अंग
625
राग सोरठ
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਹੋਇ ਦਇਆਲੁ ਕਿਰਪਾਲੁ ਪ੍ਰਭੁ ਠਾਕੁਰੁ ਆਪੇ ਸੁਣੈ ਬੇਨੰਤੀ ॥
ਪੂਰਾ ਸਤਗੁਰੁ ਮੇਲਿ ਮਿਲਾਵੈ ਸਭ ਚੂਕੈ ਮਨ ਕੀ ਚਿੰਤੀ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਅਵਖਦੁ ਮੁਖਿ ਪਾਇਆ ਜਨ ਨਾਨਕ ਸੁਖਿ ਵਸੰਤੀ ॥੪॥੧੨॥੬੨॥
ਪੂਰਾ ਸਤਗੁਰੁ ਮੇਲਿ ਮਿਲਾਵੈ ਸਭ ਚੂਕੈ ਮਨ ਕੀ ਚਿੰਤੀ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਅਵਖਦੁ ਮੁਖਿ ਪਾਇਆ ਜਨ ਨਾਨਕ ਸੁਖਿ ਵਸੰਤੀ ॥੪॥੧੨॥੬੨॥
होइ दइआलु किरपालु प्रभु ठाकुरु आपे सुणै बेनंती ॥
पूरा सतगुरु मेलि मिलावै सभ चूकै मन की चिंती ॥
हरि हरि नामु अवखदु मुखि पाइआ जन नानक सुखि वसंती ॥४॥१२॥६२॥
पूरा सतगुरु मेलि मिलावै सभ चूकै मन की चिंती ॥
हरि हरि नामु अवखदु मुखि पाइआ जन नानक सुखि वसंती ॥४॥१२॥६२॥
हिन्दी अर्थ: हे भाई ! मालिक-प्रभू दयावान हो के कृपालु हो के खुद ही (जिस मनुष्य की) विनती सुन लेता है। उसे पूरा गुरू मिला देता है (इस तरह।उस मनुष्य के) मन की हरेक चिंता समाप्त हो जाती है। हे दास नानक ! (कह, जिस मनुष्य के) मुँह में परमात्मा नाम-दवा डाल देता है।वह मनुष्य आत्मिक आनंद में जीवन व्यतीत करता है। 4। 12। 62।
ਸੋਰਠਿ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਸਿਮਰਿ ਸਿਮਰਿ ਪ੍ਰਭ ਭਏ ਅਨੰਦਾ ਦੁਖ ਕਲੇਸ ਸਭਿ ਨਾਠੇ ॥
ਗੁਨ ਗਾਵਤ ਧਿਆਵਤ ਪ੍ਰਭੁ ਅਪਨਾ ਕਾਰਜ ਸਗਲੇ ਸਾਂਠੇ ॥੧॥
ਜਗਜੀਵਨ ਨਾਮੁ ਤੁਮਾਰਾ ॥
ਗੁਰ ਪੂਰੇ ਦੀਓ ਉਪਦੇਸਾ ਜਪਿ ਭਉਜਲੁ ਪਾਰਿ ਉਤਾਰਾ ॥ ਰਹਾਉ ॥
ਤੂਹੈ ਮੰਤ੍ਰੀ ਸੁਨਹਿ ਪ੍ਰਭ ਤੂਹੈ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਕਰਣੈਹਾਰਾ ॥
ਤੂ ਆਪੇ ਦਾਤਾ ਆਪੇ ਭੁਗਤਾ ਕਿਆ ਇਹੁ ਜੰਤੁ ਵਿਚਾਰਾ ॥੨॥
ਕਿਆ ਗੁਣ ਤੇਰੇ ਆਖਿ ਵਖਾਣੀ ਕੀਮਤਿ ਕਹਣੁ ਨ ਜਾਈ ॥
ਪੇਖਿ ਪੇਖਿ ਜੀਵੈ ਪ੍ਰਭੁ ਅਪਨਾ ਅਚਰਜੁ ਤੁਮਹਿ ਵਡਾਈ ॥੩॥
ਧਾਰਿ ਅਨੁਗ੍ਰਹੁ ਆਪਿ ਪ੍ਰਭ ਸ੍ਵਾਮੀ ਪਤਿ ਮਤਿ ਕੀਨੀ ਪੂਰੀ ॥
ਸਦਾ ਸਦਾ ਨਾਨਕ ਬਲਿਹਾਰੀ ਬਾਛਉ ਸੰਤਾ ਧੂਰੀ ॥੪॥੧੩॥੬੩॥
ਸਿਮਰਿ ਸਿਮਰਿ ਪ੍ਰਭ ਭਏ ਅਨੰਦਾ ਦੁਖ ਕਲੇਸ ਸਭਿ ਨਾਠੇ ॥
ਗੁਨ ਗਾਵਤ ਧਿਆਵਤ ਪ੍ਰਭੁ ਅਪਨਾ ਕਾਰਜ ਸਗਲੇ ਸਾਂਠੇ ॥੧॥
ਜਗਜੀਵਨ ਨਾਮੁ ਤੁਮਾਰਾ ॥
ਗੁਰ ਪੂਰੇ ਦੀਓ ਉਪਦੇਸਾ ਜਪਿ ਭਉਜਲੁ ਪਾਰਿ ਉਤਾਰਾ ॥ ਰਹਾਉ ॥
ਤੂਹੈ ਮੰਤ੍ਰੀ ਸੁਨਹਿ ਪ੍ਰਭ ਤੂਹੈ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਕਰਣੈਹਾਰਾ ॥
ਤੂ ਆਪੇ ਦਾਤਾ ਆਪੇ ਭੁਗਤਾ ਕਿਆ ਇਹੁ ਜੰਤੁ ਵਿਚਾਰਾ ॥੨॥
ਕਿਆ ਗੁਣ ਤੇਰੇ ਆਖਿ ਵਖਾਣੀ ਕੀਮਤਿ ਕਹਣੁ ਨ ਜਾਈ ॥
ਪੇਖਿ ਪੇਖਿ ਜੀਵੈ ਪ੍ਰਭੁ ਅਪਨਾ ਅਚਰਜੁ ਤੁਮਹਿ ਵਡਾਈ ॥੩॥
ਧਾਰਿ ਅਨੁਗ੍ਰਹੁ ਆਪਿ ਪ੍ਰਭ ਸ੍ਵਾਮੀ ਪਤਿ ਮਤਿ ਕੀਨੀ ਪੂਰੀ ॥
ਸਦਾ ਸਦਾ ਨਾਨਕ ਬਲਿਹਾਰੀ ਬਾਛਉ ਸੰਤਾ ਧੂਰੀ ॥੪॥੧੩॥੬੩॥
सोरठि महला ५ ॥
सिमरि सिमरि प्रभ भए अनंदा दुख कलेस सभि नाठे ॥
गुन गावत धिआवत प्रभु अपना कारज सगले सांठे ॥१॥
जगजीवन नामु तुमारा ॥
गुर पूरे दीओ उपदेसा जपि भउजलु पारि उतारा ॥ रहाउ ॥
तूहै मंत्री सुनहि प्रभ तूहै सभु किछु करणैहारा ॥
तू आपे दाता आपे भुगता किआ इहु जंतु विचारा ॥२॥
किआ गुण तेरे आखि वखाणी कीमति कहणु न जाई ॥
पेखि पेखि जीवै प्रभु अपना अचरजु तुमहि वडाई ॥३॥
धारि अनुग्रहु आपि प्रभ स्वामी पति मति कीनी पूरी ॥
सदा सदा नानक बलिहारी बाछउ संता धूरी ॥४॥१३॥६३॥
सिमरि सिमरि प्रभ भए अनंदा दुख कलेस सभि नाठे ॥
गुन गावत धिआवत प्रभु अपना कारज सगले सांठे ॥१॥
जगजीवन नामु तुमारा ॥
गुर पूरे दीओ उपदेसा जपि भउजलु पारि उतारा ॥ रहाउ ॥
तूहै मंत्री सुनहि प्रभ तूहै सभु किछु करणैहारा ॥
तू आपे दाता आपे भुगता किआ इहु जंतु विचारा ॥२॥
किआ गुण तेरे आखि वखाणी कीमति कहणु न जाई ॥
पेखि पेखि जीवै प्रभु अपना अचरजु तुमहि वडाई ॥३॥
धारि अनुग्रहु आपि प्रभ स्वामी पति मति कीनी पूरी ॥
सदा सदा नानक बलिहारी बाछउ संता धूरी ॥४॥१३॥६३॥
हिन्दी अर्थ: सोरठि महला ५ ॥ हे प्रभू ! तेरा नाम सिमर सिमर के (सिमरन करने वाले मनुष्य) प्रसन्नचिक्त हो जाते हैं।(उनके अंदर से) सारे दुख-कलेश दूर हो जाते हैं। (हे भाई ! भाग्यशाली मनुष्य) अपने प्रभू के गुण गाते हुए और उसका ध्यान धरते हुए अपने सारे काम सँवार लेते हैं। 1। हे प्रभू ! तेरा नाम जगत (के जीवों) को आत्मिक जीवन देने वाला है। पूरे सतिगुरू ने (जिस मनुष्य को तेरा नाम सिमरने का) उपदेश दिया।(वह मनुष्य) नाम ज पके संसार समुंद्र से पार लांघ गया।रहाउ। हे प्रभू ! तू खुद ही अपना सलाहकार है। सब कुछ तू ही करने वाला है तू खुद ही (हरेक जीव को) दातें देने वाला है।तू खुद ही (हरेक जीव में बैठ के पदार्थों को) भोगने वाला है।इस जीव की कोई बिसात नहीं। 2। हे प्रभू ! मैं तेरे गुण कह के बयान के लायक नहीं हूँ तेरी कद्र-कीमति बताई नहीं जा सकती। तेरा बड़प्पन हैरान कर देने वाला है।(हे भाई ! मनुष्य) अपने प्रभू के दर्शन कर करके आत्मिक जीवन प्राप्त कर लेता है। 3। हे प्रभू ! हे स्वामी ! तू स्वयं ही (जीव पर) कृपा करके उसको (लोक-परलोक में) आदर देता है।उसे पूर्ण बुद्धि दे देता है। हे नानक ! (कह, हे प्रभू !) मैं सदा ही तुझसे कुर्बान जाता हूँ।मैं (तेरे दर से) संत जनों की चरण-धूड़ माँगता हूँ। 4। 13। 63।
ਸੋਰਠਿ ਮਃ ੫ ॥
ਗੁਰੁ ਪੂਰਾ ਨਮਸਕਾਰੇ ॥
ਪ੍ਰਭਿ ਸਭੇ ਕਾਜ ਸਵਾਰੇ ॥
ਹਰਿ ਅਪਣੀ ਕਿਰਪਾ ਧਾਰੀ ॥
ਪ੍ਰਭ ਪੂਰਨ ਪੈਜ ਸਵਾਰੀ ॥੧॥
ਅਪਨੇ ਦਾਸ ਕੋ ਭਇਓ ਸਹਾਈ ॥
ਸਗਲ ਮਨੋਰਥ ਕੀਨੇ ਕਰਤੈ ਊਣੀ ਬਾਤ ਨ ਕਾਈ ॥ ਰਹਾਉ ॥
ਕਰਤੈ ਪੁਰਖਿ ਤਾਲੁ ਦਿਵਾਇਆ ॥
ਪਿਛੈ ਲਗਿ ਚਲੀ ਮਾਇਆ ॥
ਤੋਟਿ ਨ ਕਤਹੂ ਆਵੈ ॥
ਮੇਰੇ ਪੂਰੇ ਸਤਗੁਰ ਭਾਵੈ ॥੨॥
ਸਿਮਰਿ ਸਿਮਰਿ ਦਇਆਲਾ ॥
ਸਭਿ ਜੀਅ ਭਏ ਕਿਰਪਾਲਾ ॥
ਜੈ ਜੈ ਕਾਰੁ ਗੁਸਾਈ ॥
ਜਿਨਿ ਪੂਰੀ ਬਣਤ ਬਣਾਈ ॥੩॥
ਤੂ ਭਾਰੋ ਸੁਆਮੀ ਮੋਰਾ ॥
ਇਹੁ ਪੁੰਨੁ ਪਦਾਰਥੁ ਤੇਰਾ ॥
ਜਨ ਨਾਨਕ ਏਕੁ ਧਿਆਇਆ ॥
ਸਰਬ ਫਲਾ ਪੁੰਨੁ ਪਾਇਆ ॥੪॥੧੪॥੬੪॥
ਗੁਰੁ ਪੂਰਾ ਨਮਸਕਾਰੇ ॥
ਪ੍ਰਭਿ ਸਭੇ ਕਾਜ ਸਵਾਰੇ ॥
ਹਰਿ ਅਪਣੀ ਕਿਰਪਾ ਧਾਰੀ ॥
ਪ੍ਰਭ ਪੂਰਨ ਪੈਜ ਸਵਾਰੀ ॥੧॥
ਅਪਨੇ ਦਾਸ ਕੋ ਭਇਓ ਸਹਾਈ ॥
ਸਗਲ ਮਨੋਰਥ ਕੀਨੇ ਕਰਤੈ ਊਣੀ ਬਾਤ ਨ ਕਾਈ ॥ ਰਹਾਉ ॥
ਕਰਤੈ ਪੁਰਖਿ ਤਾਲੁ ਦਿਵਾਇਆ ॥
ਪਿਛੈ ਲਗਿ ਚਲੀ ਮਾਇਆ ॥
ਤੋਟਿ ਨ ਕਤਹੂ ਆਵੈ ॥
ਮੇਰੇ ਪੂਰੇ ਸਤਗੁਰ ਭਾਵੈ ॥੨॥
ਸਿਮਰਿ ਸਿਮਰਿ ਦਇਆਲਾ ॥
ਸਭਿ ਜੀਅ ਭਏ ਕਿਰਪਾਲਾ ॥
ਜੈ ਜੈ ਕਾਰੁ ਗੁਸਾਈ ॥
ਜਿਨਿ ਪੂਰੀ ਬਣਤ ਬਣਾਈ ॥੩॥
ਤੂ ਭਾਰੋ ਸੁਆਮੀ ਮੋਰਾ ॥
ਇਹੁ ਪੁੰਨੁ ਪਦਾਰਥੁ ਤੇਰਾ ॥
ਜਨ ਨਾਨਕ ਏਕੁ ਧਿਆਇਆ ॥
ਸਰਬ ਫਲਾ ਪੁੰਨੁ ਪਾਇਆ ॥੪॥੧੪॥੬੪॥
सोरठि मः ५ ॥
गुरु पूरा नमसकारे ॥
प्रभि सभे काज सवारे ॥
हरि अपणी किरपा धारी ॥
प्रभ पूरन पैज सवारी ॥१॥
अपने दास को भइओ सहाई ॥
सगल मनोरथ कीने करतै ऊणी बात न काई ॥ रहाउ ॥
करतै पुरखि तालु दिवाइआ ॥
पिछै लगि चली माइआ ॥
तोटि न कतहू आवै ॥
मेरे पूरे सतगुर भावै ॥२॥
सिमरि सिमरि दइआला ॥
सभि जीअ भए किरपाला ॥
जै जै कारु गुसाई ॥
जिनि पूरी बणत बणाई ॥३॥
तू भारो सुआमी मोरा ॥
इहु पुंनु पदारथु तेरा ॥
जन नानक एकु धिआइआ ॥
सरब फला पुंनु पाइआ ॥४॥१४॥६४॥
गुरु पूरा नमसकारे ॥
प्रभि सभे काज सवारे ॥
हरि अपणी किरपा धारी ॥
प्रभ पूरन पैज सवारी ॥१॥
अपने दास को भइओ सहाई ॥
सगल मनोरथ कीने करतै ऊणी बात न काई ॥ रहाउ ॥
करतै पुरखि तालु दिवाइआ ॥
पिछै लगि चली माइआ ॥
तोटि न कतहू आवै ॥
मेरे पूरे सतगुर भावै ॥२॥
सिमरि सिमरि दइआला ॥
सभि जीअ भए किरपाला ॥
जै जै कारु गुसाई ॥
जिनि पूरी बणत बणाई ॥३॥
तू भारो सुआमी मोरा ॥
इहु पुंनु पदारथु तेरा ॥
जन नानक एकु धिआइआ ॥
सरब फला पुंनु पाइआ ॥४॥१४॥६४॥
हिन्दी अर्थ: सोरठि मः ५ ॥ हे भाई ! जो पूरे गुरू की शरण पड़ता है। (यकीन जानिए कि) परमात्मा ने उसके सारे काम सवार दिए हैं। प्रभू ने उस मनुष्य पर मेहर (की निगाह) की। और (लोक-परलोक में) उसकी लाज अच्छी तरह रख ली। 1। हे भाई ! परमात्मा अपने सेवकों का मददगार बनता है। करतार ने (सदा से ही अपने भक्तों की) सारी मनोकामनाएं पूरी की हैं।सेवक को (किसी किस्म की) कोई कमी नहीं रहती।रहाउ। (हे भाई ! जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है) सर्वव्यापक करतार ने (उसको गुरू के द्वारा) गुप्त नाम-खजाना दिलवा दिया। (उसकी माया की लालसा नहीं रह जाती) माया उसके पीछे-पीछे चलती फिरती है। (माया की ओर से उसे) कहीं भी कमी महसूस नहीं होती। मेरे पूरे सतिगुरू को (उस भाग्यशाली मनुष्य के लिए यही बात) अच्छी लगती है। 2। हे भाई ! दया के घर परमात्मा का नाम सिमर सिमर के (सिमरन करने वाले) सारे ही जीव उस दया-स्वरूप प्रभू का रूप बन जाते हैं। (इस वास्ते हे भाई !) उस सृष्टि के मालिक प्रभू की सिफत सालाह करते रहा करो। जिस ने (जीवों को अपने साथ मिलाने की) ये सुंदर योजना बना दी है। 3। हे प्रभू ! तू मेरा बड़ा मालिक है। तेरा नाम-पदार्थ (जो मुझे गुरू के माध्यम से मिला है) तेरी ही बख्शिश है। हे दास नानक ! (कह,) जिस मनुष्य ने (गुरू की शरण पड़ कर) परमात्मा को सिमरना शुरू कर दिया। उसने सारे फल देने वाली (ईश्वरीय) कृपा पा ली। 4। 14। 64।
ਸੋਰਠਿ ਮਹਲਾ ੫ ਘਰੁ ੩ ਦੁਪਦੇ
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਰਾਮਦਾਸ ਸਰੋਵਰਿ ਨਾਤੇ ॥
ਸਭਿ ਉਤਰੇ ਪਾਪ ਕਮਾਤੇ ॥
ਨਿਰਮਲ ਹੋਏ ਕਰਿ ਇਸਨਾਨਾ ॥
ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਕੀਨੇ ਦਾਨਾ ॥੧॥
ਸਭਿ ਕੁਸਲ ਖੇਮ ਪ੍ਰਭਿ ਧਾਰੇ ॥
ਸਹੀ ਸਲਾਮਤਿ ਸਭਿ ਥੋਕ ਉਬਾਰੇ ਗੁਰ ਕਾ ਸਬਦੁ ਵੀਚਾਰੇ ॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਮਲੁ ਲਾਥੀ ॥
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਭਇਓ ਸਾਥੀ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇਆ ॥
ਆਦਿ ਪੁਰਖ ਪ੍ਰਭੁ ਪਾਇਆ ॥੨॥੧॥੬੫॥
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਰਾਮਦਾਸ ਸਰੋਵਰਿ ਨਾਤੇ ॥
ਸਭਿ ਉਤਰੇ ਪਾਪ ਕਮਾਤੇ ॥
ਨਿਰਮਲ ਹੋਏ ਕਰਿ ਇਸਨਾਨਾ ॥
ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਕੀਨੇ ਦਾਨਾ ॥੧॥
ਸਭਿ ਕੁਸਲ ਖੇਮ ਪ੍ਰਭਿ ਧਾਰੇ ॥
ਸਹੀ ਸਲਾਮਤਿ ਸਭਿ ਥੋਕ ਉਬਾਰੇ ਗੁਰ ਕਾ ਸਬਦੁ ਵੀਚਾਰੇ ॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਮਲੁ ਲਾਥੀ ॥
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਭਇਓ ਸਾਥੀ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇਆ ॥
ਆਦਿ ਪੁਰਖ ਪ੍ਰਭੁ ਪਾਇਆ ॥੨॥੧॥੬੫॥
सोरठि महला ५ घरु ३ दुपदे
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
रामदास सरोवरि नाते ॥
सभि उतरे पाप कमाते ॥
निरमल होए करि इसनाना ॥
गुरि पूरै कीने दाना ॥१॥
सभि कुसल खेम प्रभि धारे ॥
सही सलामति सभि थोक उबारे गुर का सबदु वीचारे ॥ रहाउ ॥
साधसंगि मलु लाथी ॥
पारब्रहमु भइओ साथी ॥
नानक नामु धिआइआ ॥
आदि पुरख प्रभु पाइआ ॥२॥१॥६५॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
रामदास सरोवरि नाते ॥
सभि उतरे पाप कमाते ॥
निरमल होए करि इसनाना ॥
गुरि पूरै कीने दाना ॥१॥
सभि कुसल खेम प्रभि धारे ॥
सही सलामति सभि थोक उबारे गुर का सबदु वीचारे ॥ रहाउ ॥
साधसंगि मलु लाथी ॥
पारब्रहमु भइओ साथी ॥
नानक नामु धिआइआ ॥
आदि पुरख प्रभु पाइआ ॥२॥१॥६५॥
हिन्दी अर्थ: सोरठि महला ५ घरु ३ दुपदे ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे भाई ! जो मनुष्य राम के दासों के सरोवर में (साध-संगति में नाम-अमृत से) स्नान करते हैं। उनके (पिछले) किए हुए पाप उतर जाते हैं। (हरी नाम जल से) स्नान करके वे पवित्र जीवन वाले हो जाते हैं। पर ये कृपा पूरे गुरू ने ही की हुई होती है। 1। प्रभू ने (उसके हृउय में) सारे आत्मिक सुख आनंद पैदा कर दिए। हे भाई ! जिस मनुष्य ने गुरू के शबद को अपनी सोच मंडल में टिका के आत्मिक जीवन के सारे गुण (विकारों के जाल में फसने से) ठीक ठाक बचा लिए। रहाउ। हे भाई ! साध-संगति में (टिकने से) विकारों की मैल दूर हो जाती है। (साध-संगति की बरकति से) परमात्मा मददगार बन जाता है। हे नानक ! (जिस मनुष्य ने रामदास सरोवर में आ के) परमात्मा का नाम सिमरा। उसने उस प्रभू को पा लिया जो सबका आदि है और सर्व-व्यापक है। 2। 1। 65।
ਸੋਰਠਿ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਜਿਤੁ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਚਿਤਿ ਆਇਆ ॥ ਸੋ ਘਰੁ ਦਯਿ ਵਸਾਇਆ ॥
ਜਿਤੁ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਚਿਤਿ ਆਇਆ ॥ ਸੋ ਘਰੁ ਦਯਿ ਵਸਾਇਆ ॥
सोरठि महला ५ ॥
जितु पारब्रहमु चिति आइआ ॥ सो घरु दयि वसाइआ ॥
जितु पारब्रहमु चिति आइआ ॥ सो घरु दयि वसाइआ ॥
हिन्दी अर्थ: सोरठि महला ५ ॥ हे भाई ! जिस हृदय-घर में परमात्मा आ बसा है। प्रीतम प्रभू ने वह हृदय-घर (आत्मिक गुणों से) भरपूर कर दिया।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 625 है, राग सोरठ का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
Greater Kailash के बाज़ार में सर्दियों की धूप, और कोई पुराना दोस्त मिल जाए।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 47 पंक्तियों का है, 5 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 625” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: सोरठ राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 626 →, पीछे का: ← अंग 624।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।