अंग 630

अंग
630
राग सोरठ
राग: सोरठ · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਸਭ ਜੀਅ ਤੇਰੇ ਦਇਆਲਾ ॥
ਅਪਨੇ ਭਗਤ ਕਰਹਿ ਪ੍ਰਤਿਪਾਲਾ ॥
ਅਚਰਜੁ ਤੇਰੀ ਵਡਿਆਈ ॥
ਨਿਤ ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਧਿਆਈ ॥੨॥੨੩॥੮੭॥
सभ जीअ तेरे दइआला ॥
अपने भगत करहि प्रतिपाला ॥
अचरजु तेरी वडिआई ॥
नित नानक नामु धिआई ॥२॥२३॥८७॥

हिन्दी अर्थ: हे दया के घर प्रभू ! सारे जीव तेरे पैदा किए हुए हैं। तू अपने भक्तों की रखवाली स्वयं ही करता है। हे प्रभू ! तू आश्चर्य स्वरूप है।तेरी बख्शिश भी हैरान कर देने वाली है। हे नानक ! (कह, जिस मनुष्य पर प्रभू बख्शिश करता है।वह) सदा उसका नाम सिमरता रहता है। 2। 23। 87।
ਸੋਰਠਿ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਨਾਲਿ ਨਰਾਇਣੁ ਮੇਰੈ ॥
ਜਮਦੂਤੁ ਨ ਆਵੈ ਨੇਰੈ ॥
ਕੰਠਿ ਲਾਇ ਪ੍ਰਭ ਰਾਖੈ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਕੀ ਸਚੁ ਸਾਖੈ ॥੧॥
ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਪੂਰੀ ਕੀਤੀ ॥
ਦੁਸਮਨ ਮਾਰਿ ਵਿਡਾਰੇ ਸਗਲੇ ਦਾਸ ਕਉ ਸੁਮਤਿ ਦੀਤੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਪ੍ਰਭਿ ਸਗਲੇ ਥਾਨ ਵਸਾਏ ॥
ਸੁਖਿ ਸਾਂਦਿ ਫਿਰਿ ਆਏ ॥
ਨਾਨਕ ਪ੍ਰਭ ਸਰਣਾਏ ॥
ਜਿਨਿ ਸਗਲੇ ਰੋਗ ਮਿਟਾਏ ॥੨॥੨੪॥੮੮॥
सोरठि महला ५ ॥
नालि नराइणु मेरै ॥
जमदूतु न आवै नेरै ॥
कंठि लाइ प्रभ राखै ॥
सतिगुर की सचु साखै ॥१॥
गुरि पूरै पूरी कीती ॥
दुसमन मारि विडारे सगले दास कउ सुमति दीती ॥१॥ रहाउ ॥
प्रभि सगले थान वसाए ॥
सुखि सांदि फिरि आए ॥
नानक प्रभ सरणाए ॥
जिनि सगले रोग मिटाए ॥२॥२४॥८८॥

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला ५ ॥ हे भाई ! परमात्मा मेरे साथ (मेरे हृदय में बस रहा) है। (उसकी बरकति से) जमदूत मेरे नजदीक नहीं फटकता (मुझे मौत का आत्मिक मौत का खतरा नहीं रहा)। हे भाई ! जिस मनुष्य को गुरू की सदा-स्थिर हरी-नाम-सिमरन की शिक्षा मिल जाती है। प्रभू उस मनुष्य को अपने गले से लगाए रखता है। 1। हे भाई ! जिस मनुष्य को पूरे गुरू ने (जीवन में) सफलता बख्शी। प्रभू ने (कामादिक उसके) सारे ही वैरी समाप्त कर दिए।और।उस सेवक को (नाम सिमरन की) श्रेष्ठ बुद्धि दे दी। 1।रहाउ। (हे भाई ! जिन मनुष्यों को गुरू ने जीवन सफलता बख्शी) प्रभू ने उनके सारी ज्ञानेन्द्रियों को आत्मिक गुणों से भरपूर कर दिया। वह मनुष्य (कामादिक विकारों से) पलट के आत्मिक आनंद में आ टिके। हे नानक ! उस प्रभू की शरण पड़ा रह। जिसने (शरण पड़ों के) सारे रोग दूर कर दिए। 2। 28। 88।
ਸੋਰਠਿ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਸਰਬ ਸੁਖਾ ਕਾ ਦਾਤਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਤਾ ਕੀ ਸਰਨੀ ਪਾਈਐ ॥
ਦਰਸਨੁ ਭੇਟਤ ਹੋਤ ਅਨੰਦਾ ਦੂਖੁ ਗਇਆ ਹਰਿ ਗਾਈਐ ॥੧॥
ਹਰਿ ਰਸੁ ਪੀਵਹੁ ਭਾਈ ॥
ਨਾਮੁ ਜਪਹੁ ਨਾਮੋ ਆਰਾਧਹੁ ਗੁਰ ਪੂਰੇ ਕੀ ਸਰਨਾਈ ॥ ਰਹਾਉ ॥
ਤਿਸਹਿ ਪਰਾਪਤਿ ਜਿਸੁ ਧੁਰਿ ਲਿਖਿਆ ਸੋਈ ਪੂਰਨੁ ਭਾਈ ॥
ਨਾਨਕ ਕੀ ਬੇਨੰਤੀ ਪ੍ਰਭ ਜੀ ਨਾਮਿ ਰਹਾ ਲਿਵ ਲਾਈ ॥੨॥੨੫॥੮੯॥
सोरठि महला ५ ॥
सरब सुखा का दाता सतिगुरु ता की सरनी पाईऐ ॥
दरसनु भेटत होत अनंदा दूखु गइआ हरि गाईऐ ॥१॥
हरि रसु पीवहु भाई ॥
नामु जपहु नामो आराधहु गुर पूरे की सरनाई ॥ रहाउ ॥
तिसहि परापति जिसु धुरि लिखिआ सोई पूरनु भाई ॥
नानक की बेनंती प्रभ जी नामि रहा लिव लाई ॥२॥२५॥८९॥

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला ५ ॥ हे भाई ! गुरू सारे सुखों को देने वाला है।उस (गुरू) की शरण पड़ना चाहिए। गुरू के दर्शन करने से आत्मिक आनंद प्राप्त होता है।हरेक दुख दूर हो जाता है।(गुरू की शरण पड़ कर) परमात्मा की सिफत सालाह करनी चाहिए। 1। हे भाई !परमात्मा का नाम-अमुत पीते रहा करो। पूरे गुरू की शरण पड़ कर परमात्मा का नाम जपा करो।हर वक्त नाम ही सिमरा करो। रहाउ। हे भाई ! (ये नाम की दाति गुरू के दर से) उस मनुष्य को ही मिलती है जिसकी किस्मत में परमात्मा की हजूरी से इसकी प्राप्ती लिखी होती है।वह मनुष्य सर्वगुण संपन्न हो जाता है। हे प्रभू जी ! (तेरे दास) नानक की (भी तेरे दर पर ये) विनती है, मैं तेरे नाम में सुरति जोड़े रखूँ। 2। 25। 89।
ਸੋਰਠਿ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਕਰਨ ਕਰਾਵਨ ਹਰਿ ਅੰਤਰਜਾਮੀ ਜਨ ਅਪੁਨੇ ਕੀ ਰਾਖੈ ॥
ਜੈ ਜੈ ਕਾਰੁ ਹੋਤੁ ਜਗ ਭੀਤਰਿ ਸਬਦੁ ਗੁਰੂ ਰਸੁ ਚਾਖੈ ॥੧॥
ਪ੍ਰਭ ਜੀ ਤੇਰੀ ਓਟ ਗੁਸਾਈ ॥
ਤੂ ਸਮਰਥੁ ਸਰਨਿ ਕਾ ਦਾਤਾ ਆਠ ਪਹਰ ਤੁਮੑ ਧਿਆਈ ॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜੋ ਜਨੁ ਭਜਨੁ ਕਰੇ ਪ੍ਰਭ ਤੇਰਾ ਤਿਸੈ ਅੰਦੇਸਾ ਨਾਹੀ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਚਰਨ ਲਗੇ ਭਉ ਮਿਟਿਆ ਹਰਿ ਗੁਨ ਗਾਏ ਮਨ ਮਾਹੀ ॥੨॥
ਸੂਖ ਸਹਜ ਆਨੰਦ ਘਨੇਰੇ ਸਤਿਗੁਰ ਦੀਆ ਦਿਲਾਸਾ ॥
ਜਿਣਿ ਘਰਿ ਆਏ ਸੋਭਾ ਸੇਤੀ ਪੂਰਨ ਹੋਈ ਆਸਾ ॥੩॥
ਪੂਰਾ ਗੁਰੁ ਪੂਰੀ ਮਤਿ ਜਾ ਕੀ ਪੂਰਨ ਪ੍ਰਭ ਕੇ ਕਾਮਾ ॥
ਗੁਰ ਚਰਨੀ ਲਾਗਿ ਤਰਿਓ ਭਵ ਸਾਗਰੁ ਜਪਿ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮਾ ॥੪॥੨੬॥੯੦॥
सोरठि महला ५ ॥
करन करावन हरि अंतरजामी जन अपुने की राखै ॥
जै जै कारु होतु जग भीतरि सबदु गुरू रसु चाखै ॥१॥
प्रभ जी तेरी ओट गुसाई ॥
तू समरथु सरनि का दाता आठ पहर तुम॑ धिआई ॥ रहाउ ॥
जो जनु भजनु करे प्रभ तेरा तिसै अंदेसा नाही ॥
सतिगुर चरन लगे भउ मिटिआ हरि गुन गाए मन माही ॥२॥
सूख सहज आनंद घनेरे सतिगुर दीआ दिलासा ॥
जिणि घरि आए सोभा सेती पूरन होई आसा ॥३॥
पूरा गुरु पूरी मति जा की पूरन प्रभ के कामा ॥
गुर चरनी लागि तरिओ भव सागरु जपि नानक हरि हरि नामा ॥४॥२६॥९०॥

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला ५ ॥ हे भाई ! सब कुछ कर सकने वाला और जीवों से करा सकने वाला।हरेक के दिल की जानने वाला प्रभू अपने सेवक की (सदा लाज) रखता है। जो सेवक गुरू के शबद को (हृदय में बसाता है।परमात्मा के नाम का) स्वाद चखता है उसकी शोभा (सारे) संसार में होती है। 1। हे (मेरे) प्रभू जी ! हे धरती के पति ! (मुझे) तेरा (ही) आसरा है। तू सब ताकतों का मालिक है।तू (सब जीवों को) सहारा देने वाला है।(मेरे पर मेहर कर) मैं आठों पहर तुझे याद करता रहूँ।रहाउ। हे प्रभू ! जो मनुष्य तेरी भक्ति करता है।उसे कोई चिंता-फिक्र नहीं सता सकता। (जिसके माथे को) गुरू के चरण छूते हैं।उसका हरेक डर मिट जाता है।वह मनुष्य अपने मन में परमात्मा के सिफत सालाह के गीत गाता रहता है। 2। हे सतिगुरू ! जिस मनुष्य को तूने (विकारों से टकराने के लिए) हौसला दिया।उसके अंदर आत्मिक अडोलता के बहुत सुख-आनंद पैदा हो जाते हैं। वह मनुष्य (जीवन खेल) जीत के (जगत में से) शोभा कमा के हृदय-गृह में टिका रहता है।उसकी (हरेक) आशा पूरी हो जाती है। 3। हे नानक ! (कह,) जो गुरू किसी भी तरह की कमी वाला नहीं है (त्रुटिहीन है)।जिस की गुरू की शिक्षा में कमी नहीं।जो गुरू अपना सारा समय पूर्ण प्रभू (के नाम सिमरन के) उद्यमों में लगाता है। उस गुरू के चरणों में लग के।और।परमात्मा का नाम सदा जप के (मैं) संसार समुंद्र से (सही सलामति) पार लांघ रहा हूँ। 4। 26। 90।
ਸੋਰਠਿ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਭਇਓ ਕਿਰਪਾਲੁ ਦੀਨ ਦੁਖ ਭੰਜਨੁ ਆਪੇ ਸਭ ਬਿਧਿ ਥਾਟੀ ॥
ਖਿਨ ਮਹਿ ਰਾਖਿ ਲੀਓ ਜਨੁ ਅਪੁਨਾ ਗੁਰ ਪੂਰੈ ਬੇੜੀ ਕਾਟੀ ॥੧॥
ਮੇਰੇ ਮਨ ਗੁਰ ਗੋਵਿੰਦੁ ਸਦ ਧਿਆਈਐ ॥
ਸਗਲ ਕਲੇਸ ਮਿਟਹਿ ਇਸੁ ਤਨ ਤੇ ਮਨ ਚਿੰਦਿਆ ਫਲੁ ਪਾਈਐ ॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜੀਅ ਜੰਤ ਜਾ ਕੇ ਸਭਿ ਕੀਨੇ ਪ੍ਰਭੁ ਊਚਾ ਅਗਮ ਅਪਾਰਾ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇਆ ਮੁਖ ਊਜਲ ਭਏ ਦਰਬਾਰਾ ॥੨॥੨੭॥੯੧॥
सोरठि महला ५ ॥
भइओ किरपालु दीन दुख भंजनु आपे सभ बिधि थाटी ॥
खिन महि राखि लीओ जनु अपुना गुर पूरै बेड़ी काटी ॥१॥
मेरे मन गुर गोविंदु सद धिआईऐ ॥
सगल कलेस मिटहि इसु तन ते मन चिंदिआ फलु पाईऐ ॥ रहाउ ॥
जीअ जंत जा के सभि कीने प्रभु ऊचा अगम अपारा ॥
साधसंगि नानक नामु धिआइआ मुख ऊजल भए दरबारा ॥२॥२७॥९१॥

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला ५ ॥ हे भाई ! गरीबों के दुख नाश करने वाला परमात्मा (अपने सेवक पर सदा) दयावान होता आया है; उसने स्वयं ही (अपने सेवकों की रक्षा करने की) सारी विधि बनाई है। उसने एक पलक में अपने सेवक को (सदा) बचा लिया।(उसकी मेहर से) पूरे गुरू ने (सेवक के दुखों कलेशों की) बेड़ी काट दी। 1। हे मेरे मन ! सदा गुरू का ध्यान धरना चाहिए। सदा परमात्मा का नाम सिमरना चाहिए (इस उद्यम से) इस शरीर में से सारे दुख-कलेश मिट जाते हैं।और मन मांगी मुरादें हासिल कर ली जाती हैं।रहाउ। हे नानक ! (कह,) सारे जीव-जंतु जिस परमात्मा के पैदा किए हुए हैं वह प्रभू सबसे ऊँचा है।अपहुँच है।बेअंत है। जिन मनुष्यों ने (गुरू की शरण पड़ कर उस परमात्मा का) नाम सिमरा।वे परमात्मा की हजूरी में सुर्खरू हो गए। 2। 27। 91।
ਸੋਰਠਿ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਸਿਮਰਉ ਅਪੁਨਾ ਸਾਂਈ ॥
ਦਿਨਸੁ ਰੈਨਿ ਸਦ ਧਿਆਈ ॥
ਹਾਥ ਦੇਇ ਜਿਨਿ ਰਾਖੇ ॥
ਹਰਿ ਨਾਮ ਮਹਾ ਰਸ ਚਾਖੇ ॥੧॥
सोरठि महला ५ ॥
सिमरउ अपुना सांई ॥
दिनसु रैनि सद धिआई ॥
हाथ देइ जिनि राखे ॥
हरि नाम महा रस चाखे ॥१॥

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला ५ ॥ हे भाई ! मैं (उस) पति-प्रभू (का नाम) सिमरता हूँ। दिन-रात सदा (उसका) ध्यान धरता हूं। जिसने अपना हाथ दे के (उन मनुष्यों को दुखों-विकारों से) बचा लिया जिन्होंने परमात्मा के नाम का श्रेष्ठ रस चखा। 1।

संदर्भ: यह अंग 630 है, राग सोरठ का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।

M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।

New Friends Colony के पाँच-मंज़िला flat की terrace पर रात की हवा।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 45 पंक्तियों का है, 6 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 630” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: सोरठ राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 631 →, पीछे का: ← अंग 629

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।