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अंग 595

अंग
595
राग सोरठ
राग: सोरठ · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुर प्रसादि ॥
सोरठि महला 1 घरु 1 चउपदे ॥
सभना मरणा आइआ वेछोड़ा सभनाह ॥
पुछहु जाइ सिआणिआ आगै मिलणु किनाह ॥
जिन मेरा साहिबु वीसरै वडड़ी वेदन तिनाह ॥1॥
भी सालाहिहु साचा सोइ ॥
जा की नदरि सदा सुखु होइ ॥ रहाउ ॥
वडा करि सालाहणा है भी होसी सोइ ॥
सभना दाता एकु तू माणस दाति न होइ ॥
जो तिसु भावै सो थीऐ रंन कि रुंनै होइ ॥2॥
धरती उपरि कोट गड़ केती गई वजाइ ॥
जो असमानि न मावनी तिन नकि नथा पाइ ॥
जे मन जाणहि सूलीआ काहे मिठा खाहि ॥3॥
नानक अउगुण जेतड़े तेते गली जंजीर ॥
जे गुण होनि त कटीअनि से भाई से वीर ॥
अगै गए न मंनीअनि मारि कढहु वेपीर ॥4॥1॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: ईश्वर एक है, उसका नाम सदैव सत्य है, वह जगत का रचयिता है, सर्वशक्तिमान है, निर्भय है,वह मायातीत अमर है, जन्म-मरण के चक्र से परे है, स्वयंभू है, जो गुरु की बख्शिश से ही मिलता है। सोरठि महला 1 घरु 1 चउपदे ॥ (जो दुनिया के होछे सुखों की खातिर प्रभू को भुला देते हैं) उन सभी को प्रभू चरणों से विछोड़ा रहता है वे सारे पैदा होते मरते ही हैं। (हे भाई !) जा के गुरमुखों के पास से पूछो कि परमात्मा के चरणों का मिलाप किन्हें होता है (क्योंकि सुखी वही हैं जो प्रभू चरणों में जुड़ते हैं)। (ये बात साफ है कि) जिन लोगों को प्यारा मालिक प्रभू भूल जाता है उन्हें बहुत आत्मिक कलेश बना रहता है। 1। (हे भाई !) बार बार उस कायम रहने वाले परमात्मा की सिफत सालाह करते रहो। उसी की मेहर की नजर से सदा स्थिर रहने वाला सुख मिलता है। 1। रहाउ ॥ (हे भाई !) वह परमात्मा (सदा स्थिर है) अब भी मौजूद है आगे भी कायम रहेगा।उसकी सिफत सालाह करो (और कहो) कि वह सबसे बड़ा दाता है। (हे भाई ! कहो- हे प्रभू !) आप सब जीवों को सब दातें देने वाला है।मनुष्य (बिचारे क्या हैं कि उनके) पास कोई दातें हो सकें। (हे भाई !) जो कुछ प्रभू को ठीक लगता है वही होता है (उसकी रजा को मीठा करके मानो।कोई दुख-कलेश आने पर) औरतों की तरह रोने से कोई लाभ नहीं होनें वाला। 2। इस धरती पर अनेकों आए जो किले आदि बना के (अपनी ताकत का) ढोल बजा के (आखिर) चले गए। जो अपनी ताकत के घमण्ड में इतनी गर्दन अकड़ाते हैं कि (जैसे) आसमान के तले भी नहीं समाते।वह परमात्मा उनकी अकड़ भी तोड़ देता है।सो। हे मन ! अगर आप ये समझ ले कि दुनिया के मौज मेलों का नतीजा दुख-कलेश ही है तो दुनियां के भोगों में ही क्यों मस्त रहें। 3। हे नानक ! (दुनिया के सुख भोगने के लिए) जितने भी पाप-विकार हम करते हैं।ये सारे पाप-विकार हमारे गलों में जंजीर बन जाते हैं (ये एक के बाद एक और ही और पापों की तरफ घसीट के ले जाते हैं)। ये पाप-जंजीरें तभी काटी जा सकती हैं यदि हमारे पल्ले गुण हों।गुण ही असल भाई-मित्र हैं। (यहाँ से) हमारे साथ गए हुए पाप-विकार (आगे) आदर नहीं पाते।इन बे-मुर्शिदों को (अभी इसी वक्त) मार के अपने अंदर से निकाल दो। 4। 1।
सोरठि महला 1 घरु 1 ॥
मनु हाली किरसाणी करणी सरमु पाणी तनु खेतु ॥
नामु बीजु संतोखु सुहागा रखु गरीबी वेसु ॥
भाउ करम करि जंमसी से घर भागठ देखु ॥1॥
बाबा माइआ साथि न होइ ॥
इनि माइआ जगु मोहिआ विरला बूझै कोइ ॥ रहाउ ॥
हाणु हटु करि आरजा सचु नामु करि वथु ॥
सुरति सोच करि भांडसाल तिसु विचि तिस नो रखु ॥
वणजारिआ सिउ वणजु करि लै लाहा मन हसु ॥2॥
सुणि सासत सउदागरी सतु घोड़े लै चलु ॥
खरचु बंनु चंगिआईआ मतु मन जाणहि कलु ॥
निरंकार कै देसि जाहि ता सुखि लहहि महलु ॥3॥
लाइ चितु करि चाकरी मंनि नामु करि कंमु ॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 1 घरु 1 ॥ (हे भाई ! सदा साथ निभने वाला धन कमाने के लिए) मन को किसान (जैसा उद्यमी) बना।ऊँचे आचरण को खेती समझ।मेहनत (नाम के फसल के लिए) पानी है।(ये अपना) शरीर (ही) जमीन है। (इस जमीन में) परमात्मा का नाम बीज।(बीज बो के उसे पक्षियों से बचाने के लिए सोहागा फेरना जरूरी है।इसी तरह अगर संतोष वाला जीवन नहीं।तो माया की तृष्णा नाम-बीज को समाप्त कर देगी) संतोष (नाम-बीज को तृष्णा-पक्षियों से बचाने के लिए) सुहागा है।सादा जीवन (नाम-फसल की रक्षा करने के लिए) रखवाला है। (हे भाई ! ऐसी किसानी करने से शरीर-भूमि में) परमात्मा की मेहर से प्रेम पैदा होंगे।देख।(जिन्होंने ऐसी खेती की) उनके हृदय (नाम-धन से) धनाढ हो गऐ। 1। हे भाई ! (यहाँ से चलने के वक्त) माया जीव के साथ नहीं जाती (ये हरेक को पता है फिर भी) इस माया ने सारे जगत को अपने वश में किया हुआ है। कोई विरला मनुष्य समझता है (कि सदा साथ निभने वाला धन और है)। 1।रहाउ। (हे भाई !) उम्र की हरेक सांस को कमाई बना।इस दुकान में सदा-स्थिर रहने वाला हरी का नाम सौदा बना। अपनी सुरति के विचार-मण्डल को बर्तनों की कतार बना।इस बर्तनों की कतार में (बर्तनशाला में) हरी-नाम सौदे को डाल। ये नाम-वाणज्य करने वाले सत्संगियों से मिल के आप भी हरी नाम का व्यापार कर।इस व्यापार से कमाई होगी मन का खिलना। 2। (हे भाई ! सौदागरों की तरह हरी-नाम का सौदागर बन) धर्म-पुस्तकों (का उपदेश) सुना कर।ये हरी-नाम की सौदागिरी है। (सौदागरी का माल असबाब लादने के लिए) उच्च आचरण वाले घोड़े बना के चल।(जिंदगी के सफर में भी खर्च की जरूरत है) अच्छे गुणों को जीवन-यात्रा का खर्च बना। हे मन ! (इस व्यापार के उद्यम को) कल पर ना डालना।इस व्यापार से अगर आप परमात्मा के देश में (परमात्मा के चरणों में) टिक जाएं।तो आत्मिक सुख में जगह तलाश लेगा। 3। (हे भाई ! नौकर रोजी कमाने के लिए मेहनत से मालिक की सेवा करता है।आप भी) पूरे ध्यान से (प्रभू मालिक की) नौकरी कर (जैसे नौकर अपने मालिक के हुकम को भुलाता नहीं।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

नानक की रचनाओं में एक खास तरह की आबजर्वेशनल आँख है। एक पटवारी का पेशा छोड़ कर तीस के बाद के दशकों में वो काबुल, मक्का, अरब, असम, श्रीलंका, और तिब्बत की सरहद तक गए। हर जगह संत-फ़क़ीरों, बादशाहों, और साधारण किसानों से बातचीत की, और उसी बातचीत की पर्तें इन शबदों में बैठी हैं।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “ईश्वर एक है, उसका नाम सदैव सत्य है, वह जगत का रचयिता है, सर्वशक्तिमान है, निर्भय है,वह मायातीत अमर है, जन्म-मरण के चक्र से परे है, स्वयंभू है, जो गुरु की बख्शिश से ही मिलता है।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।