अंग
629
राग सोरठ
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਗੁਰੁ ਪੂਰਾ ਆਰਾਧੇ ॥
ਕਾਰਜ ਸਗਲੇ ਸਾਧੇ ॥
ਸਗਲ ਮਨੋਰਥ ਪੂਰੇ ॥
ਬਾਜੇ ਅਨਹਦ ਤੂਰੇ ॥੧॥
ਸੰਤਹੁ ਰਾਮੁ ਜਪਤ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ॥
ਸੰਤ ਅਸਥਾਨਿ ਬਸੇ ਸੁਖ ਸਹਜੇ ਸਗਲੇ ਦੂਖ ਮਿਟਾਇਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਗੁਰ ਪੂਰੇ ਕੀ ਬਾਣੀ ॥
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਮਨਿ ਭਾਣੀ ॥
ਨਾਨਕ ਦਾਸਿ ਵਖਾਣੀ ॥
ਨਿਰਮਲ ਅਕਥ ਕਹਾਣੀ ॥੨॥੧੮॥੮੨॥
ਕਾਰਜ ਸਗਲੇ ਸਾਧੇ ॥
ਸਗਲ ਮਨੋਰਥ ਪੂਰੇ ॥
ਬਾਜੇ ਅਨਹਦ ਤੂਰੇ ॥੧॥
ਸੰਤਹੁ ਰਾਮੁ ਜਪਤ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ॥
ਸੰਤ ਅਸਥਾਨਿ ਬਸੇ ਸੁਖ ਸਹਜੇ ਸਗਲੇ ਦੂਖ ਮਿਟਾਇਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਗੁਰ ਪੂਰੇ ਕੀ ਬਾਣੀ ॥
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਮਨਿ ਭਾਣੀ ॥
ਨਾਨਕ ਦਾਸਿ ਵਖਾਣੀ ॥
ਨਿਰਮਲ ਅਕਥ ਕਹਾਣੀ ॥੨॥੧੮॥੮੨॥
गुरु पूरा आराधे ॥
कारज सगले साधे ॥
सगल मनोरथ पूरे ॥
बाजे अनहद तूरे ॥१॥
संतहु रामु जपत सुखु पाइआ ॥
संत असथानि बसे सुख सहजे सगले दूख मिटाइआ ॥१॥ रहाउ ॥
गुर पूरे की बाणी ॥
पारब्रहम मनि भाणी ॥
नानक दासि वखाणी ॥
निरमल अकथ कहाणी ॥२॥१८॥८२॥
कारज सगले साधे ॥
सगल मनोरथ पूरे ॥
बाजे अनहद तूरे ॥१॥
संतहु रामु जपत सुखु पाइआ ॥
संत असथानि बसे सुख सहजे सगले दूख मिटाइआ ॥१॥ रहाउ ॥
गुर पूरे की बाणी ॥
पारब्रहम मनि भाणी ॥
नानक दासि वखाणी ॥
निरमल अकथ कहाणी ॥२॥१८॥८२॥
हिन्दी अर्थ: हे संत जनो ! जिन मनुष्यों ने पूरे गुरू का ध्यान धरा। उन्होंने अपने सारे काम सवार लिए। उनकी सारी मनोकामनाएं पूरी हो गई। उनके अंदर प्रभू की सिफत सालाह के बाजे एक-रस बजते रहते हैं। 1। हे संत जनो !परमात्मा का नाम जप के वे आत्मिक सुख लेते हैं। जो मनुष्य साध-संगति में आ टिकते हैं।वे आत्मिक अडोलता में लीन रह के आत्मिक आनंद हासिल करते हैं। वे अपने सारे दुख दूर कर लेते हैं। 1।रहाउ। पूरे गुरू की बाणी- ये बाणी परमात्मा के मन को (भी) प्यारी लगती है (क्योंकि) ये (पढ़ने वाले का जीवन) पवित्र करने वाली है। हे नानक ! (किसी विरले) दास ने ही (आत्मिक अडोलता में टिक के) उचारी है। ये बाणी उस प्रभू की सिफत सालाह है जिसका स्वरूप बयान नहीं किया जा सकता। 2। 18। 82।
ਸੋਰਠਿ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਭੂਖੇ ਖਾਵਤ ਲਾਜ ਨ ਆਵੈ ॥
ਤਿਉ ਹਰਿ ਜਨੁ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਵੈ ॥੧॥
ਅਪਨੇ ਕਾਜ ਕਉ ਕਿਉ ਅਲਕਾਈਐ ॥
ਜਿਤੁ ਸਿਮਰਨਿ ਦਰਗਹ ਮੁਖੁ ਊਜਲ ਸਦਾ ਸਦਾ ਸੁਖੁ ਪਾਈਐ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜਿਉ ਕਾਮੀ ਕਾਮਿ ਲੁਭਾਵੈ ॥
ਤਿਉ ਹਰਿ ਦਾਸ ਹਰਿ ਜਸੁ ਭਾਵੈ ॥੨॥
ਜਿਉ ਮਾਤਾ ਬਾਲਿ ਲਪਟਾਵੈ ॥
ਤਿਉ ਗਿਆਨੀ ਨਾਮੁ ਕਮਾਵੈ ॥੩॥
ਗੁਰ ਪੂਰੇ ਤੇ ਪਾਵੈ ॥
ਜਨ ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਧਿਆਵੈ ॥੪॥੧੯॥੮੩॥
ਭੂਖੇ ਖਾਵਤ ਲਾਜ ਨ ਆਵੈ ॥
ਤਿਉ ਹਰਿ ਜਨੁ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਵੈ ॥੧॥
ਅਪਨੇ ਕਾਜ ਕਉ ਕਿਉ ਅਲਕਾਈਐ ॥
ਜਿਤੁ ਸਿਮਰਨਿ ਦਰਗਹ ਮੁਖੁ ਊਜਲ ਸਦਾ ਸਦਾ ਸੁਖੁ ਪਾਈਐ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜਿਉ ਕਾਮੀ ਕਾਮਿ ਲੁਭਾਵੈ ॥
ਤਿਉ ਹਰਿ ਦਾਸ ਹਰਿ ਜਸੁ ਭਾਵੈ ॥੨॥
ਜਿਉ ਮਾਤਾ ਬਾਲਿ ਲਪਟਾਵੈ ॥
ਤਿਉ ਗਿਆਨੀ ਨਾਮੁ ਕਮਾਵੈ ॥੩॥
ਗੁਰ ਪੂਰੇ ਤੇ ਪਾਵੈ ॥
ਜਨ ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਧਿਆਵੈ ॥੪॥੧੯॥੮੩॥
सोरठि महला ५ ॥
भूखे खावत लाज न आवै ॥
तिउ हरि जनु हरि गुण गावै ॥१॥
अपने काज कउ किउ अलकाईऐ ॥
जितु सिमरनि दरगह मुखु ऊजल सदा सदा सुखु पाईऐ ॥१॥ रहाउ ॥
जिउ कामी कामि लुभावै ॥
तिउ हरि दास हरि जसु भावै ॥२॥
जिउ माता बालि लपटावै ॥
तिउ गिआनी नामु कमावै ॥३॥
गुर पूरे ते पावै ॥
जन नानक नामु धिआवै ॥४॥१९॥८३॥
भूखे खावत लाज न आवै ॥
तिउ हरि जनु हरि गुण गावै ॥१॥
अपने काज कउ किउ अलकाईऐ ॥
जितु सिमरनि दरगह मुखु ऊजल सदा सदा सुखु पाईऐ ॥१॥ रहाउ ॥
जिउ कामी कामि लुभावै ॥
तिउ हरि दास हरि जसु भावै ॥२॥
जिउ माता बालि लपटावै ॥
तिउ गिआनी नामु कमावै ॥३॥
गुर पूरे ते पावै ॥
जन नानक नामु धिआवै ॥४॥१९॥८३॥
हिन्दी अर्थ: सोरठि महला ५ ॥ हे भाई ! जैसे (किसी मनुष्य को कुछ खाने को मिल जाए।तो वह) भूखा मनुष्य खाते हुए शर्म महसूस नहीं करता। इसी तरह परमात्मा का सेवक (अपनी आत्मिक भूख मिटाने के लिए बड़े चाव से) परमात्मा की सिफत सालाह के गीत गाता है। 1। हे भाई ! अपने (असल) काम की खातिर कभी भी आलस नहीं करना चाहिएं1। जिस सिमरन की बरकति से परमात्मा की हजूरी में सुर्खरू होते हैं।और।सदा ही आत्मिक आनंद लेते हैं (वह सिमरन ही हमारा असल काम है।रहाउ। हे भाई ! जैसे कोई कामी मनुष्य काम-वासना में मगन रहता है। वैसे ही परमात्मा के सेवक को परमात्मा की सिफत सालाह ही अच्छी लगती है। 2। हे भाई ! जैसे माँ अपने बच्चे (के मोह) से चिपकी रहती है। वैसे ही आत्मिक जीवन की सूझ वाला मनुष्य नाम (-सिमरन की) कमाई करता है। 3। पर जो (ये दाति) पूरे गुरू से हासिल करता है। हे दास नानक ! (वही मनुष्य परमात्मा का) नाम सिमरता है 4। 19। 83।
ਸੋਰਠਿ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਸੁਖ ਸਾਂਦਿ ਘਰਿ ਆਇਆ ॥
ਨਿੰਦਕ ਕੈ ਮੁਖਿ ਛਾਇਆ ॥
ਪੂਰੈ ਗੁਰਿ ਪਹਿਰਾਇਆ ॥
ਬਿਨਸੇ ਦੁਖ ਸਬਾਇਆ ॥੧॥
ਸੰਤਹੁ ਸਾਚੇ ਕੀ ਵਡਿਆਈ ॥
ਜਿਨਿ ਅਚਰਜ ਸੋਭ ਬਣਾਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਬੋਲੇ ਸਾਹਿਬ ਕੈ ਭਾਣੈ ॥
ਦਾਸੁ ਬਾਣੀ ਬ੍ਰਹਮੁ ਵਖਾਣੈ ॥
ਨਾਨਕ ਪ੍ਰਭ ਸੁਖਦਾਈ ॥
ਜਿਨਿ ਪੂਰੀ ਬਣਤ ਬਣਾਈ ॥੨॥੨੦॥੮੪॥
ਸੁਖ ਸਾਂਦਿ ਘਰਿ ਆਇਆ ॥
ਨਿੰਦਕ ਕੈ ਮੁਖਿ ਛਾਇਆ ॥
ਪੂਰੈ ਗੁਰਿ ਪਹਿਰਾਇਆ ॥
ਬਿਨਸੇ ਦੁਖ ਸਬਾਇਆ ॥੧॥
ਸੰਤਹੁ ਸਾਚੇ ਕੀ ਵਡਿਆਈ ॥
ਜਿਨਿ ਅਚਰਜ ਸੋਭ ਬਣਾਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਬੋਲੇ ਸਾਹਿਬ ਕੈ ਭਾਣੈ ॥
ਦਾਸੁ ਬਾਣੀ ਬ੍ਰਹਮੁ ਵਖਾਣੈ ॥
ਨਾਨਕ ਪ੍ਰਭ ਸੁਖਦਾਈ ॥
ਜਿਨਿ ਪੂਰੀ ਬਣਤ ਬਣਾਈ ॥੨॥੨੦॥੮੪॥
सोरठि महला ५ ॥
सुख सांदि घरि आइआ ॥
निंदक कै मुखि छाइआ ॥
पूरै गुरि पहिराइआ ॥
बिनसे दुख सबाइआ ॥१॥
संतहु साचे की वडिआई ॥
जिनि अचरज सोभ बणाई ॥१॥ रहाउ ॥
बोले साहिब कै भाणै ॥
दासु बाणी ब्रहमु वखाणै ॥
नानक प्रभ सुखदाई ॥
जिनि पूरी बणत बणाई ॥२॥२०॥८४॥
सुख सांदि घरि आइआ ॥
निंदक कै मुखि छाइआ ॥
पूरै गुरि पहिराइआ ॥
बिनसे दुख सबाइआ ॥१॥
संतहु साचे की वडिआई ॥
जिनि अचरज सोभ बणाई ॥१॥ रहाउ ॥
बोले साहिब कै भाणै ॥
दासु बाणी ब्रहमु वखाणै ॥
नानक प्रभ सुखदाई ॥
जिनि पूरी बणत बणाई ॥२॥२०॥८४॥
हिन्दी अर्थ: सोरठि महला ५ ॥ वही पूरी आत्मिक अरोगता से अपने हृदय-घर में (सदा के लिए) टिक गया। उस की निंदा करने वाले के मुँह पर राख ही पड़ी (प्रभू के दास के निंदक ने सदा बदनामी का टिका ही कमाया)। (हे संत जनो ! परमात्मा की कृपा से जिस मनुष्य को) पूरे गुरू ने आदर-मान बख्शा। उसके सारे ही दुख दूर हो गए। 1। हे संत जनो ! (देखो) बड़ी शान उस सदा कायम रहने वाले परमात्मा की। जिस ने (अपने दास की सदा ही) हैरान कर देने वाली शोभा बना दी है। 1।रहाउ। हे नानक ! (प्रभू के जिस सेवक को गुरू ने इज्जत दी।वह सेवक सदा) परमात्मा की रजा में ही वचन बोलता है। वह सेवक (परमात्मा की सिफत सालाह की) बाणी सदा उचारता है।परमात्मा का नाम उचारता है। वह सदा (अपने सेवक को) सुख देने वाला है। हे भाई ! जिस परमात्मा ने (गुरू की शरण पड़ के नाम-सिमरन की ये) कभी गलत ना साबित होने वाली योजना (विधि) बना दी है। 2। 20। 84।
ਸੋਰਠਿ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਪ੍ਰਭੁ ਅਪੁਨਾ ਰਿਦੈ ਧਿਆਏ ॥
ਘਰਿ ਸਹੀ ਸਲਾਮਤਿ ਆਏ ॥
ਸੰਤੋਖੁ ਭਇਆ ਸੰਸਾਰੇ ॥
ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਲੈ ਤਾਰੇ ॥੧॥
ਸੰਤਹੁ ਪ੍ਰਭੁ ਮੇਰਾ ਸਦਾ ਦਇਆਲਾ ॥
ਅਪਨੇ ਭਗਤ ਕੀ ਗਣਤ ਨ ਗਣਈ ਰਾਖੈ ਬਾਲ ਗੁਪਾਲਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਰਿਦੈ ਉਰਿ ਧਾਰੇ ॥
ਤਿਨਿ ਸਭੇ ਥੋਕ ਸਵਾਰੇ ॥
ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਤੁਸਿ ਦੀਆ ॥
ਫਿਰਿ ਨਾਨਕ ਦੂਖੁ ਨ ਥੀਆ ॥੨॥੨੧॥੮੫॥
ਪ੍ਰਭੁ ਅਪੁਨਾ ਰਿਦੈ ਧਿਆਏ ॥
ਘਰਿ ਸਹੀ ਸਲਾਮਤਿ ਆਏ ॥
ਸੰਤੋਖੁ ਭਇਆ ਸੰਸਾਰੇ ॥
ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਲੈ ਤਾਰੇ ॥੧॥
ਸੰਤਹੁ ਪ੍ਰਭੁ ਮੇਰਾ ਸਦਾ ਦਇਆਲਾ ॥
ਅਪਨੇ ਭਗਤ ਕੀ ਗਣਤ ਨ ਗਣਈ ਰਾਖੈ ਬਾਲ ਗੁਪਾਲਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਰਿਦੈ ਉਰਿ ਧਾਰੇ ॥
ਤਿਨਿ ਸਭੇ ਥੋਕ ਸਵਾਰੇ ॥
ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਤੁਸਿ ਦੀਆ ॥
ਫਿਰਿ ਨਾਨਕ ਦੂਖੁ ਨ ਥੀਆ ॥੨॥੨੧॥੮੫॥
सोरठि महला ५ ॥
प्रभु अपुना रिदै धिआए ॥
घरि सही सलामति आए ॥
संतोखु भइआ संसारे ॥
गुरि पूरै लै तारे ॥१॥
संतहु प्रभु मेरा सदा दइआला ॥
अपने भगत की गणत न गणई राखै बाल गुपाला ॥१॥ रहाउ ॥
हरि नामु रिदै उरि धारे ॥
तिनि सभे थोक सवारे ॥
गुरि पूरै तुसि दीआ ॥
फिरि नानक दूखु न थीआ ॥२॥२१॥८५॥
प्रभु अपुना रिदै धिआए ॥
घरि सही सलामति आए ॥
संतोखु भइआ संसारे ॥
गुरि पूरै लै तारे ॥१॥
संतहु प्रभु मेरा सदा दइआला ॥
अपने भगत की गणत न गणई राखै बाल गुपाला ॥१॥ रहाउ ॥
हरि नामु रिदै उरि धारे ॥
तिनि सभे थोक सवारे ॥
गुरि पूरै तुसि दीआ ॥
फिरि नानक दूखु न थीआ ॥२॥२१॥८५॥
हिन्दी अर्थ: सोरठि महला ५ ॥ हे संत जनो ! जो मनुष्य परमात्मा का नाम अपने दिल में बसाए रखता है। वह मनुष्य अपनी आत्मिक जीवन की राशि-पूँजी को विकारों से पूरी तरह बचा के हृदय-घर में टिका रहता है। दुनिया के कार्य-व्यवहार करते हुए भी (उसके मन में माया के प्रति) संतोष बना रहता है। पूरे गुरू ने उसकी बाँह पकड़ के उसको (संसार-समुंद्र से) पार लंघा लिया होता है। 1। हे संत जनो ! मेरा प्रभू (अपने सेवकों पर) सदा ही दयावान रहता है। प्रभू अपने भक्तों के कर्मों का लेखा नहीं विचारता।(क्योंकि) सृष्टि का पालक प्रभू बच्चों की तरह (सेवकों को विकारों से) बचाए रखता है (इसलिए उनके विकारों का कोई लेखा नहीं रह जाता)। 1।रहाउ। हे संत जनो ! जो मनुष्य परमात्मा का नाम अपने हृदय में बसाए रखता है (यकीन जानिए) उसने अपने सारे आत्मिक गुण सुंदर बना लिए हैं। हे नानक ! पूरे गुरू ने (जिस मनुष्य को) प्रसन्न हो के नाम की दाति बख्शी। उसे दुबारा कभी कोई दुख नहीं व्याप सका। 2। 21। 85।
ਸੋਰਠਿ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਹਰਿ ਮਨਿ ਤਨਿ ਵਸਿਆ ਸੋਈ ॥
ਜੈ ਜੈ ਕਾਰੁ ਕਰੇ ਸਭੁ ਕੋਈ ॥
ਗੁਰ ਪੂਰੇ ਕੀ ਵਡਿਆਈ ॥
ਤਾ ਕੀ ਕੀਮਤਿ ਕਹੀ ਨ ਜਾਈ ॥੧॥
ਹਉ ਕੁਰਬਾਨੁ ਜਾਈ ਤੇਰੇ ਨਾਵੈ ॥
ਜਿਸ ਨੋ ਬਖਸਿ ਲੈਹਿ ਮੇਰੇ ਪਿਆਰੇ ਸੋ ਜਸੁ ਤੇਰਾ ਗਾਵੈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਤੂੰ ਭਾਰੋ ਸੁਆਮੀ ਮੇਰਾ ॥
ਸੰਤਾਂ ਭਰਵਾਸਾ ਤੇਰਾ ॥
ਨਾਨਕ ਪ੍ਰਭ ਸਰਣਾਈ ॥
ਮੁਖਿ ਨਿੰਦਕ ਕੈ ਛਾਈ ॥੨॥੨੨॥੮੬॥
ਹਰਿ ਮਨਿ ਤਨਿ ਵਸਿਆ ਸੋਈ ॥
ਜੈ ਜੈ ਕਾਰੁ ਕਰੇ ਸਭੁ ਕੋਈ ॥
ਗੁਰ ਪੂਰੇ ਕੀ ਵਡਿਆਈ ॥
ਤਾ ਕੀ ਕੀਮਤਿ ਕਹੀ ਨ ਜਾਈ ॥੧॥
ਹਉ ਕੁਰਬਾਨੁ ਜਾਈ ਤੇਰੇ ਨਾਵੈ ॥
ਜਿਸ ਨੋ ਬਖਸਿ ਲੈਹਿ ਮੇਰੇ ਪਿਆਰੇ ਸੋ ਜਸੁ ਤੇਰਾ ਗਾਵੈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਤੂੰ ਭਾਰੋ ਸੁਆਮੀ ਮੇਰਾ ॥
ਸੰਤਾਂ ਭਰਵਾਸਾ ਤੇਰਾ ॥
ਨਾਨਕ ਪ੍ਰਭ ਸਰਣਾਈ ॥
ਮੁਖਿ ਨਿੰਦਕ ਕੈ ਛਾਈ ॥੨॥੨੨॥੮੬॥
सोरठि महला ५ ॥
हरि मनि तनि वसिआ सोई ॥
जै जै कारु करे सभु कोई ॥
गुर पूरे की वडिआई ॥
ता की कीमति कही न जाई ॥१॥
हउ कुरबानु जाई तेरे नावै ॥
जिस नो बखसि लैहि मेरे पिआरे सो जसु तेरा गावै ॥१॥ रहाउ ॥
तूं भारो सुआमी मेरा ॥
संतां भरवासा तेरा ॥
नानक प्रभ सरणाई ॥
मुखि निंदक कै छाई ॥२॥२२॥८६॥
हरि मनि तनि वसिआ सोई ॥
जै जै कारु करे सभु कोई ॥
गुर पूरे की वडिआई ॥
ता की कीमति कही न जाई ॥१॥
हउ कुरबानु जाई तेरे नावै ॥
जिस नो बखसि लैहि मेरे पिआरे सो जसु तेरा गावै ॥१॥ रहाउ ॥
तूं भारो सुआमी मेरा ॥
संतां भरवासा तेरा ॥
नानक प्रभ सरणाई ॥
मुखि निंदक कै छाई ॥२॥२२॥८६॥
हिन्दी अर्थ: सोरठि महला ५ ॥ हे भाई ! जिस मनुष्य के मन में तन में वह परमात्मा ही बसा रहता है। हरेक जीव उसकी शोभा करता है। (पर ये) पूरे गुरू की ही बख्शिश है (जिसकी मेहर से परमात्मा की याद किसी भाग्यशाली के मन तन में बसती है) गुरू की कृपा का मूल्य नहीं पड़ सकता। 1। हे मेरे प्यारे प्रभू ! मैं तेरे नाम से सदके जाता हूँ। तू जिस मनुष्य पर कृपा करता है।वह सदा तेरी सिफत सालाह के गीत गाता है। 1।रहाउ। हे प्रभू ! तू मेरा बड़ा मालिक है। तेरे संतों को (भी) तेरा ही सहारा रहता है। हे नानक ! जो मनुष्य प्रभू की शरण पड़ा रहता है (उसका दुख दूर करने वाले) निंदक के मुँह पर राख ही पड़ती है (प्रभू की शरण पड़े मनुष्य का कोई कुछ बिगाड़ नहीं सकता)। 2। 22। 86।
ਸੋਰਠਿ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਆਗੈ ਸੁਖੁ ਮੇਰੇ ਮੀਤਾ ॥
ਪਾਛੇ ਆਨਦੁ ਪ੍ਰਭਿ ਕੀਤਾ ॥
ਪਰਮੇਸੁਰਿ ਬਣਤ ਬਣਾਈ ॥
ਫਿਰਿ ਡੋਲਤ ਕਤਹੂ ਨਾਹੀ ॥੧॥
ਸਾਚੇ ਸਾਹਿਬ ਸਿਉ ਮਨੁ ਮਾਨਿਆ ॥
ਹਰਿ ਸਰਬ ਨਿਰੰਤਰਿ ਜਾਨਿਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਆਗੈ ਸੁਖੁ ਮੇਰੇ ਮੀਤਾ ॥
ਪਾਛੇ ਆਨਦੁ ਪ੍ਰਭਿ ਕੀਤਾ ॥
ਪਰਮੇਸੁਰਿ ਬਣਤ ਬਣਾਈ ॥
ਫਿਰਿ ਡੋਲਤ ਕਤਹੂ ਨਾਹੀ ॥੧॥
ਸਾਚੇ ਸਾਹਿਬ ਸਿਉ ਮਨੁ ਮਾਨਿਆ ॥
ਹਰਿ ਸਰਬ ਨਿਰੰਤਰਿ ਜਾਨਿਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
सोरठि महला ५ ॥
आगै सुखु मेरे मीता ॥
पाछे आनदु प्रभि कीता ॥
परमेसुरि बणत बणाई ॥
फिरि डोलत कतहू नाही ॥१॥
साचे साहिब सिउ मनु मानिआ ॥
हरि सरब निरंतरि जानिआ ॥१॥ रहाउ ॥
आगै सुखु मेरे मीता ॥
पाछे आनदु प्रभि कीता ॥
परमेसुरि बणत बणाई ॥
फिरि डोलत कतहू नाही ॥१॥
साचे साहिब सिउ मनु मानिआ ॥
हरि सरब निरंतरि जानिआ ॥१॥ रहाउ ॥
हिन्दी अर्थ: सोरठि महला ५ ॥ हे मेरे मित्र ! जिस मनुष्य के आगे आने वाले जीवन में प्रभू ने सुख बना दिया। जिसके बीत चुके जीवन में भी प्रभू ने आनंद बनाए रखा। जिस मनुष्य के लिए परमेश्वर ने ऐसी योजना बना रखी। वह मनुष्य (लोक-परलोक में) कहीं भी डोलता नहीं। 1। हे भाई ! जिस मनुष्य का मन सदा कायम रहने वाले मालिक (के नाम) से पतीज जाता है। वह मनुष्य उस मालिक प्रभू को सब में एक-रस बसता पहचान लेता है। 1।रहाउ।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 629 है, राग सोरठ का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
दिल्ली के Sunday-morning के bhajan-मण्डली, घर में dadiji सुन रहीं।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 61 पंक्तियों का है, 6 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 629” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: सोरठ राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 630 →, पीछे का: ← अंग 628।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।