अंग
621
राग सोरठ
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਅਟਲ ਬਚਨੁ ਨਾਨਕ ਗੁਰ ਤੇਰਾ ਸਫਲ ਕਰੁ ਮਸਤਕਿ ਧਾਰਿਆ ॥੨॥੨੧॥੪੯॥
अटल बचनु नानक गुर तेरा सफल करु मसतकि धारिआ ॥२॥२१॥४९॥
हिन्दी अर्थ: हे नानक ! (कह,) हे गुरू ! तेरा (ये) बचन कभी टलने वाला नहीं (कि परमात्मा ही जीव का लोक-परलोक में रक्षक है)।हे गुरू ! तू अपना बरकत भरा हाथ (हम जीवों के) माथे पर रखता है। 2। 21। 49।
ਸੋਰਠਿ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਜੀਅ ਜੰਤ੍ਰ ਸਭਿ ਤਿਸ ਕੇ ਕੀਏ ਸੋਈ ਸੰਤ ਸਹਾਈ ॥
ਅਪੁਨੇ ਸੇਵਕ ਕੀ ਆਪੇ ਰਾਖੈ ਪੂਰਨ ਭਈ ਬਡਾਈ ॥੧॥
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਪੂਰਾ ਮੇਰੈ ਨਾਲਿ ॥
ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਪੂਰੀ ਸਭ ਰਾਖੀ ਹੋਏ ਸਰਬ ਦਇਆਲ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਨਾਨਕੁ ਨਾਮੁ ਧਿਆਏ ਜੀਅ ਪ੍ਰਾਨ ਕਾ ਦਾਤਾ ॥
ਅਪੁਨੇ ਦਾਸ ਕਉ ਕੰਠਿ ਲਾਇ ਰਾਖੈ ਜਿਉ ਬਾਰਿਕ ਪਿਤ ਮਾਤਾ ॥੨॥੨੨॥੫੦॥
ਜੀਅ ਜੰਤ੍ਰ ਸਭਿ ਤਿਸ ਕੇ ਕੀਏ ਸੋਈ ਸੰਤ ਸਹਾਈ ॥
ਅਪੁਨੇ ਸੇਵਕ ਕੀ ਆਪੇ ਰਾਖੈ ਪੂਰਨ ਭਈ ਬਡਾਈ ॥੧॥
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਪੂਰਾ ਮੇਰੈ ਨਾਲਿ ॥
ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਪੂਰੀ ਸਭ ਰਾਖੀ ਹੋਏ ਸਰਬ ਦਇਆਲ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਨਾਨਕੁ ਨਾਮੁ ਧਿਆਏ ਜੀਅ ਪ੍ਰਾਨ ਕਾ ਦਾਤਾ ॥
ਅਪੁਨੇ ਦਾਸ ਕਉ ਕੰਠਿ ਲਾਇ ਰਾਖੈ ਜਿਉ ਬਾਰਿਕ ਪਿਤ ਮਾਤਾ ॥੨॥੨੨॥੫੦॥
सोरठि महला ५ ॥
जीअ जंत्र सभि तिस के कीए सोई संत सहाई ॥
अपुने सेवक की आपे राखै पूरन भई बडाई ॥१॥
पारब्रहमु पूरा मेरै नालि ॥
गुरि पूरै पूरी सभ राखी होए सरब दइआल ॥१॥ रहाउ ॥
अनदिनु नानकु नामु धिआए जीअ प्रान का दाता ॥
अपुने दास कउ कंठि लाइ राखै जिउ बारिक पित माता ॥२॥२२॥५०॥
जीअ जंत्र सभि तिस के कीए सोई संत सहाई ॥
अपुने सेवक की आपे राखै पूरन भई बडाई ॥१॥
पारब्रहमु पूरा मेरै नालि ॥
गुरि पूरै पूरी सभ राखी होए सरब दइआल ॥१॥ रहाउ ॥
अनदिनु नानकु नामु धिआए जीअ प्रान का दाता ॥
अपुने दास कउ कंठि लाइ राखै जिउ बारिक पित माता ॥२॥२२॥५०॥
हिन्दी अर्थ: सोरठि महला ५ ॥ हे भाई ! सारे जीव उस (परमात्मा) के ही पैदा किए हुए हैं; वह परमात्मा ही संत जनों का मददगार रहता है। अपने सेवक की (इज्जत) परमात्मा खुद ही रखता है (उसकी कृपा से ही सेवक की) इज्जत पूरे तौर पर बनी रहती है। 1। हे भाई ! पूर्ण-परमात्मा (सदा) मेरे अंग-संग (मददगार) है। पूरे गुरू ने अच्छी तरह मेरी (इज्जत) रख ली है।गुरू सारे जीवों पर ही दयावान रहता है। 1।रहाउ। हे भाई ! नानक (तो उस परमात्मा का) नाम हर वक्त सिमरता रहता है जो जीवन देने वाला है जो सांसें देने वाला है। हे भाई ! जैसे माता-पिता अपने बच्चों का ध्यान रखते हैं।वैसे ही परमात्मा अपने सेवक को (अपने) गले से लगा के रखता है। 2। 22। 50।
ਸੋਰਠਿ ਮਹਲਾ ੫ ਘਰੁ ੩ ਚਉਪਦੇ
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਮਿਲਿ ਪੰਚਹੁ ਨਹੀ ਸਹਸਾ ਚੁਕਾਇਆ ॥
ਸਿਕਦਾਰਹੁ ਨਹ ਪਤੀਆਇਆ ॥
ਉਮਰਾਵਹੁ ਆਗੈ ਝੇਰਾ ॥
ਮਿਲਿ ਰਾਜਨ ਰਾਮ ਨਿਬੇਰਾ ॥੧॥
ਅਬ ਢੂਢਨ ਕਤਹੁ ਨ ਜਾਈ ॥
ਗੋਬਿਦ ਭੇਟੇ ਗੁਰ ਗੋਸਾਈ ॥ ਰਹਾਉ ॥
ਆਇਆ ਪ੍ਰਭ ਦਰਬਾਰਾ ॥
ਤਾ ਸਗਲੀ ਮਿਟੀ ਪੂਕਾਰਾ ॥
ਲਬਧਿ ਆਪਣੀ ਪਾਈ ॥
ਤਾ ਕਤ ਆਵੈ ਕਤ ਜਾਈ ॥੨॥
ਤਹ ਸਾਚ ਨਿਆਇ ਨਿਬੇਰਾ ॥
ਊਹਾ ਸਮ ਠਾਕੁਰੁ ਸਮ ਚੇਰਾ ॥
ਅੰਤਰਜਾਮੀ ਜਾਨੈ ॥
ਬਿਨੁ ਬੋਲਤ ਆਪਿ ਪਛਾਨੈ ॥੩॥
ਸਰਬ ਥਾਨ ਕੋ ਰਾਜਾ ॥
ਤਹ ਅਨਹਦ ਸਬਦ ਅਗਾਜਾ ॥
ਤਿਸੁ ਪਹਿ ਕਿਆ ਚਤੁਰਾਈ ॥
ਮਿਲੁ ਨਾਨਕ ਆਪੁ ਗਵਾਈ ॥੪॥੧॥੫੧॥
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਮਿਲਿ ਪੰਚਹੁ ਨਹੀ ਸਹਸਾ ਚੁਕਾਇਆ ॥
ਸਿਕਦਾਰਹੁ ਨਹ ਪਤੀਆਇਆ ॥
ਉਮਰਾਵਹੁ ਆਗੈ ਝੇਰਾ ॥
ਮਿਲਿ ਰਾਜਨ ਰਾਮ ਨਿਬੇਰਾ ॥੧॥
ਅਬ ਢੂਢਨ ਕਤਹੁ ਨ ਜਾਈ ॥
ਗੋਬਿਦ ਭੇਟੇ ਗੁਰ ਗੋਸਾਈ ॥ ਰਹਾਉ ॥
ਆਇਆ ਪ੍ਰਭ ਦਰਬਾਰਾ ॥
ਤਾ ਸਗਲੀ ਮਿਟੀ ਪੂਕਾਰਾ ॥
ਲਬਧਿ ਆਪਣੀ ਪਾਈ ॥
ਤਾ ਕਤ ਆਵੈ ਕਤ ਜਾਈ ॥੨॥
ਤਹ ਸਾਚ ਨਿਆਇ ਨਿਬੇਰਾ ॥
ਊਹਾ ਸਮ ਠਾਕੁਰੁ ਸਮ ਚੇਰਾ ॥
ਅੰਤਰਜਾਮੀ ਜਾਨੈ ॥
ਬਿਨੁ ਬੋਲਤ ਆਪਿ ਪਛਾਨੈ ॥੩॥
ਸਰਬ ਥਾਨ ਕੋ ਰਾਜਾ ॥
ਤਹ ਅਨਹਦ ਸਬਦ ਅਗਾਜਾ ॥
ਤਿਸੁ ਪਹਿ ਕਿਆ ਚਤੁਰਾਈ ॥
ਮਿਲੁ ਨਾਨਕ ਆਪੁ ਗਵਾਈ ॥੪॥੧॥੫੧॥
सोरठि महला ५ घरु ३ चउपदे
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मिलि पंचहु नही सहसा चुकाइआ ॥
सिकदारहु नह पतीआइआ ॥
उमरावहु आगै झेरा ॥
मिलि राजन राम निबेरा ॥१॥
अब ढूढन कतहु न जाई ॥
गोबिद भेटे गुर गोसाई ॥ रहाउ ॥
आइआ प्रभ दरबारा ॥
ता सगली मिटी पूकारा ॥
लबधि आपणी पाई ॥
ता कत आवै कत जाई ॥२॥
तह साच निआइ निबेरा ॥
ऊहा सम ठाकुरु सम चेरा ॥
अंतरजामी जानै ॥
बिनु बोलत आपि पछानै ॥३॥
सरब थान को राजा ॥
तह अनहद सबद अगाजा ॥
तिसु पहि किआ चतुराई ॥
मिलु नानक आपु गवाई ॥४॥१॥५१॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मिलि पंचहु नही सहसा चुकाइआ ॥
सिकदारहु नह पतीआइआ ॥
उमरावहु आगै झेरा ॥
मिलि राजन राम निबेरा ॥१॥
अब ढूढन कतहु न जाई ॥
गोबिद भेटे गुर गोसाई ॥ रहाउ ॥
आइआ प्रभ दरबारा ॥
ता सगली मिटी पूकारा ॥
लबधि आपणी पाई ॥
ता कत आवै कत जाई ॥२॥
तह साच निआइ निबेरा ॥
ऊहा सम ठाकुरु सम चेरा ॥
अंतरजामी जानै ॥
बिनु बोलत आपि पछानै ॥३॥
सरब थान को राजा ॥
तह अनहद सबद अगाजा ॥
तिसु पहि किआ चतुराई ॥
मिलु नानक आपु गवाई ॥४॥१॥५१॥
हिन्दी अर्थ: सोरठि महला ५ घरु ३ चउपदे ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे भाई ! नगर के पँचों को मिल के (कामादिक वैरियों पर पड़ रहा) सहम दूर नहीं किया जा सकता। सिकदारों (आगुओं)। लोगों से भी तसल्ली नहीं मिल सकती (कि ये वैरी तंग नहीं करेंगे) सरकारी हाकिमों के आगे भी ये झगड़ा (पेश करने से कुछ नहीं बनता) प्रभू पातशह को मिल के फैसला हो जाता है (और। कामादिक वैरियों का डर खत्म हो जाता है)। 1। तब (कामादिक वैरियों को पड़ रहे सहम से बचने के लिए) किसी और जगह (आसरा) तलाशने की जरूरत नहीं रह गई। जब गोबिंद को।गुरू को सृष्टि के पति को मिल पड़ें।रहाउ। हे भाई ! जब मनुष्य प्रभू की हजूरी में पहुँचता है (चिक्त जोड़ता है)। तब इसकी (कामादिक वैरियों के विरुद्ध) सारी शिकायत समाप्त हो जाती है। तब मनुष्य वह वस्तु हासिल कर लेता है जो सदा इसकी अपनी ही बनी रहती है। तब विकारों के चक्कर में पड़ के भटकने से बच जाता है। 2। हे भाई ! प्रभू की हजूरी में सदा कायम रहने वाले न्याय के अनुसार (कामादिक आदि के साथ हो रही टक्कर का) फैसला हो जाता है। उस दरगाह में (जुल्म करने वालों का कोई लिहाज नहीं किया जाता) मालिक और नौकर को एक समान ही समझा जाता है। हरेक के दिल की जानने वाला प्रभू (हजूरी में पहुँचे हुए सवालिए के दिल की) जानता है। (उसके) बोले बिना वह प्रभू स्वयं (उसके दिल की पीड़ा को) समझ लेता है। 3। हे भाई ! प्रभू सब जगहों का मालिक है। उससे मिलाप-अवस्था में मनुष्य के अंदर प्रभू की सिफत-सालाह की बाणी एक-रस पूरा प्रभाव डाल लेती है (और।मनुष्य पर कामादिक वैरी अपना जोर नहीं डाल सकते)।(पर। हे भाई ! उससे मिलने के लिए) उसके साथ कोई चालाकी नहीं की जा सकती। हे नानक ! (कह, हे भाई ! अगर उससे मिलना है तो) स्वै भाव गवा के (उसको) मिल। 4। 1। 51।
ਸੋਰਠਿ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਹਿਰਦੈ ਨਾਮੁ ਵਸਾਇਹੁ ॥
ਘਰਿ ਬੈਠੇ ਗੁਰੂ ਧਿਆਇਹੁ ॥
ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਸਚੁ ਕਹਿਆ ॥
ਸੋ ਸੁਖੁ ਸਾਚਾ ਲਹਿਆ ॥੧॥
ਅਪੁਨਾ ਹੋਇਓ ਗੁਰੁ ਮਿਹਰਵਾਨਾ ॥
ਅਨਦ ਸੂਖ ਕਲਿਆਣ ਮੰਗਲ ਸਿਉ ਘਰਿ ਆਏ ਕਰਿ ਇਸਨਾਨਾ ॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਾਚੀ ਗੁਰ ਵਡਿਆਈ ॥
ਤਾ ਕੀ ਕੀਮਤਿ ਕਹਣੁ ਨ ਜਾਈ ॥
ਸਿਰਿ ਸਾਹਾ ਪਾਤਿਸਾਹਾ ॥
ਗੁਰ ਭੇਟਤ ਮਨਿ ਓਮਾਹਾ ॥੨॥
ਸਗਲ ਪਰਾਛਤ ਲਾਥੇ ॥
ਮਿਲਿ ਸਾਧਸੰਗਤਿ ਕੈ ਸਾਥੇ ॥
ਗੁਣ ਨਿਧਾਨ ਹਰਿ ਨਾਮਾ ॥
ਜਪਿ ਪੂਰਨ ਹੋਏ ਕਾਮਾ ॥੩॥
ਗੁਰਿ ਕੀਨੋ ਮੁਕਤਿ ਦੁਆਰਾ ॥
ਸਭ ਸ੍ਰਿਸਟਿ ਕਰੈ ਜੈਕਾਰਾ ॥
ਨਾਨਕ ਪ੍ਰਭੁ ਮੇਰੈ ਸਾਥੇ ॥
ਜਨਮ ਮਰਣ ਭੈ ਲਾਥੇ ॥੪॥੨॥੫੨॥
ਹਿਰਦੈ ਨਾਮੁ ਵਸਾਇਹੁ ॥
ਘਰਿ ਬੈਠੇ ਗੁਰੂ ਧਿਆਇਹੁ ॥
ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਸਚੁ ਕਹਿਆ ॥
ਸੋ ਸੁਖੁ ਸਾਚਾ ਲਹਿਆ ॥੧॥
ਅਪੁਨਾ ਹੋਇਓ ਗੁਰੁ ਮਿਹਰਵਾਨਾ ॥
ਅਨਦ ਸੂਖ ਕਲਿਆਣ ਮੰਗਲ ਸਿਉ ਘਰਿ ਆਏ ਕਰਿ ਇਸਨਾਨਾ ॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਾਚੀ ਗੁਰ ਵਡਿਆਈ ॥
ਤਾ ਕੀ ਕੀਮਤਿ ਕਹਣੁ ਨ ਜਾਈ ॥
ਸਿਰਿ ਸਾਹਾ ਪਾਤਿਸਾਹਾ ॥
ਗੁਰ ਭੇਟਤ ਮਨਿ ਓਮਾਹਾ ॥੨॥
ਸਗਲ ਪਰਾਛਤ ਲਾਥੇ ॥
ਮਿਲਿ ਸਾਧਸੰਗਤਿ ਕੈ ਸਾਥੇ ॥
ਗੁਣ ਨਿਧਾਨ ਹਰਿ ਨਾਮਾ ॥
ਜਪਿ ਪੂਰਨ ਹੋਏ ਕਾਮਾ ॥੩॥
ਗੁਰਿ ਕੀਨੋ ਮੁਕਤਿ ਦੁਆਰਾ ॥
ਸਭ ਸ੍ਰਿਸਟਿ ਕਰੈ ਜੈਕਾਰਾ ॥
ਨਾਨਕ ਪ੍ਰਭੁ ਮੇਰੈ ਸਾਥੇ ॥
ਜਨਮ ਮਰਣ ਭੈ ਲਾਥੇ ॥੪॥੨॥੫੨॥
सोरठि महला ५ ॥
हिरदै नामु वसाइहु ॥
घरि बैठे गुरू धिआइहु ॥
गुरि पूरै सचु कहिआ ॥
सो सुखु साचा लहिआ ॥१॥
अपुना होइओ गुरु मिहरवाना ॥
अनद सूख कलिआण मंगल सिउ घरि आए करि इसनाना ॥ रहाउ ॥
साची गुर वडिआई ॥
ता की कीमति कहणु न जाई ॥
सिरि साहा पातिसाहा ॥
गुर भेटत मनि ओमाहा ॥२॥
सगल पराछत लाथे ॥
मिलि साधसंगति कै साथे ॥
गुण निधान हरि नामा ॥
जपि पूरन होए कामा ॥३॥
गुरि कीनो मुकति दुआरा ॥
सभ स्रिसटि करै जैकारा ॥
नानक प्रभु मेरै साथे ॥
जनम मरण भै लाथे ॥४॥२॥५२॥
हिरदै नामु वसाइहु ॥
घरि बैठे गुरू धिआइहु ॥
गुरि पूरै सचु कहिआ ॥
सो सुखु साचा लहिआ ॥१॥
अपुना होइओ गुरु मिहरवाना ॥
अनद सूख कलिआण मंगल सिउ घरि आए करि इसनाना ॥ रहाउ ॥
साची गुर वडिआई ॥
ता की कीमति कहणु न जाई ॥
सिरि साहा पातिसाहा ॥
गुर भेटत मनि ओमाहा ॥२॥
सगल पराछत लाथे ॥
मिलि साधसंगति कै साथे ॥
गुण निधान हरि नामा ॥
जपि पूरन होए कामा ॥३॥
गुरि कीनो मुकति दुआरा ॥
सभ स्रिसटि करै जैकारा ॥
नानक प्रभु मेरै साथे ॥
जनम मरण भै लाथे ॥४॥२॥५२॥
हिन्दी अर्थ: सोरठि महला ५ ॥ हे भाई ! अपने दिल में परमात्मा का नाम बसाए रखो। अंतरात्मे टिक के गुरू का ध्यान धरा करो। जिस मनुष्य को पूरे गुरू ने सदा-स्थिर हरी-नाम (के सिमरन) का उपदेश दिया। उसने वह आत्मिक आनंद पा लिया जो सदा कायम रहता है। 1। हे भाई ! जिन मनुष्यों पर प्यारा गुरू दयावान होता है। वह मनुष्य नाम-जल से मन को पवित्र करके आत्मिक आनंद सुख खुशियों से भरपूर हो के अंतरात्मे टिक जाते हैं (विकार आदि से भटकना हट जाती है)।रहाउ। हे भाई ! गुरू की आत्मिक उच्चता सदा स्थिर रहने वाली है। उसकी कद्र-कीमत बताई नहीं जा सकती। गुरू (दुनिया के) शाहों के सिर पर पातशाह है। गुरू को मिल के मन में (हरी नाम सिमरन का) चाव पैदा हो जाता है। 2। हे भाई ! सारे पाप उतर जाते हैं गुरू की संगति में मिल के । (गुरू की संगति की बरकति से) सारे गुणों के खजाने हरी नाम को जप जप के (जिंदगी के) सारे मनोरथ सफल हो जाते हैं। 3। हे भाई ! गुरू ने (हरी-नाम सिमरन का एक ऐसा) दरवाजा तैयार कर दिया है ( जो विकारों से) खलासी (करा देता है)। (गुरू की इस दाति के कारण) सारी सृष्टि (गुरू की) शोभा करती है। हे नानक ! (कह, गुरू की कृपा से हरी का नाम हृदय में बसाने से) परमात्मा मेरे अंग-संग (बसता प्रतीत हो रहा है) मेरे जनम-मरण के सारे डर उतर गए हैं। 4। 2। 52।
ਸੋਰਠਿ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਕਿਰਪਾ ਧਾਰੀ ॥
ਪ੍ਰਭਿ ਪੂਰੀ ਲੋਚ ਹਮਾਰੀ ॥
ਕਰਿ ਇਸਨਾਨੁ ਗ੍ਰਿਹਿ ਆਏ ॥
ਅਨਦ ਮੰਗਲ ਸੁਖ ਪਾਏ ॥੧॥
ਸੰਤਹੁ ਰਾਮ ਨਾਮਿ ਨਿਸਤਰੀਐ ॥
ਊਠਤ ਬੈਠਤ ਹਰਿ ਹਰਿ ਧਿਆਈਐ ਅਨਦਿਨੁ ਸੁਕ੍ਰਿਤੁ ਕਰੀਐ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਕਿਰਪਾ ਧਾਰੀ ॥
ਪ੍ਰਭਿ ਪੂਰੀ ਲੋਚ ਹਮਾਰੀ ॥
ਕਰਿ ਇਸਨਾਨੁ ਗ੍ਰਿਹਿ ਆਏ ॥
ਅਨਦ ਮੰਗਲ ਸੁਖ ਪਾਏ ॥੧॥
ਸੰਤਹੁ ਰਾਮ ਨਾਮਿ ਨਿਸਤਰੀਐ ॥
ਊਠਤ ਬੈਠਤ ਹਰਿ ਹਰਿ ਧਿਆਈਐ ਅਨਦਿਨੁ ਸੁਕ੍ਰਿਤੁ ਕਰੀਐ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
सोरठि महला ५ ॥
गुरि पूरै किरपा धारी ॥
प्रभि पूरी लोच हमारी ॥
करि इसनानु ग्रिहि आए ॥
अनद मंगल सुख पाए ॥१॥
संतहु राम नामि निसतरीऐ ॥
ऊठत बैठत हरि हरि धिआईऐ अनदिनु सुक्रितु करीऐ ॥१॥ रहाउ ॥
गुरि पूरै किरपा धारी ॥
प्रभि पूरी लोच हमारी ॥
करि इसनानु ग्रिहि आए ॥
अनद मंगल सुख पाए ॥१॥
संतहु राम नामि निसतरीऐ ॥
ऊठत बैठत हरि हरि धिआईऐ अनदिनु सुक्रितु करीऐ ॥१॥ रहाउ ॥
हिन्दी अर्थ: सोरठि महला ५ ॥ (हे संत जनो ! जब से) पूरे गुरू ने मेहर की है। प्रभू ने हमारी (नाम सिमरन की) तमन्ना पूरी कर दी है। (नाम सिमरन की बरकति से) आत्मिक स्नान करके हम अंतरात्मे टिके रहते हैं। आत्मिक आनंद आत्मिक खुशियां आत्मिक सुख भोग रहे हैं। 1। हे संत जनो ! परमात्मा के नाम में (जुड़ने से ही संसार समुंद्र से) पार लांघा जा सकता है। (इस वास्ते) उठते-बैठते हर वक्त नाम सिमरन करना चाहिए।(हरी-नाम सिमरन की ये) नेक कमाई हर समय करनी चाहिए। 1।रहाउ।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 621 है, राग सोरठ का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
Dwarka के नए-बसे sector में पहली बार आए परिवार का घर देखना।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 54 पंक्तियों का है, 5 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 621” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: सोरठ राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 622 →, पीछे का: ← अंग 620।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।