अश्वत्थामा का ब्रह्मास्त्र
शुकदेव की वाणी एक क्षण को थमी, तो परीक्षित ने हाथ जोड़कर कहा, ”भगवन्, आप जिस वंश की कथा सुना रहे हैं, वह हमारा अपना वंश है। हमने सुना है कि हमारे जन्म से पहले ही एक शस्त्र हम तक पहुँच आया था, जब हम माँ के गर्भ में थे। हम जानना चाहते हैं कि उस रात क्या हुआ था, और किसने हमें उस आग से बचाया था।”
शुकदेव कुछ क्षण मौन रहे। फिर बोले, ”राजन्, यह कथा बैर की है, और बैर के अन्त की भी। सुनिए।”
अठारह दिन का युद्ध समाप्त हो चुका था।
दोनों ओर के असंख्य वीर वीरगति को प्राप्त हो चुके थे। भीमसेन की गदा के प्रहार से दुर्योधन की जाँघ टूट चुकी थी। उस सारे संहार में से एक प्राणी अब भी कौरवों की ओर का शेष था। अश्वत्थामा।
द्रोणाचार्य का पुत्र। ब्राह्मण, पर जन्म से योद्धा। अस्त्र-शस्त्र का ऐसा ज्ञाता कि ब्रह्मास्त्र तक उसकी मुट्ठी में था। पिता को छल से मारा गया था, और वह शोक उसके भीतर आग बनकर बैठ गया था।

उस रात अश्वत्थामा ने अपने स्वामी दुर्योधन का प्रिय कार्य समझकर एक नीच कर्म किया, जिसकी निन्दा सभी करते हैं। चुपचाप पाण्डव-शिविर में घुसकर उसने द्रौपदी के सोते हुए पाँचों पुत्रों के सिर काट डाले, उपपाण्डव, अभी बालक।
जब पाण्डव लौटे, द्रौपदी ने अपने पाँचों पुत्रों के कटे शव देखे।
उनकी आँखों में आँसू छलछला आए, और वे रोने लगीं। तब अर्जुन ने उन्हें सान्त्वना देते हुए प्रतिज्ञा की।
”कल्याणी, हम आपके आँसू तब पोंछेंगे, जब उस आततायी ब्राह्मणाधम का सिर गाण्डीव-धनुष के बाणों से काटकर आपको भेंट करेंगे। और आप पुत्रों की अन्त्येष्टि-क्रिया के बाद उस पर पैर रखकर स्नान कीजिएगा।”

इन मीठी और विचित्र बातों से अर्जुन ने द्रौपदी को सान्त्वना दी। फिर अपने मित्र भगवान् श्रीकृष्ण को सारथि बनाकर, कवच धारणकर, अपने भयानक गाण्डीव धनुष को लेकर वे रथ पर सवार हुए और गुरुपुत्र अश्वत्थामा के पीछे दौड़ पड़े।
अश्वत्थामा ने जब दूर से ही देखा कि अर्जुन उसकी ओर झपटते हुए आ रहे हैं, तो वह अपने प्राणों की रक्षा के लिए जहाँ तक भाग सकता था, भागता रहा, जैसे रुद्र से भयभीत होकर कोई भागे। पर जब उसने देखा कि उसके रथ के घोड़े थक गए हैं और वह अकेला है, तब उसने अपने को बचाने का एक ही उपाय ब्रह्मास्त्र समझा।
यद्यपि उसे ब्रह्मास्त्र को लौटा लेने की विधि मालूम न थी, फिर भी प्राणसंकट देखकर उसने आचमन किया और ध्यानस्थ होकर ब्रह्मास्त्र का सन्धान कर दिया।
उस अस्त्र से सब दिशाओं में एक बड़ा प्रचण्ड तेज फैल गया, मानो प्रलय की आग दसों दिशाओं से उठ खड़ी हुई हो। अर्जुन ने देखा कि अब तो प्राणों पर ही आ बनी है, तब उन्होंने श्रीकृष्ण से प्रार्थना की, ”श्रीकृष्ण! आप सच्चिदानन्द-स्वरूप परमात्मा हैं। जो संसार की धधकती आग में जल रहे हैं, उन्हें उबारनेवाले एक आप ही हैं। यह स्वयंप्रकाश तेज सब ओर से हमारी ओर आ रहा है, यह क्या है, हम जानते ही नहीं।”
भगवान् बोले, ”अर्जुन, यह अश्वत्थामा का चलाया हुआ ब्रह्मास्त्र है। प्राणसंकट देखकर उसने इसका प्रयोग तो कर दिया, पर वह इसे लौटाना नहीं जानता। किसी दूसरे अस्त्र से ही इसे दबाया जा सकता है। आप शस्त्रास्त्र-विद्या के ज्ञाता हैं, ब्रह्मास्त्र के तेज से ही इस ब्रह्मास्त्र की आग को बुझा दीजिए।”

अर्जुन ने आचमन किया, भगवान् की परिक्रमा की, और ब्रह्मास्त्र के निवारण के लिए अपना ब्रह्मास्त्र छोड़ दिया। दोनों अस्त्रों के तेज प्रलयकालीन सूर्य और अग्नि के समान आपस में टकराकर सारे आकाश और दिशाओं में फैलने लगे। उन बढ़ी हुई लपटों से प्रजा जलने लगी, और सबने यही समझा कि यह प्रलयकाल की संवर्तक अग्नि है।
उस आग से प्रजा और लोकों का नाश होते देखकर, भगवान् की अनुमति से, अर्जुन ने दोनों ही अस्त्रों को लौटा लिया।
अब अर्जुन की आँखें क्रोध से लाल हो रही थीं। उन्होंने झपटकर उस क्रूर अश्वत्थामा को पकड़ लिया, और जैसे कोई रस्सी से पशु को बाँध ले, वैसे ही उसे बाँध लिया, और बलपूर्वक शिविर की ओर ले चले।
जब अर्जुन उसे शिविर ले जाना चाहते थे, तब कमलनयन भगवान् श्रीकृष्ण ने कुपित होकर कहा, ”अर्जुन, इस ब्राह्मणाधम को छोड़ना ठीक नहीं, इसे तो मार ही डालिए। इसने रात में सोए हुए निरपराध बालकों की हत्या की है। धर्म जाननेवाले असावधान, मतवाले, सोए हुए, बालक, स्त्री, शरणागत, रथहीन और भयभीत शत्रु को नहीं मारते। पर जो दुष्ट दूसरों को मारकर अपने प्राणों का पोषण करता है, उसका वध ही उसके लिए कल्याणकारी है। फिर हमारे सामने ही आपने द्रौपदी से प्रतिज्ञा की थी कि इसका सिर उतार लाएँगे। यह पापी आपके पुत्रों का हत्यारा है। इसलिए अर्जुन, इसे मार ही डालिए।”
भगवान् ने अर्जुन के धर्म की परीक्षा लेने के लिए यह प्रेरणा की, पर अर्जुन का हृदय महान् था। यद्यपि अश्वत्थामा ने उनके पुत्रों की हत्या की थी, फिर भी उनके मन में गुरुपुत्र को मारने की इच्छा न हुई।
इसके बाद वे अपने मित्र और सारथि श्रीकृष्ण के साथ अपने शिविर पहुँचे। वहाँ अर्जुन ने अपने मृत पुत्रों के लिए शोक करती हुई द्रौपदी को अश्वत्थामा सौंप दिया।

द्रौपदी ने देखा कि अश्वत्थामा पशु की तरह बाँधकर लाया गया है, निन्दित कर्म के कारण उसका मुख नीचे की ओर झुका हुआ है। गुरुपुत्र का इस प्रकार बँधकर लाया जाना सती द्रौपदी को सहन न हुआ। उन्होंने उसे नमस्कार किया और कहा, ”छोड़ दीजिए इन्हें, छोड़ दीजिए। ये ब्राह्मण हैं, हम सब के लिए अत्यन्त पूजनीय हैं।”
”जिनकी कृपा से आपने रहस्य के साथ सारे धनुर्वेद और सम्पूर्ण शस्त्रास्त्रों का ज्ञान प्राप्त किया, वे आपके आचार्य द्रोण ही पुत्र-रूप में आपके सामने खड़े हैं। उनकी अर्धांगिनी कृपी अपने वीर पुत्र की ममता से ही अब तक जीवित हैं। आप तो बड़े धर्मज्ञ हैं। जिस गुरुवंश की नित्य पूजा और वन्दना करनी चाहिए, उसी को व्यथा पहुँचाना आपके योग्य नहीं। जैसे अपने बालकों के मर जाने से हम दुखी होकर रो रही हैं, वैसे ही इनकी माता पतिव्रता गौतमी न रोएँ।”
द्रौपदी की बात धर्म और न्याय के अनुकूल थी। उसमें कपट नहीं था, करुणा और समता थी। राजा युधिष्ठिर ने रानी के इन हितभरे वचनों का अभिनन्दन किया। नकुल, सहदेव, सात्यकि, अर्जुन, स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण और वहाँ उपस्थित सब नर-नारियों ने द्रौपदी की बात का समर्थन किया।
पर भीमसेन से यह सहा न गया। ”जिसने सोते हुए बालकों को न अपने लिए, न अपने स्वामी के लिए, बल्कि व्यर्थ ही मार डाला, उसका तो वध ही उत्तम है।”
भगवान् श्रीकृष्ण द्रौपदी और भीमसेन की बात सुनकर, और अर्जुन की ओर देखकर, कुछ हँसते-से हुए बोले।
”आततायी ब्राह्मण भी वध के योग्य होता है, और पतित ब्राह्मण का वध नहीं करना चाहिए, ये दोनों बातें शास्त्रों में हमने ही कही हैं। इसलिए हमारी दोनों आज्ञाओं का पालन कीजिए। आपने द्रौपदी को सान्त्वना देते समय जो प्रतिज्ञा की थी उसे भी सत्य कीजिए, और भीमसेन, द्रौपदी तथा हमें जो प्रिय है, वह भी कीजिए।”

अर्जुन भगवान् के हृदय की बात तुरन्त ताड़ गए। उन्होंने अपनी तलवार से अश्वत्थामा के सिर की मणि उसके बालों के साथ उतार ली। बालकों की हत्या करने से वह श्रीहीन तो पहले ही हो चुका था, अब मणि और ब्रह्मतेज से भी रहित हो गया। इसके बाद उन्होंने रस्सी का बन्धन खोलकर उसे शिविर से बाहर निकाल दिया।
सिर मूँड़ देना, धन छीन लेना और स्थान से बाहर निकाल देना, यही ब्राह्मणाधमों का वध है। उनके लिए इससे भिन्न शारीरिक वध का विधान नहीं है। अश्वत्थामा जीवित रहा, पर जिस तेज, मान और पहचान के बल पर जीता था, वह जाता रहा।
पुत्रों की मृत्यु से द्रौपदी और पाण्डव सभी शोकातुर थे। उन्होंने अपने मरे हुए भाई-बन्धुओं की दाह आदि अन्त्येष्टि-क्रिया की।
शुकदेव यहाँ क्षण भर रुके, और बोले, ”अब वह कथा सुनिए, राजन्, जो आपकी अपनी रक्षा की है।”
दिन बीते। मरे हुए स्वजनों का जलदान देकर, उनके गुणों का स्मरण करके बहुत विलाप करके, पाण्डव गंगा-तट पर स्नान कर चुके थे। भगवान् श्रीकृष्ण ने अजातशत्रु युधिष्ठिर को उनका वह राज्य लौटा दिया था, जो छल से छीन लिया गया था, और उनसे तीन अश्वमेध यज्ञ कराए थे।
अब भगवान् श्रीकृष्ण द्वारका जाने का विचार कर सात्यकि और उद्धव के साथ रथ पर सवार हुए। उसी समय उन्होंने देखा कि अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा भय से विह्वल होकर सामने से दौड़ी चली आ रही हैं।
क्योंकि अश्वत्थामा के छोड़े उस ब्रह्मास्त्र की मार उत्तरा के गर्भ की ओर भी मुड़ चुकी थी, जहाँ पाण्डव-कुल का अकेला बचा हुआ अंकुर पल रहा था। उत्तरा ने उस ताप को अपने भीतर तक उतरते महसूस किया, मानो कोई दहकता हुआ बाण उनकी कोख को ढूँढ़ रहा हो।
”देवाधिदेव! जगदीश्वर! आप हमारी रक्षा कीजिए, रक्षा कीजिए। आपके अतिरिक्त इस लोक में अभय देनेवाला और कोई नहीं। यह दहकता हुआ बाण हमारी ओर दौड़ा आ रहा है। स्वामिन्! यह हमें भले ही जला डाले, पर हमारे गर्भ को नष्ट न करे, ऐसी कृपा कीजिए।”
भक्तवत्सल भगवान् उनकी बात सुनते ही जान गए कि अश्वत्थामा ने पाण्डवों के वंश को निर्बीज करने के लिए ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया है।

समस्त प्राणियों के भीतर और बाहर एकरस विराजमान आत्मा, योगेश्वर श्रीकृष्ण ने उत्तरा के गर्भ को पाण्डवों की वंश-परम्परा चलाने के लिए अपनी माया के कवच से ढक लिया, और अपने सुदर्शन से उन निज जनों की रक्षा की। ब्रह्मास्त्र की लपट उस वैष्णव तेज तक आई, और शान्त हो गई।
गर्भ बच गया। समय आने पर उसी गर्भ से एक बालक जन्मा, जो आगे चलकर राजर्षि परीक्षित कहलाया।
”राजन्, वह बालक आप ही हैं। जिस हाथ ने उस अँधेरी कोख में आपके चारों ओर पहरा दिया था, उसी की कथा आप इन सात दिनों में सुन रहे हैं। आप मृत्यु के मुख से नहीं, माँ के गर्भ से ही उनकी गोद में रहे हैं।”
परीक्षित कुछ देर मौन सुनते रहे।
”भगवन्,” परीक्षित ने धीरे से कहा, ”जिसके पाँचों पुत्र एक रात में काट दिए गए, उसी द्रौपदी ने हत्यारे के लिए प्राण-दान माँगा। यह हमारी समझ में आता भी है, और नहीं भी।”
शुकदेव मुसकराए। ”राजन्, उसने एक बात देख ली थी जो योद्धा प्रायः नहीं देख पाते। बैर का बदला बैर को मिटाता नहीं, उसे अगली पीढ़ी में बो देता है। अपना शोक अश्वत्थामा की माता गौतमी को सौंप देने से उसके अपने पुत्र लौट नहीं आते, बस एक और माता रोने लगती। उसने उस श्रृंखला को अपने ही हृदय में आकर तोड़ दिया।”
”और भगवान् ने उसे मारा क्यों नहीं?”
”ब्राह्मण का शारीरिक वध मर्यादा के बाहर था। पर सोते बालकों के हत्यारे को यों ही छोड़ देना न्याय नहीं था। तो उन्होंने प्राण रहने दिए और तेज छीन लिया। माथे की मणि, सिर के केश, योद्धा का मान, वह सब उतार लिया जिससे अश्वत्थामा अपने को अश्वत्थामा कहता था। शास्त्र कहते हैं कि सिर मूँड़ना, धन छीनना और स्थान से निकाल देना, यही ब्राह्मणाधम का वध है। जीवित रहा, पर जिस नाम के बल पर जीता था, वह जाता रहा।”
परीक्षित कुछ बोले नहीं। गंगा का जल किनारे की रेत को छूकर लौट रहा था, और दिन का एक पहर और बीत गया था।
साहित्यिक-संदर्भ
यह प्रसङ्ग श्रीमद्भागवत के प्रथम स्कन्ध, अध्याय 7 और 8 में आता है। भागवत अश्वत्थामा का दण्ड वहीं समाप्त कर देता है, जहाँ भगवान् के कहने पर उसकी शिरोमणि उतार ली जाती है और मूँड़कर उसे निकाल दिया जाता है, तीन हज़ार वर्ष भटकने का शाप भागवत का नहीं, महाभारत के सौप्तिक एवं स्त्री पर्व का है।
उत्तरा की पुकार और गर्भस्थ परीक्षित की रक्षा भागवत में अध्याय 8 में, भगवान् के द्वारका-प्रस्थान के समय आती है, जहाँ इसी प्रसङ्ग से कुन्ती की प्रसिद्ध स्तुति (1।8) जुड़ी हुई है।
क्यों यह कथा अभी मायने रखती है
जिसके पाँचों बेटे एक रात में मार दिए गए, उसी द्रौपदी ने हत्यारे के प्राण माँग लिए, यह जानकर कि बैर का बदला बैर को बढ़ाता है, घटाता नहीं। इसी आग और इसी क्षमा के बीच, माँ के गर्भ में, परीक्षित बचाए गए थे, जो आज गंगा-तट पर यही कथा सुन रहे हैं।
यही कथा वहाँ भी
- अध्याय 32 · अश्वत्थामा का रात्रि-संहार, ब्रह्मास्त्र, परीक्षित का सूत्र
महाभारत (सौप्तिक पर्व): अश्वत्थामा का रात्रि-संहार और ब्रह्मास्त्र