अंग 632

अंग
632
राग सोरठ
राग: सोरठ · रचयिता: Guru Tegh Bahaadur Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਅੰਤਿ ਸੰਗ ਕਾਹੂ ਨਹੀ ਦੀਨਾ ਬਿਰਥਾ ਆਪੁ ਬੰਧਾਇਆ ॥੧॥
ਨਾ ਹਰਿ ਭਜਿਓ ਨ ਗੁਰ ਜਨੁ ਸੇਵਿਓ ਨਹ ਉਪਜਿਓ ਕਛੁ ਗਿਆਨਾ ॥
ਘਟ ਹੀ ਮਾਹਿ ਨਿਰੰਜਨੁ ਤੇਰੈ ਤੈ ਖੋਜਤ ਉਦਿਆਨਾ ॥੨॥
ਬਹੁਤੁ ਜਨਮ ਭਰਮਤ ਤੈ ਹਾਰਿਓ ਅਸਥਿਰ ਮਤਿ ਨਹੀ ਪਾਈ ॥
ਮਾਨਸ ਦੇਹ ਪਾਇ ਪਦ ਹਰਿ ਭਜੁ ਨਾਨਕ ਬਾਤ ਬਤਾਈ ॥੩॥੩॥
अंति संग काहू नही दीना बिरथा आपु बंधाइआ ॥१॥
ना हरि भजिओ न गुर जनु सेविओ नह उपजिओ कछु गिआना ॥
घट ही माहि निरंजनु तेरै तै खोजत उदिआना ॥२॥
बहुतु जनम भरमत तै हारिओ असथिर मति नही पाई ॥
मानस देह पाइ पद हरि भजु नानक बात बताई ॥३॥३॥

हिन्दी अर्थ: (दुनिया के पदार्थों में से) किसी ने भी आखिर में किसी का साथ नहीं दिया।तूने व्यर्थ ही अपने आप को (माया के मोह में) जकड़ रखा है। 1। हे भाई ! (अभी तक) ना तूने परमात्मा की भक्ति की है।ना गुरू की शरण पड़ा है।ना ही तेरे अंदर आत्मिक जीवन की सूझ आई है। माया से निर्लिप प्रभू तेरे हृदय में बस रहा है।पर तू (बाहर) जंगलों में उसे तलाश रहा है। 2। हे भाई ! अनेकों जन्मों में भटक-भटक के तूने (मनुष्य जन्म की बाजी) हार ली है।तूने ऐसी अक्ल नहीं सीखी जिसकी बरकति से (जन्मों के चक्करों में से) तुझे अडोलता हासिल हो सके। हे नानक ! (कह, हे भाई ! गुरू ने तो ये) बात समझाई है कि मानस जन्म का (ऊँचा) दर्जा हासिल करके परमात्मा का भजन कर। 3। 3।
ਸੋਰਠਿ ਮਹਲਾ ੯ ॥
ਮਨ ਰੇ ਪ੍ਰਭ ਕੀ ਸਰਨਿ ਬਿਚਾਰੋ ॥
ਜਿਹ ਸਿਮਰਤ ਗਨਕਾ ਸੀ ਉਧਰੀ ਤਾ ਕੋ ਜਸੁ ਉਰ ਧਾਰੋ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਅਟਲ ਭਇਓ ਧ੍ਰੂਅ ਜਾ ਕੈ ਸਿਮਰਨਿ ਅਰੁ ਨਿਰਭੈ ਪਦੁ ਪਾਇਆ ॥
ਦੁਖ ਹਰਤਾ ਇਹ ਬਿਧਿ ਕੋ ਸੁਆਮੀ ਤੈ ਕਾਹੇ ਬਿਸਰਾਇਆ ॥੧॥
ਜਬ ਹੀ ਸਰਨਿ ਗਹੀ ਕਿਰਪਾ ਨਿਧਿ ਗਜ ਗਰਾਹ ਤੇ ਛੂਟਾ ॥
ਮਹਮਾ ਨਾਮ ਕਹਾ ਲਉ ਬਰਨਉ ਰਾਮ ਕਹਤ ਬੰਧਨ ਤਿਹ ਤੂਟਾ ॥੨॥
ਅਜਾਮਲੁ ਪਾਪੀ ਜਗੁ ਜਾਨੇ ਨਿਮਖ ਮਾਹਿ ਨਿਸਤਾਰਾ ॥
ਨਾਨਕ ਕਹਤ ਚੇਤ ਚਿੰਤਾਮਨਿ ਤੈ ਭੀ ਉਤਰਹਿ ਪਾਰਾ ॥੩॥੪॥
सोरठि महला ९ ॥
मन रे प्रभ की सरनि बिचारो ॥
जिह सिमरत गनका सी उधरी ता को जसु उर धारो ॥१॥ रहाउ ॥
अटल भइओ ध्रूअ जा कै सिमरनि अरु निरभै पदु पाइआ ॥
दुख हरता इह बिधि को सुआमी तै काहे बिसराइआ ॥१॥
जब ही सरनि गही किरपा निधि गज गराह ते छूटा ॥
महमा नाम कहा लउ बरनउ राम कहत बंधन तिह तूटा ॥२॥
अजामलु पापी जगु जाने निमख माहि निसतारा ॥
नानक कहत चेत चिंतामनि तै भी उतरहि पारा ॥३॥४॥

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला ९ ॥ हे मन ! परमात्मा की शरण पड़ कर उसके नाम का ध्यान धरा कर। जिस परमात्मा का सिमरन करके गनिका (विकारों में डूबने से) बच गई थी तू भी।(हे भाई !) उसकी सिफत सालाह अपने दिल में बसाए रख।रहाउ। हे भाई ! जिस परमात्मा के सिमरन से ध्रूव सदा के लिए अटल हो गया है और उसने निर्भयता का आत्मिक दर्जा हासिल कर लिया था। तूने उस परमात्मा को क्यों भुलाया हुआ है।वह तो इस तरह के दुखों का नाश करने वाला है। 1। हे भाई ! जिस वक्त ही (हाथी ने) कृपा के समुंद्र परमात्मा का आसरा लिया वह हाथी (गज) तेंदुए की पकड़ से निकल गया। मैं कहाँ तक परमात्मा के नाम की वडिआई बताऊँ।परमात्मा का नाम उचार के उस (हाथी) के बंधन टूट गए थे। 2। हे भाई ! सारा जगत जानता है कि अजामल विकारी था (परमात्मा के नामका सिमरन करके) पलक झपकने जितने समय में ही उसका पार-उतारा हो गया था। नानक कहता है, (हे भाई ! तू) सारी चितवनियां पूरी करने वाले परमात्मा का नाम सिमरा कर।तू भी (संसार समुंद्र से) पार लांघ जाएगा। 3। 4।
ਸੋਰਠਿ ਮਹਲਾ ੯ ॥
ਪ੍ਰਾਨੀ ਕਉਨੁ ਉਪਾਉ ਕਰੈ ॥
ਜਾ ਤੇ ਭਗਤਿ ਰਾਮ ਕੀ ਪਾਵੈ ਜਮ ਕੋ ਤ੍ਰਾਸੁ ਹਰੈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਕਉਨੁ ਕਰਮ ਬਿਦਿਆ ਕਹੁ ਕੈਸੀ ਧਰਮੁ ਕਉਨੁ ਫੁਨਿ ਕਰਈ ॥
ਕਉਨੁ ਨਾਮੁ ਗੁਰ ਜਾ ਕੈ ਸਿਮਰੈ ਭਵ ਸਾਗਰ ਕਉ ਤਰਈ ॥੧॥
ਕਲ ਮੈ ਏਕੁ ਨਾਮੁ ਕਿਰਪਾ ਨਿਧਿ ਜਾਹਿ ਜਪੈ ਗਤਿ ਪਾਵੈ ॥
ਅਉਰ ਧਰਮ ਤਾ ਕੈ ਸਮ ਨਾਹਨਿ ਇਹ ਬਿਧਿ ਬੇਦੁ ਬਤਾਵੈ ॥੨॥
ਸੁਖੁ ਦੁਖੁ ਰਹਤ ਸਦਾ ਨਿਰਲੇਪੀ ਜਾ ਕਉ ਕਹਤ ਗੁਸਾਈ ॥
ਸੋ ਤੁਮ ਹੀ ਮਹਿ ਬਸੈ ਨਿਰੰਤਰਿ ਨਾਨਕ ਦਰਪਨਿ ਨਿਆਈ ॥੩॥੫॥
सोरठि महला ९ ॥
प्रानी कउनु उपाउ करै ॥
जा ते भगति राम की पावै जम को त्रासु हरै ॥१॥ रहाउ ॥
कउनु करम बिदिआ कहु कैसी धरमु कउनु फुनि करई ॥
कउनु नामु गुर जा कै सिमरै भव सागर कउ तरई ॥१॥
कल मै एकु नामु किरपा निधि जाहि जपै गति पावै ॥
अउर धरम ता कै सम नाहनि इह बिधि बेदु बतावै ॥२॥
सुखु दुखु रहत सदा निरलेपी जा कउ कहत गुसाई ॥
सो तुम ही महि बसै निरंतरि नानक दरपनि निआई ॥३॥५॥

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला ९ ॥ (हे भाई ! बता) मनुष्य वह कौन से उपाय करे जिससे परमात्मा की भक्ति प्राप्त कर सके। और जम का डर दूर कर सके। 1।रहाउ। (हे भाई !) बता।वह कौन से (धार्मिक) कर्म हैं।वह कैसी विद्या है।वह कौन सा धर्म है (जो मनुष्य) करे; वह कौन सा गुरू का (बताया) नाम है जिसका सिमरन करने से मनुष्य संसार समुंद्र से पार लांघ सकता है। 1। (हे भाई !) कृपा के खजाने परमात्मा का नाम ही जगत में है जिसको (जो मनुष्य) जपता है (वह) उच्च आत्मिक अवस्था हासिल कर लेता है। और किसी तरह के भी कोई कर्म उस (नाम) के बराबर नहीं हें- वेद (भी) यह युक्ति बताता है। 2। हे नानक ! (कह, हे भाई !) जिसे (जगत) धरती का पति (गोसाई) कहता है वह सुखों दुखों से अलग रहता है।वह सदा (माया से) निर्लिप रहता है। वह तेरे अंदर भी एक रस बस रहा है।जैसे शीशे (में अक्स बसता हैं उसका सदा सिमरन करना चाहिए)। 3। 5।
ਸੋਰਠਿ ਮਹਲਾ ੯ ॥
ਮਾਈ ਮੈ ਕਿਹਿ ਬਿਧਿ ਲਖਉ ਗੁਸਾਈ ॥
ਮਹਾ ਮੋਹ ਅਗਿਆਨਿ ਤਿਮਰਿ ਮੋ ਮਨੁ ਰਹਿਓ ਉਰਝਾਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਗਲ ਜਨਮ ਭਰਮ ਹੀ ਭਰਮ ਖੋਇਓ ਨਹ ਅਸਥਿਰੁ ਮਤਿ ਪਾਈ ॥
ਬਿਖਿਆਸਕਤ ਰਹਿਓ ਨਿਸ ਬਾਸੁਰ ਨਹ ਛੂਟੀ ਅਧਮਾਈ ॥੧॥
ਸਾਧਸੰਗੁ ਕਬਹੂ ਨਹੀ ਕੀਨਾ ਨਹ ਕੀਰਤਿ ਪ੍ਰਭ ਗਾਈ ॥
ਜਨ ਨਾਨਕ ਮੈ ਨਾਹਿ ਕੋਊ ਗੁਨੁ ਰਾਖਿ ਲੇਹੁ ਸਰਨਾਈ ॥੨॥੬॥
सोरठि महला ९ ॥
माई मै किहि बिधि लखउ गुसाई ॥
महा मोह अगिआनि तिमरि मो मनु रहिओ उरझाई ॥१॥ रहाउ ॥
सगल जनम भरम ही भरम खोइओ नह असथिरु मति पाई ॥
बिखिआसकत रहिओ निस बासुर नह छूटी अधमाई ॥१॥
साधसंगु कबहू नही कीना नह कीरति प्रभ गाई ॥
जन नानक मै नाहि कोऊ गुनु राखि लेहु सरनाई ॥२॥६॥

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला ९ ॥ हे माँ ! धरती के प्रभू-पति को मैं किस तरह पहचानूँ। मेरा मन (तो) बड़े मोह भरी अग्यानता में।मोह के अँधेरे में (सदा) फसा रहता है। 1।रहाउ। बहुत जनमों में (अभी तक ऐसी) मति नहीं हासिल की (जो मुझे) अडोल रख सके। दिन-रात मैं माया में ही लिपटा रहता हूँ।मेरी ये नीचता खत्म होने को नहीं आती। 1। हे माँ ! मैंने कभी गुरमुखों की संगति नहीं की।मैंने कभी परमात्मा के सिफत सालाह का गीत नहीं गाया। हे दास नानक ! (कह, हे प्रभू !) मेरे अंदर कोई गुण नहीं।मुझे अपनी शरण में रख। 2। 6।
ਸੋਰਠਿ ਮਹਲਾ ੯ ॥
ਮਾਈ ਮਨੁ ਮੇਰੋ ਬਸਿ ਨਾਹਿ ॥
ਨਿਸ ਬਾਸੁਰ ਬਿਖਿਅਨ ਕਉ ਧਾਵਤ ਕਿਹਿ ਬਿਧਿ ਰੋਕਉ ਤਾਹਿ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਬੇਦ ਪੁਰਾਨ ਸਿਮ੍ਰਿਤਿ ਕੇ ਮਤ ਸੁਨਿ ਨਿਮਖ ਨ ਹੀਏ ਬਸਾਵੈ ॥
ਪਰ ਧਨ ਪਰ ਦਾਰਾ ਸਿਉ ਰਚਿਓ ਬਿਰਥਾ ਜਨਮੁ ਸਿਰਾਵੈ ॥੧॥
ਮਦਿ ਮਾਇਆ ਕੈ ਭਇਓ ਬਾਵਰੋ ਸੂਝਤ ਨਹ ਕਛੁ ਗਿਆਨਾ ॥
ਘਟ ਹੀ ਭੀਤਰਿ ਬਸਤ ਨਿਰੰਜਨੁ ਤਾ ਕੋ ਮਰਮੁ ਨ ਜਾਨਾ ॥੨॥
सोरठि महला ९ ॥
माई मनु मेरो बसि नाहि ॥
निस बासुर बिखिअन कउ धावत किहि बिधि रोकउ ताहि ॥१॥ रहाउ ॥
बेद पुरान सिम्रिति के मत सुनि निमख न हीए बसावै ॥
पर धन पर दारा सिउ रचिओ बिरथा जनमु सिरावै ॥१॥
मदि माइआ कै भइओ बावरो सूझत नह कछु गिआना ॥
घट ही भीतरि बसत निरंजनु ता को मरमु न जाना ॥२॥

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला ९ ॥ हे माँ ! मेरा मन मेरे काबू में नहीं। रात-दिन पदार्थों की खातिर दौड़ता फिरता है।मैं इसे कैसे रोकूँ। 1।रहाउ। ये जीव वेदों-पुराणों-स्मृतियों का उपदेश सुन के (भी) रक्ती भर समय के लिए भी (उस उपदेश को अपने) हृदय में नहीं बसाता। पराए धन। पराई स्त्री के मोह में मस्त रहता है।(इस तरह अपना) जनम व्यर्थ गुजारता है। 1। जीव माया के नशे में पागल हो रहा है।आत्मिक जीवन के बारे में इसे कोई सूझ नहीं आती। माया से निर्लिप प्रभू इसके दिल में ही बसता है पर ये भेद ये जीव नहीं समझता। 2।

संदर्भ: यह अंग 632 है, राग सोरठ का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Tegh Bahaadur Ji।

दिल्ली के winter-fog में सुबह 5 बजे driver को waiting करवाना।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 37 पंक्तियों का है, 5 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 632” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: सोरठ राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 633 →, पीछे का: ← अंग 631

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।