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राज्याभिषेक, और बंदी के भेस में आये वेद

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रामचरितमानसउत्तरकाण्डप्रसंग 3

जिस दिन अयोध्या का सिंहासन भरता है, उस दिन राम पूरे प्रसंग में एक ही वाक्य बोलते हैं। वह यह है: “पहले मेरे सखाओं को नहलाइये।” बाक़ी सारा बोलना उस दिन स्तुति है: देवताओं की, भाटों का भेस बाँधकर आये हुए चारों वेदों की, और अन्त में शिव की। वे लम्बी स्तुति गाकर अपने को दीनजन कहते हैं।

इस प्रसंग में राम एक ही बार बोलते हैं, एक ही वाक्य, और उसका विषय राजगद्दी नहीं है। वे सेवकों को बुलाकर कहते हैं, “जाकर पहले मेरे सखाओं को स्नान कराइये।” इसके बाद राज्याभिषेक के पूरे दिन उनका कोई बोल नहीं है। जो कुछ बोला जाता है, वह उन्हीं के सामने, उन्हीं के लिये कहा गया स्तवन है: देवताओं का, फिर भाटों का भेस बाँधकर आये चारों वेदों का। और अन्त में शिव का। अवधपुरी सज चुकी है, आकाश से फूल बरस रहे हैं, और दिन का पहला काम यह है कि सुग्रीव और उनके साथी नहलाये जायँ।

इस दिन सबसे पहले जो चीज़ खोली जाती है, वह जटा है: भरत की जटा, और खोलने वाले हाथ राम के अपने। राम ने अपने हाथ से उलझी लटें सुलझायीं। वहीं कथा कहती है कि भरत के इस भाग्य को और राम की इस कोमलता को सौ करोड़ शेष भी नहीं गा सकते। तिलक अभी दूर है, सिंहासन अभी मँगाया भी नहीं गया। पहले बाल खुलते हैं, और वे भी अपने नहीं, भाई के।

यह तुलसीदास का रामचरितमानस है, और इस प्रसंग में कथा काकभुशुण्डि गरुड़ को सुना रहे हैं। बीच-बीच में कथा रुककर सुनने वाले को पुकारती है, कभी पक्षिराज, कभी गरुड़, कभी खगपति कहकर। ये पुकारें उन्हीं मोड़ों पर आती हैं जहाँ दृश्य सँभाले नहीं सँभलता: जब देवता विमान लेकर उतरते हैं, जब शोभा कहने से बाहर हो जाती है। जब शिव आते हैं, और जब कथा अपना फल गिनाने बैठती है। कथा की यह छोटी दूरी अयोध्या के एक बहुत भरे हुए दिन की है, और उसके भीतर छः महीने बीत जाते हैं।

अभिषेक के दरबार में कौन

  • राम अपने तिलक के दिन एक ही बार बोलते हैं, और जो कहते हैं वह अपने बारे में नहीं है।
  • सीता इस प्रसंग में मानस उनका नाम सीता एक बार भी नहीं लेता। वह उन्हें जानकी, रमा, जनकसुता, श्री और, वेदों के प्रणाम में, शक्ति कहता है।
  • भरत जिनकी जटा राम अपने हाथों सुलझाते हैं, और जिनके भाग्य को सौ करोड़ शेष भी नहीं गा पाते।
  • वसिष्ठ राम को देखकर सिंहासन मँगवाते हैं, पहला तिलक करते हैं, और फिर बाक़ी ब्राह्मणों को आज्ञा देते हैं।
  • चारों वेद भाटों का भेस बाँधकर दरबार में आते हैं, स्तुति करते हैं, और सबके देखते-देखते अन्तर्धान होकर ब्रह्मलोक लौट जाते हैं।
  • शिव पहले विमानों की भीड़ में एक नाम, फिर अकेले आकर लम्बी स्तुति, और उसके अन्त में अपने लिये दीनजन शब्द।
  • काकभुशुण्डि और गरुड़ कहने वाला और सुनने वाला। यह प्रसंग इन्हीं दोनों के बीच चल रहा है।

पहले सखा, फिर भरत, फिर सब, फिर अपने

दिन की शुरुआत सजावट से होती है। अवधपुरी बहुत सुन्दर बना दी गयी है, और ऊपर से देवता फूल बरसा रहे हैं, इतने कि झड़ी लग गयी है। देवता अभी आये नहीं हैं। वे बाद में विमानों पर चढ़कर उतरेंगे। अभी वे दूर से, बिना दिखे फूल डाल रहे हैं। और इसी झड़ी के नीचे राम इस पूरे प्रसंग का अपना इकलौता वाक्य बोलते हैं। वे सेवकों को बुलाकर कहते हैं, “जाकर प्रथम मेरे सखाओं को नहलाइये।”

प्रथम, यानी सबसे पहले। यह शब्द इस प्रसंग में दो बार आता है, और दोनों बार तय करता है कि नम्बर किसका है। यहाँ पहला नम्बर सखाओं का है। जिस घर में आज राजा बैठने वाला है, उसमें पहला हुक्म मेहमानों को नहलाने का है, और मेहमान वे हैं जो लड़ाई से लौटे हैं। आदेश में सिंहासन का एक भी शब्द नहीं। राजा बनने से पहले का काम मेज़बानी का है।

वचन सुनते ही सेवक जहाँ-तहाँ दौड़ पड़े और सुग्रीव आदि को तुरन्त नहला दिया। फिर अगली बात आदेश की नहीं है। राम ने भरत को बुलाया, और अपने हाथ से उनकी जटा सुलझायी। सखाओं के लिये सेवक बुलाये गये थे। भरत के बालों के लिये कोई सेवक नहीं बुलाया गया। आदेश दूसरों के लिये था, भरत के लिये हाथ था।

कथा इसी दृश्य पर टिकी रहती है। राम ने तीनों भाइयों को स्नान कराया, और फिर यह बात: भरत का भाग्य और राम की कोमलता, इन दोनों को सौ करोड़ शेष भी नहीं गा सकते। शेष का नाम इस प्रसंग में थोड़ी ही देर बाद एक बार और आयेगा, और वहाँ वे गा रहे होंगे।

इसके बाद राम अपनी जटा खोलते हैं, गुरु की आज्ञा माँगते हैं, और तब नहाते हैं। तरतीब पूरी हो गयी: पहले सखा, फिर भरत, फिर तीनों भाई, और अन्त में वे स्वयं, वह भी गुरु की आज्ञा लेकर। जिसके लिये आज सारा नगर सजा है, वह उस नगर में नहाने वाला आख़िरी आदमी है। स्नान के बाद आभूषण पहने जाते हैं, और कथा कहती है कि उन अंगों को देखकर सैकड़ों कामदेव लजा गये। कामदेव का दूसरा ज़िक्र बहुत बाद में शिव की स्तुति में आयेगा, और वहाँ शिव उसी कामदेव को मार डालने की प्रार्थना करेंगे।

सासुओं ने, और बायीं ओर

इधर जो हो रहा था, उसमें सबसे पहले सासें आती हैं। सीता को नहलाने वाली उनकी सासें हैं, आदर के साथ, और तुरन्त। दिव्य वस्त्र और श्रेष्ठ आभूषण अंग-अंग में सजा दिये जाते हैं। जो हाथ भरत के बालों पर थे, वे यहाँ नहीं हैं। यहाँ सासों के हाथ हैं, और दोनों जगह वही जल्दी है।

फिर सीता अपनी जगह पर आ जाती हैं: राम के बायें, रूप और गुणों की खान, जिन्हें कथा यहाँ रमा कहती है। इस प्रसंग में उनके लिये मानस का शब्द जगह के साथ बदलता है: सासों के हाथ में वे जानकी हैं, सिंहासन के बायें रमा। और जो माताएँ थोड़ी देर बाद आरती उतारने वाली हैं, वे यहीं हर्षित हो चुकी हैं, अपना जन्म सफल जानकर।

अब पहली बार कथा रुककर सुनने वाले को पुकारती है। काकभुशुण्डि कहते हैं, “पक्षिराज, सुनिये।” उस समय ब्रह्मा, शिव, मुनियों के समूह, और विमानों पर चढ़े सब देवता राम के दर्शन करने आये। जो फूल पहले से बरस रहे थे, उन्हें भेजने वाले अब स्वयं उतर आये हैं। शिव यहाँ गिनती के एक नाम की तरह आते हैं, ब्रह्मा और मुनियों के बीच, बिना कुछ कहे। उनकी अपनी बारी बाद में आयेगी, और तब वे अकेले होंगे और देर तक बोलेंगे।

सिंहासन, तिलक, और जो माँगने वाले नहीं बचे

अब सिंहासन आता है, और उसे मँगाने वाला राजा नहीं है। राम को देखकर वसिष्ठ के मन में प्रेम भर आया। उन्होंने तुरन्त दिव्य सिंहासन मँगवाया, जिसका तेज सूर्य के समान है और जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता। उस पर बैठने से पहले एक काम और होता है: राम ब्राह्मणों को सिर नवाते हैं, और तब बैठते हैं। गद्दी पर चढ़ने का आख़िरी क़दम झुकना है।

सीता सहित राम को देखकर मुनियों का समुदाय हर्ष से भर जाता है। ब्राह्मण वेदमन्त्र उच्चारते हैं, और आकाश में देवता और मुनि जय-जयकार करने लगते हैं। वेद इस समय मन्त्र के रूप में बोले जा रहे हैं, ब्राह्मणों के मुँह से, बिना देह के। थोड़ी देर में वे अपने पैरों पर, अपने चुने हुए भेस में, इसी जगह आकर खड़े होंगे। इसके तुरन्त बाद तिलक होता है, और तिलक ही इस राज्याभिषेक की असली क्रिया है।

प्रथम तिलक वसिष्ठ मुनि ने किया। वही शब्द फिर आया, और फिर उसने नम्बर तय किया। पहला तिलक गुरु का, और उसके तुरन्त बाद गुरु ने सब ब्राह्मणों को आज्ञा दी कि वे भी करें। तिलक एक नहीं, अनेक हुए। पहला होने का अर्थ अकेला होना नहीं निकला। उसी क्षण माताएँ बेटे को सिंहासन पर देखती हैं और बार-बार आरती उतारती हैं। इस दरबार में हर शुभ काम दोहराया जा रहा है, जैसे किसी को यक़ीन न आ रहा हो कि यह दिन सचमुच आ गया।

फिर दान। ब्राह्मणों को अनेक प्रकार के दान दिये गये। साथ ही वह बात आती है जिस पर यह दरबार टिका है: सब माँगने वालों को न माँगने वाला बना दिया। इसके बाद ही देवता नगाड़े बजाते हैं, जब तीनों लोकों के स्वामी को अयोध्या के सिंहासन पर बैठा देख लेते हैं। दान पहले, बाजा बाद में। आकाश तब बजता है जब ज़मीन का लेन-देन पूरा हो चुका होता है।

वह शोभा जो कही नहीं जाती

अब दृश्य चौड़ा होता है। आकाश में ढेरों नगाड़े, गन्धर्व और किन्नर गाते हुए, अप्सराओं के झुंड नाचते हुए, देवता और मुनि परमानन्द पाते हुए। फिर नज़र सिंहासन के क़रीब उतरती है। कथा गिनती है कि कौन क्या पकड़े खड़ा है: भरत और बाक़ी छोटे भाई, विभीषण, अंगद, हनुमान और उनके साथी। उनके हाथों में छत्र, चँवर, पंखा, धनुष, तलवार, ढाल और शक्ति।

इस सूची में किसी नाम के साथ कोई चीज़ जोड़ी नहीं गयी। पहले सारे नाम एक साथ आते हैं, फिर सातों चीज़ें। टीका उन्हें क्रमशः बिठा देती है, आदि शब्द में सुग्रीव को गिनकर, सात हाथों के लिये सात चीज़ें। कथा में बँधा केवल यह है कि सूची भरत से शुरू होती है और हनुमान पर आकर आदि कहकर छोड़ दी जाती है।

फिर कथा राम का रूप सिर से पैर तक देती है। उसे छोटा करके कहें तो: सीता के साथ बैठे राम, नये मेघ जैसा साँवला शरीर, पीताम्बर, मुकुट और बाजूबंद, कमल जैसे नेत्र, चौड़ी छाती, लंबी भुजाएँ। और अन्त में एक वाक्य जो दृश्य से निकलकर सुनने वाले की ओर मुड़ जाता है: धन्य हैं वे मनुष्य जो इन्हें देखते हैं।

और इसके ठीक बाद काकभुशुण्डि हार मान लेते हैं: “पक्षिराज, वह शोभा, वह समाज और वह सुख मुझसे कहते नहीं बनता।” अभी-अभी वे नगाड़े, गन्धर्व, अप्सराएँ, सात राजचिह्न और नख से शिख तक का रूप गिना चुके हैं। सब गिनाकर कहते हैं कि गिनाया नहीं जा सका। पर रुकते-रुकते वे यह बता जाते हैं कि जो वे नहीं कह सके, उसे कौन कह सकता है।

उनके इस उत्तर में चार नाम हैं: सरस्वती, शेष, वेद और महेश। पहले तीन बखानते हैं, चौथा रस जानता है। दिन के आरम्भ में भरत के भाग्य और राम की कोमलता के आगे सौ करोड़ शेष भी नहीं गा पाते थे। वही शेष यहाँ सिंहासन की शोभा लगातार गा रहे हैं। सिंहासन की शोभा शेष के बस की है। भाई के उलझे बालों में फिरती उँगलियाँ नहीं थीं। एक ही नाम दो जगह आता है, एक जगह असमर्थ और दूसरी जगह समर्थ।

इस बात की दूसरी परत थोड़ा आगे खुलती है। इन चार नामों में से दो थोड़ी ही देर में सचमुच चलकर इसी दरबार में आते हैं और बोलते हैं: वेद और शिव। सरस्वती और शेष नहीं आते। इसका संकेत इसी बात में है: उनके लिये कथा वर्तमान काल रखती है, वे तो बखान ही रहे हैं, बिना आये, बिना रुके।

बंदी के भेस में

भीड़ अब छँटती है। सब देवता अलग-अलग स्तुति करके अपने-अपने लोक लौट जाते हैं। और तभी, उसी ख़ाली हुई जगह पर, चारों वेद वहाँ आते हैं जहाँ राम हैं, और अपने रूप में नहीं आते। वे बंदी का भेस बाँधकर आते हैं, यानी भाट का, जो दरबार में खड़ा होकर राजा की बिरुदावली गाता है। जिनके मन्त्र थोड़ी देर पहले इसी दरबार में पढ़े गये थे, वे अब ख़ुद चलकर, किसी और के भेस में आये हैं।

यहाँ तीन बातें साथ बँधी हैं। सर्वज्ञ राम ने उनका बहुत आदर किया। टीका कहती है, पहचानकर। किसी ने कुछ भी भेद नहीं जाना। और वेद गुणगान करने लगे, यानी भेस टूटा नहीं। जिस दरबार में तिलक, दान और आरती सब खुले में हो रहे हैं, वहाँ एक चीज़ ढकी रह जाती है। उसे ढका रखने में स्वयं राजा शामिल है। वे भेद खोलते नहीं, केवल आदर बढ़ा देते हैं, और दरबार को उसका कारण नहीं बताया जाता।

स्तुति वहीं से शुरू होती है जहाँ से वेद ही शुरू कर सकते हैं। पहला शब्द जय है। उसके तुरन्त बाद दो शब्द आते हैं जो आपस में लड़ते हुए माने जाते हैं, सगुण और निर्गुण। यहाँ वे एक ही पुकार में बैठा दिये गये हैं।

यह स्तुति चार बातें एक के बाद एक कहती है। पहले रूप: सगुण और निर्गुण, अनुपम रूप, राजाओं के शिरोमणि। फिर काम: रावण आदि प्रचण्ड, प्रबल और दुष्ट निशाचर भुजाओं के बल से मारे गये। फिर कारण: मनुष्य का अवतार लेकर संसार का भार तोड़ा और कठोर दुःख भस्म किये। और अन्त में प्रणाम, जिसमें एक शब्द पूरे दिन को बाँध देता है: शक्ति। वेद कहते हैं, “हम शक्ति सहित आपको नमस्कार करते हैं,” और टीका शक्ति का अर्थ सीता बताती है। सिंहासन पर दो लोग बैठे हैं, और नमस्कार भी दो को हो रहा है।

वेदों की यह स्तुति आगे भी चलती है। फिर वेद राम की माया की बात करते हैं। उसके वश में देवता, राक्षस, नाग, मनुष्य और चर-अचर सब काल, कर्म और गुणों से भरे दिन-रात भव के रास्ते भटक रहे हैं। और जिन्हें राम ने करुणा करके देख लिया, वे तीनों प्रकार के दुःखों से छूट गये। फिर: जो ज्ञान के अभिमान में भक्ति का आदर नहीं करते, वे देवताओं को भी दुर्लभ पद पाकर वहाँ से गिरते देखे जाते हैं। और जो सब आशा छोड़कर दास बने रहते हैं, वे केवल नाम जपकर बिना परिश्रम भवसागर तर जाते हैं।

फिर वेद चरणों तक उतर आते हैं, और उनका ब्योरा दो हिस्सों में है। एक हिस्सा महिमा का है: वही चरण जो शिव और ब्रह्मा के पूज्य हैं, जिनकी रज छूकर गौतम ऋषि की पत्नी अहल्या तर गयीं। उनके नख से तीनों लोकों को पवित्र करने वाली गंगा निकलीं, और उनमें ध्वजा, वज्र, अंकुश और कमल के चिह्न हैं। दूसरा हिस्सा उसके साथ ही है: वन में फिरते हुए काँटे चुभने से उन्हीं चरणों में घट्ठे पड़ गये हैं। एक ही साँस में वज्र का चिह्न और काँटे का निशान, और वेद दोनों को अलग नहीं करते।

फिर वेद संसार को एक पेड़ बनाकर खड़ा करते हैं। उसका ब्योरा गिनती का है: जड़ अव्यक्त, पेड़ अनादि, चार त्वचाएँ, छः तने, पचीस शाखाएँ, अनगिनत पत्ते, घने फूल। दो तरह के फल, एक कड़वा और एक मीठा, और उस पर एक अकेली बेल जो उसी के सहारे रहती है। वेद ऐसे संसार-वृक्ष के रूप में राम को नमस्कार करते हैं। और अन्त में वेद कहते हैं। “जो ब्रह्म को अजन्मा, अद्वैत, केवल अनुभव से जानने योग्य और मन से परे कहकर उसका ध्यान करते हैं, वे वैसा कहा करें और जाना करें। नाथ, हम तो नित्य आपका सगुण यश ही गाते हैं।” जिस स्तुति ने सगुण और निर्गुण की जय से शुरू किया था, वह अपने आख़िर में दोनों में से एक चुन लेती है, और चुनने वाले स्वयं वेद हैं।

स्तुति के अन्त में वेद एक वर माँगते हैं: “हम यह वर माँगते हैं कि मन, वचन और कर्म से विकारों को छोड़कर आपके चरणों में प्रेम करें।” इसी दरबार में कुछ ही देर पहले सब याचकों को अयाचक बना दिया गया था। उसके बाद माँगने वाला कोई नहीं बचना चाहिये था। जो बचे, वे वेद हैं, और उनकी माँग में देने-लेने लायक़ एक भी चीज़ नहीं।

फिर दो बातें होती हैं। विनती सबके देखते हुई, और फिर वेद अन्तर्धान होकर ब्रह्मलोक चले गये। सबके देखते: दरबार ने उन्हें खड़े देखा, गाते सुना, और फिर भी नहीं जाना कि ये कौन हैं। कथा अगला मेहमान ले आती है, और फिर सुनने वाले को पुकारती है। काकभुशुण्डि कहते हैं, “गरुड़, सुनिये,” और तब शिव वहाँ आते हैं जहाँ राम हैं।

शिव की बारी

शिव इस दरबार में पहले भी आ चुके हैं: ब्रह्मा और मुनियों के साथ, विमानों की भीड़ में एक नाम। तब वे देखने आये थे। अब वे बोलने आये हैं, और उनके आने का ब्योरा दो टुकड़ों में है: आवाज़ भरी हुई, शरीर रोमांच से भरा हुआ। जो बोलने जा रहा है, वह बोलने से पहले काँप रहा है। आगे उनकी लम्बी स्तुति आती है, और उसमें दरबार का कोई ब्योरा नहीं।

पहली ही पुकार में शिव अपनी जगह तय कर लेते हैं। वे कहते हैं, “जय राम, जन्म-मरण के ताप का नाश करने वाले। आवागमन के भय से व्याकुल इस जन की रक्षा कीजिये।” फिर नामों की एक क़तार है: अवधेश, सुरेश, रमेश, विभु। इस क़तार का पहला नाम अवधेश है, अवध का स्वामी। देवताओं का स्वामी और लक्ष्मी का पति बाद में आते हैं। जो आज ही इस नगर की गद्दी पर बैठा है, उसे पहले उसी गद्दी के नाम से पुकारा जाता है। और इस क़तार के बाद जो माँगा जाता है वह एक ही बात है: “मैं शरणागत आपसे यही माँगता हूँ, मेरी रक्षा कीजिये।”

इसके बाद स्तुति में एक ही रूपक बार-बार लौटता है, और वह रोग का है। पहले दस सिर और बीस भुजाओं वाले रावण का विनाश पृथ्वी के महान रोगों को दूर करना कहा जाता है। और राक्षसों का समूह पतंगे, जो बाणरूपी आग के प्रचण्ड तेज में जल गये। फिर लोग बहुत से रोगों और वियोगों से मारे हुए बताये जाते हैं, और कारण साफ़ लिखा है: ये सब राम के चरणों के निरादर के फल हैं। और अन्त की ओर राम स्वयं दवा हो जाते हैं, जन्म-मरण रूपी रोग की महान औषध।

बीच में स्तुति उसी रोग को भीतर ले आती है। एक जगह मद, मोह और ममता की रात है, उसका अन्धकार है, और उसके सामने राम सूर्य की किरणों की सेना हैं। फिर कामदेव भील है, मनुष्य हिरन हैं, और कुभोग के बाण सीधे हृदय में लगते हैं। शिव कहते हैं, “नाथ, उसे मारकर विषय के वन में भूले पड़े इन अनाथों की रक्षा कीजिये।” यह वही कामदेव है जो स्नान के बाद राम के अंगों को देखकर सैकड़ों की गिनती में लजा गया था। पहली बार वह अपने आप हार गया था। दूसरी बार उसे मार डालने की प्रार्थना की जा रही है, और प्रार्थना करने वाले शिव हैं।

फिर शिव उन लोगों का चित्र खींचते हैं जिन तक यह इलाज पहुँच चुका है। जिन्हें राम के चरणों में प्रीति नहीं, वे नित्य बहुत दीन, मलिन और दुःखी रहते हैं। और जिन्हें राम की कथा का सहारा है, उन्हें संत और भगवान सदा प्रिय लगने लगते हैं। उनमें न राग है, न लोभ, न मान, न मद, और उनके लिये वैभव और विपदा बराबर हैं। इसीलिये, शिव कहते हैं, मुनि लोग योग का भरोसा सदा के लिये छोड़ देते हैं और प्रसन्नता से राम के सेवक बन जाते हैं। और वे संत पृथ्वी पर घूमते दिखते हैं, निरादर और आदर को बराबर मानकर, और सुखी।

स्तुति का अन्त छोटा है, और उसमें शिव नीचे उतर आते हैं। गुण, शील और कृपा के परम स्थान को निरन्तर प्रणाम करके वे कहते हैं, “द्वन्द्वों के इस घने समूह को नष्ट कीजिये। हे महिपाल, इस दीनजन की ओर भी देखिये।” महिपाल, यानी पृथ्वी की पालना करने वाला, राजा। जो आज ही सिंहासन पर बैठा है, उसे उसी दिन के नाम से पुकारा जा रहा है, और पुकारने वाले शिव अपने को दीनजन कह रहे हैं।

फिर शिव कहते हैं, “मैं बार-बार यही वर माँगता हूँ, हर्षित होकर दीजिये: आपके चरणों की वह भक्ति जो कभी न छूटे, और सदा सत्संग।” उस दिन इस दरबार में जो भी माँगने आये, उनमें से किसी ने ऐसा कुछ नहीं माँगा जो हाथ से दिया और हाथ में लिया जा सके। वेदों ने चरणों में प्रेम माँगा, और शिव ने रक्षा, फिर भक्ति और सत्संग। यह सब उसी दरबार में हो रहा है जहाँ थोड़ी देर पहले हर याचक को अयाचक बना दिया गया था। जिनके पास कमी थी, उनकी कमी ख़त्म कर दी गयी। जिनके पास कोई कमी नहीं थी, वे हाथ फैलाये खड़े हैं।

फिर दो काम एक साथ होते हैं। शिव राम के गुण बखानकर हर्षित होकर कैलास चले गये, और तब राम ने वानरों को सब प्रकार से सुख देने वाले डेरे दिलवाये। शिव की विदा और वानरों की रिहाइश, साथ-साथ। जिस दरबार से अभी वेद और शिव गये हैं, उसका अगला काम यह देखना है कि मेहमान कहाँ ठहरेंगे। और यही इस दिन की शुरुआत भी थी: पहला वाक्य भी मेहमानों के बारे में था।

छः महीने, बिना गिने

अब कथा अपनी ओर मुड़ती है, और फिर सुनने वाले को पुकारती है। काकभुशुण्डि कहते हैं, “खगपति, सुनिये: यह कथा पवित्र करने वाली है, तीनों तापों और जन्म-मृत्यु के भय का नाश करने वाली। महाराज राम के शुभ अभिषेक को सुनकर मनुष्य वैराग्य और विवेक पाते हैं।” फिर वे एक बँटवारा करते हैं जो बहुत सीधा है और बहुत उदार। जो सकाम भाव से सुनते या गाते हैं, वे नाना प्रकार के सुख और सम्पत्ति पाते हैं। वे जगत में देवताओं को भी दुर्लभ सुख भोगते हैं, और अन्तकाल में राम के धाम जाते हैं।

फिर सुनने वालों के तीन दर्जे गिनाये जाते हैं। तीनों को अलग फल मिलता है: जीवन्मुक्त, विरक्त और विषयी सुनते हैं, और क्रमशः भक्ति, गति यानी मुक्ति, और नयी सम्पत्ति पाते हैं। विषयी को यहाँ बाहर नहीं किया गया। उसे भी वही मिलता है जो वह चाहता था। यह कथा किसी को दरवाज़े से लौटाती नहीं। और इसके तुरन्त बाद काकभुशुण्डि अपने ऊपर एक शर्त लगा देते हैं: “खगपति, मैंने अपनी बुद्धि की पहुँच के अनुसार रामकथा कही है।” जो अभी इतने बड़े फल गिना रहे थे, वे अपने कहने को अपनी बुद्धि का खेल बताते हैं।

फिर एक उपमा आती है: यह कथा वैराग्य, विवेक और भक्ति को दृढ़ करने वाली है, और मोह की नदी के लिये सुन्दर नाव है। नाव के तुरन्त बाद कथा वापस अवध में उतर आती है, और वहाँ वही पुराना दृश्य रोज़ का बन चुका है। कोसलपुरी में नित नये मंगल होते हैं, सब वर्गों के लोग हर्षित रहते हैं। राम के चरणों में, जिन्हें शिव, मुनिगण और ब्रह्मा भी नमस्कार करते हैं, सबकी प्रीति नित नयी है। भिखारियों को बहुत प्रकार के वस्त्राभूषण पहनाये जाते हैं, और ब्राह्मणों को नाना प्रकार के दान मिलते हैं।

दान दुबारा हुआ, और यही इस टुकड़े की ख़बर है। अभिषेक के दिन जो एक बार हुआ था और जिसने सब याचकों को अयाचक बना दिया था, वह अब रोज़ का काम है। देना एक दिन का समारोह नहीं, घर का नियम बन गया है। और फिर वह बात आती है जिस पर यह प्रसंग ख़त्म होता है। वह अयोध्या के बारे में नहीं, उनके बारे में है जो अभी तक मेहमान हैं।

ब्रह्मानन्द में मग्न: यह शब्द उनका है जो निर्गुण की बात करते हैं। कथा इसे वानरों पर लगाती है, उन वानरों पर जिनका इस घर से सम्बन्ध राम के चरणों की प्रीति भर है। वेदों ने थोड़ी देर पहले कहा था कि ध्यान वाले चाहे जो कहें, वे तो सगुण यश गाते हैं। शिव ने कहा था कि मुनि योग का भरोसा छोड़कर सेवक बन जाते हैं। और अन्त में ब्रह्मानन्द उनके हिस्से में आ गया जो बस साथ रह गये। दिन जाते हुए जाने ही नहीं, और छः महीने बीत गये।

याचक, सेवा और उलझे बाल

इस पूरे प्रसंग में दशरथ का नाम एक बार भी नहीं आता। जिस सिंहासन पर आज तिलक हो रहा है, वह जिनका था, उनका यहाँ कोई ज़िक्र नहीं। माताएँ हैं, और बहुत हैं, पर किसी माता का नाम नहीं: वे केवल माताएँ हैं, और सीता के लिये सासें। इस दिन से पीछे मुड़कर देखने का कोई रास्ता इस प्रसंग में नहीं है। यहाँ केवल यह है कि बाल खुल गये, तिलक हो गया, और मेहमानों के डेरे लग गये।

इस प्रसंग की बनावट को एक बात में बाँधना हो, तो वह माँगने के बारे में होगी। दान में सब याचक अयाचक कर दिये गये, यानी माँगना ख़त्म। उसके बाद जितने इस दरबार में आते हैं, वे कुछ न कुछ माँगते ही हैं: वेद चरणों में प्रेम, शिव पहले रक्षा और फिर बार-बार भक्ति और सत्संग। यह उलटफेर कहीं समझाया नहीं गया। दोनों दृश्य थोड़ी ही दूरी पर रख दिये गये हैं।

जो बात इस प्रसंग से साथ जाती है, वह शायद वह नहीं जो सबसे ऊँचे सुर में कही गयी। सौ करोड़ शेष जिसे नहीं गा सकते, वह दिव्य सिंहासन नहीं, सात राजचिह्न नहीं, आकाश भर के नगाड़े नहीं। वह भरत का भाग्य है और राम की कोमलता, यानी एक भाई का दूसरे भाई के उलझे बालों पर हाथ फेरना। और उन्हीं शेष को कुछ ही देर बाद कथा उनमें गिनती है जो इस दरबार की शोभा लगातार बखानते रहते हैं। शोभा बखानी जा सकती है। वह हाथ नहीं।

राज्याभिषेक के इस प्रसंग में वह सब है जिसकी एक राजगद्दी से उम्मीद की जाती है: दिव्य सिंहासन, वेदमन्त्र, तिलक, दान, नगाड़े, विमान और आकाश से गिरते फूल। पर यह शुरू भी एक सेवा से होता है और ख़त्म भी एक सेवा से। शुरू में सखाओं का स्नान, अन्त में वानरों के डेरे, और बीच में वह सब जिसे कहते नहीं बनता।

छः महीने बीत गये और किसी ने दिन गिने नहीं। यह वाक्य उन वानरों के बारे में है जो लड़ाई से आये हैं, जिनके घर कहीं और हैं, और जिन्हें एक दिन लौटना है। वह लौटना यहाँ नहीं आता। कथा वहीं रुकती है जहाँ समय का किसी को पता नहीं चल रहा, और जहाँ ब्रह्मानन्द उनके पास है जो केवल साथ रह गये थे।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, उत्तरकाण्ड, दोहा 11 से 15, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।