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वसिष्ठ की विनती और नारद का आगमन

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रामचरितमानसउत्तरकाण्डप्रसंग 9

भक्ति के मार्ग का हिसाब पूरा होता है, नगर अपने-अपने घर लौट जाता है। तब कुलगुरु आकर अपने ही शिष्य के सामने अपने पेशे का नाम नीचा कहते हैं। वे एक ही वर माँगते हैं, कि यह प्रेम कभी घटे नहीं।

पिछले प्रसंग में एक सभा बैठी थी। बुलावा स्वयं राम की ओर से गया था। गुरु, ब्राह्मण और सारा नगर आया था। उसी सभा में संत और असंत के लक्षण अलग-अलग करके रखे गये थे। अन्त में वह गुप्त मत भी कहा गया था जो राम ने हाथ जोड़कर कहा था। कथा यहाँ उसी सभा के आख़िरी वचनों से उठती है। पर इस प्रसंग की सबसे भारी बात सभा में नहीं कही जाती। वह बाद में कही जाती है, जब बैठक उठ चुकी है, नगर घर लौट चुका है, और सुनने वाला केवल एक है।

उस बात के कहने वाले हैं वसिष्ठ, रघुकुल के कुलगुरु, जिनके हाथों कुछ ही प्रसंग पहले पहला तिलक हुआ था। वे आते हैं, उनके चरण धोये जाते हैं, और फिर वे हाथ जोड़कर कहना शुरू करते हैं। पहले यह कि राम के आचरण देख-देखकर उनका मोह बढ़ता जाता है। फिर यह कि उनका अपना पेशा वेद, पुराण और स्मृति, तीनों की निन्दा का पात्र है। फिर एक पुराना हिसाब, कि यह पेशा उन्होंने लिया क्यों था। और अन्त में एक ही माँग, बहुत छोटी।

इसके बाद कथा बहुत हलकी हो जाती है। नगर के बाहर हाथी, रथ और घोड़े बाँटे जाते हैं, थकान लगती है, आमों का एक ठंडा बगीचा मिलता है। एक भाई अपना ही कपड़ा बिछा देता है, और एक सेवक पंखा करने लगता है। तत्त्व की सारी बातचीत के बाद कथा एक बगीचे की छाँह में आ बैठती है, और वहीं, बिना किसी सूचना के, हाथ में वीणा लिये नारद चले आते हैं। वे यहाँ केवल आते हैं और गाना आरम्भ करते हैं। जो वे कहने आये हैं, वह इस प्रसंग में नहीं है।

कुलगुरु, नगर और पंखा झलता सेवक

  • राम अयोध्या के राजा, जो सभा में भक्ति का मार्ग बताते हैं और सभा उठने के बाद एक लम्बी विनती चुपचाप सुनते हैं।
  • अवध के नर और नारी वह नगर जो सभा में बैठा था और जिसे शिव इसी प्रसंग में कृतार्थस्वरूप कहते हैं।
  • वसिष्ठ रघुकुल के कुलगुरु, जो आते हैं, अपने ही कर्म को नीचा कहते हैं और एक ही वर माँगते हैं।
  • ब्रह्मा जिनका कहा हुआ एक वचन वसिष्ठ अपनी विनती में याद करते हैं, और जिसके भरोसे उन्होंने वह काम लिया था।
  • भरत जो अमराई में बैठने के लिये अपना ही वस्त्र बिछा देते हैं।
  • हनुमान जो इस प्रसंग में एक शब्द नहीं बोलते, केवल पंखा करते हैं, और जिनके बारे में शिव कहते हैं कि उनके समान बड़भागी कोई नहीं।
  • शिव और पार्वती यह कथा जिनके बीच चल रही है। शिव इस प्रसंग में दो बार बीच में बोल पड़ते हैं।
  • नारद वे मुनि, जो अन्त में वीणा लिये हुए आते हैं और गाना शुरू कर देते हैं।

भक्ति के रास्ते का खर्च

सभा अभी उठी नहीं है। पिछली बात एक गुप्त मत पर छूटी थी। अब उसी साँस में राम एक प्रश्न पूछते हैं, कहिये तो, और उत्तर भी स्वयं ही दे देते हैं।

राम कहते हैं, “कहिये तो, भक्ति के मार्ग में कौन-सा परिश्रम है? इसमें न योग चाहिये, न यज्ञ, न जप, न तप, न उपवास। बस सरल स्वभाव हो, मन में कुटिलता न हो, और जो कुछ मिले उसी में सदा सन्तोष हो।” योग के लिये अभ्यास चाहिये, यज्ञ के लिये सामग्री और ऋत्विज, जप के लिये समय, तप के लिये सहने वाला शरीर। और उपवास के लिये भी कल का कुछ आसरा। पाँचों में कुछ न कुछ जुटाना पड़ता है। तीनों में कुछ भी नहीं। वे किसी दिन में जोड़ी नहीं जातीं, स्वभाव में से घटायी जाती हैं।

तीसरी शर्त है, जितना मिले, उतने में सन्तोष। सन्तोष किसी नियत मात्रा से नहीं नापा गया। जिसने अपने सन्तोष के लिये कोई संख्या तय कर रखी है, उसका सन्तोष उसी संख्या के अधीन है। यहाँ संख्या हटा दी गयी है, इसीलिये इस शर्त में कोई ख़र्च नहीं।

फिर राम कहते हैं, “मेरा दास कहलाकर जो मनुष्यों की आशा करे, आप ही कहिये, उसका विश्वास कैसा?” यह नहीं पूछा गया कि वह मानता क्या है। पूछा गया कि ज़रूरत पड़ने पर उसका हाथ किस ओर उठता है। विश्वास की परीक्षा पूजा के समय नहीं, उस घड़ी होती है जब कुछ चाहिये होता है और चाहने वाला तय करता है कि माँगे किससे।

और शब्द है कहलाकर। दास होना एक बात है, दास कहलाना दूसरी। राम का प्रश्न दास पर नहीं, कहलाने पर उँगली रखता है।

और फिर राम कहते हैं, “बात बढ़ाकर क्या कहूँ, भाइयो, मैं तो इसी आचरण के वश में हूँ।” जिसकी आराधना के लिये अभी पाँच बड़े साधन गिनाकर छोड़ दिये गये, वही अपने वश में होने की क़ीमत स्वयं बता रहा है, और वह क़ीमत आचरण है। और सम्बोधन भाई है: जिस सभा में गुरु और ब्राह्मण बैठे हैं, वहाँ राजा सबको भाई कहकर बुला रहा है।

आगे वह आचरण खुलता है: न किसी से वैर, न लड़ाई-झगड़ा, न आशा, न भय। मानस यहाँ एक ही ध्वनि को दो बार, दो अर्थों में रखता है: पहले आस, यानी आशा, फिर आसा, यानी दिशा। जिसने आस छोड़ी, उसके लिये सब दिशाएँ सुखमय हो गयीं।

उसके बाद विशेषण एक साथ आते हैं, अधिकतर नकार के साथ। जो फल की इच्छा से कोई काम आरम्भ नहीं करता, जिसकी घर में ममता नहीं, जो मान, पाप और क्रोध से रहित है। और फिर दो गुण बिना नकार के, निपुण और विज्ञानवान्। जो सूची घटाने से शुरू हुई थी, वह निपुणता जोड़कर बन्द होती है। भक्ति में फूहड़पन के लिये जगह नहीं।

और फिर सूची की तीखी बात: संतों के संग से सदा प्रीति, और विषय, स्वर्ग और अपवर्ग, तीनों तिनके के बराबर। विषय तिनके हैं, यह कठिन नहीं लगता। स्वर्ग भी सह लिया जाता है। पर अपवर्ग, मुक्ति, वह भी तिनका। और उसके तुरन्त बाद एक भेद: वह भक्ति के पक्ष में हठ करता है, पर दूसरे को नीचा दिखाने की शठता नहीं करता। वह सब कुतर्कों को दूर बहा देता है।

फिर राम कहते हैं, “जो मेरे गुणों और मेरे नाम में रत है, जो ममता, मद और मोह से निकल चुका है। उसका सुख वही जानता है जो परमानन्द की राशि को पा चुका है।” उस सुख का वर्णन नहीं किया गया। उसकी एक शर्त बतायी गयी है, कि जानने वाला स्वयं वहाँ पहुँच चुका हो। जो मार्ग इतनी देर सुगम बताया गया, उसका फल अन्त में हाथ में नहीं, अनुभव में रखा गया है।

और सब अपने-अपने घर गये

इतनी बड़ी बात सुनकर नगर क्या करता है: वे वचन उन्हें अमृत के समान लगते हैं, और सुनते ही सबने राम के चरण पकड़ लिये। यह सभा का शिष्टाचार नहीं, जिसमें एक आदमी आगे बढ़कर सबकी ओर से झुक जाता है। यहाँ सब एक साथ झुके हैं, और जो बोलते हैं वे भी सब हैं।

सब कहते हैं, “आप हमारे माता, पिता, गुरु और भाई हैं, और प्राणों से भी प्यारे हैं।” चार रिश्ते, और चारों घर के भीतर के। सामने राजा बैठा है, सिंहासन है, नगर का सारा वैभव है, और जो नाम गिनाये जा रहे हैं उनमें एक भी राजकीय नहीं। और सूची में गुरु का नाम भी है, जबकि उसी सभा में कुलगुरु बैठे हैं।

आगे नगर कहता है, “हे राम, शरीर, धन और घर, सब आप ही हैं, और सब प्रकार से आप ही हित करने वाले हैं। ऐसी सीख आपके सिवा कोई नहीं देता। माता-पिता भी स्वार्थ में लगे रहते हैं।” थोड़ा पहले इन्हीं लोगों ने राम को माता और पिता कहा था। अब वे अपने माता-पिता के विषय में यह कह रहे हैं। एक ही शब्द से बड़ाई भी हुई और उलाहना भी।

यह उलाहना निर्दयी नहीं। माता-पिता की सलाह उनके अपने प्रेम से रँगी होती है: वे चाहते हैं कि सन्तान पास रहे, सुरक्षित रहे। टीका कहती है कि वे हितैषी हैं और सीख भी देते हैं, पर उनकी सीख में भी स्वार्थ रहता है। ऐसी सीख उसी से मिल सकती है जिसे सुनने वाले से कुछ नहीं चाहिये।

फिर नगर कहता है, “जगत् में बिना हेतु उपकार करने वाले दो ही हैं, आप और आपके सेवक।” गुरु, ब्राह्मण और नगर के बड़े-बूढ़ों के सामने संख्या दो बतायी गयी है, और किसी ने आपत्ति नहीं की। और दूसरा नाम कोई वर्ग, पद या जन्म नहीं, आपके सेवक: ऐसी श्रेणी जिसमें कोई भी दाख़िल हो सकता है। गिनती छोटी रखी गयी है और दरवाज़ा खुला।

“बाक़ी सारे जगत् में सब स्वार्थ के मित्र हैं। प्रभु, उनमें सपने में भी परमार्थ नहीं।” जागते हुए आदमी अपने को सँभालता है। नींद में जो निकलता है वही उसका असली है, और वहाँ भी परमार्थ नहीं मिलता। यह कहकर नगर ने अपने विषय में भी वही कह दिया जो संसार के विषय में कहा, क्योंकि वह भी उसी संसार में रहता है।

सबके वचन प्रेम के रस में सने हुए थे, और उन्हें सुनकर राम हृदय में हर्षित हुए। सने हुए: जैसे कोई चीज़ किसी रस में डुबोकर रखी गयी हो और अब उससे अलग न की जा सके। बात और भाव दो चीज़ें नहीं रह गयीं।

और तब वह होता है जो उस दिन बहुत साधारण है: आज्ञा पाकर सब अपने-अपने घर चले गये। रास्ते भर वे राम की उस सुन्दर बातचीत का वर्णन करते गये। कोई वहीं नहीं रह गया। किसी ने संन्यास नहीं लिया, कोई नया व्रत नहीं लिया। जो साथ गया वह साधना नहीं, बातचीत थी, और मानस उसे बतकही कहता है, घर-आँगन का शब्द। इतना ऊँचा उपदेश उसी शब्द के सहारे घर तक पहुँचता है, गली में, चलते-चलते, दुहराया जाता हुआ।

और यहीं कथा एक क़दम पीछे हटती है। यह सारी कथा शिव पार्वती से कह रहे हैं, और यहाँ वे बीच में बोल पड़ते हैं।

शिव कहते हैं, “पार्वती, अवध में रहने वाले नर और नारी सब कृतार्थस्वरूप हैं, जहाँ स्वयं सच्चिदानन्दघन ब्रह्म राम राजा हैं।” कृतार्थस्वरूप: वे केवल कृतार्थ नहीं, कृतार्थता का रूप ही हैं। और इसका कारण किसी साधन में नहीं बताया गया, न तप, न व्रत, न दान। केवल जगह बतायी गयी है, जहाँ वे राजा हैं।

और नर-नारी, दोनों। सूची सुनने पर नहीं, बसने पर बनी है, और इसमें किसी से कुछ माँगा नहीं गया।

एक बार वसिष्ठ आये

अब कथा करवट लेती है, और ठीक उन्हीं दो शब्दों से खुलती है जिनसे पिछली सभा खुली थी, एक बार। वहाँ एक बार राम ने बुलाया था और गुरु, ब्राह्मण और पुरवासी सब आये थे। यहाँ बुलावे का कोई ज़िक्र नहीं। जो आते हैं वे स्वयं आते हैं, और वे इस घर के सबसे पुराने आदमी हैं।

एक बार वसिष्ठ मुनि वहाँ आये जहाँ सुख के धाम राम थे। राम ने उनका बहुत आदर किया, उनके चरण धोये और चरणोदक लिया। कुछ ही प्रसंग पहले इन्हीं वसिष्ठ ने इसी राजा का पहला तिलक किया था। अब वही राजा अपने पुरोहित के पैर धो रहा है और वह जल ले रहा है। कथा इस पर एक शब्द टिप्पणी नहीं करती। उसे उसी लहजे में लिख देती है जिसमें घर की कोई रोज़ की बात लिखी जाती है।

यहाँ किसी ने कुछ माँगा नहीं है। आदर पहले हो चुका है और बात बाद में शुरू होती है, इसलिये आगे जो कहा जायगा उस पर किसी लेन-देन की छाया नहीं।

वसिष्ठ हाथ जोड़कर कहते हैं, “राम, सुनिये, मेरी कुछ विनती है। आपके आचरण देख-देखकर मेरे हृदय में अपार मोह होता है।” जिनके चरण अभी धोये गये हैं, वे हाथ जोड़े खड़े हैं, और यही इस घर का क्रम है।

देख-देखकर: एक बार नहीं, बार-बार। जितना देखते हैं उतना ही उलझते हैं। साधारण अनुभव इससे उलटा है: जो बार-बार देखा जाय वह साफ़ होता जाता है, आदत बन जाता है। यहाँ उलटा हो रहा है। कहने वाले वसिष्ठ हैं। उन्होंने इस वंश की पुरोहिती ब्रह्मा के कहने पर ली थी। वे इस घर के हर शुभ अवसर पर खड़े रहे, और उन्होंने तिलक भी किया था। वही कह रहे हैं कि जितना देखते हैं, उतना ही मोह बढ़ता है।

और वे इस मोह को हटाने की प्रार्थना नहीं करते। विनती उसी से शुरू होती है और उसी पर रुक जाती है। मोह कारण है, माँग नहीं। आगे जो आता है वह किसी का प्रश्न नहीं, एक आदमी का अपना हिसाब है, जो वह उसके सामने कह रहा है जिसके कारण वह हिसाब बना।

जिस काम की निन्दा तीन ग्रन्थ करते हैं

अब वह आता है जो इस प्रसंग की धुरी है, और बड़ी सादगी से आता है।

वसिष्ठ कहते हैं, “भगवन्, आपकी महिमा अमित है, उसे वेद तक नहीं जानते, फिर मैं किस प्रकार कहूँ? पुरोहिती का कर्म बहुत ही नीचा है। वेद, पुराण और स्मृति, तीनों उसकी निन्दा करते हैं।” बिना किसी भूमिका के, बिना किसी के पूछे, यह वाक्य आता है।

कहने वाले रघुकुल के कुलगुरु हैं। इस राज्य में जो कुछ शुभ होता है उसमें उनका हाथ होता है। यह पेशा उनका परिचय, उनकी प्रतिष्ठा और उनकी रोज़ी है। और वे उसका नाम लेकर उसे नीचा कहते हैं, अपने ही शिष्य के सामने, जो अब राजा है, और गवाही में तीन ग्रन्थ रख देते हैं। राम ने कोई प्रश्न नहीं किया था।

दोनों वाक्यों में एक ही प्रमाण दो बार आया है। पहले में वेद वह है जो राम की महिमा नहीं जान सका। दूसरे में वेद वह है जो वसिष्ठ के काम की निन्दा करता है। एक ही ग्रन्थ, और दोनों बार वसिष्ठ उसे मान लेते हैं। जहाँ वह उनके अपने काम के विरुद्ध जाता है, वहाँ भी वे उसका खण्डन नहीं करते, जबकि शास्त्र उनका अपना क्षेत्र है।

पाठ यह नहीं बताता कि इस कर्म की निन्दा किस कारण होती है। न कोई तर्क, न कोई उदाहरण। केवल इतना कहा गया है कि तीनों इसे नीचा कहते हैं। पोद्दार की टीका इसे पेशा कहकर पहचानती है, यानी वह काम जिससे घर चलता है। इससे आगे पाठ चुप है।

वसिष्ठ आगे कहते हैं। “जब मैं इसे नहीं ले रहा था, तब ब्रह्मा ने मुझसे कहा था, ‘पुत्र, इससे आगे चलकर आपको बहुत लाभ होगा।’” तो पहले वे मना कर चुके थे। सूर्यवंश की पुरोहिती उनके सामने रखी गयी थी और उन्होंने हाथ नहीं बढ़ाया था। वे उस काम में गिर नहीं गये थे, उन्हें उसमें उतारा गया था, और उतारने वाले को इसके लिये कुछ कहना पड़ा था।

और ब्रह्मा ने जो कहा, वह इस काम की प्रतिष्ठा की वकालत नहीं थी। उन्होंने यह नहीं कहा कि शास्त्र ग़लत हैं या निन्दा अनुचित है। उन्होंने एक ख़बर दी: “स्वयं परमात्मा ब्रह्म मनुष्य का रूप लेकर रघुकुल के भूषण राजा होंगे।” होंगे: भविष्य की बात, और उसके सिवा कोई आश्वासन नहीं।

और अब, इस क्षण, वह भविष्य सामने बैठा है, और इन्हीं के चरणों का जल ले चुका है। जो कभी आगे की बात थी, वह हो चुकी है। यह विनती एक बूढ़े आदमी का अपनी लम्बी प्रतीक्षा का हिसाब देना बन जाती है, और उसमें शिकायत का एक शब्द नहीं।

वसिष्ठ कहते हैं, “तब मैंने हृदय में विचार किया कि जिसके लिये योग, यज्ञ, व्रत और दान किये जाते हैं, उसे मैं इसी कर्म से पा जाऊँगा। तब तो इसके समान दूसरा धर्म है ही नहीं।” विचार किया: वे छिपाते नहीं कि यह एक हिसाब था। उन्होंने तौला था, तौलकर लिया था, और आज उस तौल को दुहरा रहे हैं।

सभा में योग, यज्ञ, जप, तप और उपवास गिनाकर कहा गया था कि भक्ति के मार्ग में इनका परिश्रम नहीं। यहाँ योग, यज्ञ, व्रत और दान गिनाकर कहा जा रहा है कि जिस फल के लिये ये किये जाते हैं, वह इसी एक काम से मिल जायगा। एक ही तरह की सूची दो बार आयी है और दोनों बार उसे पार कर दिया गया है।

और जिस काम से यह मिलेगा, वह वही है जिसे तीन ग्रन्थ नीचा कहते हैं। वसिष्ठ उस निन्दा को झुठलाते नहीं। उसे मानकर भी वह काम लेते हैं, क्योंकि उनका हिसाब काम पर नहीं, उस काम के दूसरे सिरे पर बैठने वाले पर लगा था। और वह अभी आने वाला था।

मैल से मैल नहीं धुलता

इसके बाद वसिष्ठ एक लम्बी सूची गिनाते हैं और उसे कहीं रोकते नहीं: जप, तप, नियम, योग, अपना-अपना धर्म, वेद से निकले अनेक शुभ कर्म। ज्ञान, दया, दम, तीर्थस्नान, और जहाँ तक वेद और संतजन धर्म कहते हैं, वहाँ तक सब। इसमें एक भी चीज़ ऐसी नहीं जिसका कोई विरोध करता हो, और गिनाने वाले ने जीवन भर यही सब कराया है। सूची इसलिये है कि उसका एक फल बताया जा सके।

वसिष्ठ कहते हैं, “प्रभु, अनेक आगम, निगम और पुराणों के पढ़ने-सुनने का फल एक ही है, और सब साधनों का भी यही सुन्दर फल है: आपके चरणों में निरन्तर प्रीति।” एक ही: इतनी लम्बी सूची के सामने एक अंक रख दिया गया।

निरन्तर इस बात का काँटा है। प्रीति की मात्रा या गहराई नहीं माँगी गयी। उसका बिना टूटे बने रहना माँगा गया है। किसी दिन बहुत प्रेम हो जाना कठिन नहीं। कठिन यह है कि वह उस दिन भी बना रहे जिस दिन भीतर कुछ अनुभव न हो रहा हो। इसीलिये आगे जो वर माँगा जायगा, वह प्रेम के बढ़ने का नहीं, उसके न घटने का होगा।

फिर वसिष्ठ पूछते हैं, “मैल से धोने पर क्या मैल छूटता है? जल मथने से क्या किसी को घी मिलता है?” दो प्रश्न हैं और दोनों अलग बात कहते हैं। पहले में साधन ग़लत है: धोने वाला उसी चीज़ से धो रहा है जिसे हटाना है। दूसरे में क्रिया ठीक है और वस्तु ग़लत: मथना ही घी निकालने का ढंग है, पर जो मथा जा रहा है उसमें घी है ही नहीं। दोनों साथ रखने से असफलता के दोनों रास्ते ढक जाते हैं।

दूसरी उपमा में एक बात और है। जल मथने वाला ठीक उतनी ही मेहनत करता है जितनी दूध मथने वाला: वही मथानी, वही थकान। फ़र्क़ आँख से नहीं दिखता, वह मटके के भीतर है। इसलिये परिश्रम इस हिसाब में कोई प्रमाण नहीं। यह बात राम के सभा वाले प्रश्न से मिल जाती है, कि भक्ति के मार्ग में परिश्रम है ही कौन-सा।

और यह उपमा उस आदमी के मुँह से आ रही है जो जीवन भर यज्ञ कराता रहा है, जिसके लिये घी रोज़ के काम की चीज़ है। उपमा उसके अपने आँगन से उठी है।

और अन्त में वसिष्ठ कहते हैं, “हे राम, प्रेम-भक्ति के जल के बिना भीतर का मैल कभी नहीं जाता।” यह उस आदमी का वाक्य है जो सारे कर्मकाण्ड का आचार्य है, और वह इसे अपनी ही लम्बी सूची के नीचे लिख रहा है। और राम इस पूरी विनती का एक शब्द भी उत्तर नहीं देते।

फिर सात पदवियाँ एक साथ बाँट दी जाती हैं। वसिष्ठ कहते हैं, “जिसका आपके चरणों में प्रेम है, वही सर्वज्ञ है, वही तत्त्वज्ञ और पण्डित है। वही गुणों का घर और अखण्ड विज्ञान वाला है, वही चतुर और सब सुलक्षणों से युक्त है।” सात नाम हैं और शर्त एक, और वह शर्त किसी परीक्षा से नहीं जाँची जा सकती। पण्डित की पदवी उस चीज़ पर टाँग दी गयी है जो केवल दो के बीच की बात है, और यह कहने वाले स्वयं कुलगुरु हैं।

फिर वसिष्ठ कहते हैं, “नाथ, राम, मैं एक वर माँगता हूँ, कृपा करके दीजिये: जन्म-जन्म में आपके चरणों में मेरा नेह कभी न घटे।” माँगने वाला वह आदमी है जिसका पेशा यजमान के लिये हाथ उठाना है, वही पेशा जिसे उसने अभी नीचा कहा। आज उसने अपने लिये हाथ उठाया है, और एक ही चीज़ माँगी है।

माँग का व्याकरण है, न घटे। उन्होंने यह नहीं माँगा कि प्रेम बढ़े, प्रगाढ़ हो, उसका कोई फल मिले, या उन्हें कहीं कोई जगह मिले। उन्होंने घटने के विरुद्ध माँगा है। जिसके पास कोई चीज़ है और जो जानता है कि वह कितनी क़ीमती है, उसकी माँग इसी आकार की होती है। और जन्म-जन्म, यानी उस जगह के पार भी जहाँ आदमी अपना नाम तक नहीं ले जा पाता।

बातचीत मोह से शुरू हुई थी, और अन्त में वसिष्ठ उस मोह को हटाने की प्रार्थना नहीं करते। उसे वहीं रहने देते हैं और दूसरी चीज़ की रक्षा माँग लेते हैं। समझ में न आना उन्हें स्वीकार है। प्रेम का कम पड़ जाना स्वीकार नहीं। जिसने अपनी पूरी उम्र समझने में लगायी हो, उसका अन्तिम चुनाव यह है।

अमराई की छाँह

ऐसा कहकर मुनि वसिष्ठ अपने घर आये, और उनकी बात राम के मन को बहुत भायी। इतनी लम्बी विनती हुई: अपने कर्म की निन्दा का स्वीकार, ब्रह्मा का वचन, दो ऐसे प्रश्न जिनका उत्तर उन्हीं के भीतर रखा था, और एक वर। और उत्तर में एक भी वचन नहीं। कथा केवल इतना कहती है कि यह सब राम के मन को बहुत अच्छा लगा, और वसिष्ठ उठकर घर चले जाते हैं।

जो वर माँगा गया था, उसके मिलने या न मिलने की भी कोई सूचना नहीं। कथा वहाँ रुकती ही नहीं। आगे जो होता है, उसे उसी वर के उत्तर की तरह पढ़ा जा सकता है।

फिर कथा बाहर निकल आती है। सेवकों को सुख देने वाले राम हनुमान, भरत और दूसरे भाइयों को साथ लेते हैं, नगर के बाहर निकलते हैं, और वहाँ हाथी, रथ और घोड़े मँगवाते हैं। उन्हें देखकर, कृपा करके, सबकी सराहना करते हैं, और जिसने जो चाहा उसे उचित जानकर वह दे देते हैं। देने से पहले सराहना हुई: जो दिया जा रहा है उसका आदर पहले हुआ, और तब वह दिया गया।

सारे श्रम हरने वाले राम ने श्रम पाया। एक ही वाक्य में वही शब्द दो बार, एक बार उस काम के नाम पर जो वे संसार के लिये करते हैं। और एक बार उस चीज़ के नाम पर जो उन्हें स्वयं मिली। यह बहुत सीधे कहा गया है: थकान लगी, और वे छाँह की ओर चल दिये।

और वे जहाँ जाते हैं, वह न महल है, न सभा, न कोई विश्राम-गृह: आमों का एक ठंडा बगीचा। अवध के सारे वैभव के बीच से राम उठकर एक अमराई में जा बैठते हैं, और उनके साथ उनके भाई हैं।

वहाँ भरत अपना ही वस्त्र बिछा देते हैं। कोष भरा है, सेवक साथ हैं, बिछाने को कुछ भी मँगाया जा सकता था। जो बिछाया गया वह भाई का अपना कपड़ा है। सेवा में सबसे तेज़ वही होता है जिसे कुछ मँगाने की सूझती ही नहीं, जो पास है उसी से काम चला देता है। राम उस पर बैठ जाते हैं, और सब भाई सेवा करने लगते हैं।

पवन का पुत्र तब पवन करने लगा, यानी हनुमान पंखा करने लगे। जिस पवन से यह शरीर आया है, उसी पवन को यह शरीर अब हाथ से हिला रहा है। उतनी ही मात्रा में जितनी एक बैठे हुए आदमी के मुँह पर पड़ सके। एक ही शब्द दो बार रखकर कथा आगे बढ़ जाती है।

और इसी काम पर उनका शरीर पुलकित हो जाता है और आँखों में जल भर आता है। यह किसी युद्ध या संकट में नहीं, पंखा झलते हुए हुआ है। इसी प्रसंग में भक्ति के लक्षण दो बार गिनाये गये, एक बार राम के मुँह से और एक बार वसिष्ठ के मुँह से। दोनों सूचियों में किसी बड़े काम का नाम नहीं था। यहाँ वे सूचियाँ एक दृश्य बन गयी हैं: एक आदमी हवा कर रहा है और रो रहा है।

और यहीं शिव फिर बीच में बोल पड़ते हैं, “पार्वती, हनुमान के समान न कोई बड़भागी है, न कोई राम के चरणों का ऐसा प्रेमी। उनके प्रेम और सेवा की राम ने अपने मुख से बार-बार बड़ाई की है।” बड़ाई अपने मुख से की गयी, किसी और के मुँह से नहीं, और एक बार नहीं, बार-बार।

वसिष्ठ ने माँगा था कि राम के चरणों में नेह जन्म-जन्म कभी न घटे। यहाँ एक आदमी बैठा है जिसके प्रेम की बड़ाई वही करते हैं जिनके चरणों का यह प्रेम है। माँग और उसका जीता-जागता रूप कुछ ही देर के फ़ासले पर पास-पास खड़े हैं, और उन्हें जोड़ने वाला वाक्य कहीं लिखा नहीं गया।

उसी अवसर पर

और तभी, बिना किसी सूचना के, इस प्रसंग का आख़िरी क्षण आ जाता है।

उसी अवसर पर नारद मुनि हाथ में वीणा लिये आये, और राम की सुन्दर कीर्ति गाने लगे, जो सदा नयी रहती है। उसी अवसर पर: कोई दरबार नहीं, कोई पर्व या यज्ञ नहीं, कोई सभा नहीं। एक बगीचा, एक बिछा हुआ कपड़ा, कुछ भाई, और एक सेवक पंखा कर रहा है। नारद उसी में चले आते हैं और वहीं गाना आरम्भ कर देते हैं।

हथेली पर वीणा: वे गाने के लिये ही आये हैं। जो कीर्ति सदा नयी रहती है वह कभी पूरी नहीं गायी जा सकती, और उसी कारण उसका गाना कभी पुराना भी नहीं पड़ता।

और यहीं यह प्रसंग बन्द होता है। नारद आते हैं और गाना आरम्भ करते हैं, बस इतना। वे क्या कहने आये हैं, उनके आने से कौन-सी कथा चलेगी, इसका एक शब्द यहाँ नहीं। वह अगले प्रसंग में है। यहाँ उनका काम केवल आना और गाना है, ठीक वैसे ही जैसे कुछ देर पहले हनुमान का काम पंखा करना था।

सबसे कम कहनेवाला, सबसे बड़ी बात

सभा से अमराई तक तीन तरह के लोग हैं, और तीनों की माँग अलग है। नगर के लोग कुछ नहीं माँगते: सुनते हैं, चरण पकड़ते हैं, अपनी बात कह देते हैं और घर लौट जाते हैं। वसिष्ठ एक चीज़ माँगते हैं, जो किसी काम आने के लिये नहीं माँगी गयी। और हनुमान कुछ नहीं कहते। उनके हिस्से में एक भी वचन नहीं, केवल एक क्रिया है, और उसी क्रिया पर शिव कहते हैं कि उनके समान बड़भागी कोई नहीं।

प्रसंग इस प्रश्न से खुला था कि भक्ति के मार्ग में कौन-सा परिश्रम है। उत्तर में तीन चीज़ें गिनायी गयी थीं: सरल स्वभाव, कुटिलता का अभाव, और जो मिले उसी में सन्तोष। अन्त में सामने एक बगीचा है, एक बिछा हुआ कपड़ा, एक हिलता पंखा, और एक गाने वाला जो अभी आया है। शुरू की परिभाषा अन्त में एक दृश्य बन गयी है। बीच में वेद का नाम, तीन ग्रन्थों की निन्दा का हवाला और दर्जनों साधन, सब उसी एक चीज़ पर लाकर छोड़ दिये गये।

इस प्रसंग में सीता का नाम एक बार भी नहीं आता। लक्ष्मण का नाम भी नहीं। भाइयों में केवल भरत का नाम है, और वह भी इसलिये कि उन्होंने अपना कपड़ा बिछाया। यहाँ राजा राम का दरबार नहीं है। यह एक सभा के उठ जाने, एक बूढ़े आदमी के आने और चले जाने, और एक बगीचे में बैठ जाने की कथा है।

इस प्रसंग का वज़न वसिष्ठ के पास है। उन्होंने अपना काम शास्त्रों की निन्दा सहकर लिया, उस भरोसे पर जो उस समय केवल एक वचन था। वर्षों उसे किया, और जब वह वचन सामने आकर बैठ गया, तब उससे कुछ नया नहीं माँगा। जो पाया था, उसी के बने रहने की प्रार्थना की। लम्बी प्रतीक्षा का अन्त यहाँ एक बहुत छोटी माँग में होता है।

भक्ति का पक्ष लेते समय भी यहाँ कोई दूसरा मार्ग गिराया नहीं जाता। जप, तप, योग, यज्ञ, दान, तीर्थ, ज्ञान, सब गिनाये जाते हैं और उनका आदर बना रहता है। बस उनका फल दिखा दिया जाता है, और फल एक निकलता है। वसिष्ठ ने अपनी लम्बी सूची के नीचे यही लिखा, और उससे पहले राम ने सभा में यही कहा। दोनों जगह किसी को हराया नहीं गया। एक चीज़ को सबके आगे रख दिया गया।

और आख़िरी बात। जिसने इतनी ऊँची विनती की, उसे उत्तर में एक वचन भी नहीं मिला, केवल इतना कि यह मन को बहुत भाया। और जिसने एक शब्द नहीं कहा, उसके बारे में कहा गया कि उसकी प्रीति और सेवा की बड़ाई राम स्वयं अपने मुख से बार-बार करते हैं। दोनों आमने-सामने रखे गये हैं, बिना समझाये, और फिर उसी अमराई में हाथ में वीणा लिये नारद आ जाते हैं, जिनकी गायी कीर्ति सदा नयी रहती है।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, उत्तरकाण्ड, दोहा 46 से 50, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।