अंग
623
राग सोरठ
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਤਿਨਿ ਸਗਲੀ ਲਾਜ ਰਾਖੀ ॥੩॥
ਬੋਲਾਇਆ ਬੋਲੀ ਤੇਰਾ ॥
ਤੂ ਸਾਹਿਬੁ ਗੁਣੀ ਗਹੇਰਾ ॥
ਜਪਿ ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਸਚੁ ਸਾਖੀ ॥
ਅਪੁਨੇ ਦਾਸ ਕੀ ਪੈਜ ਰਾਖੀ ॥੪॥੬॥੫੬॥
ਬੋਲਾਇਆ ਬੋਲੀ ਤੇਰਾ ॥
ਤੂ ਸਾਹਿਬੁ ਗੁਣੀ ਗਹੇਰਾ ॥
ਜਪਿ ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਸਚੁ ਸਾਖੀ ॥
ਅਪੁਨੇ ਦਾਸ ਕੀ ਪੈਜ ਰਾਖੀ ॥੪॥੬॥੫੬॥
तिनि सगली लाज राखी ॥३॥
बोलाइआ बोली तेरा ॥
तू साहिबु गुणी गहेरा ॥
जपि नानक नामु सचु साखी ॥
अपुने दास की पैज राखी ॥४॥६॥५६॥
बोलाइआ बोली तेरा ॥
तू साहिबु गुणी गहेरा ॥
जपि नानक नामु सचु साखी ॥
अपुने दास की पैज राखी ॥४॥६॥५६॥
हिन्दी अर्थ: शबद ने उसकी सारी इज्जत रख ली (उसको विकारों के जाल में फंसने से बचा लिया)। 3। हे प्रभू !जब तू प्रेरणा देता है तब ही मैं तेरी सिफत-सालाह कर सकता हूं। तू हमारा मालिक है।तू गुणों का खजाना है।तू गहरे जिगरे वाला है। हे नानक ! सदा स्थिर प्रभू का नाम जपा कर।यही सदा हामी भरने वाला है। प्रभू अपने सेवक की (सदा) इज्जत रखता आया है। 4। 6। 56।
ਸੋਰਠਿ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਵਿਚਿ ਕਰਤਾ ਪੁਰਖੁ ਖਲੋਆ ॥
ਵਾਲੁ ਨ ਵਿੰਗਾ ਹੋਆ ॥
ਮਜਨੁ ਗੁਰ ਆਂਦਾ ਰਾਸੇ ॥
ਜਪਿ ਹਰਿ ਹਰਿ ਕਿਲਵਿਖ ਨਾਸੇ ॥੧॥
ਸੰਤਹੁ ਰਾਮਦਾਸ ਸਰੋਵਰੁ ਨੀਕਾ ॥
ਜੋ ਨਾਵੈ ਸੋ ਕੁਲੁ ਤਰਾਵੈ ਉਧਾਰੁ ਹੋਆ ਹੈ ਜੀ ਕਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜੈ ਜੈ ਕਾਰੁ ਜਗੁ ਗਾਵੈ ॥
ਮਨ ਚਿੰਦਿਅੜੇ ਫਲ ਪਾਵੈ ॥
ਸਹੀ ਸਲਾਮਤਿ ਨਾਇ ਆਏ ॥ ਅਪਣਾ ਪ੍ਰਭੂ ਧਿਆਏ ॥੨॥
ਸੰਤ ਸਰੋਵਰ ਨਾਵੈ ॥
ਸੋ ਜਨੁ ਪਰਮ ਗਤਿ ਪਾਵੈ ॥
ਮਰੈ ਨ ਆਵੈ ਜਾਈ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਧਿਆਈ ॥੩॥
ਇਹੁ ਬ੍ਰਹਮ ਬਿਚਾਰੁ ਸੁ ਜਾਨੈ ॥
ਜਿਸੁ ਦਇਆਲੁ ਹੋਇ ਭਗਵਾਨੈ ॥
ਬਾਬਾ ਨਾਨਕ ਪ੍ਰਭ ਸਰਣਾਈ ॥
ਸਭ ਚਿੰਤਾ ਗਣਤ ਮਿਟਾਈ ॥੪॥੭॥੫੭॥
ਵਿਚਿ ਕਰਤਾ ਪੁਰਖੁ ਖਲੋਆ ॥
ਵਾਲੁ ਨ ਵਿੰਗਾ ਹੋਆ ॥
ਮਜਨੁ ਗੁਰ ਆਂਦਾ ਰਾਸੇ ॥
ਜਪਿ ਹਰਿ ਹਰਿ ਕਿਲਵਿਖ ਨਾਸੇ ॥੧॥
ਸੰਤਹੁ ਰਾਮਦਾਸ ਸਰੋਵਰੁ ਨੀਕਾ ॥
ਜੋ ਨਾਵੈ ਸੋ ਕੁਲੁ ਤਰਾਵੈ ਉਧਾਰੁ ਹੋਆ ਹੈ ਜੀ ਕਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜੈ ਜੈ ਕਾਰੁ ਜਗੁ ਗਾਵੈ ॥
ਮਨ ਚਿੰਦਿਅੜੇ ਫਲ ਪਾਵੈ ॥
ਸਹੀ ਸਲਾਮਤਿ ਨਾਇ ਆਏ ॥ ਅਪਣਾ ਪ੍ਰਭੂ ਧਿਆਏ ॥੨॥
ਸੰਤ ਸਰੋਵਰ ਨਾਵੈ ॥
ਸੋ ਜਨੁ ਪਰਮ ਗਤਿ ਪਾਵੈ ॥
ਮਰੈ ਨ ਆਵੈ ਜਾਈ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਧਿਆਈ ॥੩॥
ਇਹੁ ਬ੍ਰਹਮ ਬਿਚਾਰੁ ਸੁ ਜਾਨੈ ॥
ਜਿਸੁ ਦਇਆਲੁ ਹੋਇ ਭਗਵਾਨੈ ॥
ਬਾਬਾ ਨਾਨਕ ਪ੍ਰਭ ਸਰਣਾਈ ॥
ਸਭ ਚਿੰਤਾ ਗਣਤ ਮਿਟਾਈ ॥੪॥੭॥੫੭॥
सोरठि महला ५ ॥
विचि करता पुरखु खलोआ ॥
वालु न विंगा होआ ॥
मजनु गुर आंदा रासे ॥
जपि हरि हरि किलविख नासे ॥१॥
संतहु रामदास सरोवरु नीका ॥
जो नावै सो कुलु तरावै उधारु होआ है जी का ॥१॥ रहाउ ॥
जै जै कारु जगु गावै ॥
मन चिंदिअड़े फल पावै ॥
सही सलामति नाइ आए ॥ अपणा प्रभू धिआए ॥२॥
संत सरोवर नावै ॥
सो जनु परम गति पावै ॥
मरै न आवै जाई ॥
हरि हरि नामु धिआई ॥३॥
इहु ब्रहम बिचारु सु जानै ॥
जिसु दइआलु होइ भगवानै ॥
बाबा नानक प्रभ सरणाई ॥
सभ चिंता गणत मिटाई ॥४॥७॥५७॥
विचि करता पुरखु खलोआ ॥
वालु न विंगा होआ ॥
मजनु गुर आंदा रासे ॥
जपि हरि हरि किलविख नासे ॥१॥
संतहु रामदास सरोवरु नीका ॥
जो नावै सो कुलु तरावै उधारु होआ है जी का ॥१॥ रहाउ ॥
जै जै कारु जगु गावै ॥
मन चिंदिअड़े फल पावै ॥
सही सलामति नाइ आए ॥ अपणा प्रभू धिआए ॥२॥
संत सरोवर नावै ॥
सो जनु परम गति पावै ॥
मरै न आवै जाई ॥
हरि हरि नामु धिआई ॥३॥
इहु ब्रहम बिचारु सु जानै ॥
जिसु दइआलु होइ भगवानै ॥
बाबा नानक प्रभ सरणाई ॥
सभ चिंता गणत मिटाई ॥४॥७॥५७॥
हिन्दी अर्थ: सोरठि महला ५ ॥ सर्व-व्यापक करतार खुद उसकी सहायता करता है। (उसकी आत्मिक राशि-पूँजी का) रक्ती भर भी नुकसान नहीं होता। (हे भाई ! साध-संगति में जिस मनुष्य का) आत्मिक स्नान गुरू ने सफल कर दिया। वह मनुष्य सदा परमात्मा का नाम जप-जप के (अपने सारे) पाप नाश कर लेता है।1। हे संत जनो ! साध-संगति (एक) सुंदर (स्थान) है। जो मनुष्य (साध-संगति में) आत्मिक स्नान करता है (मन को नाम-जल से पवित्र करता है)।उसके जीवन का (विकारों से) पार-उतारा हो जाता है।वह अपनी सारी कुल को भी (संसार समुंद्र से) पार लंघा लेता है। 1।रहाउ। सारा जगत उसकी शोभा के गीत गाता है। वह मनुष्य मन-वांछित फल हासिल कर लेता है। (हे भाई ! वह मनुष्य इस सत्संग-सरोवर में आत्मिक) स्नान कर के अपनी आत्मिक जीवन की राशि-पूँजी को पूर्ण-तौर पर बचा लेता है। (जो मनुष्य राम के दासों के सरोवर में टिक के) अपने परमात्मा की आराधना करता है।2। हे भाई ! जो मनुष्य संतो के सरोवर में (साध-संगति में) आत्मिक स्नान करता है। वह मनुष्य सबसे उच्च आत्मिक अवस्था हासिल कर लेता है। वह जनम-मरण के चक्कर में नहीं पड़ता। जो मनुष्य सदा परमात्मा का नाम सिमरता रहता है। 3। हे भाई ! परमात्मा के मिलाप की इस विचार को वही मनुष्य समझता है जिस पर परमात्मा खुद दयावान होता है। हे नानक ! (कह,) हे भाई ! जो मनुष्य परमात्मा की शरण पड़ा रहता है। वह अपनी हरेक किस्म की चिंता-फिक्र दूर कर लेता है। 4। 7। 57।
ਸੋਰਠਿ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮਿ ਨਿਬਾਹੀ ਪੂਰੀ ॥
ਕਾਈ ਬਾਤ ਨ ਰਹੀਆ ਊਰੀ ॥
ਗੁਰਿ ਚਰਨ ਲਾਇ ਨਿਸਤਾਰੇ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਸਮੑਾਰੇ ॥੧॥
ਅਪਨੇ ਦਾਸ ਕਾ ਸਦਾ ਰਖਵਾਲਾ ॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਅਪੁਨੇ ਕਰਿ ਰਾਖੇ ਮਾਤ ਪਿਤਾ ਜਿਉ ਪਾਲਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਵਡਭਾਗੀ ਸਤਿਗੁਰੁ ਪਾਇਆ ॥
ਜਿਨਿ ਜਮ ਕਾ ਪੰਥੁ ਮਿਟਾਇਆ ॥
ਹਰਿ ਭਗਤਿ ਭਾਇ ਚਿਤੁ ਲਾਗਾ ॥
ਜਪਿ ਜੀਵਹਿ ਸੇ ਵਡਭਾਗਾ ॥੨॥
ਹਰਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਬਾਣੀ ਗਾਵੈ ॥
ਸਾਧਾ ਕੀ ਧੂਰੀ ਨਾਵੈ ॥
ਅਪੁਨਾ ਨਾਮੁ ਆਪੇ ਦੀਆ ॥
ਪ੍ਰਭ ਕਰਣਹਾਰ ਰਖਿ ਲੀਆ ॥੩॥
ਹਰਿ ਦਰਸਨ ਪ੍ਰਾਨ ਅਧਾਰਾ ॥
ਇਹੁ ਪੂਰਨ ਬਿਮਲ ਬੀਚਾਰਾ ॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਅੰਤਰਜਾਮੀ ॥
ਦਾਸ ਨਾਨਕ ਸਰਣਿ ਸੁਆਮੀ ॥੪॥੮॥੫੮॥
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮਿ ਨਿਬਾਹੀ ਪੂਰੀ ॥
ਕਾਈ ਬਾਤ ਨ ਰਹੀਆ ਊਰੀ ॥
ਗੁਰਿ ਚਰਨ ਲਾਇ ਨਿਸਤਾਰੇ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਸਮੑਾਰੇ ॥੧॥
ਅਪਨੇ ਦਾਸ ਕਾ ਸਦਾ ਰਖਵਾਲਾ ॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਅਪੁਨੇ ਕਰਿ ਰਾਖੇ ਮਾਤ ਪਿਤਾ ਜਿਉ ਪਾਲਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਵਡਭਾਗੀ ਸਤਿਗੁਰੁ ਪਾਇਆ ॥
ਜਿਨਿ ਜਮ ਕਾ ਪੰਥੁ ਮਿਟਾਇਆ ॥
ਹਰਿ ਭਗਤਿ ਭਾਇ ਚਿਤੁ ਲਾਗਾ ॥
ਜਪਿ ਜੀਵਹਿ ਸੇ ਵਡਭਾਗਾ ॥੨॥
ਹਰਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਬਾਣੀ ਗਾਵੈ ॥
ਸਾਧਾ ਕੀ ਧੂਰੀ ਨਾਵੈ ॥
ਅਪੁਨਾ ਨਾਮੁ ਆਪੇ ਦੀਆ ॥
ਪ੍ਰਭ ਕਰਣਹਾਰ ਰਖਿ ਲੀਆ ॥੩॥
ਹਰਿ ਦਰਸਨ ਪ੍ਰਾਨ ਅਧਾਰਾ ॥
ਇਹੁ ਪੂਰਨ ਬਿਮਲ ਬੀਚਾਰਾ ॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਅੰਤਰਜਾਮੀ ॥
ਦਾਸ ਨਾਨਕ ਸਰਣਿ ਸੁਆਮੀ ॥੪॥੮॥੫੮॥
सोरठि महला ५ ॥
पारब्रहमि निबाही पूरी ॥
काई बात न रहीआ ऊरी ॥
गुरि चरन लाइ निसतारे ॥
हरि हरि नामु सम॑ारे ॥१॥
अपने दास का सदा रखवाला ॥
करि किरपा अपुने करि राखे मात पिता जिउ पाला ॥१॥ रहाउ ॥
वडभागी सतिगुरु पाइआ ॥
जिनि जम का पंथु मिटाइआ ॥
हरि भगति भाइ चितु लागा ॥
जपि जीवहि से वडभागा ॥२॥
हरि अंम्रित बाणी गावै ॥
साधा की धूरी नावै ॥
अपुना नामु आपे दीआ ॥
प्रभ करणहार रखि लीआ ॥३॥
हरि दरसन प्रान अधारा ॥
इहु पूरन बिमल बीचारा ॥
करि किरपा अंतरजामी ॥
दास नानक सरणि सुआमी ॥४॥८॥५८॥
पारब्रहमि निबाही पूरी ॥
काई बात न रहीआ ऊरी ॥
गुरि चरन लाइ निसतारे ॥
हरि हरि नामु सम॑ारे ॥१॥
अपने दास का सदा रखवाला ॥
करि किरपा अपुने करि राखे मात पिता जिउ पाला ॥१॥ रहाउ ॥
वडभागी सतिगुरु पाइआ ॥
जिनि जम का पंथु मिटाइआ ॥
हरि भगति भाइ चितु लागा ॥
जपि जीवहि से वडभागा ॥२॥
हरि अंम्रित बाणी गावै ॥
साधा की धूरी नावै ॥
अपुना नामु आपे दीआ ॥
प्रभ करणहार रखि लीआ ॥३॥
हरि दरसन प्रान अधारा ॥
इहु पूरन बिमल बीचारा ॥
करि किरपा अंतरजामी ॥
दास नानक सरणि सुआमी ॥४॥८॥५८॥
हिन्दी अर्थ: सोरठि महला ५ ॥ (हे भाई ! सदा से ही) परमात्मा ने अपने सेवक से प्रीति आखिर तक निभाई है। सेवक को किसी बात की कोई कमी नहीं रहती। गुरू ने (सेवकों को सदा ही) चरणों से लगा के (संसार-समुंद्र से) पार लंघाया है। सेवक सदा परमात्मा का नाम अपने दिल में संभाल के रखता है।1। हे भाई ! परमात्मा अपने सेवक का सदा रक्षक बना रहता है। जैसे माँ-बाप (बच्चों को) पालते हैं।वैसे ही प्रभू कृपा करके अपने सेवकों को अपने बनाए रखता है। 1।रहाउ। हे भाई ! बड़े भाग्यों वाले मनुष्यों ने (वह) गुरू पा लिया। जिस (गुरू) ने (उनके वास्ते) जम के देश को ले जाने वाला रास्ता मिटा दिया (क्योंकि गुरू की कृपा से) उनका मन परमात्मा की भक्ति में प्रभू के प्रेम में मगन रहता है। वे भाग्यशाली मनुष्य परमात्मा का नाम जप जप के आत्मिक जीवन प्राप्त कर लेते हैं। 2। (हे भाई ! परमात्मा का सेवक) परमात्मा की आत्मिक जीवन देने वाली बाणी गाता रहता है सेवक गुरमुखों के चरणों की धूड़ में स्नान करता रहता है (सवै भाव मिटा के संत जनों की शरण पड़ा रहता है)। परमात्मा ने खुद ही (अपने सेवक को) अपना नाम बख्शा है। सृजनहार प्रभू ने खुद ही (सदा से अपने सेवक को विकारों से) बचाया है। 3। हे भाई ! परमात्मा के दर्शन ही (सेवक की) जिंदगी का आसरा हैं, (प्रभू के सेवक का) ये पवित्र और पूर्ण विचार बना रहता है हे सबके दिलों की जानने वाले ! हे स्वामी ! (मेरे पर) मेहर कर। हे दास नानक ! (तू भी प्रभू दर पर अरदास कर।और कह,)मैं तेरी शरण आया हूँ। 4। 8। 58।
ਸੋਰਠਿ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਚਰਨੀ ਲਾਇਆ ॥
ਹਰਿ ਸੰਗਿ ਸਹਾਈ ਪਾਇਆ ॥
ਜਹ ਜਾਈਐ ਤਹਾ ਸੁਹੇਲੇ ॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਪ੍ਰਭਿ ਮੇਲੇ ॥੧॥
ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਵਹੁ ਸਦਾ ਸੁਭਾਈ ॥
ਮਨ ਚਿੰਦੇ ਸਗਲੇ ਫਲ ਪਾਵਹੁ ਜੀਅ ਕੈ ਸੰਗਿ ਸਹਾਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਨਾਰਾਇਣ ਪ੍ਰਾਣ ਅਧਾਰਾ ॥
ਹਮ ਸੰਤ ਜਨਾਂ ਰੇਨਾਰਾ ॥
ਪਤਿਤ ਪੁਨੀਤ ਕਰਿ ਲੀਨੇ ॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਹਰਿ ਜਸੁ ਦੀਨੇ ॥੨॥
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਕਰੇ ਪ੍ਰਤਿਪਾਲਾ ॥
ਸਦ ਜੀਅ ਸੰਗਿ ਰਖਵਾਲਾ ॥
ਹਰਿ ਦਿਨੁ ਰੈਨਿ ਕੀਰਤਨੁ ਗਾਈਐ ॥
ਬਹੁੜਿ ਨ ਜੋਨੀ ਪਾਈਐ ॥੩॥
ਜਿਸੁ ਦੇਵੈ ਪੁਰਖੁ ਬਿਧਾਤਾ ॥
ਹਰਿ ਰਸੁ ਤਿਨ ਹੀ ਜਾਤਾ ॥
ਜਮਕੰਕਰੁ ਨੇੜਿ ਨ ਆਇਆ ॥
ਸੁਖੁ ਨਾਨਕ ਸਰਣੀ ਪਾਇਆ ॥੪॥੯॥੫੯॥
ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਚਰਨੀ ਲਾਇਆ ॥
ਹਰਿ ਸੰਗਿ ਸਹਾਈ ਪਾਇਆ ॥
ਜਹ ਜਾਈਐ ਤਹਾ ਸੁਹੇਲੇ ॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਪ੍ਰਭਿ ਮੇਲੇ ॥੧॥
ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਵਹੁ ਸਦਾ ਸੁਭਾਈ ॥
ਮਨ ਚਿੰਦੇ ਸਗਲੇ ਫਲ ਪਾਵਹੁ ਜੀਅ ਕੈ ਸੰਗਿ ਸਹਾਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਨਾਰਾਇਣ ਪ੍ਰਾਣ ਅਧਾਰਾ ॥
ਹਮ ਸੰਤ ਜਨਾਂ ਰੇਨਾਰਾ ॥
ਪਤਿਤ ਪੁਨੀਤ ਕਰਿ ਲੀਨੇ ॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਹਰਿ ਜਸੁ ਦੀਨੇ ॥੨॥
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਕਰੇ ਪ੍ਰਤਿਪਾਲਾ ॥
ਸਦ ਜੀਅ ਸੰਗਿ ਰਖਵਾਲਾ ॥
ਹਰਿ ਦਿਨੁ ਰੈਨਿ ਕੀਰਤਨੁ ਗਾਈਐ ॥
ਬਹੁੜਿ ਨ ਜੋਨੀ ਪਾਈਐ ॥੩॥
ਜਿਸੁ ਦੇਵੈ ਪੁਰਖੁ ਬਿਧਾਤਾ ॥
ਹਰਿ ਰਸੁ ਤਿਨ ਹੀ ਜਾਤਾ ॥
ਜਮਕੰਕਰੁ ਨੇੜਿ ਨ ਆਇਆ ॥
ਸੁਖੁ ਨਾਨਕ ਸਰਣੀ ਪਾਇਆ ॥੪॥੯॥੫੯॥
सोरठि महला ५ ॥
गुरि पूरै चरनी लाइआ ॥
हरि संगि सहाई पाइआ ॥
जह जाईऐ तहा सुहेले ॥
करि किरपा प्रभि मेले ॥१॥
हरि गुण गावहु सदा सुभाई ॥
मन चिंदे सगले फल पावहु जीअ कै संगि सहाई ॥१॥ रहाउ ॥
नाराइण प्राण अधारा ॥
हम संत जनां रेनारा ॥
पतित पुनीत करि लीने ॥
करि किरपा हरि जसु दीने ॥२॥
पारब्रहमु करे प्रतिपाला ॥
सद जीअ संगि रखवाला ॥
हरि दिनु रैनि कीरतनु गाईऐ ॥
बहुड़ि न जोनी पाईऐ ॥३॥
जिसु देवै पुरखु बिधाता ॥
हरि रसु तिन ही जाता ॥
जमकंकरु नेड़ि न आइआ ॥
सुखु नानक सरणी पाइआ ॥४॥९॥५९॥
गुरि पूरै चरनी लाइआ ॥
हरि संगि सहाई पाइआ ॥
जह जाईऐ तहा सुहेले ॥
करि किरपा प्रभि मेले ॥१॥
हरि गुण गावहु सदा सुभाई ॥
मन चिंदे सगले फल पावहु जीअ कै संगि सहाई ॥१॥ रहाउ ॥
नाराइण प्राण अधारा ॥
हम संत जनां रेनारा ॥
पतित पुनीत करि लीने ॥
करि किरपा हरि जसु दीने ॥२॥
पारब्रहमु करे प्रतिपाला ॥
सद जीअ संगि रखवाला ॥
हरि दिनु रैनि कीरतनु गाईऐ ॥
बहुड़ि न जोनी पाईऐ ॥३॥
जिसु देवै पुरखु बिधाता ॥
हरि रसु तिन ही जाता ॥
जमकंकरु नेड़ि न आइआ ॥
सुखु नानक सरणी पाइआ ॥४॥९॥५९॥
हिन्दी अर्थ: सोरठि महला ५ ॥ (हे भाई जिस मनुष्य को) पूरे गुरू ने (परमात्मा के) चरणों में जोड़ दिया। उसने वह परमात्मा पा लिया जो हर वक्त अंग-संग बसता है।और (जीवन का) मददगार है। (अगर प्रभू चरणों में जुड़े रहें तो) जहाँ भी जाएं। वहीं सुखी रह सकते हैं (पर जिन्हें चरणों में मिलाया है) प्रभू ने (खुद ही) कृपा करके मिलाया है। 1। हे भाई ! सदा प्यार से परमात्मा के सिफत सालाह के गीत गाते रहा करो। (सिफत सालाह की बरकति से) मन मांगे फल (प्रभू के दर से) प्राप्त करते रहोगे।परमात्मा जीवन के साथ (बसता) साथी (प्रतीत होता रहेगा)। 1।रहाउ। परमात्मा जीवन का आसरा है। मैं तो संत जनों की धूड़ बना रहता हूँ। विकारों में गिरे हुओं को (भी) पवित्र जीवन वाला बना लेते हैं। संत जन कृपा करके परमात्मा की सिफत सालाह की दाति देते हैं।2। परमात्मा खुद (सिफत सालाह करने वालों की) रक्षा करता है। सदा उनके प्राणों के साथ रक्षक बना रहता है। हे भाई ! दिन-रात (हर समय) परमात्मा की सिफत सालाह के गीत गाते रहना चाहिए। (सिफत सालाह की बरकति से) दुबारा जनम-मरन का चक्कर नहीं पड़ता।3। जिसे सृजनहार सर्व-व्यापक प्रभू खुद (ये दाति) देता है। उस मनुष्य ने ही परमात्मा के नाम का स्वाद समझा है (कद्र जानी है)। जम दूत भी उसके नजदीक नहीं फटकते। हे नानक ! परमात्मा की शरण पड़ा रह के वह आत्मिक आनंद लेता रहता है। 4। 9। 49।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 623 है, राग सोरठ का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
Vasant Vihar के market में Sunday सुबह की धीमी-धीमी activity।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 61 पंक्तियों का है, 4 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 623” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: सोरठ राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 624 →, पीछे का: ← अंग 622।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।