रामचरितमानस · उत्तरकाण्ड · भुशुण्डि का संक्षिप्त राम-चरित
भुशुण्डि का संक्षिप्त राम-चरित
गरुड़ माँगते हैं और काग सुनाते हैं: बीस से कम चौपाइयों में पूरा रामचरितमानस, सरोवर के रूपक से अयोध्या के राज्याभिषेक तक। फिर सुननेवाला बताता है कि जिस मोह ने उसे इस आश्रम तक लाया, वह मोह उसका शत्रु नहीं था।
यह पन्ना उन पन्नों में से है जिन पर कोई घटना नहीं घटती और फिर भी सब कुछ घट जाता है। एक परम पवित्र आश्रम है, वहाँ एक काग बैठा है, और उसके सामने पक्षियों का राजा विनती करता हुआ बैठा है। राजा माँगता है, काग सुनाता है, और सुनाने में जो कुछ कहा जाता है वह राम की पूरी कथा है, जन्म से पहले के रूपक से लेकर राज्याभिषेक तक। बीस से कम चौपाइयों में। जिस ग्रन्थ को सुननेवाले सात सोपानों में पढ़ते आये हैं, वही ग्रन्थ यहाँ अपने ही भीतर, अपने ही एक पात्र के मुँह से, कुछ पंक्तियों में दोहराया जाता है।
तुलसीदास यहाँ जो कर रहे हैं वह देखने लायक है। वे अपनी ही किताब का सार अपनी ही किताब के भीतर रख रहे हैं, और रखनेवाले को उन्होंने वह पक्षी बनाया है जिसके मन में यह कथा कहते हुए परम उत्साह है। यह उत्साह तुलसी दो बार गिनाते हैं, कथा शुरू होने से पहले और पहले ही दोहे में। इसलिये यह सार किसी सूची की तरह नहीं चलता। यह उस आदमी की तरह चलता है जिसे कोई प्रिय कथा फिर से सुनाने का अवसर मिल गया हो, और जो जल्दी में इसलिये है कि उसे अगला हिस्सा याद आ रहा है और वह उसे रोक नहीं पा रहा।
और पन्ना यहीं नहीं रुकता। कथा पूरी होने पर सुननेवाला बोलता है, और जो कहता है वह इस प्रसंग का दूसरा केन्द्र है। गरुड़ का जो मोह उन्हें इस आश्रम तक लाया था, उसे वे अब अपना शत्रु नहीं मानते। धूप में जला हुआ ही जानता है कि पेड़ की छाया क्या होती है, वे कहते हैं, और यह दृष्टान्त इतना सादा है कि इसे भूलना कठिन है। सुनकर काग की आँखें भर आती हैं, और शिव पार्वती को वह बात कहते हैं जो इस पूरी कथा के कहे जाने की शर्त है: ठीक सुननेवाला मिल जाये तो सज्जन अपनी सबसे गुप्त बात भी खोल देते हैं।
इस प्रसंग के मुख्य किरदार
- काकभुशुण्डि वह काग जिनके आश्रम में यह कथा कही जाती है। सुनाते समय उनके मन में परम उत्साह है, और सुननेवाले की बात सुनने के बाद उनकी आँखों में जल।
- गरुड़ पक्षियों के राजा, जो यहाँ श्रोता हैं। पहले कथा माँगते हैं, फिर सुनकर बताते हैं कि जो मोह उन्हें यहाँ लाया वह मोह उनके लिये हित था।
- शिव यह पूरी कथा जिनके मुँह से सुनी जा रही है। बीच में वे पार्वती को भवानी और उमा कहकर पुकारते हैं और याद दिला देते हैं कि भुशुण्डि ने जो कहा वह वही है जो वे स्वयं कहते आये हैं।
- पार्वती भवानी, उमा, जो सुन रही हैं और जिनसे अन्तिम दोहे में श्रोता के लक्षणों की बात अलग से कही जाती है।
- राम जिनकी कथा सुनायी जा रही है। इस पन्ने पर वे केवल कथा के भीतर हैं, नामों में और क्रियाओं में, और एक भी पंक्ति में स्वयं उपस्थित नहीं होते।
जो माँगने आया था, वह पहले ही मिल गया
गरुड़ आश्रम पहुँच चुके हैं, और यह पन्ना उनके एक वाक्य से खुलता है। वाक्य अजीब है। वे कहते हैं कि जिस कारण से आया था वह सब काम आपके दर्शन पाते ही हो गया। यानी जो पूछने आये थे, वह पूछा ही नहीं गया, और उत्तर मिल गया।
सुनहु तात जेहि कारन आयउँ । सो सब भयउ दरस तव पायउँ॥
चौपाई १
देखि परम पावन तव आश्रम। गयउ मोह संसय नाना भ्रम॥
हे तात, सुनिये, मैं जिस कारण से आया था वह सब तो आपके दर्शन पाते ही पूरा हो गया। आपका परम पवित्र आश्रम देखकर ही मेरा मोह, मेरा संशय और नाना प्रकार के भ्रम, सब जाते रहे। तीन शब्द हैं, मोह, संसय, भ्रम, और तीनों एक साँस में गिनाये गये हैं, जैसे कोई अपने पुराने रोगों की सूची पढ़कर सुनाये और हर नाम पर कहे, यह भी गया। और यह सब हुआ आश्रम देखने से। कथा अभी शुरू नहीं हुई है, और सुननेवाला कह रहा है कि मेरा काम हो गया।
तो फिर आगे क्या बचा? यही इस चौपाई का पेच है। जिसका काम हो गया वह लौट सकता था। पर गरुड़ लौटते नहीं। वे माँगते हैं, और जो माँगते हैं वह अब किसी आवश्यकता से नहीं माँगा जा रहा।
अब श्रीराम कथा अति पावनि। सदा सुखद दुख पुंज नसावनि॥
चौपाई २
सादर तात सुनावहु मोही । बार बार बिनवउँ प्रभु तोही॥
अब हे तात, श्रीराम की वह कथा सुनाइये जो अत्यन्त पवित्र करनेवाली है, सदा सुख देनेवाली है, और दुःखों के ढेर का नाश करनेवाली है। आदर के साथ सुनाइये, हे प्रभु, मैं बार-बार यही विनती करता हूँ। जिसका दुःख अभी-अभी गया है वह दुःख नाश करनेवाली कथा माँग रहा है। इसमें कोई विरोध नहीं है। जो दवा से ठीक हो गया है वह भी दवा का स्वाद फिर से चाह सकता है, यदि दवा मीठी हो। कथा की तीन तारीफ़ें गिनायी गयी हैं, पावनि, सुखद, दुख पुंज नसावनि, और तीनों में से कोई ज्ञान की नहीं है। कोई यह नहीं कह रहा कि इससे मुझे तत्त्व समझ में आयेगा। कहा जा रहा है कि यह पवित्र करती है, सुख देती है, और दुःख हरती है। सुनने की माँग रस की माँग है।
बार बार बिनवउँ। पक्षियों का राजा एक काग से बार-बार विनती कर रहा है, और तुलसी इस विनम्रता को अगली चौपाई में गिनकर बताते हैं। गरुड़ की वाणी बिनीता है, सरल है, सुप्रेम है, सुखद है, सुपुनीता है। पाँच विशेषण एक वाणी के लिये। और इस वाणी का असर सुननेवाले पर वही होता है जो किसी कथावाचक पर एक अच्छे श्रोता का होता है।
गरुड़ की विनम्र, सरल, सुन्दर प्रेमभरी, सुखद और अत्यन्त पवित्र वाणी सुनते ही भुशुण्डि के मन में परम उत्साह हुआ और वे रघुपति के गुणों की गाथा कहने लगे। परम उछाहा। यह शब्द यहाँ पहली बार आता है और अगले दोहे में फिर आयेगा। उत्साह कथा का ईंधन है। जो कहानी बिना उत्साह के कही जाये वह सूची बन जाती है, और आगे जो आनेवाला है वह देखने में सूची ही है, नामों की, घटनाओं की, एक के बाद एक। पर तुलसी ने पहले ही बता दिया है कि यह सूची किस मन से कही जा रही है, और यही बात इसे सूची नहीं रहने देती।
सार: गरुड़ कहते हैं कि जिस काम से आये थे वह आश्रम देखते ही हो गया, मोह, संशय और भ्रम सब गये। फिर भी वे रामकथा माँगते हैं, जो पवित्र करती है, सुख देती है और दुःख हरती है, और बार-बार विनती करते हैं। उनकी विनम्र वाणी सुनकर भुशुण्डि के मन में परम उत्साह होता है और वे कथा कहने लगते हैं।
सरोवर से विवाह तक
और कथा कहाँ से शुरू होती है? यह बात इस पन्ने की सबसे बारीक बातों में है। भुशुण्डि राम के जन्म से नहीं शुरू करते। वे उस रूपक से शुरू करते हैं जिससे तुलसी की अपनी किताब शुरू होती है।
प्रथमहिं अति अनुराग भवानी। रामचरित सर कहेसि बखानी॥
चौपाई ३
पुनि नारद कर मोह अपारा । कहेसि बहुरि रावन अवतारा॥
हे भवानी, पहले तो उन्होंने बड़े अनुराग से रामचरितरूपी सरोवर का वर्णन किया। रामचरित सर। टीका इसे रामचरितमानस सरोवर का रूपक कहती है, यानी वही रूपक जिसके नाम पर यह पूरा ग्रन्थ है। भुशुण्डि जो कथा कह रहे हैं वह कोई भी रामकथा नहीं है, वह ठीक यही ग्रन्थ है, इसी क्रम में, इसी रूपक के साथ। और यहीं ध्यान देने की बात है कि यह चौपाई किसके मुँह से कही जा रही है। हे भवानी, यह सम्बोधन भुशुण्डि का नहीं हो सकता। यह शिव कह रहे हैं। यानी कथा के भीतर कथा है और उसके भीतर कथा। शिव पार्वती को बता रहे हैं कि भुशुण्डि ने गरुड़ को क्या-क्या कहा, और भुशुण्डि ने जो कहा वह राम का चरित है। तीन तह हैं, और हर तह पर एक कहनेवाला और एक सुननेवाला है।
फिर नारद का अपार मोह, और फिर रावण का अवतार। बालकाण्ड के ये दोनों प्रसंग यहाँ एक-एक शब्द में आ गये हैं, और उनका क्रम वही रखा गया है जो मूल में है। नारद का मोह पहले, रावण का अवतार उसके बाद, और दोनों के बीच बस एक बहुरि। जिसने बालकाण्ड पढ़ा है उसे मालूम है कि यह बहुरि कितना भारी है, और जिसने नहीं पढ़ा उसके लिये यह सार खुलता नहीं। यह सार उन लोगों के लिये है जो कथा जानते हैं और उसे फिर से सुनकर सुख पाते हैं।
फिर प्रभु के अवतार की कथा गायी गयी, और उसके बाद मन लगाकर शिशु-चरित कहे गये। गाई, और कहेसि मन लाई। अवतार की कथा गायी जाती है, बाललीला मन लगाकर कही जाती है। दोनों क्रियाएँ अलग हैं। एक में सुर है, दूसरी में ध्यान। और दोहा इसी ध्यान को फिर से पकड़ता है।
बालचरित कहि बिबिधि बिधि मन महँ परम उछाह।
दोहा ६४
रिषि आगवन कहेसि पुनि श्रीरघुबीर बिबाह॥ ६४॥
मन में परम उत्साह लेकर अनेक प्रकार की बाललीलाएँ कहकर, फिर ऋषि का आना और फिर श्रीरघुवीर का विवाह कहा। बिबिधि बिधि। बाललीलाएँ अनेक प्रकार की हैं, और भुशुण्डि उन्हें अनेक प्रकार से कह रहे हैं, यानी सार के भीतर भी यहाँ थोड़ा विस्तार है। पूरे सार में जहाँ-जहाँ बहु या बिबिध लगा है, वहाँ कहनेवाला रुककर थोड़ा फैल रहा है, और ऐसी जगहें गिनी-चुनी हैं: बाललीला, भरत का प्रेम, राम का भरत को समझाना, और लंका की लड़ाई। किसी को कहानी में क्या प्रिय है, यह इसी से मालूम होता है कि वह कहाँ रुकता है, और यह काग सबसे पहले बच्चे राम पर रुकता है।
रिषि आगवन। ऋषि का नाम दोहे में नहीं है, पोद्दार की टीका उन्हें विश्वामित्र बताती है और उनके आने को अयोध्या आना कहती है। और फिर विवाह। बालकाण्ड का इतना लम्बा उत्सव एक शब्द में, बिबाह। यहाँ जो नहीं कहा गया वह बताता है कि यह सार किसके लिये है। सुननेवाले को याद दिलाया जा रहा है, बताया नहीं जा रहा।
सार: भुशुण्डि कथा वहीं से शुरू करते हैं जहाँ से यह ग्रन्थ शुरू होता है, रामचरित रूपी सरोवर के रूपक से। फिर नारद का मोह, रावण का अवतार, प्रभु का अवतार, और मन लगाकर कही गयी अनेक प्रकार की बाललीलाएँ। दोहे में ऋषि का आना और रघुवीर का विवाह आता है। यह सब शिव भवानी को बता रहे हैं।
अयोध्या: एक वाक्य से टूटा हुआ रस
अब अयोध्या, और यहाँ सार की चाल बदल जाती है। बालकाण्ड ढाई चौपाइयों और एक दोहे में गया था। अयोध्या को चार पूरी चौपाइयाँ मिलती हैं, और उनमें एक भी ठहराव नहीं है।
बहुरि राम अभिषेक प्रसंगा। पुनि नृप बचन राज रस भंगा॥
चौपाई ४
पुरबासिन्ह कर बिरह बिषादा। कहेसि राम लछिमन संबादा॥
फिर राम के राज्याभिषेक का प्रसंग, फिर राजा के वचन से राजरस का भंग, फिर पुरवासियों का विरह और विषाद, और राम-लक्ष्मण का संवाद। नृप बचन राज रस भंगा। इस आधी पंक्ति को ध्यान से देखिये। राज्याभिषेक का आनन्द टूटा, और टूटा राजा के वचन से। जिसने भी यह वचन कहलवाया, जिस कारण से कहलवाया, वह सब यहाँ नहीं है। बचा है केवल इतना कि राजा ने कुछ कहा और रस टूट गया। टीका राजा को दशरथ कहती है, चौपाई उन्हें केवल नृप कहती है।
रस भंग। तुलसी आनन्द को रस कहते हैं और उसके टूटने को भंग, जैसे कोई भरा हुआ पात्र टूटे। और उसके ठीक बाद जो आता है वह टूटे हुए पात्र का फैलाव है, पुरवासियों का विरह और विषाद। राजा के एक वाक्य से पूरा नगर दुखी है। और इस दुःख के बीच में एक संवाद है, राम और लक्ष्मण का। सार में यह संवाद रखा गया है, यानी भुशुण्डि ने इसे छोड़ा नहीं। दो भाइयों की बातचीत उन्हें कथा का आवश्यक हिस्सा लगती है, इतनी आवश्यक कि नगर के विरह के बगल में उसे जगह दी गयी है।
बिपिन गवन केवट अनुरागा। सुरसरि उतरि निवास प्रयागा॥
चौपाई ५
बालमीक प्रभु मिलन बखाना। चित्रकूट जिमि बसे भगवाना॥
वन-गमन, केवट का अनुराग, गंगा पार उतरकर प्रयाग में निवास, वाल्मीकि से प्रभु का मिलना, और जैसे भगवान् चित्रकूट में बसे। इस चौपाई में चार जगहें हैं और दो लोग। जगहें हैं वन, सुरसरि, प्रयाग, चित्रकूट। लोग हैं केवट और वाल्मीकि। एक ऋषि और एक नाव खेनेवाला, और ऋषि के साथ मिलन है, नाव खेनेवाले के साथ अनुराग। अनुराग शब्द इस पूरे सार में दो बार आता है, पहली बार कथा कहने के ढंग के लिये, अति अनुराग, और दूसरी बार केवट के लिये। जिस भाव से कहनेवाला कह रहा है, उसी भाव का नाम एक नाव खेनेवाले को दिया गया है।
और चित्रकूट में बसना। बसे भगवाना। यहाँ राम को भगवान् कहा गया है, और यह शब्द इस पूरे सार में यहीं एक बार आता है। अयोध्या में नहीं, लंका में नहीं, राज्याभिषेक पर नहीं। वन में, बिना राज्य के, चित्रकूट में बसते हुए, वहाँ वे भगवान् हैं।
अगली दो चौपाइयाँ पूरी तरह भरत की हैं। मन्त्री का नगर लौटना, राजा का मरण, भरत का आना और उनके प्रेम का बहुत वर्णन। राजा की क्रिया करके पुरवासियों के साथ भरत वहाँ गये जहाँ सुख की राशि प्रभु थे। फिर रघुपति ने बहुत प्रकार से समझाया, और वे पादुका लेकर अवधपुर आये। भरत की रहनी, इन्द्रपुत्र की करनी, और प्रभु तथा अत्रि की भेंट। नृप मरना, दो शब्द। और भरत के लिये प्रेम बहु बरना, बहुत वर्णन के साथ। जिसे जितनी जगह मिली है, उससे मालूम होता है कि कहनेवाले को क्या प्रिय है। इस सार में भरत को दो चौपाइयाँ मिली हैं, लगभग उतनी ही जितनी पूरे बालकाण्ड को।
सुरपति सुत करनी। इन्द्र के पुत्र की करनी। टीका उन्हें जयन्त कहती है और करनी को नीच कहती है, चौपाई में कोई विशेषण नहीं है, केवल करनी है। और फिर अत्रि। अयोध्या की कथा यहीं छूटती है और वन की कथा शुरू होती है, और तुलसी ने बीच में कोई सीमा नहीं खींची। अत्रि की भेंट के बाद सीधे अगला दोहा, और उसमें विराध का वध। इस सार में काण्डों की दीवारें नहीं हैं। कथा एक बहाव है, और कहनेवाला उसमें बहा जा रहा है।
सार: अयोध्या को चार चौपाइयाँ मिलती हैं। राज्याभिषेक का प्रसंग, राजा के वचन से टूटा हुआ राजरस, पुरवासियों का विरह, राम-लक्ष्मण का संवाद, वन-गमन, केवट का अनुराग, प्रयाग, वाल्मीकि, चित्रकूट। फिर मन्त्री का लौटना, राजा का मरण, भरत का प्रेम, पादुका लेकर अवध लौटना, इन्द्रपुत्र की करनी और अत्रि से भेंट।
वन: जहाँ विरह बार-बार आता है
कहि बिराध बध जेहि बिधि देह तजी सरभंग।
दोहा ६५
बरनि सुतीछन प्रीति पुनि प्रभु अगस्ति सतसंग॥ ६५॥
जिस प्रकार विराध का वध हुआ और शरभंग ने देह त्यागी, वह कहकर, फिर सुतीक्ष्ण का प्रेम वर्णन करके प्रभु और अगस्त्य का सत्संग कहा। एक दोहे में चार नाम। पर देखिये कि चारों के साथ अलग-अलग क्रिया लगी है। विराध का बध, शरभंग की देह तजी, सुतीक्ष्ण की प्रीति, अगस्त्य का सतसंग। एक मारा गया, एक ने स्वयं शरीर छोड़ा, एक ने प्रेम किया, और एक के साथ बैठकर बात हुई। सार यहाँ भी बारीक है। हर नाम के साथ वही एक शब्द है जो उस प्रसंग की जान है, और कोई शब्द किसी दूसरे नाम के साथ बदला नहीं जा सकता।
फिर दण्डकवन को पवित्र करना, गीध के साथ मैत्री, पंचवटी में निवास और सब मुनियों के भय का नाश। गीध मइत्री। गीध का नाम यहाँ नहीं है, टीका उन्हें गृध्रराज कहती है और आगे जटायु। और मित्रता शब्द ध्यान देने योग्य है। राम और एक पक्षी के बीच मैत्री, यानी बराबरी का सम्बन्ध। इस पन्ने पर भी दो पक्षी बैठे हैं, और उनमें से एक ठीक इसी कथा को सुनकर राम के चरणों में प्रेम पायेगा।
पुनि लछिमन उपदेस अनूपा। सूपनखा जिमि कीन्हि कुरूपा॥
चौपाई ६
खर दूषन बध बहुरि बखाना। जिमि सब मरमु दसानन जाना॥
फिर लक्ष्मण को अनुपम उपदेश, और जैसे शूर्पणखा को कुरूप किया गया। फिर खर-दूषण का वध, और जैसे रावण ने सब भेद जाना। चार आधी पंक्तियाँ, और उनमें कथा की चाल ठीक-ठीक दिखायी देती है। पहले उपदेश, शान्त, अनूप। फिर एक स्त्री कुरूप की जाती है। फिर दो राक्षस मरते हैं। और फिर दसानन को सब मालूम हो जाता है। एक शान्त बातचीत से रावण की जानकारी तक चार कदम हैं, और तुलसी ने बीच में एक शब्द भी नहीं रखा जिससे लगे कि यह क्रम टाला जा सकता था।
फिर रावण और मारीच की बातचीत जैसे हुई, वह सब कही। फिर माया-सीता का हरण, और श्रीरघुवीर के विरह का कुछ वर्णन। माया सीता। यहाँ तुलसी अपनी कथा का वह तत्त्व सार में भी बचाकर रखते हैं जो उनकी अपनी है। हरण हुआ तो माया-सीता का, यह बात भुशुण्डि के सार में भी छूटती नहीं। और विरह के साथ कछु लगा है। कुछ वर्णन। कहनेवाला यहाँ रुकना नहीं चाहता, या रुक नहीं पाता। कछु बरना, और आगे।
पुनि प्रभु गीध क्रिया जिमि कीन्ही । बधि कबंध सबरिहि गति दीन्ही॥
चौपाई ७
बहुरि बिरह बरनत रघुबीरा । जेहि बिधि गए सरोबर तीरा॥
फिर प्रभु ने जैसे गीध की क्रिया की, कबन्ध को मारकर शबरी को गति दी, और फिर विरह वर्णन करते हुए रघुवीर जैसे सरोवर के तीर पर गये। गीध क्रिया। जिस पक्षी से मैत्री हुई थी, उसकी अन्त्येष्टि प्रभु ने की। मैत्री और क्रिया, ये दो शब्द एक ही पक्षी के लिये तीन चौपाइयों के अन्तर पर रखे गये हैं, और उनके बीच पूरा हरण है। और फिर बधि कबंध सबरिहि गति दीन्ही, एक ही आधी पंक्ति में एक का वध है और एक को गति है, और तुलसी ने दोनों को एक ही साँस में रखा है।
और यहाँ विरह फिर आता है। बहुरि बिरह बरनत रघुबीरा। पहले कछु बरना था, अब बरनत, वर्णन करते हुए चलते हैं, सरोवर के तीर तक। टीका सरोवर को पंपासर कहती है। पूरे सार में विरह तीन बार नाम लेकर आया है, एक बार पुरवासियों का और दो बार रघुवीर का, और कोई दूसरा भाव इतनी बार नहीं आया। जिसने यह सार कहा वह जानता है कि इस कथा में कौन-सी चीज़ बार-बार कहने लायक है।
सार: विराध का वध, शरभंग का देह-त्याग, सुतीक्ष्ण की प्रीति, अगस्त्य का सत्संग, दण्डकवन, गीध से मैत्री, पंचवटी, लक्ष्मण को उपदेश, शूर्पणखा, खर-दूषण, रावण-मारीच की बातचीत, माया-सीता का हरण, गीध की क्रिया, कबन्ध, शबरी, और विरह करते हुए सरोवर तक। रघुवीर का विरह इस सार में दो बार आता है।
किष्किन्धा से लंका: दो बार लाँघा हुआ समुद्र
प्रभु नारद संबाद कहि मारुति मिलन प्रसंग।
दोहा ६६ (क) और (ख)
पुनि सुग्रीव मिताई बालि प्रान कर भंग॥ ६६ (क)॥
कपिहि तिलक करि प्रभु कृत सैल प्रबरषन बास।
बरनन बरषा सरद अरु राम रोष कपि त्रास॥ ६६ (ख)॥
प्रभु और नारद का संवाद, मारुति के मिलने का प्रसंग, फिर सुग्रीव से मित्रता और बालि के प्राणों का भंग। सुग्रीव का तिलक करके प्रभु ने प्रवर्षण पर्वत पर निवास किया, वर्षा और शरद का वर्णन, राम का रोष और कपि का त्रास। दो दोहों और एक चौपाई में किष्किन्धा की सारी कथा। और इनमें एक बात है जो पूरे सार में केवल यहीं है, ऋतुओं का नाम। बरनन बरषा सरद। वर्षा और शरद। यानी भुशुण्डि ने कथा कहते हुए मौसम भी कहा। घटनाओं की इस भागती हुई सूची में दो ऋतुएँ अपनी जगह पा गयी हैं, और यह बताता है कि कहनेवाला जल्दी में है पर लापरवाह नहीं। जिसे मौसम याद है, उसे कथा याद है।
और फिर राम रोष कपि त्रास। राम का क्रोध और वानर का भय, एक ही पंक्ति में, बिना कारण बताये। टीका बताती है कि रोष सुग्रीव पर था और भय सुग्रीव का। जिसने कथा सुनी है वह जानता है, और जिसने नहीं सुनी उसके लिये यह पंक्ति एक बन्द दरवाज़ा है। और बालि प्रान कर भंग। भंग शब्द फिर आया है। पहले राज रस भंग था, अब प्रान का भंग। तुलसी के सार में एक ही शब्द राज्य के टूटने और प्राण के टूटने के लिये है।
अगली चौपाई खोज की है। जिस प्रकार कपिपति ने वानर भेजे और वे सीता की खोज में सब दिशाओं में दौड़े, जैसे बिल में प्रवेश किया, और फिर वानरों को सम्पाती मिला। और फिर सम्पाती से सब कथा सुनकर जो होता है, वह इस सार की सबसे तेज़ पंक्ति है।
सुनि सब कथा समीरकुमारा । नाघत भयउ पयोधि अपारा॥
चौपाई ८
लंकाँ कपि प्रबेस जिमि कीन्हा । पुनि सीतहि धीरजु जिमि दीन्हा॥
सब कथा सुनकर पवनकुमार अपार समुद्र को लाँघ गये। जैसे लंका में कपि ने प्रवेश किया, फिर जैसे सीता को धीरज दिया। नाघत भयउ पयोधि अपारा। समुद्र अपार है और उसे लाँघने में एक शब्द लगा है, नाघत। पूरी सुन्दरकाण्ड की कथा यहाँ दो चौपाइयों में है, और उसका सबसे बड़ा क्षण एक क्रिया में। यहाँ हनुमान का नाम भी नहीं है, समीरकुमारा है, पवन का बेटा, जैसे लाँघना उनके कुल का काम हो। और लंका पहुँचकर पहला काम जो गिनाया गया है वह युद्ध नहीं है, धीरज देना है। सीतहि धीरजु जिमि दीन्हा। समुद्र लाँघकर जो पहुँचा उसने सबसे पहले किसी को ढाढ़स दिया।
और फिर लंका में जो हुआ, वह अगली चौपाई में चार क्रियाओं में है। बन उजाड़ा, रावण को समझाया, पुर जलाया, फिर समुद्र लाँघा। उजारि, प्रबोधी, दहि, नाघेउ। बीच की क्रिया देखिये। उजाड़ने और जलाने के बीच में समझाना है। प्रबोधी। रावण को उपदेश दिया गया, और उसके तुरन्त बाद उसका नगर जला। यह क्रम तुलसी का है और सार में भी टूटा नहीं। और फिर नाघेउ बहुरि पयोधी, फिर समुद्र लाँघा। एक ही कथा में समुद्र दो बार लाँघा जाता है और दोनों बार लगभग एक ही शब्द से। फिर सब वानर वहाँ आये जहाँ रघुराई थे, और वैदेही की कुशल सुनायी। कुसल। लंका से लौटकर जो पहली ख़बर दी गयी वह यह थी कि वे ठीक हैं।
सार: नारद से संवाद, मारुति से भेंट, सुग्रीव से मित्रता, बालि का वध, सुग्रीव का तिलक, प्रवर्षण पर वास, वर्षा और शरद, राम का रोष। फिर वानरों की खोज, बिल में प्रवेश, सम्पाती, पवनकुमार का समुद्र लाँघना, लंका में प्रवेश, सीता को धीरज, वन उजाड़ना, रावण को समझाना, पुर जलाना, फिर समुद्र लाँघकर वैदेही की कुशल सुनाना।
सेतु से अभिषेक तक, और जहाँ सार रुकता है
फिर सेना के साथ रघुवीर जैसे समुद्र के तीर पर उतरे, जैसे विभीषण आकर मिले, और समुद्र के निग्रह की कथा। सागर निग्रह। समुद्र को बाँधने की कथा, और उसके साथ ही दोहे में सेतु।
सेतु बाँधि कपि सेन जिमि उतरी सागर पार।
दोहा ६७ (क) और (ख)
गयउ बसीठी बीरबर जेहि बिधि बालिकुमार॥ ६७ (क)॥
निसिचर कीस लराई बरनिसि बिबिध प्रकार।
कुंभकरन घननाद कर बल पौरुष संघार॥ ६७ (ख)॥
सेतु बाँधकर जैसे कपि-सेना समुद्र पार उतरी, जैसे वीरश्रेष्ठ बालिकुमार दूत बनकर गये। राक्षसों और वानरों की लड़ाई का अनेक प्रकार से वर्णन, कुम्भकर्ण और मेघनाद का बल, पौरुष और संहार। बालिकुमार। टीका इन्हें अंगद कहती है, पर दोहे में वे अपने पिता के नाम से हैं, और पिता वही जिसके प्राणों का भंग कुछ ही पंक्तियाँ पहले कहा गया था। तुलसी सार में भी यह याद दिला देते हैं कि दूत बनकर जो गया वह उसी बालि का बेटा है। बसीठी, दूत का काम। बीरबर, वीरों में श्रेष्ठ। दो शब्द और पूरा परिचय।
कुंभकरन घननाद कर बल पौरुष संघार। दो नाम, और तीन संज्ञाएँ, बल, पौरुष, संहार। संहार तीसरे स्थान पर है। पहले बल है, फिर पौरुष, और फिर उनका अन्त। जो मरे, वे पहले बलवान् और पुरुषार्थी कहे गये हैं। सार में भी शत्रु को उसका पूरा हिस्सा मिला है। और घननाद, मेघ की गरज, यह नाम टीका के मेघनाद का अवधी रूप है और दोहे में गरज की तरह ही बैठा है।
फिर नाना प्रकार से राक्षसों के समूह का मरण, रघुपति और रावण का युद्ध। रावण का वध, मन्दोदरी का शोक, विभीषण का राज्य, देवताओं का शोकहीन होना। रावन बध मंदोदरि सोका, राज बिभीषन देव असोका। इस चौपाई की दूसरी पंक्ति में तुक सोका और असोका पर बैठी है। एक ओर एक स्त्री का शोक, दूसरी ओर देवताओं का शोक मिटना। रावण की मृत्यु एक ही पंक्ति में दो जगह गिरती है, एक घर पर और एक स्वर्ग पर, और दोनों एक ही तुक में बँधे हैं। पूरे सार में यह अकेली जगह है जहाँ किसी के रोने का नाम लिया गया है, और रोनेवाली रावण की रानी है।
सीता रघुपति मिलन बहोरी । सुरन्ह कीन्हि अस्तुति कर जोरी॥
चौपाई ९
पुनि पुष्पक चढ़ि कपिन्ह समेता। अवध चले प्रभु कृपा निकेता॥
फिर सीता और रघुपति का मिलन, देवताओं ने हाथ जोड़कर स्तुति की। फिर वानरों के साथ पुष्पक पर चढ़कर कृपा के धाम प्रभु अवध को चले। कृपा निकेता। लंका जीतकर लौटते हुए राम के लिये विशेषण विजेता नहीं है, कृपा का घर है। और उनके साथ कपिन्ह समेता, वानर भी। जो सेना समुद्र पार उतरी थी, वह लौट भी रही है, और सार ने उसे लौटते हुए भी नहीं छोड़ा।
जिस प्रकार राम अपने नगर आये, वह सब उज्ज्वल चरित काग ने गाया। फिर राम का अभिषेक कहा, और पुर तथा अनेक नृपनीति का वर्णन करते हुए। बायस बिसद चरित सब गाए। यहाँ पहली बार सार के भीतर कहनेवाले को उसके रूप से याद किया गया है, बायस, काग। अब तक कहेसि था, बरनी था, बखाना था, कर्ता छिपा हुआ था। अब जब कथा घर लौट रही है, तुलसी बताते हैं कि यह सब एक काग गा रहा था। गाए। कहा नहीं, गाया। और अन्त में अभिषेक, वही शब्द जिससे अयोध्या की कथा शुरू हुई थी। तब अभिषेक का प्रसंग था और रस भंग हो गया था। अब अभिषेक है, और कुछ भंग नहीं होता।
कथा समस्त भुसुंड बखानी । जो मैं तुम्ह सन कही भवानी॥
चौपाई १०
सुनि सब राम कथा खगनाहा। कहत बचन मन परम उछाहा॥
भुशुण्डि ने वह समस्त कथा कही जो, हे भवानी, मैंने आपसे कही। सारी रामकथा सुनकर पक्षिराज मन में परम उत्साह से वचन कहने लगे। यह चौपाई इस पूरे सार का ताला है। शिव कह रहे हैं कि भुशुण्डि ने ठीक वही कहा जो मैं आपको कहता आया हूँ। यानी सार यहीं रुकता है जहाँ शिव की अपनी कथा इस समय खड़ी है, राम के अभिषेक और अयोध्या के राज्य के वर्णन पर। आगे की कथा, जो अभी उत्तरकाण्ड में कही जा रही है, इस सार में नहीं है, क्योंकि जिसे यह सार सुनाया जा रहा है वह अभी उसी के भीतर बैठा है। भुशुण्डि की कथा शिव की कथा से आगे नहीं जाती। और परम उछाहा फिर आया है, तीसरी बार, पर इस बार कहनेवाले में नहीं, सुननेवाले में। उत्साह एक पक्षी से दूसरे पक्षी में उतर गया है।
सार: सेना समुद्र-तट पर, विभीषण का मिलना, समुद्र का निग्रह, सेतु, बालिकुमार की दूतता, राक्षसों और वानरों का युद्ध, कुम्भकर्ण और मेघनाद का संहार, रावण का वध, मन्दोदरी का शोक, विभीषण का राज्य, सीता-मिलन, देवताओं की स्तुति, पुष्पक से अवध, अभिषेक, और नगर तथा राजनीति का वर्णन। यहीं सार रुकता है, ठीक वहाँ जहाँ शिव की अपनी कथा खड़ी है, और गरुड़ के मन में वही उत्साह उतर आता है जो कहनेवाले में था।
गरुड़ का उत्तर: धूप और छाया
गयउ मोर संदेह सुनेउँ सकल रघुपति चरित।
सोरठा ६८ (क) और (ख)
भयउ राम पद नेह तव प्रसाद बायस तिलक॥ ६८ (क)॥
मोहि भयउ अति मोह प्रभु बंधन रन महुँ निरखि।
चिदानंद संदोह राम बिकल कारन कवन॥ ६८ (ख)॥
मेरा संशय गया, मैंने रघुपति का सारा चरित सुना। हे काकशिरोमणि, आपके प्रसाद से राम के चरणों में मेरा प्रेम हो गया। युद्ध में प्रभु का बन्धन देखकर मुझे अत्यन्त मोह हुआ था, कि जो चिदानन्द के घन हैं वे राम किस कारण विकल हैं। बायस तिलक, कागों का तिलक, कागों का शिरोमणि। पक्षियों का राजा एक काग को यह नाम दे रहा है। और फिर पहली बार इस पन्ने पर गरुड़ बताते हैं कि उनका मोह था क्या। रन महुँ बंधन। युद्ध में राम बँधे हुए। टीका बन्धन को नागपाश कहती है। जिसे चिदानन्द का समूह कहा जाता है वह बँधा हुआ, विकल। यह देखकर जो प्रश्न उठा वह यह नहीं था कि राम कौन हैं। प्रश्न यह था कि जो राम हैं, वे ऐसे कैसे हो सकते हैं।
यहाँ ध्यान देने की बात है कि सोरठे की पहली पंक्ति में दो अलग चीज़ें गिनायी गयी हैं। संदेह गया, यह पहली चीज़ है। राम पद नेह भयउ, यह दूसरी। पन्ने के आरम्भ में गरुड़ ने कहा था कि आश्रम देखते ही मोह, संशय और भ्रम गये। यानी संशय जाने के लिये दर्शन काफ़ी था। पर प्रेम के लिये कथा चाहिये थी। कथा ने कुछ हटाया नहीं, कथा ने कुछ जोड़ा। दर्शन ने खाली किया, कथा ने भरा। और इसी से समझ में आता है कि जिसका काम हो चुका था वह क्यों बैठा रहा और क्यों बार-बार विनती करता रहा।
फिर गरुड़ अपने मोह का हिसाब देते हैं, और यह हिसाब अनोखा है। बिलकुल मनुष्यों जैसा चरित देखकर मेरे हृदय में भारी संशय हुआ। उस भ्रम को अब मैं अपना हित मानता हूँ, कृपानिधान ने अनुग्रह किया। सोइ भ्रम अब हित करि मैं माना। वही भ्रम। जिसे अभी संसय भारी कहा था, उसे अगली ही पंक्ति में हित कह दिया, और हित कहने का काम अपने ऊपर लिया, मैं माना। यह किसी ने उन्हें बताया नहीं, उन्होंने स्वयं माना। और उसका कारण अगली चौपाई में है, और वह कारण एक पेड़ है।
जो अति आतप ब्याकुल होई । तरु छाया सुख जानइ सोई॥
चौपाई ११
जौं नहिं होत मोह अति मोही । मिलतेउँ तात कवन बिधि तोही॥
जो अत्यन्त धूप से व्याकुल होता है, वही पेड़ की छाया का सुख जानता है। हे तात, यदि मुझे अत्यन्त मोह न हुआ होता तो मैं आपसे किस प्रकार मिलता। इस दृष्टान्त में कोई शास्त्र नहीं है। इसमें बस धूप है, एक पेड़ है, और एक थका हुआ यात्री जो छाया में बैठकर साँस लेता है। और इसका तर्क सीधा है। छाया सबके लिये है, पर छाया का सुख उसी के लिये है जो जला हुआ आये। जिसे धूप न लगी हो, उसके लिये छाया केवल छाया है, सुख नहीं। गरुड़ कह रहे हैं कि मेरा मोह मेरी धूप था, और वह धूप न होती तो यह आश्रम मेरे लिये केवल एक जगह होता, और आप केवल एक काग।
और फिर वे अपने प्रश्न को दो बार पूछते हैं। मिलतेउँ कवन बिधि, मैं मिलता कैसे। सुनतेउँ किमि हरि कथा सुहाई, मैं यह सुन्दर हरिकथा सुनता कैसे। दोनों क्रियाएँ उस रूप में हैं जो न हुई हुई चीज़ को बताती है। न मिलता, न सुनता। यानी गरुड़ अपने मोह के बिना अपने ही जीवन की कल्पना कर रहे हैं, और उस कल्पना में यह आश्रम नहीं है, यह कथा नहीं है। इसलिये मोह हित है। जिस चीज़ के बिना यह कथा न मिलती, उसे शत्रु कहना कृतघ्नता होती, और गरुड़ कृतघ्न नहीं हैं।
और इसके बाद वे यह बात केवल अपनी नहीं रहने देते। वेद, शास्त्र और पुराणों का यही मत है, और सिद्ध तथा मुनि भी यही कहते हैं, इसमें सन्देह नहीं। जो अभी तक एक पक्षी का अपना अनुभव था, उसे अब शास्त्र की गवाही दी जा रही है, और गवाही यह है।
संत बिसुद्ध मिलहिं परि तेही । चितवहिं राम कृपा करि जेही॥
चौपाई १२
राम कृपाँ तव दरसन भयऊ। तव प्रसाद सब संसय गयऊ॥
शुद्ध संत उसी को मिलते हैं जिसे राम कृपा करके देखते हैं। राम की कृपा से आपके दर्शन हुए, और आपके प्रसाद से सब संशय गया। इस चौपाई में कृपा दो बार है और प्रसाद एक बार, और तीनों की दिशा एक है। राम की कृपा से संत मिलते हैं, संत के प्रसाद से संशय जाता है। यानी संशय जाने का रास्ता सीधे राम से नहीं है, वह एक संत से होकर जाता है, और संत तक पहुँचने का रास्ता राम से होकर। यह एक घेरा है, और गरुड़ इस घेरे में खड़े होकर अपनी जगह पहचान रहे हैं। चितवहिं राम कृपा करि जेही। जिसे राम देख लें। देखना ही कृपा है। और जिसे देख लिया गया, उसे एक काग मिल गया।
सार: गरुड़ कहते हैं कि सारा चरित सुनकर संशय गया और राम के चरणों में प्रेम हुआ। उनका मोह युद्ध में राम को बँधे हुए देखकर हुआ था, पर अब वे उसी भ्रम को अपना हित मानते हैं, क्योंकि धूप में जला हुआ ही छाया का सुख जानता है, और मोह न होता तो न यह भेंट होती न यह कथा। वेद, पुराण, सिद्ध और मुनि का मत है कि शुद्ध संत उसी को मिलते हैं जिसे राम कृपा करके देखें।
काग की आँखें, और उमा के लिये एक बात
सुनि बिहंगपति बानी सहित बिनय अनुराग।
दोहा ६९ (क) और (ख)
पुलक गात लोचन सजल मन हरषेउ अति काग॥ ६९ (क)॥
श्रोता सुमति सुसील सुचि कथा रसिक हरिदास।
पाइ उमा अति गोप्यमपि सज्जन करहिं प्रकास॥ ६९ (ख)॥
पक्षिराज की विनय और अनुराग भरी वाणी सुनकर काग का शरीर पुलकित हो गया, नेत्र सजल हो गये, और मन अत्यन्त हर्षित हुआ। हे उमा, सुन्दर बुद्धिवाले, सुशील, पवित्र, कथा के रसिक और हरि के दास श्रोता को पाकर सज्जन अत्यन्त गोपनीय बात भी प्रकट कर देते हैं। यह प्रसंग यहाँ पलट जाता है। अब तक सुननेवाले पर असर हो रहा था। अब कहनेवाले पर हो रहा है। पुलक गात लोचन सजल। जिसने अभी-अभी पूरी रामकथा एक साँस में कह डाली, बिना रुके, वह अपने श्रोता की चार चौपाइयाँ सुनकर रो पड़ा। कथा कहते हुए उछाह था, कथा का फल देखकर आँसू हैं। और यह ठीक वही जगह है जहाँ पूरे प्रसंग में पहली बार कोई आँख भरती है।
और फिर शिव पार्वती से वह बात कहते हैं जो इस पूरे पन्ने का नियम है। श्रोता के पाँच लक्षण गिनाये गये हैं। सुमति, सुसील, सुचि, कथा रसिक, हरिदास। पाँच में तीन सु से शुरू होते हैं, और पाँचों में एक भी ऐसा नहीं जो विद्या का हो। बुद्धि अच्छी हो, स्वभाव अच्छा हो, भीतर पवित्रता हो, कथा में रस आता हो, और हरि का दास हो। ऐसा श्रोता मिले तो सज्जन गोप्यमपि प्रकास करहिं, अत्यन्त गुप्त बात भी खोल देते हैं। गोप्यमपि, यह शब्द संस्कृत का है और अवधी के दोहे में अपनी जगह पर वैसा ही बैठा है जैसे किसी सादी पोशाक पर एक भारी बटन। तुलसी ने रहस्य के लिये रहस्य की भाषा चुनी है।
और अब उलटकर देखिये कि पन्ने के आरम्भ में गरुड़ की वाणी के कौन-से लक्षण गिनाये गये थे। बिनीता, सरल, सुप्रेम, सुखद, सुपुनीता। और अन्त में श्रोता के लक्षण। सुमति, सुसील, सुचि, कथा रसिक, हरिदास। दोनों सूचियाँ पाँच-पाँच की हैं और दोनों में सु की झंकार है। जो वाणी पहले गिनायी गयी वह इसी श्रोता की थी। यानी दोहा किसी सिद्धान्त की बात नहीं कर रहा, वह अभी-अभी जो हुआ उसे नियम बनाकर रख रहा है। ऐसा सुननेवाला आया, इसलिये यह कथा कही गयी, और इसीलिये आगे कुछ और कहा जायेगा।
और गोप्य क्या है, यह इस पन्ने पर नहीं खुलता। जो कथा अभी कही गयी वह रामचरित है, और वह गुप्त नहीं है, वह तो सब जानते हैं, शिव स्वयं पार्वती को कह चुके हैं। इसलिये यह दोहा पीछे की ओर नहीं, आगे की ओर देख रहा है। ऐसे श्रोता को पाकर सज्जन गुप्त बात खोलते हैं, यानी अब कुछ खुलने वाला है। यह दोहा दरवाज़ा है, और उसके पार क्या है यह अगला प्रसंग बतायेगा।
सार: गरुड़ की विनय सुनकर भुशुण्डि का शरीर पुलकित होता है, आँखें भर आती हैं, मन हर्षित होता है। शिव उमा को कहते हैं कि सुबुद्धि, सुशील, पवित्र, कथा-रसिक और हरिदास श्रोता को पाकर सज्जन अत्यन्त गोपनीय बात भी प्रकट कर देते हैं। गरुड़ की वाणी के पाँच लक्षण और श्रोता के पाँच लक्षण एक ही सुननेवाले के हैं।
और अन्त में, अपनी ओर
इस पन्ने पर जो सबसे बड़ी बात है वह कथा नहीं, कथा का नाप है। जो ग्रन्थ छह काण्डों में फैला हुआ है, उसे तुलसी ने बीस से कम चौपाइयों और छह दोहों में दोहरा दिया, और इस दोहराने में उन्होंने कुछ चीज़ें गिरा दीं और कुछ बचा लीं। जो बचा वह देखने लायक है। बाललीला को बिबिधि बिधि मिला। केवट को अनुराग मिला। भरत को दो चौपाइयाँ मिलीं। रघुवीर का विरह दो बार आया। वर्षा और शरद का नाम आया। और युद्ध, जिस पर पूरा एक काण्ड है, वह दो पंक्तियों में सिमट गया। किसी कथा का सार बताता है कि कहनेवाले को उसमें क्या प्रिय है, और इस सार से मालूम होता है कि तुलसी को अपनी कथा में क्या प्रिय था। बच्चा, नाव खेनेवाला, दूर बैठा भाई, और वियोग।
दूसरी बात गरुड़ की है। उन्होंने जो कहा वह इस पूरे उत्तरकाण्ड की सबसे उदार बातों में है, कि मेरा मोह मेरा हित था। यह बात कहना आसान नहीं है। अपनी भूल को स्वीकार करना एक बात है, उसे धन्यवाद देना दूसरी। गरुड़ दूसरी बात कर रहे हैं। और वे इसे किसी भावुकता से नहीं, तर्क से कर रहे हैं। धूप न होती तो छाया का सुख न होता, मोह न होता तो यह आश्रम न मिलता, आश्रम न मिलता तो यह कथा न मिलती। हर कड़ी पिछली कड़ी से बँधी है, और सबसे पहली कड़ी वह है जिसे लोग काटकर फेंक देना चाहते हैं।
और तीसरी बात, जो इस पन्ने से उठकर पूरे ग्रन्थ पर फैल जाती है। कथा कहने की शर्त सुननेवाले में है। कहनेवाले के पास सब कुछ था, पर वह तब बोला जब उसे बिनीता वाणी सुनायी दी, और वह तब रोया जब उसने सुननेवाले को बदला हुआ देखा। और शिव, जो स्वयं यह सब पार्वती को कह रहे हैं, अन्त में उन्हीं की ओर मुड़कर कहते हैं, हे उमा, ऐसा श्रोता मिले तो गुप्त बात भी खुल जाती है। यानी यह दोहा भुशुण्डि के लिये ही नहीं है। यह उन पार्वती के लिये भी है जो सुन रही हैं, और उस हर सुननेवाले के लिये जो इस पन्ने तक पढ़ते हुए आया है।
उत्तरकाण्ड का यह प्रसंग उन प्रसंगों में है जिन्हें पढ़कर पीछे लौटने की इच्छा होती है। जिसने पूरा रामचरितमानस पढ़ा है, उसके लिये ये चौपाइयाँ एक-एक दरवाज़ा हैं, और हर दरवाज़े के पीछे एक पूरा काण्ड खड़ा है। जिसने नहीं पढ़ा, उसके लिये यह सूची है। तुलसी ने यह सार उन्हीं के लिये लिखा है जो कथा जानते हैं, और यह भी उन्होंने पहले ही बता दिया कि इसे सुननेवाला कथा रसिक होना चाहिये। रस वहीं आता है जहाँ याद हो।
और अन्तिम बात। इस पूरे पन्ने पर राम एक बार भी सामने नहीं आते। वे कथा के भीतर हैं, नामों में, क्रियाओं में, एक काग की गाथा में। पर पन्ने के अन्त में जो होता है वह उनका ही किया हुआ है। एक पक्षी का संशय गया, एक पक्षी की आँखें भर आयीं, और एक कहनेवाले ने अपनी सुननेवाली को बताया कि अब गुप्त बात खुलने का समय है। कथा कहने से जो होता है, वह इसी पन्ने पर हुआ है, और उसे किसी उपदेश ने नहीं, केवल कथा ने किया है।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, उत्तरकाण्ड, दोहा ६४ से ६९, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।