अंग
626
राग सोरठ
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਸੁਖ ਸਾਗਰੁ ਗੁਰੁ ਪਾਇਆ ॥ ਤਾ ਸਹਸਾ ਸਗਲ ਮਿਟਾਇਆ ॥੧॥
ਹਰਿ ਕੇ ਨਾਮ ਕੀ ਵਡਿਆਈ ॥
ਆਠ ਪਹਰ ਗੁਣ ਗਾਈ ॥
ਗੁਰ ਪੂਰੇ ਤੇ ਪਾਈ ॥ ਰਹਾਉ ॥
ਪ੍ਰਭ ਕੀ ਅਕਥ ਕਹਾਣੀ ॥
ਜਨ ਬੋਲਹਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਬਾਣੀ ॥
ਨਾਨਕ ਦਾਸ ਵਖਾਣੀ ॥
ਗੁਰ ਪੂਰੇ ਤੇ ਜਾਣੀ ॥੨॥੨॥੬੬॥
ਹਰਿ ਕੇ ਨਾਮ ਕੀ ਵਡਿਆਈ ॥
ਆਠ ਪਹਰ ਗੁਣ ਗਾਈ ॥
ਗੁਰ ਪੂਰੇ ਤੇ ਪਾਈ ॥ ਰਹਾਉ ॥
ਪ੍ਰਭ ਕੀ ਅਕਥ ਕਹਾਣੀ ॥
ਜਨ ਬੋਲਹਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਬਾਣੀ ॥
ਨਾਨਕ ਦਾਸ ਵਖਾਣੀ ॥
ਗੁਰ ਪੂਰੇ ਤੇ ਜਾਣੀ ॥੨॥੨॥੬੬॥
सुख सागरु गुरु पाइआ ॥ ता सहसा सगल मिटाइआ ॥१॥
हरि के नाम की वडिआई ॥
आठ पहर गुण गाई ॥
गुर पूरे ते पाई ॥ रहाउ ॥
प्रभ की अकथ कहाणी ॥
जन बोलहि अंम्रित बाणी ॥
नानक दास वखाणी ॥
गुर पूरे ते जाणी ॥२॥२॥६६॥
हरि के नाम की वडिआई ॥
आठ पहर गुण गाई ॥
गुर पूरे ते पाई ॥ रहाउ ॥
प्रभ की अकथ कहाणी ॥
जन बोलहि अंम्रित बाणी ॥
नानक दास वखाणी ॥
गुर पूरे ते जाणी ॥२॥२॥६६॥
हिन्दी अर्थ: हे भाई ! (जब किसी भाग्यशाली को) सुखों का समुंद्र गुरू मिल गया। तब उसने अपना सारा सहम दूर कर लिया। 1। हे भाई ! परमात्मा के नाम की सिफत सालाह करनी। आठों पहर परमात्मा की सिफत सालाह के गीत गाने- (ये दाति) पूरे गुरू से ही मिलती है।रहाउ। हे भाई ! परमात्मा के स्वरूप की बातचीत बताई नहीं जा सकती। प्रभू के सेवक आत्मिक जीवन देने वाली सिफत सालाह की बाणी उचारते रहते हैं। हे नानक ! वही सेवक ये बाणी उचारते हैं। जिन्होंने पूरे गुरू से ये समझ हासिल की है। 2। 2। 66।
ਸੋਰਠਿ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਆਗੈ ਸੁਖੁ ਗੁਰਿ ਦੀਆ ॥
ਪਾਛੈ ਕੁਸਲ ਖੇਮ ਗੁਰਿ ਕੀਆ ॥
ਸਰਬ ਨਿਧਾਨ ਸੁਖ ਪਾਇਆ ॥
ਗੁਰੁ ਅਪੁਨਾ ਰਿਦੈ ਧਿਆਇਆ ॥੧॥
ਅਪਨੇ ਸਤਿਗੁਰ ਕੀ ਵਡਿਆਈ ॥
ਮਨ ਇਛੇ ਫਲ ਪਾਈ ॥
ਸੰਤਹੁ ਦਿਨੁ ਦਿਨੁ ਚੜੈ ਸਵਾਈ ॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜੀਅ ਜੰਤ ਸਭਿ ਭਏ ਦਇਆਲਾ ਪ੍ਰਭਿ ਅਪਨੇ ਕਰਿ ਦੀਨੇ ॥
ਸਹਜ ਸੁਭਾਇ ਮਿਲੇ ਗੋਪਾਲਾ ਨਾਨਕ ਸਾਚਿ ਪਤੀਨੇ ॥੨॥੩॥੬੭॥
ਆਗੈ ਸੁਖੁ ਗੁਰਿ ਦੀਆ ॥
ਪਾਛੈ ਕੁਸਲ ਖੇਮ ਗੁਰਿ ਕੀਆ ॥
ਸਰਬ ਨਿਧਾਨ ਸੁਖ ਪਾਇਆ ॥
ਗੁਰੁ ਅਪੁਨਾ ਰਿਦੈ ਧਿਆਇਆ ॥੧॥
ਅਪਨੇ ਸਤਿਗੁਰ ਕੀ ਵਡਿਆਈ ॥
ਮਨ ਇਛੇ ਫਲ ਪਾਈ ॥
ਸੰਤਹੁ ਦਿਨੁ ਦਿਨੁ ਚੜੈ ਸਵਾਈ ॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜੀਅ ਜੰਤ ਸਭਿ ਭਏ ਦਇਆਲਾ ਪ੍ਰਭਿ ਅਪਨੇ ਕਰਿ ਦੀਨੇ ॥
ਸਹਜ ਸੁਭਾਇ ਮਿਲੇ ਗੋਪਾਲਾ ਨਾਨਕ ਸਾਚਿ ਪਤੀਨੇ ॥੨॥੩॥੬੭॥
सोरठि महला ५ ॥
आगै सुखु गुरि दीआ ॥
पाछै कुसल खेम गुरि कीआ ॥
सरब निधान सुख पाइआ ॥
गुरु अपुना रिदै धिआइआ ॥१॥
अपने सतिगुर की वडिआई ॥
मन इछे फल पाई ॥
संतहु दिनु दिनु चड़ै सवाई ॥ रहाउ ॥
जीअ जंत सभि भए दइआला प्रभि अपने करि दीने ॥
सहज सुभाइ मिले गोपाला नानक साचि पतीने ॥२॥३॥६७॥
आगै सुखु गुरि दीआ ॥
पाछै कुसल खेम गुरि कीआ ॥
सरब निधान सुख पाइआ ॥
गुरु अपुना रिदै धिआइआ ॥१॥
अपने सतिगुर की वडिआई ॥
मन इछे फल पाई ॥
संतहु दिनु दिनु चड़ै सवाई ॥ रहाउ ॥
जीअ जंत सभि भए दइआला प्रभि अपने करि दीने ॥
सहज सुभाइ मिले गोपाला नानक साचि पतीने ॥२॥३॥६७॥
हिन्दी अर्थ: सोरठि महला ५ ॥ गुरू ने उस मनुष्य को आगे आने वाले जीवन राह में सुख बख्श दिया। बीते समय में भी उसे गुरू ने सुख आनंद दिया। 1। उसने सारे (आत्मिक) खजाने सारे आनंद प्राप्त कर लिए। हे संत जनो ! जिस मनुष्य ने अपने गुरू को (अपने) हृदय में बसा लिया। हे संत जनो ! (देखो) अपने गुरू की ऊँची आत्मिक अवस्था। (जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है वह) मन-मांगी मुरादें प्राप्त कर लेता है। गुरू की ये उदारता दिनो दिन बढ़ती चली जाती है।रहाउ। हे संत जनो ! (जो भी जीव गुरू की शरण पड़ते हैं वह) सारे ही जीव दया-भरपूर (हृदय वाले) हो जाते हैं।प्रभू उन्हें अपने बना लेता है। हे नानक ! (अंदर पैदा हो चुकी) आत्मिक अडोलता और प्रीति के कारण उन्हें सृष्टि का पालक-प्रभू मिल जाता है।वह सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा (की याद) में मगन रहते हैं। 2। 3। 67।
ਸੋਰਠਿ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਗੁਰ ਕਾ ਸਬਦੁ ਰਖਵਾਰੇ ॥
ਚਉਕੀ ਚਉਗਿਰਦ ਹਮਾਰੇ ॥
ਰਾਮ ਨਾਮਿ ਮਨੁ ਲਾਗਾ ॥
ਜਮੁ ਲਜਾਇ ਕਰਿ ਭਾਗਾ ॥੧॥
ਪ੍ਰਭ ਜੀ ਤੂ ਮੇਰੋ ਸੁਖਦਾਤਾ ॥
ਬੰਧਨ ਕਾਟਿ ਕਰੇ ਮਨੁ ਨਿਰਮਲੁ ਪੂਰਨ ਪੁਰਖੁ ਬਿਧਾਤਾ ॥ ਰਹਾਉ ॥
ਨਾਨਕ ਪ੍ਰਭੁ ਅਬਿਨਾਸੀ ॥
ਤਾ ਕੀ ਸੇਵ ਨ ਬਿਰਥੀ ਜਾਸੀ ॥
ਅਨਦ ਕਰਹਿ ਤੇਰੇ ਦਾਸਾ ॥
ਜਪਿ ਪੂਰਨ ਹੋਈ ਆਸਾ ॥੨॥੪॥੬੮॥
ਗੁਰ ਕਾ ਸਬਦੁ ਰਖਵਾਰੇ ॥
ਚਉਕੀ ਚਉਗਿਰਦ ਹਮਾਰੇ ॥
ਰਾਮ ਨਾਮਿ ਮਨੁ ਲਾਗਾ ॥
ਜਮੁ ਲਜਾਇ ਕਰਿ ਭਾਗਾ ॥੧॥
ਪ੍ਰਭ ਜੀ ਤੂ ਮੇਰੋ ਸੁਖਦਾਤਾ ॥
ਬੰਧਨ ਕਾਟਿ ਕਰੇ ਮਨੁ ਨਿਰਮਲੁ ਪੂਰਨ ਪੁਰਖੁ ਬਿਧਾਤਾ ॥ ਰਹਾਉ ॥
ਨਾਨਕ ਪ੍ਰਭੁ ਅਬਿਨਾਸੀ ॥
ਤਾ ਕੀ ਸੇਵ ਨ ਬਿਰਥੀ ਜਾਸੀ ॥
ਅਨਦ ਕਰਹਿ ਤੇਰੇ ਦਾਸਾ ॥
ਜਪਿ ਪੂਰਨ ਹੋਈ ਆਸਾ ॥੨॥੪॥੬੮॥
सोरठि महला ५ ॥
गुर का सबदु रखवारे ॥
चउकी चउगिरद हमारे ॥
राम नामि मनु लागा ॥
जमु लजाइ करि भागा ॥१॥
प्रभ जी तू मेरो सुखदाता ॥
बंधन काटि करे मनु निरमलु पूरन पुरखु बिधाता ॥ रहाउ ॥
नानक प्रभु अबिनासी ॥
ता की सेव न बिरथी जासी ॥
अनद करहि तेरे दासा ॥
जपि पूरन होई आसा ॥२॥४॥६८॥
गुर का सबदु रखवारे ॥
चउकी चउगिरद हमारे ॥
राम नामि मनु लागा ॥
जमु लजाइ करि भागा ॥१॥
प्रभ जी तू मेरो सुखदाता ॥
बंधन काटि करे मनु निरमलु पूरन पुरखु बिधाता ॥ रहाउ ॥
नानक प्रभु अबिनासी ॥
ता की सेव न बिरथी जासी ॥
अनद करहि तेरे दासा ॥
जपि पूरन होई आसा ॥२॥४॥६८॥
हिन्दी अर्थ: सोरठि महला ५ ॥ (हे भाई ! विकारों के मुकाबले में) गुरू का शबद ही हम जीवों का रखवाला है। शबद ही (हमें विकारों से बचाने के लिए) हमारे चारों तरफ पहरा है। (गुरू के शबद की बरकति से जिस मनुष्य का) मन परमात्मा के नाम में जुड़ता है।उससे (विकार तो एक तरफ रहे। ) जम (भी) शर्मिंदा हो के भाग जाता है। 1। हे प्रभू जी ! मेरे लिए तो तू ही सुखों का दाता है। (हे भाई ! जो मनुष्य प्रभू के नाम में मन जोड़ता है) सर्व-व्यापक सृजनहार प्रभू (उसके माया के मोह आदि के सारे) बंधन काट के उसके मन को पवित्र कर देता है।रहाउ। हे नानक ! (कह,) अविनाशी प्रभू (ऐसा उदार-चिक्त है कि) उसकी की हुई सेवा-भक्ति व्यर्थ नहीं जाती। हे प्रभू ! तेरे सेवक (सदा) आत्मिक आनंद भोगते हैं। तेरा नाम जप के उनकी हरेक मनोकामना पूरी हो जाती है। 2। 4। 68।
ਸੋਰਠਿ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਗੁਰ ਅਪੁਨੇ ਬਲਿਹਾਰੀ ॥
ਜਿਨਿ ਪੂਰਨ ਪੈਜ ਸਵਾਰੀ ॥
ਮਨ ਚਿੰਦਿਆ ਫਲੁ ਪਾਇਆ ॥
ਪ੍ਰਭੁ ਅਪੁਨਾ ਸਦਾ ਧਿਆਇਆ ॥੧॥
ਸੰਤਹੁ ਤਿਸੁ ਬਿਨੁ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਈ ॥
ਕਰਣ ਕਾਰਣ ਪ੍ਰਭੁ ਸੋਈ ॥ ਰਹਾਉ ॥
ਪ੍ਰਭਿ ਅਪਨੈ ਵਰ ਦੀਨੇ ॥
ਸਗਲ ਜੀਅ ਵਸਿ ਕੀਨੇ ॥
ਜਨ ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇਆ ॥
ਤਾ ਸਗਲੇ ਦੂਖ ਮਿਟਾਇਆ ॥੨॥੫॥੬੯॥
ਗੁਰ ਅਪੁਨੇ ਬਲਿਹਾਰੀ ॥
ਜਿਨਿ ਪੂਰਨ ਪੈਜ ਸਵਾਰੀ ॥
ਮਨ ਚਿੰਦਿਆ ਫਲੁ ਪਾਇਆ ॥
ਪ੍ਰਭੁ ਅਪੁਨਾ ਸਦਾ ਧਿਆਇਆ ॥੧॥
ਸੰਤਹੁ ਤਿਸੁ ਬਿਨੁ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਈ ॥
ਕਰਣ ਕਾਰਣ ਪ੍ਰਭੁ ਸੋਈ ॥ ਰਹਾਉ ॥
ਪ੍ਰਭਿ ਅਪਨੈ ਵਰ ਦੀਨੇ ॥
ਸਗਲ ਜੀਅ ਵਸਿ ਕੀਨੇ ॥
ਜਨ ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇਆ ॥
ਤਾ ਸਗਲੇ ਦੂਖ ਮਿਟਾਇਆ ॥੨॥੫॥੬੯॥
सोरठि महला ५ ॥
गुर अपुने बलिहारी ॥
जिनि पूरन पैज सवारी ॥
मन चिंदिआ फलु पाइआ ॥
प्रभु अपुना सदा धिआइआ ॥१॥
संतहु तिसु बिनु अवरु न कोई ॥
करण कारण प्रभु सोई ॥ रहाउ ॥
प्रभि अपनै वर दीने ॥
सगल जीअ वसि कीने ॥
जन नानक नामु धिआइआ ॥
ता सगले दूख मिटाइआ ॥२॥५॥६९॥
गुर अपुने बलिहारी ॥
जिनि पूरन पैज सवारी ॥
मन चिंदिआ फलु पाइआ ॥
प्रभु अपुना सदा धिआइआ ॥१॥
संतहु तिसु बिनु अवरु न कोई ॥
करण कारण प्रभु सोई ॥ रहाउ ॥
प्रभि अपनै वर दीने ॥
सगल जीअ वसि कीने ॥
जन नानक नामु धिआइआ ॥
ता सगले दूख मिटाइआ ॥२॥५॥६९॥
हिन्दी अर्थ: सोरठि महला ५ ॥ हे संत जनो ! मैं अपने गुरू से कुर्बान जाता हूँ। जिसने (प्रभू के नाम की दाति दे के) पूरी तरह से (मेरी) इज्जत रख ली है। वह मन-मांगी मुरादें प्राप्त कर लेता है। हे भाई ! जो भी मनुष्य सदा अपने प्रभू का ध्यान धरता है 1। हे संत जनो ! उस परमात्मा के बिना (जीवों का) कोई और (रक्षक) नहीं। वही परमात्मा जगत का मूल है।रहाउ। हे संत जनो ! प्यारे प्रभू ने (जीवों को) सब वर दिए हुए हैं। सारे जीवों को उसने अपने वश में किया हुआ है। हे दास नानक ! (कह, जब भी किसी ने) परमात्मा का नाम सिमरा। तब उसने अपने सारे दुख दूर कर लिए। 2। 5। 69।
ਸੋਰਠਿ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਤਾਪੁ ਗਵਾਇਆ ਗੁਰਿ ਪੂਰੇ ॥
ਵਾਜੇ ਅਨਹਦ ਤੂਰੇ ॥
ਸਰਬ ਕਲਿਆਣ ਪ੍ਰਭਿ ਕੀਨੇ ॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਆਪਿ ਦੀਨੇ ॥੧॥
ਬੇਦਨ ਸਤਿਗੁਰਿ ਆਪਿ ਗਵਾਈ ॥
ਸਿਖ ਸੰਤ ਸਭਿ ਸਰਸੇ ਹੋਏ ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਧਿਆਈ ॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜੋ ਮੰਗਹਿ ਸੋ ਲੇਵਹਿ ॥
ਪ੍ਰਭ ਅਪਣਿਆ ਸੰਤਾ ਦੇਵਹਿ ॥
ਹਰਿ ਗੋਵਿਦੁ ਪ੍ਰਭਿ ਰਾਖਿਆ ॥
ਜਨ ਨਾਨਕ ਸਾਚੁ ਸੁਭਾਖਿਆ ॥੨॥੬॥੭੦॥
ਤਾਪੁ ਗਵਾਇਆ ਗੁਰਿ ਪੂਰੇ ॥
ਵਾਜੇ ਅਨਹਦ ਤੂਰੇ ॥
ਸਰਬ ਕਲਿਆਣ ਪ੍ਰਭਿ ਕੀਨੇ ॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਆਪਿ ਦੀਨੇ ॥੧॥
ਬੇਦਨ ਸਤਿਗੁਰਿ ਆਪਿ ਗਵਾਈ ॥
ਸਿਖ ਸੰਤ ਸਭਿ ਸਰਸੇ ਹੋਏ ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਧਿਆਈ ॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜੋ ਮੰਗਹਿ ਸੋ ਲੇਵਹਿ ॥
ਪ੍ਰਭ ਅਪਣਿਆ ਸੰਤਾ ਦੇਵਹਿ ॥
ਹਰਿ ਗੋਵਿਦੁ ਪ੍ਰਭਿ ਰਾਖਿਆ ॥
ਜਨ ਨਾਨਕ ਸਾਚੁ ਸੁਭਾਖਿਆ ॥੨॥੬॥੭੦॥
सोरठि महला ५ ॥
तापु गवाइआ गुरि पूरे ॥
वाजे अनहद तूरे ॥
सरब कलिआण प्रभि कीने ॥
करि किरपा आपि दीने ॥१॥
बेदन सतिगुरि आपि गवाई ॥
सिख संत सभि सरसे होए हरि हरि नामु धिआई ॥ रहाउ ॥
जो मंगहि सो लेवहि ॥
प्रभ अपणिआ संता देवहि ॥
हरि गोविदु प्रभि राखिआ ॥
जन नानक साचु सुभाखिआ ॥२॥६॥७०॥
तापु गवाइआ गुरि पूरे ॥
वाजे अनहद तूरे ॥
सरब कलिआण प्रभि कीने ॥
करि किरपा आपि दीने ॥१॥
बेदन सतिगुरि आपि गवाई ॥
सिख संत सभि सरसे होए हरि हरि नामु धिआई ॥ रहाउ ॥
जो मंगहि सो लेवहि ॥
प्रभ अपणिआ संता देवहि ॥
हरि गोविदु प्रभि राखिआ ॥
जन नानक साचु सुभाखिआ ॥२॥६॥७०॥
हिन्दी अर्थ: सोरठि महला ५ ॥ पूरे गुरू ने (हरी नाम की दवा दे के जिस मनुष्य के अंदर से) ताप दूर कर दिया। (उसके अंदर आत्मिक आनंद के।मानो) एक-रस बाजे बजने लग पड़े। प्रभू ने पूर्ण कल्याण किया है और कृपा करके खुद ही वह सारे सुख आनंद बख्श दिए है । 1। (जिसने भी परमात्मा का नाम सिमरा) गुरू ने खुद (उसकी हरेक) पीड़ा दूर कर दी। हे भाई ! सारे सिख संत परमात्मा का नाम सिमर सिमर के आनंद भरपूर हुए रहते हैं।रहाउ। हे प्रभू ! (तेरे दर से तेरे संत जन) जो कुछ माँगते हैं।वह हासिल कर लेते हैं। तू अपने संतों को (खुद सब कुछ) देता है। (हे भाई ! बालक) हरि गोबिंद को (भी) प्रभू ने (खुद) बचाया है (किसी देवी आदि ने नहीं)। हे दास नानक ! (कह,) मैं तो सदा स्थिर रहने वाले प्रभू का नाम ही उचारता हूँ। 2। 6। 70।
ਸੋਰਠਿ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਸੋਈ ਕਰਾਇ ਜੋ ਤੁਧੁ ਭਾਵੈ ॥
ਮੋਹਿ ਸਿਆਣਪ ਕਛੂ ਨ ਆਵੈ ॥
ਹਮ ਬਾਰਿਕ ਤਉ ਸਰਣਾਈ ॥
ਪ੍ਰਭਿ ਆਪੇ ਪੈਜ ਰਖਾਈ ॥੧॥
ਮੇਰਾ ਮਾਤ ਪਿਤਾ ਹਰਿ ਰਾਇਆ ॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਪ੍ਰਤਿਪਾਲਣ ਲਾਗਾ ਕਰਂੀ ਤੇਰਾ ਕਰਾਇਆ ॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜੀਅ ਜੰਤ ਤੇਰੇ ਧਾਰੇ ॥
ਪ੍ਰਭ ਡੋਰੀ ਹਾਥਿ ਤੁਮਾਰੇ ॥
ਸੋਈ ਕਰਾਇ ਜੋ ਤੁਧੁ ਭਾਵੈ ॥
ਮੋਹਿ ਸਿਆਣਪ ਕਛੂ ਨ ਆਵੈ ॥
ਹਮ ਬਾਰਿਕ ਤਉ ਸਰਣਾਈ ॥
ਪ੍ਰਭਿ ਆਪੇ ਪੈਜ ਰਖਾਈ ॥੧॥
ਮੇਰਾ ਮਾਤ ਪਿਤਾ ਹਰਿ ਰਾਇਆ ॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਪ੍ਰਤਿਪਾਲਣ ਲਾਗਾ ਕਰਂੀ ਤੇਰਾ ਕਰਾਇਆ ॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜੀਅ ਜੰਤ ਤੇਰੇ ਧਾਰੇ ॥
ਪ੍ਰਭ ਡੋਰੀ ਹਾਥਿ ਤੁਮਾਰੇ ॥
सोरठि महला ५ ॥
सोई कराइ जो तुधु भावै ॥
मोहि सिआणप कछू न आवै ॥
हम बारिक तउ सरणाई ॥
प्रभि आपे पैज रखाई ॥१॥
मेरा मात पिता हरि राइआ ॥
करि किरपा प्रतिपालण लागा करंी तेरा कराइआ ॥ रहाउ ॥
जीअ जंत तेरे धारे ॥
प्रभ डोरी हाथि तुमारे ॥
सोई कराइ जो तुधु भावै ॥
मोहि सिआणप कछू न आवै ॥
हम बारिक तउ सरणाई ॥
प्रभि आपे पैज रखाई ॥१॥
मेरा मात पिता हरि राइआ ॥
करि किरपा प्रतिपालण लागा करंी तेरा कराइआ ॥ रहाउ ॥
जीअ जंत तेरे धारे ॥
प्रभ डोरी हाथि तुमारे ॥
हिन्दी अर्थ: सोरठि महला ५ ॥ हे प्रभू पातशाह ! तू मुझसे वही काम करवाया कर जो तूझे अच्छा लगता है। मुझे कोई समझदारी वाली बात करनी नहीं आती। हे प्रभू ! हम (तेरे) बच्चे तेरी शरण आए हैं। हे भाई ! (शरण पड़े जीव की) प्रभू ने खुद ही इज्जत (हमेशा) रखवाई है। 1। हे प्रभू पातशाह ! तू ही मेरी माँ है।तू ही मेरा पिता है। मेहर करके तू खुद ही मेरी पालना कर रहा है।हे प्रभू ! मैं वही कुछ करता हूँ।जो तू मुझसे करवाता है।रहाउ। सारे जीव तेरे ही आसरे हैं। हे प्रभू ! (हम जीवों की जिंदगी की) डोर तेरे हाथ में है।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 626 है, राग सोरठ का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
Chittaranjan Park के Bengali-दुर्गा-puja के बीच पंडाल में किसी quiet pause में।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 60 पंक्तियों का है, 6 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 626” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: सोरठ राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 627 →, पीछे का: ← अंग 625।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।