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अंग 596

अंग
596
राग सोरठ
राग: सोरठ · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
बंनु बदीआ करि धावणी ता को आखै धंनु ॥
नानक वेखै नदरि करि चड़ै चवगण वंनु ॥4॥2॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: आप भी) परमात्मा मालिक के नाम को मन में पक्का करके रख।यही है उसकी सेवा।विकारों को (अपने नजदीक आने से) रोक दे।ये है परमात्मा की नौकरी की दौड़-भाग।(यदि ये उद्यम करेगा) तो हर कोई आपको साबाशी देगा। हे नानक ! ऐसी नौकरी करने से परमात्मा आपको मेहर की नजर से देखेगा।आपकी जीवात्मा पर चौगुना आत्मिक-रूप चढ़ेगा। 4। 2।
सोरठि मः 1 चउतुके ॥
माइ बाप को बेटा नीका ससुरै चतुरु जवाई ॥
बाल कंनिआ कौ बापु पिआरा भाई कौ अति भाई ॥
हुकमु भइआ बाहरु घरु छोडिआ खिन महि भई पराई ॥
नामु दानु इसनानु न मनमुखि तितु तनि धूड़ि धुमाई ॥1॥
मनु मानिआ नामु सखाई ॥
पाइ परउ गुर कै बलिहारै जिनि साची बूझ बुझाई ॥ रहाउ ॥
जग सिउ झूठ प्रीति मनु बेधिआ जन सिउ वादु रचाई ॥
माइआ मगनु अहिनिसि मगु जोहै नामु न लेवै मरै बिखु खाई ॥
गंधण वैणि रता हितकारी सबदै सुरति न आई ॥
रंगि न राता रसि नही बेधिआ मनमुखि पति गवाई ॥2॥
साध सभा महि सहजु न चाखिआ जिहबा रसु नही राई ॥
मनु तनु धनु अपुना करि जानिआ दर की खबरि न पाई ॥
अखी मीटि चलिआ अंधिआरा घरु दरु दिसै न भाई ॥
जम दरि बाधा ठउर न पावै अपुना कीआ कमाई ॥3॥
नदरि करे ता अखी वेखा कहणा कथनु न जाई ॥
कंनी सुणि सुणि सबदि सलाही अंम्रितु रिदै वसाई ॥
निरभउ निरंकारु निरवैरु पूरन जोति समाई ॥
नानक गुर विणु भरमु न भागै सचि नामि वडिआई ॥4॥3॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: सोरठि मः 1 चउतुके ॥ जो मनुष्य कभी माता-पिता का प्यारा पुत्र था।कभी ससुर का चतुर दामाद था। कभी पुत्र-पुत्री के लिए प्यारा पिता।कभी भाई का बड़ा (स्नेह भरा) भाई था। जब अकालपुरुख का हुकम हुआ तो उसने घर-बार सब कुछ छोड़ दिया।पलक झपकते ही सब कुछ पराया हैं गया है। अपने मन के पीछे चलने वाले बंदे ने ना नाम जपा ना सेवा की और ना ही पवित्र आचरण बनाया।इस मानस शरीर से मिट्टी ही उड़ाता रहा। 1। जिस मनुष्य का मन गुरू के उपदेश में पतीजता है वह परमात्मा के नाम को असल मित्र समझता है। मैं तो गुरू के पैर लगता हूँ।गुरू से सदके जाता हूँ जिसने ये सच्ची मति दी है (कि परमात्मा असल मित्र है)। 1। मनमुख का मन जगत से झूठे प्यार में परोया रहता है।संत-जनों से वह झगड़ा खड़ा किए रखता है। माया (के मोह) में मस्त वह दिन रात वह माया की राह ही ताकता रहता है।परमात्मा का नाम कभी नहीं सिमरता।इस तरह (माया के मोह का) जहर खा खा के आत्मिक मौत मर जाता है। अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य गंदे गीतों (गाने-सुनने) में मस्त रहता है।गंदे गीतों से ही हित करता है।परमात्मा की सिफत सालाह वाली बाणी में उसकी सुरति नहीं जुड़ती। ना वह परमात्मा के प्यार में रंगा जाता है ना वह नाम-रस से आकर्षित होता है।मनमुख इसी तरह अपनी इज्जत गवा लेता है। 2। साध-संगति में जा के मनमुख आत्मिक अडोलता का आनंद कभी नहीं पाता।उसकी जीभ को नाम जपने में थोड़ा सा भी स्वाद नहीं आता। मनमुख अपने मन को तन को धन को ही अपना समझे बैठता है परमात्मा के दर की उसे कोई समझ नहीं होती। मनमुख अंधा (जीवन सफर में) आँखे बँद करके ही चलता जाता है।हे भाई ! परमात्मा का घर परमात्मा का दर उसे कभी दिखता ही नहीं। आखिर अपने किए का ये लाभ कमाता है कि यमराज के दरवाजे पर बँधा हुआ (मार खाता है।इस सजा से बचने के लिए) उसे कोई सहारा नहीं मिलता। 3। (पर हम जीवों के भी क्या वश।) अगर प्रभू स्वयं मेहर की नजर करे तो ही मैं उसे आँखों से देख सकता हूँ।उसके गुणों का बयान नहीं किया जा सकता। (उसकी मेहर हो तो ही) कानों से उसकी सिफत सालाह सुन-सुन के गुरू के शबद के माध्यम से मैं उसकी सिफत सालाह कर सकता हूँ।और अटल आत्मिक जीवन देने वाला उसका नाम दिल में बसा सकता हूँ। हे नानक ! प्रभू निरभय है निराकार है निर्वैर है उसकी ज्योति सारे जगत में पूर्ण रूप में व्यापक है।उसके सदा स्थिर रहने वाले नाम में टिकने से ही आदर मिलता है। पर गुरू की शरण के बिना मन की भटकन दूर नहीं होती (और भटकन दूर हुए बिना नाम में जुड़ा नहीं जा सकता)। 4। 3।
सोरठि महला 1 दुतुके ॥
पुड़ु धरती पुड़ु पाणी आसणु चारि कुंट चउबारा ॥
सगल भवण की मूरति एका मुखि तेरै टकसाला ॥1॥
मेरे साहिबा तेरे चोज विडाणा ॥
जलि थलि महीअलि भरिपुरि लीणा आपे सरब समाणा ॥ रहाउ ॥
जह जह देखा तह जोति तुमारी तेरा रूपु किनेहा ॥
इकतु रूपि फिरहि परछंना कोइ न किस ही जेहा ॥2॥
अंडज जेरज उतभुज सेतज तेरे कीते जंता ॥
एकु पुरबु मै तेरा देखिआ तू सभना माहि रवंता ॥3॥
तेरे गुण बहुते मै एकु न जाणिआ मै मूरख किछु दीजै ॥
प्रणवति नानक सुणि मेरे साहिबा डुबदा पथरु लीजै ॥4॥4॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 1 दुतुके ॥ हे प्रभू ! ये सारी सृष्टि आपका ही चुबारा है।चारों तरफ उस चुबारे की चार दीवारें हैं।धरती उस चुबारे की (नीचे की) पुड़ (चक्की का हिस्सा) है (फर्श है)।आकाश उस चुबारे का (ऊपरी) पुड़ है (छत है)। इस चुबारे में आपका निवास है।सारी सृष्टि (के जीव-जंतुओं) की मूर्तियां आपकी ही श्रेष्ठ टकसाल में घड़ी हुई हैं। 1। हे मेरे मालिक ! आपके आश्चर्यजनक करिश्मे हैं। आप पानी में।धरती के अंदर।धरती के ऊपर (सारे अंतरिक्ष में) भरपूर व्यापक है।आप खुद ही सब जगह मौजूद है।रहाउ। मैं जिधर देखता हूँ आपकी ही ज्योति (प्रकाशमान) है।पर आपका स्वरूप कैसा है (ये बयान से परे है)। आप खुद ही खुद होते हुए भी इन बेअंत जीवों में छुप के घूम रहा है (आश्चर्य ये है कि) कोई एक जीव किसी दूसरे जैसा नहीं। 2। अण्डे में से।गर्भ में से।धरती में से।पसीने में से पैदा होए हुए ये सारे जीव आपके ही पैदा किए हुए हैं (ये सारे अनेकों रंगों और किस्मों के हैं)। पर मैं आपके आश्चर्यजनक खेल को देखता हूँ कि आप इन सभी जीवों में मौजूद है। 3। नानक विनती करता है, हे प्रभू ! आपके अनेकों गुण हैं।मुझे किसी एक की भी पूरी समझ नहीं हैं।हे मेरे मालिक ! सुन ! मुझ मूर्ख को सद-बुद्धि दे। मैं विकारों में डूब रहा हूँ जैसे पत्थर पानी में डूब जाता है।मुझे निकाल ले। 4। 4।
सोरठि महला 1 ॥
हउ पापी पतितु परम पाखंडी तू निरमलु निरंकारी ॥
अंम्रितु चाखि परम रसि राते ठाकुर सरणि तुमारी ॥1॥
करता तू मै माणु निमाणे ॥
माणु महतु नामु धनु पलै साचै सबदि समाणे ॥ रहाउ ॥
तू पूरा हम ऊरे होछे तू गउरा हम हउरे ॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 1 ॥ हे मेरे ठाकुर ! मैं विकारी हूँ।(सदा वकारों में ही) गिरा रहता हूँ।बड़ा ही पाखण्डी हूँ।आप पवित्र निरंकार है।(इतनी ज्यादा दूरी होते हुए मैं आपके चरणों में कैसे पहुँचू।)। (पर आप शरण पड़े की लाज रखने वाला है) जो लोग आपकी शरण पड़ते हैं;वे अटल आत्मिक जीवन देने वाला आपका नाम-रस चख के उस सबसे उच्च रस में मस्त रहते हैं। 1। हे मेरे करतार ! (दुनिया में किसी को धन का गुमान।किसी को गुणों का फख़र।मेरे पास तो गुण नहीं हैं) मुझे निमाण के लिए तो आप ही माण है (मुझे आपका ही माण है आसरा है) जिनके पल्ले परमात्मा का नाम धन है।जो गुरू-शबद के द्वारा सदा-स्थिर रहने वाले प्रभू में लीन रहते हैं उन्हें ही मान मिलता है उन्हें ही बड़प्पन मिलता है।रहाउ। हे प्रभू ! आप गुणों से भरपूर है।हम जीव छोटे हैं।तुच्छ बुद्धि के हैं।आप गंभीर है हम हल्के हैं

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

गुरु नानक की वाणी का अपना मिज़ाज है, सीधा-सादा, बिना अलंकार के, मगर हर पंक्ति में एक ठहराव। 1469 में तलवण्डी में जन्म, सुलतानपुर के बहीखाते में कुछ साल काम, फिर तीस की उम्र के क़रीब वो लम्बी पैदल यात्रा जो काबुल, बग़दाद, मक्का, जगन्नाथ-पुरी, तिब्बत की सरहद तक उन्हें ले गयी। उनके शबद इन्हीं यात्राओं की वाणी हैं।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “आप भी) परमात्मा मालिक के नाम को मन में पक्का करके रख।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।