अंग
624
राग सोरठ
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਸੋਰਠਿ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਕੀਤੀ ਪੂਰੀ ॥
ਪ੍ਰਭੁ ਰਵਿ ਰਹਿਆ ਭਰਪੂਰੀ ॥
ਖੇਮ ਕੁਸਲ ਭਇਆ ਇਸਨਾਨਾ ॥
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਵਿਟਹੁ ਕੁਰਬਾਨਾ ॥੧॥
ਗੁਰ ਕੇ ਚਰਨ ਕਵਲ ਰਿਦ ਧਾਰੇ ॥
ਬਿਘਨੁ ਨ ਲਾਗੈ ਤਿਲ ਕਾ ਕੋਈ ਕਾਰਜ ਸਗਲ ਸਵਾਰੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਮਿਲਿ ਸਾਧੂ ਦੁਰਮਤਿ ਖੋਏ ॥
ਪਤਿਤ ਪੁਨੀਤ ਸਭ ਹੋਏ ॥
ਰਾਮਦਾਸਿ ਸਰੋਵਰ ਨਾਤੇ ॥
ਸਭ ਲਾਥੇ ਪਾਪ ਕਮਾਤੇ ॥੨॥
ਗੁਨ ਗੋਬਿੰਦ ਨਿਤ ਗਾਈਐ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਮਿਲਿ ਧਿਆਈਐ ॥
ਮਨ ਬਾਂਛਤ ਫਲ ਪਾਏ ॥
ਗੁਰੁ ਪੂਰਾ ਰਿਦੈ ਧਿਆਏ ॥੩॥
ਗੁਰ ਗੋਪਾਲ ਆਨੰਦਾ ॥
ਜਪਿ ਜਪਿ ਜੀਵੈ ਪਰਮਾਨੰਦਾ ॥
ਜਨ ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇਆ ॥
ਪ੍ਰਭ ਅਪਨਾ ਬਿਰਦੁ ਰਖਾਇਆ ॥੪॥੧੦॥੬੦॥
ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਕੀਤੀ ਪੂਰੀ ॥
ਪ੍ਰਭੁ ਰਵਿ ਰਹਿਆ ਭਰਪੂਰੀ ॥
ਖੇਮ ਕੁਸਲ ਭਇਆ ਇਸਨਾਨਾ ॥
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਵਿਟਹੁ ਕੁਰਬਾਨਾ ॥੧॥
ਗੁਰ ਕੇ ਚਰਨ ਕਵਲ ਰਿਦ ਧਾਰੇ ॥
ਬਿਘਨੁ ਨ ਲਾਗੈ ਤਿਲ ਕਾ ਕੋਈ ਕਾਰਜ ਸਗਲ ਸਵਾਰੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਮਿਲਿ ਸਾਧੂ ਦੁਰਮਤਿ ਖੋਏ ॥
ਪਤਿਤ ਪੁਨੀਤ ਸਭ ਹੋਏ ॥
ਰਾਮਦਾਸਿ ਸਰੋਵਰ ਨਾਤੇ ॥
ਸਭ ਲਾਥੇ ਪਾਪ ਕਮਾਤੇ ॥੨॥
ਗੁਨ ਗੋਬਿੰਦ ਨਿਤ ਗਾਈਐ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਮਿਲਿ ਧਿਆਈਐ ॥
ਮਨ ਬਾਂਛਤ ਫਲ ਪਾਏ ॥
ਗੁਰੁ ਪੂਰਾ ਰਿਦੈ ਧਿਆਏ ॥੩॥
ਗੁਰ ਗੋਪਾਲ ਆਨੰਦਾ ॥
ਜਪਿ ਜਪਿ ਜੀਵੈ ਪਰਮਾਨੰਦਾ ॥
ਜਨ ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇਆ ॥
ਪ੍ਰਭ ਅਪਨਾ ਬਿਰਦੁ ਰਖਾਇਆ ॥੪॥੧੦॥੬੦॥
सोरठि महला ५ ॥
गुरि पूरै कीती पूरी ॥
प्रभु रवि रहिआ भरपूरी ॥
खेम कुसल भइआ इसनाना ॥
पारब्रहम विटहु कुरबाना ॥१॥
गुर के चरन कवल रिद धारे ॥
बिघनु न लागै तिल का कोई कारज सगल सवारे ॥१॥ रहाउ ॥
मिलि साधू दुरमति खोए ॥
पतित पुनीत सभ होए ॥
रामदासि सरोवर नाते ॥
सभ लाथे पाप कमाते ॥२॥
गुन गोबिंद नित गाईऐ ॥
साधसंगि मिलि धिआईऐ ॥
मन बांछत फल पाए ॥
गुरु पूरा रिदै धिआए ॥३॥
गुर गोपाल आनंदा ॥
जपि जपि जीवै परमानंदा ॥
जन नानक नामु धिआइआ ॥
प्रभ अपना बिरदु रखाइआ ॥४॥१०॥६०॥
गुरि पूरै कीती पूरी ॥
प्रभु रवि रहिआ भरपूरी ॥
खेम कुसल भइआ इसनाना ॥
पारब्रहम विटहु कुरबाना ॥१॥
गुर के चरन कवल रिद धारे ॥
बिघनु न लागै तिल का कोई कारज सगल सवारे ॥१॥ रहाउ ॥
मिलि साधू दुरमति खोए ॥
पतित पुनीत सभ होए ॥
रामदासि सरोवर नाते ॥
सभ लाथे पाप कमाते ॥२॥
गुन गोबिंद नित गाईऐ ॥
साधसंगि मिलि धिआईऐ ॥
मन बांछत फल पाए ॥
गुरु पूरा रिदै धिआए ॥३॥
गुर गोपाल आनंदा ॥
जपि जपि जीवै परमानंदा ॥
जन नानक नामु धिआइआ ॥
प्रभ अपना बिरदु रखाइआ ॥४॥१०॥६०॥
हिन्दी अर्थ: सोरठि महला ५ ॥ हे भाई ! पूरे गुरू ने (आत्मिक जीवन में) सफलता दी है। (मुझे) परमात्मा हर जगह व्यापक दिखाई दे रहा है। मेरे अंदर आत्मिक सुख-आनंद बन गया है, ये है स्नान (जो मैंने गुरू सरोवर में किया है)। मैं परमात्मा से सदके जाता हूँ (जिसने मुझे गुरू मिला दिया है)। 1। हे भाई ! जिस मनुष्य ने गुरू के कमल फूल जैसे कोमल चरण अपने हृदय में बसा लिए। (उसकी जिंदगी के रास्ते में) रक्ती भर भी कोई रुकावट नहीं आती।गुरू उसके सारे काम सँवार देता है। 1।रहाउ। हे भाई ! गुरू को मिल के मनुष्य खोटी मति दूर कर लेता है। विकारी मनुष्य भी गुरू को मिल के पवित्र जीवन वाले हो जाते हैं। जो भी मनुष्य राम के दासों के सरोवर में (गुरू की संगति में आत्मिक) स्नान करते हैं (मन को आत्मिक जीवन देने वाले नाम-जल से स्नान करवाते हैं) उनके सारे (पिछले) कमाए हुए पाप उतर जाते हैं। 2। हे भाई ! गुरू की संगति में मिल के परमात्मा का नाम सिमरना चाहिए। सदा प्रभू की सिफत सालाह के गीत गाने चाहिए। वह (प्रभू-दर से) मन माँगी मुरादें पा लेता है। जो मनुष्य पूरे गुरू को अपने हृदय में बसाता है।3। सृष्टि को पालने वाला है।आनंद स्वरूप है। उस सबसे ऊँचे आनंद के मालिक को जप जप के वह मनुष्य आत्मिक जीवन हासिल कर लेता है। हे दास नानक ! (कह,)जो मनुष्य उसका नाम सिमरता है। परमात्मा अपना बिरद सदा कायम रखता है। 4। 10। 60।
ਰਾਗੁ ਸੋਰਠਿ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਦਹ ਦਿਸ ਛਤ੍ਰ ਮੇਘ ਘਟਾ ਘਟ ਦਾਮਨਿ ਚਮਕਿ ਡਰਾਇਓ ॥
ਸੇਜ ਇਕੇਲੀ ਨੀਦ ਨਹੁ ਨੈਨਹ ਪਿਰੁ ਪਰਦੇਸਿ ਸਿਧਾਇਓ ॥੧॥
ਹੁਣਿ ਨਹੀ ਸੰਦੇਸਰੋ ਮਾਇਓ ॥
ਏਕ ਕੋਸਰੋ ਸਿਧਿ ਕਰਤ ਲਾਲੁ ਤਬ ਚਤੁਰ ਪਾਤਰੋ ਆਇਓ ॥ ਰਹਾਉ ॥
ਕਿਉ ਬਿਸਰੈ ਇਹੁ ਲਾਲੁ ਪਿਆਰੋ ਸਰਬ ਗੁਣਾ ਸੁਖਦਾਇਓ ॥
ਮੰਦਰਿ ਚਰਿ ਕੈ ਪੰਥੁ ਨਿਹਾਰਉ ਨੈਨ ਨੀਰਿ ਭਰਿ ਆਇਓ ॥੨॥
ਹਉ ਹਉ ਭੀਤਿ ਭਇਓ ਹੈ ਬੀਚੋ ਸੁਨਤ ਦੇਸਿ ਨਿਕਟਾਇਓ ॥
ਭਾਂਭੀਰੀ ਕੇ ਪਾਤ ਪਰਦੋ ਬਿਨੁ ਪੇਖੇ ਦੂਰਾਇਓ ॥੩॥
ਭਇਓ ਕਿਰਪਾਲੁ ਸਰਬ ਕੋ ਠਾਕੁਰੁ ਸਗਰੋ ਦੂਖੁ ਮਿਟਾਇਓ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਹਉਮੈ ਭੀਤਿ ਗੁਰਿ ਖੋਈ ਤਉ ਦਇਆਰੁ ਬੀਠਲੋ ਪਾਇਓ ॥੪॥
ਸਭੁ ਰਹਿਓ ਅੰਦੇਸਰੋ ਮਾਇਓ ॥
ਜੋ ਚਾਹਤ ਸੋ ਗੁਰੂ ਮਿਲਾਇਓ ॥
ਸਰਬ ਗੁਨਾ ਨਿਧਿ ਰਾਇਓ ॥ ਰਹਾਉ ਦੂਜਾ ॥੧੧॥੬੧॥
ਦਹ ਦਿਸ ਛਤ੍ਰ ਮੇਘ ਘਟਾ ਘਟ ਦਾਮਨਿ ਚਮਕਿ ਡਰਾਇਓ ॥
ਸੇਜ ਇਕੇਲੀ ਨੀਦ ਨਹੁ ਨੈਨਹ ਪਿਰੁ ਪਰਦੇਸਿ ਸਿਧਾਇਓ ॥੧॥
ਹੁਣਿ ਨਹੀ ਸੰਦੇਸਰੋ ਮਾਇਓ ॥
ਏਕ ਕੋਸਰੋ ਸਿਧਿ ਕਰਤ ਲਾਲੁ ਤਬ ਚਤੁਰ ਪਾਤਰੋ ਆਇਓ ॥ ਰਹਾਉ ॥
ਕਿਉ ਬਿਸਰੈ ਇਹੁ ਲਾਲੁ ਪਿਆਰੋ ਸਰਬ ਗੁਣਾ ਸੁਖਦਾਇਓ ॥
ਮੰਦਰਿ ਚਰਿ ਕੈ ਪੰਥੁ ਨਿਹਾਰਉ ਨੈਨ ਨੀਰਿ ਭਰਿ ਆਇਓ ॥੨॥
ਹਉ ਹਉ ਭੀਤਿ ਭਇਓ ਹੈ ਬੀਚੋ ਸੁਨਤ ਦੇਸਿ ਨਿਕਟਾਇਓ ॥
ਭਾਂਭੀਰੀ ਕੇ ਪਾਤ ਪਰਦੋ ਬਿਨੁ ਪੇਖੇ ਦੂਰਾਇਓ ॥੩॥
ਭਇਓ ਕਿਰਪਾਲੁ ਸਰਬ ਕੋ ਠਾਕੁਰੁ ਸਗਰੋ ਦੂਖੁ ਮਿਟਾਇਓ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਹਉਮੈ ਭੀਤਿ ਗੁਰਿ ਖੋਈ ਤਉ ਦਇਆਰੁ ਬੀਠਲੋ ਪਾਇਓ ॥੪॥
ਸਭੁ ਰਹਿਓ ਅੰਦੇਸਰੋ ਮਾਇਓ ॥
ਜੋ ਚਾਹਤ ਸੋ ਗੁਰੂ ਮਿਲਾਇਓ ॥
ਸਰਬ ਗੁਨਾ ਨਿਧਿ ਰਾਇਓ ॥ ਰਹਾਉ ਦੂਜਾ ॥੧੧॥੬੧॥
रागु सोरठि महला ५ ॥
दह दिस छत्र मेघ घटा घट दामनि चमकि डराइओ ॥
सेज इकेली नीद नहु नैनह पिरु परदेसि सिधाइओ ॥१॥
हुणि नही संदेसरो माइओ ॥
एक कोसरो सिधि करत लालु तब चतुर पातरो आइओ ॥ रहाउ ॥
किउ बिसरै इहु लालु पिआरो सरब गुणा सुखदाइओ ॥
मंदरि चरि कै पंथु निहारउ नैन नीरि भरि आइओ ॥२॥
हउ हउ भीति भइओ है बीचो सुनत देसि निकटाइओ ॥
भांभीरी के पात परदो बिनु पेखे दूराइओ ॥३॥
भइओ किरपालु सरब को ठाकुरु सगरो दूखु मिटाइओ ॥
कहु नानक हउमै भीति गुरि खोई तउ दइआरु बीठलो पाइओ ॥४॥
सभु रहिओ अंदेसरो माइओ ॥
जो चाहत सो गुरू मिलाइओ ॥
सरब गुना निधि राइओ ॥ रहाउ दूजा ॥११॥६१॥
दह दिस छत्र मेघ घटा घट दामनि चमकि डराइओ ॥
सेज इकेली नीद नहु नैनह पिरु परदेसि सिधाइओ ॥१॥
हुणि नही संदेसरो माइओ ॥
एक कोसरो सिधि करत लालु तब चतुर पातरो आइओ ॥ रहाउ ॥
किउ बिसरै इहु लालु पिआरो सरब गुणा सुखदाइओ ॥
मंदरि चरि कै पंथु निहारउ नैन नीरि भरि आइओ ॥२॥
हउ हउ भीति भइओ है बीचो सुनत देसि निकटाइओ ॥
भांभीरी के पात परदो बिनु पेखे दूराइओ ॥३॥
भइओ किरपालु सरब को ठाकुरु सगरो दूखु मिटाइओ ॥
कहु नानक हउमै भीति गुरि खोई तउ दइआरु बीठलो पाइओ ॥४॥
सभु रहिओ अंदेसरो माइओ ॥
जो चाहत सो गुरू मिलाइओ ॥
सरब गुना निधि राइओ ॥ रहाउ दूजा ॥११॥६१॥
हिन्दी अर्थ: रागु सोरठि महला ५ ॥ (जब) बादलों की घन घोर घटाएं दसों दिशाओं में (पसरी होती हैं)।बिजली चमक-चमक के डराती है। (जिस स्त्री का) पति परदेस गया होता है।(उसकी) सेज (पति के बिना) सूनी होती है।(उसकी) आँखों में नींद नहीं आती। 1। (पति से विछुड़ के घबराई हुई वह कहती है,) हे माँ ! अब तो (पति की ओर से) कोई संदेशा भी नहीं आता। (पहले जब कभी घर से जा के पति) एक कोस रास्ता ही तय करता था तब (उसकी) चार चिठियां आ जाती थीं।रहाउ। हे माँ ! मुझे भी ये सुंदर प्यारा लाल (प्रभू) कैसे भूल सकता है।ये तो सारे गुणों का मालिक है।सारे सुख देने वाला है। मैं भी (विछुड़ी नारी की तरह) कोठे के ऊपर चढ़ के (पति का) राह ताकती हूँ।(मेरी भी) आँखें (वैराग-) नीर से भर आती हैं। 2। हे माँ ! मैं सुनती तो ये हूँ।कि (वह पति प्रभू) मेरे हृदय देस में मेरे नजदीक ही बसता है।पर (मेरे और उसके) बीच में मेरी अहंकार की दीवार खड़ी हो गई है। (कहते हैं) भंभीरी के पंखों की तरह (बड़ा बारीक) पर्दा (मेरे और उस पति के बीच में)।पर उसके दर्शन किए बिना वह कहीं दूर प्रतीत होता है। 3। हे माँ ! जिस सौभाग्यवती पर सब जीवों का मालिक दयावान होता है।उसका वह सारा (विछोड़े का) दुख दूर कर देता है। हे नानक ! कह, जब गुरू ने (जीव स्त्री के अंदर से) अहंकार की दीवार गिरा दी।तब उसने माया-रहित दयालु (प्रभू-पति) को (अपने अंदर ही) पा लिया। 4। हे माँ !उसकी सारी चिंता-फिक्र खत्म हो जाती है। जिस जीव-स्त्री को गुरू ने वह मिला दिया।जिसकी उसे चाहत थी। प्रभू-पातशाह सारे गुणों का खजाना है।रहाउ दूजा। 11। 61।
ਸੋਰਠਿ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਗਈ ਬਹੋੜੁ ਬੰਦੀ ਛੋੜੁ ਨਿਰੰਕਾਰੁ ਦੁਖਦਾਰੀ ॥
ਕਰਮੁ ਨ ਜਾਣਾ ਧਰਮੁ ਨ ਜਾਣਾ ਲੋਭੀ ਮਾਇਆਧਾਰੀ ॥
ਨਾਮੁ ਪਰਿਓ ਭਗਤੁ ਗੋਵਿੰਦ ਕਾ ਇਹ ਰਾਖਹੁ ਪੈਜ ਤੁਮਾਰੀ ॥੧॥
ਹਰਿ ਜੀਉ ਨਿਮਾਣਿਆ ਤੂ ਮਾਣੁ ॥
ਨਿਚੀਜਿਆ ਚੀਜ ਕਰੇ ਮੇਰਾ ਗੋਵਿੰਦੁ ਤੇਰੀ ਕੁਦਰਤਿ ਕਉ ਕੁਰਬਾਣੁ ॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜੈਸਾ ਬਾਲਕੁ ਭਾਇ ਸੁਭਾਈ ਲਖ ਅਪਰਾਧ ਕਮਾਵੈ ॥
ਕਰਿ ਉਪਦੇਸੁ ਝਿੜਕੇ ਬਹੁ ਭਾਤੀ ਬਹੁੜਿ ਪਿਤਾ ਗਲਿ ਲਾਵੈ ॥
ਪਿਛਲੇ ਅਉਗੁਣ ਬਖਸਿ ਲਏ ਪ੍ਰਭੁ ਆਗੈ ਮਾਰਗਿ ਪਾਵੈ ॥੨॥
ਹਰਿ ਅੰਤਰਜਾਮੀ ਸਭ ਬਿਧਿ ਜਾਣੈ ਤਾ ਕਿਸੁ ਪਹਿ ਆਖਿ ਸੁਣਾਈਐ ॥
ਕਹਣੈ ਕਥਨਿ ਨ ਭੀਜੈ ਗੋਬਿੰਦੁ ਹਰਿ ਭਾਵੈ ਪੈਜ ਰਖਾਈਐ ॥
ਅਵਰ ਓਟ ਮੈ ਸਗਲੀ ਦੇਖੀ ਇਕ ਤੇਰੀ ਓਟ ਰਹਾਈਐ ॥੩॥
ਗਈ ਬਹੋੜੁ ਬੰਦੀ ਛੋੜੁ ਨਿਰੰਕਾਰੁ ਦੁਖਦਾਰੀ ॥
ਕਰਮੁ ਨ ਜਾਣਾ ਧਰਮੁ ਨ ਜਾਣਾ ਲੋਭੀ ਮਾਇਆਧਾਰੀ ॥
ਨਾਮੁ ਪਰਿਓ ਭਗਤੁ ਗੋਵਿੰਦ ਕਾ ਇਹ ਰਾਖਹੁ ਪੈਜ ਤੁਮਾਰੀ ॥੧॥
ਹਰਿ ਜੀਉ ਨਿਮਾਣਿਆ ਤੂ ਮਾਣੁ ॥
ਨਿਚੀਜਿਆ ਚੀਜ ਕਰੇ ਮੇਰਾ ਗੋਵਿੰਦੁ ਤੇਰੀ ਕੁਦਰਤਿ ਕਉ ਕੁਰਬਾਣੁ ॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜੈਸਾ ਬਾਲਕੁ ਭਾਇ ਸੁਭਾਈ ਲਖ ਅਪਰਾਧ ਕਮਾਵੈ ॥
ਕਰਿ ਉਪਦੇਸੁ ਝਿੜਕੇ ਬਹੁ ਭਾਤੀ ਬਹੁੜਿ ਪਿਤਾ ਗਲਿ ਲਾਵੈ ॥
ਪਿਛਲੇ ਅਉਗੁਣ ਬਖਸਿ ਲਏ ਪ੍ਰਭੁ ਆਗੈ ਮਾਰਗਿ ਪਾਵੈ ॥੨॥
ਹਰਿ ਅੰਤਰਜਾਮੀ ਸਭ ਬਿਧਿ ਜਾਣੈ ਤਾ ਕਿਸੁ ਪਹਿ ਆਖਿ ਸੁਣਾਈਐ ॥
ਕਹਣੈ ਕਥਨਿ ਨ ਭੀਜੈ ਗੋਬਿੰਦੁ ਹਰਿ ਭਾਵੈ ਪੈਜ ਰਖਾਈਐ ॥
ਅਵਰ ਓਟ ਮੈ ਸਗਲੀ ਦੇਖੀ ਇਕ ਤੇਰੀ ਓਟ ਰਹਾਈਐ ॥੩॥
सोरठि महला ५ ॥
गई बहोड़ु बंदी छोड़ु निरंकारु दुखदारी ॥
करमु न जाणा धरमु न जाणा लोभी माइआधारी ॥
नामु परिओ भगतु गोविंद का इह राखहु पैज तुमारी ॥१॥
हरि जीउ निमाणिआ तू माणु ॥
निचीजिआ चीज करे मेरा गोविंदु तेरी कुदरति कउ कुरबाणु ॥ रहाउ ॥
जैसा बालकु भाइ सुभाई लख अपराध कमावै ॥
करि उपदेसु झिड़के बहु भाती बहुड़ि पिता गलि लावै ॥
पिछले अउगुण बखसि लए प्रभु आगै मारगि पावै ॥२॥
हरि अंतरजामी सभ बिधि जाणै ता किसु पहि आखि सुणाईऐ ॥
कहणै कथनि न भीजै गोबिंदु हरि भावै पैज रखाईऐ ॥
अवर ओट मै सगली देखी इक तेरी ओट रहाईऐ ॥३॥
गई बहोड़ु बंदी छोड़ु निरंकारु दुखदारी ॥
करमु न जाणा धरमु न जाणा लोभी माइआधारी ॥
नामु परिओ भगतु गोविंद का इह राखहु पैज तुमारी ॥१॥
हरि जीउ निमाणिआ तू माणु ॥
निचीजिआ चीज करे मेरा गोविंदु तेरी कुदरति कउ कुरबाणु ॥ रहाउ ॥
जैसा बालकु भाइ सुभाई लख अपराध कमावै ॥
करि उपदेसु झिड़के बहु भाती बहुड़ि पिता गलि लावै ॥
पिछले अउगुण बखसि लए प्रभु आगै मारगि पावै ॥२॥
हरि अंतरजामी सभ बिधि जाणै ता किसु पहि आखि सुणाईऐ ॥
कहणै कथनि न भीजै गोबिंदु हरि भावै पैज रखाईऐ ॥
अवर ओट मै सगली देखी इक तेरी ओट रहाईऐ ॥३॥
हिन्दी अर्थ: सोरठि महला ५ ॥ हे प्रभू ! तू (आत्मिक जीवन की) खोई हुई (राशि पूँजी) को वापिस दिलवाने वाला है।तू (विकारों की) कैद में से छुड़वाने वाला है।तेरा कोई खास रूप नहीं बताया जा सकता।तू (जीवों को) दुखों में ढाढस देने वाला है। हे प्रभू ! मैं कोई अच्छा कर्म अच्छा धर्म करना नहीं जानता।मैं लोभ में फंसा रहता हूँ।मैं माया के मोह में ग्रसित रहता हूँ।पर। हे प्रभू ! मेरा नाम ‘गोबिंद का भगत’ पड़ गया है।सो।अब तू ही अपने नाम की खुद ही लाज रख। 1। हे प्रभू जी ! तू उन लोगों को सम्मान देता है।जिनका और कोई मान नहीं करता। हे भाई ! मेरा गोबिंद नकारों को भी आदरणीय बना देता है मैं तेरी ताकत से सदके जाता हूँ। ।रहाउ। हे भाई ! जैसे कोई बच्चा अपनी लगन के अनुसार स्वभाव के मुताबिक लाखों ग़लतियां करता है। उसका पिता उसको समझा समझा के कई कई तरीकों से झिड़कता भी है।पर फिर भी अपने गले से (उसको) लगा लेता है। इसी तरह प्रभू पिता भी जीवों के पिछले गुनाह बख्श लेता है।और आगे के लिए (जीवन के) ठीक रास्ते पर डाल देता है। 2। हे भाई ! परमात्मा हरेक दिल की जानने वाला है।(जीवों की) हरेक (आत्मिक) हालत को जानता है।(उसे छोड़ के) और किस के पास (अपनी व्यथा) कह के सुनाई जा सकती है। हे भाई ! परमात्मा निरी ज़बानी बातों से खुश नहीं होता।(कर्मों के कारण जो मनुष्य) परमात्मा को अच्छा लगने लगता है।उसका वह सम्मान रख लेता है। हे प्रभू ! मैंने और सारे आसरे देख लिए हैं।मैंने एक तेरा आसरा ही रखा हुआ है। 3।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 624 है, राग सोरठ का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
दिल्ली-यूनिवर्सिटी के North Campus में exam-season की tension।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 45 पंक्तियों का है, 3 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 624” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: सोरठ राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 625 →, पीछे का: ← अंग 623।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।