लुल्ला परिवारLulla Family
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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

राग सोरठ

राग · M1-M5 + भगत

राग सोरठ

शाम की धुन, भक्ति और चिन्तन के बीच।

सोरठ राग का सुर शाम के झुकाव का है, भक्ति और चिन्तन के बीच का। दिन का काम पीछे छूटने लगा है, और मन एक तरह की मीठी गम्भीरता में बैठ रहा है।

नाम का सम्बन्ध सौराष्ट्र-क्षेत्र (आज का गुजरात) से बताया जाता है, जहाँ से इस राग की कुछ रचनाएँ शायद उठीं। ग्रंथ में सोरठ की रचनाएँ काफ़ी संख्या में हैं, गुरु अर्जन की अधिक।

"किस हउ जाची किस आराधी जा सभु को कीता होसी ॥" सोरठ M5
इस राग के सब अंग

इस राग के शबद

हर शबद अपनी पहली पंक्ति से, वाणी के अनुसार। पंक्ति पर जाने से वह शबद अपने अंग पर खुलता है।

महला 1 (18)
  1. सभना मरणा आइआ वेछोड़ा सभनाह ॥अंग 595
  2. मनु हाली किरसाणी करणी सरमु पाणी तनु खेतु ॥अंग 595
  3. माइ बाप को बेटा नीका ससुरै चतुरु जवाई ॥अंग 596
  4. पुड़ु धरती पुड़ु पाणी आसणु चारि कुंट चउबारा ॥अंग 596
  5. हउ पापी पतितु परम पाखंडी तू निरमलु निरंकारी ॥अंग 596
  6. अलख अपार अगंम अगोचर ना तिसु कालु न करमा ॥अंग 597
  7. जिउ मीना बिनु पाणीऐ तिउ साकतु मरै पिआस ॥अंग 597
  8. घटि घटि रवि रहिआ बनवारी ॥अंग 597
  9. अपना घरु मूसत राखि न साकहि की पर घरु जोहन लागा ॥अंग 598
  10. मन रे राम जपहु सुखु होई ॥अंग 598
  11. जा तिसु भावा तद ही गावा ॥अंग 599
  12. दुबिधा न पड़उ हरि बिनु होरु न पूजउ मड़ै मसाणि न जाई ॥अंग 634
  13. आसा मनसा बंधनी भाई करम धरम बंधकारी ॥अंग 635
  14. जिन॑ी सतिगुरु सेविआ पिआरे तिन॑ के साथ तरे ॥अंग 636
  15. तू गुणदातौ निरमलो भाई निरमलु ना मनु होइ ॥अंग 636
  16. सोरठि सदा सुहावणी जे सचा मनि होइ ॥अंग 642
  17. इक दझहि इक दबीअहि इकना कुते खाहि ॥अंग 648
  18. ता की रजाइ लेखिआ पाइ अब किआ कीजै पांडे ॥अंग 653
महला 2 (1)
  1. नकि नथ खसम हथ किरतु धके दे ॥अंग 653
महला 3 (61)
  1. सेवक सेव करहि सभि तेरी जिन सबदै सादु आइआ ॥अंग 599
  2. भगति खजाना भगतन कउ दीआ नाउ हरि धनु सचु सोइ ॥अंग 600
  3. दासनि दासु होवै ता हरि पाए विचहु आपु गवाई ॥अंग 600
  4. इकु पलु खिनु विसरहि तू सुआमी जाणउ बरस पचासा ॥अंग 601
  5. गुरमुखि भगति करहि प्रभ भावहि अनदिनु नामु वखाणे ॥अंग 601
  6. सो सिखु सखा बंधपु है भाई जि गुर के भाणे विचि आवै ॥अंग 601
  7. सतिगुरु सेवे सदा सुखु पाए हउमै सबदि समाणी ॥अंग 602
  8. सतिगुर मिलिऐ उलटी भई भाई जीवत मरै ता बूझ पाइ ॥अंग 602
  9. तिही गुणी त्रिभवणु विआपिआ भाई गुरमुखि बूझ बुझाइ ॥अंग 603
  10. सतिगुरु सुख सागरु जग अंतरि होर थै सुखु नाही ॥अंग 603
  11. बिनु सतिगुर सेवे बहुता दुखु लागा जुग चारे भरमाई ॥अंग 603
  12. सतिगुर सेवे ता सहज धुनि उपजै गति मति तद ही पाए ॥अंग 604
  13. हरि जी एह तेरी वडिआई ॥अंग 637
  14. निगुणिआ नो आपे बखसि लए भाई सतिगुर की सेवा लाइ ॥अंग 638
  15. सदा सुखु सोहागणी भाई अनदिनु रतीआ रंगु लाइ ॥1॥अंग 639
  16. हउमै जलते जलि मुए भ्रमि आए दूजै भाइ ॥अंग 643
  17. सफलिओ सतिगुरु सेविआ धंनु जनमु परवाणु ॥अंग 643
  18. पूरबि लिखिआ कमावणा जि करतै आपि लिखिआसु ॥अंग 643
  19. से सैण से सजणा जि गुरमुखि मिलहि सुभाइ ॥अंग 643
  20. माइआ ममता मोहणी जिनि विणु दंता जगु खाइआ ॥अंग 643
  21. घर ही महि अंम्रितु भरपूरु है मनमुखा सादु न पाइआ ॥अंग 644
  22. जिउ तनु कोलू पीड़ीऐ रतु न भोरी डेहि ॥अंग 644
  23. सजणु मैडा रंगुला रंगु लाए मनु लेइ ॥अंग 644
  24. सतिगुर की सेवा सफलु है जे को करे चितु लाइ ॥अंग 644
  25. मनमुख मंनु अजितु है दूजै लगै जाइ ॥अंग 644
  26. सतिगुर ते जो मुह फिरे से बधे दुख सहाहि ॥अंग 645
  27. जो सतिगुर ते मुह फिरे तिना ठउर न ठाउ ॥अंग 645
  28. थालै विचि तै वसतू पईओ हरि भोजनु अंम्रितु सारु ॥अंग 645
  29. जो धुरि मेले से मिलि रहे सतिगुर सिउ चितु लाइ ॥अंग 645
  30. सहजे जागै सहजे सोवै ॥अंग 646
  31. अंतरि गिआनु न आइओ जितु किछु सोझी पाइ ॥अंग 646
  32. सचा सउदा हटु सचु रतनी भरे भंडार ॥अंग 646
  33. सेखा चउचकिआ चउवाइआ एहु मनु इकतु घरि आणि ॥अंग 646
  34. हरि गुण तोटि न आवई कीमति कहणु न जाइ ॥अंग 646
  35. परथाइ साखी महा पुरख बोलदे साझी सगल जहानै ॥अंग 647
  36. गुरमुखि चितु न लाइओ अंति दुखु पहुता आइ ॥अंग 647
  37. पंडित मैलु न चुकई जे वेद पड़ै जुग चारि ॥अंग 647
  38. मनमुख हरि नामु न सेविआ दुखु लगा बहुता आइ ॥अंग 647
  39. हसती सिरि जिउ अंकसु है अहरणि जिउ सिरु देइ ॥अंग 647
  40. जिन गुरमुखि नामु धिआइआ आए ते परवाणु ॥अंग 648
  41. नानक नामु न चेतनी अगिआनी अंधुले अवरे करम कमाहि ॥अंग 648
  42. नानक सतिगुरु सेवहि आपणा से जन सचे परवाणु ॥अंग 648
  43. बिनु करमै नाउ न पाईऐ पूरै करमि पाइआ जाइ ॥अंग 648
  44. नानक नावहु घुथिआ हलतु पलतु सभु जाइ ॥अंग 648
  45. संता नालि वैरु कमावदे दुसटा नालि मोहु पिआरु ॥अंग 649
  46. सतिगुर की सेवा गाखड़ी सिरु दीजै आपु गवाइ ॥अंग 649
  47. महलु कुमहलु न जाणनी मूरख अपणै सुआइ ॥अंग 649
  48. ब्रहमु बिंदै तिस दा ब्रहमतु रहै एक सबदि लिव लाइ ॥अंग 649
  49. किआ गभरू किआ बिरधि है मनमुख त्रिसना भुख न जाइ ॥अंग 649
  50. गुर बिनु गिआनु न होवई ना सुखु वसै मनि आइ ॥अंग 650
  51. सिध साधिक नावै नो सभि खोजदे थकि रहे लिव लाइ ॥अंग 650
  52. पड़णा गुड़णा संसार की कार है अंदरि त्रिसना विकारु ॥अंग 650
  53. विणु मनु मारे कोइ न सिझई वेखहु को लिव लाइ ॥अंग 650
  54. जनम जनम की इसु मन कउ मलु लागी काला होआ सिआहु ॥अंग 651
  55. चहु जुगी कलि काली कांढी इक उतम पदवी इसु जुग माहि ॥अंग 651
  56. रे जन उथारै दबिओहु सुतिआ गई विहाइ ॥अंग 651
  57. सबदि रते हउमै गई सोभावंती नारि ॥अंग 651
  58. गुर सेवा ते सुखु ऊपजै फिरि दुखु न लगै आइ ॥अंग 651
  59. बिनु सबदै सुधु न होवई जे अनेक करै सीगार ॥अंग 651
  60. ए मन हरि जी धिआइ तू इक मनि इक चिति भाइ ॥अंग 653
  61. आपे सेवा लाइअनु आपे बखस करेइ ॥अंग 653
महला 4 (45)
  1. आपे आपि वरतदा पिआरा आपे आपि अपाहु ॥अंग 604
  2. आपे अंडज जेरज सेतज उतभुज आपे खंड आपे सभ लोइ ॥अंग 604
  3. आपे ही सभु आपि है पिआरा आपे थापि उथापै ॥अंग 605
  4. आपे कंडा आपि तराजी प्रभि आपे तोलि तोलाइआ ॥अंग 605
  5. आपे स्रिसटि उपाइदा पिआरा करि सूरजु चंदु चानाणु ॥अंग 606
  6. आपे सेवा लाइदा पिआरा आपे भगति उमाहा ॥अंग 606
  7. अनिक जनम विछुड़े दुखु पाइआ मनमुखि करम करै अहंकारी ॥अंग 607
  8. हरि सिउ प्रीति अंतरु मनु बेधिआ हरि बिनु रहणु न जाई ॥अंग 607
  9. अचरु चरै ता सिधि होई सिधी ते बुधि पाई ॥अंग 607
  10. सोरठि तामि सुहावणी जा हरि नामु ढंढोले ॥अंग 642
  11. तू आपे सिसटि करता सिरजणहारिआ ॥अंग 642
  12. हरि पुरखु निरंजनु सेवि हरि नामु धिआईऐ ॥अंग 643
  13. तुधु आपे जगतु उपाइ कै आपि खेलु रचाइआ ॥अंग 643
  14. सो हरि पुरखु अगंमु है कहु कितु बिधि पाईऐ ॥अंग 644
  15. हरि आपि वरतै आपि हरि आपि बुलाइदा ॥अंग 644
  16. एह भूपति राणे रंग दिन चारि सुहावणा ॥अंग 645
  17. जो सेवहि सति मुरारि से भवजल तरि गइआ ॥अंग 645
  18. बहि सखीआ जसु गावहि गावणहारीआ ॥अंग 645
  19. से हरि नामु धिआवहि जो हरि रतिआ ॥अंग 646
  20. जिना अंदरि कूड़ु वरतै सचु न भावई ॥अंग 646
  21. हरि चोली देह सवारी कढि पैधी भगति करि ॥अंग 646
  22. हरि सजण मेलि पिआरे मिलि पंथु दसाई ॥अंग 647
  23. हरि रसना हरि जसु गावै खरी सुहावणी ॥अंग 647
  24. गुरमुखि सखीआ सिख गुरू मेलाईआ ॥अंग 648
  25. धनु संपै माइआ संचीऐ अंते दुखदाई ॥अंग 648
  26. तिन का खाधा पैधा माइआ सभु पवितु है जो नामि हरि राते ॥अंग 648
  27. जो हरि नामु धिआइदे से हरि हरि नामि रते मन माही ॥अंग 649
  28. धंनु धनु भाग तिना भगत जना जो हरि नामा हरि मुखि कहतिआ ॥अंग 649
  29. हउ बलिहारी तिंन कंउ जो गुरमुखि सिखा ॥अंग 650
  30. हम ढाढी हरि प्रभ खसम के नित गावह हरि गुण छंता ॥अंग 650
  31. हरि हरि संत मिलहु मेरे भाई हरि नामु द्रिड़ावहु इक किनका ॥अंग 650
  32. हरि हरि मेलि साध जन संगति मुखि बोली हरि हरि भली बाणि ॥अंग 651
  33. जिना गुरु गोपिआ आपणा ते नर बुरिआरी ॥अंग 651
  34. हरि हरि अपणी दइआ करि हरि बोली बैणी ॥अंग 652
  35. हरि दासन सिउ प्रीति है हरि दासन को मितु ॥अंग 652
  36. नानक प्रीति लाई तिनि साचै तिसु बिनु रहणु न जाई ॥अंग 652
  37. रैणि दिनसु परभाति तूहै ही गावणा ॥अंग 652
  38. अंतरि अगिआनु भई मति मधिम सतिगुर की परतीति नाही ॥अंग 652
  39. मनमुख माइआ मोहि विआपे दूजै भाइ मनूआ थिरु नाहि ॥अंग 652
  40. संत भगत परवाणु जो प्रभि भाइआ ॥अंग 652
  41. गुरमुखि अंतरि सांति है मनि तनि नामि समाइ ॥अंग 653
  42. सतिगुर पुरखि जि मारिआ भ्रमि भ्रमिआ घरु छोडि गइआ ॥अंग 653
  43. गुरि सचै बधा थेहु रखवाले गुरि दिते ॥अंग 653
  44. सभे गला आपि थाटि बहालीओनु ॥अंग 653
  45. तू करण कारण समरथु हहि करते मै तुझ बिनु अवरु न कोई ॥अंग 653
महला 5 (96)
  1. किस हउ जाची किस आराधी जा सभु को कीता होसी ॥अंग 608
  2. गुरु गोविंदु सलाहीऐ भाई मनि तनि हिरदै धार ॥अंग 608
  3. जउ लउ भाउ अभाउ इहु मानै तउ लउ मिलणु दूराई ॥अंग 609
  4. पुत्र कलत्र लोक ग्रिह बनिता माइआ सनबंधेही ॥अंग 609
  5. गुरु पूरा भेटिओ वडभागी मनहि भइआ परगासा ॥अंग 609
  6. सुखीए कउ पेखै सभ सुखीआ रोगी कै भाणै सभ रोगी ॥अंग 610
  7. तनु संतन का धनु संतन का मनु संतन का कीआ ॥अंग 610
  8. जा कै हिरदै वसिआ तू करते ता की तैं आस पुजाई ॥अंग 610
  9. सगल समग्री मोहि विआपी कब ऊचे कब नीचे ॥अंग 610
  10. खोजत खोजत खोजि बीचारिओ राम नामु ततु सारा ॥अंग 611
  11. करि इसनानु सिमरि प्रभु अपना मन तन भए अरोगा ॥अंग 611
  12. एकु पिता एकस के हम बारिक तू मेरा गुर हाई ॥अंग 611
  13. कोटि ब्रहमंड को ठाकुरु सुआमी सरब जीआ का दाता रे ॥अंग 612
  14. जिना बात को बहुतु अंदेसरो ते मिटे सभि गइआ ॥अंग 612
  15. चरन कमल सिउ जा का मनु लीना से जन त्रिपति अघाई ॥अंग 612
  16. राजन महि राजा उरझाइओ मानन महि अभिमानी ॥अंग 613
  17. हम मैले तुम ऊजल करते हम निरगुन तू दाता ॥अंग 613
  18. मात गरभ महि आपन सिमरनु दे तह तुम राखनहारे ॥अंग 613
  19. हम संतन की रेनु पिआरे हम संतन की सरणा ॥अंग 614
  20. जेती समग्री देखहु रे नर तेती ही छडि जानी ॥अंग 614
  21. मिरतक कउ पाइओ तनि सासा बिछुरत आनि मिलाइआ ॥अंग 614
  22. रतनु छाडि कउडी संगि लागे जा ते कछू न पाईऐ ॥अंग 614
  23. गुण गावहु पूरन अबिनासी काम क्रोध बिखु जारे ॥अंग 615
  24. करण करावणहार प्रभु दाता पारब्रहम प्रभु सुआमी ॥अंग 615
  25. प्रभ की सरणि सगल भै लाथे दुख बिनसे सुखु पाइआ ॥अंग 615
  26. माइआ मोह मगनु अंधिआरै देवनहारु न जानै ॥अंग 616
  27. पारब्रहमु होआ सहाई कथा कीरतनु सुखदाई ॥अंग 616
  28. बिनसै मोहु मेरा अरु तेरा बिनसै अपनी धारी ॥1॥अंग 616
  29. सगल बनसपति महि बैसंतरु सगल दूध महि घीआ ॥अंग 617
  30. जा कै सिमरणि होइ अनंदा बिनसै जनम मरण भै दुखी ॥अंग 617
  31. काम क्रोध लोभ झूठ निंदा इन ते आपि छडावहु ॥अंग 617
  32. जा कै सिमरणि सभु कछु पाईऐ बिरथी घाल न जाई ॥अंग 617
  33. अबिनासी जीअन को दाता सिमरत सभ मलु खोई ॥अंग 617
  34. जनम जनम के दूख निवारै सूका मनु साधारै ॥अंग 618
  35. अंतर की गति तुम ही जानी तुझ ही पाहि निबेरो ॥अंग 618
  36. भए क्रिपाल गुरू गोविंदा सगल मनोरथ पाए ॥अंग 618
  37. गुर के चरन बसे रिद भीतरि सुभ लखण प्रभि कीने ॥अंग 618
  38. संचनि करउ नाम धनु निरमल थाती अगम अपार ॥अंग 618
  39. गुरि पूरै अपनी कल धारी सभ घट उपजी दइआ ॥अंग 618
  40. सूख मंगल कलिआण सहज धुनि प्रभ के चरण निहारिआ ॥अंग 619
  41. साधू संगि भइआ मनि उदमु नामु रतनु जसु गाई ॥अंग 619
  42. गए कलेस रोग सभि नासे प्रभि अपुनै किरपा धारी ॥अंग 619
  43. सिमरि सिमरि गुरु सतिगुरु अपना सगला दूखु मिटाइआ ॥अंग 619
  44. हमरी गणत न गणीआ काई अपणा बिरदु पछाणि ॥अंग 619
  45. दुरतु गवाइआ हरि प्रभि आपे सभु संसारु उबारिआ ॥अंग 620
  46. बखसिआ पारब्रहम परमेसरि सगले रोग बिदारे ॥अंग 620
  47. भए क्रिपाल सुआमी मेरे तितु साचै दरबारि ॥अंग 620
  48. संतहु हरि हरि नामु धिआई ॥अंग 620
  49. मेरा सतिगुरु रखवाला होआ ॥अंग 620
  50. जीअ जंत्र सभि तिस के कीए सोई संत सहाई ॥अंग 621
  51. मिलि पंचहु नही सहसा चुकाइआ ॥अंग 621
  52. हिरदै नामु वसाइहु ॥अंग 621
  53. गुरि पूरै किरपा धारी ॥अंग 621
  54. साहिबु गुनी गहेरा ॥अंग 622
  55. सूख सहज आनंदा ॥अंग 622
  56. ठाढि पाई करतारे ॥अंग 622
  57. विचि करता पुरखु खलोआ ॥अंग 623
  58. पारब्रहमि निबाही पूरी ॥अंग 623
  59. गुरि पूरै चरनी लाइआ ॥अंग 623
  60. गुरि पूरै कीती पूरी ॥अंग 624
  61. दह दिस छत्र मेघ घटा घट दामनि चमकि डराइओ ॥अंग 624
  62. गई बहोड़ु बंदी छोड़ु निरंकारु दुखदारी ॥अंग 624
  63. सिमरि सिमरि प्रभ भए अनंदा दुख कलेस सभि नाठे ॥अंग 625
  64. गुरु पूरा नमसकारे ॥अंग 625
  65. रामदास सरोवरि नाते ॥अंग 625
  66. जितु पारब्रहमु चिति आइआ ॥ सो घरु दयि वसाइआ ॥अंग 625
  67. आगै सुखु गुरि दीआ ॥अंग 626
  68. गुर का सबदु रखवारे ॥अंग 626
  69. गुर अपुने बलिहारी ॥अंग 626
  70. तापु गवाइआ गुरि पूरे ॥अंग 626
  71. सोई कराइ जो तुधु भावै ॥अंग 626
  72. हरि नामु रिदै परोइआ ॥अंग 627
  73. गुर मिलि प्रभू चितारिआ ॥अंग 627
  74. पारब्रहमि साजि सवारिआ ॥अंग 627
  75. सदा सदा हरि जापे ॥अंग 627
  76. अपना गुरू धिआए ॥अंग 627
  77. परमेसरि दिता बंना ॥अंग 627
  78. ऐथै ओथै रखवाला ॥अंग 628
  79. सतिगुर पूरे भाणा ॥अंग 628
  80. गरीबी गदा हमारी ॥अंग 628
  81. गुरि पूरै पूरी कीनी ॥अंग 628
  82. भूखे खावत लाज न आवै ॥अंग 629
  83. सुख सांदि घरि आइआ ॥अंग 629
  84. प्रभु अपुना रिदै धिआए ॥अंग 629
  85. हरि मनि तनि वसिआ सोई ॥अंग 629
  86. आगै सुखु मेरे मीता ॥अंग 629
  87. नालि नराइणु मेरै ॥अंग 630
  88. सरब सुखा का दाता सतिगुरु ता की सरनी पाईऐ ॥अंग 630
  89. करन करावन हरि अंतरजामी जन अपुने की राखै ॥अंग 630
  90. भइओ किरपालु दीन दुख भंजनु आपे सभ बिधि थाटी ॥अंग 630
  91. सिमरउ अपुना सांई ॥अंग 630
  92. सुनहु बिनंती ठाकुर मेरे जीअ जंत तेरे धारे ॥अंग 631
  93. जीअ जंत सभि वसि करि दीने सेवक सभि दरबारे ॥अंग 631
  94. सभु जगु जिनहि उपाइआ भाई करण कारण समरथु ॥अंग 639
  95. मात गरभ दुख सागरो पिआरे तह अपणा नामु जपाइआ ॥अंग 640
  96. पाठु पड़िओ अरु बेदु बीचारिओ निवलि भुअंगम साधे ॥अंग 641
महला 9 (12)
  1. रे मन राम सिउ करि प्रीति ॥अंग 631
  2. मन की मन ही माहि रही ॥अंग 631
  3. मन रे कउनु कुमति तै लीनी ॥अंग 631
  4. मन रे प्रभ की सरनि बिचारो ॥अंग 632
  5. प्रानी कउनु उपाउ करै ॥अंग 632
  6. माई मै किहि बिधि लखउ गुसाई ॥अंग 632
  7. माई मनु मेरो बसि नाहि ॥अंग 632
  8. रे नर इह साची जीअ धारि ॥अंग 633
  9. इह जगि मीतु न देखिओ कोई ॥अंग 633
  10. मन रे गहिओ न गुर उपदेसु ॥अंग 633
  11. जो नरु दुख मै दुखु नही मानै ॥अंग 633
  12. प्रीतम जानि लेहु मन माही ॥अंग 634
भगत कबीर जी (11)
  1. बुत पूजि पूजि हिंदू मूए तुरक मूए सिरु नाई ॥अंग 654
  2. जब जरीऐ तब होइ भसम तनु रहै किरम दल खाई ॥अंग 654
  3. बेद पुरान सभै मत सुनि कै करी करम की आसा ॥अंग 654
  4. दुइ दुइ लोचन पेखा ॥अंग 655
  5. जा के निगम दूध के ठाटा ॥अंग 655
  6. जिह बाझु न जीआ जाई ॥अंग 655
  7. किआ पड़ीऐ किआ गुनीऐ ॥अंग 655
  8. ह्रिदै कपटु मुख गिआनी ॥अंग 656
  9. बहु परपंच करि पर धनु लिआवै ॥अंग 656
  10. संतहु मन पवनै सुखु बनिआ ॥अंग 656
  11. भूखे भगति न कीजै ॥अंग 656
भगत नामदेव जी (3)
  1. जब देखा तब गावा ॥अंग 656
  2. पाड़ पड़ोसणि पूछि ले नामा का पहि छानि छवाई हो ॥अंग 657
  3. अणमड़िआ मंदलु बाजै ॥अंग 657
भगत रविदास जी (6)
  1. जब हम होते तब तू नाही अब तूही मै नाही ॥अंग 657
  2. जउ हम बांधे मोह फास हम प्रेम बधनि तुम बाधे ॥अंग 658
  3. दुलभ जनमु पुंन फल पाइओ बिरथा जात अबिबेकै ॥अंग 658
  4. सुख सागरु सुरतर चिंतामनि कामधेनु बसि जा के ॥अंग 658
  5. जल की भीति पवन का थंभा रकत बुंद का गारा ॥अंग 659
  6. चमरटा गांठि न जनई ॥अंग 659
अन्य भगत (2)
  1. नैनहु नीरु बहै तनु खीना भए केस दुध वानी ॥अंग 659
  2. ऐसा नामु रतनु निरमोलकु पुंनि पदारथु पाइआ ॥अंग 659

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