अंग
622
राग सोरठ
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਸੰਤ ਕਾ ਮਾਰਗੁ ਧਰਮ ਕੀ ਪਉੜੀ ਕੋ ਵਡਭਾਗੀ ਪਾਏ ॥
ਕੋਟਿ ਜਨਮ ਕੇ ਕਿਲਬਿਖ ਨਾਸੇ ਹਰਿ ਚਰਣੀ ਚਿਤੁ ਲਾਏ ॥੨॥
ਉਸਤਤਿ ਕਰਹੁ ਸਦਾ ਪ੍ਰਭ ਅਪਨੇ ਜਿਨਿ ਪੂਰੀ ਕਲ ਰਾਖੀ ॥
ਜੀਅ ਜੰਤ ਸਭਿ ਭਏ ਪਵਿਤ੍ਰਾ ਸਤਿਗੁਰ ਕੀ ਸਚੁ ਸਾਖੀ ॥੩॥
ਬਿਘਨ ਬਿਨਾਸਨ ਸਭਿ ਦੁਖ ਨਾਸਨ ਸਤਿਗੁਰਿ ਨਾਮੁ ਦ੍ਰਿੜਾਇਆ ॥
ਖੋਏ ਪਾਪ ਭਏ ਸਭਿ ਪਾਵਨ ਜਨ ਨਾਨਕ ਸੁਖਿ ਘਰਿ ਆਇਆ ॥੪॥੩॥੫੩॥
ਕੋਟਿ ਜਨਮ ਕੇ ਕਿਲਬਿਖ ਨਾਸੇ ਹਰਿ ਚਰਣੀ ਚਿਤੁ ਲਾਏ ॥੨॥
ਉਸਤਤਿ ਕਰਹੁ ਸਦਾ ਪ੍ਰਭ ਅਪਨੇ ਜਿਨਿ ਪੂਰੀ ਕਲ ਰਾਖੀ ॥
ਜੀਅ ਜੰਤ ਸਭਿ ਭਏ ਪਵਿਤ੍ਰਾ ਸਤਿਗੁਰ ਕੀ ਸਚੁ ਸਾਖੀ ॥੩॥
ਬਿਘਨ ਬਿਨਾਸਨ ਸਭਿ ਦੁਖ ਨਾਸਨ ਸਤਿਗੁਰਿ ਨਾਮੁ ਦ੍ਰਿੜਾਇਆ ॥
ਖੋਏ ਪਾਪ ਭਏ ਸਭਿ ਪਾਵਨ ਜਨ ਨਾਨਕ ਸੁਖਿ ਘਰਿ ਆਇਆ ॥੪॥੩॥੫੩॥
संत का मारगु धरम की पउड़ी को वडभागी पाए ॥
कोटि जनम के किलबिख नासे हरि चरणी चितु लाए ॥२॥
उसतति करहु सदा प्रभ अपने जिनि पूरी कल राखी ॥
जीअ जंत सभि भए पवित्रा सतिगुर की सचु साखी ॥३॥
बिघन बिनासन सभि दुख नासन सतिगुरि नामु द्रिड़ाइआ ॥
खोए पाप भए सभि पावन जन नानक सुखि घरि आइआ ॥४॥३॥५३॥
कोटि जनम के किलबिख नासे हरि चरणी चितु लाए ॥२॥
उसतति करहु सदा प्रभ अपने जिनि पूरी कल राखी ॥
जीअ जंत सभि भए पवित्रा सतिगुर की सचु साखी ॥३॥
बिघन बिनासन सभि दुख नासन सतिगुरि नामु द्रिड़ाइआ ॥
खोए पाप भए सभि पावन जन नानक सुखि घरि आइआ ॥४॥३॥५३॥
हिन्दी अर्थ: (हे संत जनो ! सिमरन करना ही मनुष्य के लिए) गुरू का (बताया हुआ सही) रास्ता है।(सिमरन ही) धर्म की सीढ़ी है (जिसके द्वारा मनुष्य प्रभू-चरनों में पहुँच सकता है।पर) कोई दुर्लभ भाग्यशाली ही (ये सीढ़ी) पाता है। जो मनुष्य (सिमरन के द्वारा) परमात्मा के चरणों में चिक्त जोड़ता है।उसके करोड़ों जन्मों के पाप नाश हो जाते हैं। हे संत जनो ! जिस परमात्मा ने (सारे संसार में अपनी) पूरी सक्ता टिका रखी है।उसकी सिफत सालाह सदा करते रहा करो। हे भाई ! वह सारे ही प्राणी स्वच्छ जीवन वाले बन जाते हैं।जो सदा-स्थिर हरी-नाम सिमरन वाली गुरू की शिक्षा को ग्रहण करते हैं। 3। हे नानक ! (कह, जीवन के राह में से सारी) रुकावटें दूर करने वाला।सारे दुख नाश करने वाला हरि-नाम गुरू ने जिस लोगों के दिल में दृढ़ कर दिया। उनके सारे पाप नाश हो जाते हैं।वह सारे पवित्र जीवन वाले बन जाते हैं।वह आत्मिक आनंद से अंतरात्मे टिके रहते हैं। 4। 3। 53।
ਸੋਰਠਿ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਸਾਹਿਬੁ ਗੁਨੀ ਗਹੇਰਾ ॥
ਘਰੁ ਲਸਕਰੁ ਸਭੁ ਤੇਰਾ ॥
ਰਖਵਾਲੇ ਗੁਰ ਗੋਪਾਲਾ ॥
ਸਭਿ ਜੀਅ ਭਏ ਦਇਆਲਾ ॥੧॥
ਜਪਿ ਅਨਦਿ ਰਹਉ ਗੁਰ ਚਰਣਾ ॥
ਭਉ ਕਤਹਿ ਨਹੀ ਪ੍ਰਭ ਸਰਣਾ ॥ ਰਹਾਉ ॥
ਤੇਰਿਆ ਦਾਸਾ ਰਿਦੈ ਮੁਰਾਰੀ ॥
ਪ੍ਰਭਿ ਅਬਿਚਲ ਨੀਵ ਉਸਾਰੀ ॥
ਬਲੁ ਧਨੁ ਤਕੀਆ ਤੇਰਾ ॥
ਤੂ ਭਾਰੋ ਠਾਕੁਰੁ ਮੇਰਾ ॥੨॥
ਜਿਨਿ ਜਿਨਿ ਸਾਧਸੰਗੁ ਪਾਇਆ ॥
ਸੋ ਪ੍ਰਭਿ ਆਪਿ ਤਰਾਇਆ ॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਨਾਮ ਰਸੁ ਦੀਆ ॥
ਕੁਸਲ ਖੇਮ ਸਭ ਥੀਆ ॥੩॥
ਹੋਏ ਪ੍ਰਭੂ ਸਹਾਈ ॥
ਸਭ ਉਠਿ ਲਾਗੀ ਪਾਈ ॥
ਸਾਸਿ ਸਾਸਿ ਪ੍ਰਭੁ ਧਿਆਈਐ ॥
ਹਰਿ ਮੰਗਲੁ ਨਾਨਕ ਗਾਈਐ ॥੪॥੪॥੫੪॥
ਸਾਹਿਬੁ ਗੁਨੀ ਗਹੇਰਾ ॥
ਘਰੁ ਲਸਕਰੁ ਸਭੁ ਤੇਰਾ ॥
ਰਖਵਾਲੇ ਗੁਰ ਗੋਪਾਲਾ ॥
ਸਭਿ ਜੀਅ ਭਏ ਦਇਆਲਾ ॥੧॥
ਜਪਿ ਅਨਦਿ ਰਹਉ ਗੁਰ ਚਰਣਾ ॥
ਭਉ ਕਤਹਿ ਨਹੀ ਪ੍ਰਭ ਸਰਣਾ ॥ ਰਹਾਉ ॥
ਤੇਰਿਆ ਦਾਸਾ ਰਿਦੈ ਮੁਰਾਰੀ ॥
ਪ੍ਰਭਿ ਅਬਿਚਲ ਨੀਵ ਉਸਾਰੀ ॥
ਬਲੁ ਧਨੁ ਤਕੀਆ ਤੇਰਾ ॥
ਤੂ ਭਾਰੋ ਠਾਕੁਰੁ ਮੇਰਾ ॥੨॥
ਜਿਨਿ ਜਿਨਿ ਸਾਧਸੰਗੁ ਪਾਇਆ ॥
ਸੋ ਪ੍ਰਭਿ ਆਪਿ ਤਰਾਇਆ ॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਨਾਮ ਰਸੁ ਦੀਆ ॥
ਕੁਸਲ ਖੇਮ ਸਭ ਥੀਆ ॥੩॥
ਹੋਏ ਪ੍ਰਭੂ ਸਹਾਈ ॥
ਸਭ ਉਠਿ ਲਾਗੀ ਪਾਈ ॥
ਸਾਸਿ ਸਾਸਿ ਪ੍ਰਭੁ ਧਿਆਈਐ ॥
ਹਰਿ ਮੰਗਲੁ ਨਾਨਕ ਗਾਈਐ ॥੪॥੪॥੫੪॥
सोरठि महला ५ ॥
साहिबु गुनी गहेरा ॥
घरु लसकरु सभु तेरा ॥
रखवाले गुर गोपाला ॥
सभि जीअ भए दइआला ॥१॥
जपि अनदि रहउ गुर चरणा ॥
भउ कतहि नही प्रभ सरणा ॥ रहाउ ॥
तेरिआ दासा रिदै मुरारी ॥
प्रभि अबिचल नीव उसारी ॥
बलु धनु तकीआ तेरा ॥
तू भारो ठाकुरु मेरा ॥२॥
जिनि जिनि साधसंगु पाइआ ॥
सो प्रभि आपि तराइआ ॥
करि किरपा नाम रसु दीआ ॥
कुसल खेम सभ थीआ ॥३॥
होए प्रभू सहाई ॥
सभ उठि लागी पाई ॥
सासि सासि प्रभु धिआईऐ ॥
हरि मंगलु नानक गाईऐ ॥४॥४॥५४॥
साहिबु गुनी गहेरा ॥
घरु लसकरु सभु तेरा ॥
रखवाले गुर गोपाला ॥
सभि जीअ भए दइआला ॥१॥
जपि अनदि रहउ गुर चरणा ॥
भउ कतहि नही प्रभ सरणा ॥ रहाउ ॥
तेरिआ दासा रिदै मुरारी ॥
प्रभि अबिचल नीव उसारी ॥
बलु धनु तकीआ तेरा ॥
तू भारो ठाकुरु मेरा ॥२॥
जिनि जिनि साधसंगु पाइआ ॥
सो प्रभि आपि तराइआ ॥
करि किरपा नाम रसु दीआ ॥
कुसल खेम सभ थीआ ॥३॥
होए प्रभू सहाई ॥
सभ उठि लागी पाई ॥
सासि सासि प्रभु धिआईऐ ॥
हरि मंगलु नानक गाईऐ ॥४॥४॥५४॥
हिन्दी अर्थ: सोरठि महला ५ ॥ तू सबका मालिक है। तू गुणों का मालिक है।तू गहरे जिगरे वाला है। (जीवों को) दिया हुआ सारा घर-घाट तेरा ही है। हे सबसे बड़े ! हे सृष्टि के पालनहार ! हे सब जीवों के रखवाले ! तू सारे जीवों पर दयावान रहता है।1। हे भाई ! गुरू के चरनों को दिल में बसा के मैं आत्मिक आनंद में टिका रहता हूँ। हे भाई ! प्रभू की शरण पड़ने से कहीं भी कोई डर छू नहीं सकता।रहाउ। हे प्रभू ! तेरे सेवकों दिल में ही नाम बसता है। हे प्रभू ! तूने (अपने दासों के हृदय में भक्ति की) कभी ना हिलने वाली नींव रख दी है। हे प्रभू ! तू ही मेरा बल है।तू ही मेरा धन है।तेरा ही मुझे आसरा है। तू मेरा सबसे बड़ा मालिक है। 2। हे भाई ! जिस जिस मनुष्य ने गुरू की संगति प्राप्त की है। उस उस को प्रभू ने स्वयं (संसार समुंद्र से) पार लंघा दिया है। जिस मनुष्य को प्रभू ने मेहर करके अपने नाम का स्वाद बख्शा है। उसके अंदर सदा आत्मिक आनंद बना रहता है। 3। हे भाई ! परमात्मा जिस मनुष्य का मददगार बनता है। सारी दुनिया उठ के उसके पैरों में आ लगती है। हे नानक ! हरेक सांस के साथ परमात्मा का ध्यान धरना चाहिए। सदा परमात्मा की सिफत सालाह के गीत गाते रहना चाहिए। 4। 4। 54।
ਸੋਰਠਿ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਸੂਖ ਸਹਜ ਆਨੰਦਾ ॥
ਪ੍ਰਭੁ ਮਿਲਿਓ ਮਨਿ ਭਾਵੰਦਾ ॥
ਪੂਰੈ ਗੁਰਿ ਕਿਰਪਾ ਧਾਰੀ ॥
ਤਾ ਗਤਿ ਭਈ ਹਮਾਰੀ ॥੧॥
ਹਰਿ ਕੀ ਪ੍ਰੇਮ ਭਗਤਿ ਮਨੁ ਲੀਨਾ ॥
ਨਿਤ ਬਾਜੇ ਅਨਹਤ ਬੀਨਾ ॥ ਰਹਾਉ ॥
ਹਰਿ ਚਰਣ ਕੀ ਓਟ ਸਤਾਣੀ ॥
ਸਭ ਚੂਕੀ ਕਾਣਿ ਲੋਕਾਣੀ ॥
ਜਗਜੀਵਨੁ ਦਾਤਾ ਪਾਇਆ ॥
ਹਰਿ ਰਸਕਿ ਰਸਕਿ ਗੁਣ ਗਾਇਆ ॥੨॥
ਪ੍ਰਭ ਕਾਟਿਆ ਜਮ ਕਾ ਫਾਸਾ ॥
ਮਨ ਪੂਰਨ ਹੋਈ ਆਸਾ ॥
ਜਹ ਪੇਖਾ ਤਹ ਸੋਈ ॥
ਹਰਿ ਪ੍ਰਭ ਬਿਨੁ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਈ ॥੩॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਪ੍ਰਭਿ ਰਾਖੇ ॥
ਸਭਿ ਜਨਮ ਜਨਮ ਦੁਖ ਲਾਥੇ ॥
ਨਿਰਭਉ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇਆ ॥
ਅਟਲ ਸੁਖੁ ਨਾਨਕ ਪਾਇਆ ॥੪॥੫॥੫੫॥
ਸੂਖ ਸਹਜ ਆਨੰਦਾ ॥
ਪ੍ਰਭੁ ਮਿਲਿਓ ਮਨਿ ਭਾਵੰਦਾ ॥
ਪੂਰੈ ਗੁਰਿ ਕਿਰਪਾ ਧਾਰੀ ॥
ਤਾ ਗਤਿ ਭਈ ਹਮਾਰੀ ॥੧॥
ਹਰਿ ਕੀ ਪ੍ਰੇਮ ਭਗਤਿ ਮਨੁ ਲੀਨਾ ॥
ਨਿਤ ਬਾਜੇ ਅਨਹਤ ਬੀਨਾ ॥ ਰਹਾਉ ॥
ਹਰਿ ਚਰਣ ਕੀ ਓਟ ਸਤਾਣੀ ॥
ਸਭ ਚੂਕੀ ਕਾਣਿ ਲੋਕਾਣੀ ॥
ਜਗਜੀਵਨੁ ਦਾਤਾ ਪਾਇਆ ॥
ਹਰਿ ਰਸਕਿ ਰਸਕਿ ਗੁਣ ਗਾਇਆ ॥੨॥
ਪ੍ਰਭ ਕਾਟਿਆ ਜਮ ਕਾ ਫਾਸਾ ॥
ਮਨ ਪੂਰਨ ਹੋਈ ਆਸਾ ॥
ਜਹ ਪੇਖਾ ਤਹ ਸੋਈ ॥
ਹਰਿ ਪ੍ਰਭ ਬਿਨੁ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਈ ॥੩॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਪ੍ਰਭਿ ਰਾਖੇ ॥
ਸਭਿ ਜਨਮ ਜਨਮ ਦੁਖ ਲਾਥੇ ॥
ਨਿਰਭਉ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇਆ ॥
ਅਟਲ ਸੁਖੁ ਨਾਨਕ ਪਾਇਆ ॥੪॥੫॥੫੫॥
सोरठि महला ५ ॥
सूख सहज आनंदा ॥
प्रभु मिलिओ मनि भावंदा ॥
पूरै गुरि किरपा धारी ॥
ता गति भई हमारी ॥१॥
हरि की प्रेम भगति मनु लीना ॥
नित बाजे अनहत बीना ॥ रहाउ ॥
हरि चरण की ओट सताणी ॥
सभ चूकी काणि लोकाणी ॥
जगजीवनु दाता पाइआ ॥
हरि रसकि रसकि गुण गाइआ ॥२॥
प्रभ काटिआ जम का फासा ॥
मन पूरन होई आसा ॥
जह पेखा तह सोई ॥
हरि प्रभ बिनु अवरु न कोई ॥३॥
करि किरपा प्रभि राखे ॥
सभि जनम जनम दुख लाथे ॥
निरभउ नामु धिआइआ ॥
अटल सुखु नानक पाइआ ॥४॥५॥५५॥
सूख सहज आनंदा ॥
प्रभु मिलिओ मनि भावंदा ॥
पूरै गुरि किरपा धारी ॥
ता गति भई हमारी ॥१॥
हरि की प्रेम भगति मनु लीना ॥
नित बाजे अनहत बीना ॥ रहाउ ॥
हरि चरण की ओट सताणी ॥
सभ चूकी काणि लोकाणी ॥
जगजीवनु दाता पाइआ ॥
हरि रसकि रसकि गुण गाइआ ॥२॥
प्रभ काटिआ जम का फासा ॥
मन पूरन होई आसा ॥
जह पेखा तह सोई ॥
हरि प्रभ बिनु अवरु न कोई ॥३॥
करि किरपा प्रभि राखे ॥
सभि जनम जनम दुख लाथे ॥
निरभउ नामु धिआइआ ॥
अटल सुखु नानक पाइआ ॥४॥५॥५५॥
हिन्दी अर्थ: सोरठि महला ५ ॥ मेरे अंदर आत्मिक अडोलता के सुख-आनंद बने रहते हैं। (मुझे) मन में प्यारा लगने वाला परमात्मा मिल गया है। (हे भाई ! जब से) पूरे गुरू ने (मेरे पर) मेहर की है तब से मेरी ऊँची आत्मिक अवस्था बन गई है।1। हे भाई ! जिस मनुष्य का मन परमात्मा की प्यार भरी भक्ति में टिका रहता है। उसके अंदर सदा एक रस (आत्मिक आनंद की।मानो) वीणा बजती रहती है।रहाउ। हे भाई ! जिस मनुष्य ने प्रभू-चरनों का बलवान आसरा ले लिया। दुनिया के लोगों वाली उसकी सारी मुथाजी खत्म हो गई। उसे जगत का सहारा दातार प्रभू मिल जाता है। वह सदा बड़े प्रेम से परमात्मा के गीत गाता रहता है। 2। हे भाई ! मेरी भी प्रभू ने जम की फांसी काट दी है। मेरे मन की (ये चिरों की) आशा पूरीहो गई है। अब मैं जिधर देखता हूँ वह ही दिखाई नहीं देता। उस परमात्मा के बिना कोई और कोई हमर नहीं है 3। हे नानक ! प्रभू ने कृपा करके जिनकी रक्षा की। उनके अनेकों जन्मों के सारे दुख दूर हो गए। जिन्होंने निर्भय प्रभू का नाम सिमरा। उन्होंने वह आत्मिक आनंद प्राप्त कर लिया जो कभी दूर नहीं होता। 4। 5। 55।
ਸੋਰਠਿ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਠਾਢਿ ਪਾਈ ਕਰਤਾਰੇ ॥
ਤਾਪੁ ਛੋਡਿ ਗਇਆ ਪਰਵਾਰੇ ॥
ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਹੈ ਰਾਖੀ ॥
ਸਰਣਿ ਸਚੇ ਕੀ ਤਾਕੀ ॥੧॥
ਪਰਮੇਸਰੁ ਆਪਿ ਹੋਆ ਰਖਵਾਲਾ ॥
ਸਾਂਤਿ ਸਹਜ ਸੁਖ ਖਿਨ ਮਹਿ ਉਪਜੇ ਮਨੁ ਹੋਆ ਸਦਾ ਸੁਖਾਲਾ ॥ ਰਹਾਉ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਦੀਓ ਦਾਰੂ ॥
ਤਿਨਿ ਸਗਲਾ ਰੋਗੁ ਬਿਦਾਰੂ ॥
ਅਪਣੀ ਕਿਰਪਾ ਧਾਰੀ ॥
ਤਿਨਿ ਸਗਲੀ ਬਾਤ ਸਵਾਰੀ ॥੨॥
ਪ੍ਰਭਿ ਅਪਨਾ ਬਿਰਦੁ ਸਮਾਰਿਆ ॥
ਹਮਰਾ ਗੁਣੁ ਅਵਗੁਣੁ ਨ ਬੀਚਾਰਿਆ ॥
ਗੁਰ ਕਾ ਸਬਦੁ ਭਇਓ ਸਾਖੀ ॥
ਠਾਢਿ ਪਾਈ ਕਰਤਾਰੇ ॥
ਤਾਪੁ ਛੋਡਿ ਗਇਆ ਪਰਵਾਰੇ ॥
ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਹੈ ਰਾਖੀ ॥
ਸਰਣਿ ਸਚੇ ਕੀ ਤਾਕੀ ॥੧॥
ਪਰਮੇਸਰੁ ਆਪਿ ਹੋਆ ਰਖਵਾਲਾ ॥
ਸਾਂਤਿ ਸਹਜ ਸੁਖ ਖਿਨ ਮਹਿ ਉਪਜੇ ਮਨੁ ਹੋਆ ਸਦਾ ਸੁਖਾਲਾ ॥ ਰਹਾਉ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਦੀਓ ਦਾਰੂ ॥
ਤਿਨਿ ਸਗਲਾ ਰੋਗੁ ਬਿਦਾਰੂ ॥
ਅਪਣੀ ਕਿਰਪਾ ਧਾਰੀ ॥
ਤਿਨਿ ਸਗਲੀ ਬਾਤ ਸਵਾਰੀ ॥੨॥
ਪ੍ਰਭਿ ਅਪਨਾ ਬਿਰਦੁ ਸਮਾਰਿਆ ॥
ਹਮਰਾ ਗੁਣੁ ਅਵਗੁਣੁ ਨ ਬੀਚਾਰਿਆ ॥
ਗੁਰ ਕਾ ਸਬਦੁ ਭਇਓ ਸਾਖੀ ॥
सोरठि महला ५ ॥
ठाढि पाई करतारे ॥
तापु छोडि गइआ परवारे ॥
गुरि पूरै है राखी ॥
सरणि सचे की ताकी ॥१॥
परमेसरु आपि होआ रखवाला ॥
सांति सहज सुख खिन महि उपजे मनु होआ सदा सुखाला ॥ रहाउ ॥
हरि हरि नामु दीओ दारू ॥
तिनि सगला रोगु बिदारू ॥
अपणी किरपा धारी ॥
तिनि सगली बात सवारी ॥२॥
प्रभि अपना बिरदु समारिआ ॥
हमरा गुणु अवगुणु न बीचारिआ ॥
गुर का सबदु भइओ साखी ॥
ठाढि पाई करतारे ॥
तापु छोडि गइआ परवारे ॥
गुरि पूरै है राखी ॥
सरणि सचे की ताकी ॥१॥
परमेसरु आपि होआ रखवाला ॥
सांति सहज सुख खिन महि उपजे मनु होआ सदा सुखाला ॥ रहाउ ॥
हरि हरि नामु दीओ दारू ॥
तिनि सगला रोगु बिदारू ॥
अपणी किरपा धारी ॥
तिनि सगली बात सवारी ॥२॥
प्रभि अपना बिरदु समारिआ ॥
हमरा गुणु अवगुणु न बीचारिआ ॥
गुर का सबदु भइओ साखी ॥
हिन्दी अर्थ: सोरठि महला ५ ॥ हे भाई ! जिस मनुष्य के अंदर करतार ने ठंड बरता दी। उसके परिवार को (उसकी ज्ञानेन्द्रियों को विकारों का) ताप छोड़ जाता है। हे भाई ! पूरे गुरू ने जिस मनुष्य की मदद की। उसने सदा कायम रहने वाले परमात्मा का आसरा देख लिया। 1। हे भाई ! जिस मनुष्य का रखवाला परमात्मा खुद बन जाता है। उसका मन सदा के लिए सुखी हो जाता है (क्योंकि उसके अंदर) एक छिन में आत्मिक अडोलता के सुख और शांति पैदा हो जाते हैं।रहाउ। हे भाई ! (विकार रोगों का इलाज करने के लिए गुरू ने मनुष्य को) परमात्मा का नाम-दवा दी। उस नाम-दवाई ने उस मनुष्य के सारे ही (विकार-) रोग काट दिए। जब प्रभू ने उस मनुष्य पर मेहर की। तो उसने अपनी सारी जीवन कहानी ही सुंदर बना ली (अपना सारा जीवन ही सँवार लिया)। 2। हे भाई ! प्रभू ने (सदा ही) अपने प्यार करने वाले मूल प्राकृतिक स्वभाव (बिरद) को याद रखा है। वह हम जीवों के कोई भी गुण-अवगुण दिल से लगा के नहीं रखता। (प्रभू की कृपा से जिस मनुष्य के अंदर) गुरू के शबद ने अपना प्रभाव डाला।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 622 है, राग सोरठ का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
Noida के office-tower की 15वीं मंज़िल से शाम का Delhi-view।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 58 पंक्तियों का है, 4 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 622” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: सोरठ राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 623 →, पीछे का: ← अंग 621।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।