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अंग 633

अंग
633
राग सोरठ
राग: सोरठ · रचयिता: Guru Tegh Bahaadur Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
जब ही सरनि साध की आइओ दुरमति सगल बिनासी ॥
तब नानक चेतिओ चिंतामनि काटी जम की फासी ॥3॥7॥
तेग बहादुर जी ने जीवन का बड़ा हिस्सा एकांत में बिताया, असम और बिहार की यात्राओं में। दुनिया की क्षणभंगुरता उनकी वाणी का केन्द्रीय धागा है, और इस शबद में भी वही स्वर सुनाई देता है।

हिन्दी अर्थ: जब जीव गुरू की शरण पड़ता है।तब इसकी सारी कोझी मति नाश हो जाती है।तब। हे नानक ! ये सारी मनोकामनाएं पूरी करने वाले परमात्मा को सिमरता है।और।इसकी जम की फाही (भी) काटी जाती है। 3। 7।
सोरठि महला 9 ॥
रे नर इह साची जीअ धारि ॥
सगल जगतु है जैसे सुपना बिनसत लगत न बार ॥1॥ रहाउ ॥
बारू भीति बनाई रचि पचि रहत नही दिन चारि ॥
तैसे ही इह सुख माइआ के उरझिओ कहा गवार ॥1॥
अजहू समझि कछु बिगरिओ नाहिनि भजि ले नामु मुरारि ॥
कहु नानक निज मतु साधन कउ भाखिओ तोहि पुकारि ॥2॥8॥
गुरु तेग बहादुर जी (1621-1675) की वाणी में वैराग्य और nश्वरता का स्वर लगातार है। उनकी शहादत 1675 में दिल्ली के चाँदनी चौक के पास हुई, औरंगज़ेब के हुक्म पर। उनकी रचनाएँ ग्रंथ के अन्तिम पन्नों पर हैं, गुरु गोबिंद सिंह द्वारा 1706 में जोड़ी गयीं।

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 9 ॥ हे मनुष्य ! अपने दिल में ये बात पक्की तरह टिका ले। (कि) सारा संसार सपने जैसा है।(इसके) नाश होने में देर नहीं लगती। 1।रहाउ। हे भाई ! (जैसे किसी ने) रेत की दीवार खड़ी करके पोच के तैयार की हो।पर वह दीवार चार दिन भी (टिकी) नहीं रहती। इस माया के सुख भी उस (रेत की दीवार) जैसे ही हैं।हे मूर्ख ! आप इन सुखों में क्यों मस्त हैं रहा है। 1। हे भाई ! अभी भी समझ जा (अभी) कुछ नहीं बिगड़ा; और परमात्मा का नाम सिमरा कर। हे नानक ! कह, (हे भाई !) मैं आपको गुरमुखों का यह निजी ख्याल पुकार के सुना रहा हूँ। 2। 8।
सोरठि महला 9 ॥
इह जगि मीतु न देखिओ कोई ॥
सगल जगतु अपनै सुखि लागिओ दुख मै संगि न होई ॥1॥ रहाउ ॥
दारा मीत पूत सनबंधी सगरे धन सिउ लागे ॥
जब ही निरधन देखिओ नर कउ संगु छाडि सभ भागे ॥1॥
कहंउ कहा यिआ मन बउरे कउ इन सिउ नेहु लगाइओ ॥
दीना नाथ सकल भै भंजन जसु ता को बिसराइओ ॥2॥
सुआन पूछ जिउ भइओ न सूधउ बहुतु जतनु मै कीनउ ॥
नानक लाज बिरद की राखहु नामु तुहारउ लीनउ ॥3॥9॥
तेग बहादुर जी ने जीवन का बड़ा हिस्सा एकांत में बिताया, असम और बिहार की यात्राओं में। दुनिया की क्षणभंगुरता उनकी वाणी का केन्द्रीय धागा है, और इस शबद में भी वही स्वर सुनाई देता है।

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 9 ॥ हे भाई ! इस जगत में कोई (आखिर तक साथ निभाने वाला) मित्र (मैंने) नहीं देखा। सारा संसार अपने सुख में ही जुटा हुआ है।दुख में (कोई किसी के) साथ (साथी) नहीं बनता। 1।रहाउ। हे भाई ! स्त्री-मित्र-पुत्र-रिश्तेदार- ये सारे धन से (ही) प्यार करते हैं। जब ही इन्होंने मनुष्य को कंगाल देखा।(तभी) साथ छोड़ के भाग जाते हैं। 1। हे भाई ! मैं इस पागल मन को क्या समझाऊँ।(इसने) इन (कच्चे साथियों) के साथ प्यार डाला हुआ है। (जो परमात्मा) गरीबों का रखवाला और सारे डर नाश करने वाला है उसकी सिफत सालाह (इसने) भुलाई हुई है। 2। हे भाई ! जैसे कुत्ते की पूँछ सीधी नहीं होती (इसी तरह इस मन की परमात्मा की याद के प्रति लापरवाही हटती नहीं) मैंने बहुत यत्न किया है। हे नानक ! (कह, हे प्रभू ! अपने) बिरदु भरे प्यार वाले स्वभाव की लाज रख (मेरी मदद कर।तो ही) मैं आपका नाम जप सकता हूँ। 3। 9।
सोरठि महला 9 ॥
मन रे गहिओ न गुर उपदेसु ॥
कहा भइओ जउ मूडु मुडाइओ भगवउ कीनो भेसु ॥1॥ रहाउ ॥
साच छाडि कै झूठह लागिओ जनमु अकारथु खोइओ ॥
करि परपंच उदर निज पोखिओ पसु की निआई सोइओ ॥1॥
राम भजन की गति नही जानी माइआ हाथि बिकाना ॥
उरझि रहिओ बिखिअन संगि बउरा नामु रतनु बिसराना ॥2॥
रहिओ अचेतु न चेतिओ गोबिंद बिरथा अउध सिरानी ॥
कहु नानक हरि बिरदु पछानउ भूले सदा परानी ॥3॥10॥
गुरु तेग बहादुर जी (1621-1675) की वाणी में वैराग्य और nश्वरता का स्वर लगातार है। उनकी शहादत 1675 में दिल्ली के चाँदनी चौक के पास हुई, औरंगज़ेब के हुक्म पर। उनकी रचनाएँ ग्रंथ के अन्तिम पन्नों पर हैं, गुरु गोबिंद सिंह द्वारा 1706 में जोड़ी गयीं।

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 9 ॥ हे मन ! आप गुरू की शिक्षा ग्रहण नहीं करता। (हे भाई ! गुरू का उपदेश भुला के) अगर सिर भी मुनवा लिया।और।भगवे रंग के कपड़े पहन लिए।तो भी क्या बना।(आत्मिक जीवन का कुछ भी ना हो सँवरा)। 1।रहाउ। (हे भाई ! भगवा भेष तो धार लिया।पर) सदा-स्थिर प्रभू का नाम छोड़ के नाशवंत पदार्थों में ही सुरति जोड़े रखी।(लोगों से) छल करके अपना पेट पालता रहा।और।पशुओं की तरह सोया रहा। 1। आप अनेक छल-कपट करके अपने पेट का पोषण करता है और पशु की भांति सोता है॥ 1॥ हे भाई ! (गाफिल मनुष्य) परमात्मा के भजन की जुगति नहीं समझता।माया के हाथ में बिका रहता है। पागल मनुष्य मायावी पदार्थों (के मोह) में मगन रहता है।और।प्रभू के (श्रेष्ठ) रत्न-नाम को भुलाए रखता है। 2। (मनुष्य माया में फस के) बेसुध हुआ रहता है।परमात्मा को याद नहीं करता।सारी उम्र व्यर्थ गुजार लेता है। हे नानक ! कह, हे हरी ! आप अपने बिरद भरे प्यार वाले मूल स्वभाव को याद रख।ये जीव तो सदा भूले ही रहते हैं। 3। 10।
सोरठि महला 9 ॥
जो नरु दुख मै दुखु नही मानै ॥
सुख सनेहु अरु भै नही जा कै कंचन माटी मानै ॥1॥ रहाउ ॥
नह निंदिआ नह उसतति जा कै लोभु मोहु अभिमाना ॥
हरख सोग ते रहै निआरउ नाहि मान अपमाना ॥1॥
आसा मनसा सगल तिआगै जग ते रहै निरासा ॥
कामु क्रोधु जिह परसै नाहनि तिह घटि ब्रहमु निवासा ॥2॥
गुर किरपा जिह नर कउ कीनी तिह इह जुगति पछानी ॥
नानक लीन भइओ गोबिंद सिउ जिउ पानी संगि पानी ॥3॥11॥
तेग बहादुर जी ने जीवन का बड़ा हिस्सा एकांत में बिताया, असम और बिहार की यात्राओं में। दुनिया की क्षणभंगुरता उनकी वाणी का केन्द्रीय धागा है, और इस शबद में भी वही स्वर सुनाई देता है।

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 9 ॥ हे भाई ! जो मनुष्य दुखों में घबराता नहीं। जिस मनुष्य के हृदय में सुखों से मोह नहीं।और (किसी किस्म का) डर नहीं।जो मनुष्य सोने को मिट्टी (के समान) समझता है (उसके अंदर परमात्मा का निवास हो जाता है)। 1।रहाउ। हे भाई ! जिस मनुष्य के अंदर किसी की चुगली-बुराई नहीं।किसी की खुशमद नहीं।जिसके अंदर ना लोभ है।ना मोह है।ना अहंकार है; जो मनुष्य खुशी और ग़मी से निर्लिप रहता है।जिस पर ना आदर असर कर सकता है ना निरादरी (ऐसे मनुष्य के दिल में परमात्मा का निवास हो जाता है)। 1। हे भाई ! जो मनुष्य आशाएं-उम्मीदें सब त्याग देता है।जगत से निर्मोह रहता है। जिस मनुष्य को ना काम-वासना छू सकती है ना ही क्रोध छू सकता है।उस मनुष्य के दिल में परमात्मा का निवास हो जाता है। 2। (पर) हे नानक ! (कह) जिस मनुष्य पर गुरू ने मेहर की उसने (ही जीवन की) ये जाच समझी है। वह मनुष्य परमात्मा के साथ ऐसे एक-मेक हो जाता है।जैसे पानी के साथ पानी मिल जाता है। 3। 11।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

गुरु तेग बहादुर जी (1621-1675) की वाणी में वैराग्य और nश्वरता का स्वर लगातार है। उन्होंने जीवन का बड़ा हिस्सा एकांत में बिताया, असम और बिहार की यात्राओं में। 1675 में औरंगज़ेब के हुक्म पर उन्हें दिल्ली के चाँदनी चौक के पास शहीद किया गया, क्योंकि उन्होंने कश्मीरी पंडितों के धर्मांतरण से इनकार किया था। उनकी शहादत के स्थल पर आज सीस-गंज गुरुद्वारा है।

इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे।

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।