाले को पुकारती है। हे खगपति, सुनिये: यह कथा पवित्र करने वाली है, तीनों तापों और भव के भय का नाश करने वाली, और महाराज के शुभ अभिषेक को सुनकर मनुष्य वैराग्य और विवेक पाते हैं। फिर काकभुशुण्डि एक बँटवारा करते हैं जो बहुत सीधा है और बहुत उदार। जो सकाम भाव से सुनते या गाते हैं, वे नाना प्रकार के सुख और सम्पत्ति पाते हैं, जगत में देवताओं को भी दुर्लभ सुख भोगते हैं, और अन्तकाल में रघुनाथ के पुर जाते हैं।

इसके बाद सुनने वालों के तीन दर्जे गिनाये जाते हैं और तीनों को अलग-अलग फल मिलता है। जीवन्मुक्त, विरक्त और विषयी सुनते हैं, और क्रमशः भक्ति, गति और नयी सम्पत्ति पाते हैं। ध्यान दीजिये कि विषयी को यहाँ बाहर नहीं किया गया। उसे भी कुछ मिलता है, और जो मिलता है वह ठीक वही है जो वह चाहता था। यह कथा किसी को दरवाज़े से लौटाती नहीं, और किसी से यह नहीं पूछती कि आप किस इरादे से आये हैं। और इसके तुरन्त बाद कहने वाला अपने ऊपर एक शर्त लगा देता है: स्वमति बिलास, मैंने अपनी बुद्धि की पहुँच के अनुसार रामकथा कही है। जो अभी-अभी इतने बड़े फल गिना रहा था, वह अपने कहने को अपनी बुद्धि का खेल बता रहा है।

फिर एक उपमा आती है जो इस काण्ड की सबसे काम की उपमा है। यह कथा वैराग्य, विवेक और भक्ति को दृढ़ करने वाली है, और मोह रूपी नदी के लिये सुन्दर नाव है। नाव के तुरन्त बाद कथा वापस अवध में उतर आती है, और उतरते ही जो दिखता है वह कोई नया दृश्य नहीं है, वही पुराना दृश्य रोज़ का बन चुका है। कौसलपुरी में नित नये मंगल होते हैं, सब वर्गों के लोग हर्षित रहते हैं, श्रीराम के चरणकमलों में सबकी प्रीति नित नयी है, उन चरणों में जिन्हें शिव, मुनिगण और ब्रह्मा भी नमस्कार करते हैं, और भिखारियों को बहुत प्रकार के वस्त्राभूषण पहनाये जाते हैं तथा ब्राह्मणों को नाना प्रकार के दान मिलते हैं।

दान दुबारा हुआ, और यही इस टुकड़े की असली ख़बर है। अभिषेक के दिन जो एक बार हुआ था और जिसने सब याचकों को अयाचक बना दिया था, वह अब रोज़ का काम है। जिस घर में माँगने वालों को माँगने से छुड़ा दिया जाता है, उस घर में देना एक दिन का समारोह नहीं रह जाता, वह घर का नियम बन जाता है। और फिर वह दोहा आता है जिस पर यह प्रसंग ख़त्म होता है, और वह अयोध्या के बारे में नहीं है। वह उन लोगों के बारे में है जो अभी तक मेहमान हैं।

ब्रह्मानंद मगन कपि सब कें प्रभु पद प्रीति।
जात न जाने दिवस तिन्ह गए मास षट बीति॥ १५॥

दोहा १५

ब्रह्मानन्द में मग्न। यह शब्द उन लोगों का है जो निर्गुण की बात करते हैं, और तुलसी इसे वानरों पर लगा देते हैं, उन्हीं वानरों पर जिनका पूरा सम्बन्ध इस घर से प्रभु के चरणों की प्रीति भर है। वेदों ने थोड़ी देर पहले कहा था कि ध्यान वाले चाहे जो कहें, हमें तो सगुण यश गाना है। शंकर ने कहा था कि मुनि योग का भरोसा छोड़कर सेवक बन जाते हैं। और दोहा पंद्रह में ब्रह्मानन्द उन लोगों के हिस्से में आ गया जिन्होंने न ध्यान किया, न योग किया, बस साथ रह गये। दिन जाते हुए जाने ही नहीं, और छः महीने बीत गये।

सार: काकभुशुण्डि कथा का फल गिनाते हैं, सकाम को सुख-सम्पत्ति और अन्त में रघुनाथ का पुर, तथा जीवन्मुक्त, विरक्त और विषयी को क्रमशः भक्ति, गति और नयी सम्पत्ति। फिर वे अपने कहे को अपनी बुद्धि का विलास बताते हैं। अवध में नित नये मंगल हैं, दान रोज़ का काम है, और वानर प्रभु के चरणों की प्रीति में ऐसे डूबे हैं कि छः महीने बिना गिने बीत जाते हैं।

और अन्त में, अपनी ओर

इस पूरे प्रसंग में दशरथ का नाम एक बार भी नहीं आता। जिस सिंहासन पर आज तिलक हो रहा है, वह जिनका था, उनका यहाँ कोई ज़िक्र नहीं है। माताएँ हैं, और बहुत हैं, पर किसी माता का नाम नहीं है। वे महतारी हैं, मातु सब हैं, और जानकी के लिये सासुन्ह हैं। तुलसी ने इस दिन से पीछे मुड़कर देखने का एक भी रास्ता नहीं छोड़ा। जो हुआ था, उसका हिसाब इस पन्ने पर नहीं है। यहाँ सिर्फ़ यह है कि बाल खुल गये, तिलक हो गया, और मेहमानों के डेरे लग गये।

और अगर इस पन्ने की बनावट को एक बात में बाँधना हो, तो वह बात माँगने के बारे में होगी। सुबह के दान में सब याचक अयाचक कर दिये गये, यानी माँगना ख़त्म। उसके बाद जितने लोग इस दरबार में आते हैं, वे कुछ न कुछ माँगते ही हैं। वेद चरणों में प्रेम माँगते हैं। शंकर पहले रक्षा माँगते हैं और फिर बार-बार भक्ति और सत्संग। यह उलटफेर तुलसी कहीं समझाते नहीं। वे बस दोनों दृश्य एक ही सिलसिले में, कुछ ही दोहों की दूरी पर रख देते हैं, और छोड़ देते हैं कि पढ़ने वाला उन्हें आमने-सामने रखकर देखे।

और जो एक पंक्ति इस प्रसंग से साथ जाती है, वह शायद वह नहीं है जो सबसे ऊँचे सुर में कही गयी है। सौ करोड़ शेष जिसे नहीं गा सकते, वह दिव्य सिंहासन नहीं है, सात राजचिह्न नहीं हैं, आकाश भर के नगाड़े नहीं हैं। वह भरत का भाग्य है और प्रभु की कोमलता, यानी एक आदमी का अपने भाई के उलझे बालों पर हाथ फेरना। और उन्हीं शेष को कुछ ही देर बाद तुलसी उन गाने वालों में गिन देते हैं जो इस दरबार की शोभा लगातार बखानते रहते हैं। शोभा बखानी जा सकती है। वह हाथ नहीं बखाना जा सकता।

राज्याभिषेक का यह प्रसंग दोहा ग्यारह से शुरू होकर दोहा पंद्रह पर ख़त्म होता है, और इसमें वह सब है जिसकी एक राजगद्दी से उम्मीद की जाती है: दिव्य सिंहासन, वेदमन्त्र, तिलक, दान, नगाड़े, विमान और आकाश से गिरते फूल। पर तुलसी इसे शुरू भी एक सेवा से करते हैं और ख़त्म भी एक सेवा से। शुरू में सखाओं का स्नान, अन्त में वानरों के डेरे, और बीच में वह सब जिसे कहते नहीं बनता। बड़े दृश्य को तुलसी ने दोनों सिरों पर छोटे कामों से बाँध रखा है, और वही बँधन इस पन्ने को हल्का नहीं होने देता।

छः महीने बीत गये और किसी ने दिन गिने नहीं। यह वाक्य उन वानरों के बारे में है जो अभी-अभी लड़ाई से आये हैं, जिनके घर कहीं और हैं, और जिन्हें एक दिन लौटना है। उस लौटने को तुलसी इस पन्ने पर नहीं लाते। वे पन्ना ठीक वहीं बन्द कर देते हैं जहाँ समय का किसी को पता ही नहीं चल रहा, जहाँ दिन गिने नहीं जा रहे, और जहाँ ब्रह्मानन्द उन लोगों के पास है जो सिर्फ़ साथ रह गये थे।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, उत्तरकाण्ड, दोहा ११ से १५, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।

English