अश्वत्थामा का ब्रह्मास्त्र

कथा 24 · भागवतम् की कथाएँ

अश्वत्थामा का ब्रह्मास्त्र

The Last Cowardice of a Defeated Warrior
स्कन्ध 1, अध्याय 7-8

महाभारत का युद्ध ख़त्म था।

अठारह दिन। दोनों तरफ़ के योद्धा मर चुके थे। पाण्डव जीते। कौरव गए।

बस एक आदमी बचा था, कौरव-पक्ष से। अश्वत्थामा।

द्रोणाचार्य का बेटा। महाभारत का सबसे विद्वान् astra-शस्त्र-जानकार। ब्रह्मास्त्र चलाना जानता था।

वो रात में, युद्ध ख़त्म होने के बाद, चुपके से पाण्डव-शिविर में घुसा। पाण्डव वहाँ नहीं थे, बाहर थे।

मगर द्रौपदी के पाँच बेटे थे, उपपाण्डव। नींद में।

अश्वत्थामा ने उन्हें मार डाला। अपने पिता की हत्या का बदला। एक मक्कार बदला।

जब पाण्डव लौटे, द्रौपदी ने अपने पाँच बेटों के शव देखे।

उसने ज़मीन पर सिर रखा। बहुत देर तक चुप रही।

फिर बोली, ”अर्जुन, उसे ले आ।”

अर्जुन निकला। अश्वत्थामा भागा। पर अर्जुन तेज़ था। उसने पकड़ लिया।

अश्वत्थामा को अर्जुन ने रथ से पीछे बाँधा। घसीटते हुए लाया।

द्रौपदी सामने।

उसकी आँखों में आँसू थे, मगर बात साफ़।

”अर्जुन,” उसने कहा, ”इसे मत मार।”

अर्जुन हैरान। ”क्यों? यह तुम्हारे बच्चों का हत्यारा है।”

”हाँ। और इसकी माँ भी एक माँ है। मेरी तरह। अगर यह मरा, तो उसका दर्द मेरे जैसा होगा। मैं किसी और को वो दर्द नहीं देना चाहती।”

अर्जुन का दिल पिघला। पर भीम पास खड़ा था।

”क्या बकवास?” भीम बोला। ”इस पाप के लिए तो मौत भी कम है।”

द्रौपदी ने हाथ जोड़े। ”भीम, नहीं। हमारा दर्द बढ़ता ही रहेगा अगर हम बदला लेते रहेंगे।”

कृष्ण पास खड़े थे। चुप-चाप। उन्होंने एक middle रास्ता निकाला।

”अर्जुन, इसके सिर पर एक मणि है। द्रोणाचार्य ने इसे दी थी। यह मणि इसकी ताक़त है। उसको निकाल ले। फिर इसका सिर मूंड दे। ब्राह्मण को मारना नहीं चाहिए, क्योंकि वो ब्राह्मण है। मगर इसकी हर बात निकाल ले, इसकी पहचान, उसकी मणि, उसकी इज़्ज़त।”

अर्जुन ने ऐसा ही किया।

अश्वत्थामा रथ से बँधा गया। मणि निकाली गई। सिर मुंडा। और जंगल में छोड़ दिया गया।

”जा। जी। हमेशा।”

वैरं हन्ति बहूनां च तत्क्षणाद् वैरमेव हि ।
नश्यन्ति न तु वैर्येण को हन्ति यस्तु तं सकृत् ॥

बदला तुरंत बहुतों के दुश्मनी को बढ़ाता है, घटाता नहीं। दुश्मनी से दुश्मनी मिटती नहीं। बस उसी से मिटती है जो उसे एक बार ही ख़त्म कर सके।

मगर कथा यहाँ ख़त्म नहीं हुई।

अश्वत्थामा जंगल में था। ज़ख़्मी। बेइज़्ज़त। पर पागल।

उसके पास अभी भी एक चीज़ बची थी। ज्ञान।

वो ब्रह्मास्त्र चलाना जानता था। उसके पास एक छोटी सी तीर वाली पुडिया थी।

उसने उसे निकाला। और अर्जुन की तरफ़ चलाने का इरादा बनाया।

मगर एक problem थी। ब्रह्मास्त्र वापस लेना भी आना चाहिए। अश्वत्थामा को सिर्फ़ चलाना आता था, वापस लेना नहीं।

उसने सोचा, ”चलो, चलाता हूँ। पाण्डव-वंश मिटेगा। यही मेरा बदला।”

और उसने ब्रह्मास्त्र चलाया।

उत्तरा, अभिमन्यु की पत्नी, उस समय गर्भवती थी। उसका गर्भ पाण्डव-वंश का continuation था।

ब्रह्मास्त्र सीधे उसकी तरफ़ गया।

उत्तरा को पता चला। वो भागी, कृष्ण के पास।

”प्रभु! मेरे गर्भ को बचाइए!”

कृष्ण ने एक पल को रुककर सोचा। फिर अपना सुदर्शन चक्र निकाला। और उसे उत्तरा के गर्भ की रक्षा के लिए भेजा।

ब्रह्मास्त्र उसके पेट तक पहुँचा, मगर सुदर्शन ने उसे रोका।

गर्भ बच गया। उस गर्भ से बाद में परीक्षित का जन्म हुआ।

मगर एक काम और हुआ।

ब्रह्मास्त्र, जब चलाया जाता है, वापस नहीं लिया जा सकता। तो वो किधर जाएगा?

कृष्ण ने अश्वत्थामा को बुलाया।

अब उसका हाल बेहद ख़राब। बिना मणि के। बिना मान के। पागल जैसा।

”अश्वत्थामा! तू ने एक माँ के गर्भ पर शस्त्र चलाया। तुझे इस के लिए शाप।”

”तू अब अमर है। तीन हज़ार साल तक। तू भटकेगा। तेरे शरीर से ख़ून निकलता रहेगा। तेरी पीठ पर तेरी ही मणि के निकालने की जगह से, मवाद बहता रहेगा। तेरा कोई इलाज नहीं।”

”तू मरना चाहेगा, पर मर नहीं पाएगा। तू जीना नहीं चाहेगा, पर जीना पड़ेगा।”

अश्वत्थामा गिर पड़ा। चिल्लाया। पर शाप तो शाप था।

वो उठा। अकेले जंगल में चला गया।

पुराण कहते हैं, वो आज भी कहीं है। हिमालय में। तीन हज़ार साल का शाप पूरा नहीं हुआ।

मन्थन

अश्वत्थामा की कथा भागवतम् के सबसे dark कथाओं में से है।

एक ब्राह्मण-योद्धा। पिता का बदला लेने के नाम पर रात में सोते हुए बच्चों को मारा। बेरहम।

और फिर, जब हार हुआ, उसने अंतिम पाप किया, गर्भ में पलते बच्चे पर ब्रह्मास्त्र।

इस कथा में सबसे hit करने वाला character द्रौपदी है। जिसके बच्चे मारे गए, उसी ने हत्यारे को ज़िन्दा छोड़ने को कहा।

क्यों? क्योंकि उसने देखा, बदला कभी ख़त्म नहीं होता। बदला से बदला, हर पीढ़ी, अनगिनत।

और कृष्ण ने एक third option दिया, हत्यारे को मारना नहीं, बल्कि उसकी identity छीनना। उसकी मणि निकालना, उसका मुंडन। ताकि वो जिए, मगर पहचान के बिना।

यह एक deep punishment है। और एक interesting moral। कई बार सबसे बड़ी सज़ा मौत नहीं, ज़िन्दगी होती है, बिना उन सब चीज़ों के जिनसे आप अपने आप को define करते थे।

और अश्वत्थामा को आज तक का शाप, यह एक रूपक है। हर वो आदमी जो किसी के बच्चे को (किसी भी रूप में) नुक़सान पहुँचाता है, वो एक शाप ले जाता है। शायद वो शाप उसको दिखाई न दे। मगर अंदर-अंदर बहता है।