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अंग 629

अंग
629
राग सोरठ
राग: सोरठ · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
गुरु पूरा आराधे ॥
कारज सगले साधे ॥
सगल मनोरथ पूरे ॥
बाजे अनहद तूरे ॥1॥
संतहु रामु जपत सुखु पाइआ ॥
संत असथानि बसे सुख सहजे सगले दूख मिटाइआ ॥1॥ रहाउ ॥
गुर पूरे की बाणी ॥
पारब्रहम मनि भाणी ॥
नानक दासि वखाणी ॥
निरमल अकथ कहाणी ॥2॥18॥82॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: हे संत जनो ! जिन मनुष्यों ने पूरे गुरू का ध्यान धरा। उन्होंने अपने सारे काम सवार लिए। उनकी सारी मनोकामनाएं पूरी हो गई। उनके अंदर प्रभू की सिफत सालाह के बाजे एक-रस बजते रहते हैं। 1। हे संत जनो !परमात्मा का नाम जप के वे आत्मिक सुख लेते हैं। जो मनुष्य साध-संगति में आ टिकते हैं।वे आत्मिक अडोलता में लीन रह के आत्मिक आनंद हासिल करते हैं। वे अपने सारे दुख दूर कर लेते हैं। 1।रहाउ। पूरे गुरू की बाणी- ये बाणी परमात्मा के मन को (भी) प्यारी लगती है (क्योंकि) ये (पढ़ने वाले का जीवन) पवित्र करने वाली है। हे नानक ! (किसी विरले) दास ने ही (आत्मिक अडोलता में टिक के) उचारी है। ये बाणी उस प्रभू की सिफत सालाह है जिसका स्वरूप बयान नहीं किया जा सकता। 2। 18। 82।
सोरठि महला 5 ॥
भूखे खावत लाज न आवै ॥
तिउ हरि जनु हरि गुण गावै ॥1॥
अपने काज कउ किउ अलकाईऐ ॥
जितु सिमरनि दरगह मुखु ऊजल सदा सदा सुखु पाईऐ ॥1॥ रहाउ ॥
जिउ कामी कामि लुभावै ॥
तिउ हरि दास हरि जसु भावै ॥2॥
जिउ माता बालि लपटावै ॥
तिउ गिआनी नामु कमावै ॥3॥
गुर पूरे ते पावै ॥
जन नानक नामु धिआवै ॥4॥19॥83॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 ॥ हे भाई ! जैसे (किसी मनुष्य को कुछ खाने को मिल जाए।तो वह) भूखा मनुष्य खाते हुए शर्म महसूस नहीं करता। इसी तरह परमात्मा का सेवक (अपनी आत्मिक भूख मिटाने के लिए बड़े चाव से) परमात्मा की सिफत सालाह के गीत गाता है। 1। हे भाई ! अपने (असल) काम की खातिर कभी भी आलस नहीं करना चाहिएं1। जिस सिमरन की बरकति से परमात्मा की हजूरी में सुर्खरू होते हैं।और।सदा ही आत्मिक आनंद लेते हैं (वह सिमरन ही हमारा असल काम है।रहाउ। हे भाई ! जैसे कोई कामी मनुष्य काम-वासना में मगन रहता है। वैसे ही परमात्मा के सेवक को परमात्मा की सिफत सालाह ही अच्छी लगती है। 2। हे भाई ! जैसे माँ अपने बच्चे (के मोह) से चिपकी रहती है। वैसे ही आत्मिक जीवन की सूझ वाला मनुष्य नाम (-सिमरन की) कमाई करता है। 3। पर जो (ये दाति) पूरे गुरू से हासिल करता है। हे दास नानक ! (वही मनुष्य परमात्मा का) नाम सिमरता है 4। 19। 83।
सोरठि महला 5 ॥
सुख सांदि घरि आइआ ॥
निंदक कै मुखि छाइआ ॥
पूरै गुरि पहिराइआ ॥
बिनसे दुख सबाइआ ॥1॥
संतहु साचे की वडिआई ॥
जिनि अचरज सोभ बणाई ॥1॥ रहाउ ॥
बोले साहिब कै भाणै ॥
दासु बाणी ब्रहमु वखाणै ॥
नानक प्रभ सुखदाई ॥
जिनि पूरी बणत बणाई ॥2॥20॥84॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 ॥ वही पूरी आत्मिक अरोगता से अपने हृदय-घर में (सदा के लिए) टिक गया। उस की निंदा करने वाले के मुँह पर राख ही पड़ी (प्रभू के दास के निंदक ने सदा बदनामी का टिका ही कमाया)। (हे संत जनो ! परमात्मा की कृपा से जिस मनुष्य को) पूरे गुरू ने आदर-मान बख्शा। उसके सारे ही दुख दूर हो गए। 1। हे संत जनो ! (देखो) बड़ी शान उस सदा कायम रहने वाले परमात्मा की। जिस ने (अपने दास की सदा ही) हैरान कर देने वाली शोभा बना दी है। 1।रहाउ। हे नानक ! (प्रभू के जिस सेवक को गुरू ने इज्जत दी।वह सेवक सदा) परमात्मा की रजा में ही वचन बोलता है। वह सेवक (परमात्मा की सिफत सालाह की) बाणी सदा उचारता है।परमात्मा का नाम उचारता है। वह सदा (अपने सेवक को) सुख देने वाला है। हे भाई ! जिस परमात्मा ने (गुरू की शरण पड़ के नाम-सिमरन की ये) कभी गलत ना साबित होने वाली योजना (विधि) बना दी है। 2। 20। 84।
सोरठि महला 5 ॥
प्रभु अपुना रिदै धिआए ॥
घरि सही सलामति आए ॥
संतोखु भइआ संसारे ॥
गुरि पूरै लै तारे ॥1॥
संतहु प्रभु मेरा सदा दइआला ॥
अपने भगत की गणत न गणई राखै बाल गुपाला ॥1॥ रहाउ ॥
हरि नामु रिदै उरि धारे ॥
तिनि सभे थोक सवारे ॥
गुरि पूरै तुसि दीआ ॥
फिरि नानक दूखु न थीआ ॥2॥21॥85॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 ॥ हे संत जनो ! जो मनुष्य परमात्मा का नाम अपने दिल में बसाए रखता है। वह मनुष्य अपनी आत्मिक जीवन की राशि-पूँजी को विकारों से पूरी तरह बचा के हृदय-घर में टिका रहता है। दुनिया के कार्य-व्यवहार करते हुए भी (उसके मन में माया के प्रति) संतोष बना रहता है। पूरे गुरू ने उसकी बाँह पकड़ के उसको (संसार-समुंद्र से) पार लंघा लिया होता है। 1। हे संत जनो ! मेरा प्रभू (अपने सेवकों पर) सदा ही दयावान रहता है। प्रभू अपने भक्तों के कर्मों का लेखा नहीं विचारता।(क्योंकि) सृष्टि का पालक प्रभू बच्चों की तरह (सेवकों को विकारों से) बचाए रखता है (इसलिए उनके विकारों का कोई लेखा नहीं रह जाता)। 1।रहाउ। हे संत जनो ! जो मनुष्य परमात्मा का नाम अपने हृदय में बसाए रखता है (यकीन जानिए) उसने अपने सारे आत्मिक गुण सुंदर बना लिए हैं। हे नानक ! पूरे गुरू ने (जिस मनुष्य को) प्रसन्न हो के नाम की दाति बख्शी। उसे दुबारा कभी कोई दुख नहीं व्याप सका। 2। 21। 85।
सोरठि महला 5 ॥
हरि मनि तनि वसिआ सोई ॥
जै जै कारु करे सभु कोई ॥
गुर पूरे की वडिआई ॥
ता की कीमति कही न जाई ॥1॥
हउ कुरबानु जाई तेरे नावै ॥
जिस नो बखसि लैहि मेरे पिआरे सो जसु तेरा गावै ॥1॥ रहाउ ॥
तूं भारो सुआमी मेरा ॥
संतां भरवासा तेरा ॥
नानक प्रभ सरणाई ॥
मुखि निंदक कै छाई ॥2॥22॥86॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 ॥ हे भाई ! जिस मनुष्य के मन में तन में वह परमात्मा ही बसा रहता है। हरेक जीव उसकी शोभा करता है। (पर ये) पूरे गुरू की ही बख्शिश है (जिसकी मेहर से परमात्मा की याद किसी भाग्यशाली के मन तन में बसती है) गुरू की कृपा का मूल्य नहीं पड़ सकता। 1। हे मेरे प्यारे प्रभू ! मैं आपके नाम से सदके जाता हूँ। आप जिस मनुष्य पर कृपा करता है।वह सदा आपकी सिफत सालाह के गीत गाता है। 1।रहाउ। हे प्रभू ! आप मेरा बड़ा मालिक है। आपके संतों को (भी) आपका ही सहारा रहता है। हे नानक ! जो मनुष्य प्रभू की शरण पड़ा रहता है (उसका दुख दूर करने वाले) निंदक के मुँह पर राख ही पड़ती है (प्रभू की शरण पड़े मनुष्य का कोई कुछ बिगाड़ नहीं सकता)। 2। 22। 86।
सोरठि महला 5 ॥
आगै सुखु मेरे मीता ॥
पाछे आनदु प्रभि कीता ॥
परमेसुरि बणत बणाई ॥
फिरि डोलत कतहू नाही ॥1॥
साचे साहिब सिउ मनु मानिआ ॥
हरि सरब निरंतरि जानिआ ॥1॥ रहाउ ॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 ॥ हे मेरे मित्र ! जिस मनुष्य के आगे आने वाले जीवन में प्रभू ने सुख बना दिया। जिसके बीत चुके जीवन में भी प्रभू ने आनंद बनाए रखा। जिस मनुष्य के लिए परमेश्वर ने ऐसी योजना बना रखी। वह मनुष्य (लोक-परलोक में) कहीं भी डोलता नहीं। 1। हे भाई ! जिस मनुष्य का मन सदा कायम रहने वाले मालिक (के नाम) से पतीज जाता है। वह मनुष्य उस मालिक प्रभू को सब में एक-रस बसता पहचान लेता है। 1।रहाउ।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे संत जनो ! जिन मनुष्यों ने पूरे गुरू का ध्यान धरा।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।