गुरमुखि एक द्रिसटि करि देखहु घटि घटि जोति समोई जीउ ॥2॥
चलतौ ठाकि रखहु घरि अपनै गुर मिलिऐ इह मति होई जीउ ॥
देखि अद्रिसटु रहउ बिसमादी दुखु बिसरै सुखु होई जीउ ॥3॥
पीवहु अपिउ परम सुखु पाईऐ निज घरि वासा होई जीउ ॥
जनम मरण भव भंजनु गाईऐ पुनरपि जनमु न होई जीउ ॥4॥
ततु निरंजनु जोति सबाई सोहं भेदु न कोई जीउ ॥
अपरंपर पारब्रहमु परमेसरु नानक गुरु मिलिआ सोई जीउ ॥5॥11॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जा तिसु भावा तद ही गावा ॥
ता गावे का फलु पावा ॥
गावे का फलु होई ॥ जा आपे देवै सोई ॥1॥
मन मेरे गुर बचनी निधि पाई ॥
ता ते सच महि रहिआ समाई ॥ रहाउ ॥
गुर साखी अंतरि जागी ॥
ता चंचल मति तिआगी ॥
गुर साखी का उजीआरा ॥
ता मिटिआ सगल अंध्यारा ॥2॥
गुर चरनी मनु लागा ॥
ता जम का मारगु भागा ॥
भै विचि निरभउ पाइआ ॥
ता सहजै कै घरि आइआ ॥3॥
भणति नानकु बूझै को बीचारी ॥
इसु जग महि करणी सारी ॥
करणी कीरति होई ॥
जा आपे मिलिआ सोई ॥4॥1॥12॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सेवक सेव करहि सभि तेरी जिन सबदै सादु आइआ ॥
गुर किरपा ते निरमलु होआ जिनि विचहु आपु गवाइआ ॥
अनदिनु गुण गावहि नित साचे गुर कै सबदि सुहाइआ ॥1॥
मेरे ठाकुर हम बारिक सरणि तुमारी ॥
एको सचा सचु तू केवलु आपि मुरारी ॥ रहाउ ॥
जागत रहे तिनी प्रभु पाइआ सबदे हउमै मारी ॥
गिरही महि सदा हरि जन उदासी गिआन तत बीचारी ॥
सतिगुरु सेवि सदा सुखु पाइआ हरि राखिआ उर धारी ॥2॥
इहु मनूआ दह दिसि धावदा दूजै भाइ खुआइआ ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
गुरु नानक की वाणी का अपना मिज़ाज है, सीधा-सादा, बिना अलंकार के, मगर हर पंक्ति में एक ठहराव। 1469 में तलवण्डी में जन्म, सुलतानपुर के बहीखाते में कुछ साल काम, फिर तीस की उम्र के क़रीब वो लम्बी पैदल यात्रा जो काबुल, बग़दाद, मक्का, जगन्नाथ-पुरी, तिब्बत की सरहद तक उन्हें ले गयी। उनके शबद इन्हीं यात्राओं की वाणी हैं।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे मेरे मन ! जो प्रभू आपके अंदर बस रहा है उसको बाहर (सारी कायनात में) देख।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।