अंग 631

अंग
631
राग सोरठ
राग: सोरठ · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਅਪਨੇ ਗੁਰ ਊਪਰਿ ਕੁਰਬਾਨੁ ॥
ਭਏ ਕਿਰਪਾਲ ਪੂਰਨ ਪ੍ਰਭ ਦਾਤੇ ਜੀਅ ਹੋਏ ਮਿਹਰਵਾਨ ॥ ਰਹਾਉ ॥
ਨਾਨਕ ਜਨ ਸਰਨਾਈ ॥
ਜਿਨਿ ਪੂਰਨ ਪੈਜ ਰਖਾਈ ॥
ਸਗਲੇ ਦੂਖ ਮਿਟਾਈ ॥
ਸੁਖੁ ਭੁੰਚਹੁ ਮੇਰੇ ਭਾਈ ॥੨॥੨੮॥੯੨॥
अपने गुर ऊपरि कुरबानु ॥
भए किरपाल पूरन प्रभ दाते जीअ होए मिहरवान ॥ रहाउ ॥
नानक जन सरनाई ॥
जिनि पूरन पैज रखाई ॥
सगले दूख मिटाई ॥
सुखु भुंचहु मेरे भाई ॥२॥२८॥९२॥

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! मैं अपने गुरू से सदके जाता हूँ। (जिसकी मेहर से) सर्व-व्यापक दातार प्रभू जी (सेवकों पर) कृपाल होते हैं।सारें जीवों पर मेहरवान होते हैं।रहाउ। हे दास नानक ! (कह,) हे मेरे भाईयो ! उस परमात्मा की शरण पड़े रहो। जिस ने (शरण आए मनुष्यों की) इज्जत (दुखों-विकारों के मुकाबले पर) अच्छी तरह रख ली। जिसने उनके सारे दुख दूर कर दिए। हे भाईओ ! (तुम भी उसकी शरण पड़ कर) आत्मिक आनंद लो। 2। 28। 92।
ਸੋਰਠਿ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਸੁਨਹੁ ਬਿਨੰਤੀ ਠਾਕੁਰ ਮੇਰੇ ਜੀਅ ਜੰਤ ਤੇਰੇ ਧਾਰੇ ॥
ਰਾਖੁ ਪੈਜ ਨਾਮ ਅਪੁਨੇ ਕੀ ਕਰਨ ਕਰਾਵਨਹਾਰੇ ॥੧॥
ਪ੍ਰਭ ਜੀਉ ਖਸਮਾਨਾ ਕਰਿ ਪਿਆਰੇ ॥
ਬੁਰੇ ਭਲੇ ਹਮ ਥਾਰੇ ॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸੁਣੀ ਪੁਕਾਰ ਸਮਰਥ ਸੁਆਮੀ ਬੰਧਨ ਕਾਟਿ ਸਵਾਰੇ ॥
ਪਹਿਰਿ ਸਿਰਪਾਉ ਸੇਵਕ ਜਨ ਮੇਲੇ ਨਾਨਕ ਪ੍ਰਗਟ ਪਹਾਰੇ ॥੨॥੨੯॥੯੩॥
सोरठि महला ५ ॥
सुनहु बिनंती ठाकुर मेरे जीअ जंत तेरे धारे ॥
राखु पैज नाम अपुने की करन करावनहारे ॥१॥
प्रभ जीउ खसमाना करि पिआरे ॥
बुरे भले हम थारे ॥ रहाउ ॥
सुणी पुकार समरथ सुआमी बंधन काटि सवारे ॥
पहिरि सिरपाउ सेवक जन मेले नानक प्रगट पहारे ॥२॥२९॥९३॥

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला ५ ॥ हे मेरे ठाकुर ! (मेरी) विनती सुन।सारे छोटे बड़े जीव तेरे ही आसरे हैं हे सब कुछ कर सकने और करा सकने वाले प्रभू !(तेरा नाम है ‘शरण योग’।हम जीव तेरे ही आसरे हैं)तू अपने (इस) नाम की लाज रख (और।हमारे माया के बँधन काट)। 1। हे प्यारे प्रभू जी ! (तू हमारा पति है) पति वाले फर्ज पूरे कर। (चाहे हम) बुरे हैं (चाहे हम) अच्छे हैं।हम तेरे ही हैं (हमारे विकारों के बँधन काट)।रहाउ। हे नानक ! (कह,हे भाई ! जिन सेवकों की) पुकार सब ताकतों के मालिक प्रभू ने सुन ली।उनके (माया के) बँधन काट के प्रभू ने उनके जीवन सुंदर बना दिए। उन सेवकों को दासों को आदर-मान दे के अपने चरणों में मिला लिया।और।संसार में प्रमुख कर दिया। 2। 29। 93।
ਸੋਰਠਿ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਜੀਅ ਜੰਤ ਸਭਿ ਵਸਿ ਕਰਿ ਦੀਨੇ ਸੇਵਕ ਸਭਿ ਦਰਬਾਰੇ ॥
ਅੰਗੀਕਾਰੁ ਕੀਓ ਪ੍ਰਭ ਅਪੁਨੇ ਭਵ ਨਿਧਿ ਪਾਰਿ ਉਤਾਰੇ ॥੧॥
ਸੰਤਨ ਕੇ ਕਾਰਜ ਸਗਲ ਸਵਾਰੇ ॥
ਦੀਨ ਦਇਆਲ ਕ੍ਰਿਪਾਲ ਕ੍ਰਿਪਾ ਨਿਧਿ ਪੂਰਨ ਖਸਮ ਹਮਾਰੇ ॥ ਰਹਾਉ ॥
ਆਉ ਬੈਠੁ ਆਦਰੁ ਸਭ ਥਾਈ ਊਨ ਨ ਕਤਹੂੰ ਬਾਤਾ ॥
ਭਗਤਿ ਸਿਰਪਾਉ ਦੀਓ ਜਨ ਅਪੁਨੇ ਪ੍ਰਤਾਪੁ ਨਾਨਕ ਪ੍ਰਭ ਜਾਤਾ ॥੨॥੩੦॥੯੪॥
सोरठि महला ५ ॥
जीअ जंत सभि वसि करि दीने सेवक सभि दरबारे ॥
अंगीकारु कीओ प्रभ अपुने भव निधि पारि उतारे ॥१॥
संतन के कारज सगल सवारे ॥
दीन दइआल क्रिपाल क्रिपा निधि पूरन खसम हमारे ॥ रहाउ ॥
आउ बैठु आदरु सभ थाई ऊन न कतहूं बाता ॥
भगति सिरपाउ दीओ जन अपुने प्रतापु नानक प्रभ जाता ॥२॥३०॥९४॥

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला ५ ॥ (हमारा पति-प्रभू) संत जनों के सारे काम सँवार देता है (दुनिया के) सारे जीवों को उनके आज्ञाकार बना देता है। सेवकों का सदा पक्ष करता है।और।उनको संसार समुंद्र से पार लंघा लेता है। 1। हे भाई !(हमारा पति-प्रभू) सँत-जनों के सारे काम सँवार देता है। हे भाई ! हमारा पति दीनों पर दया करने वाला है।कृपा का घर है।कृपा का खजाना है।सब ताकतों का मालिक है। हे नानक ! (कह, परमात्मा के सेवकों को संत जनों को) हर जगह आदर मिलता है (हर जगह लोग) स्वागत करते हैं।(संतजनों को) किसी बात की कोई कमी नहीं रहती। परमात्मा अपने सेवकों को भक्ति (का) सिरोपा बख्शता है (इस तरह) परमात्मा का तेज-प्रताप (सारे संसार में) रौशन हो जाता है। 2। 30। 94।
ਸੋਰਠਿ ਮਹਲਾ ੯
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਰੇ ਮਨ ਰਾਮ ਸਿਉ ਕਰਿ ਪ੍ਰੀਤਿ ॥
ਸ੍ਰਵਨ ਗੋਬਿੰਦ ਗੁਨੁ ਸੁਨਉ ਅਰੁ ਗਾਉ ਰਸਨਾ ਗੀਤਿ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਕਰਿ ਸਾਧਸੰਗਤਿ ਸਿਮਰੁ ਮਾਧੋ ਹੋਹਿ ਪਤਿਤ ਪੁਨੀਤ ॥
ਕਾਲੁ ਬਿਆਲੁ ਜਿਉ ਪਰਿਓ ਡੋਲੈ ਮੁਖੁ ਪਸਾਰੇ ਮੀਤ ॥੧॥
ਆਜੁ ਕਾਲਿ ਫੁਨਿ ਤੋਹਿ ਗ੍ਰਸਿ ਹੈ ਸਮਝਿ ਰਾਖਉ ਚੀਤਿ ॥
ਕਹੈ ਨਾਨਕੁ ਰਾਮੁ ਭਜਿ ਲੈ ਜਾਤੁ ਅਉਸਰੁ ਬੀਤ ॥੨॥੧॥
सोरठि महला ९
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
रे मन राम सिउ करि प्रीति ॥
स्रवन गोबिंद गुनु सुनउ अरु गाउ रसना गीति ॥१॥ रहाउ ॥
करि साधसंगति सिमरु माधो होहि पतित पुनीत ॥
कालु बिआलु जिउ परिओ डोलै मुखु पसारे मीत ॥१॥
आजु कालि फुनि तोहि ग्रसि है समझि राखउ चीति ॥
कहै नानकु रामु भजि लै जातु अउसरु बीत ॥२॥१॥

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला ९ ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे (मेरे) मन ! परमात्मा से प्यार बना। (हे भाई !) कानों से परमात्मा की उस्तति सुना कर।और।जीभ से परमात्मा (की सिफत सालाह) के गीत गाया कर।रहाउ। हे भाई ! गुरमुखों की संगत किया कर।परमात्मा का सिमरन करता रह।(सिमरन की बरकति से) विकारी भी पवित्र बन जाते हैं। हे मित्र ! (इस काम में आलस ना कर।देख) मौत साँप की तरह मुँह खोल के घूम रही है। 1। हे भाई ! अपने चिक्त में ये बात समझ ले कि (ये मौत) तुझे भी जल्दी ही हड़प कर लेगी। नानक (तुझे) कहता है, (अब अभी वक्त है) परमात्मा का भजन कर ले।ये वक्त गुजरता जा रहा है। 2। 1।
ਸੋਰਠਿ ਮਹਲਾ ੯ ॥
ਮਨ ਕੀ ਮਨ ਹੀ ਮਾਹਿ ਰਹੀ ॥
ਨਾ ਹਰਿ ਭਜੇ ਨ ਤੀਰਥ ਸੇਵੇ ਚੋਟੀ ਕਾਲਿ ਗਹੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਦਾਰਾ ਮੀਤ ਪੂਤ ਰਥ ਸੰਪਤਿ ਧਨ ਪੂਰਨ ਸਭ ਮਹੀ ॥
ਅਵਰ ਸਗਲ ਮਿਥਿਆ ਏ ਜਾਨਉ ਭਜਨੁ ਰਾਮੁ ਕੋ ਸਹੀ ॥੧॥
ਫਿਰਤ ਫਿਰਤ ਬਹੁਤੇ ਜੁਗ ਹਾਰਿਓ ਮਾਨਸ ਦੇਹ ਲਹੀ ॥
ਨਾਨਕ ਕਹਤ ਮਿਲਨ ਕੀ ਬਰੀਆ ਸਿਮਰਤ ਕਹਾ ਨਹੀ ॥੨॥੨॥
सोरठि महला ९ ॥
मन की मन ही माहि रही ॥
ना हरि भजे न तीरथ सेवे चोटी कालि गही ॥१॥ रहाउ ॥
दारा मीत पूत रथ संपति धन पूरन सभ मही ॥
अवर सगल मिथिआ ए जानउ भजनु रामु को सही ॥१॥
फिरत फिरत बहुते जुग हारिओ मानस देह लही ॥
नानक कहत मिलन की बरीआ सिमरत कहा नही ॥२॥२॥

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला ९ ॥ ( हे भाई ! देखो।माया धारी के दुर्भाग्य ! उस के) मन की आस मन में ही रह गई। ना उसने परमात्मा का भजन किया।ना ही उसने संतजनों की सेवा की।और।मौत ने चोटी आ पकड़ी। 1।रहाउ। हे भाई ! स्त्री।मित्र।पुत्र।गाड़ियां।माल असबाब।धन पदार्थ। सारी ही धरती – ये सब कुछ नाशवंत समझो।परमात्मा का भजन (ही) असल (साथी) है। 1। हे भाई ! कई युग (जोनियों में) भटक-भटक के तू थक गया था।(अब) तुझे मनुष्य का शरीर मिला है। नानक कहता है, (हे भाई ! परमात्मा को) मिलने की यही बारी है।अब तू सिमरन क्यों नहीं करता। 2। 2।
ਸੋਰਠਿ ਮਹਲਾ ੯ ॥
ਮਨ ਰੇ ਕਉਨੁ ਕੁਮਤਿ ਤੈ ਲੀਨੀ ॥
ਪਰ ਦਾਰਾ ਨਿੰਦਿਆ ਰਸ ਰਚਿਓ ਰਾਮ ਭਗਤਿ ਨਹਿ ਕੀਨੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਮੁਕਤਿ ਪੰਥੁ ਜਾਨਿਓ ਤੈ ਨਾਹਨਿ ਧਨ ਜੋਰਨ ਕਉ ਧਾਇਆ ॥
सोरठि महला ९ ॥
मन रे कउनु कुमति तै लीनी ॥
पर दारा निंदिआ रस रचिओ राम भगति नहि कीनी ॥१॥ रहाउ ॥
मुकति पंथु जानिओ तै नाहनि धन जोरन कउ धाइआ ॥

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला ९ ॥ हे मन ! तूने कैसी कुबुद्धि ले ली है। तू पराई स्त्री।पराई निंदा के रस में मस्त रहता है।परमात्मा की भक्ति तूने (कभी) नहीं की। 1।रहाउ। हे भाई ! तूने विकारों से खलासी पाने का रास्ता (अभी तक) नहीं समझा।धन एकत्र करने के लिए तू सदा दौड़-भाग करता रहा है।

संदर्भ: यह अंग 631 है, राग सोरठ का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।

M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।

Jor Bagh metro station से Khan Market की 10-मिनट की walk में मन का थमना।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 39 पंक्तियों का है, 6 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 631” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: सोरठ राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 632 →, पीछे का: ← अंग 630

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।