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अंग 600

अंग
600
राग सोरठ
राग: सोरठ · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
मनमुख मुगधु हरि नामु न चेतै बिरथा जनमु गवाइआ ॥
सतिगुरु भेटे ता नाउ पाए हउमै मोहु चुकाइआ ॥3॥
हरि जन साचे साचु कमावहि गुर कै सबदि वीचारी ॥
आपे मेलि लए प्रभि साचै साचु रखिआ उर धारी ॥
नानक नावहु गति मति पाई एहा रासि हमारी ॥4॥1॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: अपने मन के पीछे चलने वाला मूर्ख मनुष्य परमात्मा का नाम याद नहीं करता।अपना जीवन व्यर्थ गवा लेता है। पर जब उसे गुरू मिल जाता है तब वह हरी नाम की दाति हासिल करता है।और।अपने अंदर से माया का मोह और अहंकार दूर कर लेता है। 3। हे भाई ! गुरू के शबद के द्वारा विचारवान हो के परमात्मा के दास सदा स्थिर परमात्मा का सदा-स्थिर नाम-सिमरन की कमाई करते रहते हैं। सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा ने स्वयं ही उनको अपने चरणों में मिला लिया होता है।वह सदा कायम रहने वाले प्रभू को अपने दिल में बसाए रखते हैं। हे नानक ! (कह) परमात्मा के नाम से ही ऊँची आत्मिक अवस्था और (अच्छी) बुद्धि प्राप्त होती है।परमात्मा का नाम ही हम (जीवों का) सरमाया है। 4। 1।
सोरठि महला 3 ॥
भगति खजाना भगतन कउ दीआ नाउ हरि धनु सचु सोइ ॥
अखुटु नाम धनु कदे निखुटै नाही किनै न कीमति होइ ॥
नाम धनि मुख उजले होए हरि पाइआ सचु सोइ ॥1॥
मन मेरे गुर सबदी हरि पाइआ जाइ ॥
बिनु सबदै जगु भुलदा फिरदा दरगह मिलै सजाइ ॥ रहाउ ॥
इसु देही अंदरि पंच चोर वसहि कामु क्रोधु लोभु मोहु अहंकारा ॥
अंम्रितु लूटहि मनमुख नही बूझहि कोइ न सुणै पूकारा ॥
अंधा जगतु अंधु वरतारा बाझु गुरू गुबारा ॥2॥
हउमै मेरा करि करि विगुते किहु चलै न चलदिआ नालि ॥
गुरमुखि होवै सु नामु धिआवै सदा हरि नामु समालि ॥
सची बाणी हरि गुण गावै नदरी नदरि निहालि ॥3॥
सतिगुर गिआनु सदा घटि चानणु अमरु सिरि बादिसाहा ॥
अनदिनु भगति करहि दिनु राती राम नामु सचु लाहा ॥
नानक राम नामि निसतारा सबदि रते हरि पाहा ॥4॥2॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 3 ॥ (हे भाई ! गुरू) भक्त जनों को परमात्मा की भक्ति का खजाना देता है।परमात्मा का नाम ऐसा धन है जो सदा कायम रहता है। हरि-नाम-धन कभी खत्म होने वाला नहीं।ये धन कभी खत्म नहीं होता।किसी से ये मूल्य भी नहीं लिया जा सकता (भाव।कोई मनुष्य इसे दुनियावी पदार्थों से खरीद भी नहीं सकता)। जिन्होंने ये सदा-स्थिर हरी-धन प्राप्त कर लिया।उन्हें इस नाम-धन की बरकति से (लोक-परलोक में) आदर मिलता है। 1। हे मेरे मन ! गुरू के शबद से ही परमात्मा मिल सकता है। शबद के बिना जगत गलत रास्ते पर भटकता फिरता है (आगे परलोक में) प्रभू की दरगाह में दण्ड सहता है।रहाउ। हे भाई ! जिस शरीर में काम-क्रोध-लोभ-मोह-अहंकार पाँच चोर बसते हैं (ये मनुष्य के अंदर) आत्मिक जीवन देने वाला नाम-धन लूटते रहते हैं। अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य को ये बात समझ में नहीं आती।(जब सब कुछ लुटा के वे दुखी होते हैं तब) उनकी कोई पुकार नहीं सुनता (उनकी कोई सहायता नहीं कर सकता)। माया के मोह में अंधा हुआ जगत अंधों वाली करतूत ही करता रहता है।गुरू से बेमुख हो के (इसके आत्मिक जीवन में) अंधकार छाया रहता है। 2। ‘मैं बड़ा हूँ…ये धन-पदार्थ मेरा है’ – ये कह,कह के (माया-ग्रसित मनुष्य) दुखी होते रहते हैं।पर जगत से चलते वक्त कोई भी चीज किसी के साथ नहीं चलती। जो मनुष्य गुरू के सन्मुख रहता है वह सदा परमात्मा के नाम को दिल में बसा के नाम सिमरता रहता है। वह सदा-स्थिर रहने वाली सिफत सालाह की बाणी के द्वारा परमात्मा के गुण गाता रहता है।परमात्मा की मेहर की नजर से वह सदा सुखी रहता है। 3। जिनके हृदय में परमात्मा का बख्शा हुआ ज्ञान सदा प्रकाश किए रखता है उसका हुकम (दुनिया के) बादशाहों के सिर पर (भी) चलता है। वे हर वक्त दिन-रात परमात्मा की भक्ति करते रहते हैं।वे हरी-नाम का लाभ कमाते रहते हैं जो सदा कायम रहता है। हे नानक ! परमात्मा के नाम से संसार से पार-उतारा हो जाता है।जो मनुष्य गुरू के शबद से हरी-नाम के रंग में रंगे रहते हैं।परमात्मा उनके नजदीक बसता है। 4। 2।
सोरठि मः 3 ॥
दासनि दासु होवै ता हरि पाए विचहु आपु गवाई ॥
भगता का कारजु हरि अनंदु है अनदिनु हरि गुण गाई ॥
सबदि रते सदा इक रंगी हरि सिउ रहे समाई ॥1॥
हरि जीउ साची नदरि तुमारी ॥
आपणिआ दासा नो क्रिपा करि पिआरे राखहु पैज हमारी ॥ रहाउ ॥
सबदि सलाही सदा हउ जीवा गुरमती भउ भागा ॥
मेरा प्रभु साचा अति सुआलिउ गुरु सेविआ चितु लागा ॥
साचा सबदु सची सचु बाणी सो जनु अनदिनु जागा ॥2॥
महा गंभीरु सदा सुखदाता तिस का अंतु न पाइआ ॥
पूरे गुर की सेवा कीनी अचिंतु हरि मंनि वसाइआ ॥
मनु तनु निरमलु सदा सुखु अंतरि विचहु भरमु चुकाइआ ॥3॥
हरि का मारगु सदा पंथु विखड़ा को पाए गुर वीचारा ॥
हरि कै रंगि राता सबदे माता हउमै तजे विकारा ॥
नानक नामि रता इक रंगी सबदि सवारणहारा ॥4॥3॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: सोरठि मः 3 ॥ हे भाई ! जो मनुष्य अपने अंदर से स्वै भाव दूर करके बहुत गरीबी स्वभाव वाला बनता है।वह परमात्मा को मिल जाता है। परमात्मा के भक्तों का मुख्य काम यही होता है कि वह (स्वै भाव गवा के) हर वक्त प्रभू की सिफत सालाह के गीत गा के उसके मिलाप का आनंद लेते हैं। भक्तजन गुरू के शबद में सदा एक-रस रंगे रह के परमात्मा (की याद) में लीन रहते हैं। 1। हे प्रभू जी ! आपकी मेहर की निगाह (अपने सेवकों पर) सदा टिकी रहती है। हे प्यारे ! आप अपने दासों पर कृपा करता रहता है।मेरी भी इज्ज़त रख।रहाउ। (हे प्रभू ! अगर आपकी मेहर हैं तो) मैं गुरू के शबद में (जुड़ के) आपकी सिफत सालाह करता रहूँ।जो मनुष्य गुरू की मति पर चलता है उसका डर दूर हैं जाता है। (हे भाई !) मेरा प्रभू सुंदर है।और सदा कायम रहने वाला है।जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है।उसका चित्त (उस सुंदर प्रभू में) मगन रहता है। (जिस मनुष्य के दिल में) सदा-स्थिर प्रभू की सिफत सालाह का शबद।सिफत सालाह की बाणी (बसती है) वह मनुष्य हर वक्त (सिफत सालाह में) सचेत रहता है। 2। हे भाई ! परमात्मा बड़े गहरे जिगरे वाला है।सदा ही (जीवों को) सुख देने वाला है।उसके गुणों का अंत नहीं पाया जा सकता। जो मनुष्य पूरे गुरू की बताई हुई सेवा करता है।उसके मन में वह परमात्मा आ बसता है जिसे कोई चिंता सता नहीं सकती। उस मनुष्य का मन पवित्र हो जाता है हृदय पवित्र हो जाता है।उसके हृदय में सदा सुख ही सुख है।वह अपने अंदर से सदा भटकना दूर कर लेता है। 3। हे भाई ! परमात्मा के मिलाप का रास्ता बड़ा कठिन है।कोई वह विरला मनुष्य ही वह रास्ता पाता है जो गुरू के शबद की विचार करता है। वह मनुष्य प्रभू के प्रेम रंग में रंगा जाता है।गुरू के शबद में मस्त रहता है।अपने अंदर से अहंकार आदि विकार दूर कर देता है। हे नानक ! वह मनुष्य प्रभू के नाम में एक-रस रमा रहता है।जो गुरू के शबद से उसका जीवन सँवार देता है। 4। 3।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “अपने मन के पीछे चलने वाला मूर्ख मनुष्य परमात्मा का नाम याद नहीं करता।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।