गुरमुखि अंतरि सांति है मनि तनि नामि समाइ ॥
नामो चितवै नामु पड़ै नामि रहै लिव लाइ ॥
नामु पदारथु पाइआ चिंता गई बिलाइ ॥
सतिगुरि मिलिऐ नामु ऊपजै तिसना भुख सभ जाइ ॥
नानक नामे रतिआ नामो पलै पाइ ॥1॥
सतिगुर पुरखि जि मारिआ भ्रमि भ्रमिआ घरु छोडि गइआ ॥
ओसु पिछै वजै फकड़ी मुहु काला आगै भइआ ॥
ओसु अरलु बरलु मुहहु निकलै नित झगू सुटदा मुआ ॥
किआ होवै किसै ही दै कीतै जां धुरि किरतु ओस दा एहो जेहा पइआ ॥
जिथै ओहु जाइ तिथै ओहु झूठा कूड़ु बोले किसै न भावै ॥
वेखहु भाई वडिआई हरि संतहु सुआमी अपुने की जैसा कोई करै तैसा कोई पावै ॥
एहु ब्रहम बीचारु होवै दरि साचै अगो दे जनु नानकु आखि सुणावै ॥2॥
गुरि सचै बधा थेहु रखवाले गुरि दिते ॥
पूरन होई आस गुर चरणी मन रते ॥
गुरि क्रिपालि बेअंति अवगुण सभि हते ॥
गुरि अपणी किरपा धारि अपणे करि लिते ॥
नानक सद बलिहार जिसु गुर के गुण इते ॥27॥
ता की रजाइ लेखिआ पाइ अब किआ कीजै पांडे ॥
हुकमु होआ हासलु तदे होइ निबड़िआ हंढहि जीअ कमांदे ॥1॥
नकि नथ खसम हथ किरतु धके दे ॥
जहा दाणे तहां खाणे नानका सचु हे ॥2॥
सभे गला आपि थाटि बहालीओनु ॥
आपे रचनु रचाइ आपे ही घालिओनु ॥
आपे जंत उपाइ आपि प्रतिपालिओनु ॥
दास रखे कंठि लाइ नदरि निहालिओनु ॥
नानक भगता सदा अनंदु भाउ दूजा जालिओनु ॥28॥
ए मन हरि जी धिआइ तू इक मनि इक चिति भाइ ॥
हरि कीआ सदा सदा वडिआईआ देइ न पछोताइ ॥
हउ हरि कै सद बलिहारणै जितु सेविऐ सुखु पाइ ॥
नानक गुरमुखि मिलि रहै हउमै सबदि जलाइ ॥1॥
आपे सेवा लाइअनु आपे बखस करेइ ॥
सभना का मा पिउ आपि है आपे सार करेइ ॥
नानक नामु धिआइनि तिन निज घरि वासु है जुगु जुगु सोभा होइ ॥2॥
तू करण कारण समरथु हहि करते मै तुझ बिनु अवरु न कोई ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
गुरु रामदास जी 1574 में गुरु-गद्दी पर बैठे और 1581 तक रहे। उन्हीं ने अमृतसर शहर बसाया, हरमंदिर साहिब की नींव रखी। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य प्रेम की तस्वीरें बार-बार लौटती हैं। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, उन्हीं की रचना है।
इस अंग पर 10 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे नानक ! (ऐसे मनुष्य) हरी (के भजन रूप) तीर्थ में नहाते हैं और पवित्र हो जाते हैं।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।