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अंग 598

अंग
598
राग सोरठ
राग: सोरठ · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
जनम मरन कउ इहु जगु बपुड़ो इनि दूजै भगति विसारी जीउ ॥
सतिगुरु मिलै त गुरमति पाईऐ साकत बाजी हारी जीउ ॥3॥
सतिगुर बंधन तोड़ि निरारे बहुड़ि न गरभ मझारी जीउ ॥
नानक गिआन रतनु परगासिआ हरि मनि वसिआ निरंकारी जीउ ॥4॥8॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: ये भाग्यहीन जगत जनम-मरण का चक्कर सहेड़े बैठा है क्योंकि इसने माया के मोह में पड़ कर परमात्मा की भक्ति भुला दी है। अगर सतिगुरू मिल जाए तो गुरू के उपदेश में चलने से (प्रभू की भक्ति) प्राप्त होती है।पर माया-ग्रसित जीव (भक्ति से टूट के मानस जन्म की) बाजी हार जाते हैं। 3। हे सतिगुरू ! माया के बँधन तोड़ के जिन लोगों को आप माया से निर्लिप कर देता है।वह दुबारा जनम-मरन के चक्कर में नहीं पड़ता। हे नानक ! (गुरू की कृपा से जिनके अंदर परमात्मा के) ज्ञान का रतन चमक पड़ता है।उनके मन में हरी निरंकार (स्वयं) आ बसता है। 4। 9।
सोरठि महला 1 ॥
जिसु जल निधि कारणि तुम जगि आए सो अंम्रितु गुर पाही जीउ ॥
छोडहु वेसु भेख चतुराई दुबिधा इहु फलु नाही जीउ ॥1॥
मन रे थिरु रहु मतु कत जाही जीउ ॥
बाहरि ढूढत बहुतु दुखु पावहि घरि अंम्रितु घट माही जीउ ॥ रहाउ ॥
अवगुण छोडि गुणा कउ धावहु करि अवगुण पछुताही जीउ ॥
सर अपसर की सार न जाणहि फिरि फिरि कीच बुडाही जीउ ॥2॥
अंतरि मैलु लोभ बहु झूठे बाहरि नावहु काही जीउ ॥
निरमल नामु जपहु सद गुरमुखि अंतर की गति ताही जीउ ॥3॥
परहरि लोभु निंदा कूड़ु तिआगहु सचु गुर बचनी फलु पाही जीउ ॥
जिउ भावै तिउ राखहु हरि जीउ जन नानक सबदि सलाही जीउ ॥4॥9॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 1 ॥ (हे भाई !) जिस अमृत के खजाने की खातिर आप जगत में आए हैं वह अमृत गुरू की ओर से मिलता है; पर धार्मिक भेष का पहरावा छोड़।मन की चालाकी भी छोड़ दे (बाहर की सूरति धर्मियों वाली और अंदर से दुनिया को ठगने वाली चालाकी) इस दुविधा भरी चाल में उलझे रह के ये अमृत फल की प्राप्ति नहीं हो सकती। 1। हे मेरे मन ! (अंदर ही प्रभू चरणों में) टिका रह।(देखना।नाम-अमृत की तलाश में) कहीं बाहर ना भटकते फिरना। अगर आप बाहर ढूँढने निकल पड़ा।तो बहुत दुख पाएगा।अटल आत्मिक जीवन देने वाला रस आपके घर में ही है।हृदय में ही है।रहाउ। (हे भाई !) अवगुण छोड़ के गुण हासिल करने का यतन करो।अगर अवगुण ही करते रहोगे तो पछताना पड़ेगा। (हे मन !) आप बार-बार मोह के कीचड़ में डूब रहा है।आप अच्छे-बुरे की परख करनी नहीं जानता। 2। (हे भाई !) अगर अंदर (मन में) लोभ की मैल है (और लोभ के अधीन हो के) कई ठॅगी के काम करते हैं।तो बाहर (तीर्थ आदि पर) स्नान करने के क्या लाभ। अंदर की ऊँची अवस्था तभी बनेगी जब गुरू के बताए हुए रास्ते पर चल के सदा प्रभू का पवित्र नाम जपोगे। 3। (हे मन !) लोभ त्याग।निंदा और झूठ त्याग।गुरू के बचनों में चलने से ही सदा स्थिर रहने वाला अमृत-फल मिलेगा। हे दास नानक ! (प्रभू दर पर अरदास कर और कह) हे हरी ! जैसे आपकी रजा हैं वैसे ही मुझे रख (पर ये मेहर कर कि गुरू के) शबद में जुड़ के मैं आपकी सिफत सालाह करता रहूँ। 4। 9।
सोरठि महला 1 पंचपदे ॥
अपना घरु मूसत राखि न साकहि की पर घरु जोहन लागा ॥
घरु दरु राखहि जे रसु चाखहि जो गुरमुखि सेवकु लागा ॥1॥
मन रे समझु कवन मति लागा ॥
नामु विसारि अन रस लोभाने फिरि पछुताहि अभागा ॥ रहाउ ॥
आवत कउ हरख जात कउ रोवहि इहु दुखु सुखु नाले लागा ॥
आपे दुख सुख भोगि भोगावै गुरमुखि सो अनरागा ॥2॥
हरि रस ऊपरि अवरु किआ कहीऐ जिनि पीआ सो त्रिपतागा ॥
माइआ मोहित जिनि इहु रसु खोइआ जा साकत दुरमति लागा ॥3॥
मन का जीउ पवनपति देही देही महि देउ समागा ॥
जे तू देहि त हरि रसु गाई मनु त्रिपतै हरि लिव लागा ॥4॥
साधसंगति महि हरि रसु पाईऐ गुरि मिलिऐ जम भउ भागा ॥
नानक राम नामु जपि गुरमुखि हरि पाए मसतकि भागा ॥5॥10॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 1 पंचपदे ॥ हे मन ! आपका अपना आत्मिक जीवन लुटा जा रहा है उसे आप बचा नहीं सकता।पराए ऐब क्यों फरोलता फिरता है। अपना घर-बार (लुटे जाने से तभी) बच सकेगा अगर आप प्रभू के नाम का स्वाद चखेगा।(नाम-रस वही) सेवक (चखता है) जो गुरू के सन्मुख रहके (सेवा में) लगता है। हे मन ! होश कर।किस बुरी मति में लग गया है। हे अभागे ! परमात्मा का नाम भुला के अन्य ही स्वादों में मस्त हो रहा है।(समय बीत जाने पर) फिर पछताएगा।रहाउ। हे मन ! आप आते धन को देख के खुश होता है।जाते को देख के रोता है।ये दुख और सुख आपके साथ ही चिपका चला (पर आपके भी क्या वश।) प्रभू खुद ही (जीव को उसके किए कर्मों के अनुसार) दुखों और सुखों के भोग में उलझा के (दुख-सुख) भोगाता हूँ।(सिर्फ) वह मनुष्य ही निर्मोही रहता है जो गुरू के बताए हुए रास्ते पर चलता है। 2। (हे मन !) परमात्मा के नाम के रस से बढ़िया और कोई रस कहा नहीं जा सकता।जिस मनुष्य ने ये रस पिया है वह (दुनिया के और रसों की ओर से) तृप्त हो जाता है। पर जिस मनुष्य ने माया के मोह में फंस के यह (नाम-) रस गवा लिया है वह माया-ग्रसित लोगों की कुबुद्धि में जा लगता है। 3। जो प्रकाश-रूप परमात्मा हमारे मन का सहारा है।प्राणों का मालिक है।शरीर का मालिक है।वह हमारे शरीर में ही मौजूद है (पर हमें ये समझ नहीं आता।हम बाहर ही भटकते रहते हैं)। हे प्रभू ! अगर आप खुद मुझे अपने नाम का रस बख्शे तो ही मैं आपके गुण गा सकता हूँ।जिस मनुष्य की सुरति हरी-सिमरन में जुड़ती है उसका मन माया की ओर से तृप्त हो जाता है। 4। हे नानक ! साध-संगति में परमात्मा के नाम का रस प्राप्त हो सकता है (साध-संगति में) अगर गुरू मिल जाए तो मौत का (भी) डर दूर हो जाता है। जिस मनुष्य के माथे पर अच्छे लेख उघड़ आएं।वह गुरू के बताए हुए राह पर चल के परमात्मा का नाम सिमर के परमात्मा के साथ मिलाप हासिल कर लेता है। 5। 10।
सोरठि महला 1 ॥
सरब जीआ सिरि लेखु धुराहू बिनु लेखै नही कोई जीउ ॥
आपि अलेखु कुदरति करि देखै हुकमि चलाए सोई जीउ ॥1॥
मन रे राम जपहु सुखु होई ॥
अहिनिसि गुर के चरन सरेवहु हरि दाता भुगता सोई ॥ रहाउ ॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 1 ॥ धुर से ही (परमात्मा की रजा अनुसार) सब जीवों के माथे पर (अपने-अपने किए कर्मोंके संस्कारों का) लेख (उकरा हुआ) है।कोई जीव ऐसा नहीं है जिस पर इस लेख का प्रभाव ना हो। सिर्फ परमात्मा खुद इस (कर्म) लेख से स्वतंत्र है।जो इस कुदरत को रच के इसकी संभाल करता है।और अपने हुकम में (जगत की कार्रवाही) चला रहा है। 1। हे मेरे मन ! सदा राम का नाम जपो (नाम जपने से) आत्मिक सुख मिलेगा। दिन-रात उस सबसे बड़े मालिक के चरणों का ध्यान धरो।वह हरी (खुद ही सब जीवों को दातें) देने वाला है।(खुद ही सबमें व्यापक हो के) भोगने वाला है।रहाउ।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

नानक की रचनाओं में एक खास तरह की आबजर्वेशनल आँख है। एक पटवारी का पेशा छोड़ कर तीस के बाद के दशकों में वो काबुल, मक्का, अरब, असम, श्रीलंका, और तिब्बत की सरहद तक गए। हर जगह संत-फ़क़ीरों, बादशाहों, और साधारण किसानों से बातचीत की, और उसी बातचीत की पर्तें इन शबदों में बैठी हैं।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “ये भाग्यहीन जगत जनम-मरण का चक्कर सहेड़े बैठा है क्योंकि इसने माया के मोह में पड़ कर परमात्मा की भक्ति भुला दी है।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।