सतिगुरु मिलै त गुरमति पाईऐ साकत बाजी हारी जीउ ॥3॥
सतिगुर बंधन तोड़ि निरारे बहुड़ि न गरभ मझारी जीउ ॥
नानक गिआन रतनु परगासिआ हरि मनि वसिआ निरंकारी जीउ ॥4॥8॥
जिसु जल निधि कारणि तुम जगि आए सो अंम्रितु गुर पाही जीउ ॥
छोडहु वेसु भेख चतुराई दुबिधा इहु फलु नाही जीउ ॥1॥
मन रे थिरु रहु मतु कत जाही जीउ ॥
बाहरि ढूढत बहुतु दुखु पावहि घरि अंम्रितु घट माही जीउ ॥ रहाउ ॥
अवगुण छोडि गुणा कउ धावहु करि अवगुण पछुताही जीउ ॥
सर अपसर की सार न जाणहि फिरि फिरि कीच बुडाही जीउ ॥2॥
अंतरि मैलु लोभ बहु झूठे बाहरि नावहु काही जीउ ॥
निरमल नामु जपहु सद गुरमुखि अंतर की गति ताही जीउ ॥3॥
परहरि लोभु निंदा कूड़ु तिआगहु सचु गुर बचनी फलु पाही जीउ ॥
जिउ भावै तिउ राखहु हरि जीउ जन नानक सबदि सलाही जीउ ॥4॥9॥
अपना घरु मूसत राखि न साकहि की पर घरु जोहन लागा ॥
घरु दरु राखहि जे रसु चाखहि जो गुरमुखि सेवकु लागा ॥1॥
मन रे समझु कवन मति लागा ॥
नामु विसारि अन रस लोभाने फिरि पछुताहि अभागा ॥ रहाउ ॥
आवत कउ हरख जात कउ रोवहि इहु दुखु सुखु नाले लागा ॥
आपे दुख सुख भोगि भोगावै गुरमुखि सो अनरागा ॥2॥
हरि रस ऊपरि अवरु किआ कहीऐ जिनि पीआ सो त्रिपतागा ॥
माइआ मोहित जिनि इहु रसु खोइआ जा साकत दुरमति लागा ॥3॥
मन का जीउ पवनपति देही देही महि देउ समागा ॥
जे तू देहि त हरि रसु गाई मनु त्रिपतै हरि लिव लागा ॥4॥
साधसंगति महि हरि रसु पाईऐ गुरि मिलिऐ जम भउ भागा ॥
नानक राम नामु जपि गुरमुखि हरि पाए मसतकि भागा ॥5॥10॥
सरब जीआ सिरि लेखु धुराहू बिनु लेखै नही कोई जीउ ॥
आपि अलेखु कुदरति करि देखै हुकमि चलाए सोई जीउ ॥1॥
मन रे राम जपहु सुखु होई ॥
अहिनिसि गुर के चरन सरेवहु हरि दाता भुगता सोई ॥ रहाउ ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
नानक की रचनाओं में एक खास तरह की आबजर्वेशनल आँख है। एक पटवारी का पेशा छोड़ कर तीस के बाद के दशकों में वो काबुल, मक्का, अरब, असम, श्रीलंका, और तिब्बत की सरहद तक गए। हर जगह संत-फ़क़ीरों, बादशाहों, और साधारण किसानों से बातचीत की, और उसी बातचीत की पर्तें इन शबदों में बैठी हैं।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “ये भाग्यहीन जगत जनम-मरण का चक्कर सहेड़े बैठा है क्योंकि इसने माया के मोह में पड़ कर परमात्मा की भक्ति भुला दी है।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।