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अंग 653

अंग
653
राग सोरठ
राग: सोरठ · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
नानक भए पुनीत हरि तीरथि नाइआ ॥26॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! (ऐसे मनुष्य) हरी (के भजन रूप) तीर्थ में नहाते हैं और पवित्र हो जाते हैं। 26।
सलोकु मः 4 ॥
गुरमुखि अंतरि सांति है मनि तनि नामि समाइ ॥
नामो चितवै नामु पड़ै नामि रहै लिव लाइ ॥
नामु पदारथु पाइआ चिंता गई बिलाइ ॥
सतिगुरि मिलिऐ नामु ऊपजै तिसना भुख सभ जाइ ॥
नानक नामे रतिआ नामो पलै पाइ ॥1॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 4॥ अगर मनुष्य सतिगुरू के सन्मुख है उसके अंदर ठंढ है और वह मन से तन से नाम में लीन रहता है। वह नाम ही चितवता है।नाम ही पढ़ता है और नाम में ही बिरती जोड़े रखता है। नाम (रूपी) सुंदर वस्तु पा के उसकी चिंताएं दूर हो जाती है। यदि गुरू मिल जाए तो नाम (हृदय में) अंकुरित होता है।तृष्णा दूर हो जाती है (माया की) सारी भूख दूर हो जाती है। हे नानक ! नाम में रंगे जाने के कारण नाम ही (हृदय रूप) पल्ले में उकर जाता है। 1।
मः 4 ॥
सतिगुर पुरखि जि मारिआ भ्रमि भ्रमिआ घरु छोडि गइआ ॥
ओसु पिछै वजै फकड़ी मुहु काला आगै भइआ ॥
ओसु अरलु बरलु मुहहु निकलै नित झगू सुटदा मुआ ॥
किआ होवै किसै ही दै कीतै जां धुरि किरतु ओस दा एहो जेहा पइआ ॥
जिथै ओहु जाइ तिथै ओहु झूठा कूड़ु बोले किसै न भावै ॥
वेखहु भाई वडिआई हरि संतहु सुआमी अपुने की जैसा कोई करै तैसा कोई पावै ॥
एहु ब्रहम बीचारु होवै दरि साचै अगो दे जनु नानकु आखि सुणावै ॥2॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: महला 4॥ जिस मनुष्य को गुरू परमेश्वर ने मारा है (भाव।जिसे रॅब के राह से बिल्कुल ही नफ़रत है) वह भ्रम में भटकता हुआ अपने ठिकाने से हिल जाता है। उसके पीछे लोग फकॅड़ी बजाते हैं और आगे (जहाँ भी जाता है) मुँह कालिख कमाता है। उसके मुँह से निरी बकवास ही निकलती है और वह सदा निंदा करके दुखी होता रहता है। किसी के करने से कुछ होने वाला नहीं है (भाव।कोई उसे सद्बुद्धि नहीं दे सकता)।क्योंकि धुर से ही (किए बुरे कर्मों के संस्कारों के तहत अब भी) ऐसी ही (भाव।निंदनीय) कमाई करनी पड़ रही है। वह (मनमुख) जहाँ भी जाता है वहीं झूठा होता है।झूठ बोलता है और किसी को अच्छा नहीं लगता। हे संत जनो ! प्यारे मालिक प्रभू की महिमा देखो।कि जैसी कोई कमाई करता है।वैसा ही उसे फल मिलता है। ये सच्ची विचार सच्ची दरगाह में होती है।दास नानक पहले ही आपको ये कह के सुना रहा है (ताकि भले बीज बीज के भले फल की आशा की जा सके)। 2।
पउड़ी ॥
गुरि सचै बधा थेहु रखवाले गुरि दिते ॥
पूरन होई आस गुर चरणी मन रते ॥
गुरि क्रिपालि बेअंति अवगुण सभि हते ॥
गुरि अपणी किरपा धारि अपणे करि लिते ॥
नानक सद बलिहार जिसु गुर के गुण इते ॥27॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ सच्चे सतिगुरू ने (सत्संग रूप) गाँव बसाया है।(उस गाँव के लिए सत्संगी) रखवाले भी सतिगुरू ने ही दिए हैं। जिनके मन गुरू के चरणों में जुड़े हैं।उनकी आस पूरी हो गई है (भाव।तृष्णा मिट गई है); दयालु और बेअंत गुरू ने उनके सारे पाप नाश कर दिए हैं; अपनी मेहर करके सतिगुरू ने उनको अपना बना लिया है। हे नानक ! मैं सदा उस सतिगुरू से सदके हूँ।जिसमें इतने गुण हैं। 27।
सलोक मः 1 ॥
ता की रजाइ लेखिआ पाइ अब किआ कीजै पांडे ॥
हुकमु होआ हासलु तदे होइ निबड़िआ हंढहि जीअ कमांदे ॥1॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ हे पण्डित ! इस वक्त (झुरने से) कुछ नहीं बनता;प्रभू की रजा में (अपने ही पिछले किए के अनुसार) लिखे (लेख) मिलते हैं; जब प्रभू का हुकम हुआ तब ये फैसला हुआ और (उस लेख के अनुसार) जीव (करम) कमाते फिरते हैं। 1।
मः 2 ॥
नकि नथ खसम हथ किरतु धके दे ॥
जहा दाणे तहां खाणे नानका सचु हे ॥2॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: महला 2॥ हे नानक ! जीव के नाक में (रजा की) नाथ (नकेल) है जो खसम प्रभू के (अपने) हाथ में है।पिछले किए हुए कर्मों के अनुसार बना हुआ स्वभाव (निहित कर्म) धक्के दे के चला रहे हैं। सच ये है कि जहाँ जीव का दाना-पानी होता है वहाँ खाना पड़ता है। 2।
पउड़ी ॥
सभे गला आपि थाटि बहालीओनु ॥
आपे रचनु रचाइ आपे ही घालिओनु ॥
आपे जंत उपाइ आपि प्रतिपालिओनु ॥
दास रखे कंठि लाइ नदरि निहालिओनु ॥
नानक भगता सदा अनंदु भाउ दूजा जालिओनु ॥28॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ प्रभू ने खुद ही सारे (जगत की) विउंते बना के कायम की हैं; खुद ही संसार की रचना करके खुद ही नाश करता है; खुद ही जीवों को पैदा करता है और खुद ही पालता है; खुद ही अपने सेवकों को गले से लगा के रखता है।खुद ही मेहर की नजर से देखता है। हे नानक ! भक्तों को सदा प्रसन्नता रहती है।(क्योंकि) उनका माया का प्यार उस प्रभू ने खुद जला दिया है। 28।
सलोकु मः 3 ॥
ए मन हरि जी धिआइ तू इक मनि इक चिति भाइ ॥
हरि कीआ सदा सदा वडिआईआ देइ न पछोताइ ॥
हउ हरि कै सद बलिहारणै जितु सेविऐ सुखु पाइ ॥
नानक गुरमुखि मिलि रहै हउमै सबदि जलाइ ॥1॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ हे मन ! प्यार से एकाग्रचित्त हो के हरी का सिमरन कर; हरी में ये हमेशा के लिए गुण हैं कि दातें दे के पछताता नहीं। मैं हरी से सदा कुर्बान हूँ।जिसकी सेवा करने से सुख मिलता है; हे नानक ! गुरमुख जन अहंकार को सतिगुरू के शबद के द्वारा जला के हरी में मिले रहते हैं। 1।
मः 3 ॥
आपे सेवा लाइअनु आपे बखस करेइ ॥
सभना का मा पिउ आपि है आपे सार करेइ ॥
नानक नामु धिआइनि तिन निज घरि वासु है जुगु जुगु सोभा होइ ॥2॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ हरी ने खुद ही मनुष्यों को सेवा में लगाया है।खुद ही बख्शिश करता है। खुद ही सबका माँ-बाप है और खुद ही सबकी संभाल करता है। हे नानक ! जो मनुष्य नाम जपते हैं।वे अपने ठिकाने पर टिके हुए हैं।हरेक युग में उनकी शोभा होती है। 2।
पउड़ी ॥
तू करण कारण समरथु हहि करते मै तुझ बिनु अवरु न कोई ॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ हे करतार ! आप सारी कुदरत का रचयता है;आपके बिना आपके जितना कोई और मुझे नहीं दिखता;

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

गुरु रामदास जी 1574 में गुरु-गद्दी पर बैठे और 1581 तक रहे। उन्हीं ने अमृतसर शहर बसाया, हरमंदिर साहिब की नींव रखी। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य प्रेम की तस्वीरें बार-बार लौटती हैं। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, उन्हीं की रचना है।

इस अंग पर 10 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे नानक ! (ऐसे मनुष्य) हरी (के भजन रूप) तीर्थ में नहाते हैं और पवित्र हो जाते हैं।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।