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भुशुण्डि का संक्षिप्त राम-चरित

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रामचरितमानसउत्तरकाण्डप्रसंग 12

गरुड़ माँगते हैं और काग सुनाते हैं: थोड़े-से शब्दों में पूरा रामचरितमानस, सरोवर के रूपक से अयोध्या के राज्याभिषेक तक। फिर सुननेवाला बताता है कि जिस मोह ने उसे इस आश्रम तक लाया, वह मोह उसका शत्रु नहीं था।

भुशुण्डि के आश्रम का यह प्रसंग उन प्रसंगों में से है जिनमें कोई घटना नहीं घटती और फिर भी सब कुछ घट जाता है। एक बहुत पवित्र आश्रम है, वहाँ एक काग बैठा है, और उसके सामने पक्षियों का राजा विनती करता हुआ बैठा है। राजा माँगता है, काग सुनाता है। जो सुनाया जाता है वह राम की पूरी कथा है, सरोवर के रूपक से लेकर राज्याभिषेक तक, थोड़े-से शब्दों में। जिस ग्रन्थ को सुननेवाले सात सोपानों में पढ़ते आये हैं, वही ग्रन्थ यहाँ अपने ही एक पात्र के मुँह से कुछ ही वाक्यों में दोहराया जाता है।

यह सार किसी सूची की तरह नहीं चलता, क्योंकि कहनेवाले के मन में परम उत्साह है। कथा यह उत्साह दो बार गिनाती है, कथा शुरू होने से पहले और फिर बाललीलाएँ कहते हुए। वह उस आदमी की तरह चलता है जिसे कोई प्रिय कथा फिर से सुनाने का अवसर मिल गया हो। वह जल्दी में इसलिये है कि उसे अगला हिस्सा याद आ रहा है।

कथा पूरी होने पर सुननेवाला बोलता है, और जो कहता है वह इस प्रसंग का दूसरा केन्द्र है। गरुड़ का जो मोह उन्हें इस आश्रम तक लाया था, उसे वे अब अपना शत्रु नहीं मानते। उनका दृष्टान्त सादा है: धूप में जला हुआ ही जानता है कि पेड़ की छाया क्या होती है। सुनकर काग की आँखें भर आती हैं। शिव पार्वती से वह बात कहते हैं जो इस कथा के कहे जाने की शर्त है। ठीक सुननेवाला मिल जाये तो सज्जन अपनी गुप्त से गुप्त बात भी खोल देते हैं।

तीन तहों के कहने-सुननेवाले

  • काकभुशुण्डि वह काग जिनके आश्रम में यह कथा कही जाती है। सुनाते समय उनके मन में परम उत्साह है, और सुननेवाले की बात सुनने के बाद आँखों में जल।
  • गरुड़ पक्षियों के राजा, जो यहाँ श्रोता हैं। पहले कथा माँगते हैं, फिर सुनकर बताते हैं कि जो मोह उन्हें यहाँ लाया वह उनके लिये हित था।
  • शिव जिनके मुँह से यह पूरी कथा सुनी जा रही है। बीच में वे पार्वती को पुकारकर याद दिला देते हैं कि भुशुण्डि ने जो कहा वह वही है जो वे स्वयं कहते आये हैं।
  • पार्वती जो सुन रही हैं, और जिनसे अन्त में श्रोता के लक्षणों की बात अलग से कही जाती है।
  • राम जिनकी कथा सुनायी जा रही है। आश्रम में वे केवल कथा के भीतर हैं, नामों में और क्रियाओं में। एक बार भी स्वयं उपस्थित नहीं होते।

जो माँगने आया था, वह पहले ही मिल गया

गरुड़ आश्रम पहुँच चुके हैं। बात उनके एक अजीब वाक्य से खुलती है: जिस कारण से वे आये थे, वह सब काम भुशुण्डि के दर्शन पाते ही हो गया। जो पूछने आये थे, वह पूछा ही नहीं गया, और उत्तर मिल गया।

गरुड़ कहते हैं: “हे तात, सुनिये, मैं जिस कारण से आया था वह सब तो आपके दर्शन पाते ही पूरा हो गया। आपका परम पवित्र आश्रम देखकर ही मेरा मोह, संशय और नाना प्रकार के भ्रम, सब जाते रहे।” मोह, संशय, भ्रम: तीनों एक साँस में गिनाये गये हैं, जैसे कोई अपने पुराने रोगों की सूची पढ़कर हर नाम पर कहे, यह भी गया। और यह सब आश्रम देखने से हुआ। कथा अभी शुरू नहीं हुई, और सुननेवाला कह रहा है कि उसका काम हो गया।

तो फिर आगे क्या बचा? यही इस बात का पेच है। जिसका काम हो गया वह लौट सकता था, पर गरुड़ लौटते नहीं। वे माँगते हैं, और अब यह माँग किसी आवश्यकता से नहीं है।

वे कहते हैं। “अब हे तात, राम की वह कथा आदर के साथ सुनाइये जो अत्यन्त पवित्र करनेवाली है, सदा सुख देनेवाली है, और दुःखों के ढेर का नाश करनेवाली है। मैं बार-बार यही विनती करता हूँ।” जिसका दुःख अभी-अभी गया है वह दुःख नाश करनेवाली कथा माँग रहा है। इसमें विरोध नहीं है: जो दवा से ठीक हो गया वह भी दवा का स्वाद फिर चाह सकता है, यदि दवा मीठी हो। कथा के तीन गुण गिनाये गये हैं, और इनमें से कोई ज्ञान का नहीं है। गरुड़ यह नहीं कहते कि इससे तत्त्व समझ में आयेगा। उनकी माँग रस की माँग है।

पक्षियों का राजा एक काग से बार-बार विनती कर रहा है, और फिर कथा उसकी वाणी के पाँच गुण गिनाती है। इस वाणी का असर कहनेवाले पर वही होता है जो किसी कथावाचक पर एक अच्छे श्रोता का होता है।

गरुड़ की विनम्र, सरल, प्रेमभरी, सुखद और अत्यन्त पवित्र वाणी सुनते ही भुशुण्डि के मन में परम उत्साह हुआ। वे राम के गुणों की गाथा कहने लगे। परम उत्साह: यह बात यहाँ आती है और आगे फिर आयेगी। आगे जो आनेवाला है वह देखने में नामों और घटनाओं की सूची ही है। पर कथा पहले ही बता देती है कि यह सूची किस मन से कही जा रही है, और यही बात उसे सूची नहीं रहने देती।

सरोवर से विवाह तक

कथा कहाँ से शुरू होती है? भुशुण्डि राम के जन्म से शुरू नहीं करते। वे उस रूपक से शुरू करते हैं जिससे यह ग्रन्थ स्वयं शुरू होता है।

शिव कहते हैं कि पहले भुशुण्डि ने बड़े अनुराग से रामचरित रूपी सरोवर का वर्णन किया। टीका इसे रामचरितमानस सरोवर का रूपक कहती है, यानी वही रूपक जिसके नाम पर यह पूरा ग्रन्थ है। भुशुण्डि जो कथा कह रहे हैं वह कोई भी रामकथा नहीं, ठीक यही ग्रन्थ है, इसी क्रम में, इसी रूपक के साथ। इस वाक्य में पार्वती को सम्बोधन है, इसलिये यह भुशुण्डि का नहीं हो सकता। यह शिव का है, जो पार्वती को बता रहे हैं कि भुशुण्डि ने गरुड़ को क्या-क्या कहा। भुशुण्डि ने जो कहा वह राम का चरित है। कथा के भीतर कथा है और उसके भीतर कथा: तीन तहें, और हर तह पर एक कहनेवाला और एक सुननेवाला।

फिर नारद का अपार मोह, और फिर रावण का अवतार। बालकाण्ड के ये दोनों प्रसंग यहाँ एक-एक शब्द में आ गये हैं, मूल के ही क्रम में, और दोनों के बीच बस एक “फिर”। जिसने बालकाण्ड पढ़ा है उसके लिये यह फिर बहुत भारी है। जिसने नहीं पढ़ा उसके लिये यह सार खुलता नहीं। यह सार उनके लिये है जो कथा जानते हैं और उसे फिर से सुनकर सुख पाते हैं।

फिर राम के अवतार की कथा गायी गयी, और उसके बाद मन लगाकर बाललीलाएँ कही गयीं। अवतार की कथा गायी जाती है, बाललीला मन लगाकर कही जाती है। एक में सुर है, दूसरी में ध्यान, और आगे कथा इसी ध्यान को फिर पकड़ती है।

मन में परम उत्साह लेकर अनेक प्रकार की बाललीलाएँ कहकर भुशुण्डि ने फिर ऋषि का आना और राम का विवाह कहा। अनेक प्रकार: बाललीलाएँ अनेक प्रकार की हैं और वे अनेक प्रकार से कही जा रही हैं, यानी सार के भीतर भी यहाँ थोड़ा विस्तार है। पूरे सार में जहाँ-जहाँ “बहुत” या “अनेक प्रकार” लगा है, वहाँ कहनेवाला रुककर थोड़ा फैलता है। ऐसी जगहें गिनी-चुनी हैं: बाललीला, भरत का प्रेम, राम का भरत को समझाना, और लंका की लड़ाई। कोई कहानी में कहाँ रुकता है, इसी से मालूम होता है कि उसे क्या प्रिय है, और यह काग सबसे पहले बालक राम पर रुकता है।

यहाँ ऋषि का नाम नहीं है। पोद्दार की टीका उन्हें विश्वामित्र बताती है और उनके आने को अयोध्या आना कहती है। फिर विवाह: बालकाण्ड का इतना लम्बा उत्सव एक शब्द में, विवाह। सुननेवाले को याद दिलाया जा रहा है, बताया नहीं जा रहा।

अयोध्या: एक वाक्य से टूटा हुआ रस

अब अयोध्या, और यहाँ सार की चाल बदल जाती है। बालकाण्ड थोड़े-से शब्दों में गया था। अयोध्या को उससे कहीं अधिक जगह मिलती है, और उसमें एक भी ठहराव नहीं है।

फिर राम के राज्याभिषेक का प्रसंग, फिर राजा के वचन से राजरस का भंग, फिर पुरवासियों का विरह और विषाद, और राम-लक्ष्मण का संवाद। राज्याभिषेक का आनन्द टूटा, और राजा के वचन से टूटा। वह वचन किसने कहलवाया और क्यों, यह सब यहाँ नहीं है। बचा है केवल इतना कि राजा ने कुछ कहा और रस टूट गया। टीका राजा को दशरथ कहती है, कथा उन्हें केवल राजा कहती है।

आनन्द रस है और उसका टूटना भंग, जैसे कोई भरा हुआ पात्र टूटे। उसके ठीक बाद टूटे पात्र का फैलाव है, पुरवासियों का विरह और विषाद: राजा के एक वाक्य से पूरा नगर दुखी है। इस दुःख के बीच राम और लक्ष्मण का संवाद है, और भुशुण्डि उसे छोड़ते नहीं। दो भाइयों की बातचीत को नगर के विरह के बगल में जगह मिली है।

फिर वन-गमन, केवट का अनुराग, गंगा पार उतरकर प्रयाग में निवास, वाल्मीकि से राम का मिलना, और जैसे भगवान् चित्रकूट में बसे। इस हिस्से में चार जगहें हैं, वन, गंगा, प्रयाग, चित्रकूट, और दो लोग, केवट और वाल्मीकि: ऋषि के साथ मिलन है, नाव खेनेवाले के साथ अनुराग। अनुराग शब्द इस पूरे सार में दो बार आता है, पहली बार कथा कहने के ढंग के लिये, बड़े अनुराग से, और दूसरी बार केवट के लिये। जिस भाव से कहनेवाला कह रहा है, उसी भाव का नाम एक नाव खेनेवाले को मिला है।

इस पूरे सार में राम को भगवान् यहीं एक बार कहा गया है। अयोध्या में नहीं, लंका में नहीं, राज्याभिषेक पर नहीं। वन में, बिना राज्य के, चित्रकूट में बसते हुए।

आगे का हिस्सा लगभग पूरा भरत का है: मन्त्री का नगर लौटना, राजा का मरण, भरत का आना और उनके प्रेम का बहुत वर्णन। राजा की क्रिया करके भरत पुरवासियों के साथ वहाँ गये जहाँ सुख की राशि राम थे। राम ने उन्हें बहुत प्रकार से समझाया, और वे पादुका लेकर अयोध्या लौटे। फिर भरत की रहनी, इन्द्र के पुत्र की करनी, और राम तथा अत्रि की भेंट। राजा का मरना दो शब्दों में है। भरत के प्रेम के साथ बहुत वर्णन लगा है। इस सार में भरत को लगभग उतनी जगह मिली है जितनी पूरे बालकाण्ड को।

टीका इन्द्र के पुत्र को जयन्त कहती है और उसकी करनी को नीच। कथा में कोई विशेषण नहीं, केवल करनी है। फिर अत्रि, और अत्रि की भेंट के बाद सीधे विराध का वध। अयोध्या की कथा और वन की कथा के बीच कोई सीमा नहीं खिंची। इस सार में काण्डों की दीवारें नहीं हैं। कथा एक बहाव है, और कहनेवाला उसमें बहा जा रहा है।

वन: जहाँ विरह बार-बार आता है

जिस प्रकार विराध का वध हुआ और शरभंग ने देह त्यागा, वह कहकर, फिर सुतीक्ष्ण का प्रेम वर्णन करके भुशुण्डि ने राम और अगस्त्य का सत्संग कहा। एक साथ चार नाम, और चारों के साथ अलग क्रिया: विराध का वध, शरभंग का देह त्यागना, सुतीक्ष्ण का प्रेम, अगस्त्य का सत्संग। एक मारा गया, एक ने स्वयं शरीर छोड़ा, एक ने प्रेम किया, और एक के साथ बैठकर बात हुई। हर नाम के साथ वही एक शब्द है जो उस प्रसंग की जान है।

फिर दण्डकवन को पवित्र करना, गीध के साथ मैत्री, पंचवटी में निवास और सब मुनियों के भय का नाश। गीध का नाम यहाँ नहीं है। टीका उन्हें गृध्रराज कहती है और आगे जटायु। मैत्री यानी बराबरी का सम्बन्ध, राम और एक पक्षी के बीच। इस आश्रम में भी दो पक्षी बैठे हैं, और उनमें से एक ठीक इसी कथा को सुनकर राम के चरणों में प्रेम पायेगा।

फिर लक्ष्मण को अनुपम उपदेश, और जैसे शूर्पणखा को कुरूप किया गया। फिर खर-दूषण का वध, और जैसे रावण ने सब भेद जाना। इन चार बातों में कथा की चाल साफ़ दिखती है: पहले शान्त, अनुपम उपदेश। फिर एक स्त्री कुरूप की जाती है। फिर दो राक्षस मरते हैं। और फिर रावण को सब मालूम हो जाता है। एक शान्त बातचीत से रावण की जानकारी तक चार क़दम हैं, और बीच में एक भी शब्द नहीं जिससे लगे कि यह क्रम टाला जा सकता था।

फिर रावण और मारीच की बातचीत जैसे हुई, वह सब कहा। फिर माया-सीता का हरण, और राम के विरह का कुछ वर्णन। मानस की अपनी बात, कि हरण माया-सीता का हुआ, भुशुण्डि के सार में भी नहीं छूटती। और विरह के साथ “कुछ” लगा है, कुछ ही वर्णन: कहनेवाला यहाँ रुकता नहीं, कुछ कहकर आगे बढ़ जाता है।

फिर राम ने जैसे गीध की क्रिया की, कबन्ध को मारकर शबरी को गति दी, और फिर जैसे विरह करते हुए सरोवर के तीर पर गये। जिस पक्षी से मैत्री हुई थी, उसकी अन्त्येष्टि राम ने की: मैत्री और क्रिया, एक ही पक्षी के लिये कुछ ही देर के अन्तर पर, और बीच में पूरा हरण। यहाँ एक का वध है और एक को गति।

और विरह फिर आता है। पहले कुछ ही वर्णन था, अब राम विरह करते हुए सरोवर के तीर तक चलते हैं। टीका सरोवर को पंपासर कहती है। पूरे सार में विरह तीन बार नाम लेकर आया है, एक बार पुरवासियों का और दो बार राम का, और कोई दूसरा भाव इतनी बार नहीं आया।

किष्किन्धा से लंका: दो बार लाँघा हुआ समुद्र

फिर राम और नारद का संवाद, हनुमान के मिलने का प्रसंग, सुग्रीव से मित्रता और बालि के प्राणों का भंग। सुग्रीव का तिलक करके राम ने प्रवर्षण पर्वत पर निवास किया। वर्षा और शरद का वर्णन, राम का रोष और कपि का त्रास। थोड़े-से शब्दों में किष्किन्धा की सारी कथा। इनमें एक बात पूरे सार में केवल यहीं है, ऋतुओं का नाम, वर्षा और शरद। घटनाओं की इस भागती हुई सूची में दो ऋतुएँ अपनी जगह पा गयी हैं। कहनेवाला जल्दी में है, पर लापरवाह नहीं।

राम का क्रोध और वानर का भय, एक साथ, बिना कारण बताये। टीका बताती है कि रोष सुग्रीव पर था और भय सुग्रीव का। और बालि के प्राणों के भंग में भंग शब्द फिर आया है: पहले राजरस का भंग था, अब प्राण का। सार में एक ही शब्द राज्य के आनन्द के टूटने और प्राण के टूटने, दोनों के लिये है।

आगे खोज की बात है: जिस प्रकार वानरराज ने वानर भेजे और वे सीता की खोज में सब दिशाओं में दौड़े। जैसे बिल में प्रवेश किया, और फिर वानरों को सम्पाती मिला। और फिर सम्पाती से सब कथा सुनकर जो होता है, वह इस सार की तेज़ से तेज़ बात है।

सब कथा सुनकर हनुमान अपार समुद्र को लाँघ गये। फिर जैसे लंका में प्रवेश किया, और जैसे सीता को धीरज दिया। समुद्र अपार है और उसे लाँघने में एक शब्द लगा है। कथा हनुमान को यहाँ पवन का बेटा कहती है। लंका पहुँचकर पहला काम जो गिनाया गया है वह युद्ध नहीं, धीरज देना है। समुद्र लाँघकर जो पहुँचा, उसने पहले किसी को ढाढ़स दिया।

लंका में जो हुआ वह चार क्रियाओं में है: वन उजाड़ा, रावण को समझाया, नगर जलाया, फिर समुद्र लाँघा। उजाड़ने और जलाने के बीच समझाना है: रावण को उपदेश दिया गया, और उसके तुरन्त बाद उसका नगर जला। फिर समुद्र दोबारा लाँघा जाता है: एक ही कथा में दो बार, और दोनों बार लगभग एक ही शब्द से। फिर सब वानर वहाँ आये जहाँ राम थे, और सीता की कुशल सुनायी। लंका से लौटकर जो पहली ख़बर दी गयी, वह यह थी कि वे ठीक हैं।

सेतु से अभिषेक तक, और जहाँ सार रुकता है

फिर सेना के साथ राम जैसे समुद्र के तीर पर उतरे, जैसे विभीषण आकर मिले। और समुद्र के निग्रह की कथा, यानी समुद्र को बाँधने की कथा, और उसके साथ ही सेतु।

सेतु बाँधकर जैसे वानर-सेना समुद्र पार उतरी, और जैसे वीरश्रेष्ठ अंगद दूत बनकर गये। फिर राक्षसों और वानरों की लड़ाई का अनेक प्रकार से वर्णन, और कुम्भकर्ण तथा मेघनाद का बल, पौरुष और संहार। कथा अंगद को उनके पिता के नाम से बालिकुमार, बालि का बेटा, कहती है (टीका नाम लेती है, अंगद)। पिता वही है जिसके प्राणों का भंग कुछ ही देर पहले कहा गया था। दूत का काम, और वीरों में श्रेष्ठ: दो शब्दों में पूरा परिचय।

कुम्भकर्ण और मेघनाद, दो नाम और तीन संज्ञाएँ। पहले बल, फिर पौरुष, और फिर उनका अन्त। जो मरे, वे पहले बलवान् और पुरुषार्थी कहे गये हैं। सार में शत्रु को भी उसका पूरा हिस्सा मिला है। मानस यहाँ मेघनाद को घननाद कहता है, मेघ की गरज, जो उसी का दूसरा नाम है।

फिर नाना प्रकार से राक्षसों के समूह का मरण, और राम और रावण का युद्ध। रावण का वध, मन्दोदरी का शोक, विभीषण का राज्य, और देवताओं का शोकहीन होना। एक ओर एक स्त्री का शोक, दूसरी ओर देवताओं का शोक मिटना। रावण की मृत्यु दो जगह गिरती है, एक घर पर और एक स्वर्ग पर।

फिर सीता और राम का मिलन, और देवताओं ने हाथ जोड़कर स्तुति की। फिर वानरों के साथ पुष्पक पर चढ़कर राम अयोध्या को चले। कथा यहाँ उन्हें कृपा का घर कहती है: लंका जीतकर लौटते हुए उनके लिये शब्द विजेता नहीं है। और उनके साथ वानर भी: जो सेना समुद्र पार उतरी थी, सार उसे लौटते हुए भी नहीं छोड़ता।

जिस प्रकार राम अपने नगर आये, वह सब उज्ज्वल चरित काग ने गाया। फिर राम का अभिषेक कहा, और नगर तथा अनेक प्रकार की राजनीति का वर्णन किया। अब तक कथा इतना ही कहती थी कि उन्होंने कहा, वर्णन किया, बखाना, और कहनेवाला छिपा हुआ था। अब कथा घर लौट रही है, तो वह कहनेवाले को उसके रूप से याद करती है, काग। और अन्त में अभिषेक, वही शब्द जिससे अयोध्या की कथा शुरू हुई थी। तब अभिषेक का प्रसंग था और रस भंग हो गया था। अब अभिषेक है, और कुछ भंग नहीं होता।

शिव कहते हैं: “पार्वती, भुशुण्डि ने वह सारी कथा कही जो मैंने आपसे कही है।” सारी रामकथा सुनकर गरुड़ मन में परम उत्साह से बोलने लगे। सार ठीक वहाँ रुकता है जहाँ शिव की अपनी कथा इस समय खड़ी है, राम के अभिषेक और अयोध्या के राज्य के वर्णन पर। भुशुण्डि की कथा शिव की कथा से आगे नहीं जाती। और परम उत्साह यहाँ तीसरी बार आया है, पर इस बार कहनेवाले में नहीं, सुननेवाले में: उत्साह एक पक्षी से दूसरे पक्षी में उतर गया है।

गरुड़ का उत्तर: धूप और छाया

गरुड़ कहते हैं: “मेरा संशय गया, मैंने राम का सारा चरित सुना। हे काकशिरोमणि, आपके प्रसाद से राम के चरणों में मेरा प्रेम हो गया। युद्ध में राम का बन्धन देखकर मुझे अत्यन्त मोह हुआ था कि जो चिदानन्द के घन हैं, वे राम किस कारण विकल हैं।” काकशिरोमणि: पक्षियों का राजा एक काग को यह नाम दे रहा है। और अब गरुड़ बताते हैं कि उनका मोह था क्या: युद्ध में बँधे हुए राम। टीका बन्धन को नागपाश कहती है। प्रश्न यह नहीं था कि राम कौन हैं। प्रश्न यह था कि जो राम हैं, वे ऐसे कैसे हो सकते हैं।

गरुड़ के पहले वाक्य में दो अलग बातें हैं: संदेह गया, और राम के चरणों में प्रेम हुआ। शुरू में गरुड़ ने कहा था कि आश्रम देखते ही मोह, संशय और भ्रम गये। यानी संशय जाने के लिये दर्शन काफ़ी था, पर प्रेम के लिये कथा चाहिये थी। दर्शन ने खाली किया, कथा ने भरा। इसी से समझ में आता है कि जिसका काम हो चुका था वह क्यों बैठा रहा और बार-बार विनती करता रहा।

फिर गरुड़ अपने मोह का हिसाब देते हैं: “बिलकुल मनुष्यों जैसा चरित देखकर मेरे हृदय में भारी संशय हुआ। उस भ्रम को अब मैं अपना हित मानता हूँ। राम ने मुझ पर अनुग्रह किया।” जिसे अभी भारी संशय कहा था, उसे अगले ही वाक्य में हित कह दिया, और यह मानना उन्होंने अपने ऊपर लिया, “मैं मानता हूँ”। किसी ने उन्हें बताया नहीं। इसका कारण आगे है, और वह कारण एक पेड़ है।

गरुड़ कहते हैं: “जो धूप से अत्यन्त व्याकुल होता है, वही पेड़ की छाया का सुख जानता है। हे तात, यदि मुझे अत्यन्त मोह न हुआ होता तो मैं आपसे किस प्रकार मिलता?” इस दृष्टान्त में कोई शास्त्र नहीं है। बस धूप है, एक पेड़ है, और एक थका हुआ यात्री जो छाया में साँस लेता है। छाया सबके लिये है, पर छाया का सुख उसी के लिये है जो जलकर आये। गरुड़ का मोह उनकी धूप था। वह धूप न होती तो यह आश्रम उनके लिये केवल एक जगह होता, और भुशुण्डि केवल एक काग।

फिर वे अपना प्रश्न दूसरी बार पूछते हैं: “मैं आपसे कैसे मिलता, और यह सुन्दर कथा कैसे सुनता, जो आपने बहुत प्रकार से गायी है?” दोनों क्रियाएँ उस रूप में हैं जो न हुई बात को बताती हैं: न मिलता, न सुनता। गरुड़ अपने मोह के बिना अपने जीवन की कल्पना कर रहे हैं, और उस कल्पना में न यह आश्रम है न यह कथा। इसलिये मोह हित है। जिस चीज़ के बिना यह कथा न मिलती, उसे शत्रु कहना कृतघ्नता होती।

और वे इस बात को केवल अपनी नहीं रहने देते: वेद, शास्त्र और पुराणों का यही मत है, और सिद्ध तथा मुनि भी यही कहते हैं, इसमें सन्देह नहीं। एक पक्षी के अपने अनुभव को अब शास्त्र की गवाही दी जा रही है।

वह गवाही यह है, और गरुड़ उसे अपने ऊपर घटाते हैं: “शुद्ध संत उसी को मिलते हैं जिसे राम कृपा करके देखते हैं। राम की कृपा से मुझे आपके दर्शन हुए, और आपके प्रसाद से मेरा सारा संशय गया।” कृपा दो बार है और प्रसाद एक बार, और तीनों की दिशा एक है: राम की कृपा से संत मिलते हैं, संत के प्रसाद से संशय जाता है। संशय जाने का रास्ता एक संत से होकर जाता है, और संत तक पहुँचने का रास्ता राम से होकर। जिसे राम देख लें। देखना ही कृपा है, और जिसे देख लिया गया उसे एक काग मिल गया।

काग की आँखें, और पार्वती के लिये एक बात

गरुड़ की विनय और अनुराग भरी वाणी सुनकर काग का शरीर पुलकित हो गया, नेत्र सजल हो गये, और मन अत्यन्त हर्षित हुआ। फिर शिव पार्वती से कहते हैं कि सुन्दर बुद्धिवाले, सुशील, पवित्र, कथा के रसिक और भगवान् के दास श्रोता को पाकर सज्जन अत्यन्त गोपनीय बात भी प्रकट कर देते हैं। प्रसंग यहाँ पलट जाता है: अब तक असर सुननेवाले पर हो रहा था, अब कहनेवाले पर हो रहा है। जिसने अभी-अभी पूरी रामकथा बिना रुके कह डाली, वह अपने श्रोता की कुछ बातें सुनकर रो पड़ा। कथा कहते हुए उत्साह था, कथा का फल देखकर आँसू हैं, और पूरे प्रसंग में किसी की आँख पहली बार यहीं भरती है।

शिव की यह बात इस पूरी बैठक का नियम है। श्रोता के पाँच लक्षण हैं, और पाँचों में एक भी विद्या का नहीं। बुद्धि अच्छी हो, स्वभाव अच्छा हो, भीतर पवित्रता हो, कथा में रस आता हो, और भगवान् का दास हो। ऐसा श्रोता मिले तो सज्जन अत्यन्त गुप्त बात भी खोल देते हैं।

कथा शुरू होने से पहले गरुड़ की वाणी के पाँच गुण गिनाये गये थे: विनम्र, सरल, प्रेमभरी, सुखद और पवित्र। अन्त में श्रोता के पाँच लक्षण हैं। दोनों सूचियाँ पाँच-पाँच की हैं। जो वाणी पहले गिनायी गयी वह इसी श्रोता की थी। शिव किसी सिद्धान्त की बात नहीं कर रहे, अभी-अभी जो हुआ उसे नियम बनाकर रख रहे हैं। ऐसा सुननेवाला आया, इसलिये यह कथा कही गयी, और इसीलिये आगे कुछ और कहा जायेगा।

वह गुप्त बात क्या है, यह इस प्रसंग में नहीं खुलता। जो कथा अभी कही गयी वह रामचरित है, और वह गुप्त नहीं। शिव स्वयं पार्वती को उसे कह चुके हैं। इसलिये शिव की यह बात पीछे की ओर नहीं, आगे की ओर देख रही है: अब कुछ खुलने वाला है। यह बात दरवाज़ा है, और उसके पार क्या है यह अगला प्रसंग बतायेगा।

सार का नाप, मोह का धन्यवाद

भुशुण्डि के सार में कथा से बड़ी बात कथा का नाप है। जो ग्रन्थ छह काण्डों में फैला है, वह थोड़े-से शब्दों में दोहरा दिया गया। इस दोहराने में कुछ चीज़ें गिरीं और कुछ बचीं। बाललीला को अनेक प्रकार का वर्णन मिला, केवट को अनुराग, भरत को लगभग पूरे बालकाण्ड जितनी जगह। राम का विरह दो बार आया। वर्षा और शरद का नाम आया। और युद्ध, जिस पर पूरा एक काण्ड है, कुछ वाक्यों में सिमट गया। किसी कथा का सार बताता है कि कहनेवाले को उसमें क्या प्रिय है, और इस सार में वह है बालक, नाव खेनेवाला, दूर बैठा भाई, और वियोग।

दूसरी बात गरुड़ की है: उनका मोह उनका हित था। अपनी भूल को स्वीकार करना एक बात है, उसे धन्यवाद देना दूसरी, और गरुड़ दूसरी बात कर रहे हैं, भावुकता से नहीं, तर्क से। धूप न होती तो छाया का सुख न होता। मोह न होता तो यह आश्रम न मिलता। आश्रम न मिलता तो यह कथा न मिलती। हर कड़ी पिछली कड़ी से बँधी है, और पहली कड़ी वह है जिसे लोग काटकर फेंक देना चाहते हैं।

तीसरी बात इस आश्रम से उठकर पूरे ग्रन्थ पर फैल जाती है: कथा कहने की शर्त सुननेवाले में है। कहनेवाले के पास सब कुछ था, पर वह तब बोला जब उसे विनीत वाणी सुनायी दी, और तब रोया जब उसने सुननेवाले को बदला हुआ देखा। और शिव स्वयं यह सब पार्वती को कह रहे हैं। अन्त में वे उन्हीं की ओर मुड़कर कहते हैं कि ऐसा श्रोता मिले तो गुप्त बात भी खुल जाती है। यह बात केवल भुशुण्डि के लिये नहीं। यह सुन रही पार्वती के लिये भी है, और कथा के हर सुननेवाले के लिये।

जिसने पूरा रामचरितमानस पढ़ा है, उसके लिये ये वाक्य एक-एक दरवाज़ा हैं, और हर दरवाज़े के पीछे एक पूरा काण्ड खड़ा है। जिसने नहीं पढ़ा, उसके लिये यह सूची है। यह सार उनके लिये है जो कथा जानते हैं, और शिव पहले ही कह देते हैं कि इसका सुननेवाला कथा का रसिक होना चाहिये। रस वहीं आता है जहाँ याद हो।

इस प्रसंग में राम एक बार भी सामने नहीं आते। वे कथा के भीतर हैं, नामों में, क्रियाओं में, एक काग की गाथा में। पर अन्त में जो होता है वह उन्हीं का किया हुआ है: एक पक्षी का संशय गया, एक पक्षी की आँखें भर आयीं। और एक कहनेवाले ने अपनी सुननेवाली को बताया कि अब गुप्त बात खुलने का समय है। यह सब किसी उपदेश ने नहीं, केवल कथा ने किया है।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, उत्तरकाण्ड, दोहा 64 से 69, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।