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वसिष्ठ की विनती और नारद का आगमन

रामचरितमानस · उत्तरकाण्ड · वसिष्ठ की विनती और नारद का आगमन

वसिष्ठ की विनती और नारद का आगमन

भक्ति के मार्ग का हिसाब पूरा होता है, नगर अपने-अपने घर लौट जाता है, और तब कुलगुरु आकर अपने ही शिष्य के सामने अपने पेशे का नाम नीचा कहते हैं और एक ही वर माँगते हैं, कि यह प्रेम कभी घटे नहीं।

पिछले प्रसंग में एक सभा बैठी थी। बुलावा स्वयं रघुनाथ की ओर से गया था, गुरु आये थे, ब्राह्मण आये थे, और सारा नगर आया था। उसी सभा में संत और असंत के लक्षण अलग-अलग करके रख दिये गये थे, और अन्त में वह गुप्त मत भी कह दिया गया था जिसे कहनेवाले ने हाथ जोड़कर कहा था। यह पन्ना उसी सभा के आख़िरी वचनों से खुलता है। पर जो बात इस पन्ने पर सबसे भारी है, वह सभा में नहीं कही जाती। वह उसके बाद कही जाती है, जब बैठक उठ चुकी है, नगर घर लौट चुका है, और सुननेवाला केवल एक है।

उस बात का कहनेवाला इस काण्ड का सबसे बूढ़ा और सबसे ऊँचा आदमी है। वसिष्ठ, रघुकुल के कुलगुरु, वही जिनके हाथों कुछ ही प्रसंग पहले अभिषेक हुआ था। वे बिना बुलाये आते हैं, उनके चरण धोये जाते हैं, और फिर वे हाथ जोड़कर वह कहना शुरू करते हैं जो शायद ही कोई गुरु अपने शिष्य से कहता हो। पहले यह कि आपको देख-देखकर मेरा भ्रम बढ़ता जाता है। फिर यह कि मेरा अपना पेशा वेद, पुराण और स्मृति, तीनों की निन्दा का पात्र है। फिर एक पुराना हिसाब, कि यह पेशा उन्होंने लिया क्यों था। और अन्त में एक ही माँग, जो इस पूरे उत्तरकाण्ड की सबसे छोटी माँगों में है।

इसके बाद पन्ना बहुत हलका हो जाता है और यही उसकी ख़ूबी है। नगर के बाहर हाथी, रथ और घोड़े बाँटे जाते हैं, थकान लगती है, आमों का एक ठंडा बगीचा मिलता है, एक भाई अपना ही कपड़ा बिछा देता है, और एक सेवक पंखा करने लगता है। तत्त्व की सारी बातचीत के बाद तुलसी हमें एक दोपहर में लाकर बिठा देते हैं, और उसी दोपहर में, बिना किसी सूचना के, हाथ में वीणा लिये नारद चले आते हैं। वे इस पन्ने पर केवल आते हैं और गाना आरम्भ करते हैं। जो कुछ वे कहने आये हैं, वह इस प्रसंग में नहीं है।

इस प्रसंग के मुख्य किरदार

  • राम अयोध्या के राजा, जो इस पन्ने के पहले हिस्से में भक्ति का मार्ग बताते हैं और दूसरे हिस्से में एक लम्बी विनती चुपचाप सुनते हैं।
  • अवध के नर और नारी वह नगर जो सभा में बैठा था और जिसे शिव इसी प्रसंग में कृतार्थस्वरूप कह देते हैं।
  • वसिष्ठ रघुकुल के कुलगुरु, जो बिना बुलाये आते हैं, अपने ही कर्म को नीचा कहते हैं और एक ही वर माँगते हैं।
  • ब्रह्मा जिनका कहा हुआ एक वचन वसिष्ठ इस पन्ने पर याद करते हैं, और जिसके भरोसे उन्होंने वह काम लिया था।
  • भरत जो अमराई में बैठने के लिये अपना ही वस्त्र बिछा देते हैं।
  • हनुमान् जो इस प्रसंग में एक शब्द नहीं बोलते, केवल पंखा करते हैं, और जिन्हें शिव सबसे बड़भागी कह देते हैं।
  • शिव और उमा यह पूरी कथा जिनके बीच चल रही है, और जो इस प्रसंग में दो बार बीच में बोल पड़ते हैं।
  • नारद वे मुनि, जो आख़िरी दोहे में वीणा लिये हुए आते हैं और गाना शुरू कर देते हैं।

भक्ति के रास्ते का खर्च

सभा अभी उठी नहीं है। पिछली बात जहाँ छूटी थी वहाँ एक गुप्त मत कह दिया गया था, और अब उसी साँस में एक प्रश्न पूछा जाता है। पूछनेवाला वही है जो उत्तर भी जानता है, और वह उत्तर स्वयं नहीं कहता। वह सभा से कहलवाना चाहता है। कहहु, कहिये तो। जिस बात को अपने मुँह से कह देना सबसे आसान था, उसे सुननेवालों के मुँह पर छोड़ दिया गया है, और यह ढंग इस पूरे काण्ड में लौट-लौटकर आता है।

कहहु भगति पथ कवन प्रयासा। जोग न मख जप तप उपवासा॥
सरल सुभाव न मन कुटिलाई । जथा लाभ संतोष सदाई॥

चौपाई १

कहिये तो, भक्ति के मार्ग में कौन-सा परिश्रम है। न योग, न यज्ञ, न जप, न तप, न उपवास। और फिर तीन चीज़ें गिनायी जाती हैं जो चाहिये। सरल स्वभाव, मन में कुटिलता का न होना, और जो मिल जाये उसी में सदा सन्तोष। इन तीनों को उन पाँचों के सामने रखकर देखिये। योग के लिये आसन और अभ्यास चाहिये, यज्ञ के लिये सामग्री और ऋत्विज चाहिये, जप के लिये समय चाहिये, तप के लिये ऐसा शरीर चाहिये जो सह सके, और उपवास के लिये कम से कम इतना तो चाहिये ही कि कल खाने को कुछ हो। पाँचों में कुछ न कुछ जुटाना पड़ता है। तीनों में कुछ भी जुटाना नहीं पड़ता। वे किसी दिन में जोड़ी नहीं जातीं, वे स्वभाव में से घटायी जाती हैं।

और तीसरी शर्त पर ज़रा रुकना बनता है, जथा लाभ संतोष सदाई। सन्तोष किसी नियत मात्रा से नहीं नापा गया। जितना मिले, उतने में। यानी माप बाहर से नहीं आता, वह हर दिन बदल सकता है, और शर्त फिर भी वही रहती है। जिसने अपने सन्तोष के लिये कोई संख्या तय कर रखी है, उसका सन्तोष उसी संख्या के अधीन है, और जिस दिन संख्या पूरी नहीं होगी उस दिन सन्तोष भी नहीं होगा। यहाँ संख्या हटा दी गयी है, इसीलिये इस शर्त को पूरा करने में कोई ख़र्च नहीं है।

मोर दास कहाइ नर आसा । करइ तौ कहहु कहा बिस्वासा॥
बहुत कहउँ का कथा बढ़ाई । एहि आचरन बस्य मैं भाई॥

चौपाई २

मेरा दास कहलाकर जो मनुष्यों की आशा करता है, कहिये, उसका विश्वास कैसा। ध्यान दीजिये कि यहाँ यह नहीं पूछा गया कि वह मानता क्या है। पूछा यह गया कि ज़रूरत पड़ने पर उसका हाथ किस ओर उठता है। विश्वास की परीक्षा पूजा के समय नहीं होती। वह उस घड़ी होती है जब कुछ चाहिये होता है और चाहनेवाला यह तय करता है कि माँगे किससे। उस एक घड़ी में जो ठिकाना चुना जाता है, वही आदमी का असली ठिकाना है।

और एक शब्द और है जिस पर आँख टिक जाती है, कहाइ। कहलाकर। दास होना एक बात है और दास कहलाना दूसरी। कहलाना अपने आप नहीं होता, वह कराया जाता है। जो आदमी अपना यह परिचय बनवाने में लगा हुआ है, वह देर-सबेर उसी परिचय के बल पर लोगों से कुछ न कुछ चाहने लगेगा, क्योंकि जो पदवी मेहनत से बनायी जाती है उसका ब्याज भी माँगा जाता है। इसी से यह पंक्ति दास पर नहीं, कहलाने पर उँगली रखती है।

और फिर वह आधी पंक्ति जिसमें सारा हिसाब चुक जाता है, एहि आचरन बस्य मैं भाई। बात बढ़ाकर क्या कहूँ, हे भाई, मैं तो इसी आचरण के वश में हूँ। जिसकी आराधना के लिये अभी पाँच बड़े साधन गिनाकर छोड़ दिये गये थे, वही अपने वश में होने की क़ीमत स्वयं बता रहा है, और वह क़ीमत आचरण है। और सम्बोधन भाई है। जिस सभा में गुरु और ब्राह्मण बैठे हैं, वहाँ राजा उन्हें भाई कहकर बुला रहा है, और यह शब्द इस पन्ने पर आगे भी लौटेगा।

आगे की दो चौपाइयों में वह आचरण खोला जाता है, और खोलने का ढंग देखने लायक है। न किसी से वैर, न लड़ाई-झगड़ा, न आशा, न भय। और फिर वह पंक्ति जो कान में अटक जाती है, सुखमय ताहि सदा सब आसा। ऊपर की पंक्ति में आस थी, आशा के अर्थ में, और नीचे की पंक्ति में आसा है, दिशा के अर्थ में। एक ही ध्वनि दो बार आयी है और दोनों बार उसका अर्थ दूसरा है। जिसने आस छोड़ी, उसे सब आसा मिल गयीं। जो आदमी किसी से कुछ नहीं चाहता, उसके लिये कोई दिशा बन्द नहीं रहती, क्योंकि दिशाएँ माँगने से ही बन्द होती हैं।

उसके बाद विशेषण एक साथ आते हैं और उनमें से अधिकतर के आगे नकार लगा हुआ है। अनारंभ अनिकेत अमानी, और फिर अनघ और अरोष। जो फल की इच्छा से कुछ आरम्भ नहीं करता, जिसका अपना कोई घर नहीं, यानी जिसकी घर में ममता नहीं, जो मानरहित है, पापरहित है, क्रोधरहित है। और उसके ठीक बाद दो शब्द बिना नकार के आते हैं, दच्छ बिग्यानी। निपुण और विज्ञानवान्। जो सूची घटाने से शुरू हुई थी वह जोड़ने पर बन्द होती है, और जो जोड़ा गया है वह निपुणता है। भक्ति में फूहड़पन के लिये जगह नहीं छोड़ी गयी।

और फिर वह जो इस सूची में सबसे तीखा है। संतों के संग से सदा प्रीति, और विषय, स्वर्ग तथा अपवर्ग, तीनों तिनके के बराबर। विषय तिनके हैं, यह सुनने में कठिन नहीं लगता। स्वर्ग तिनका है, यह भी सह लिया जाता है। पर अपवर्ग, मुक्ति, वह भी तिनका। जिस चीज़ के लिये सारे साधन किये जाते हैं उसे भी उसी ढेर में डाल दिया गया है। और उसके तुरन्त बाद एक और भेद खींचा जाता है, कि वह भक्ति के पक्ष में हठ करता है पर सठताई नहीं करता। अड़ना मना नहीं है, दूसरे को नीचा दिखाने की चतुराई मना है। कुतर्कों को दूर बहा देने की बात कही गयी है, बहस जीतने की नहीं।

मम गुन ग्राम नाम रत गत ममता मद मोह।
ता कर सुख सोइ जानइ परानंद संदोह॥ ४६॥

दोहा ४६

और तब वह दोहा आता है जिसमें यह पूरी शिक्षा अपने ऊपर परदा डाल लेती है। जो मेरे गुणसमूहों और मेरे नाम में रत है, जो ममता, मद और मोह से निकल चुका है, उसका सुख वही जानता है जो स्वयं परमानन्द की राशि को पा चुका है। ध्यान दीजिये कि उस सुख का वर्णन नहीं किया गया। उसकी एक शर्त बता दी गयी, और शर्त यह है कि जाननेवाला स्वयं वही हो चुका हो। इतनी देर तक जो मार्ग सुगम बताया जाता रहा, उसके फल को अन्त में हाथ में नहीं दिया जाता। यह एक बन्द घेरा है और जान-बूझकर बन्द है, क्योंकि जिस चीज़ को चखने पर ही समझा जा सकता है, उसके विषय में बताना समय बरबाद करना है।

सार: राम सभा से पूछते हैं कि भक्ति के मार्ग में कौन-सा परिश्रम है, और योग, यज्ञ, जप, तप तथा उपवास को हटाकर तीन चीज़ें माँगते हैं, सरल स्वभाव, कुटिलता का अभाव और जो मिले उसी में सन्तोष। जो दास कहलाकर मनुष्यों से आशा करे उसका विश्वास कच्चा है। बैर, कलह, आशा और भय से रहित, मानरहित, क्रोधरहित, निपुण और विज्ञानवान्, जिसे स्वर्ग और मुक्ति तक तिनके के बराबर हैं, ऐसे आचरण के वे स्वयं वश में हैं। और उस भक्त का सुख वही जान सकता है जो स्वयं परमानन्द को प्राप्त हो।

और सब अपने-अपने घर गये

अब देखना यह है कि इतनी बड़ी बात सुनकर नगर करता क्या है। तुलसी उन वचनों के लिये एक ही उपमा लगाते हैं, सुधा, और सुनने का फल तुरन्त बता देते हैं। सबने चरण पकड़ लिये। यह सभा का शिष्टाचार नहीं है। शिष्टाचार में एक आदमी आगे बढ़ता है और सबकी ओर से झुक जाता है। यहाँ सब एक साथ झुके हैं, और जो पहले बोला वह कोई एक नहीं, सब हैं।

सुनत सुधासम बचन राम के। गहे सबनि पद कृपाधाम के॥
जननि जनक गुर बंधु हमारे । कृपा निधान प्रान ते प्यारे॥

चौपाई ३

हे कृपानिधान, आप हमारे माता, पिता, गुरु और भाई हैं, और प्राणों से भी प्यारे हैं। चार रिश्ते गिनाये गये हैं और चारों घर के भीतर के हैं। सामने राजा बैठा है, सिंहासन है, छत्र है, नगर का सारा वैभव है, और जो नाम गिनाये जा रहे हैं उनमें एक भी राजकीय नहीं है। इस काण्ड में यह अदला-बदली बार-बार होती है, कि जिसे सब ऊपर बिठाना चाहते हैं उसे उसके अपने लोग भीतर बिठा लेते हैं। और सूची में गुरु का नाम भी है, जबकि उसी सभा में असली गुरु बैठे हुए हैं।

आगे नगर शरीर, धन और घर, तीनों उसी एक नाम पर लिख देता है, और फिर वह वाक्य कहता है जो इस पूरे पन्ने का सबसे कड़वा वाक्य है। ऐसी सीख आपके बिना कोई नहीं देता। माता-पिता भी स्वार्थ में लगे हुए हैं। दो पंक्ति पहले इन्हीं लोगों ने राम को माता और पिता कहा था। अब वे अपने असली माता-पिता के विषय में यह कह रहे हैं। एक ही शब्द से बड़ाई भी हुई और उलाहना भी दे दिया गया, और दोनों एक साँस के भीतर।

और यह उलाहना निर्दयी नहीं है। इसका कारण सोचने पर मिल जाता है। माता-पिता की सलाह उनके अपने प्रेम से रँगी होती है। वे यही चाहेंगे कि सन्तान बनी रहे, पास रहे, बढ़े, सुरक्षित रहे, और उन्हें देखती रहे। जो सीख सन्तान को उनसे दूर ले जा सकती हो, वह उनके मुँह से निकलनी कठिन है, और यह उनका दोष नहीं, उनके प्रेम का आकार है। इसीलिये वह सीख उसी से मिल सकती है जिसे सुननेवाले से कुछ नहीं चाहिये।

हेतु रहित जग जुग उपकारी । तुम्ह तुम्हार सेवक असुरारी॥
स्वारथ मीत सकल जग माहीं । सपनेहुँ प्रभु परमारथ नाहीं॥

चौपाई ४

जगत् में बिना किसी हेतु के उपकार करनेवाले दो ही हैं, आप और आपके सेवक। जुग, यानी दो। यह गिनती है, और गिनती उस सभा में की जा रही है जहाँ गुरु बैठे हैं, ब्राह्मण बैठे हैं, नगर के बड़े-बूढ़े बैठे हैं। इतने लोगों के सामने संख्या दो बतायी गयी है और किसी ने आपत्ति नहीं की। पर दूसरा नाम ध्यान से देखिये। दूसरा कोई वर्ग नहीं है, कोई पद नहीं है, कोई जन्म नहीं है। आपके सेवक। यह वह श्रेणी है जिसमें उसी समय, उसी जगह, कोई भी दाख़िल हो सकता है। गिनती छोटी रखी गयी है और दरवाज़ा खुला छोड़ दिया गया है।

और बाक़ी सब स्वार्थ के मित्र हैं, उनमें सपनेहुँ परमार्थ नहीं। सपने में भी नहीं। यह एक शब्द पूरी बात को मुहावरे से निकालकर बहुत गहरी जगह ले जाता है। जागते हुए आदमी अपने को सँभालता है, अपना चेहरा बनाये रखता है, जो कहना चाहिये वही कहता है। नींद में वह सँभालता नहीं। वहाँ जो निकलता है वही उसका असली है। और वहाँ भी परमार्थ नहीं मिलता, यह कहकर नगर ने अपने विषय में भी वही कह दिया जो उसने संसार के विषय में कहा था, क्योंकि वह स्वयं भी उसी संसार में रहता है।

इसके बाद तुलसी एक पंक्ति में सुननेवाले की ओर से भी उत्तर दे देते हैं। सबके वचन प्रेम के रस में सने हुए थे, और उन्हें सुनकर रघुनाथ हृदय में हर्षित हुए। साने, सने हुए। जैसे कोई चीज़ किसी रस में डुबोकर रखी गयी हो और अब उससे अलग न की जा सके। बात और भाव दो चीज़ें नहीं रह गयीं, और यही कारण है कि वे वचन उस आदमी को भी अच्छे लगे जिसने अभी-अभी उन्हें यह सिखाया था कि स्तुति से कुछ नहीं होता।

और तब वह होता है जो इस पन्ने पर सबसे साधारण है और इसीलिये सबसे ध्यान देने लायक। आज्ञा पाकर सब अपने-अपने घर चले गये, और रास्ते भर प्रभु की उस सुन्दर बातचीत का वर्णन करते गये। कोई वहीं नहीं रह गया। किसी ने संन्यास नहीं लिया, किसी ने कोई नया व्रत नहीं लिया, किसी को कोई नियम नहीं सौंपा गया। सब घर लौट गये, और जो साथ ले गये वह कोई साधना नहीं थी, वह बातचीत थी। तुलसी उसके लिये जो शब्द लगाते हैं वह बतकही है, घर-आँगन का शब्द। इस काण्ड का सबसे ऊँचा उपदेश उसी शब्द के सहारे घर तक पहुँचता है, गली में, चलते-चलते, दुहराया जाता हुआ।

और यहीं कथा एक क़दम पीछे हट जाती है। अब तक जो कुछ हो रहा था वह अयोध्या में हो रहा था। इस दोहे में अचानक एक दूसरी आवाज़ सुनायी देने लगती है, क्योंकि यह सारी कथा शिव पार्वती से कह रहे हैं, और यहाँ वे बीच में बोल पड़ते हैं।

उमा अवधबासी नर नारि कृतारथ रूप।
ब्रह्म सच्चिदानंद घन रघुनायक जहँ भूप॥ ४७॥

दोहा ४७

हे उमा, अवध में रहनेवाले नर और नारी सब कृतार्थस्वरूप हैं, जहाँ स्वयं सच्चिदानन्दघन ब्रह्म रघुनाथ राजा हैं। दो बातें इस दोहे में रखी हुई हैं। पहली, कृतारथ रूप। वे कृतार्थ हैं, इतना ही नहीं कहा गया। वे कृतार्थता का रूप ही हैं। दूसरी, और यह अधिक चुभती है, कि इसका कोई कारण साधन में नहीं बताया गया। न तप, न व्रत, न दान, न कोई पुण्य। केवल जगह बतायी गयी है, जहँ भूप, जहाँ वे राजा हैं। पात्रता का सारा हिसाब एक भौगोलिक वाक्य में बदल दिया गया है।

और नर नारि, दोनों। जिस सभा को हम अभी उठते देख आये हैं उसमें गुरु थे, द्विज थे, पुरवासी थे। दोहा उस दायरे को चुपचाप चौड़ा कर देता है और उन्हें भी भीतर ले लेता है जो उस सभा में बैठी नहीं थीं। जिन्होंने वे वचन सुने ही नहीं, वे भी उसी सूची में हैं, क्योंकि सूची सुनने पर नहीं बनी है, बसने पर बनी है। और यह इस पूरे काण्ड की सबसे उदार पंक्तियों में है, क्योंकि इसमें किसी से कुछ माँगा नहीं गया।

सार: वचन सुनकर सबने चरण पकड़ लिये और कहा कि आप ही हमारे माता, पिता, गुरु और भाई हैं, ऐसी सीख देनेवाला कोई नहीं, माता-पिता तक स्वार्थ में लगे हैं, और बिना हेतु उपकार करनेवाले संसार में दो ही हैं, आप और आपके सेवक। उनके प्रेम में सने वचन सुनकर राम हर्षित हुए और सब आज्ञा पाकर उसी बातचीत का वर्णन करते हुए अपने घर लौट गये। शिव उमा से कहते हैं कि अवध के नर और नारी कृतार्थस्वरूप हैं, जहाँ स्वयं ब्रह्म राजा हैं।

एक बार वसिष्ठ आये

अब पन्ना करवट लेता है, और तुलसी उसे ठीक उन्हीं दो शब्दों से खोलते हैं जिनसे उन्होंने पिछली सभा खोली थी। एक बार। वहाँ एक बार रघुनाथ ने बुलाया था और गुरु, ब्राह्मण तथा पुरवासी सब आये थे। यहाँ किसी ने नहीं बुलाया। जो आते हैं वे स्वयं आते हैं, और वे इस घर के सबसे पुराने आदमी हैं।

एक बार बसिष्ट मुनि आए । जहाँ राम सुखधाम सुहाए॥
अति आदर रघुनायक कीन्हा । पद पखारि पादोदक लीन्हा॥

चौपाई ५

एक बार वसिष्ठ मुनि वहाँ आये जहाँ सुख के धाम सुन्दर राम थे। रघुनाथ ने अत्यन्त आदर किया, उनके चरण धोये और वह चरणोदक लिया। यह आधी पंक्ति एक पूरे राज्य का शिष्टाचार उलटकर रख देती है। कुछ ही प्रसंग पहले इन्हीं वसिष्ठ के हाथों इसी राजा का अभिषेक हुआ था। राजा अब सिंहासन पर है, और वही राजा नीचे बैठकर अपने पुरोहित के पैर धो रहा है और वह जल अपने ऊपर ले रहा है। तुलसी इस पर एक शब्द टिप्पणी नहीं करते। वे इसे उसी लहजे में लिख देते हैं जिसमें घर की कोई रोज़ की बात लिखी जाती है, और यही इसे बड़ा बनाता है।

और यह ध्यान रखिये कि यहाँ किसी ने कुछ माँगा नहीं है। मुनि माँगने नहीं आये, राजा देने नहीं बैठा। आदर पहले हो चुका है और बात बाद में शुरू होती है, इसलिये आगे जो कुछ कहा जायेगा उस पर किसी लेन-देन की छाया नहीं है।

राम सुनहु मुनि कह कर जोरी । कृपासिंधु बिनती कछु मोरी॥
देखि देखि आचरन तुम्हारा । होत मोह मम हृदयँ अपारा॥

चौपाई ६

मुनि हाथ जोड़कर कहते हैं, हे राम, सुनिये, हे कृपासिन्धु, मेरी कुछ विनती है। जिनके चरण अभी-अभी धोये गये हैं, वे हाथ जोड़े खड़े हैं, और यह क्रम उलटा नहीं है, यही इस घर का क्रम है। और उसके बाद वे वह वाक्य कहते हैं जो शायद ही कोई गुरु अपने शिष्य से कहता हो। आपके आचरण देख-देखकर मेरे हृदय में अपार मोह होता है।

देखि देखि। एक बार नहीं, बार-बार। जितना देखते हैं उतना ही उलझते हैं। साधारण अनुभव इससे उलटा है। जिस चीज़ को बार-बार देखा जाये वह साफ़ होती जाती है, आदत बन जाती है, चुभना बन्द कर देती है। यहाँ उलटा हो रहा है, और कहनेवाला वह आदमी है जो इस घर में सबसे पुराना है। उसने इस वंश की पुरोहिती ब्रह्मा के कहने पर ली थी, और उसी नाते वह इस घर के हर शुभ अवसर पर खड़ा रहा है। तिलक भी उसी ने किया था। और वही कह रहा है कि जितना देखता हूँ उतनी ही समझ कम होती जाती है।

और यह भी देखिये कि वे इस मोह को हटाने की प्रार्थना नहीं करते। यह विनती उसी से शुरू होती है और उसी पर रुक जाती है। मोह कारण है, माँग नहीं। इसी के बल पर वे आगे बोलने की छूट माँग लेते हैं, और आगे जो कुछ आता है वह सचमुच किसी का प्रश्न नहीं है। वह एक आदमी का अपना हिसाब है जो वह ऊँची आवाज़ में कह रहा है, उसके सामने जिसके कारण वह हिसाब बना।

सार: एक बार वसिष्ठ बिना बुलाये वहाँ आते हैं जहाँ राम हैं। राम बहुत आदर करते हैं, उनके चरण धोकर चरणोदक लेते हैं। मुनि हाथ जोड़कर कहते हैं कि मेरी एक विनती है, और पहली ही बात यह कहते हैं कि आपके आचरण देख-देखकर मेरे हृदय में अपार मोह होता है। वे उस मोह को मिटाने की प्रार्थना नहीं करते, उसे आगे कहने का कारण बनाकर छोड़ देते हैं।

जिस काम की निन्दा तीन ग्रन्थ करते हैं

अब वह आता है जो इस पन्ने की धुरी है, और वह इतनी सादगी से आता है कि पहली बार पढ़ने में निकल जाता है।

महिमा अमिति बेद नहिं जाना। मैं केहि भाँति कहउँ भगवाना॥
उपरोहित्य कर्म अति मंदा। बेद पुरान सुमृति कर निंदा॥

चौपाई ७

आपकी महिमा अमित है, उसे वेद तक नहीं जानते, फिर मैं किस प्रकार कहूँ। और उसके तुरन्त बाद, बिना किसी भूमिका के, बिना किसी के पूछे, वह वाक्य आता है जिसके लिये यह पन्ना याद रखा जाना चाहिये। पुरोहिती का कर्म अत्यन्त नीचा है, और वेद, पुराण तथा स्मृति, तीनों उसकी निन्दा करते हैं।

जो यह कह रहे हैं वे रघुकुल के कुलगुरु हैं। इस राज्य में जो कुछ शुभ होता है उसमें उनका हाथ होता है। यह पेशा उनका परिचय है, उनकी प्रतिष्ठा है और उनकी रोज़ी है। और वे उसका नाम लेकर उसे नीचा कहते हैं, अपने ही शिष्य के सामने, जो अब राजा है, और गवाही में तीन ग्रन्थ रख देते हैं। किसी ने पूछा नहीं था। राम ने कोई प्रश्न नहीं किया था। यह आदमी अपने आप यह कह रहा है, और उसके पास इसे न कहने के हज़ार कारण थे।

और दोनों वाक्यों को साथ रखकर देखिये, क्योंकि उनमें एक ही प्रमाण दो बार आया है। पहले वाक्य में वेद वह है जो आपकी महिमा नहीं जान सका। दूसरे वाक्य में वेद वह है जो मेरे काम की निन्दा करता है। एक ही ग्रन्थ, और दोनों बार वसिष्ठ उसे मान लेते हैं। जहाँ वह उनके अपने काम के विरुद्ध जाता है वहाँ भी वे उसका खण्डन नहीं करते, जबकि खण्डन करना उनके लिये सबसे आसान होता। शास्त्र उनका अपना क्षेत्र है और तर्क उनका अपना औज़ार। वे उस औज़ार को नहीं उठाते।

और तुलसी यह नहीं बताते कि इस कर्म की निन्दा किस कारण होती है। न कोई तर्क दिया गया है, न कोई उदाहरण, न कोई प्रसंग। केवल इतना कहा गया है कि तीनों इसे नीचा कहते हैं। पोद्दार की टीका इसे पेशा कहकर पहचानती है, यानी वह काम जिससे घर चलता है। इससे आगे पाठ चुप है, और उस चुप्पी को भरना पढ़नेवाले का काम नहीं है। जो कहा गया वह इतना ही है कि निन्दा है, और कहनेवाला उसे मानता है।

जब न लेउँ मैं तब बिधि मोही । कहा लाभ आगें सुत तोही॥
परमातमा ब्रह्म नर रूपा। होइहि रघुकुल भूषन भूपा॥

चौपाई ८

जब मैं इसे नहीं ले रहा था, तब ब्रह्मा ने मुझसे कहा कि हे पुत्र, इससे तुमको आगे चलकर लाभ होगा। तो पहले वे मना कर चुके थे। सूर्यवंश की पुरोहिती उनके सामने रखी गयी थी और उन्होंने हाथ नहीं बढ़ाया था। इस एक आधी पंक्ति से पूरी बात का ढाँचा बदल जाता है। वे उस काम में गिर नहीं गये थे, उन्हें उसमें उतारा गया था, और उतारनेवाले को उतारने के लिये कुछ कहना पड़ा था।

और जो कहा गया वह भी देखने लायक है। ब्रह्मा ने इस काम की प्रतिष्ठा की वकालत नहीं की। उन्होंने यह नहीं कहा कि शास्त्र ग़लत हैं, यह नहीं कहा कि निन्दा अनुचित है, यह नहीं कहा कि कर्म को कर्ता ऊँचा कर देता है। उन्होंने एक ख़बर दी। स्वयं परमात्मा ब्रह्म मनुष्य का रूप लेकर रघुकुल के भूषण राजा होंगे। होइहि, होंगे। भविष्य का क्रियारूप, और उसके सिवा कोई आश्वासन नहीं।

और अब, इस क्षण, वही होइहि सामने बैठा हुआ है और इन्हीं के चरणों का जल अपने माथे लगा चुका है। जो कभी आगे की बात थी वह हो चुकी है। इसीलिये यह पूरी विनती एक बूढ़े आदमी का अपनी लम्बी प्रतीक्षा का हिसाब देना बन जाती है, और उसमें शिकायत का एक शब्द नहीं है। उसने जिस भरोसे पर वह काम लिया था, वह भरोसा पूरा हुआ, और वह यह बात उसी के सामने कह रहा है जिसके कारण पूरा हुआ।

तब मैं हृदयँ बिचारा जोग जग्य ब्रत दान।
जा कहुँ करिअ सो पैहउँ धर्म न एहि सम आन॥ ४८॥

दोहा ४८

तब मैंने हृदय में विचार किया कि जिसके लिये योग, यज्ञ, व्रत और दान किये जाते हैं, उसे मैं इसी काम से पा जाऊँगा, तब तो इसके समान दूसरा धर्म है ही नहीं। बिचारा, विचार किया। वे इसे छिपाते नहीं कि यह एक हिसाब था। उन्होंने भावुक होकर हाँ नहीं कह दी थी। उन्होंने तौला था, और तौलकर लिया था, और आज इतने बरस बाद उस तौल को दुहरा भी रहे हैं।

और अब इस दोहे की चार चीज़ों को इसी पन्ने के पहले हिस्से के पास रखकर देखिये। वहाँ योग, यज्ञ, जप, तप और उपवास गिनाकर कहा गया था कि भक्ति के मार्ग में इनका परिश्रम नहीं है। यहाँ योग, यज्ञ, व्रत और दान गिनाकर कहा जा रहा है कि जिस फल के लिये ये किये जाते हैं, वह फल इसी एक काम से मिल जायेगा। एक ही सूची दो बार आयी है और दोनों बार उसे पार कर दिया गया है। एक बार भक्ति के नाम पर और एक बार उस सेवा के नाम पर जो भक्ति के ही घर की है।

और जिस काम से यह मिलेगा वह वही काम है जिसे तीन ग्रन्थ नीचा कहते हैं। वसिष्ठ उस निन्दा को झुठलाते नहीं। वे उसे मानकर भी वह काम लेते हैं, क्योंकि उनका हिसाब काम पर नहीं लगा था। वह उस काम के दूसरे सिरे पर बैठनेवाले पर लगा था, और वह सिरा अभी था ही नहीं, वह आनेवाला था। कोई आदमी किसी नौकरी को इसलिये स्वीकार करे कि उसका मालिक एक दिन कोई और होगा, यह अपने आप में एक लम्बी प्रतीक्षा का नाम है।

सार: वसिष्ठ कहते हैं कि आपकी महिमा वेद भी नहीं जानते, और उसके तुरन्त बाद यह कि पुरोहिती का कर्म अत्यन्त नीचा है और वेद, पुराण तथा स्मृति तीनों उसकी निन्दा करते हैं। जब वे उसे नहीं ले रहे थे तब ब्रह्मा ने उन्हें कहा था कि आगे लाभ होगा, क्योंकि स्वयं ब्रह्म मनुष्यरूप लेकर रघुकुल के राजा होंगे। तब उन्होंने विचार किया कि योग, यज्ञ, व्रत और दान का जो फल है वह इसी से मिल जायेगा, और इसके समान दूसरा धर्म नहीं है।

मैल से मैल नहीं धुलता

इसके बाद वसिष्ठ एक लम्बी साँस में एक लम्बी सूची गिनाते हैं और उसे बीच में कहीं रोकते नहीं। जप, तप, नियम, योग, अपना-अपना धर्म, श्रुति से निकले हुए अनेक शुभ कर्म, ज्ञान, दया, दम, तीर्थस्नान, और जहाँ तक वेद तथा संतजन धर्म कहते हैं वहाँ तक सब कुछ। यह सूची किसी को छोटा करने के लिये नहीं बनायी गयी है। इसमें एक भी चीज़ ऐसी नहीं है जिसका कोई विरोध करता हो, और गिनानेवाला वह आदमी है जिसने जीवन भर यही सब कराया है। सूची इसलिये बनायी गयी है कि उसका एक फल बताया जा सके।

आगम निगम पुरान अनेका। पढ़े सुने कर फल प्रभु एका॥
तव पद पंकज प्रीति निरंतर । सब साधन कर यह फल सुंदर॥

चौपाई ९

अनेक आगम, निगम और पुराणों के पढ़ने और सुनने का फल, हे प्रभो, एक ही है। एका। इतनी लम्बी सूची के सामने एक अंक रख दिया गया। और वह एक क्या है, यह उसी चौपाई की दूसरी पंक्ति में है। आपके चरणकमलों में निरन्तर प्रीति। और सब साधनों का भी यही सुन्दर फल है।

निरंतर, यही इस पंक्ति का काँटा है। प्रीति की मात्रा नहीं माँगी गयी। उसकी गहराई नहीं माँगी गयी, उसका ताप नहीं माँगा गया, उसका कोई लक्षण नहीं माँगा गया। उसका बिना टूटे बने रहना माँगा गया है। किसी दिन बहुत प्रेम हो जाना कठिन नहीं है, और वह दिन आ भी जाता है। कठिन यह है कि वह उस दिन भी बना रहे जिस दिन भीतर कुछ भी अनुभव न हो रहा हो। इसीलिये आगे जो वर माँगा जायेगा वह बढ़ने का नहीं होगा, न घटने का होगा।

छूटइ मल कि मलहि के धोएँ । घृत कि पाव कोइ बारि बिलोएँ॥
प्रेम भगति जल बिनु रघुराई । अभिअंतर मल कबहुँ न जाई॥

चौपाई १०

मैल से धोने पर क्या मैल छूटता है। जल मथने से क्या किसी को घी मिलता है। दो प्रश्न हैं, और दोनों एक ही बात नहीं कह रहे। पहले में साधन ग़लत है, धोनेवाला उसी चीज़ से धो रहा है जिसे हटाना है। दूसरे में क्रिया ठीक है और वस्तु ग़लत है, मथना ही घी निकालने का ढंग है, पर जो मथा जा रहा है उसमें घी है ही नहीं। दोनों को साथ रखिये तो असफलता के दोनों रास्ते ढक जाते हैं, और बीच में बचने की कोई जगह नहीं रहती।

और दूसरी उपमा में एक बात और छिपी हुई है जो चुभती है। जल मथनेवाला ठीक उतनी ही मेहनत करता है जितनी दूध मथनेवाला। बाहर से दोनों एक जैसे दिखते हैं। वही रस्सी, वही मथानी, वही आगे-पीछे होता शरीर, वही थकान, वही पसीना। फ़र्क़ आँख से दिखायी नहीं देता, वह मटके के भीतर है। इसलिये परिश्रम इस हिसाब में कोई प्रमाण नहीं है, और यह बात इसी पन्ने के पहले हिस्से से मिलकर बैठ जाती है, जहाँ कहा गया था कि भक्ति के मार्ग में परिश्रम है ही कौन-सा।

और यह उपमा किसके मुँह से निकल रही है, यह भी देखने की चीज़ है। घी उस आदमी के काम की चीज़ है जो जीवन भर यज्ञ कराता रहा है। उसने उसे नापा है, डाला है, उसकी गन्ध में बैठा है, और उसके बिना कोई आहुति पूरी नहीं होती। जो आदमी घी और जल का भेद रोज़ के काम में जानता है, वही यह पूछ रहा है कि जल मथकर घी नहीं निकलता। उपमा उसके अपने आँगन से उठायी गयी है, किसी शास्त्र से नहीं।

और अन्त में वे कह देते हैं कि हे रघुनाथ, प्रेम-भक्ति के जल के बिना भीतर का मैल कभी नहीं जाता। यह वाक्य उस आदमी का है जो सारे कर्मकाण्ड का आचार्य है, और वह इसे अपनी ही लम्बी सूची के नीचे लिख रहा है। और सामनेवाले ने इसका कोई उत्तर नहीं दिया। न यहाँ, न इसके बाद। इस पूरे प्रसंग में राम इस विनती का एक शब्द भी उत्तर नहीं देते, और यह चुप्पी अपने आप में इस पन्ने की एक घटना है।

उसके बाद सात पदवियाँ एक साथ बाँट दी जाती हैं। वही सर्वज्ञ है, वही तत्त्वज्ञ, वही पण्डित, वही गुणों का घर, वही अखण्ड विज्ञानवाला, वही चतुर, वही सब सुलक्षणों से युक्त, जिसका आपके चरणकमलों में प्रेम है। सात नाम हैं और शर्त एक है, और वह शर्त किसी परीक्षा से नहीं जाँची जा सकती। कोई सभा इस पर निर्णय नहीं दे सकती, कोई शास्त्रार्थ इसे सिद्ध नहीं कर सकता। पण्डित की पदवी उस चीज़ पर टाँग दी गयी है जो केवल दो के बीच की बात है, और यह कहनेवाला स्वयं उस युग का सबसे बड़ा पण्डित है।

नाथ एक बर मागउँ राम कृपा करि देहु।
जन्म जन्म प्रभु पद कमल कबहुँ घटै जनि नेहु॥ ४९॥

दोहा ४९

हे नाथ, हे राम, मैं एक वर माँगता हूँ, कृपा करके दीजिये। जन्म-जन्म में प्रभु के चरणकमलों में मेरा नेह कभी न घटे। माँगनेवाला वह आदमी है जो वर देने के काम में जीवन बिता चुका है। यजमान के लिये हाथ उठाना उसका पेशा है, और वही पेशा है जिसे उसने अभी नीचा कहा। आज उसने अपने लिये हाथ उठाया है, और एक ही चीज़ माँगी है।

और माँग का व्याकरण देखिये, घटै जनि। न घटे। उन्होंने यह नहीं माँगा कि यह प्रेम बढ़े। यह नहीं माँगा कि वह प्रगाढ़ हो, यह नहीं माँगा कि उसका कोई फल मिले, यह नहीं माँगा कि उन्हें कहीं कोई जगह मिले। उन्होंने घटने के विरुद्ध माँगा है। जिसके पास कोई चीज़ है और जो जानता है कि वह चीज़ कितनी क़ीमती है, उसकी माँग इसी आकार की होती है। और जन्म जन्म, यानी उस एक जगह के पार भी, जहाँ आदमी अपना नाम तक नहीं ले जा पाता।

और अब उस मोह को याद कीजिये जिससे यह बातचीत शुरू हुई थी। वसिष्ठ ने कहा था कि आपके आचरण देख-देखकर मेरे हृदय में अपार मोह होता है। बातचीत के अन्त में उन्होंने उस मोह को हटाने की प्रार्थना नहीं की। उन्होंने उसे वहीं रहने दिया और दूसरी चीज़ की रक्षा माँग ली। समझ में न आना उन्हें स्वीकार है। प्रेम का कम पड़ जाना स्वीकार नहीं है। और जिस आदमी ने अपनी पूरी उम्र समझने में लगायी हो, उसका अन्तिम चुनाव यह हो, यह इस प्रसंग का सबसे शान्त और सबसे बड़ा वाक्य है।

सार: वसिष्ठ जप, तप, नियम, योग, अपने धर्म, शुभ कर्म, ज्ञान, दया, दम और तीर्थस्नान की पूरी सूची गिनाकर कहते हैं कि इन सबका और सब ग्रन्थों के पढ़ने-सुनने का फल एक ही है, चरणकमलों में निरन्तर प्रीति। मैल से मैल नहीं धुलता और जल मथने से घी नहीं मिलता, प्रेम-भक्ति के जल के बिना भीतर का मैल कभी नहीं जाता। जिसका उन चरणों में प्रेम है वही सर्वज्ञ, तत्त्वज्ञ और पण्डित है। और अन्त में वे एक ही वर माँगते हैं, कि जन्म-जन्म में यह नेह कभी न घटे।

अमराई की छाँह

अस कहि मुनि बसिष्ट गृह आए । कृपासिंधु के मन अति भाए॥
हनूमान भरतादिक भ्राता। संग लिए सेवक सुखदाता॥

चौपाई ११

ऐसा कहकर मुनि वसिष्ठ अपने घर आये, और वे कृपासागर के मन को बहुत भाये। इस आधी पंक्ति पर रुकिये, क्योंकि यहीं इस प्रसंग की सबसे बड़ी चुप्पी है। इतनी लम्बी विनती हुई। अपने कर्म की निन्दा का स्वीकार हुआ, ब्रह्मा का वचन याद किया गया, दो ऐसे प्रश्न पूछे गये जिनका उत्तर उन्हीं के भीतर रखा हुआ था, और एक वर माँगा गया। और उत्तर में एक भी वचन नहीं है। तुलसी कोई प्रत्युत्तर नहीं लिखते। वे केवल इतना लिखते हैं कि यह सब मन को बहुत अच्छा लगा, और मुनि उठकर घर चले जाते हैं।

जो वर माँगा गया था, उसके मिलने या न मिलने की भी कोई सूचना नहीं है। कथा वहाँ रुकती ही नहीं। किसी और कवि ने यहाँ एक दृश्य बनाया होता, कोई आश्वासन दिलवाया होता, कोई आँसू दिखाया होता। तुलसी आधी पंक्ति लगाकर आगे बढ़ जाते हैं। और आगे जो होता है, उसे उसी माँगे हुए वर का उत्तर पढ़ा जा सकता है, बशर्ते पढ़नेवाला जल्दी न करे।

उसी चौपाई का दूसरा आधा हिस्सा हमें बाहर ले आता है। सेवकों को सुख देनेवाले राम हनुमान्, भरत और दूसरे भाइयों को साथ लेते हैं, नगर के बाहर निकलते हैं, और वहाँ हाथी, रथ और घोड़े मँगवाते हैं। फिर उन्हें देखकर, कृपा करके, सबकी सराहना करते हैं, और जिसने जो चाहा उसे वह उचित जानकर दे देते हैं। यह पूरा दृश्य दो पंक्तियों में निपट जाता है, और उसमें एक ब्योरा ऐसा है जो साधारण नहीं है। देनेवाले ने पहले सराहना की। बाँटने से पहले उन जानवरों को देखा गया और उनकी प्रशंसा की गयी। जो चीज़ दी जा रही है उसका आदर पहले हुआ, और तब वह दी गयी, और यह उस आदमी का ढंग है जो दान को लेन-देन नहीं मानता।

हरन सकल श्रम प्रभु श्रम पाई । गए जहाँ सीतल अवँराई॥
भरत दीन्ह निज बसन डसाई। बैठे प्रभु सेवहिं सब भाई॥

चौपाई १२

हरन सकल श्रम प्रभु श्रम पाई। सब श्रमों को हरनेवाले प्रभु ने श्रम पाया। एक ही पंक्ति में वही शब्द दो बार आया है, एक बार उस काम के नाम पर जो वे संसार के लिये करते हैं और एक बार उस चीज़ के नाम पर जो उन्हें स्वयं मिली। तुलसी इसे विरोध की तरह नहीं रखते, वे इसे बहुत सीधे रख देते हैं, जैसे इसमें कहने को कुछ है ही नहीं। थकान लगी, और वे छाँह की ओर चल दिये।

और वे जहाँ जाते हैं वह जगह भी देखिये। न महल, न सभा, न शीतल जल का कोई कुण्ड, न कोई बना हुआ विश्राम-गृह। आमों का एक ठंडा बगीचा। अवध के सारे वैभव के बीच से यह आदमी उठकर एक अमराई में जा बैठता है, और उसके साथ उसके भाई हैं।

और वहाँ भरत अपना वस्त्र बिछा देते हैं। निज बसन, अपना वस्त्र, वही जो पहने हुए थे। कोष भरा हुआ है, सेवक साथ हैं, नगर पास है, बिछाने को कुछ भी मँगाया जा सकता था और मँगाने में देर भी न लगती। जो बिछाया गया वह वही कपड़ा है जो एक भाई के शरीर पर था। सेवा में सबसे तेज़ वही होता है जिसे कुछ मँगाने की सूझती ही नहीं, जो जो पास है उसी से काम चला देता है, क्योंकि उसका ध्यान चीज़ पर नहीं, उस घड़ी पर है। प्रभु उस पर बैठ जाते हैं और सब भाई सेवा करने लगते हैं।

मारुतसुत तब मारुत करई । पुलक बपुष लोचन जल भरई॥
हनूमान सम नहिं बड़भागी । नहिं कोउ राम चरन अनुरागी॥
गिरिजा जासु प्रीति सेवकाई । बार बार प्रभु निज मुख गाई॥

चौपाई १३

मारुतसुत तब मारुत करई। पवन का पुत्र तब पवन करने लगा। इस पन्ने की सबसे अच्छी पंक्ति यही है, और वह बिना किसी ज़ोर के लिखी गयी है। जिस पवन से यह शरीर आया है, उसी पवन को यह शरीर अब हाथ से हिला रहा है, और उतनी ही मात्रा में जितनी एक बैठे हुए आदमी के मुँह पर पड़ सके। तुलसी यह नहीं कहते कि यह छोटा काम है, और न यह कहते हैं कि यह बड़ा काम है। वे बस दो बार एक ही शब्द रख देते हैं और आगे बढ़ जाते हैं।

और ठीक इसी काम पर उनका शरीर पुलकित हो जाता है और नेत्रों में जल भर आता है। पुलक बपुष लोचन जल भरई। यह किसी युद्ध में नहीं हुआ, किसी संकट में नहीं हुआ, किसी बड़े काम के पूरे होने पर नहीं हुआ। यह पंखा झलते हुए हुआ है। इसी पन्ने पर भक्ति के लक्षण दो बार गिनाये गये हैं, एक बार राम के मुँह से और एक बार वसिष्ठ के मुँह से, और दोनों सूचियों में एक भी बड़े काम का नाम नहीं था। यहाँ वे सूचियाँ एक दृश्य बन गयी हैं, और दृश्य में कुल इतना है कि एक आदमी हवा कर रहा है और रो रहा है।

और यहीं शिव फिर बीच में बोल पड़ते हैं। हे गिरिजा, हनुमान् के समान न कोई बड़भागी है और न कोई राम के चरणों का ऐसा प्रेमी, जिनके प्रेम और सेवा की प्रभु ने निज मुख से बार बार बड़ाई की है। दो बातें इसमें रखी हुई हैं। बड़ाई अपने श्रीमुख से की गयी, किसी और के मुँह से नहीं, और एक बार नहीं, बार-बार।

और अब इस पंक्ति को उस वर के पास रखकर देखिये जो थोड़ी देर पहले माँगा गया था। वसिष्ठ ने माँगा था कि चरणकमलों में नेह जन्म-जन्म कभी न घटे। यहाँ एक आदमी बैठा है जिसके प्रेम की बड़ाई वही करते हैं जिनके चरणों का यह प्रेम है। माँग और उसका जीता-जागता रूप एक ही पन्ने पर हैं, और इन्हें जोड़नेवाला वाक्य कहीं लिखा नहीं गया। तुलसी दोनों को बस पास-पास रख देते हैं, कुछ ही पंक्तियों के फ़ासले पर, और आगे निकल जाते हैं।

सार: वसिष्ठ अपनी बात कहकर घर लौट जाते हैं और राम के मन को वह बहुत भाता है, पर उत्तर में एक वचन भी नहीं आता। इसके बाद राम हनुमान्, भरत और भाइयों को साथ लेकर नगर के बाहर जाते हैं, हाथी, रथ और घोड़े मँगवाकर उनकी सराहना करते हैं और जिसने जो चाहा उसे देते हैं। फिर श्रम पाकर ठंडी अमराई में जाते हैं, भरत अपना वस्त्र बिछा देते हैं, और हनुमान् पंखा करने लगते हैं, जिनका शरीर पुलकित है और आँखें भरी हुई हैं। शिव कहते हैं कि उनके समान बड़भागी और राम के चरणों का प्रेमी कोई नहीं।

उसी अवसर पर

और तभी, बिना किसी सूचना के, बिना किसी की प्रतीक्षा के, इस प्रसंग का आख़िरी दोहा आ जाता है।

तेहिं अवसर मुनि नारद आए करतल बीन।
गावन लगे राम कल कीरति सदा नबीन॥ ५०॥

दोहा ५०

उसी अवसर पर नारद मुनि हाथ में वीणा लिये हुए आये, और राम की सुन्दर कीर्ति गाने लगे, जो सदा नयी रहती है। तेहिं अवसर, उसी अवसर पर। वह अवसर कौन-सा है, यह याद रखने लायक है। कोई दरबार नहीं लगा है। कोई पर्व नहीं है, कोई यज्ञ नहीं हो रहा, कोई सभा नहीं बैठी। एक बगीचा है, एक बिछा हुआ कपड़ा है, कुछ भाई हैं, और एक सेवक पंखा कर रहा है। नारद मुनि उसी में चले आते हैं और वहीं गाना आरम्भ कर देते हैं।

करतल बीन, हथेली पर वीणा। वे उसे लेकर आये हैं, यानी वे गाने के लिये ही आये हैं, और यह एक ब्योरा उनके आने का सारा कारण बता देता है। और सदा नबीन, जो सदा नयी रहती है। किसी भी गानेवाले के लिये यह सबसे बड़ी सुविधा है और सबसे बड़ी कठिनाई भी। जो कीर्ति सदा नयी रहती है वह कभी पूरी नहीं गायी जा सकती, इसलिये गानेवाला कभी काम ख़त्म नहीं कर पाता। और उसी कारण उसका गाना कभी पुराना भी नहीं पड़ता।

और यहीं यह प्रसंग बन्द हो जाता है। नारद इस पन्ने पर आते हैं और गाना आरम्भ करते हैं, बस इतना। वे क्या कहने आये हैं, उनके आने से कौन-सी कथा चलेगी, इसका एक शब्द यहाँ नहीं है। जो पाठक उनका नाम सुनते ही किसी बड़ी घटना की प्रतीक्षा करने लगते हैं, उन्हें अगले प्रसंग तक रुकना पड़ेगा। इस पन्ने पर उनका काम केवल आना और गाना है, और यह अपने आप में ठीक वैसा ही है जैसा पिछली पंक्तियों में पंखा करना था।

सार: उसी अवसर पर, अमराई में, नारद मुनि हाथ में वीणा लिये हुए आते हैं और राम की उस सुन्दर कीर्ति को गाने लगते हैं जो सदा नयी रहती है। वे इस प्रसंग में केवल आते और गाते हैं, इससे आगे की कोई बात इस पन्ने पर नहीं है।

और अन्त में, अपनी ओर

इस पन्ने पर तीन तरह के लोग हैं और तीनों की माँग अलग है। नगर के लोग कुछ नहीं माँगते। वे सुनते हैं, चरण पकड़ते हैं, अपनी बात कह देते हैं और घर लौट जाते हैं। वसिष्ठ एक चीज़ माँगते हैं, और वह चीज़ ऐसी है जो किसी काम आने के लिये नहीं माँगी गयी। और हनुमान् कुछ नहीं कहते। इस पूरे प्रसंग में उनके हिस्से में एक भी वचन नहीं है, केवल एक क्रिया है, और उसी क्रिया पर शिव उन्हें सबसे बड़भागी कह देते हैं। जिसने सबसे कम कहा, उसके विषय में सबसे बड़ी बात कही गयी।

दूसरी बात, जो पन्ने के दोनों सिरों को मिलाने से दिखती है। यह पन्ना इस प्रश्न से खुला था कि भक्ति के मार्ग में कौन-सा परिश्रम है, और उत्तर में तीन चीज़ें गिनायी गयी थीं, सरल स्वभाव, कुटिलता का अभाव, और जो मिले उसी में सन्तोष। पन्ना बन्द होते समय हमारे सामने एक दोपहर है। एक बगीचा, एक बिछा हुआ कपड़ा, एक हिलता हुआ पंखा, और एक गानेवाला जो अभी-अभी आया है। शुरू में जो परिभाषा थी, अन्त में वह एक दृश्य बन गयी है, और बीच में वेद का नाम लिया गया, तीन ग्रन्थों की निन्दा का हवाला दिया गया, दर्जनों साधन गिनाये गये, और वे सब उसी एक चीज़ पर लाकर छोड़ दिये गये।

तीसरी बात कहने की है, और वह इस प्रसंग में जो नहीं है उसके विषय में है। इस पूरे पन्ने पर सीता का नाम एक बार भी नहीं आता। लक्ष्मण का नाम भी नहीं आता। भाइयों में केवल भरत का नाम है, और वह भी इसलिये कि उन्होंने अपना कपड़ा बिछाया। जो पाठक राजा राम के दरबार की कल्पना करके यहाँ आता है, उसे यह पन्ना वह दरबार नहीं देता। यह एक सभा के उठ जाने, एक बूढ़े आदमी के आने और चले जाने, और एक बगीचे में बैठ जाने का पन्ना है।

और चौथी बात, जो सबसे देर तक साथ रहती है। इस प्रसंग का असली वज़न वसिष्ठ के पास है, और उनका सारा कहा हुआ एक ही बात के इर्द-गिर्द घूमता है। उन्होंने अपना काम शास्त्रों की निन्दा सहकर लिया, उस भरोसे पर लिया जो उस समय केवल एक वचन था, वर्षों उसे किये, और जब वह वचन सामने आकर बैठ गया तब उन्होंने उससे कुछ नया नहीं माँगा। उन्होंने जो पाया था उसी के बने रहने की प्रार्थना की। लम्बी प्रतीक्षा का अन्त प्रायः किसी बड़ी माँग में होता है। यहाँ वह एक बहुत छोटी माँग में होता है, और यही उसे बड़ा बनाता है।

इस प्रसंग को पढ़ते हुए बार-बार यह ध्यान आता है कि तुलसी यहाँ कुछ भी सिद्ध नहीं कर रहे। भक्ति का पक्ष लेते समय भी वे किसी दूसरे मार्ग को गिराते नहीं। जप, तप, योग, यज्ञ, दान, तीर्थ, ज्ञान, ये सब गिनाये जाते हैं और उनका आदर बना रहता है। उनके साथ बस इतना किया जाता है कि उनका फल दिखा दिया जाता है, और फल एक निकलता है। वसिष्ठ ने अपनी लम्बी सूची के नीचे यही लिखा, और उससे पहले राम ने सभा में यही कहा। दोनों जगह किसी को हराया नहीं गया, केवल एक चीज़ को सबके आगे रख दिया गया।

और आख़िरी बात, जो इस पन्ने की सबसे शान्त बात है। जिस आदमी ने सबसे ऊँची विनती की, उसे उत्तर में एक वचन भी नहीं मिला, केवल इतना कि यह मन को बहुत भाया। और जिस आदमी ने एक शब्द नहीं कहा, उसके विषय में कहा गया कि उसकी प्रीति और सेवा की बड़ाई प्रभु स्वयं अपने मुख से बार-बार करते हैं। इन दोनों को एक ही पन्ने पर रखकर तुलसी कुछ समझाते नहीं। वे बस दोनों को दिखा देते हैं, और फिर उसी दोपहर में, उसी अमराई में, हाथ में वीणा लिये हुए किसी को भेज देते हैं, जिसकी गायी हुई कीर्ति सदा नयी रहती है।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, उत्तरकाण्ड, दोहा ४६ से ५०, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।

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