राग सोरठ
शाम की धुन, भक्ति और चिन्तन के बीच।
सोरठ राग का सुर शाम के झुकाव का है, भक्ति और चिन्तन के बीच का। दिन का काम पीछे छूटने लगा है, और मन एक तरह की मीठी गम्भीरता में बैठ रहा है।
नाम का सम्बन्ध सौराष्ट्र-क्षेत्र (आज का गुजरात) से बताया जाता है, जहाँ से इस राग की कुछ रचनाएँ शायद उठीं। ग्रंथ में सोरठ की रचनाएँ काफ़ी संख्या में हैं, गुरु अर्जन की अधिक।
"किस हउ जाची किस आराधी जा सभु को कीता होसी ॥" सोरठ M5
इस राग के सब अंग
इस राग के शबद
हर शबद अपनी पहली पंक्ति से, वाणी के अनुसार। पंक्ति पर जाने से वह शबद अपने अंग पर खुलता है।
महला 1 (18)
- सभना मरणा आइआ वेछोड़ा सभनाह ॥अंग 595
- मनु हाली किरसाणी करणी सरमु पाणी तनु खेतु ॥अंग 595
- माइ बाप को बेटा नीका ससुरै चतुरु जवाई ॥अंग 596
- पुड़ु धरती पुड़ु पाणी आसणु चारि कुंट चउबारा ॥अंग 596
- हउ पापी पतितु परम पाखंडी तू निरमलु निरंकारी ॥अंग 596
- अलख अपार अगंम अगोचर ना तिसु कालु न करमा ॥अंग 597
- जिउ मीना बिनु पाणीऐ तिउ साकतु मरै पिआस ॥अंग 597
- घटि घटि रवि रहिआ बनवारी ॥अंग 597
- अपना घरु मूसत राखि न साकहि की पर घरु जोहन लागा ॥अंग 598
- मन रे राम जपहु सुखु होई ॥अंग 598
- जा तिसु भावा तद ही गावा ॥अंग 599
- दुबिधा न पड़उ हरि बिनु होरु न पूजउ मड़ै मसाणि न जाई ॥अंग 634
- आसा मनसा बंधनी भाई करम धरम बंधकारी ॥अंग 635
- जिन॑ी सतिगुरु सेविआ पिआरे तिन॑ के साथ तरे ॥अंग 636
- तू गुणदातौ निरमलो भाई निरमलु ना मनु होइ ॥अंग 636
- सोरठि सदा सुहावणी जे सचा मनि होइ ॥अंग 642
- इक दझहि इक दबीअहि इकना कुते खाहि ॥अंग 648
- ता की रजाइ लेखिआ पाइ अब किआ कीजै पांडे ॥अंग 653
महला 2 (1)
- नकि नथ खसम हथ किरतु धके दे ॥अंग 653
महला 3 (61)
- सेवक सेव करहि सभि तेरी जिन सबदै सादु आइआ ॥अंग 599
- भगति खजाना भगतन कउ दीआ नाउ हरि धनु सचु सोइ ॥अंग 600
- दासनि दासु होवै ता हरि पाए विचहु आपु गवाई ॥अंग 600
- इकु पलु खिनु विसरहि तू सुआमी जाणउ बरस पचासा ॥अंग 601
- गुरमुखि भगति करहि प्रभ भावहि अनदिनु नामु वखाणे ॥अंग 601
- सो सिखु सखा बंधपु है भाई जि गुर के भाणे विचि आवै ॥अंग 601
- सतिगुरु सेवे सदा सुखु पाए हउमै सबदि समाणी ॥अंग 602
- सतिगुर मिलिऐ उलटी भई भाई जीवत मरै ता बूझ पाइ ॥अंग 602
- तिही गुणी त्रिभवणु विआपिआ भाई गुरमुखि बूझ बुझाइ ॥अंग 603
- सतिगुरु सुख सागरु जग अंतरि होर थै सुखु नाही ॥अंग 603
- बिनु सतिगुर सेवे बहुता दुखु लागा जुग चारे भरमाई ॥अंग 603
- सतिगुर सेवे ता सहज धुनि उपजै गति मति तद ही पाए ॥अंग 604
- हरि जी एह तेरी वडिआई ॥अंग 637
- निगुणिआ नो आपे बखसि लए भाई सतिगुर की सेवा लाइ ॥अंग 638
- सदा सुखु सोहागणी भाई अनदिनु रतीआ रंगु लाइ ॥1॥अंग 639
- हउमै जलते जलि मुए भ्रमि आए दूजै भाइ ॥अंग 643
- सफलिओ सतिगुरु सेविआ धंनु जनमु परवाणु ॥अंग 643
- पूरबि लिखिआ कमावणा जि करतै आपि लिखिआसु ॥अंग 643
- से सैण से सजणा जि गुरमुखि मिलहि सुभाइ ॥अंग 643
- माइआ ममता मोहणी जिनि विणु दंता जगु खाइआ ॥अंग 643
- घर ही महि अंम्रितु भरपूरु है मनमुखा सादु न पाइआ ॥अंग 644
- जिउ तनु कोलू पीड़ीऐ रतु न भोरी डेहि ॥अंग 644
- सजणु मैडा रंगुला रंगु लाए मनु लेइ ॥अंग 644
- सतिगुर की सेवा सफलु है जे को करे चितु लाइ ॥अंग 644
- मनमुख मंनु अजितु है दूजै लगै जाइ ॥अंग 644
- सतिगुर ते जो मुह फिरे से बधे दुख सहाहि ॥अंग 645
- जो सतिगुर ते मुह फिरे तिना ठउर न ठाउ ॥अंग 645
- थालै विचि तै वसतू पईओ हरि भोजनु अंम्रितु सारु ॥अंग 645
- जो धुरि मेले से मिलि रहे सतिगुर सिउ चितु लाइ ॥अंग 645
- सहजे जागै सहजे सोवै ॥अंग 646
- अंतरि गिआनु न आइओ जितु किछु सोझी पाइ ॥अंग 646
- सचा सउदा हटु सचु रतनी भरे भंडार ॥अंग 646
- सेखा चउचकिआ चउवाइआ एहु मनु इकतु घरि आणि ॥अंग 646
- हरि गुण तोटि न आवई कीमति कहणु न जाइ ॥अंग 646
- परथाइ साखी महा पुरख बोलदे साझी सगल जहानै ॥अंग 647
- गुरमुखि चितु न लाइओ अंति दुखु पहुता आइ ॥अंग 647
- पंडित मैलु न चुकई जे वेद पड़ै जुग चारि ॥अंग 647
- मनमुख हरि नामु न सेविआ दुखु लगा बहुता आइ ॥अंग 647
- हसती सिरि जिउ अंकसु है अहरणि जिउ सिरु देइ ॥अंग 647
- जिन गुरमुखि नामु धिआइआ आए ते परवाणु ॥अंग 648
- नानक नामु न चेतनी अगिआनी अंधुले अवरे करम कमाहि ॥अंग 648
- नानक सतिगुरु सेवहि आपणा से जन सचे परवाणु ॥अंग 648
- बिनु करमै नाउ न पाईऐ पूरै करमि पाइआ जाइ ॥अंग 648
- नानक नावहु घुथिआ हलतु पलतु सभु जाइ ॥अंग 648
- संता नालि वैरु कमावदे दुसटा नालि मोहु पिआरु ॥अंग 649
- सतिगुर की सेवा गाखड़ी सिरु दीजै आपु गवाइ ॥अंग 649
- महलु कुमहलु न जाणनी मूरख अपणै सुआइ ॥अंग 649
- ब्रहमु बिंदै तिस दा ब्रहमतु रहै एक सबदि लिव लाइ ॥अंग 649
- किआ गभरू किआ बिरधि है मनमुख त्रिसना भुख न जाइ ॥अंग 649
- गुर बिनु गिआनु न होवई ना सुखु वसै मनि आइ ॥अंग 650
- सिध साधिक नावै नो सभि खोजदे थकि रहे लिव लाइ ॥अंग 650
- पड़णा गुड़णा संसार की कार है अंदरि त्रिसना विकारु ॥अंग 650
- विणु मनु मारे कोइ न सिझई वेखहु को लिव लाइ ॥अंग 650
- जनम जनम की इसु मन कउ मलु लागी काला होआ सिआहु ॥अंग 651
- चहु जुगी कलि काली कांढी इक उतम पदवी इसु जुग माहि ॥अंग 651
- रे जन उथारै दबिओहु सुतिआ गई विहाइ ॥अंग 651
- सबदि रते हउमै गई सोभावंती नारि ॥अंग 651
- गुर सेवा ते सुखु ऊपजै फिरि दुखु न लगै आइ ॥अंग 651
- बिनु सबदै सुधु न होवई जे अनेक करै सीगार ॥अंग 651
- ए मन हरि जी धिआइ तू इक मनि इक चिति भाइ ॥अंग 653
- आपे सेवा लाइअनु आपे बखस करेइ ॥अंग 653
महला 4 (45)
- आपे आपि वरतदा पिआरा आपे आपि अपाहु ॥अंग 604
- आपे अंडज जेरज सेतज उतभुज आपे खंड आपे सभ लोइ ॥अंग 604
- आपे ही सभु आपि है पिआरा आपे थापि उथापै ॥अंग 605
- आपे कंडा आपि तराजी प्रभि आपे तोलि तोलाइआ ॥अंग 605
- आपे स्रिसटि उपाइदा पिआरा करि सूरजु चंदु चानाणु ॥अंग 606
- आपे सेवा लाइदा पिआरा आपे भगति उमाहा ॥अंग 606
- अनिक जनम विछुड़े दुखु पाइआ मनमुखि करम करै अहंकारी ॥अंग 607
- हरि सिउ प्रीति अंतरु मनु बेधिआ हरि बिनु रहणु न जाई ॥अंग 607
- अचरु चरै ता सिधि होई सिधी ते बुधि पाई ॥अंग 607
- सोरठि तामि सुहावणी जा हरि नामु ढंढोले ॥अंग 642
- तू आपे सिसटि करता सिरजणहारिआ ॥अंग 642
- हरि पुरखु निरंजनु सेवि हरि नामु धिआईऐ ॥अंग 643
- तुधु आपे जगतु उपाइ कै आपि खेलु रचाइआ ॥अंग 643
- सो हरि पुरखु अगंमु है कहु कितु बिधि पाईऐ ॥अंग 644
- हरि आपि वरतै आपि हरि आपि बुलाइदा ॥अंग 644
- एह भूपति राणे रंग दिन चारि सुहावणा ॥अंग 645
- जो सेवहि सति मुरारि से भवजल तरि गइआ ॥अंग 645
- बहि सखीआ जसु गावहि गावणहारीआ ॥अंग 645
- से हरि नामु धिआवहि जो हरि रतिआ ॥अंग 646
- जिना अंदरि कूड़ु वरतै सचु न भावई ॥अंग 646
- हरि चोली देह सवारी कढि पैधी भगति करि ॥अंग 646
- हरि सजण मेलि पिआरे मिलि पंथु दसाई ॥अंग 647
- हरि रसना हरि जसु गावै खरी सुहावणी ॥अंग 647
- गुरमुखि सखीआ सिख गुरू मेलाईआ ॥अंग 648
- धनु संपै माइआ संचीऐ अंते दुखदाई ॥अंग 648
- तिन का खाधा पैधा माइआ सभु पवितु है जो नामि हरि राते ॥अंग 648
- जो हरि नामु धिआइदे से हरि हरि नामि रते मन माही ॥अंग 649
- धंनु धनु भाग तिना भगत जना जो हरि नामा हरि मुखि कहतिआ ॥अंग 649
- हउ बलिहारी तिंन कंउ जो गुरमुखि सिखा ॥अंग 650
- हम ढाढी हरि प्रभ खसम के नित गावह हरि गुण छंता ॥अंग 650
- हरि हरि संत मिलहु मेरे भाई हरि नामु द्रिड़ावहु इक किनका ॥अंग 650
- हरि हरि मेलि साध जन संगति मुखि बोली हरि हरि भली बाणि ॥अंग 651
- जिना गुरु गोपिआ आपणा ते नर बुरिआरी ॥अंग 651
- हरि हरि अपणी दइआ करि हरि बोली बैणी ॥अंग 652
- हरि दासन सिउ प्रीति है हरि दासन को मितु ॥अंग 652
- नानक प्रीति लाई तिनि साचै तिसु बिनु रहणु न जाई ॥अंग 652
- रैणि दिनसु परभाति तूहै ही गावणा ॥अंग 652
- अंतरि अगिआनु भई मति मधिम सतिगुर की परतीति नाही ॥अंग 652
- मनमुख माइआ मोहि विआपे दूजै भाइ मनूआ थिरु नाहि ॥अंग 652
- संत भगत परवाणु जो प्रभि भाइआ ॥अंग 652
- गुरमुखि अंतरि सांति है मनि तनि नामि समाइ ॥अंग 653
- सतिगुर पुरखि जि मारिआ भ्रमि भ्रमिआ घरु छोडि गइआ ॥अंग 653
- गुरि सचै बधा थेहु रखवाले गुरि दिते ॥अंग 653
- सभे गला आपि थाटि बहालीओनु ॥अंग 653
- तू करण कारण समरथु हहि करते मै तुझ बिनु अवरु न कोई ॥अंग 653
महला 5 (96)
- किस हउ जाची किस आराधी जा सभु को कीता होसी ॥अंग 608
- गुरु गोविंदु सलाहीऐ भाई मनि तनि हिरदै धार ॥अंग 608
- जउ लउ भाउ अभाउ इहु मानै तउ लउ मिलणु दूराई ॥अंग 609
- पुत्र कलत्र लोक ग्रिह बनिता माइआ सनबंधेही ॥अंग 609
- गुरु पूरा भेटिओ वडभागी मनहि भइआ परगासा ॥अंग 609
- सुखीए कउ पेखै सभ सुखीआ रोगी कै भाणै सभ रोगी ॥अंग 610
- तनु संतन का धनु संतन का मनु संतन का कीआ ॥अंग 610
- जा कै हिरदै वसिआ तू करते ता की तैं आस पुजाई ॥अंग 610
- सगल समग्री मोहि विआपी कब ऊचे कब नीचे ॥अंग 610
- खोजत खोजत खोजि बीचारिओ राम नामु ततु सारा ॥अंग 611
- करि इसनानु सिमरि प्रभु अपना मन तन भए अरोगा ॥अंग 611
- एकु पिता एकस के हम बारिक तू मेरा गुर हाई ॥अंग 611
- कोटि ब्रहमंड को ठाकुरु सुआमी सरब जीआ का दाता रे ॥अंग 612
- जिना बात को बहुतु अंदेसरो ते मिटे सभि गइआ ॥अंग 612
- चरन कमल सिउ जा का मनु लीना से जन त्रिपति अघाई ॥अंग 612
- राजन महि राजा उरझाइओ मानन महि अभिमानी ॥अंग 613
- हम मैले तुम ऊजल करते हम निरगुन तू दाता ॥अंग 613
- मात गरभ महि आपन सिमरनु दे तह तुम राखनहारे ॥अंग 613
- हम संतन की रेनु पिआरे हम संतन की सरणा ॥अंग 614
- जेती समग्री देखहु रे नर तेती ही छडि जानी ॥अंग 614
- मिरतक कउ पाइओ तनि सासा बिछुरत आनि मिलाइआ ॥अंग 614
- रतनु छाडि कउडी संगि लागे जा ते कछू न पाईऐ ॥अंग 614
- गुण गावहु पूरन अबिनासी काम क्रोध बिखु जारे ॥अंग 615
- करण करावणहार प्रभु दाता पारब्रहम प्रभु सुआमी ॥अंग 615
- प्रभ की सरणि सगल भै लाथे दुख बिनसे सुखु पाइआ ॥अंग 615
- माइआ मोह मगनु अंधिआरै देवनहारु न जानै ॥अंग 616
- पारब्रहमु होआ सहाई कथा कीरतनु सुखदाई ॥अंग 616
- बिनसै मोहु मेरा अरु तेरा बिनसै अपनी धारी ॥1॥अंग 616
- सगल बनसपति महि बैसंतरु सगल दूध महि घीआ ॥अंग 617
- जा कै सिमरणि होइ अनंदा बिनसै जनम मरण भै दुखी ॥अंग 617
- काम क्रोध लोभ झूठ निंदा इन ते आपि छडावहु ॥अंग 617
- जा कै सिमरणि सभु कछु पाईऐ बिरथी घाल न जाई ॥अंग 617
- अबिनासी जीअन को दाता सिमरत सभ मलु खोई ॥अंग 617
- जनम जनम के दूख निवारै सूका मनु साधारै ॥अंग 618
- अंतर की गति तुम ही जानी तुझ ही पाहि निबेरो ॥अंग 618
- भए क्रिपाल गुरू गोविंदा सगल मनोरथ पाए ॥अंग 618
- गुर के चरन बसे रिद भीतरि सुभ लखण प्रभि कीने ॥अंग 618
- संचनि करउ नाम धनु निरमल थाती अगम अपार ॥अंग 618
- गुरि पूरै अपनी कल धारी सभ घट उपजी दइआ ॥अंग 618
- सूख मंगल कलिआण सहज धुनि प्रभ के चरण निहारिआ ॥अंग 619
- साधू संगि भइआ मनि उदमु नामु रतनु जसु गाई ॥अंग 619
- गए कलेस रोग सभि नासे प्रभि अपुनै किरपा धारी ॥अंग 619
- सिमरि सिमरि गुरु सतिगुरु अपना सगला दूखु मिटाइआ ॥अंग 619
- हमरी गणत न गणीआ काई अपणा बिरदु पछाणि ॥अंग 619
- दुरतु गवाइआ हरि प्रभि आपे सभु संसारु उबारिआ ॥अंग 620
- बखसिआ पारब्रहम परमेसरि सगले रोग बिदारे ॥अंग 620
- भए क्रिपाल सुआमी मेरे तितु साचै दरबारि ॥अंग 620
- संतहु हरि हरि नामु धिआई ॥अंग 620
- मेरा सतिगुरु रखवाला होआ ॥अंग 620
- जीअ जंत्र सभि तिस के कीए सोई संत सहाई ॥अंग 621
- मिलि पंचहु नही सहसा चुकाइआ ॥अंग 621
- हिरदै नामु वसाइहु ॥अंग 621
- गुरि पूरै किरपा धारी ॥अंग 621
- साहिबु गुनी गहेरा ॥अंग 622
- सूख सहज आनंदा ॥अंग 622
- ठाढि पाई करतारे ॥अंग 622
- विचि करता पुरखु खलोआ ॥अंग 623
- पारब्रहमि निबाही पूरी ॥अंग 623
- गुरि पूरै चरनी लाइआ ॥अंग 623
- गुरि पूरै कीती पूरी ॥अंग 624
- दह दिस छत्र मेघ घटा घट दामनि चमकि डराइओ ॥अंग 624
- गई बहोड़ु बंदी छोड़ु निरंकारु दुखदारी ॥अंग 624
- सिमरि सिमरि प्रभ भए अनंदा दुख कलेस सभि नाठे ॥अंग 625
- गुरु पूरा नमसकारे ॥अंग 625
- रामदास सरोवरि नाते ॥अंग 625
- जितु पारब्रहमु चिति आइआ ॥ सो घरु दयि वसाइआ ॥अंग 625
- आगै सुखु गुरि दीआ ॥अंग 626
- गुर का सबदु रखवारे ॥अंग 626
- गुर अपुने बलिहारी ॥अंग 626
- तापु गवाइआ गुरि पूरे ॥अंग 626
- सोई कराइ जो तुधु भावै ॥अंग 626
- हरि नामु रिदै परोइआ ॥अंग 627
- गुर मिलि प्रभू चितारिआ ॥अंग 627
- पारब्रहमि साजि सवारिआ ॥अंग 627
- सदा सदा हरि जापे ॥अंग 627
- अपना गुरू धिआए ॥अंग 627
- परमेसरि दिता बंना ॥अंग 627
- ऐथै ओथै रखवाला ॥अंग 628
- सतिगुर पूरे भाणा ॥अंग 628
- गरीबी गदा हमारी ॥अंग 628
- गुरि पूरै पूरी कीनी ॥अंग 628
- भूखे खावत लाज न आवै ॥अंग 629
- सुख सांदि घरि आइआ ॥अंग 629
- प्रभु अपुना रिदै धिआए ॥अंग 629
- हरि मनि तनि वसिआ सोई ॥अंग 629
- आगै सुखु मेरे मीता ॥अंग 629
- नालि नराइणु मेरै ॥अंग 630
- सरब सुखा का दाता सतिगुरु ता की सरनी पाईऐ ॥अंग 630
- करन करावन हरि अंतरजामी जन अपुने की राखै ॥अंग 630
- भइओ किरपालु दीन दुख भंजनु आपे सभ बिधि थाटी ॥अंग 630
- सिमरउ अपुना सांई ॥अंग 630
- सुनहु बिनंती ठाकुर मेरे जीअ जंत तेरे धारे ॥अंग 631
- जीअ जंत सभि वसि करि दीने सेवक सभि दरबारे ॥अंग 631
- सभु जगु जिनहि उपाइआ भाई करण कारण समरथु ॥अंग 639
- मात गरभ दुख सागरो पिआरे तह अपणा नामु जपाइआ ॥अंग 640
- पाठु पड़िओ अरु बेदु बीचारिओ निवलि भुअंगम साधे ॥अंग 641
महला 9 (12)
- रे मन राम सिउ करि प्रीति ॥अंग 631
- मन की मन ही माहि रही ॥अंग 631
- मन रे कउनु कुमति तै लीनी ॥अंग 631
- मन रे प्रभ की सरनि बिचारो ॥अंग 632
- प्रानी कउनु उपाउ करै ॥अंग 632
- माई मै किहि बिधि लखउ गुसाई ॥अंग 632
- माई मनु मेरो बसि नाहि ॥अंग 632
- रे नर इह साची जीअ धारि ॥अंग 633
- इह जगि मीतु न देखिओ कोई ॥अंग 633
- मन रे गहिओ न गुर उपदेसु ॥अंग 633
- जो नरु दुख मै दुखु नही मानै ॥अंग 633
- प्रीतम जानि लेहु मन माही ॥अंग 634
भगत कबीर जी (11)
- बुत पूजि पूजि हिंदू मूए तुरक मूए सिरु नाई ॥अंग 654
- जब जरीऐ तब होइ भसम तनु रहै किरम दल खाई ॥अंग 654
- बेद पुरान सभै मत सुनि कै करी करम की आसा ॥अंग 654
- दुइ दुइ लोचन पेखा ॥अंग 655
- जा के निगम दूध के ठाटा ॥अंग 655
- जिह बाझु न जीआ जाई ॥अंग 655
- किआ पड़ीऐ किआ गुनीऐ ॥अंग 655
- ह्रिदै कपटु मुख गिआनी ॥अंग 656
- बहु परपंच करि पर धनु लिआवै ॥अंग 656
- संतहु मन पवनै सुखु बनिआ ॥अंग 656
- भूखे भगति न कीजै ॥अंग 656
भगत नामदेव जी (3)
- जब देखा तब गावा ॥अंग 656
- पाड़ पड़ोसणि पूछि ले नामा का पहि छानि छवाई हो ॥अंग 657
- अणमड़िआ मंदलु बाजै ॥अंग 657