अंग 627

अंग
627
राग सोरठ
राग: सोरठ · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਜਿ ਕਰਾਵੈ ਸੋ ਕਰਣਾ ॥
ਨਾਨਕ ਦਾਸ ਤੇਰੀ ਸਰਣਾ ॥੨॥੭॥੭੧॥
जि करावै सो करणा ॥
नानक दास तेरी सरणा ॥२॥७॥७१॥

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! हम जीव वही कुछ कर सकते हैं जो कुछ परमात्मा हमसे करवाता है। हे नानक ! (कह, हे प्रभू !) तेरे दास तेरी ही शरण पड़े रहते हैं। 2। 7। 71।
ਸੋਰਠਿ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਰਿਦੈ ਪਰੋਇਆ ॥
ਸਭੁ ਕਾਜੁ ਹਮਾਰਾ ਹੋਇਆ ॥
ਪ੍ਰਭ ਚਰਣੀ ਮਨੁ ਲਾਗਾ ॥
ਪੂਰਨ ਜਾ ਕੇ ਭਾਗਾ ॥੧॥
ਮਿਲਿ ਸਾਧਸੰਗਿ ਹਰਿ ਧਿਆਇਆ ॥
ਆਠ ਪਹਰ ਅਰਾਧਿਓ ਹਰਿ ਹਰਿ ਮਨ ਚਿੰਦਿਆ ਫਲੁ ਪਾਇਆ ॥ ਰਹਾਉ ॥
ਪਰਾ ਪੂਰਬਲਾ ਅੰਕੁਰੁ ਜਾਗਿਆ ॥
ਰਾਮ ਨਾਮਿ ਮਨੁ ਲਾਗਿਆ ॥
ਮਨਿ ਤਨਿ ਹਰਿ ਦਰਸਿ ਸਮਾਵੈ ॥
ਨਾਨਕ ਦਾਸ ਸਚੇ ਗੁਣ ਗਾਵੈ ॥੨॥੮॥੭੨॥
सोरठि महला ५ ॥
हरि नामु रिदै परोइआ ॥
सभु काजु हमारा होइआ ॥
प्रभ चरणी मनु लागा ॥
पूरन जा के भागा ॥१॥
मिलि साधसंगि हरि धिआइआ ॥
आठ पहर अराधिओ हरि हरि मन चिंदिआ फलु पाइआ ॥ रहाउ ॥
परा पूरबला अंकुरु जागिआ ॥
राम नामि मनु लागिआ ॥
मनि तनि हरि दरसि समावै ॥
नानक दास सचे गुण गावै ॥२॥८॥७२॥

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला ५ ॥ हे भाई ! जब परमात्मा का नाम अच्छी तरह दिल में बसा लिया जाता है। तब हम जीवों का सारा जीवन-मनोरथ सफल हो जाता है। हे भाई !उसका मन परमात्मा के चरणों में लीन रहता है। जिस मनुष्य के भाग्य अच्छी तरह जाग पड़ते हैं। 1। ( हे भाई ! जिस भी मनुष्य ने) साध-संगति में मिल के परमात्मा का नाम सिमरन किया। आठों पहर (हर वक्त) परमात्मा का नाम याद किया।उसने हरेक मन-मांगी मुरादें पा लीं।रहाउ। हे दास नानक ! (कह, साध-संगति में मिल के जब किसी मनुष्य के) अनेकों पूर्बले जन्मों के संस्कारों के बीज अंकुरित हो जाते हैं (पूर्बले संस्कार जाग जाते हैं।तब उसका) मन परमात्मा के नाम में लगने लग जाता है। वह मनुष्य मन से तन से परमात्मा के दीदार में मस्त रहता है। वह मनुष्य सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा के गुण गाता रहता है। 2। 8। 72।
ਸੋਰਠਿ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਗੁਰ ਮਿਲਿ ਪ੍ਰਭੂ ਚਿਤਾਰਿਆ ॥
ਕਾਰਜ ਸਭਿ ਸਵਾਰਿਆ ॥
ਮੰਦਾ ਕੋ ਨ ਅਲਾਏ ॥
ਸਭ ਜੈ ਜੈ ਕਾਰੁ ਸੁਣਾਏ ॥੧॥
ਸੰਤਹੁ ਸਾਚੀ ਸਰਣਿ ਸੁਆਮੀ ॥
ਜੀਅ ਜੰਤ ਸਭਿ ਹਾਥਿ ਤਿਸੈ ਕੈ ਸੋ ਪ੍ਰਭੁ ਅੰਤਰਜਾਮੀ ॥ ਰਹਾਉ ॥
ਕਰਤਬ ਸਭਿ ਸਵਾਰੇ ॥
ਪ੍ਰਭਿ ਅਪੁਨਾ ਬਿਰਦੁ ਸਮਾਰੇ ॥
ਪਤਿਤ ਪਾਵਨ ਪ੍ਰਭ ਨਾਮਾ ॥
ਜਨ ਨਾਨਕ ਸਦ ਕੁਰਬਾਨਾ ॥੨॥੯॥੭੩॥
सोरठि महला ५ ॥
गुर मिलि प्रभू चितारिआ ॥
कारज सभि सवारिआ ॥
मंदा को न अलाए ॥
सभ जै जै कारु सुणाए ॥१॥
संतहु साची सरणि सुआमी ॥
जीअ जंत सभि हाथि तिसै कै सो प्रभु अंतरजामी ॥ रहाउ ॥
करतब सभि सवारे ॥
प्रभि अपुना बिरदु समारे ॥
पतित पावन प्रभ नामा ॥
जन नानक सद कुरबाना ॥२॥९॥७३॥

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला ५ ॥ हे संत जनो ! (जिस मनुष्य ने) गुरू को मिल के परमात्मा को याद करना शुरू कर दिया। उसने अपने सारे काम सवार लिए। वह मनुष्य (किसी को) कोई बुरे बोल नहीं बोलता। वह सारी दुनिया को प्रभू की सिफत सालाह ही सुनाता रहता है। 1। हे संत जनो ! मालिक प्रभू का आसरा पक्का आसरा है (क्योंकि) सारे जीव उस प्रभू के हाथ में हैं।और वह प्रभू हरेक जीव के दिल की जानने वाला है।रहाउ। हे संत जनो ! (जिस मनुष्य ने प्रभू का पक्का आसरा लिया।प्रभू ने उसके) सारे काम सवार दिए। प्रभू ने अपना ये बिरद (प्यार करने वाला स्वभाव) हमेशा ही याद रखा हुआ है। (हे संत जनो !) परमात्मा का नाम विकारियों को पवित्र करने वाला है। हे दास नानक ! (कह, मैं उससे) सदा सदके जाता हूँ। 2। 9। 73।
ਸੋਰਠਿ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮਿ ਸਾਜਿ ਸਵਾਰਿਆ ॥
ਇਹੁ ਲਹੁੜਾ ਗੁਰੂ ਉਬਾਰਿਆ ॥
ਅਨਦ ਕਰਹੁ ਪਿਤ ਮਾਤਾ ॥
ਪਰਮੇਸਰੁ ਜੀਅ ਕਾ ਦਾਤਾ ॥੧॥
ਸੁਭ ਚਿਤਵਨਿ ਦਾਸ ਤੁਮਾਰੇ ॥
ਰਾਖਹਿ ਪੈਜ ਦਾਸ ਅਪੁਨੇ ਕੀ ਕਾਰਜ ਆਪਿ ਸਵਾਰੇ ॥ ਰਹਾਉ ॥
ਮੇਰਾ ਪ੍ਰਭੁ ਪਰਉਪਕਾਰੀ ॥
ਪੂਰਨ ਕਲ ਜਿਨਿ ਧਾਰੀ ॥
ਨਾਨਕ ਸਰਣੀ ਆਇਆ ॥
ਮਨ ਚਿੰਦਿਆ ਫਲੁ ਪਾਇਆ ॥੨॥੧੦॥੭੪॥
सोरठि महला ५ ॥
पारब्रहमि साजि सवारिआ ॥
इहु लहुड़ा गुरू उबारिआ ॥
अनद करहु पित माता ॥
परमेसरु जीअ का दाता ॥१॥
सुभ चितवनि दास तुमारे ॥
राखहि पैज दास अपुने की कारज आपि सवारे ॥ रहाउ ॥
मेरा प्रभु परउपकारी ॥
पूरन कल जिनि धारी ॥
नानक सरणी आइआ ॥
मन चिंदिआ फलु पाइआ ॥२॥१०॥७४॥

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला ५ ॥ हे भाई ! परमात्मा ने इस छोटे बच्चे (हरगोबिंद) को सजाया और सँवारा। (साध-संगति की अरदास सुन के) गुरूने इसको बचा लिया है। (गुरू परमात्मा की मेहर के सदका इस के) माता-पिता बेशक खुशी मनाएं। परमात्मा ही जीवन का दाता है (रक्षक है)।1। हे प्रभू ! तेरे सेवक सब का भला मांगते हैं। (अपने सेवकों की मांग के मुताबिक) तू काम सवार के सेवकों की इज्जत रख लेता है।रहाउ। हे भाई !वही सबकी भलाई करने वाला है। जिस मेरे प्रभू ने सारे जगत में अपनी शक्ति टिकाई हुई है। हे नानक ! (कह, हे भाई !) जो भी मनुष्य (उस प्रभू की) शरण आ पड़ता है। वह मन-मांगी मुरादें पा लेता है। 2। 10। 74।
ਸੋਰਠਿ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਸਦਾ ਸਦਾ ਹਰਿ ਜਾਪੇ ॥
ਪ੍ਰਭ ਬਾਲਕ ਰਾਖੇ ਆਪੇ ॥
ਸੀਤਲਾ ਠਾਕਿ ਰਹਾਈ ॥
ਬਿਘਨ ਗਏ ਹਰਿ ਨਾਈ ॥੧॥
ਮੇਰਾ ਪ੍ਰਭੁ ਹੋਆ ਸਦਾ ਦਇਆਲਾ ॥
ਅਰਦਾਸਿ ਸੁਣੀ ਭਗਤ ਅਪੁਨੇ ਕੀ ਸਭ ਜੀਅ ਭਇਆ ਕਿਰਪਾਲਾ ॥ ਰਹਾਉ ॥
ਪ੍ਰਭ ਕਰਣ ਕਾਰਣ ਸਮਰਾਥਾ ॥
ਹਰਿ ਸਿਮਰਤ ਸਭੁ ਦੁਖੁ ਲਾਥਾ ॥
ਅਪਣੇ ਦਾਸ ਕੀ ਸੁਣੀ ਬੇਨੰਤੀ ॥
ਸਭ ਨਾਨਕ ਸੁਖਿ ਸਵੰਤੀ ॥੨॥੧੧॥੭੫॥
सोरठि महला ५ ॥
सदा सदा हरि जापे ॥
प्रभ बालक राखे आपे ॥
सीतला ठाकि रहाई ॥
बिघन गए हरि नाई ॥१॥
मेरा प्रभु होआ सदा दइआला ॥
अरदासि सुणी भगत अपुने की सभ जीअ भइआ किरपाला ॥ रहाउ ॥
प्रभ करण कारण समराथा ॥
हरि सिमरत सभु दुखु लाथा ॥
अपणे दास की सुणी बेनंती ॥
सभ नानक सुखि सवंती ॥२॥११॥७५॥

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला ५ ॥ हे भाई ! सदा ही (सिर्फ) परमात्मा का नाम जपा करो। प्रभू जी खुद ही बालकों के रखवाले हैं। (बालक हरगोबिंद से प्रभू ने स्वयं ही) सीतला (चेचक) रोक ली है। परमात्मा की सिफत सालाह की बरकति से खतरे दूर हो गए हैं। 1। हे भाई ! मेरा प्रभू सदा ही दयावान रहता है। सारे ही जीवों पर वह दयालु रहता है।वह अपने भक्त की आरजू (हमेशा) सुनता है।रहाउ। हे भाई ! प्रभू जगत का मूल है।और।सब ताकतों का मालिक है। प्रभू का नाम सिमरने से हरेक दुख दूर हो जाता है। हे नानक ! प्रभू ने (हमेशा ही) अपने सेवकों की विनती सुनी है (प्रभू जी की मेहर से ही) सारी दुनिया सुखी बसती है। 2। 11। 75।
ਸੋਰਠਿ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਅਪਨਾ ਗੁਰੂ ਧਿਆਏ ॥
ਮਿਲਿ ਕੁਸਲ ਸੇਤੀ ਘਰਿ ਆਏ ॥
ਨਾਮੈ ਕੀ ਵਡਿਆਈ ॥
ਤਿਸੁ ਕੀਮਤਿ ਕਹਣੁ ਨ ਜਾਈ ॥੧॥
ਸੰਤਹੁ ਹਰਿ ਹਰਿ ਹਰਿ ਆਰਾਧਹੁ ॥
ਹਰਿ ਆਰਾਧਿ ਸਭੋ ਕਿਛੁ ਪਾਈਐ ਕਾਰਜ ਸਗਲੇ ਸਾਧਹੁ ॥ ਰਹਾਉ ॥
ਪ੍ਰੇਮ ਭਗਤਿ ਪ੍ਰਭ ਲਾਗੀ ॥
ਸੋ ਪਾਏ ਜਿਸੁ ਵਡਭਾਗੀ ॥
ਜਨ ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇਆ ॥
ਤਿਨਿ ਸਰਬ ਸੁਖਾ ਫਲ ਪਾਇਆ ॥੨॥੧੨॥੭੬॥
सोरठि महला ५ ॥
अपना गुरू धिआए ॥
मिलि कुसल सेती घरि आए ॥
नामै की वडिआई ॥
तिसु कीमति कहणु न जाई ॥१॥
संतहु हरि हरि हरि आराधहु ॥
हरि आराधि सभो किछु पाईऐ कारज सगले साधहु ॥ रहाउ ॥
प्रेम भगति प्रभ लागी ॥
सो पाए जिसु वडभागी ॥
जन नानक नामु धिआइआ ॥
तिनि सरब सुखा फल पाइआ ॥२॥१२॥७६॥

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला ५ ॥ हे संत जनो ! जो मनुष्य अपने गुरू का ध्यान धरता है। वह (गुरू चरणों में) जुड़ के आत्मिक आनंद से अपने हृदय-घर में टिक जाता है (बाहर भटकने से बच जाता है)। ये नाम की ही बरकति है (कि मनुष्य अन्य आसरों की तलाश छोड़ देता है)। (पर) इस (हरी-नाम) का मूल्य नहीं आँका जा सकता (किसी दुनियावी पदार्थ के बदले नहीं मिलता)। 1। हे संत जनो ! सदा ही परमात्मा का नाम सिमरा करो। परमात्मा का नाम सिमर के हरेक चीज प्राप्त की जाती है।(तुम भी परमात्मा का नाम सिमर के अपने) सारे काम सवारो।रहाउ। (हे संत जनो ! जो मनुष्य गुरू का ध्यान धरता है) प्रभू की प्यार भरी भक्ति में उसका मन लग जाता है। पर ये दाति वही मनुष्य हासिल करता है जिसके बड़े भाग्य हों। हे दास नानक ! (कह,) जिस मनुष्य ने परमात्मा का नाम सिमरा है। उसने सारे सुख देने वाले (फल) प्राप्त कर लिए हैं। 2। 12। 76।
ਸੋਰਠਿ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਪਰਮੇਸਰਿ ਦਿਤਾ ਬੰਨਾ ॥
ਦੁਖ ਰੋਗ ਕਾ ਡੇਰਾ ਭੰਨਾ ॥
ਅਨਦ ਕਰਹਿ ਨਰ ਨਾਰੀ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਪ੍ਰਭਿ ਕਿਰਪਾ ਧਾਰੀ ॥੧॥
सोरठि महला ५ ॥
परमेसरि दिता बंना ॥
दुख रोग का डेरा भंना ॥
अनद करहि नर नारी ॥
हरि हरि प्रभि किरपा धारी ॥१॥

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला ५ ॥ हे संत जनो ! (जिस मनुष्य के आत्मिक जीवन के लिए) परमेश्वर ने (विकारों के रास्ते पर) रुकावट खड़ी कर दी। (उस मनुष्य के अंदर से) परमेश्वर ने दुखों और रोगों का डेरा ही खत्म कर दिया। सारे जीव आत्मिक आनंद पाते हैं। जिन जीवों पर प्रभू ने (ये) कृपा कर दी हैं। 1।

संदर्भ: यह अंग 627 है, राग सोरठ का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।

M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।

Punjabi Bagh के gurdwara में अरदास के बाद का calm।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 62 पंक्तियों का है, 7 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 627” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: सोरठ राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 628 →, पीछे का: ← अंग 626

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।